10 जुलाई, 2017

कच्चे कान : पक्के कान

ठीक-ठीक इस विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता कि कान पकड़ने की परंपरा का आरंभ कब हुआ और किसने किया। आदिकाल से कान दो प्रकार के पाए जाते रहे है। सजीव कान और निर्जीव कान। सभी सजीवों के कान सजीव कहलाते हैं, किंतु निर्जीव कान प्रायः दीवारों के होने के समाचार है। दीवारों के कान होते होंगे, पर आज तक किसी ने देखे नहीं। अनेक प्रमाणों के आधार पर पुष्ट होता है कि दीवारों के कान होते हैं।
    आधुनिक काल में कान को ठोक-बजाकर देखें तो कान की दो किस्में हैं- कच्चे कान और पक्के कान। कहते हैं कि अफसर के कान कच्चे होते हैं। वे किसी भी बात पर जल्दी भरोसा कर लेते हैं। खासकर अपने मेल स्पूनों और फीमेल स्पूनों द्वारा दूसरों के बारे में कही गई बातों को वे आंखें मूंद कर भरोसा कर लेते हैं। कर्मचारी के विषय में शोध के परिणाम आए हैं कि उनके कान पक्के होते हैं अथवा पक्के हो जाते हैं। कर्मचारी जब कर्मचारी के रूप में सेवा आरंभ करते हैं तब उनके कान अधपक्के होते हैं। जैसे ही प्रोबेशन पूरा होता है वे पक्के हो जाते हैं। अफसर के श्रीमुख से आरंभ में कर्मचारी इतना कुछ सुन चुका होता है कि उसके कान पकने लाजमी है। अफसर का काम होता है- कहना और कर्मचारी का बंधा-बंधाया काम है- सुनना। जब अफसर जब बार-बार कहता है तो समझ लिजिए कि साहब के कान कुछ ज्यादा ही कच्चे हो गए हैं।
    अफसर चाहता है कि वह कर्मचारियों के कानों को पकड़ कर रखे। अफिस के कर्मचारी भी भला कहां कम होते हैं, वे भी अफसर से भिन्न विचार नहीं रखते हैं। जब सभी के विचार अफसरी-विचार हो जाते हैं तो कान पकड़म-पकडाई का खेल आरंभ होता है। कौन मूर्ख सीधा सीधा कान पकड़ता है। इस खेल का असूल है कि कान पकड़ा तो जाए पर उसे जरा घुमाकर पकड़ा जाए। प्रत्यक्ष में सीधा-सीधा यह नहीं लगना चाहिए कि कान पकड़ा गया है।
    सीधा कान पकड़ना निगाहों में आ जाता है, घूमाकर पकड़ा हुआ कान निगाहों में नहीं आता। सुनते हैं कि सरकार सभी नौकरीपेशा कर्मचारियों को खूब पगार देती थी और तिस पर सातवां वेतन आयोग भी दे दिया गया है। जनता का मानना है कि सरकारी दामादों के तो व्यारे-न्यारे हो गए। पर कर्मचारियों के श्रीमुख से सुना जा रहा है कि क्या दिया, कुछ नहीं! इधर दिया, उधर ले लिया। वृद्धि के नाम पर बढ़ी हुई पगार देने के साथ ही भरपाई के लिए कर यानी टेक्स से सरकार ने सभी के कान पकड़ लिए हैं। 
    पंच काका कहते हैं कि जब किसी का कान सीधा-सीधा पकड़ना संभव नहीं हो तो दूसरे-तीसरे अथवा चौथे विकल्प पर विचार ही नहीं करना चाहिए। देखिए ना पहले हमारे जमाने में गुरुजी का साप्ताहिक कार्यक्रम होता था- बच्चों के दो-च्यार बार कान पकड़ना और कान के नीचे हाथ जमाना। कभी कभी उनकी मरजी होती तो वे कान घुमाने का प्रयास भी किया करते थे। कान घूमने में सीमा यह थी कि शिष्य की आंखें छल-छला आए और गुरुजी की मुस्कान- जा बैठ बेटा! अब गुरुजी कान पकड़ने और कान के नीचे दो च्यार हाथ जमाने के सपने भी नहीं देख सकते। ऐसे में अफसरों और कर्मचारियों को आचार-संहिता का पालन करना चाहिए। यह जान लें कि भलाई इसी में है कि ये कान-कान खेल बंद ही कर दिया जाए।     
० नीरज दइया

 

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