08 मई, 2016

मूल और अनुवाद में भेद न करना अनैतिक

साहित्य/बातचीत: डॉ. आईदान सिंह भाटी से डॉ. नीरज दइया की बातचीत | दुनिया इन दिनों 1 से 15 मई 2016 | 

 डॉ. आईदान सिंह भाटी। जन्म 10 दिसम्बर, 1952 नोख, जैसलमेर (राजस्थान)। प्रकाशन : हंसतोड़ा होठां रो सांच, रात-कसूंबल, आंख हींयै रा हरियल सपना (कविता-संग्रह), थार की गौरवगाथाएं (इतिहास-कथाएं), समकालीन साहित्य और आलोचना (आलोचना), गांधीजी री आत्मकथा एवं राईनोसोर्स (गैंडौ) अनुवाद पुस्तकें। अकादमी पत्रिका जागती जोत का सम्पादन भी किया। साहित्य अकादमी का मुख्य एवं अनुवाद पुरस्कार के अतिरिक्त राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के सर्वोच्च पुरस्कार से सम्मानित। वर्षों तक कॉलेज शिक्षा में अध्यापन के बाद वर्तमान में जोधपुर में स्थायी आवास एवं स्वतंत्र लेखन।   

 आप वर्षों हिन्दी के प्राध्यापक रहे, फिर भी राजस्थानी में ही लिखते रहे हैं। ऐसा क्यों?
- इसका पहला कारण तो यह है कि राजस्थानी मेरी मातृभाषा रही और हिन्दी मैंने बाद में पढ़ने-लिखने के दौरान सीखी। राजस्थानी तो जुबान के आंटे में थी, इसलिए राजस्थानी में लिखता हूं।

आपका बाद में महाविद्यालयी-शिक्षा से जुड़ाव रहा और हिन्दी में भी आपका लेखन रहा। आप खुद को किस भाषा का रचनाकार कहलाना पसंद करेंगे, भाषा और रचना का अंतर्सम्बन्ध क्या है? 
- कविता का जहां तक सम्बन्ध है सम्वेदन मातृभाषा से ही जुड़ा रहा है, मैंने हिन्दी सीखी और कुछ कविताएं हिन्दी की लिखी भी हैं, लेकिन सहज अनुभव अपने आप को राजस्थानी में करता हूं। कवि खुद को राजस्थानी का मानता हूं, हां गद्य जरूर हिन्दी में लिखा है।

कविता के संदर्भ में क्या भाषा माध्यम ही महत्वपूर्ण है या राजस्थानी में लिखते हुए भी आप खुद को एक भारतीय कवि के रूप में देखते हैं?
- मैं राजस्थानी कवि होकर ही सम्पूर्ण भारतीय भाषाओं के कवियों की बिरादर में खड़ा होता हूं क्योंकि अन्य भारतीय भाषाएं भी लोक भाषाएं हैं। हिन्दी में मैं अपने आपको उस रूप में हिन्दी का कवि नहीं मानता। हां, साक्षरता के दौरान या जहां लोग राजस्थानी नहीं समझते, वहां मैंने उनके लिए यत्र-तत्र कुछ कविताएं हिन्दी में लिखीं।

लेकिन राजस्थानी के कुछ लेखक अपनी रचनाओं को दोनों ही भाषाओं में मौलिक मानते हैं। उनकी एक जैसी रचनाएं राजस्थानी और हिन्दी दोनों में देखी जा सकती हैं, जबकि सच तो यह है कि कोई रचना किसी एक भाषा में मौलिक होती है।
- यह वस्तुत: गलत बात है। मैं राजस्थानी में लिखता हूं तो राजस्थानी की ही बात करूंगा। मेरी राजस्थानी कविता को मैं हिन्दी की कविता कह कर प्रकाशित करता हूं तो यह कोई अच्छी बात तो नहीं है। मैं इसको नैतिकता के स्तर पर भी ठीक नहीं मानता, लेकिन जो लोग ऐसा कर रहे हैं, मेरे विचार से अपना सम्प्रेषण न होने के कारण ऐसा कर रहे हैं। उनको ऐसा लगा होगा कि हमारी बात ढंग से पाठकों तक पहुंची नहीं है। इसी के रहते हिन्दी अनुवाद करके हिन्दी पाठकों को सहज उपलब्ध करवाया।

क्या यह लेखकीय ईमानदारी का प्रश्न नहीं है कि आप मूल और अनुवाद में भेद प्रकट नहीं करते?
- यह बिल्कुल ही गलत बात है, अनैतिक है। मेरा मानना है कि मूल और अनुवाद का भेद होना ही चाहिए। जैसे अभी कुछ दिनों पहले आपने मेरी राजस्थानी कविता का हिन्दी अनुवाद कर पाठकों तक पहुंचाया। उसको देख-पढ़ कर मुझे बहुत से मित्रों ने बधाई भी दी, साथ ही उन्होंने कहा भी कि आप हिन्दी में क्यों नहीं लिखते?

आज के बदलते दौर में लिखना क्यों जरूरी है, या कहूं कि आप क्यों लिखते हैं?
- मैंने लिखने से पहले खुद से ही सवाल किया कि मैं क्या काम कर सकता हूं। अंतस का उत्तर पाया - मुझे मेरे लिए सबसे सहज काम कविता लिखना लगता है, सहज उस रूप में नहीं है। यह ऐसी सहजता है, जो मेरे द्वारा सम्भव है। आज कविता लिखना इतना सहज नहीं रह गया है। जो चीजें समाज में आ रहीं हैं, जैसे बाजारवाद-वैश्वीकरण का जो दौर आरम्भ हो चुका है, उसमें कविता को हाशिये पर डालने के सारे उपक्रम चल रहे हैं और इसलिए मैं मानता हूं कि आज कविता की जरूरत पहले से भी अधिक है।

आपने राजस्थानी कविता का पूरा बदलाव देखा, छंद और मुक्त छंद और उसके बाद आज की कविता। इस बदलाव को आप कवि-आलोचक के रूप में कैसे देखते हैं?

- मैं समझ गया आपकी बात, छंद मैं लिखता था, गांव में डिंगळ काव्य की परम्परा थी, लेकिन जब जोधपुर आया तब लगा कि समकालीनता के लिए मुक्त छंद जरूरी है। मैं पाठ्य या पठित मुक्त छंद जैसा नहीं, आज भी मैं गति लय का निर्वाह करता हूं। छंद लिख कर सीख कर हम मुक्त छंद लिखते हैं तो मैं कहूंगा कि हम निराला की तरह छंद का ही प्रयोग कर रहे होते हैं। छंद नहीं आये और कहूं मैं मुक्त छंद में लिखता हूं, इसे मैं ठीक नहीं मानता।

राजस्थानी साहित्य के सम्वर्धन में आलोचना की स्थिति पर कुछ कहना चाहेंगे?
- कमजोर पक्ष है इसे कहें गत्यात्मक नहीं है, आपकी और अर्जुनदेव चारण की किताबें आयीं। पर यह या अन्य जो लिखा गया है, वह निरंतर नहीं है। इसमें गति और निरंतरता की बहुत जरूरत समझता हूं। साहित्य को भारतीय परिप्रेक्ष्य के लिए आलोचना की प्रवृति विकसित करनी होगी और हमें खुद छायावादियों की तरह आलोचना में लिखना होगा।

तकनीकी बदलावों के चलते आज सोशल मीडिया पर बहुत से नये रचनाकारों की बाढ़ सी आ रही है, इसमें साहित्य के मापदंड नहीं रहे  और होड़ सी लगी है।
- प्रतिस्पर्द्धा में जिसकी सम्वेदना और भाषा में दम होगा, वही बचेगा। संख्यात्मक वृद्धि हमारे लोकप्रिय साहित्य का विस्तार मानता हूं और यह अच्छा भी है। विराट फलक में पाठक और दर्शक बढ़े हैं, यह अच्छा-बुरा दोनों रूपों में है। समय और लोग, अपने आप अच्छे और बुरे की पहचान कर लेंगे।

फेसबुक जैसी आभासी दुनिया में त्वरित टिप्पणियां होती हैं। क्या इसमें गम्भीरता है?
- नहीं, यह गम्भीरता नहीं है, लेकिन आप गम्भीर टिप्पणी कर रहे हैं तो यह महत्वपूर्ण भी है।

लेखकीय धैर्य और विवेक के साथ लिखना और त्वरा में बह कर लिखना दोनों भिन्न-भिन्न है? वास्तविक माध्यम और आभासी माध्यमों के बीच आने वाले साहित्य को आप किस रूप में देखते हैं?
- आपने खुद ही कह दिया कि साहित्य और लोकप्रिय माध्यम की भाषा अलग है, त्वरित टिप्पणियां साहित्यिक नहीं व्यक्तिगत होती हैं। इसमें साहित्यिक मूल्यों का अभाव होता है।

राजस्थानी मान्यता के विषय में आपको क्या लगता है? यह हमारा सपना सच में सम्भव होगा?
- यह मेरे सम्वेदना से जुड़ा मुद्दा है। मैं आरम्भ से ही इसका पक्षधर रहा हूं, लेकिन मैं चिल्लाने वाले लोगों के साथ नहीं हूं। पिछले चालीस-पचास वर्षों से साहित्यकारों ने आंदोलन चलाया, लेकिन बाजारवाद के साथ ही ऐसे लोग इस आंदोलन में आये, जो अपने नामों और चेहरों को ही आगे करने के प्रयास करते रहे हैं। वे राजस्थानी के नाम पर सब कुछ अपने पक्ष में कर लेना चाहते हैं। ऐसी प्रवृतियों ने आंदोलन को न केवल पीछे किया है, बल्कि वे गिनती के चंद लोग लोगों की आंखों में आ गये हैं। पहले मजबूत था, अपने घर परिवार बोलचाल रीत-रिवाज से लेकर सम्बन्धों और संस्कारों के साथ सांस्कृतिक मूल्यों से भी आंदोलन जुड़ा था। ये सब घटक उसके अभिन्न अंग थे। दूसरा एक भाषा, एक राष्ट्र और एक धर्म वालों से मुझे बहुत ज्यादा आशा नहीं है। लोक भाषाओं के समर्थक लोग जो राजनेता हैं, वे निरंतर पिछड़ते जा रहे हैं। अगतिशील लोग क्या हमारी लोक भाषा के सम्वेदन और मर्म को समझेंगे! 

एक लेखक ने कहा कि राजस्थानी के सभी लेखक हिन्दी समझते हैं, वे हिन्दी माध्यम से पढ़े हैं। राजस्थानी में केवल अपनी मातृभाषा के जुड़ाव के वशीभूत या ऋण को चुकाने के लिए राजस्थानी में लिखते हैं। क्या राष्ट्रप्रेम में राजस्थानी को छोड़ दिया जाना चाहिए?   
- नीरज जी कितना शानदार आपने सवाल किया है, मुझे ऐसा लगता है कि क्या हमारी लोक भाषाओं के सम्वेदन में राष्ट्र प्रेम है ही नहीं क्या? क्या राष्ट्र प्रेम किसी एक भाषा में अभिव्यक्त होता है? ऐसा जो कहते हैं उनके लिए मैं कहूंगा कि मेरे पिता इन्हें क्षमा करना, वे नहीं जानते कि वे क्या कह रहे हैं... जबकि सुनीत कुमार चटर्जी वर्षों पहले अपने एक लेख में स्पष्ट रूप से बहुत सी बातें लिख कर बता चुके हैं कि राजस्थानी अपने आप में पूर्ण भाषा है। मैं हिन्दी या किसी भी भारतीय भाषा का विरोध नहीं करता, लेकिन मैं यह मानने को तैयार नहीं कि राष्ट्र प्रेम या धरती प्रेम या ऐसा कोई प्रेम जो हमारी बहुलतावादी संस्कृति से जुड़ा हुआ हो, वह किसी एक भाषा में नहीं वरन सभी भारतीय भाषाओं में परिलक्षित होता है।

राजस्थानी अकादमी लेखकों-राजनेताओं की उपेक्षा के कारण बंद पड़ी है।
- सरकारों की अंतिम दृष्टि में साहित्य-कला है। वे केवल फोटो खिंचवाने के बहाने साहित्य-कला के उपक्रम करते हैं। सब चुप हंै कि कोई लाभ हमें मिलने वाला है, उससे वंचित न हो जाएं।

ऐसे प्रतिकूल समय में साहित्यकार का दायित्व क्या है?

- लेखक को लिखते जाना चाहिए, बिना किसी की परवाह किये कि कोई अकादमी है या नहीं। छपना, नहीं छपना तो बाद की बात है, लिखना बहुत जरूरी है। 
संपर्क - 9461375668

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मूल और अनुवाद में भेद नहीं करना अनैतिक
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(बीकानेर / राजस्थानी के ख्यातनाम लेखक डॉ. आईदान सिंह भाटी ‘आईजी’ एक कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए बीकानेर आए। इस मौके पर ‘भास्कर’ के पाठकों के लिए कवि-कथाकार-आलोचक डॉ. नीरज दइया ने उनसे विशेष बातचीत की। प्रस्तुत है बातचीत के अंश)
० आप वर्षों हिंदी के प्राध्यापक रहे फिर भी राजस्थानी में ही लिखते रहें हैं, ऐसा क्यों?
आईजी- इसका पहला कारण तो राजस्थानी मेरी मातृभाषा रही और हिंदी मैंने बाद में पढ़ने-लिखने के दौरान सीखी। राजस्थानी तो जुबान के आंटे में थी इसलिए राजस्थानी में लिखता हूं।
० कविता के संदर्भ में क्या भाषा माध्यम ही महत्त्वपूर्ण है या राजस्थानी में लिखते हुए भी आप खुद को एक भारतीय कवि के रूप में देखते हैं?
आईजी- मैं राजस्थानी कवि होकर ही संपूर्ण भारतीय भाषाओं के कवियों की विरादर में खड़ा होता हूं। क्यों कि अन्य भारतीय भाषाएं भी लोक भाषाएं है।
० राजस्थानी के कुछ लेखक अपनी रचनाओं को दोनों ही भाषाओं में मौलिक मानते हैं, उनकी एक जैसी रचनाएं राजस्थानी और हिंदी दोनों में देखी जा सकती है?
आईजी- यह वस्तुतः गलत बात है। मैं राजस्थानी में लिखता हूं तो राजस्थानी की ही बात करूंगा, मेरी राजस्थानी कविता को मैं हिंदी की कविता कह कर प्रकाशित करता हूं तो यह कोई अच्छी बात तो नहीं है। मैं इसको नैतिकता के स्तर पर भी ठीक नहीं मानता। लेकिन जो लोग ऐसा कर रहे हैं मेरे विचार से अपना संप्रेषण न होने के कारण ऐसा कर रहे हैं।
० आज के बदलते दौर में लिखना क्यों जरूरी है, या कहूं कि आप क्यों लिखते हैं?
आईजी- मुझे मेरे लिए सबसे सहज काम कविता लिखना लगता है, सहज उस रूप में नहीं है। यह ऐसी सहजता है जो मेरे द्वारा संभव है। आज कविता लिखना इतना सहज नहीं रह गया है। कविता को हासिये पर डालने के सारे उपक्रम चल रहे हैं और इसलिए मैं मानता हूं कि आज कविता की जरूरत पहले से भी अधिक है।
० आपने राजस्थानी कविता का पूरा बदलाव देखा, छंद और मुक्त छंद और उसके बाद आज की कविता। इस बदलाव को आप कवि-आलोचक के रूप में कैसे देखते हैं?
आईजी-मैं समझ गया आपकी बात, छंद में लिखता था गांव में डिंगळ काव्य की परंपरा थी लेकिन जब जोधपुर आया तब लगा कि समकालीनता के लिए मुक्त छंद जरूरी है। मैं पाठ्य या पठित मुक्त छंद जैसा नहीं आज भी मैं गति लय का निर्वाह करता हूं। छंद लिख कर सीख कर हम मुक्त छंद लिखते हैं तो मैं कहूंगा कि हम निराला की तरह छंद का ही प्रयोग कर रहे होते हैं। छंद नहीं आए और कहूं मैं मुक्त छंद में लिखता हूं इसे मैं ठीक नहीं मानता।
० राजस्थानी साहित्य के संवर्धन में आलोचना की स्थिति पर कुछ कहना चाहेंगे?
आईजी-कमजोर पक्ष है इसे कहें गत्यात्मक नहीं है, आपकी और अर्जुनदेव चारण की किताबें आईं। पर यह या अन्य जो लिखा गया है वह निरंतर नहीं है। इसमें गति और निरंतरता की बहुत जरूरत समझता हूं।
० फेसबुक जैसी आभासी दुनिया में त्वरित टिप्पणियां होती है। क्या इसमें गंभीरता है?
आईजी-नहीं यह गंभीरता नहीं है, लेकिन आप गंभीर टिप्पणी कर रहे हैं तो यह महत्त्वपूर्ण भी है। साहित्य और लोकप्रिय माध्यम की भाषा अलग है, त्वरिक टिप्पणियां साहित्यिक नहीं व्यक्तिगत होती है। इसमें साहित्यिक मूल्यों का अभाव होता है।
०एक लेखक ने कहा कि राजस्थानी के सभी लेखक हिंदी समझते हैं, वे हिंदी माध्यम से पढ़े हैं। राजस्थानी में केवल अपनी मातृभाष के जुड़ाव के वशीभूत या ऋण को चुकाने के लिए राजस्थानी में लिखते हैं। क्या राष्ट्रप्रेम में राजस्थानी को छोड़ दिया जाना चाहिए?
आईजी- क्या हमारी लोक भाषाओं के संवेदन में राष्ट्र प्रेम है ही नहीं क्या ? क्या राष्ट्र प्रेम किसी एक भाषा में अभिव्यक्त होता है।
०राजस्थानी अकादमी लेखकों-राजनेताओं की उपेक्षा के कारण बंद पड़ी है।
आईजी-सरकारों की अंतिम दृष्टि में साहित्य-कला है वे केवल फोटो खींचवाने के बहाने साहित्य-कला के उपक्रम करते हैं। सब चुप है कि कोई लाभ हमें मिलने वाल है वह वंचित न हो जाए।
०ऐसे प्रतिकूल समय में साहित्यकार का दायित्व क्या है?
आईजी-लेखक को लिखते जाना चाहिए बिना किसी की परवाह किए कि कोई अकादमी है या नहीं। छपना नहीं छपना तो बाद की बात है लिखना बहुत जरूरी है।
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अप्रगतिशील लोग नहीं समझेंगे राजस्थानी का महत्त्व
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० राजस्थानी मान्यता के विषय में आपको क्या लगता है? यह हमारा सपना सच में संभव होगा?
आईजी- मैं आरंभ से ही इसका पक्षधर रहा हूं लेकिन मैं चिल्लाने वाले लोगों के साथ नहीं हूं। पिछले चालीस-पचास वर्षों से साहित्यकारों ने आंदोलन चलाया लेकिन बाजारवाद के साथ ही ऐसे लोग इस आंदोलन में आए जिनको अपने नामों और चेहरों को ही आगे करने के प्रयास करते रहे हैं। वे राजस्थानी के नाम पर सब कुछ अपने पक्ष में कर लेना चाहते हैं। ऐसी प्रवृतियों से आंदोलन को न केवल पीछे किया है बल्कि वे गिनती के चंद लोग लोगों की आंखों में आ गए हैं। 

राजस्थानी भाषा और साहित्य के उद्भट विद्वान् और कवि आलोचक डॉ आईदान सिंह से नीरज दइया की बातचीत "प्रगतिशील राजस्थान"में 21 अप्रैल 2016 के अंक में प्रकाशित । (सौजन्य: दैनिक भास्कर बीकानेर)

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