15 अगस्त, 2019

‘आड्यां अळूझी जूण’ / महेन्द्र मोदी

पोथी - आड्यां अळूझी जूण (संस्मरण) लेखक- महेन्द्र मोदी, प्रकाशक- बोधि प्रकाशन, जयपुर , संस्करण : 2019 ; पृष्ठ- 324 ; मूल्य- 350/-
  ब सूं पैली तो ‘आड्यां अळूझी जूण’ पोथी खातर लेखक महेन्द्र मोदी जी नैं मोकळी बधाई अर मंगळकामनावां। राजस्थानी में संस्मरण लिखणियां गिणती रा है- मुरलीधर व्यास, श्रीलाल नथमल जोशी, शिवराज छंगाणी, नेमनारायण जोशी, सूर्यशंकर पारीक, सत्येन जोशी, कमला कमलेश, तारालक्ष्मण गहलोत, अस्तअलीखां मलकांण, बैजनाथ पंवार, देवकिशन राजपुरोहित, जितेन्द्र निर्मोही, अनुश्री राठौड़, महेन्द्र मोदी, हरिचरण अहरवाल आद। महेन्द्र मोदी री नवी पोथी बाबत बात करां उण सूं पैली आपां जाणा कै आ जातरा अधजागी रातां : अधसूता दिन’ 2017 में पैलै खंड सूं चालू हुई। लेखक मुजब आ पोथी तीजै खंड मांय पूरी हुवैला। दोनूं पोथ्यां नैं देख’र लेखक री हिम्मत री सरावणा करूं कै अस्सी का सौ पानां री पोथ्यां रै दौर में आप कीं खेचळ बेसी करी हो।
            पोथी री बात करां तो आपां साम्हीं लेखक महेन्द्र मोदी रेडियो री आपारी नौकरी अर जूण-जातरा री लांठी अनुभव गांठड़ी नैं खोलर राखण री हिम्मत करी है। बै लिखती बगत किणी बात री सोच-फिकर दर ई कोनी करै। अठै साफ सबदां में कैयो जावणो चाइजै कै सरकारी काम-काज सूं छुट्टी लियां पछै, बै जाणै आपरै पूरै मैकमै री छुट्टी करण मांय लाग्योड़ा है। छुट्टी इण अरथ मांय कै मोदी जी अफसर हा अर मैकमै री पोल-पट्टी अबै खोलण लाग रैया है तो केई नांवां नैं बदळ ई दिया है जिण सूं किणी माथै आंच नीं आवै।
            पैली पोथी में इक्कतीस अर दूजी पोथी में अठाइस संस्मरण राख्यां पछै ई अजेस ठाह नीं कित्तो कांई लिखैला, का कैवां लिखज चुक्यो है। कैयो जाय सकै कै जियां-जियां मिनख री उमर बधै उण मांय धीरज बापरतो जावै अर फेर मोदियां रो तो सुभाव ई घणो मीठो हुया करै, बै इसा मीठा बोलै कै ठाह ई कोनी पड़ण देवै कै कद जादू कर देवै। इण पोथी मांय मोदी जी घणै धीरज सूं आपरी जूण री चोखी-माडी घणी सारी बातां नैं अेकठ करण रो जतन करियो है। सरकारी जादतिया अर काण-कायदा रै आंटै बै घणै आकरै सुर मांय केई जागा आपरै सुभाव नै बिसरावतां बोलता ई दीसै, पण इत्तो बेगो कोई फैसलो आपां नैं नीं करणो चाइजै क्यूं कै हाल तीसरी पोथी आवणी बाकी है। 
          असल मांय मोदी जी आपरै लांबै अनुभव रै पाण किणी बात नै रेडियो माथै किण ढाळै कैवणी चाइजै रो आंटो जाण चुक्या अर उणी आंटै रै कारणै बै आपरै सुणणियां अर बांचणियां नैं प्रभावित करै। ओळूं-गांठड़ी मांय सूं छांट-छांट’र या कैवां टाळ-टाळ’र केई छोटी-छोटी अर लांबी बातां किणी बातपोस दांई जाणै दोनूं पोथ्यां मांय पुरसी हुवै। हरेक संस्मरण खुद मांय पूरो हुवतां थकां ई आगलै-लारलै संस्मरणां सूं जुड़’र पोथी किणी आत्मकथात्मक उपन्यास दांई आगै बधती जावै। इण पोथी नैं संस्मरणां री पोथियां रै क्रम री दूजी पोथी कैयो गयो है, पण म्हारो मानणो है कै महेन्द्र मोदी री आत्मकथा रो ओ दूजो भाग है।
