02 सितंबर, 2016

पांच लेखकों के नाम

र्षों पहले किसी लेखक से पंच चाचा ने सवाल किया था- पांच लेखकों के नाम बताओ?’ तब वह बेचारा लेखक नाम नहीं गिना पाया या इस संकोच में रहा होगा कि किसका नाम लूं और किसका छोड़ूं। ऐसा भी हो सकता है कि उसे उस समय पांच लेखकों के नाम मालूम ही नहीं हो, और होने को तो यह भी हो सकता है कि वह लेखक पूरे साहित्य-संसार में सिर्फ स्वयं को ही लेखक मानता हो सो चार नाम कौनसे लिए जाए। खैर हुआ यह कि वर्षों बाद वही लेखक पंच चाचा को देख उनके पीछे पीछे दौड़ता आया और हांफते-हांफते बोला- ‘मैं पांच लेखकों के नाम बताना चाहता हूं।”
       ऐसे कोई आपके पीछे दौड़ लगाकर आए और कहे मैं पांच लेखकों के नाम बताना चाहता हूं तो आप क्या कहेंगे। वह लेखक तो वर्षों तक पांच लेखकों के नाम की तलाश में भटकता रहा था और दौड़ते-दौड़ते इस दिन तक पहुंचा कि वह खुद को पांच लेखकों के नाम बताने लायक समझ रहा था। पंच चाचा मुस्कुराए और बोला- “क्यों?”
       उस लेखक ने अगला-पिछला सारा विवरण दिया और बोला- ‘आपने तब पूछा था और मैं अब बता रहा हूं तो कोई परेशानी है क्या?’ पंच चाचा ने इसे सहृदयता से लिया और बोले- ‘तुम इतने वर्षों पांच लेखकों के नाम नहीं बता पाए तो अब क्या खाक बताओगे! चलो चाय की दुकान पर चाय पीते हैं और मैं तुम को वहीं पूरी बात समझा सकूंगा।’
       वह पंच चाचा के पीछे-पीछे चाय की दुकान पहुंचा और दो चाय का बोलकर सामने बैठ गया। पंच चाचा फिर शुरु हो गए- ‘पर तुम पांच लेखकों के नाम जो बताने वाले हो वे कहां के हैं? तुम्हारे अपने ही घर-परिवार के हैं या गली-मौहल्ले के हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि पांच के पांच नाम हमारे ही शहर के तुम बताने लगो। और अगर ऐसा है भी तो देखना होगा कि पांच लेखकों की विधाएं क्या-क्या है? उन में सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व भी होना चाहिए। उन की कितनी-कितनी किताबें प्रकाशित हुई है और कौन-कौन से पुरस्कार मिले हैं। साथ में यह भी देखना होगा कि समकालीन आलोचना ने उनका मूल्यांकन किस श्रेंणी का मानकर किया है। भैया मैंने तुम से जोड़-तोड़ कर लेखक बनने वाले लेखकों के नाम नहीं पूछे थे। मुझे यह भी देखना होगा कि तुम कितने संकीर्ण हो, प्रांत और देश की सीमा से भी ऊपर उठकर बात करनी होती है। कहा जाता है कि जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि। समझ रहे हो ना तुम, यह मामला ऐसा है कि तुम को कवियों के जब गूढ़ स्थानों की जानकारी हो ही नहीं सकती तो नाम क्या जान सकोगे। कोई कहीं पहुंच गया होगा और कोई कहीं।’
       इतने में चाय आ गई। पंच चाचा के सामने उसकी तो जैसा बोलती बंद हो गई। वह सिर झुकाए मनन करता रहा तो पंच चाचा ने फिर बोलना चालू किया- ‘सुन भैया, तुम क्या बड़े-बड़े लेखक पांच लेखकों के नाम नहीं बता पाते, जहां उन को नाम बताने होते हैं वहां कन्नी काटते हैं या फिर एक-दो रटे-रटाये नाम लेकर आदि-आदि से काम चलाते हैं। साहित्य पढ़ने-पढ़ाने वाले भी बस कोर्स की किताबों तक वर्षों घसीटते रहते हैं। किसी से पूछो कहानीकार का नाम तो प्रेमचंद और कवि का नाम पूछो तो तुलसीदास से आरंभ करेंगे और दो-च्यार नाम के बाद गाड़ी रुक जाती है।’       वह लेखक उठ खड़ा हुआ और बोला- ‘मुझे माफ कर दीजिए, मैं पांच लेखकों के नाम नहीं जानता। बस एक ही नाम जानता हूं, वो है आपका।’
- नीरज दइया  

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