14 सितंबर, 2025

पांच रुपये में मौत/ डॉ. नीरज दइया

'यम आएगा साकी बनकर साथ लिए काली हाला' बच्चन जी की यह पंक्तियां 'हाला' के शौकीन लोगों के लिए कही गई हों, परंतु इसमें एक गहरा सत्य छिपा है। यमराज को रोकने का दम किसी में नहीं है। जिसके लिए वह आते हैं, उसे लेकर ही जाते हैं। चाहे उनके हाथ में काली हाला हो, चाहे मौत का प्याला। कौन जाने, वह अपनी मर्जी से किसे पिलाएं और किसे नहीं। कभी-कभी लगता है कि उनका धर्म ही यही है कि सबको एक-एक घूंट पिलाकर अपने साथ ले जाएं।

मेरे भीतर यह दार्शनिकता बिहार आने के बाद और भी गहरी हो गई है। बिहार की भयावयता पहले की तुलना में काफी कम हो गई है। फिर भी यहां चारों तरफ मुझे मौत की काली छाया फैली दिखती है। सड़कें हों या गलियां, हर जगह ऐसा प्रतीत होता है कि यमराज ने अड्डा जमा लिया हो। ओवरलोड ट्रक, तेज रफ्तार ऑटो, बिना हेलमेट बाइक चालक, दो-तीन नहीं बस पांच सवारियों को ढोते दुपहिया वाहन, और लापरवाही का ऐसा आलम कि पैदल चलना भी जोखिम भरा है। लगता है कि यहां मौत की कीमत बहुत मामूली है- बस पांच रुपये। 

आप पूछेंगे कि यह पांच का आंकड़ा कैसे? इन दिनों में जहां रहता हूं वहां से मेरा कार्य स्थल लगभग एक या सवा किलोमीटर दूर होगा। जब यहां मैं नया-नया था तो ऑटो वाले मुझ से दस रुपये लेते थे। बाद में पता चला की रेट तो केवल पांच रुपये ही है। सुनने में आया कि पांच रुपये अग्रिम किराया देकर मेरे मित्र के मित्र आनंद जी परम आनंदधाम पहुंच गए।

जीवन और मरण के विषय में तुलसीदास ने भी कहा है- 'सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेऊ मुनिनाथ। हानि-लाभ, जीवन-मरण - जस-अपजस बिधि हाथ।' सोचता हूं, कैसी विधि है यह कि यमराज कभी सड़क दुर्घटनाओं के बहाने, कभी बीमारियों के बहाने, तो कभी यूं ही किसी की सांसों को खींचकर ले जाते हैं। उनकी सत्ता इतनी प्रबल है कि कोई उन्हें चुनौती नहीं दे सकता। गीता कहती है- 'आत्मा अजर-अमर है, शरीर तो केवल वस्त्र है।' लेकिन जब मौत सामने आती है, तब यह और ऐसे अनेक दार्शनिक ज्ञान धरे के धरा रह जाते हैं।

यहां की सड़कों का हाल देखिए- बड़े-बड़े ट्रक सड़क पर ऐसे दौड़ते हैं जैसे शेर अपने इलाके में दहाड़ते हों। ऑटो तो किसी अजूबे से कम नहीं। जैसे छोटी सी किसी डिबिया में चालक ऐसी कलाकारी दिखाता है कि आठ-दस लोगों को ठूंस देता है। बच्चों को स्कूल ले जाते हुए दृश्य देखता हूं तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। आधे से ज्यादा बच्चे हवा में लटके रहते हैं, मानो मौत से आंख-मिचौली खेल रहे हों। इन हालात में बैठना अपने आप में बहादुरी है। ऑटो में बैठते ही मेरी सांसें तेज हो जाती हैं। हर झटका, हर मोड़ दिल की धड़कनें बढ़ा देता है। मन-ही-मन हनुमान चालीसा जपने लगता हूं और प्रार्थना करता हूं कि किसी तरह यह सफर सकुशल पूरा हो जाए तो अगली बार ऐसे तो हर्गिज नहीं बैठूंगा। कई बार देखा है, ऑटो के पीछे दो-तीन लोग लटककर यात्रा कर रहे हैं और ड्राइवर हँसते हुए रेडियो पर गाना बजा रहा है- 'जीना यहां, मरना यहां इसके सिवा जाना कहां…।' लगता है जैसे यमराज को भी इस गीत की धुन भा गई हो। कल खेल में हम हो ना हो... मेरा सवाल है फिर खेल ही क्यों?

