08 जुलाई, 2016

ये मन बड़ा पगा कर रहा

            ‘मन’ का अर्थ समझना-समझाना बेहद कठिन है। बचपन में तो मालूम नहीं था कि भीतर कुछ बला की चीज मन भी लेकर मैं पैदा हुआ हूं। मुझे मेरे मन के बारे में किसी ने कुछ नहीं बताया। स्कूल में गणित के मास्टरजी ‘मन’ को चालीस किलो बताते रहे और हिंदी के मास्टरजी कुछ दूसरा ही अर्थ बताते थे। तोल का ख्याल तो अब भी समझ में आता है पर सूरदास को पढ़ते हुए गोपियों के मन की व्यथा न तब समझ में आती थी न अब। उस व्यथा को तो जैसे-तैसे रट-रट कर पेपर में पूछे जाने पर उत्तर के रूप में लिखा था अब भी जब ‘उधो मन ना भये दस बीस, एक हुतो जो गयो श्याम संग’ पढ़ता-पढ़ता हूं तो विनोद करने को जी करता है।
            गोपियों के समय फोटो प्रतिलिपियों का चलन नहीं था। पर अब तो खूब है। अब कोई ‘ओरिजनल डोक्यूमेंट’ किसी के संग जाने नहीं देता। हर जगह फोटो-प्रतिलिपि। एक दिन सोचा कि मन की फोटोप्रतिलि कर ली जाए। मगर मन है कि पकड़ में नहीं आता, फिर फोटो प्रतिलिपि कैसे बनावाएं? मन और मनमीत को सोचते एक गाना याद आता है- मन रे तू काहे ना धीर धरे / वो निर्मोही मोह ना जाने, जिनका मोह करे’ मन को मनमीत का मोह होना लाजमी है पर वह निर्मोही क्यों है। यह स्पष्ट है कि मन का एक गुणधर्म मोह करना है। मोह से बचने के लिए मन को पकड़ कर रखो। मैं मन को पकड़ने के प्रयास करता हूं, पर अभी तक तो पकड़ में नहीं आया। मैं सोचता हूं कि मेरा मन छोटा है या बड़ा? कभी लगता है छोटा है और कभी लगता है नहीं यह तो बहुत बड़ा है। ऐसे में मैं दूसरों के मनों की बात क्यों करूं।
      कभी-कभी सोचता हूं मन को इस बार पकड़ लिया, वश में कर लिया। पर मन है कि वो गया ये गया का छलावा ही करता रहता है। मन का एक गुणधर्म मचलना भी है, जिसे इस गाने में गीतकार ने लिखा है- ‘जब भी कोई कंगना बोले पायल छनक जाये / सोयी-सोयी दिल की धड़कन सुलग-सुलग जाये / करूँ जतन लाख मगर मन मचल मचल जाये।’ ये कंगना और पायल जरूर मेरे जी का जंजाल बनते, पर ऐसा होते-होते बीच में कलम आ गई और उसी से मुझे प्यार हो गया।
      अगर कभी ऐसा महसूस हो कि मन का अर्थ समझ आ गया तो फिर से मन में सवाल उठ खड़ा होता है। ‘तोरा मन दर्पण कहलाए’ कहने वाले ने यह नहीं बताया कि मन अगर दर्पण है तो फिर दर्पण क्या है? दर्पण अगर मन है, तो दोनों नामों की अदला-बदली क्यों? मन का मतलब एक मित्र ने ‘दिल’ बताया, मैंने उसे डांट दिया। भैया यहां मन का अर्थ ही समझ नहीं आ रहा है, और अगर मन का अर्थ दिल मान लूंगा तो अनर्थ मन में आ जमेंगे। दिल तो पागल है जैसे गीतों ने दिल की मिट्टी-पलीत कर दी। दिल को समझदार नहीं कह कर पागल कहने वाले गीतकार को सम्मानित करने वाले संस्थान असहनीय है। मन के अस्थिर होने का की व्यंजना एक गीत में है, जिसमें गीतकार ने ‘मन के नैन हजार’ कहे हैं। कहां आपके हमारे दो नैन या फिर चार नैन और कहां हजार। अरे भाई कोई मुकाबला ही नहीं है।
      मैं उस वक्त चौंका जब मेरा बेटा आज पंच काका को पूछ रहा था- ‘ये जन-गम-मन में मन का मतलब क्या है?’ तब मुझे चुपके से खड़े होकर वहीं कान लगाने को मजबूर होना ही था। पंच चाचा ने उसे मन का अर्थ माइंड यानी दिमाग बताया। यह सुनते ही मैं वहां से इधर-उधर हो गया। सोचा मुझे वे अपनी बातों में शामिल ना कर लें। मन यानी माइंड और दिल यानी हृदय। ये मन बड़ा पंगा कर रहा है। मन ने मेरा अमन, चैन, संतोष और सुख छीन लिया।
naya arjun 01.02.2017 Parat Dar Parat

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें