15 अगस्त, 2019

राजस्थानी की पहली कहानी

सत्तरहवीं शताब्दी से राजस्थानी भाषा में वार्ताओं के रूप में कहानी का आरंभिक रूप मिलता है, जिनको ‘वात’ अथवा ‘बात’ नाम से पहचाना जाता है। यद्यपि आधुनिक राजस्थानी कहानी की शुरूआत बीसवीं सदी के आरंभ में हुई है। बांग्ला, मराठी, हिंदी, अंग्रेजी आदि साहित्य की प्रेरणा से भारतीय भाषाओं में कहानी की जमीन तलाश की गई। राजस्थानी में पहली कहानी का श्रेय अधिकांश विद्वान श्री शिवचन्द भरतिया की ‘विश्रांत प्रवासी’ (1904) को देते हैं। यह हिन्दी मासिक ‘वैश्योपकारक’ (कोलकत्ता) में प्रकाशित हुई थी, जो पूर्ण नहीं है। हिंदी में जैसे भारतेन्दु जी को मान-सम्मान मिला वैसा ही मान-सम्मान और स्थान राजस्थानी में राजस्थान के प्रवासी साहित्यकार शिवचंद भरतिया को प्राप्त हुआ है। आपका राजस्थानी उपन्यास और नाटक के क्षेत्र में भी अद्वितीय योगदान रहा है।
आपका जन्म कन्नड़ (हैदराबाद) में चैत्र शुक्ला सप्तमी, विक्रम सम्वत् 1910 (ई.स. 1853) में हुआ। आपके दादा गंगाराम जोधपुर रियासत के डीडवाणा गांव के वैश्य अग्रवाल कुल के थे। आपके पिता का नाम बलदेव था।
शिवचन्द भरतिया का निधन 12 फरवरी, 1915 को इंदौर में हुआ।

राजस्थानी भाषा में आपकी कृतियां हैं-
·         कनक सुन्दर (नवल कथा)
·         केसर विलास (नाटक)
·         फाटका जंजाल (नाटक)
·         बोध-दर्पण
·         मोत्यां की कंठी (दूहा-संग्रह)
·         विश्रांत प्रवासी (कहानी)
·         वैष्यप्रबोध
·         संगीत मानकुंवर (नाटक)

विश्रांत प्रवासी

            हवा की लहरें ऊपर की ओर आ रही थी। आठ बज रहे थे। धीरे-धीरे लोग बिखरने लगे। आस-पास भीड़ कम हो गई। मेरे प्रवासी शरीर को अब कुछ शति मिली और विचार-शक्ति बढ़ी। प्रेम का उदय होने से हृदय भीतर ही भीतर फड़फड़ाया। मानो नींद से जगकर आदमी आलस्य तोड़ता जम्हाई लेता है। बार-बार जम्हाई लेते हुए मन ही मन कहा-हे परमेश्वर, तुम्हारी यह कैसी लीला है, ब्रह्मदिक भी पार नहीं पा सके। तुम्हारी विचित्र माया है। कहां मेरी मातृभूमि, कहां मेरा देश और घर-संसार? घर छोड़ते समय ऐसा चित्र मेरे हृदय पटल पर अंकित हुआ कि उसका विस्मरण मेरी मृत्यु के साथ ही होगा। प्रिय राधवल्लभ का बार-बार समझाकर नहीं जाने का हठ, क्रोधावेश और प्रेममय संभाषण अब भी मेरे कानों में गूंज रहा है। माताजी की आशीर्वाद युक्त दृष्टि और जल्दी वापसी की आज्ञा मुझे घर की तरफ खींच रही है। हाय, मेरी प्रिया के प्रेमिल टप-टप-टप अश्रुपात से मेरा प्रवासी मन अब तक मुग्ध है, भ्रांतियों से धिरा मैं विचार-शून्य होकर बेंच के हत्थे पर सिर रखकर सो गया।
            निंद्रा नहीं थी। वह मोह भरी भ्रांति ही थी। नहीं, नहीं प्रेम की मूर्छा थी। थोड़ी देर बाद मेरी आंख खुली। आंख खुलते ही अश्रुधारा निकल पड़ी। दिल ने कहा-मैं बहुत दिनों से घर छोड़ने का विचार कर रहा था, परंतु कभी प्राणप्रिया से कह नहीं सका। मैं अच्छी तरह जानता था कि अगर पहले बता दूंगा तो परदेश जाना कभी संभव नहीं होगा। प्रेम-बंधन विचित्र होता है। बड़ी-बड़ी लकड़ी बेधने वालों! भ्रमर जरा से कमल में बंधकर अंदर ही अंदर मर जाता है, पर कमल के दांत नहीं लगा सकता।
            माधुर्य बिना अनुभव जाना नहीं जाता। उसकी माधुरी पता मधुपान किए बिना नहीं चलता। जिससे अनिर्वचीय आंनद प्राप्त होता है, जिससे हृदय खिंचता है, जिसके लिए प्रबल इच्छा उत्पन्न होती है और जिसके लाभ से हृदय स्नेह से परिपूर्ण होता है, वहीं प्रेम है। यह भाव हृदय को परस्पर खींचता है। बिजली के तार की भांति झटके जैसे एक दूसरे हृदय पर आघात करता है। प्रेम का भाव, प्रेम का भावुक मन और प्रेम की भावना में से किसी का भी लोप हो जाए तो दूसरा नहीं रहता। वह भावमयी मूर्ति पांव से जमीन पर भाव लिखती, अश्रुधारा से लेख बहाती, हृदय को कंपित करती, दृष्टि को तिरोहित करती, सुख को आच्छादित करती, कटाक्ष बाणों से रास्ता रोकती, मन का हरण करती, मधुर, आनंदहीन, चांचल, उदास, गलित-वेदना, प्रत्यक्ष करुण रस की नदी मेरे निःसहाय हृदय को बहा रही है, डूबो रही है और प्राणों को व्याकुल कर रही है।
                                                                                              
(अनुवाद- डॉ. नीरज दइया)
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डॉ. नीरज दइया (1968) हिंदी और राजस्थानी में विगत तीन दशकों से निरंतर सृजनरत हैं। आप कविता, व्यंग्य, आलोचना, अनुवाद और संपादन के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान रखते हैं। अब तक आपकी दो दर्जन से अधिक कृतियां विविध विधाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं।
साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली के राजस्थानी भाषा में मुख्य पुरस्कार और बाल साहित्य पुरस्कार से सम्मानित डॉ. दइया को राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर के अनुवाद पुरस्कार समेत अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों-सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है। डॉ. नीरज दइया की प्रमुख कृतियां हैं- आलोचना रै आंगणै, बिना हासलपाई, जादू रो पेन, कागला अर काळो पाणी, मंडाण, पाछो कुण आसी (राजस्थानी), राजस्थानी कहानी का वर्तमान, उचटी हुई नींद, पंच काका के जेबी बच्चे, टांट टांय फिस्स, आधुनिक लघुकथाएं, कागद की कविताई (हिंदी) आदि।
वर्तमान में आप केंद्रीय विद्यालय, क्रमांक-1, बीकानेर में पी.जी.टी. (हिंदी) के पद पर सेवारत हैं।
- डॉ. नीरज दइया
सी-107, वल्लभ गार्डन, पवनपुरी,
बीकानेर- 334003 (राज.)
मो. : 9461375668
-मेल : drneerajdaiya@gmail.com

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