जब यहां आया था, तभी सुना कि आंनद जी की मौत हो गई। कारण? ऑटो किसी कार से टकरा गया, पलटा और मौत ने दस्तक दे दी। अस्पताल की औपचारिकता के बाद बस खबर आई- 'वह नहीं रहे।' बताने वाला मित्र इस तरह कह रहा था मानो यह कोई सामान्य घटना हो। और सचमुच यह सामान्य ही है। रोज कुछ ना कुछ होता रहता है। यह बात सुनकर मैं भीतर तक दहल गया। लगा जैसे मौत मेरे दरवाजे तक आकर लौट गई हो। तभी से हर सफर में सोचता हूं- क्या यह पांच रुपये मंजिल तक पहुंचने का किराया है या मौत खरीदने की कोई कीमत? पैदल चलना स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है किंतु पैदल चलना भी सरल कहां।

वैसे जिंदगी और मौत का सौदा पांच रुपये में! यह वाक्य सुनने में व्यंग्य लगता भले हो, पर सच यही है। ना मालूम किसी पांच रुपये के सिक्के पर ही मौत लिखी हो। और जब वह आएगी तो हर किसी नोट को खुल्ले पैसों में बदल देगी। पता नहीं किस किस के पांच रुपये में अपना उपहार देकर ले जाएगी। जीना है तो डरना नहीं और डर डर के जीना नहीं। हम ऑटो में बैठते हैं, रोज बैठते है यानी डर के आगे जीत है। कोई गारंटी नहीं कि जीत किस दिन हार में बदल जाएगी। यही तो जीवन का असली रंग है, सच्चाई है। हम ऐसे ही एक किसी दिन हमारी असली मंजिल तक पहुंचेंगे। फिर नहीं डरना इस बात से कि बीच रास्ते ही कोई ट्रक धक्का मार दे और हमारी कहानी खत्म कर जाए। 

कभी-कभी लगता है कि यहां ऑटो सिर्फ सवारी नहीं ढोते, बल्कि पूरे समाज की विवशता ढोते हैं। ये पांच रुपये सिर्फ किराया नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का प्रमाण हैं जिसमें गरीब आदमी अपनी जान जोखिम में डालकर रोज यात्रा करता है। सरकार सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाती है, हेलमेट अभियान चलाती है, पर यहाँ सच्चाई यह है कि लोग दो वक्त की रोटी के लिए मौत से सौदा करते नहीं थकते हैं। 

एक दिन का किस्सा याद आता है। मैं ऑटो में बैठा था। ड्राइवर के आजू-बाजू तीन-तीन लोग ठूंसे हुए थे। एक बुज़ुर्ग महिला गोदी में बच्चा लिए बैठी थी। बच्चा लगातार रो रहा था और महिला उसे चुप कराने के लिए झुला रही थी। अचानक सामने से आती बस को बचाने के लिए ड्राइवर ने ऑटो को तेज़ी से मोड़ा। सबके शरीर एक-दूसरे से टकराए। महिला का बच्चा लगभग छूटकर गिर ही जाता कि किसी ने उसे थाम लिया। उस क्षण लगा, मौत कितनी सस्ती और कितनी पास है।

कबीर दास जी ने कहा है- 'माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर। कर का मनका छोड़ दे, मन का मनका फेर।' सच यही है। मौत से बचने के लिए हम चाहे माला फेरें या हनुमान चालीसा पढ़ें, अंततः सब कुछ विधि के हाथ में है। परंतु यह ख्याल भी आता है कि क्या हम केवल विधि को दोष देकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकते हैं? सड़कों पर गड्ढे हैं, ऑटो में क्षमता से दोगुनी सवारी बैठती है, हेलमेट का नामोनिशान नहीं। यह सब यमराज का नहीं, हमारी लापरवाही का खेल है।

