17 अप्रैल, 2016

राजस्थानी उपन्यास “गवाड़” से चयनित अंश

साहित्य अकादेमी पुरस्कार (राजस्थानी) 2015 से सम्मानित 
राजस्थानी उपन्यास “गवाड़” से चयनित अंश 
उपन्यासकार : मधु आचार्य ‘आशावादी’ / हिंदी अनुवाद : नीरज दइया 
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 साहित्य अकादेमी की टिप्पणीमधु आचार्य ‘आशावादी’ (जन्म : 1960) प्रतिष्ठित राजस्थानी कथाकार और रंगकर्मी है। हिंदी पत्रकारिता से संबद्ध ‘आशावादी’ की गणना जमीन से जुड़े हुए पत्रकारों में होती है।पुरस्कृत उपन्यास गवाड़ अपनी विधागत संरचना में एक विलक्षण और चित्ताकर्षक प्रयोग है। उपन्यास के परंपरा-रूढ़ ढांचे अथवा उसके दोहराव से अछूता है। चरित्रों के ‘कोलाज’ से एक ऐसा प्रच्छन्न कथासूत्र पिरोया गया है, जो उपन्यास विधा की एक नई प्रस्तावना प्रस्तुत करता है।
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अंधेरा
आंखें खोलने के बाद मैंने अंधेरा ही अंधेरा देखा। जन्म के साथ नए प्रकाश की बात एकदम झूठी। अंधेरे में कुछ दिखाई नहीं देता। चाहे देखने का व्यर्थ प्रयास करते रहें। निगाह किसी स्थान पर स्थिर होनी बेहद कठिन। घर, गवाड़ (मोहल्ले), चौगान, देश, चारों तरफ अंधेरा, आदम जात में अंधेरा, दिमाग में अंधेरा, विचारों में अंधेरा।
    इस अंधेरे को समझने मैं घर से निकला। देखें तो सही, कहां से आता-जाता है अंधेरा? बाहर कदम रखते ही चारों तरफ रोते-बिलखते मनुष्यों को चलते-फिरते देखा, उन की देह पर किसी न किसी अंग की कोई कमी थी। उन चेहरों की हवाइयां उड़ी हुई थी और वे पागलों की तरह दौड़ने में व्यस्त थे। उन को चेहरों से पहचानना मुश्किल कि वे किसी शहर के हैं अथवा गांव के! कहीं के हो चाहे से, हैं तो मनुष्य ही। मनुष्य-मनुष्य में अंतर करने की बात विचारते मुझे ग्लानि हुई। सोचा- मैं तो स्वयं सर्वथा अंधेरे में हूं।
    कुछ अंतराल बाद फटाखों के छोड़े जाने की तेज-तेज आवाजें सुनाई दी। पास दीपावली तो थी नहीं। इसलिए आश्चर्य हुआ, उन आवाजों की दिशा में मैं दौड़ने लगा। जैसे-जैसे नजदीक पहुंचता जाता, वे आवाजें दूर होती जाती, किंतु बंद नहीं हो रही थी। मुझे लगा, जैसे पूरी पृथ्वी पर इसी तरह की आवाजें ही आवाजें हो रहीं है। तीक्ष्ण आवाजें और दौड़ते-भागते मनुष्य, बस हर तरफ ऐसा ही नजारा दिखाई दे रहा था।
    आवाजों से डर कर भागते मनुष्यों में, इन आवाजों के खिलाफ आवाज उठाने की तनिक भी हिम्मत नहीं थी। मुझे अंधेरे का कुछ अर्थ समझ आने लगा। कोई उजाला करने की हिम्मत नहीं करता। अंधेरा डर बन कर मनुष्यों के हृदयों में राज करने लगा। मनुष्य निर्दोश बना उस के कहे अनुसार चलने लगा।
    हर मनुष्य जैसा दिखाई देता है, असल में वैसा होता नहीं। बुद्धिजीवी मूर्ख बन गए, कलाकार अंधे, समाज-सेवक चोर और मनुष्य फकत जानवर। ये दो-दो मुखौटे पहने फिरते हैं और मनुष्यों को अपनी गिरफ्त में ले लेते हैं। सच जानिए गजब हो गया है।
    मैंने दौड़ते-भागते मनुष्यों को रोकने का किंचित प्रयास किया, पर वे मुझे गिराते हुए आगे निकल गए। मैं सड़क पर गिरा सोचने लगा। ऐसी कौनसी बात हुई कि मनुष्य मनुष्य को गिराने का प्रयास करता है! मनुष्य खुद को और दूसरों को पहचानने में भूल करता है। मेरे इस विचार का कोई अंत नहीं, मैं सोचता रहा।
    मैंने खड़े होने की चेष्टा की, पर भागमभाग में खड़ा भी नहीं हो सका। खड़े होने की कोशिस करते ही दूसरा कोई धक्का दे कर गिरा जाता। मुझे लगा, बच्चों और जानवरों की भांति सड़क पर रेंगना होगा। तभी कुछ आगे पहुंच सकूंगा, ध्येय पर पहुंचने में देरी होने की पूरी-पूरी संभावना थी। पहुंचना भी तय कहां था। मार्ग में अवरोधों का क्या ठिकाना, कितने आएंगे-रोकेंगे! अवरोध के समक्ष प्रत्येक मनुष्य विवश होता है। आहिस्ता-आहिस्ता अंधेरा, मुझे अपना-सा लगने लगा। मैं अंधेरे में और अंधेरा मुझ में समाता गया।  
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पहचान
मैं सोचने लगा कि इस धरती पर आने से पहले मैं कहां था? जबाब मिलना इतना आसान नहीं था। विगत विचारते इतिहास पर दृष्टिपात किया। पुस्तकें पढ़ने की चेष्टा की। गुरु जी के पास गया। एक ही जबाब मिला। परमात्मा जिसे चाहे जन्म देता है। जन्म लेना-देना तो उसके हाथ में है। इसका अभिप्राय मैं परमात्मा के पास था। लोगों की बातों से तो यही लगा।
    परमात्मा ने मनुष्य को क्यों बनाया! यह बात चिंता की नहीं थी, परंतु मनुष्य को ऐसा क्यों बनाया, यह बात जरा विचारणीय थी। कलाकार जब अपनी रचना को रूप देता है, तब उसमें उम्दा विशेषताएं भरता है। मैंने तो किसी कलाकार को जान-बूझ कर निकृष्ट रचना का सृजन करते देखा नहीं। फिर परमात्मा से यह चूक कैसे हो गई।
    परंतु परमात्मा क्या है? इस प्रश्न का जबाब कहीं नहीं मिला। कल्पनाओं के घोड़े दौड़ने के अतिरिक्त हम क्या कर सकते हैं, परंतु कल्पनाओं का आधार ही जब परमात्मा हो तब उसका होना मान कर ही कुछ सोचना-समझना होगा। यह त्रासदी है। सोची-समझी और जानी-पहचानी त्रासदी।
    परंतु मुझे जन्म देने का उपकार तो मेरे माता-पिता ने किया। इसका अर्थ मेरी पहचान तो उन दोनों से हैं। मैंने मां से पूछा- मैं तुम्हारे पास आने से पहले कहां था?
    उत्तर मिला- परमात्मा के पास।
    मैं फिर से उलझनों में घिर गया। मुझे लगा कि सभी लोगों की बातों का आधार परमात्मा ही है। वही एक कुबुद्धि है जिसने मनुष्य को धरा पर अलग-अलग जगहों पर भेजा है। एक परमात्मा से हम सभी की पहचान जुड़ी है। परमात्मा के बारे में सोचने की बात बाद में करेंगे। करनी तो होगी कभी।
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परलोक
परमात्मा और जन्म की बातें सोचते-सोचते परलोक की तरफ पहुंचा। मुझे लगा मैं खुद परमात्मा हूं और मेरे आस-पास दो शिष्य खड़े हैं। मैं इस चिंतन में कष्ट पा रहा हूं, छटपटा रहा हूं। पृथ्वी पर ही चमचागिरी चलती हो ऐसी बात नहीं, परलोक में भी इसका चलन है।
    मेरे हालत देख कर एक चम्मच बोला- नारायण! नारायण!! नारयण!!!
    दूसरा बिदका- बंद कर अपना यह अखंड जाप! इसे अब कोई नहीं सुनता।
    मैंने शांत करते हुए कहा- लोक-परलोक तो जीवों की परेशानियां बन गए। पृथ्वी पर चहुंदिस खून ही खून दिखता है, ऐसा लगता है जैसे धरत पर रक्त का कोई सागर फैल गया है। हम चील-कौओं की भांति मंडराते लाशें ढोने का का काम करते हैं।
    मेरी दशा पृथ्वी पर हड्डियां ही हड्डियां देख बिगड़ती गई। शिष्य सलाह देते रहे कि पृथ्वी पर चलें, देखें कि क्या हो रहा है? प्रत्यक्ष-दर्शन के बिना कुछ भी ठीक से मालूम नहीं हो सकता।
    परमात्मा बनने में भी मुश्किल है। परमात्मा मनुष्यों को बनता है, बुद्धि देता है, पर खुद दुखी रहता है। आठों पहर निरंतर पापाचार से मनुष्य जीवन कठिन होता जाता है, तब बेचारे परमात्मा की आत्मा भी द्रवित तो होगी है। शिष्यों के चक्कर में फंस कर पृथ्वी पर जाने का फैसला लिया, तो जाने का साधन विमान बेकार-बेचार नाकारा दिखाई दिया। वर्षों से पृथ्वी पर नहीं जाने से यह हालत होनी स्वभाविक भी थी। फिर पेट्रोल की समस्या अलग से। अरब मुल्कों के लोग अपने झगड़ों में फंसे हैं। तेल लेन-देने की सोचे तो भी कैसे-कौन? तेल का भंडार तो उन के पास है, वे चाहे जिसे दें, ना दें।
    परलोक के लोगों को भी ब्लैक-मार्केटिंग में तेल लेना पड़ता है, लिया और पृथ्वी पर पहुंचे भी। बुराइयां सिर्फ पृथ्वीलोक पर हों ऐसा नहीं था, परलोक में भी अनेक थीं। मुझे तो दोनों स्थानों में कोई फर्क ही नहीं लगता।
    मन की शांति और स्वयं की पहचान के लिए मैं परलोक गया, परंतु सब व्यर्थ जान वापस पृथ्वी पर ही आना पड़ा। वहां जाना कि जीवन का समग्र सार इसी पृथ्वी पर है। इसलिए यहीं कुछ देखना-खोजना होगा। बहुत दूर जाने से कुछ नहीं मिलने वाला। कहीं कोई अंतर नहीं है। फ़कत फर्क है सोचने-समझने का। 
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रहमत चाचा
गवाड़ के प्रत्येक छोटे-बड़े से रहमत चाचा को प्रेम था। रहमत चाचा नमाज के नित-नेमी थे। प्रत्येक से स्नेह रखते। गवाड़ के सभी घरों की रसोई तक उनकी सीधी पहुंच थी। किसी की भी रसोई में जा बैठते। चाय पीते। इच्छा होती तो भोजन भी कर लेते। सरकारी नौकरी से सेवानिवृति के पश्चात वे ‘फ्री’ थे।
    बच्चे सुबह-सुबह ही चाचा के घर के आगे एकत्र हो जाते। उन के घर में जाते और जिस किसी चीज की जरूरत होती भीतर से उठा लाते। चाचा और उन के घरवाले कभी मना नहीं करते। गवाड़ के हर कार्य में रहमत चाचा की हिस्सेदारी रहती। नमाज पढ़ने जाते, तब भी चुन्नू-मुन्नू साथ हो जाते। उन को मस्जिद की चौकी पर बाहर बिठाते और वे बच्चे भी चाचा की नमाज पूरी होने का इंतजार करते। फिर चाचा को जिद कर के मंदिर तक ले कर जाते। इसी तरह प्रतिदिन की दिनचर्या थी चाचा की।
    गली की किसी लड़की की शादी होती तो बारात की अगवानी में चाचा खड़े मिलते। दीपावली होती तो पटाखे जलाने में चाचा पीछे नहीं रहते। गवाड़ की रम्मत के पीछलग्गूओं में भी वे साथ मिल जाते। रम्मत के गीतों भी सुर में सुर मिला कर गाते। उन को गीत कंठस्थ थे। आप जी भर के होली की गुलाल भी उड़ाते।
    ताजिया आते तो रहमत चाचा गवाड़ के सभी बच्चों को साथ ले कर जाते और काम में जुटते। किसी प्रकार का कोई भेदभाव-फर्क नहीं था। प्रत्येक के दुख में रहमत चाचा सबसे पहले पहुंचते। रहमत चाचा की सीख प्रत्येक का पथ-प्रदर्शन करती। इस प्रकार के चाचा प्रत्येक गवाड़ में होते है। आवश्यकता है फकत उन को विस्तार देने की। जाति और धर्म से भी विशाल है गवाड़ और उस में रहने वाले। यह बात मेरी गवाड़ के रहमत चाचा तो प्रमाणित करते हैं। प्रत्येक गवाड़ के रहमत चाचा ऐसे ही लगें रहे तो मनुष्य-मनुष्य में जाति-धर्म का भेद ही नहीं रहेगा। मैं विचार करता हूं कि अब मेरी गवाड़ कैसे किसी एक देश से कम है।
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बता, धन कहां है?  

गवाड़ में काफी लोग ऐसे थे जिनका काम सिर्फ पैसे कमाना था। उन्हें रोटी खाने की भी फुर्सत नहीं थी। फायदा होता तो वे साठ किलोमीटर तक भी आते-जाते। उनका तो जैसे एक ही नारा था- बता, धन कहां है?  
    धन कमाने के चक्कर में वे भूल चुके थे कि भाईचारा, घर और परिवार भी कुछ होता है। वे लोग तो प्रत्येक कार्य को पैसों की तराजू में तोलते। लक्की कुमार, ऊमाराम और भीखमचंद इन तीनों को देखते ही लोग तकिया कलाम जैसे कह उठते- ‘बता, धन कहां है?’ इनकी समझ में बस यह था कि पैसों से ही यह दुनिया चलती है। पैसों के अतिरिक्त यहां कुछ भी नहीं है!
    पैसा ही मां-बाप है। वे सुबह सात बजे घर से निकलते और रात गए उन की वापसी होती। हर समय उन को काम-धंधे की ही लगन लगी रहती। कमाई होनी चाहिए, भले कहीं से हो- कैसे भी हो- चाहे ब्लैक हो या मेहनत की हो। कमाई के लिए वे चोबीसों घंटों तैयार रहते। यह भी सच्चाई है कि कमाई के लिए रिस्क उठाते थे। उन को जरा भी डर नहीं लगता था। वे अपने संबंधियों से भी हर काम के पूरे पैसे लेते थे। कभी किसी को कोई रियायत नहीं।
    एक दिन लक्की कुमार की टांग मोटर साइकिल से गिरने से टूट गई। जैसे-तैसे वह घर पहुंचा, परंतु टूटी-टांग तो इलाज करवाने से ही ठीक होगी। अब इलाज करवाने के पैसे लगेंगे। जैसे-तैसे पैसों की हामी भरी तो अस्पलात दिखाने कौन ले कर जाए। बिना पैसों के तो कभी किसी का एक भी काम किया नहीं था, इसलिए जिस से पूछा वह अपनी गाथा कहता चलता बना। पैसे होते हुए भी अस्पलात पहुंचने में भारी असुविधा।
    जिसे साथ चलने को कहते, वही अपना पीछा छुड़ा लेता। आज लक्की कुमार को पता चला कि सब काम-काज पैसों से नहीं होते। उस की आंखों से अश्रु बह निकले। इस दशा को जब मुनीम जी ने देखा तब दो लड़कों बुला कर भेजा- जाओ! इसे अस्पताल दिखा कर पट्टा बंधवावो।
    मुनीमजी के कहने पर लड़के लक्की कुमार को अस्पताल ले जाने को तत्पर हुए, किंतु अपनी शर्त पर कि ईलाज का खर्चा हमीं करेंगे। लड़कों ने उस दिन प्रमाणित कर दिया कि गवाड़ में लक्की कुमार से गरीब दूजा कोई नहीं है। ईलाज करवाने की मजबूरी थी, इसलिए लक्की कुमार को हामी भरनी पड़ी। दबदबा धन का नहीं, मनुष्यों का होता है। यदि सभी गवाड़ों के लोग इस तथ्य को अंगीकार कर लें तो सहयोग की भावना से हर समस्या का समाधान संभव है।
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बदर गुरु का क्या कहना!
गवाड़ के लोग एक कवि की कविता गाते- “बदर गुरु का क्या कहना! क्या कहना! हां जी हां, जी में ही रहना।” बदर एक आदमी नहीं, चरित्र है। अपनी कुछ विशेषताओं के कारण उसका नाम ‘बदर’ एक प्रतीक रूप समझें। ऐसे बदर तो हर किसी गवाड़ में देखने को मिलेंगे।
    बदर की विशेषता थी कि अपने मुंह से कभी किसी को ‘नहीं’  नहीं बोलना। घर से बाहर निकला तो उस की चाची जी दिखाई देती है। देखते ही कहा- बदर, तुम्हारे चाचा जी को दफ्तर जाना है, बाजार से तरकारी तो ला दे।
    - अभी लाता हूं चाची जी!
    बदर थेला और पैसे लेता, वह तरकारियां लाने बाजार के रास्ते चल देता है। जल्दी-जल्दी चलता है। उस के दिमाग में चाचा जी के दफ्तर जाने की चिंता है। इसलिए जल्द से जल्द सब्जी-मंड़ी पहुंचने की लगी है। परंतु बदर गुरु का इंतजार तो सभी को रहता। गली से जरा आगे निकलता तो सामने भंवर बैठा दिखाई दिया।
    - अरे बदर, तेरा ही इंतजार कर रहा था। मुझ से चला नहीं जाता, टांगों में दर्द है। रामजी मोदी के यहां से दही तो ला कर दे। कढ़ी बनानी है। कढ़ी खा कर ही रामू स्कूल जाएगा।
    - भंवर भाई साहब, अभी लाता हूं।
    तरकारी लाने वाला थेला तो जेब में चला जाता और हाथ में बरनी आ जाती है। बरनी में पहले दही लाकर देना जो था। स्कूल की बात थी। जरा देर होगी तो लड़के की मास्टर जी खबर लेंगे। हांफता-हांफता बदर पहले रामजी मोदी के यहां पहुंचता है। दही लेता और फिर लौटता। भंवर भाई साहब को दही दे कर चाची जी के लिए तरकारी लेने वापिस जाने को हुआ कि सामने से मास्टर जी आते हुए दिखाई दिए। मास्टर जी रिटायर हो चुके थे। बीमार रहते थे। वैसे भी वे बेगार देने वाले मास्टर जी हैं। फिर बदर तो दिखाई देना चाहिए।
    - बदर, कोई काम नहीं है क्या?
