13 जुलाई, 2017

निरे बुद्धू और गूगल बाबा

प्रतियोगिता परीक्षा के बाद बच्चे सवालों पर चर्चा करते हैं- कौनसा सही हुआ, कौनसा गलत। जो हुआ सा हो गया। पर नहीं, इनकों तो मेरे जैसे बुद्धिजीवियों की हालत दयनीय करनी होती है। पेशे से अध्यापक हूं और लेखक-कवि होने का वहम से खुद को बुद्धिजीवी मानने लगा हूं। यह कहने-सुनाने की बात नहीं है फिर भी यहां लिखना पड़ता है कि हम निरे बुद्धू हैं। हम से बड़ी-बड़ी उम्मीदें हैं। यह तो अच्छा हो गूगल बाबा का जो कुछ भी पूछो, जल्दी से बता देते हैं। यह एक गुप्त ज्ञान है। गूगल बाबा ने आधुनिक समाज में गुप्त-ज्ञान को सार्वजनिक ज्ञान की श्रेणी में कर दिया है। बच्चे ने पूछा- ‘तावान’ कहानी के लेखक कौन है? इसके साथ ही उसने चार कहानीकरों के नाम बता कर मेरा मुंह ताका। मुस्कुराता हुआ वह बोला- मुझे नहीं आता था इसलिए मैं प्रेमचंद का नाम देखकर, यही तुक्का चला आया हूं।
गूगल बाबा की जय हो कि तवान कहानी के कहानीकार प्रेमचंद ही हैं। काश! बात यहीं थम जाती तो ठीक थी। पर अगले सवाल से बुद्धिजीवी होने के वहम पर फिर गाज गिरी- ‘तावान’ का मतलब क्या होता है? एक बार फिर गूगल बाबा की जय बोलनी पड़ेगी। लाज रह गई, पर यह पक्का हो गया कि अब बिन गूगल के सब सून है। प्रेमचंदजी सरीखे लेखक भी क्या खूब थे! इतनी कहानियां लिखी कि नाम भी भला अटपटे और कठिन रख छोड़े हैं। बड़ी गलती पेपर-सेटर की है। भला यह भी क्या सवाल हुआ कि फलां कहानी किसकी है, और फलां कहानीकार की कहानी निम्न में से कौनसी? अब ये खामियाजा तो आने वाली पीढ़ियों के साथ-साथ हमको भुगतना होगा।
तावान यानी हर्जना, मुआवज़ा, क्षतिपूर्ति, अर्थदंड आदि शब्द अभी विस्मृति में पहुंचे ही नहीं थे कि हमारे शहर में एक हादसा हो गया। फटाखा गोदाम में हुई दुर्घटना ने इस बुद्धिजीवी के सामने फिर से बड़ी समस्या खड़ी कर दी। जान-माल का बड़ा नुकसान हुआ, इसका गम होने से अधिक दिखाने की कला हमें आनी चाहिए। ऐसी किसी भी घटना से अगर हमारी संवेदनशीलता आहत नहीं हो, तो हम काहे के बुद्धिजीवी? माना कि ऐसी घटना में कोई भरपाई यानी तावान संभव नहीं है। असली दर्द तो उसका है, जिसका घर-संसार उजड़ गया। गलती किसकी थी, कौन जिम्मेदार है, किसको सजा होगी? किसने अपनी ड्यूटी ठीक से नहीं की? यह सब फैसला तो होता रहेगा पर जिसकी जान गई उसका क्या होगा? ऐसी लाशों पर राजनीति और पार्टी की रोटियां सेकने वाले हमारे कितने हमदर्द है? बच्चे बड़े हो गए फिर भी सवाल करते हैं। ऐसे सवाल जिनका जबाब ना तो गूगल बाबा के पास है और ना निरे बुद्धू जी के पास। बच्चा जानना चाहता है कि एक मौत के पच्चीस लाख मुवावजा मांगने वाले ढाई लाख से राजी क्यों गए? यह भी जानना चाहता है कि ढाई लाख या पच्चीस लाख किसी मृतक के परिवार वाला सरकार को दे दे तो क्या उनका घर फिर आबाद हो जाएगा?
पंच काका कहते हैं कि ऐसी मौत की क्षतिपूर्ति संभव नहीं। कोई अर्थदंड ऐसे घावों को भर नहीं सकता। मौत के सामने हम सब लाचार होते हैं। वह किसके हिस्से कब-कहां-कैसे आएगी, इसकी खबर किसी खबरनवीश को भी नहीं होती। वैसे यह खबर है भी नहीं, यह तो परमात्मा का बड़ा व्यंग्य है। हम सब इस व्यंग्य के निशाने पर हैं। किसी का नंबर कभी भी लग सकता है।

* नीरज दइया 
 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें