25 दिसंबर, 2021

जूते का स्वाद / डॉ. नीरज दइया

 एक दिन अकबर ने बीरबल से पूछा- “बीरबल, दुनिया में सब से बेहतर स्वाद किसका होता है?” बीरबल सोच में पड़ गया। वह जब भी सोच में पड़ता, अकबर से कहा अदब से कहता- ‘‘जहांपनाह ! थोड़ा वक्त दीजिए।’’ इस बार भी उसने यही कहा, और उसे वक्त दे दिया गया। अब दिन-रात बीरबल को चिंता सताने लगी कि अगर किसी खाने-पीने या फल आदि का नाम लिया और बादशाह अकबर को वह पसंद नहीं आया तो क्या होगा? यहां तो उसकी हाजिर-जवाबी पर दाग लगने की नौबत आ पहुंची। वह यही सोच सोच कर परेशान रहने लगा- अगर उसकी और जहांपनाह की पसंद जुदा निकली तो क्या होगा! हो सकता है कि बूढ़े जहांपनाह बूढ़े होते बीरबल की अंतिम परीक्षा ले रहे हो और इसके बाद उसे सदा-सदा के लिए विदा कर दिया जाए। विदा क्या धक्के मार कर दरबार से बाहर कर दिया जाए... बीरबल की आंखों में आंसु आ गए। हाय अल्लाह! इतने सालों की वफादारी का यह ईनाम बख्सा जाएगा!
    आंसु तो मेरे भी आने वाले हैं, कारण यह कि मेरे पाठक आप श्रीमान तो शीर्षक देखकर यह विचार कर चुके हैं कि स्वादों में सबसे निराला स्वाद जूतों का ही बताया जाएगा। क्या आप इस बात से सहमत हैं? अब मैं बीरबल बन कर आपसे थोड़ा समय लेकर बात को आगे बढ़ा रहा हूं कि कहीं कोई स्वाद जूतों से बेहतर आपको समझा सकूं। यह तो बेहद सरल था कि मैं बीरबल के श्रीमुख से अकबर को तपाक से उत्तर दिला देता- “जहांपनाह स्वादों में सबसे बेहतरीन स्वाद तो जूते का स्वाद होता है।” यों बात वहीं खत्म हो जाती। हो जाती तो ठीक ही थी, पर नहीं हुई और बिना कुछ किए कराए मुंह में जूते का स्वाद भर गया है। दुनिया में हजारों चीजे हैं जनाब, और जूता भी भला कोई खाने की चीज और स्वाद में आता है क्या? पर क्या करें सबकी अपनी अपनी पसंद होती है और ना मालूम बदशाह सलामत की पसंद क्या हो। और खुदा का खौफ नहीं उनकी पसंद तो बदलती रहती है!
    श्रीमान सुनिए बात यूं है कि यह कोई झूठा किस्सा या बनी बनाई झूठी कहानी नहीं है। बिल्कुल सच्ची घटना है कि एक लेखक अपने आस-पास अनेक लेखकों के चित्रों को अपने आस-पास बिखेर कर उन्हें जूते का स्वाद चखा रहा था- “दुष्टों, साहित्य का तुम सब ने मिलकर बेड़ा गर्क कर दिया है। मैं जब तक इस संसार में पैदा हुआ तुम सब ने मिलकर वह सब कुछ लिख डाला जो-जो मैं लिखने की सोच कर यहां आया था।” देखिए, आजादी ने हमें बहुत सारी हिम्मत दे दी है। माना कि इस जूता प्रकरण में उसका स्वाद हमारे लेखक मित्रों तक नहीं पहुंच सका। उनमें से कुछ लेखक तो स्वगवासी थे किंतु जो इसी संसार के वासी थे उनको इसकी खबर तक नहीं लगी कि कोई नया लेखक उनको जूतों का प्रसाद दे रहा है। मुझे लगने लगा है कि अब तो आपके मुंह में भी कुछ कुछ स्वाद जूतों का आने लग गया है।
    वैसे तो यह मेरी कल्पना ही थी कि जूते का स्वाद बेहतरीन होता है किंतु अब यकीन हो चला है कि दुनिया में सबसे बेहतरीन स्वाद जूते का ही है। उम्र के साथ उसका स्वाद बदलता जाता है। जूते की ऐड़ी और ऊंची ऐड़ी का स्वाद समान नहीं हो सकता। मित्र और हसीना के जूते का स्वाद तो भैया भिन्न-भिन्न होता ही है। आजकल जमाना बदल गया है किसी को मर्दाना जूते का स्वाद पसंद है तो किसी को फैशनेबल जनाना। अपना ख्याल यहां तो हाई हील के जूते खाने के लिए दुनिया में ऐसे स्टोर भी खुल रहे हैं जहां ग्राहक बड़ी संख्या में आते हैं और उनकी लाइन लगती है। एक रेस्टोरेंट सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना कि वहां खाने में जूते परोसे जाते हैं। खाने वाले जूता, चॉकलेट से बना है। अकबर-बीरबल ने तो उसी जमाने में यह स्वाद रहस्य जान लिया था किंतु अब इस नई दुनिया का मानना है कि जूते का स्वाद गजब का होता है।
    जते का स्वाद ऐसा है कि सब जानते और मानते हैं। हो सकता है इसे स्वीकार करने की हिम्मत नहीं हो। इसका स्वाद तो सभी जानते हैं और कोई जीवन ऐसा नहीं जिसने इसका स्वाद ना जाना हो। किंतु सत्य यह भी है कि इस विषय में पूछे जाने पर हर कोई किन्नी काटता हैं। यह संकोच कैसा…? दरसल जूता सदैव एक संभावनाशील विषय रहा है और हर युग में रहेगा। बीरबल ने जाना कि हमारे भरत जी जूते का स्वाद बखूबी जानते थे इसलिए तो रामजी के खड़ाऊ लेकर अयोध्या वापस लौट आए और जूते यानी खड़ाऊ को पूजते रहे। अब विचार कीजिए कि पूरा भक्तिकाल भगवान के श्रीचरणों में बैठा कर कौन से स्वाद को लेकर साहित्य का स्वर्णयुग बन बैठा है। साहब को कभी मेम साहब के जूतों का स्वाद पूछ कर देखिए। ऐसे गोपनीय प्रकरण रसरंजन के बाद श्रीमुख की शोभा होते हैं, अस्तु इसके साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ करना अधोषित अपराध है।
- डॉ. नीरज दइया

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एक दिन अकबर ने बीरबल से पूछा- “बीरबल, दुनिया में सब से बेहतर स्वाद किसका होता है?” बीरबल सोच में पड़ गया। वह जब भी सोच में पड़ता, अकबर से अदब से कहता- ‘‘जहांपनाह ! थोड़ा वक्त दीजिए।’’ इस बार भी उसने यही कहा, और उसे वक्त दे दिया गया। अब दिन-रात बीरबल को चिंता सताने लगी कि अगर किसी खाने-पीने या फल आदि का नाम लिया और बादशाह अकबर को वह पसंद नहीं आया तो क्या होगा? यहां तो उसकी हाजिर-जवाबी पर दाग लगने की नौबत आ पहुंची। वह यही सोच सोच कर परेशान रहने लगा- अगर उसकी और जहांपनाह की पसंद जुदा निकली तो क्या होगा! हो सकता है कि बूढ़े जहांपनाह बूढ़े होते बीरबल की अंतिम परीक्षा ले रहे हो और इसके बाद उसे सदा-सदा के लिए विदा कर दिया जाए। विदा क्या धक्के मार कर दरबार से बाहर कर दिया जाए... बीरबल की आंखों में आंसु आ गए। हाय अल्लाह! इतने सालों की वफादारी का यह ईनाम बख्सा जाएगा!

            आंसु तो मेरे भी आने वाले हैं, कारण यह कि मेरे पाठक आप श्रीमान तो शीर्षक देखकर यह विचार कर चुके हैं कि स्वादों में सबसे निराला स्वाद जूतों का ही बताया जाएगा। क्या आप इस बात से सहमत हैं? अब मैं बीरबल बन कर आपसे थोड़ा समय लेकर बात को आगे बढ़ा रहा हूं कि कहीं कोई स्वाद जूतों से बेहतर आपको समझा सकूं। यह तो बेहद सरल था कि मैं बीरबल के श्रीमुख से अकबर को तपाक से उत्तर दिला देता- “जहांपनाह स्वादों में सबसे बेहतरीन स्वाद तो जूते का स्वाद होता है।” यों बात वहीं खत्म हो जाती। हो जाती तो ठीक ही थी, पर नहीं हुई और बिना कुछ किए कराए मुंह में जूते का स्वाद भर गया है। दुनिया में हजारों चीजे हैं जनाब, और जूता भी भला कोई स्वाद में आता है क्या? पर क्या करें सबकी अपनी-अपनी पसंद होती है और ना मालूम बदशाह सलामत की पसंद क्या हो। और खुदा का खौफ नहीं, उनकी पसंद तो बदलती रहती है!

            श्रीमान सुनिए, बात यूं है कि यह कोई झूठा किस्सा या बनी बनाई झूठी कहानी नहीं है। बिल्कुल सच्ची घटना है कि एक लेखक अपने आस-पास अनेक लेखकों के चित्रों को अपने आस-पास बिखेर कर उन्हें जूते का स्वाद चखा रहा था- “दुष्टों, साहित्य का तुम सब ने मिलकर बेड़ा गर्क कर दिया है। मैं जब तक इस संसार में पैदा हुआ तुम सब ने मिलकर वह सब कुछ लिख डाला जो-जो मैं लिखने की सोच कर यहां आया था।” आजादी ने हमें बहुत सारी हिम्मत दे दी है। माना कि इस जूता प्रकरण में उसका स्वाद हमारे लेखक मित्रों तक नहीं पहुंच सका।    वैसे तो यह मेरी कल्पना ही थी कि जूते का स्वाद बेहतरीन होता है, किंतु अब यकीन हो चला है कि दुनिया में सबसे बेहतरीन स्वाद जूते का ही है। उम्र के साथ उसका स्वाद बदलता जाता है। जूते की ऐड़ी और ऊंची ऐड़ी का स्वाद समान नहीं हो सकता। मित्र और हसीना के जूते का स्वाद तो भैया भिन्न-भिन्न होता ही है। आजकल जमाना बदल गया है किसी को मर्दाना जूते का स्वाद पसंद है, तो किसी को फैशनेबल जनाना जूतियां। अपना ख्याल यहां तो हाई-हील के जूते खाने के लिए दुनिया में ऐसे स्टोर भी खुल रहे हैं जहां ग्राहक बड़ी संख्या में आते हैं और उनकी लाइन लगती है। एक रेस्टोरेंट सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना कि वहां खाने में जूते परोसे जाते हैं। खाने वाले जूता, चॉकलेट से बना है।

            जूते का स्वाद ऐसा है कि सब जानते हैं। हो सकता है इसे स्वीकार करने की हिम्मत नहीं हो। कोई जीवन ऐसा नहीं जिसने इसका स्वाद ना जाना हो। किंतु सत्य यह भी है कि इस विषय में पूछे जाने पर हर कोई किन्नी काटता हैं। यह संकोच कैसा…? हमारे भरत जी जूते का स्वाद बखूबी जानते थे इसलिए तो रामजी के खड़ाऊ लेकर अयोध्या वापस लौट आए और खड़ाऊ पूजते रहे। पूरा भक्तिकाल भगवान के श्रीचरणों में बैठ कर कौन से स्वाद को लेकर साहित्य का स्वर्णयुग बन बैठा है। साहब को कभी मेम साहब के जूतों का स्वाद पूछ कर देखिए। ऐसे गोपनीय प्रकरण रसरंजन के बाद श्रीमुख की शोभा होते हैं। यकीन कीजिए जूतमपाक से बेहतरीन स्वाद इस संसार में दूसरा नहीं है और बीरबल को सारे स्वाद जान लेने के बाद यही उत्तर देना पड़ा। अकबर भी यह उत्तर जाकर ना जाने क्यों चुप रहे!

 



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