    - मास्टर जी, चाची जी ने तरकारी ला कर देने को कहा है।
    - अरे, वह तरकारी तो कोई घर की ही बना लेगी। मुझे कल से बुखार है। डाक्टर के पास चलते हैं, दवाई लानी है। मरने जैसे हालत हो गई है। जा कर साइकिल किराए पर ले कर आ।
    मास्टर जी ने बदर को सामने से कुछ कहने का मौका ही नहीं दिया। बदर मास्टर जी के साथ अस्पताल रवाना हो गया। डाक्टर को दिखाया। पेंशनवाली डायरी में दवाइयां लिखवाई। वापिस आए। इस काम में तीन घंटे तो लग ही गए थे।
    बदर मास्टर जी को घर तक पहुंचाने आया। उन्होंने कहा- जल्दी में है, खाना तो खा कर जा। भोजन का समय हो गया। बदर ने डपट कर पेट पूजा की। कमर सीधी करने के बहाने जरा-सा लेटा क्या, आंख लग गई। शाम को चार बजे उठा तो काम फिर तैयार था। मास्टरनी जी ने कहा- बदर, लड़के ने सारा दूध पी लिया, अब चाय बानानी है। तुझे भी पीनी है और ये भी लेंगे... ऐसा कर, दूध ले कर आ जल्दी।
    बदर को बर्तन और पैसे दे दिए। वह बाजार की तरफ रवाना हुआ। दूध लाया। चाय बनी। दिमाग में चाची जी की तरकारी तो जाने कब-कहां गुम हो गई। वहां से निकल कर गली में बहार आया तो ठेकेदार जी खड़े दिखाई दिए। देखते ही बोले- बदर, चल आ जा। रविवार है, भैंरू बाबा के दर्शन करने जरूरी है। पुण्य होगा।
    - लेकिन ठेकेदार जी मैं तो हनुमान जी जाया करता हूं।
    - आज भैंरूनाथ के यहां चल चल। एक ही बात है। सभी देवता एक है। मुझे भी साथ मिल जाएगा।
    ठेकेदार जी के कहने पर बदर गाड़ी में जा बैठा और कोड़मदेसर के भैंरू दर्शन हेतु साथ निकल गया। मंदिर में प्रसाद चढ़ाया। आरती की। वापसी तक रात घिर आई। रास्ते में एक तरकारी का गाड़ा दिखाई दिया तब कहीं बदर को स्मरण हुआ कि सर्वप्रथम चाची जी ने तरकारी लाने को कहा था और वह चला भी था। गाड़े वाले को रोक कर बदर ने तरकारी ली। चाची जी के पास पहुंचा तब तक रात्रि का भोजन भी हो चुका था। बदर को चाची जी ने बेशुमार गालियां निकाली। उन का बदर के पास कोई उत्तर नहीं था। सभी के कहे-कहे काम किए, किंतु रहा अयोग्य का अयोग्य। ऐसे बदर हर किसी गवाड़ में मिलेंगे। उन के दर्द की चिंता करने वाला कोई नहीं है।    
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मरे हुए लोग
मैं सच कहता हूं- मरे हुए लोग भी इस धरा पर चलते-फिरते दिखाई देते हैं। लाशों का एक बड़ा सागर देखा जा सकता है। लाश का अभिप्राय क्या है, यही ना कि जिस्म में कोई विचार जिंदा नहीं हो। विचार-विहीन मनुष्य लाश कहे जाते हैं और इस भांति के मनुष्य थोक में दिखाई देते हैं, चलते-फिरते तो सभी है परंतु जिंदा नहीं है। उन के ऐसे जीने का कोई अर्थ नहीं है।
    मुझे एक मनुष्य कहा करता था- जन्म लेकर बड़ा होना, बड़े हो कर शादी करना, बच्चे पैदा करना, बच्चों को पढ़ाना और काम-धंधे लगाना, बूढ़े हो जाएं तब सेवा करवानी और अंततः एक दिन मर जाना, यह काम तो बहुत करते है। जन्म ले कर फिर नया क्या कुछ किया? मुझे पता है कि लोग नए-पुराने का जरा भी चिंतन कहां करते हैं।
    मैं विचार-मग्न हूं कि जिंदा लाशों का परिणाम कितना भयानक है। ऐसे लोग जिंदा रहे उस से पहले मर जाएं तो बेहतर नहीं है क्या? जीवन जीने के कुछ मायने नहीं हों तो फिर कोई जिंदा रहे ही क्यों?
