एक समय की बात है, छोटे से गांव में दो जुड़वा बहनें रहती थीं। उनके माता-पिता ने उन्हें ‘आशा’ और ‘निराशा’ नाम दिए थे। दोनों अपनी-अपनी प्रकृति में एक दूसरे से बिलकुल अलग थीं। आशा हमेशा उम्मीद और खुशियों से भरी रहती थी, जबकि निराशा इसके ठीक विपरीत अक्सर उदास और निराश रहती थी।
एक दिन, गांव में मेला आया। मेले के बात सुनकर आशा खुशी में उछल-कूद मचा रही थी, जबकि निराशा लगातार उदास बैठी कुछ सोच रही थी।
आशा ने सोचा- मेले में घूमने-फिरने के साथ ही बड़ा झूला झुलने को मिलेगा। गोला गोल ऊंचा झूला और तरह तरह के झूले। खाने-पीने की अलग अलग स्वाद की ढेरों चीजें मिलेंगी। कपड़े और बहुत से सामान वे मेले से कम कीमत में खरीद सकेंगी।
वहीं निराशा कुछ अलग सोच रही थी- मेले में घूमने-फिरने से थक जाएंगे और बुखार हो जाएगा। वहां वे लोग साफ-सफाई का ध्यान नहीं रखते हैं। हम गंदा खाएंगे-पीएंगे तो बीमार हो जाएंगे। बीमार होंगे तो दवाई के पैसे लगेंगे। कपड़े और दूसरे सामान देखकर मन लालच से भर जाएगा। लड़कियां भी अपने सजने-संवरने के सामान पर कितने रुपये खर्च कर देती है! हद होती है यार... मेला यानी वक्त की बरबादी।
एक दिन मेल में चलने के लिए आशा ने निराशा को धक्का दिया, चल-चल चलते हैं। निराशा ने रोनी सूरत बना रखी थी फिर भी आशा ने हंस कर जोश के साथ कहा- ‘चलो निराशा बहन, हम मेला देखने जाएंगे। वहां खूब मौज-मस्ती करेंगे। बहुत सारे मजेदार खेल-खिलौने होंगे और हां, चामत्कारिक चीजें देखने को मिलेंगी।’
निराशा मेले में नहीं जाने का निर्णय ले चुकी थी। उसने सोचा- आशा गंदी लड़की है। यह कोई जिद पकड़ लेती है तो उसे नहीं छोड़ती है।
आशा उम्मीद भरी आंखों से लगातार आग्रह करती रही तो आखिर में उसकी जीत हुई और निराशा ने अपनी जिद छोड़ दी। दोनों ने मेले में जाने का फैसला किया और वे दोनों मेले के रास्ते लहराती हुई चल पड़ीं।
मेले में पहुंचकर, आशा ने देखा कि निराशा के चेहरे पर अब भी कोई अधिक खुशी नहीं है। उसने अपनी बहन निराशा दीदी का हाथ पकड़ा और मेले की घुमाई करने के लिए तेजी से चलने लगी। उसने कहा- ‘जिंदगी बहुत सारे रंगों का नाम है। इन रंगों से ही हमारे भीतर सुख-दुख होते हैं। कम रंग तो दुखी होना पड़ेगा। आओ! हम खुसियों के सारे रंग बटोर लें।’
इस बात पर भी निराशा दीदी चुप रही तो आशा ने आपनी बात को आगे बढ़ाया- ‘दुनिया में बहुत सारी चीजें आखिर बनी हुई किसने लिए है? हमें मजे से जीना चाहिए और जीवन को हर बार नए अवसर देने चाहिए।’
निराशा ने कहा- ‘मेरा नाम तो निराशा है, भला मैं क्या अवसर दे सकती हूं।’
आशा ने कहा- ‘नाम पता सब भूल जाओ। बस सोचो कि तुम हो।’
निराशा ने सोचा कि वह है इस दुनिया में एक सुंदर और प्यारी बच्ची। बस ऐसा सोचते ही उसमें जैसे एक नई आशा का संचार होने लगा। अब वह अपनी बहन के साथ मजेदार खेलों में हिस्सा लेने लगी। उन्हें वहां राइड्स पर सवारी कर खूब आनंद लिया। दोनों बहनें आपस में बातें करती रहीं। उनमें इतनी बातें पहले कभी नहीं हुई थी। वे एक दूसरे की समस्याओं को सुनती और समझती रहीं।
आशा और निराशा थी तो दोनों एक ही उम्र की पर फिर भी आशा ने खुद को बड़ा मानते हुए निराशा को समझाया कि चुनौतियों से हमें हार नहीं माननी चाहिए। सकारात्मक सोच का जीवन में बहुत महत्त्व होता है।
उसे लगा कि निराशा अब बदल रही है। वह बदल जाएगी। पर यह क्या... दूसरे ही दिन फिर निराशा ने खुद को अपने कमरे में बंद कर लिया। पूछने पर बोली- ‘परीक्षा में मेरे अंक कम क्यों आते हैं?’
