21 सितंबर, 2016

ठग जाने ठग की भाषा

         म जिस महान भारत देश में रह रहें हैं, वहां हर कोई हमें कुछ न कुछ सुनाने को आमदा है। और हमारा हाल यह है कि हम इतना कुछ सुन चुके हैं कि कहीं कुछ बाकी नहीं लगता। देश से बाहर जो हमारा काला धन है, देश में आएगा। यह हमने इतना सुन लिया कि अगर काला-सफेद धन आता है और हम सब में बांटा भी जाता है तो वह रकम हमारे इस सुनने-सुनाने का हर्जना भर होगी। पूरी दुनिया में मुफ्त में सब कुछ सुनने वाले अगर कहीं किसी को मिल सकते हैं तो भारत में मिलेंगे।
         सीधे-सीधे तो किसी से यह सवाल पूछा नहीं जा सकता- ‘आप ‘खग’ का अर्थ जानते हैं या नहीं?’ तो उल्टे-पुलटे ढंग से प्रयास करते हैं। आप चाहे यकीन करें या न करें पर यह ऐसा समय है कि देश का बच्चा-बच्चा कुछ जाने न जाने पर ‘ठग’ और ‘ठगना’ तो जान ही गया है। डार्विन के वर्षों पुराने सिद्धांत का नया पाठ हमारे पंच काका ने तैयार किया है- ‘ठगना और ठगे जाना’ जो इन दिनों बेहद लोकप्रिय हो रहा है। पंच चाचा कहते हैं कि हमारे पास कुछ ऐसे सवाल और मुद्दे होने चाहिए कि जिससे सामने वाला हमें सुने और सुनता रहे। इस सुनाने और सुनाने के क्रम में वे बातें भी हम बीच-बीच में सुना सकते हैं, जिन्हें सुनने वाले बखूबी जानते हैं। और जानते भी इस हद तक है कि उन्हें सुन-सुन कर बोर ही नहीं अब तक तो पूरे पक चुके हैं।
         भारत की जनता ने वर्षों इतना कुछ सुना और सदियों से सुनती चली आ रही है कि सुनना सभी के जीन्स में शामिल है। हरदम कुछ न कुछ सुनना-सुनाना हमारा वंशानुक्रमित लक्ष्ण है। अब तो हाल यह है कि जिसे देखो सुनाने को आमदा है। सुनने वाल कौन बचा है? घर में पिता की न बेटा सुनता हैं न बेटियां और ऐसा ऐसा घर तो शायद ही भारत भूमि पर पाया जाएगा जहां पति सुनाएं और पत्नी सुने। देश, समाज और राजनीति में भी जो कुछ सुनाने में सक्षम हैं, वही राज करते हैं। सत्तारूढ़ इतना कुछ सुनाते हैं कि हमें वोट देते समय सोचना पड़ता है कि शायद दूसरा अथवा तीसरा विकल्प कुछ कम सुनाने वाला होगा।
         हमारी विवशता है कि हम ऐसे समय में हैं जहां अब हमें किसी को कुछ सुनाने के नए-नए तरीके इजाद करने होगे। ऐसे में बहुत जरूरी हो गया कि आप कुछ ऐसी घटनाओं, ब्यौरों और शब्दों को याद कर लें, जो दूसरे नहीं जानते हैं। ध्यानाकर्षण के लिए यह बहुत जरूरी है। खैर बात ‘खग’ की करते हुए, मैं भी इतनी चतुराई से आपको कहां ले आया हूं। आपको अब तो लगने लगा होगा कि अरे यह ‘खग’ तो बहुत उड़ लिया। ‘खग’ के बहाने मैं ऐसे ठगों की कह रहा हूं जिनसे हम ठगे जाने की त्रासदी झेल रहे हैं।
         क्या आप जानते हैं रबीन्द्रनाथ टैगोर की ख्याति के कारणों में एक कारण उनका एक खग की कहानी लिखना भी माना जाता है। वर्षों से यह पंडितों का काम है कि वे खगों को भी पढ़ा सकते हैं। पर पंडित तो खग की भाषा नहीं जानते, और गनीमत यह कि सारे खग पंडितों की भाषा बखूबी समझते है। लोकतंत्र में राजा का नाम भले बदल गया हो, पर राजा अब भी तोते को चुटकी से दबाते हैं। पढ़े-लिखे तोते हैं जो ना हां करते हैं, ना हूं करते हैं। हां, उसके पेट में पोथियों के सूखे पत्ते अब भी खड़खड़ाने लगते है। मेरा तो यहां तक मानना है कि अब जो हम सुन रहे हैं, वह क्या सूखे पत्तों की खड़खड़ाट तो नहीं है?
         पंच चाचा कहते हैं- खग जाने खग की भाषा और ठग जाने ठग की भाषा। जीवन इस कदर रीतता जा रहा है कि कहीं कोई प्रतिरोध नहीं है। चंद सिक्कों की खनखनाहट और कुछ मरे हुए या जीवन से शून्यता की तरफ गति करते शब्दों की खड़खड़ाट सुनना ही भारतीय जीवन का शेष रह गया है।

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