    मैं यही विचार करता हूं कि मनुष्यों को जिंदा लाशों में किसने तब्दील कर दिया? कौन था वह जिसने इतना महान और भयानक अंजाम दिया। मरे हुए लोग, मरे हुए लोगों को मारने में लगे हुए हैं, परंतु लाशों पर कोई असर होता है क्या? इन चलती-फिरती लाशों का भविष्य क्या है और ताजिंदगी मुट्ठी भर लोगों ने इन को अपने अधीन कर रखा है। बंद मुट्ठी किए लोग ही लाशों के कारखाने चलाते हैं।
    गरीब शब्द को एक मजाक बना छोड़ा है, पढ़े-लिखे लोग देखते रहे और वह मार सहन करता गया। गरीब को मनुष्य होने का अहसास किसी ने कभी भी नहीं करवाया!  
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उजाला कहां है?

जानवरों और मनुष्यों में कोई अंतर नहीं लगता है। मनुष्य के खूनी पंजों की शक्ति जानवरों से अधिक हो गई है। मनुष्य ने चुस्ती और फुर्ती भी जानवरों से अधिक हासिल कर ली। छिप कर वार करने का गुण भी मनुष्य ने जानवरों से अधिक पा लिया। इस प्रकार भक्ष्ण के कामों में भी मनुष्य ने जानवरों को पीछे छोड़ दिया है।
       हमें इस बदलाव का संपूर्ण यश अपनी समाज-व्यवस्था को देना चाहिए। द्रोपदी के चीर की भांति मनुष्य का जंगलीपन निरंतर बढ़ता जा रहा है, इस के अंत का कोई सिरा दिखाई नहीं देता। ऐसा लगता जैसे मनुष्य ही जानवर बन गया। इसके जानवर बन जाने के पीछे बड़ा कारण हमारी चुप्पी है।
    परलोक के मनुष्य अपनी धरा पर आ पहुंचे तो इन मनुष्यों को मार ढेर करे।
    भय। चारों तरफ भय। भय निरंतर मनुष्य का भक्ष्ण करता जाता है, ना तो उसे जिंदा रहने देता है और ना ही मरने देता है। सभी शक्ति से बंधे, एक-दूजे के सहारे जिंदा हैं। अजगर की सांसों में हर अदमजात खींचता जाता है। आदमजात, आदम से भयाक्रांत है। वह भयग्रस्त एक आदम से रहता है और दूसरे को भयग्रस्त रखता है। मन, बुद्धि और विचार सभी यहां भयाक्रांत, इस लिए नया कुछ भी होना संभव नहीं लगता है।
    भय का भयानक नाटक यहां जारी रहता है। कारण है कि नाटक देखने वाले सभी दर्शक भयाक्रांत है। वे मंच तक पहुंचने का साहस ही नहीं कर रहे। बिना आधार के कोई वस्तु टिक नहीं सकती। त्रिशंकु की बात सर्वथा व्यर्थ! अगर सच्ची होती तो बीच आकाश कई बस्तियां बस चुकी होती।
    मैं भयग्रस्त हूं कि दर्शकों में से कोई प्रथमतः मंच पर पहुंच ना जाए, डराने वालों की कहीं कोई पोल ना खोल दे, सच का अभिप्राय कहीं जग-जाहिर ना कर दे। मैं देख रहा हूं- दर्शकों में से कुछ लोग उचक रहे हैं- वे देखिए! खड़े हो रहे हैं- क्या मैं उन्हें एक आवाज लगा दूं?
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दुनिया इन दिनों 30 अप्रैल 2016 में प्रकाशित
 


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