28 दिसंबर, 2021

डॉ. शक्तिदान कविया की स्वर्णिम आभा / डॉ. नीरज दइया

 डॉ. शक्तिदान कविया (1940-2021) शिक्षा, साहित्य, अनुवाद और संपादन आदि अनेक क्षेत्रों में अविस्मरणीय नाम है। आपके बड़े और व्यापक कार्य को किसी एक छोटे से आलेख में समाहित करना असंभव है। यहां बस अपने कुछ प्रसंगों-अनुभवों के माध्यम से अंतर्मन के कविया जी को आपके सामने प्रस्तुत करने का मेरा प्रयास रहेगा। मेरा मानना है कि बहुत बार हम बहुत कुछ जानकर भी काफी कुछ से वंचित होते हैं। जानने में भी अनेक घटक छूट जाते हैं। जनाना किसी सीमा में आबद्ध होता है। जानकारियों का सिलसिला हमें एक कड़ी से अनेक कड़ियों से जोड़ता हुआ कहीं का कहीं पहुंचा देता है। एक उदाहरण के हवाले से बात करें तो कविया जी को वर्ष 1993 का साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार अनूदित कृति ‘धरती घणी रूपाली’ (1991) के लिए अर्पित किया गया है। यह रामेश्वरलाल खंडेलवाल ‘तरुण’ के हिन्दी कविता–संकलन ‘तरुण काव्य–संचयन’ का राजस्थानी पद्यानुवाद है। भीलवाड़ा के महाकवि तरुण जी के काव्य-संसार से मेरा परिचय नहीं रहा, मैंने उन्हें इस अनुवाद के माध्यम से जाना-पहचाना है।
    कृति ‘धरती घणी रूपाली’ के अनुवाद के बारे में डॉ. आनंद प्रकाश दीक्षित ने लिखा- ‘तरुण की कुछ चुनी हुई कविताओं का राजस्थानी के सरस हृदय कवि डॉ. शक्तिदान कविया ने राजस्थानी में उन कविताओं की संपूर्ण गरिमा और अर्थ एवं भाव की रक्षा करते हुए सुघड अनुवाद प्रस्तुत करके बड़ा ही उपयोगी कार्य किया है। उनका अनुवाद मूल रचना के सन्निकट और उसके लिए सोने में सुगंध जैसा है।’ पचास कविताओं की इस कृति में प्रस्तावना विद्वान लेखक डॉ. मनोहर शर्मा ने लिखी और स्वयं अनुवादक ने भी अपनी बात भूमिका ‘अनुवादक रा आखर’ में विस्तार से रखी है। यही नहीं अंग्रेजी भाषा के कवि टॉमस ग्रे की ‘एलीजी’ का अनुवाद भी कविया जी ने किया जो बेहद चर्चित रहा है। इनकी भूमिकाओं के माध्यम से हम कविता और अनुवाद की अनेक बातें जान सकते हैं।
    दो बातें स्पष्ट है एक तो यह कि कविया जी कविता के अच्छे अनुवादक रहे हैं और दूसरी यह कि उनका अध्ययन व्यापक-विशद रहा है। वैसे उन्होंने स्वयं भी कविताएं लिखी है। एक कवि हृदय दूसरे कवि हृदय को बेहतर ढंग से समझ सकता है। परंपरागत डिंगळ शैली और छंदबद्ध काव्य-रचनाओं के लिए पहचाने जाने वाले कविया जी की सर्वाधिक जनप्रिय कविता को राजस्थानी भाषा की वंदना कह सकते हैं। ‘इणरौ इतिहास अनूठो है, इण मांय मुलक री आसा है।/ चहूंकूंटां चावी नै ठावी, आ राजस्थानी भासा है।’ जब-जब राजस्थानी भाषा और मंचीय कविता की बात होगी हमें इस अद्वितीय कविता का स्मरण करना होगा। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि सपूता री धरती, दारू-दूषण, धरा सुरंगी धाट, धोरां री धरोहर जैसी काव्य-कृतियों के द्वारा कवि के रूप में अनेक छंदबद्ध रचनाएं देने वाले कविया जी ने आधुनिक कविता के क्षेत्र में भी किंचित योगदान दिया है, किंतु वे डिंगळ के छंदवद्ध कवि के रूप में ही ख्याति प्राप्त कर सके हैं। आधुनिक गद्य विधाओं खासकर उपन्यास, कहानी, कविता, नाटक आदि के विषय में उनका चिंतन लेखन मेरे अध्ययन में नहीं आया है किंतु वे महाविद्यालय में राजस्थानी विभागाध्यक्ष रहे तो निसंदेह इन सब पर भी उनका समान अधिकार रहा है।  
