25 दिसंबर, 2021

‘म्हारो काळजो’ संग्रै

‘म्हारो काळजो’ संग्रै री कवितावां मिनख रै आपै री अंवेर करती थकी आधुनिक समाज नै आपरी परंपरा री हेमाणी नै अंवेर’र राखण री अरज करै। संस्कृति अर संस्कारां री अंवेर खातर बरसां पैली कवि डॉ. हरिमोहन सारस्वत ‘रूंख’ रो पैलो कविता-संग्रै ‘गम्योड़ा सबद’ (2003) आयो, जिण रै मारफत बां कविता रै आंगणै कीं सबदां नै सोधणता जूण रा साच दरसावण री खेचळ करी ही। अठै कवि आपां नै आपरो काळजो सबदां रै मारफत दरसावण रो जतन करै।
    ‘म्हारो काळजो’ री कवितावां मिनखाजूण री अणथक जातरा नै अरथावण-बिड़दावण अर लगोलग बधावण री कवितावां है। कवि आपरै आसै-पासै अर मांयली दुनिया मांय हुय रैया बदळावां कानी ध्यान करण री बात करै। जीवण रो खरो साच सेवट मरण मानीजै पण मरण नै मंगळ मानण वाळी कविता परंपरा मांय अबै पैली दांई रणखेत मांय जुध नीं हुय’र नितूकै अंतस मांय जुध चालै। कवि जूण-खेत मांय बेफिकरी सूं आगै बधण अर भरोसो राखण रो संदेस देवै। कवि बदळतै बगत मांय छूटतै संस्कारां अर मिनखाजूण मांय खूटतै मिनखपणै नै समझण-समझावण अर चेतावण री बात करै।
    ‘म्हारो काळजो’ री कवितावां जाण्यै-अणजाण्यै साच नै फेर फेर जाणकारी मांय लावण री कवितावां है। ‘कठै सूं चाल/ कठै तांई पूगणो है/ कुण जाणै’ जैड़ी ओळ्यां इण बात री साख भरै। कवि जूण रै हरेक साच रो मन सूं स्वागत करण री बात करै। आं कवितावां री खासियत नवी बुणगट रै साथै कवि री आपरी भासा अर भावां है जिण रै पाण कविता बांचणियां रा मन मोवै।
    ‘म्हारो काळजो’ री कवितावां मांय युवा कवि री मनगत भेळै प्रौढ हुवतै कवि-मन री चिंतावां ई आपां देख सकां। जूण रा साच सूं ओ काळजो आकळ-बाकळ हुयोड़ो है। अठै अंतस रै लूण नै बचावण री बात भेळी अंतस सूं जुड़ी केई बातां है जिण मांय भासा अर जुबान री खास बात मिलैला। आं कवितावां नै बांचणो आपरै जुगबोध सूं अरू-भरू हुवणो है। आस करां कै कवि भेळै आखो मानखो ई आपरी भासा, साहित्य अर संस्कारां री हेमाणी नै बचावण खातर संभैला। जूण मांय बिसरता मूल्यां नै बचावण री साची अर खरी आफळ खतार कवि नै मोकळी बधाई रै साथै मंगळकामनावां कै कवि री काव्य-जातरा अणथक आगै आगै बधैला।

-    डॉ. नीरज दइया

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें