29 मई, 2016

बहु-आयामी साहित्यकार डॉ.मंगत बादल की रचनाधर्मिता

डॉ. नीरज दइया 
राजस्थान के साहित्यिक परिदृश्य की बात करें तो आज डॉ. मंगत बादल एक ऐसा नाम है जिनकी रचनाधर्मिता के अनेक आयाम हैं। आपने विपुल मात्रा में हिंदी और राजस्थानी में सतत साहित्य-सृजन कर एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। गंगानगर जिले के साहित्य पर एक आलेख लिखते हुए मैंने डॉ. बादल को महाकवि कहा, क्योंकि इक्कीसवीं सदी में दसमेस महाकाव्य, मीरां प्रबंध काव्य अथवा सीता, कैकेयी खंड काव्य का सृजन असल में हमारी साहित्यिक परंपरा को बचाना है। ऐसे नाम हमारे बीच बहुत कम मिलेंगे जिन्होंने छंद को साधते हुए परंपरा को आधुनिक स्वर दिए हैं। दसमेस अथवा मीरां जैसी कालजयी कृतियों के मूल्यांकन हेतु राजस्थानी आलोचना को आयुधों का निर्माण करना शेष है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि छंद के साथ आपने मुक्त छंद में भी पर्याप्त और समान रूप से सृजन किया है।
            गुरु गोविंदसिंह जी के त्याग, बलिदान और उपदेशों की लोक मंलगकारी जमीन पर सृजित ग्यारह सर्गों का महाकाव्य ‘दसमेस’ है। इसे राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी का सूर्यमल्ल मीसण पुरस्कार मिला और यह कृति पंजाबी में यह अनूदित भी हुई है। अपने युग संदर्भों के साथ कुरीतियां, आडंबर, शोषण और साम्प्रदायिक विसंगतियों के कई आयाम इस महाकाव्य में अभिव्यक्त होते हैं। ‘मीरा’ प्रबंध काव्य एक प्रयोग है जिसमें छंद मुक्त होते हुए भी डॉ. बादल आंतरिक लय और नाद को साधते हुए मीरा के चरित्र की विविधताओं के साथ जैसे ऐतिहासिकता का पुर्मूल्यांकन करते हैं। इस कृति को साहित्य अकादेमी दिल्ली द्वारा सर्वोच्च पुरस्कार प्रदान किया गया वहीं यह इस कृति का अनुवाद पंजाबी में भी हुआ है। सीता और कैकई खंड काव्यों में कवि बादल इन चरित्रों के अंतस में उतर कर इनके द्वंद्व को उजागर करते हैं वहीं परंपरा से चली आ रही मान्यताओं और विचार को भी नए आयामों में सोचने का प्रारूप प्रस्तुत करते हैं। कविता के संदर्भ में यहां यह भी कहना उपयुक्त होगा कि राजस्थानी कविता के क्षेत्र में डॉ. मंगत बादल को कृति ‘मीरां’ के विविध आयामों में नई भाषा-शैली के साथ आधुनिकता बोध की तलाश है और इस कृति को प्रख्यात कवि डॉ. नारायणसिंह भाटी की परंपरा में इसे देखा-समझा जाना चाहिए। किसी चरित्र को नए ढंग से नए आयामों द्वारा उद्धाटित करना आपकी काव्य-यात्रा में रेखांकित किए जाने योग्य विशेषता है।
            डॉ. बादल की रचनाधर्मिता के काव्य साहित्य के अंतर्गत मुख्य रूप से दो आयाम नजर आते हैं। एक तो वे इतिहास, परंपरा और मिथकों को नए रूपों में सहेजने-संवारने और नवीन संदर्भों में व्याख्या में सक्रियता प्रदर्शित करते हैं है। इसी के समानांतर दूसरा आयाम यह है कि आप नई कविता में अमूर्त कलात्मक वर्णनों और काल्पनिक रूमानी दुनिया से दूर रहते हैं। डॉ. बादल के रचनालोक में लोक जीवन अपने विविध रूपों और रंगों में अभिव्यक्त होता है। राजस्थान के इस भू-भाग का जीवन जैसा कैसा है वह यहां अपने अंतर्द्वंद्वों के अभिव्यक्त है। इस धरा, लोक और जीवन से जुड़े अनेक प्रश्नों के साथ समस्याओं से रू-ब-रू कराती है आपकी कविता। इस पंक्ति के प्रमाण में हिंदी कविता संग्रह ‘मत बाँधो आकाश’, ‘शब्दों की संसद’, ‘इस मौसम में’, ‘हम मनके इक हार के’, ‘अच्छे दिनों की याद में’ और राजस्थानी में ‘रेत री पुकार’ देख सकते हैं। डॉ. बादल की के काव्य संसार में घर-परिवार और समाज के अनेक चित्र हैं जिनमें बदलते परिवेश में व्यक्ति के आत्म का आत्मविश्लेषन है।
            आपकी एक कविता है- ‘लोग उम्मीद करते हैं’ जिसमें भविष्य की अनेक उम्मीदों के सिलसिलेवार वर्णन के पश्चात काव्य पंक्तियां हैं- “लोग उम्मीद करते हैं / लोग वर्षों से
उम्मीदों के सहारे जी रहे हैं; / और रोजमर्रा की जिन्दगी को / जहर की तरह पी रहे हैं!”
‘छाया का विरोध-पत्र’ कविता में डॉ. मंगत बादल लिखते हैं- “मेरी शब्द रचना भी /
धरती से रस खींचेगी / और उसकी लय / पत्ते-पत्ते को / रस से सींचेगी!” यहां निसंदेह आपके काव्य का केंद्रिय स्वर बहुत कम शब्दों में व्यंजित होता है। डॉ. बादल की पूरी कविता-यात्रा का जुड़ाव अपनी धरती और जड़ों से लगातार देख सकते हैं वहीं आपकी दृष्टि में पत्ते-पत्ते की अभिव्यंजना में प्रत्येक जन से जुड़ाव समझा जा सकता है।
            गद्य रचनाओं की चर्चा करें तो ललित निबंध राजस्थानी में बेहद कम सामने आए हैं और उन में डॉ. बादल की कृति “तारां छाई रात” का उल्लेखनीय है। एक उदाहरण से बात कहूं तो आपका ललित निबंध ‘आंगणो’ हिंदी के प्रख्यात ललित निबंध लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी के ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ की श्रेणी का रेखांकित किए जाने योग्य रचना है। राजस्थानी में निबंध रचनाएं और निबंध लेखक बहुत कम है और मंगत बादल इस कम को पूरा करने में लगे हैं। आपकी कृतियां सावण सुरंगो ओसरियो, बात री बात, हेत री हांती निबंध विधा की राजस्थानी में पुस्तकें हैं वहीं आपके व्यंग्य संग्रह भेड अर ऊन रो गणित के अतिरिक्त हिंदी में यह दिल युग है, आन्दोलन सामग्री के थोक विक्रेता, छवि सुधारो कार्यक्रम व्यंग्य संकलन प्रकाशित हुए हैं। डॉ. बादल जहां निबंधों में हमारी परंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों को पोषित करने में गतिशील दिखाई देते हैं। उनके यहां लोक जीवन और लोक चिक का आकर्षक वर्णन देखने को मिलता है। वहीं व्यंग्य विधा के अंतर्गत बदलते समय और समाज में परंपरा और मूल्यों का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष पोषण है। किसी समस्या की तरफ संकेत करते हुए व्यंग्यकार उसे रोचकता के साथ वर्णित करता हैं। व्यंग्य लेखक असल में किसी चिकित्सक की भांति हमारी मानसिक और सामाजिक बीमारियों का इलाज करता है। निबंधों में विषयगत नवीनता और विविधता के साथ ही प्रवाहमयी भाषा-शैली से पाठक प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता।
            गद्य की अन्य विधाओं की बात करें तो एक कहानीकार के रूप में हिंदी में “कागा सब तन” तथा राजस्थानी में “कितणो पाणी” कहानी संग्रह प्रकाशित हैं। कहानियों में ग्रामीण जीवन और उनकी समस्याओं के साथ ही डॉ. बादल ने कुछ कथा प्रयोग भी किए हैं। परंपरागत कहानी के स्वरूप में चकवा-चकवी को अवधारणा को आपने कहानी में आधुनिक संदर्भों में प्रयुक्त किया है। आपके यात्र-वृतांत ‘वतन से दूर’ में देश और परदेश के जीवन के साथ सांस्कृतिक मूल्यों का तुलनात्मक अध्ययन देखा जा सकता है। यह टिप्पणी डॉ. मंगत बादल की रचनाधर्मिता को पहचानने और परखने का प्रस्तान बिंदु है, ऐसे बहु-आयामी सृजनधर्मी साहित्यकार की साहित्य-साधना को हम व्यापकता और विशदता के साथ जानने-समझने का प्रयास करें।



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