18 मार्च, 2018

मेरे लिए हर रचना अपनी ही तलाश है : डॉ. नीरज दइया

डॉ.नीरज दइया से डॉ. मदन गोपाल लढ़ा की बातचीत
(मेरे लिए हर नयी रचना स्वयं की तलाश है, यह कहते हैं, कवि, आलोचक, व्यंग्यकार, अनुवादक और संपादक के रूप में राजस्थानी और हिंदी साहित्य में जाने माने नाम डॉ. नीरज दइया। आपने “निर्मल वर्मा के कथा साहित्य में आधुनिकता बोध” विषय पर शोध किया है। आपकी दो दर्जन से अधिक पुस्तकें राजस्थानी और हिंदी में प्रकाशित हुई है। डॉ. दइया को साहित्य अकादेमी नई दिल्ली द्वारा राजस्थानी भाषा मुख्य पुरस्कार एवं बाल साहित्य पुरस्कार के अतिरिक्त राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं सस्कृति अकादेमी, बीकानेर के अनुवाद पुरस्कार सहित अनेक पुरस्कारों मान-सम्मानों से नवाजा जा चुका है। डॉ. दइया से डॉ. मदन गोपाल लढ़ा की बातचीत के प्रमुख अंश यहां प्रस्तुत हैं)

'बिना हासलपाई' पर साहित्य अकादमी पुरस्कार (राजस्थानी) की घोषणा से कैसा अनुभव कर रहे हैं?

पुरस्कार किसे अच्छा नहीं लगता, जाहिर है मुझे भी अच्छा लगा किंतु बहुत आश्चर्य हुआ कि गत वर्ष कहानीकार बुलाकी शर्मा और उनसे पूर्व उपन्यासकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ को यह पुरस्कार मिला था। संयोग से दोनों कथाकार बीकानेर के हैं। इस बार बीकानेर में यह तीसरा पुरस्कार प्रमाणित करता है कि अकादेमी और निर्णायकों के मूल्यांनक में पुस्तक ही सर्वोपरि होती है। लेखक के लिए कोई भी पुरस्कार सामाजिक प्रतिष्ठा के अतिरिक्त कुछ महत्त्व नहीं रखता है। बतौर लेखक यह पुरस्कार मेरे लिए नई जिम्मेदारियां लाया है।
राजस्थानी के समकालीन परिदृश्य को किस रूप में देखते हैं?
‘बिना हासलपाई’ आधुनिक राजस्थानी कहानी पर केंद्रित पुस्तक है। भारतीय कहानी अथवा साहित्य का चेहरा हिंदी के साथ प्रादेशिक भाषाओं से निर्मित होता है। राजस्थानी भाषा के समकालीन साहित्य को हिंदी और अन्य भाषाओं के साहित्य से कदम मिलाकर चलने के साथ ही उसका लौकिक स्वरूप और माटी की सौंधी महक को भी संजोए रखना चाहिए।
हिंदी व राजस्थानी दोनों भाषाओं में कई विधाओं को एक साथ कैसे साध पाते हैं?
मेरे लिए जीना और लिखना पर्याय है। वैसे लेखन के संस्कार मुझे मेरे दिवंगत लेखक पिता सांवर दइया से मिले हैं। मैं केवल लिखने के नहीं लिखता हूं, मेरा मानना है कि मेरे भीतर एक बेचैन लेखक रहता है। वही मुझे लेखन के लिए बाध्य करता है। उसे प्रतिदिन लिखने के लिए अवकाश देना मेरी नियति है। राजभाषा हिंदी व मातृभाषा राजस्थानी दोनों भाषाओं में लिखने को मैं देशभक्ति और मातृभक्ति से रूप में देखता हूं। शरीर को हिंदी और आत्मा को राजस्थानी पोषित करती है। विधाओं का चयन परिस्थितियां और सम-सापेक्ष है।
कभी ऐसा लगा कि आलोचना की राह में बहुत कांटे हैं?
बिल्कुल, ऐसे कांटें हैं जिन को चाह कर भी कोई बुहार नहीं सकता है। किसी रचना अथवा रचनाकार की आलोचना एक अंगुली से संकेत करने जैसा है। जब हम किसी दिशा में एक अंगुली करते है तो तीन अंगुलियां हमारी तरफ स्वतः मुड़ जाती है। खुद से मैं तीन सवाल करने के बाद ही प्रतिपक्ष से सवाल किए जाने के पक्ष में हूं। आलोचन में अनेकानेक सवालों से मुठभेड़ होती है। कृति और कृतिकार की दिशा से मैं चीजों को देखने-समझने का प्रयास करता हूं। किसी रचना के प्रति पूर्वधारणाओं की बजाए नए आयुधों की तलाश में रहता हूं। परंपरा और आधुनिक विकास-यात्रा में रचना के मर्म को जानना-समझना और मूल्यांकन करना हमारे पाठ के आनंद को छिन्न-भिन्न कर देता है। इसलिए सच्ची, खरी और बेलाग आलोचना तो सदा हमारे पाठक ही किया करते हैं।
आपने अनुवाद के क्षेत्र में खूब काम किया है। अनुवाद के लिए रचना का चयन कैसे करते हैं?
अनुवाद को मैं अनुसृजन मानता हूं। किन्हीं दो भाषाओं के बीच पुल बनाने का काम अनुवाद से संभव होता है। अमृता प्रीतम, निर्मल वर्मा, भोलाभाई पटेल, नंदकिशोर आचार्य, सुधीर सक्सेना जैसे अनेक रचनाकारों से भारतीय साहित्य का चेहरा बनता है। इनको अपनी भाषा में लाकर मैंने भाषा के सामर्थ्य को प्रमाणित करने का प्रयास किया है। अनुवाद का चयन रचना और रचनाकार की गुणवत्ता से स्वयं प्रभावित होकर करता हूं। भारतीय कविता की एक झांकी देखने दिखाने के लिए ‘सबद-नाद’ में लगभग सभी भारतीय भाषाओं की कविताएं राजस्थानी में देख सकते हैं।
अन्य भाषाओं से राजस्थानी में हुए अनुवाद की तुलना में राजस्थानी से अन्य भाषाओं में अनुवाद बहुत कम हुए हैं?
राजस्थानी भाषा की रचनाओं को अधिक मात्रा में हमें हिंदी और अंग्रेजी में लाना होगा। माध्यम भाषा से फिर आगे अनुवाद होने संभव हो सकेंगे। मोहन आलोक की काव्य-कृति ‘ग-गीत’ का मेरा हिंदी अनुवाद साहित्य अकादेमी से प्रकाशित हुआ है। अब मधु आचार्य ‘आशावादी’ के उपन्यास ‘गवाड़’ का हिंदी अनुवाद आने वाला है।
खुद को मूल रूप से क्या मानते हैं- कवि, आलोचक, बाल साहित्यकार, व्यंग्यकार, अनुवादक या संपादक?
मैं मूल रूप से तो इन सब का एक आवास-स्थल हूं। मेरे भीतर का लेखक ही हर बार यह चयनित करता है कि वह क्या करने वाला है। मैं लेखक के रूप में लिखने की कोई मशीन नहीं हूं, रचना के समय ही सब कुछ निर्धारित होता है। बादल आते हैं तब यह कहां तय होता है कि वे बरसने वाले हैं। कभी कभी किसी विधा का एक दौर चलता है जैसे बरसात की झड़ी लगती है।
आपकी वैचारिक प्रतिबद्धता क्या है?
मैं अपने भीतर के लेखक को कभी दायरों में कैद करने के पक्ष में नहीं हूं। कुछ मित्र मेरे लेखन के आधार पर मुझे वाद अथवा धाराओं में बांधते हैं और मैं उनकी घोषणाओं पर सहमति प्रकट करता हूं किंतु मैं हमेशा के लिए यहीं स्थिर रहूंगा यह वादा नहीं कर सकता। मेरी आस्था विचार के स्तर पर सही के पक्ष में खड़ा रहने की मेरी आस्था है और रहेगी।
आप किन लेखकों से प्रभावित हुए?
मेरा सौभाग्य यह रहा कि मैं लेखक सांवर दइया के घर जन्मा और मेरे अनेक गुरुजन साहित्य-लेखन से जुड़े थे। दिखावा नहीं करता कि फलां-फलां को पढ़ा और प्रभावित हुआ। अनेक देशी-विदेशी लेखकों से सीखने का प्रयास किया है। जब भी कोई नई रचना लिखता हूं तो मेरा पूर्व अध्ययन अथवा लेखन-कौशल काम नहीं आता। मैं हर बार खुद को खाली हाथ पाता हूं और अनुभूति के महासागर से रचना में कुछ नया लेकर लौटने का प्रयास करता हूं। मेरे लिए रचना स्वयं की तलाश है। मैं प्रयास करूंगा कि अपने लेखन की योजनाओं को फलीभूत कर सकूं।
राजस्थानी की संवैधानिक मान्यता से क्या हिंदी कमजोर हो जाएगी?
यह कुछ मूढ़ों ने भ्रम फैलाया है कि हिंदी कमजोर हो जाएगी। आदिकाल से हिंदी को राजस्थानी पोषित करती रही है। पृथ्वीराज रासो से मीरा तक की यात्रा के बाद आधुनिक काल में तो हिंदी के हित में राजस्थानी ने अपना बलिदान दिया। राजस्थानी की संवैधानिक मान्यता से हिंदी उऋण ही होगी।
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