    कविता और अनुवाद की बात करते हुए प्रसंगवश हमें यहां यह भी विचार करना चाहिए कि किसी अनुवादक के द्बारा किसी रचना अथवा कृति को अनुवाद के लिए चयन करने का मूल आधार क्या होता है। इसमें सर्वाधिक अभिमत तो अनुवादक की अपनी पसंद है जो निसंदेह महत्त्व भी रखती है। कविया जी के साथ भी ऐसा ही रहा है। साहित्य अकादेमी के अनुवाद पुरस्कार से सम्मानित कृति के अनुवाद का बीजारोपण अनुवादक कविया जी के मन में वर्ष 1958 में हुआ, जब वे कविवर तरुण की कविता ‘बटोही ठंडी सांस न ले’ रचना से बेहद प्रभावित हुए थे। वर्ष 1989 में महाकवि तरुण की ‘तरुण-काव्य ग्रंथावली’ का प्रकाशन हुआ और दिसंबर 1990 में उन्होंने उनकी चयनित लगभग पचास कविताओं का राजस्थानी रूपांतरण किया। यहां यह भी रेखांकित किया जाना जरूरी है कि किसी मूल कविता के मूल छंद को अनुवाद की भाषा में उसी छंद और भाव गरिमा के साथ साधना बेहद श्रमसाध्य होता है जो   उन्होंने इस अनुवाद में किया है।
    जब हम कविया जी के विशद कार्य को देखते हैं तो उनको किसी एक रूप अथवा विधा के बंधन में नहीं बांध सकते हैं। वे कवि और अनुवादक तो थे ही किंतु उससे भी अधिक उनका मान-सम्मान निबंध विधा में रहा है। उन्होंने एक बेजोड़ गद्यकार के रूप में जहां वचनिका शैली को साधने का प्रयास किया, वहीं विविध विषयों के व्यापक अध्ययन-मनन-चिंतन से पुष्ट उनके निवंध विषयगत आधरभूमि कहे जाते हैं। ‘संस्कृति री सोरम’ (1984) निबंध-संग्रह में दस निवंधों के माध्यम से राजस्थानी संस्कृति के अनेक परिचित-अपरिचित पक्षों को कविया जी ने वाणी दी है। यहां परंपरा और आधुनिकता का सुंदर समन्वय देखा जा सकता है। लोक-संस्कृति, लोक-परंपराओं, लोक-विश्वासों और लोक-साहित्य के व्यापक अध्यान को यहां शब्द-शब्द सुवास और लालित्यपूर्ण गद्य में देख सकते हैं।     
      यह देखकर आश्चर्य होता है कि उन्होंने जिस विद्वता से अनेक ग्रंथों की भूमिकाएं और प्रस्तावनाएं लिखी उनमें स्वतंत्र रचनाओं-विचारों के अनेक अंश मौजूद है। शायद यही कारण रहा होगा कि अनेक कृतियों की भूमिकाओं और प्रस्तावनाओं में से चयनित 24 को उन्होंने कृति ‘प्रस्तावना री पीलजोत’ (2009) में संकलित किया था। मेरा मानना है कि शक्तिदान कविया की स्वर्णिम आभा इन रचनाओं के अतिरिक्त अनेक ऐसे ग्रंथ संपादनों की भूमिकाओं में भी मिलती है। उदाहरण के लिए भारतीय विद्या मंदिर शोध प्रतिष्ठान से प्रकाशित राजस्थानी की चर्चित कृति ‘छन्द राउ जइतसी रउ’ (1991) का संपादन मूलचंद ‘प्राणेश’ ने किया जिसमें प्रस्तावना डॉ. शक्तिदान कविया की प्रकाशित हुई है। इसी प्रकार राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान से प्रकाशित ‘सोढायण’ (1966) के संपादक के रूप में कविया जी ने 92 पृष्ठीय भूमिका में बहुत विस्तार से विविध आयामों को स्पर्श करते हुए जो कुछ लिखा है वह अपने आप में अद्वितीय मेधा का अनुपम उदाहरण है। कैसे एक व्यक्ति ने इतिहास, साहित्य और संस्कृति को एकमेक करते हुए अतीत के पन्नों को प्रामाणिकता के साथ उजागर किया है यह देखने-समझने की बात है। उनको कवि-अनुवाद के साथ निबंधकार और आलोचक के रूप में मानना समीचीन होगा।  
