पंच चाचा कहते हैं- ‘हर क्षेत्र में
आरक्षण है फिर पुरस्कारों में क्यों नहीं है। चलो जाओ, हमारा आरक्षण नोबल पुरस्कार के
लिए कर के आओ।’
मैं हैरान
परेशान हो गया। पहली बात तो नोबल पुरस्कार जो विभिन्न क्षेत्रों के लिए दिया जाता
है उसमें पंच चाचा कहां फिट हो सकेगे। दूसरी यह कि नोबल का रास्ता भी मैं नहीं
जानता। मैं साहित्य का विद्यार्थी हूं। मियां की दौड़ मस्जिद तक। वर्षों पहले हमारे
गुरुदेव रवीन्द्र को एक नोबल मिला था, अब वे इस संसार में रहे नहीं, पूछना भी संभव
नहीं। यदि मेरी दशा पर खुद गुरुदेव को दया आ जाए तो संभव है वे मुझे किसी दिन सपने
में कोई रास्ता बता भी जाए। वैसे पंच चाचा ने साहित्य में कुछ खास लिखा-विखा नहीं
है। जिसे कोई उल्लेखनीय कह सके या रेखांकित किया जा सके। वे तो बस लोगों से पुरानी
कहानियां सुनते हैं और कभी मन होने पर खाली समय में उनको लिपिबद्ध कर लेते हैं। यह
महत्त्वपूर्ण काम उनको निश्चय ही कोई न कोई पुरस्कार दिलाएगा, क्यों की जो नोबल की
फिराक लगाएगा उसको गली-मौहल्ले या फिर गांव-शहर-जिले का कोई न कोई पुरस्कार तो मिल
ही जाएगा।
पुरस्कारों में
आरक्षण नहीं होने के कारण ही देश के बड़े-बड़े पुरस्कारों से अनेक प्रांत अब तक
वंचित है। कहीं मूसलाधार वर्षा तो कहीं एक बूंद भी पानी नहीं। यह लोकतंत्र का
अपमान है। माना कि इंद्र देव पर हमारा वश नहीं और राजस्थान में वर्षा नहीं होती या
कम होती है पर पुरस्कारों पर तो विवाद किया जा सकता है। इधर कुछ मित्रों ने
साहित्य अकादेमी द्वारा अब तक राजस्थान के किसी हिंदी लेखक को पुरस्कृत नहीं किए
जाने को चिंता का विषय मानते हुए अकादेमी की पुरजोर शब्दों में भर्त्सना की है।
दूसरी तरफ अकादेमी द्वारा मुख्य पुरस्कार के साथ अनुवाद पुरस्कार, बाल साहित्य
पुरस्कार और युवा पुरस्कार आरंभ किए जाने के बाद कई क्षेत्रीय भाषाओं में पौ-बारा
पच्चीस हो गए हैं। एक ही जिले में दस-दस साहित्यकार साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत
मिल जाएंगे। ऐसी परिस्थियों में निसंदेह हमे चाचा जी की बात से सहमत होना पड़ेगा कि
पुरस्कारों में आरक्षण होना चाहिए।
केवल साहित्य
ही नहीं किसी भी स्तर के पुरस्कारों में आरक्षण होगा तब जरूरी है कि अनेक वर्ग किए
जाए। महिला और पुरुष वर्ग, जातिय आरक्षण व्यवस्था के साथ सामान्य के अंतर्गत भी
‘सब-आरक्षण’ होना चाहिए। माना कि सेठों के पास पैसों की कोई कमी नहीं होती पर
सम्मान किसे नहीं चाहिए। कई जाट और ब्राह्मण तो पुरस्कारों की आकांक्षा में बावले
हुए जाते हैं। उन्होंने तो ‘दे पुरस्कार’ और ‘ले पुरस्कार’ नई स्कीम लोंच कर दी
है। इस दे और ले के चक्कर में अनेक पाले बन गए हैं।
पंच चाचा अभी
दुनियादारी से अपरिचित हैं, वे नहीं जानते कि जिस किसी को कोई पुरस्कार मिल जाता
है और अगर उससे पूछा जाता है- ‘भैया कैसे मिला।’ तो आप क्या समझते हैं वह बता
देगा। नहीं दस बातें नहीं. वह दस हजार बातें भी बताएगा फिर भी असली बात को पेट में
दबाए रखेगा। पिछले दिनों की बात है, मैंने गलती से किसी मित्र से पूछ लिया कि
दोस्त तुझे पलां पुरस्कार मिला उसके लिए मुझे भी आवदेन करना है। कोई पता,
संपर्क-सूत्र, ई-मेल या फोन नंबर तो बताओ। उसकी सूरत में यकायक बदलाव आ गया। चेहरे
का रंग बदल गया। बोला- ‘था तो सही पर अभी मामूल नहीं। अबखार देखते रहा करो, उसमें
उनका विज्ञापन छपेगा। और यह पुरस्कार तो किस्मत से मिलते हैं, इसके लिए आवेदन तो
महज औपचारिकता होती है।’ हे भगवान! मेरे ना सही, पर मेरे पंच चाचा की किस्मत में नोबल लिख
दे।


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