आशा उसे हर बात समझा सकती थी पर वह समझना ही नहीं चाहती थी।
सीधी और सरल सी बात थी- आशा पढ़ाई में सक्रिय रहती थी इसलिए वह होशियार थी और वह हमेशा खुश रहती थी। वहीं निराशा सुस्त रहती और कामचोर थी तो उसका नाम कमजोर बच्चों में आता था। उसके पेपर भी अच्छे नहीं होते थे। कभी-कभी तो वह पेपर पूरा लिखती भी नहीं थी इसलिए उसके अंक कम आते थे। उसे लगता रहता था कि सब उसके साथ भेदभाव करते हैं।
दोनों बहनें अलग-अलग दिशा में चल रही थीं।
एक दिन विद्यालय के वार्षिकोत्सव की तारीख घोषित की गई। विद्यालय ने विभिन्न प्रतियोगिताओं का एक कार्यक्रम जारी किया। सभी छात्र-छात्राओं के लिए अच्छा अवसर था। आशा, जो हमेशा से आगे रहती थी, उसने इन प्रतियोगिताओं में भाग लेने का निर्णय कर लिया था। वह प्रतियोगिताओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने के लिए मेहनत करने लगी। उसकी अद्भुत प्रतिभा को देखकर उसे प्रशंसा मिली।
वहीं, निराशा ने भी कुछ प्रतियोगिताओं में डरते डरते हिस्सा लेने का निर्णय लिया आशा के कहने पर किया। बहन की प्रेरणा से निराशा के जीवन में नई उम्मीदें उमंगे हिलोरे ले रही थी। उसने कुछ नया करने का फैसला किया। उसने मेहनत बढ़ाई और विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग लिया तो कुछ में उसे सफलता मिली।
दोनों बहनों ने एक साथ प्रतिस्पर्धा के लिए तैयारी की और उनके घर जैसे ईनामों के ढेर लग गए। इस मुकाबलें ने उन्हें एक-दूसरे के साथ गहरे बंधनों में बांध दिया। उन्होंने अपनी अनुभूतियों, ज्ञान और कौशल का प्रदर्शन किया और आपसी प्रतिस्पर्धा के बावजूद एक दूसरे का समर्थन भी किया। प्रतियोगिता उन्हें न केवल अकेले अपने आप को प्रमाणित करने का अवसर दिया, बल्कि उन्हें एक-दूसरे के साथ अधिक सहयोगी बनाने का भी मौका दिया।
इस घटना के बाद, आशा और निराशा ने मिलकर एक दूसरे के समर्थन में खड़े होने का निर्णय ले लिया था। वे सहयोग करने और एक-दूसरे की पढ़ाई में मदद करने के लिए साथ काम करने लगीं। आशा ने निराशा को उत्साहित किया और निराशा ने आशा को समर्थन प्रदान किया। उन्होंने एक-दूसरे की कमियों को पूरा किया और वे सफलता पर सफलता प्राप्त करती चली गई।
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29 मई, 2023
आशा-निराशा / नीरज दइया
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