    हिंदी लेखक की बात करें तो उनके विपुल लेखन को संग्रहित किया जाना है। अब तक उनकी तीन कृतियां- राजस्थानी साहित्य का अनुशीलन, डिंगल के ऐतिहासिक प्रबंध काव्य और राजस्थानी काव्य में सांस्कृतिक गौरव हिंदी में प्रकाशित हुई है। उन्होंने राणी लक्ष्मी कुमार चूड़ावत पर विशेष कार्य किया है। राजस्थानी दूहा संग्रह, राजिया रा सोरठा और ऊमरदान ग्रंथावली जैसे अनेक ग्रंथों के संपादन के लिए उनकी अक्षय कीर्ति है। डॉ. शक्तिदान कविया के संपूर्ण कार्यों की प्रारंभिक जानकारी के लिए राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर द्बारा प्रकाशित राजस्थानी साहित्य रा अगीवाण शृंखला में डॉ. गजादान चारण द्वारा लिखित विनिबंध देख सकते हैं।
    डॉ. शक्तिदान कविया को यदि मैं गुरुओं का गुरु कहता हूं तो यह कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। उन्होंने शिक्षा विभाग राजस्थान के शिक्षक रचनाकारों की संपादित कृति ‘फूल सारू पांखड़ी’ (1984) की भूमिका भी अनेक ऐसे बिंदुओं को उजागर किया है कि वे आज भी भाषाई दृष्टिकोण से प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। ‘फूल सारू पांखड़ी’ में गहरी व्यंजना है जो गागर में सागर उक्ति से मिलती-जुलती है। गागर में सागर में अधिकता का भाव है, वहीं फूल सारू पांखड़ी में न्यूनता की अभिव्यक्ति है। बहुत अधिक के स्थान पर बस थोड़ा-सा अथवा उसका अंश मात्र अभिव्यक्त करना अथवा होना ‘फूल सारू पांखड़ी’ में समाहित है। आठ-दस पृष्ठों की भूमिका में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात भाषा के प्रति गंभीर और सजग होने की प्रेरणा गुरुजनों को देना है। उन्होंने अनेक उदाहरणों-उद्धरणों के द्वारा शिक्षक विभाग में सेवारत राजस्थानी लेखकों का आह्वान किया है कि यदि वे सजगता से कार्य करेंगे तो निकट भविष्य में भाषा मानकीकरण का कार्य बेहद सरल-सहज हो जाएगा। उनका मानना रहा कि राजस्थानी में ‘लेखक’ के लिए ‘लिखारौ’ शब्द उचित नहीं है। इसका कारण वे देते हैं कि ‘लेखक’ में ‘क’ कर्त्ता का बोधक है, जबकि ‘लिखारौ’ में अर्जीनवीस या प्रतिलिपिकार ही हो सकता है। निसंदेह यह उनका लेखन के लिए जिस सृजनात्मक क्षमता का अहसास समाहित करने की बात का उदाहरण है। इसी भांति उन्होंने राजस्थानी के लिए ‘पाठक’ या ‘पढ़णहार’ दोनों शब्दों को ‘पढ़ार’ की तुलना में अधिक उचित-बेहतर बताया है। यहां यह कहने का अभिप्राय है कि शिक्षकों को उनकी भाषा और वर्तनी की अनेक जानकारियों के साथ प्रेरित और प्रोत्साहित करने वाले कविया जी ने स्वयं एक रचनाकार के रूप में समरूपता का निर्वाहन करने का प्रयास जीवन पर्यंत किया है। इस लिहाज से वे भाषाविद अथवा भाषा वैज्ञानिक के रूप में भी पहचाने जा सकते हैं। ऐसे पुरोधा की स्मृति को नमन।  

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें