मास्टर जी का नियम था कि वे हमेशा सुबह और शाम थोड़ी देर से सैर को जाते थे। सर्दी-गर्मी या फिर बरसात कोई मौसम हो वे अपना नियम नहीं तोड़ते थे। इस बार की गर्मियां पिछली से कुछ अलग है। अलग इस मायने में कि इस बार सर्दी भी अधिक रही तो गर्मी भी पहले से कुछ अधिक है। रोज सूरज सिर पर चढ़कर जैसे आग बरसा रहा है। पेड़-पौध सभी झुलस गए हैं। बाहर निकलने का मन ही नहीं करता। इन दिनों दिन भी कुछ लंबे हो गए हैं। रिटायरमेंट के बाद घर में बैठे-बैठे ऊब जाते हैं। नई आबादी में मास्टर जी ने मकान बनवा लिया है। अब वे धीरे धीरे दुनियादारी से पीछा छुड़ाते हुए भक्ति-भावना और स्वास्थ्य-लाभ में लीन होते जा रहे हैं। सुबह-शाम नित्य पूजा-पाठ के साथ सैर करना उनकी दिनचर्या में ढल गया है।
अब शाम ढल चुकी है फिर भी गर्मी का अहसास बना हुआ है। मास्टर जी का एक मन करता है- अब तो बाहर निकलें। थोड़ा घूम आएं। अगले पल उनका दूसरा मन कहता है- क्या करना है बाहर जाकर। बाहर सुहानी शाम नहीं, बहुत गर्मी है। मास्टर जी ने दूसरे मन की नहीं मानी और बाहर निकल पड़े। उन्होंने आकाश की तरफ देखा और मन ही मन कहा- ‘बरसात कब होगी?’
आकाश में बादल कम ही नजर आ रहे थे। रात की काली चादर की छाया थोड़ी देर में होले-होले पूरे आकाश पर छा जाएगी। मास्टर जी मन ही मन किसी पुरानी बात को याद कर मुस्कुराने लगे। शायद उन्हें अपना बचपन याद आ गया था। वे सोचा करते थे कि दिन के बाद रात, और रात के बाद दिन कैसे आता है? ऋतुएं कैसे बदलती है? बरसात कैसे होती है? बचपन में कितने-कितने सवाल-जवाब होते थे। पढ़ाई करते-करते धीरे-धीरे स्कूल में आगे से आगे बढ़ते गए और सवालों के जवाब एक एक कर मिलने लगे। फिर तो पूरी एक उम्र निकल गई स्कूल में बच्चों को सवाल-जवाब समझाते-समझाते। मास्टर जी ने सोचा नहीं था कि बुढ़ापा ऐसा होता है।
गली से सड़क पर आते ही उन्हें दूर बनी दुकानों के पास कुछ बच्चे बैठे दिखाई दिए। शाम हो चुकी थी पर सड़क पर अब भी वीरानी छाई थी। यह ना दिन का समय है और ना रात का, इसे गोधूलि बेला कहते हैं। मास्टर जी के चेहरे पर फिर मुस्कान तैर गई। आजकल के बच्चों को तो पता भी नहीं है कि गोधूलि वेला होती क्या है? ये सब गुड मोर्निंग और गुड इवनिंग के चक्कर में असली बातें भूलते जा रहे हैं। फिर खुद से ही बोले- पर बच्चों का इसमें क्या दोष है? उनको तो कोई बताए तब वे जानेंगे। मास्टर जी टीन शेड के करीब पहुंच गए थे और उन्होंने देखा- वहां चार बच्चे बैठे थे। तभी अनाचक ना जाने क्या हुआ कि वे यकायक कुछ देख कर चौंकें और गिर पड़े। उनके मुंह से दो शब्द निकले थे- ‘अरे... सांप।’ एक बार तो बच्चों की खिलखिलाहट की आवाज हवा में सुनाई दी फिर सब चुप हो गए थे। मास्टर जी ऐसे गिरे कि वापस ना संभले ना कुछ बोले।
चारों लड़के दौड़ कर मास्टर जी के पास पहुंचे। एक ने कहा- ‘मर गए क्या?’
दूसरा बोला- ‘नहीं। ऐसे थोड़े मर जाते हैं। डर गए हैं।
तीसरा लड़के का घर पास ही था वह दौड़ा-दौड़ा घर गया और अपने चाचा को बुला लाया। चौथा लड़का रोने लगा। वह रोते रोते बोला- ‘यह क्या हो गया, हमने क्या कर दिया?’
आस-पास से कुछ आदमी आकर वहां जमा हो गए। उन में से एक ने तो मास्टर जी को पहचान लिया। वह बोला- ‘इनको मैं जानता हूं बी छब्बीस में रहते हैं। रिटार्ड मास्टर जी हैं। इनके घर खबर भेजो।’
सवाल जवाब करने वाले बहुत जमा हो गए थे। कोई पूछ रहा था- ‘आखिर ऐसे हुआ कैसे?
एक कह रहा था- ‘मास्टर जी अचानक कैसे गिर गए?’
- ‘होली की मजाक में सांप-सांप बच्चे खेल रहे थे और मास्टर जी गश खाकर गिर पड़े।’
- ‘यह सब इन बदमाश छोकरों की शरारत है।’
जितने लोग उतनी बातें। बातें होती रहीं। इस बीच मास्टर जी के घर खबर भेजी दी गई और मौहल्ले के कुछ लोगों ने मास्टर जी के हाथ पैर पकड़ कर उन्हें टेक्सी में डाल लिया। टेक्सी सीधे अस्पताल की तरफ दौड़ने लगी। जमा लोग बच्चों को धमकाने लगे।
मास्टर जी बेहोश हो गए हैं और होश आ जाएगा पर यदि मास्टर जी को कुछ हो गया तो तुम सब की खैर नहीं है। बच्चे डर गए। होली की मजाक-मजाक खेल में यह क्या से क्या हो गए। कुछ आशांका व्यक्त कर रहे थे कि कहीं मास्टर जी को हार्ट अटैक ना आ गया हो। बहस होने लगी- ऐसा नहीं हो सकता है। इतनी सी बात पर भला ऐसा होता है क्या?
- कुछ कमजोर दिल के होते हैं तो उनको ऐसे में हार्ट अटैक भी आ सकता है।
मास्टर जी के परिवार से उनकी पत्नी और बेटे की बहू घटना स्थल पर पहुंची गई। पूरी बात का पता किया कि कैसे बच्चे नकली सांप से होली का मजाक बना रहे थे और मास्टर जी डर कर चित हो गए।
अब मास्टरनी लड़कों पर चिल्लाने लगी- ‘तुम चारों लड़के नहीं जिंदा सांप हो। इतनी जल्दी होली-होली केवल तुम में ही घुस आई है क्या?’ और वह रोने लगी।
भीड़ को देखकर और शोर सुनकर आस-पास की काफी औरतें-आदमी वहां पहुंच गई थे उन्होंने मास्टरनी जी को संभाला। जिंदा सांपों की मां-बहनों ने मास्टरनी से कहा- ‘धीरज रखो बहन जी, कुछ नहीं होगा। अभी मास्टर जी आ जाएंगे।’
मास्टर जी के बेटे की बहू ने हिम्मत दिखाई और उसने बातों में समय गमाने की बजाय वहां से अस्पताल जाने का निर्णय लिया। उसने टेक्सी बुला कर अपनी सास को साथ लिया और अस्पताल पहुंच गई। जैसे ही वे टेक्सी से उतने लगे उनको अस्पताल से मास्टर जी कुछ आदमियों के साथ बाहर आते दिखाई दिए।
मास्टरनी की रोनी सूरत पर मुस्कान तैर आई और बोली- ‘बेटा देखे, तेरे बाऊजी आ रहे हैं। सब ठीक है ना।’
बहू भी खुशी से अपनी चुन्नी को सिर पर लेते हुए कहने लगी- ‘हां मां आप नाहक चिंता कर रहे थे। सब ठीक है।’
मास्टर जी ने भी अब अपनी पत्नी और बहू को देख लिया था। वे कह रहे थे- ‘अरे, तुम दोनों यहां क्यों आ गई? मुझे कुछ नहीं हुआ है।’
एक आदमी आगे बढ़ा और बोला- ‘बहन जी, हमें माफ कर दीजिए। मेरे लड़के की शरारत....।’
बहन जी यानी मास्टरनी जी कहां माफ करने वाली थी, बोली- ‘वे लड़के नहीं है, जिंदा सांप है। यह भी भला होली की मजाक होती है। अभी होली कितनी दूर पड़ी है।’
मास्टर जी बोले- ‘कमला जी, बच्चों के लिए ऐसा नहीं कहते हैं। उन्हें माफ कर दो। बच्चे हैं नादान है भोले है।’
कमला जी यानी मास्टरनी जी फिर भी बोले बिना नहीं रही, बोली- ‘भोले हैं सो ठीक है, पर भोलेनाथ के सांप को लेकर मजाक क्यों करते हैं?’
01 जुलाई, 2023
जिंदा सांप/ डॉ. नीरज दइया
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