डॉ. नीरज दइया
पंच काका कुछ उदास और खोए-खोए से लग रहे हैं। उनकी यह हालत देखकर पूछा- काका, क्या बात है? तबियत तो ठीक है ना? वे बोले- तबियत को क्या हुआ है, और अब हो भी क्या सकता है? अब तो उसके घर से बुलावा आना बाकी है, देखते हैं कब बुलाता है। ऐसी वीत-राग सुनकर मैंने उन्हें टोका- काका! ऐसा क्यों सोचते हो, अभी तो बहुत काम बाकी है। माना कि आपने एक उम्र गुजार दी पर अभी इतने बूढ़े भी नहीं हुए हैं। काका असहज हो गए और बोले- बूढ़ा तो उसी दिन हो गया जिस दिन तेरी काकी इस संसार से गई, वह अब मुझे बुला रही है। मैंने मजाक में कहा- काका अब तो होली आने वाली है, उसके बाद ऐसी बातें करना। ऐसा मजाक मत करो जो सहन नहीं हो। अभी तो कुछ रंग-भंग की बातें कीजिए। मैंने सोचा कि काका कहेंगे- जा बेटा, भांग ले कर आ, पर हुआ उल्टा ही। काका हंसे और बोले- एकदम ठीक, जीवन से यह मेरा रंग-भंग ही तो गया है। तेरी काकी गई भगवान के पास और अब मुझे वहां से आवाजें दे रही है। बार-बार कहती है कि कब आओगे। अब आना-जाना मेरे हाथ में तो नहीं है।
मैंने अब साफ-साफ कहना ठीक जाना- काका, भांग लेकर आता हूं। आज हो जाए कुछ... । काका ने फिर टोक दिया- नहीं अब काहे का भांग-धतूरा। ये मोदी जी ने सारे देश के रंग में भंग डाल दिया रे। पूछ मुझसे कि कैसे? मैंने पूछा- कैसे? उन्होंने चिंतन की मुद्रा बनाते हुए कहा- मैं बताता हूं, पहले नोटबंदी फिर होंठबंदी और अब ऊपर से ये जीएसटी। कर दी ना चौपट सारी होली। मैं होली को ऐसे कैसे चौपट होने देता, तुरंत बोला- इसमें भला क्या तुक है? ऐसे-कैसे चौपट हो गई होली? होली तो होगी और खूब जोरदार होगी देखना।
काका जरा तेश में आ गए- बोले बेटा, कैसे होगी होली... मैं भी देखता हूं। अगर होली होगी तो स्वच्छा अभियान को क्या बोलेगे। अब तो है तुक, बोलो। हर बात में तुक खोजते हो, भला जीवन कोई पुरानी कविता है कि हर बंध में कोई न कोई तुक होगा ही होगा। बेतुके लोग और तुक की उम्मीद करते हो। चलो मिला दिया हमने तुक। होली में तुम पानी को बर्बाद करोगे और चारों तरफ कीचड़ ही कीचड़ कर दोगे, फिर यह कौनसा अभियान हुआ? भैया बताना जरा! और हां, रंग खेलोगे तो क्या गंदगी नहीं होगी? मैंने माथे पर सलवटे डाल ली और बोला- रंग में कौनसी गंदगी हुई, रंग तो खुद ही स्वच्छता है काका। काका कब हार मानने वाले थे, बोले- तो फिर आर टी आई लगा के खुद मोदी बाबा से ही पूछ लेता हूं कि होली में गंदगी होगी या फिर स्वच्छ होगी। अगर स्वच्छा ही होती है तो फिर भैया रोज खेलो होली और कर लो पूरा देश स्वच्छ। ये दो तरह की बातें नहीं चलेगी। होली पर क्या स्वच्छा अभियान को ऑफ कर दोगे एक-दो दिन के लिए या फिर मदिरा की दुकानों जैसे होली का भी कुछ सरकारी टाइमिंग कर दोगे। अब तुम कहोगे- मैं कौन होता हूं टाइमिंग करने वाला या फिर ऑन-ऑफ वाला। तो मितरों देश ऐसे नहीं चलता...
मैं एकदम फेड-अप हो गया। एक छोटी सी बात को ये बुढ़ऊ काका कहां से कहां ले गए। काकी जब से स्वर्गवासी हुई जरा सठिया गए हैं। हम सोचते हैं कि बड़े-बूढ़े हैं और उनसे बात करनी चाहिए पर यह तो जैसे हर बात में मोदी जी को लेकर आ जाते हैं, जैसे हम मोदी जी सगे-संबंधी है और इनकी बात उन तक पहुंचा देंगे। समझ नहीं आता- अब काका जी से आगे क्या बात करूं । कोई बहाना बना कर मैं तो खिसकता हूं। आप में बहुत हिम्मत हो तो कर लो काका जी से होली की राम-राम। पहले से कह देता हूं- जरा टाइम निकाल कर आना, फिर ना कहना कि ऐसा तो कहा नहीं था।
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पंच काका कुछ उदास और खोए-खोए से लग रहे हैं। उनकी यह हालत देखकर पूछा- काका, क्या बात है? तबियत तो ठीक है ना? वे बोले- तबियत को क्या हुआ है, और अब हो भी क्या सकता है? अब तो उसके घर से बुलावा आना बाकी है, देखते हैं कब बुलाता है। ऐसी वीत-राग सुनकर मैंने उन्हें टोका- काका! ऐसा क्यों सोचते हो, अभी तो बहुत काम बाकी है। माना कि आपने एक उम्र गुजार दी पर अभी इतने बूढ़े भी नहीं हुए हैं। काका असहज हो गए और बोले- बूढ़ा तो उसी दिन हो गया जिस दिन तेरी काकी इस संसार से गई, वह अब मुझे बुला रही है। मैंने मजाक में कहा- काका अब तो होली आने वाली है, उसके बाद ऐसी बातें करना। ऐसा मजाक मत करो जो सहन नहीं हो। अभी तो कुछ रंग-भंग की बातें कीजिए। मैंने सोचा कि काका कहेंगे- जा बेटा, भांग ले कर आ, पर हुआ उल्टा ही। काका हंसे और बोले- एकदम ठीक, जीवन से यह मेरा रंग-भंग ही तो गया है। तेरी काकी गई भगवान के पास और अब मुझे वहां से आवाजें दे रही है। बार-बार कहती है कि कब आओगे। अब आना-जाना मेरे हाथ में तो नहीं है।
मैंने अब साफ-साफ कहना ठीक जाना- काका, भांग लेकर आता हूं। आज हो जाए कुछ... । काका ने फिर टोक दिया- नहीं अब काहे का भांग-धतूरा। ये मोदी जी ने सारे देश के रंग में भंग डाल दिया रे। पूछ मुझसे कि कैसे? मैंने पूछा- कैसे? उन्होंने चिंतन की मुद्रा बनाते हुए कहा- मैं बताता हूं, पहले नोटबंदी फिर होंठबंदी और अब ऊपर से ये जीएसटी। कर दी ना चौपट सारी होली। मैं होली को ऐसे कैसे चौपट होने देता, तुरंत बोला- इसमें भला क्या तुक है? ऐसे-कैसे चौपट हो गई होली? होली तो होगी और खूब जोरदार होगी देखना।
काका जरा तेश में आ गए- बोले बेटा, कैसे होगी होली... मैं भी देखता हूं। अगर होली होगी तो स्वच्छा अभियान को क्या बोलेगे। अब तो है तुक, बोलो। हर बात में तुक खोजते हो, भला जीवन कोई पुरानी कविता है कि हर बंध में कोई न कोई तुक होगा ही होगा। बेतुके लोग और तुक की उम्मीद करते हो। चलो मिला दिया हमने तुक। होली में तुम पानी को बर्बाद करोगे और चारों तरफ कीचड़ ही कीचड़ कर दोगे, फिर यह कौनसा अभियान हुआ? भैया बताना जरा! और हां, रंग खेलोगे तो क्या गंदगी नहीं होगी? मैंने माथे पर सलवटे डाल ली और बोला- रंग में कौनसी गंदगी हुई, रंग तो खुद ही स्वच्छता है काका। काका कब हार मानने वाले थे, बोले- तो फिर आर टी आई लगा के खुद मोदी बाबा से ही पूछ लेता हूं कि होली में गंदगी होगी या फिर स्वच्छ होगी। अगर स्वच्छा ही होती है तो फिर भैया रोज खेलो होली और कर लो पूरा देश स्वच्छ। ये दो तरह की बातें नहीं चलेगी। होली पर क्या स्वच्छा अभियान को ऑफ कर दोगे एक-दो दिन के लिए या फिर मदिरा की दुकानों जैसे होली का भी कुछ सरकारी टाइमिंग कर दोगे। अब तुम कहोगे- मैं कौन होता हूं टाइमिंग करने वाला या फिर ऑन-ऑफ वाला। तो मितरों देश ऐसे नहीं चलता...
मैं एकदम फेड-अप हो गया। एक छोटी सी बात को ये बुढ़ऊ काका कहां से कहां ले गए। काकी जब से स्वर्गवासी हुई जरा सठिया गए हैं। हम सोचते हैं कि बड़े-बूढ़े हैं और उनसे बात करनी चाहिए पर यह तो जैसे हर बात में मोदी जी को लेकर आ जाते हैं, जैसे हम मोदी जी सगे-संबंधी है और इनकी बात उन तक पहुंचा देंगे। समझ नहीं आता- अब काका जी से आगे क्या बात करूं । कोई बहाना बना कर मैं तो खिसकता हूं। आप में बहुत हिम्मत हो तो कर लो काका जी से होली की राम-राम। पहले से कह देता हूं- जरा टाइम निकाल कर आना, फिर ना कहना कि ऐसा तो कहा नहीं था।
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