            पैली पोथी री हर करां तो जूथिका रॉय रो गाणो अर उण री मीरा सूं तुलना रै प्रसंग में महादेवी वर्मा नै ई लेखक रो याद करणो, पण उण बाबत पूरो प्रसंग स्यात पोथी रै तीजै भाग मांय आवैला। दूजी पोथी मांय लेखक रो खुद आपरी पैली पोथी रै संस्मरण नै चेतै कराणो अर दुसरावणो ई अठै देख सकां। गळी री ओळूं नै चितरता दोनूं पोथी मांय भंवरी रो प्रसंग किणी उपन्यास दांई ठेठ तांई परोटण सूं कड़ियां आपसरी मांय जुड़ती जावै।
            लारली पोथी बाबत म्हारो मानणो हो कै पोथी आपां री दीठ सूं उळझ्योड़ै अर लगोलग उळझतै बगत नैं अरथावण रो काम करै। उण विगत सूं आगै पोथी- ‘आड्यां अळूझी जूण’ मांय महेन्द्र मोदी री जूण-जातरा सैकंड ईयर रै परीक्षा रै बगत सूं चालू हुवै अर बै घर-परिवार, मित्रां भेळै आकाशवाणी री नौकरी बाबत घणो कीं चेतो करता-करावतां सेवट आपरै बेटै-पोतै भेळै बीकानेर मांय मौज रा दिनां री हर करै। पोथी सूं एक दाखलो देखां-
            “जिकी धरती नै लोक धोरां री धरती रै नांव सूं पिछाणता हा, हम्मै तो उण बीकानेर रै आसै-पासै धोरां रो नांव निशाण ई कोनी। लारलै दिना जद म्हारै पोतै टाइगर धोरा देखण री इन्छ्या जताई तो म्हे कार ले’र बोळा आगा निकळ ग्या पण धोरां जै’ड़ा धोरां म्हांनै निजर नई आया जदकै कोई जमानो हौ जणा धोरा उड उड’र म्हारै आंगणै में आ बिराजता। घणी पैली री बात क्यां करां टाइगर अर उण रै डैडी यानि म्हारै बेटै वैभव रै बिचाळै एक पीढी रौ ई तो फासलो है, वैभव छोटो हौ जणा रस्तै में ई धोरा मिल जांवता। वैभव खासी ताळ वां धोरां में रमतो रैंवतो। एक ई पीढी में म्हे लोकां सोनै जै’ड़ै चिलचिलातै धोरां नै पाधरा कर’र उण री ठौड़ पॉलीथीन रौ कचरो खिंडा दियो।” (आड्यां अळूझी जूण, पेज-293)
            आपां आगै कीं बात करां उण सूं पैली एक दखलो भळै लेवणो ठीक रैसी- “अब तो बीकानेर के आस पास बालू के टीलों का कहीं नाम निशान भी नहीं है, पिछले दिनों जब हम लोग बीकानेर गए हुए थे, मेरे पोते ने बालू के उन टीलों को, जिन्हें हम बचपन से धोरों के नाम से पहचानते आये हैं, देखने की इच्छा ज़ाहिर की तो हम कार लेकर जाने कितने किलोमीटर चारों ओर घूम आये, हमें कहीं धोरों के दर्शन नहीं हुए जबकि किसी ज़माने में ये धोरे आँधियों में उड़ उड़ कर हमारे घरों में आ जाया करते थे. वैभव जब छोटा था तब तक धोरे हमसे इतनी दूर नहीं हुए थे. अक्सर जब शाम को मैं खाली होता था, उसे स्कूटर पर आगे खड़ा करके गंगाशहर की तरफ निकल जाता था, रास्ते में ही धोरे मिल जाया करते थे और वैभव उन धोरों में देर तक खेलता रहता था. वैसे बहोत मुश्किल वक़्त था वो. पानी के लिए भिश्तियों पर निर्भर रहना पड़ता था, जो चमड़े की पखालों और मशकों में भर कर पानी लाते थे. नाप तौल कर पानी काम में लेना पडता था.” (दी लल्लनटॉप,  जब चारों तरफ बिच्छू जैसी फितरत वाले लोग हो गए थे, 06 अगस्त, 2018)
            इण लारली ओळी नैं कीं पलेथन लगा’र लेखक इण ढाळै लिखै- ‘बियां उण बगत जिनगी में च्यारूं मेर दोरप ई दोरप ही। स्सोरो कीं कोनी हौ। पाणी का तो रतनसागर कूऐ सूं भर’र लाओ अर का फेर भिश्तियां सूं नखवाओ। कूऐ माथै 10-12 नळका लाग्या थका हा, आधा हिंदुआं सारू आधा मुसळमानां सारू। बिच में एक मोटी सी लकीर खैन्चीज्योड़ी ही। एक पासै लिख्योड़ो हौ हिन्दू अर दूजै पासै मुसळमान। म्हांरै घरां री लुगायां पाणी भरण खातर घड़ो ले’र कूऐ पर नईं जांवती। म्हे भिश्तियां सूं पाणी नखवाया करता जिका चमड़ै री मशाक या पखाल में पाणी भर’र लांवता अर म्हारै घर की कूंडियां नै भर देंवता। पाणी सोनै ज्यूं नाप जोख’र काम में लेवणो पड़तो।’
            पोथी रो नांव है- ‘आड्यां अळूझी जूण’ पण म्हारै साम्हीं आ आडी अळूझगी कै हिंदी री रचनावां नै राजस्थानी मांय खुद लेखक अनुवाद का दूसर सिरजै तो इण लारै कांई कारण रैया हुवैला? राजस्थानी में कीं पण लिखणो रचणो गीरबै अर हूंस री बात है अर उम्मीद करां कै बै राजस्थानी में मौलिक सिरजण कर’र उण रो हिंदी अनुवाद, अनुवाद रूप पाठकां साम्हीं राखैला तो घणी रूपाळी बात हुवैला।      
            लारली पोथी मांय लेखक म्हारी बातमांय भासा-पख पेटै लिख्यो- भाषा रा विद्वान म्हनै अेक बात सारू माफी देवै, ओ म्हारो निवेदन है। इण किताब में जिकी भाषा म्हैं लिखी है बा राजस्थान में किणी अेक ठौड़ री भाषा नईं है। म्हैं मारवाड़ में पैदा हुयो, पण थोड़ै थोड़ै बखत छेड़ै न्यारी-न्यारी जिग्यां तबादला हूवण रै कारणै म्हारी भाषा में स्यात राजस्थान री केई जिग्यावां री भाषावां रळगी।
            लेखक री आं ओळ्यां पेटै भळै म्हारो ओ ई कैवणो है पोथी मांय भासा अर बोलियां रै रूपाळै मेळ भेळै जे मानक रूप परोटण माथै गौर करैला तो बात सांतरी बणैला।
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डॉ. नीरज दइया
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राजस्थानी में संस्मरण लिखणियां-
मुरलीधर व्यास, श्रीलाल नथमल जोशी, शिवराज छंगाणी, नेमनारायण जोशी, सूर्यशंकर पारीक, सत्येन जोशी, कमला कमलेश, तारा लक्ष्मण गहलोत, अस्तअली खां मलकांण, बैजनाथ पंवार, देवकिशन राजपुरोहित, जितेन्द्र निर्मोही, अनुश्री राठौड़, महेन्द्र मोदी, हरिचरण अहरवाल...
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