यह भी सही है कि लोग मजबूरी में सफर करते हैं। नौकरी का समय हो या स्कूल का, साधन यही है। ऑटो वाले जानते हैं कि लोग मजबूर हैं, इसलिए चाहे जितनी भीड़ हो, लोग चढ़ ही जाएंगे। कभी हँसी आती है कि ड्राइवर खुद को कलाकार समझता है- किस तरह दो इंच की जगह में पांच सवारी फिट कर सकता है। वह बड़े गर्व से कहता है- 'भइया, सबका जगह बन जाएगा।' और सचमुच, जगह बन भी जाती है। यह जगह केवल शरीर की नहीं, बल्कि मौत के साथ समझौते की जगह है।

बिहार की गलियों और कस्बों में चलते हुए बार-बार यही महसूस होता है कि यमराज का सबसे प्रिय वाहन यही ऑटो है। ट्रक और बसें तो बड़ी घटनाओं के लिए हैं, पर रोज की छोटी मौतों का हिसाब यही ऑटो रखता है। कोई बच्चा स्कूल जाते समय कुचल गया, कोई ऑफिस जाते हुए गिर पड़ा, कोई घर लौटते समय किसी लापरवाह मोड़ का शिकार हो गया। अखबार में एक-आध कॉलम की खबर छपती है, और फिर अगले दिन कोई नई दुर्घटना पुराने दर्द पर परदा डाल देती है।

कभी-कभी सोचता हूं कि यह मौतें इतनी सामान्य क्यों हो गई हैं। समाज ने इन्हें स्वीकार कर लिया है। ड्राइवर की लापरवाही, पुलिस की नजरअंदाजी, प्रशासन की चुप्पी- सब मिलकर मानो यही कह रहे हैं कि गरीब की जान की कोई कीमत नहीं। किसी बड़ी हस्ती की मौत पर शोक संदेश दिए जाते हैं, भाषण होते हैं, सुरक्षा बढ़ाई जाती है। लेकिन यहां रोज कोई गुमनाम चेहरा पांच-दस रुपये में मौत खरीद लेता है और यह खबर किसी को विचलित नहीं करती।

मैंने जमालपुर से मुंगेर और खगड़िया तक कई बार ऐसी यात्राएं की हैं- बात पांच-दस या बीस रुपये की नहीं है। हर सफर ने मेरी सहनशक्ति की परख ली है। बिहटा में खचाखच भरे ऑटो, धूल से अटी सड़कें, अचानक उभरते ट्रक और लापरवाह ड्राइवर। एक क्षण ऐसा आता जब लगता कि अब कुछ नहीं बचेगा। पर फिर किसी तरह बच जाते। हर बार यही सवाल मन में गूंजता- 'यह पांच रुपये का किराया है या मौत का टिकट?' कभी-कभी तो ऐसा महसूस होता है कि यमराज खुद ओवरटेक कर रहे हैं। जब भीड़ में फसा ऑटो तेज रफ्तार से किसी ट्रक के बराबर चलता है, तब लगता है यमराज पास से गुजरते हुए मुस्कुरा रहे हैं। जैसे कह रहे हों- बाबू चलो, अभी तो बच गए, अगली बार देखेंगे।' यह दृश्य किसी फिल्मी खलनायक की तरह डरावना भी है। 

पांच रुपये देकर कोई बच्चा, बड़ा या बुजुर्ग स्कूल, बाजार या दफ्तर  कहीं जाता है। किसी का ठिकाना कोई दफ़्तर, कोई बाजार या कोई स्कूल के साथ साथ परमधाम भी किसी कोने में अंकित है। व्यवस्था इतनी लापरवाह है कि हर यात्रा मौत के निमंत्रण को ठुकराती चलती है। यहां सब लोग जीते हैं, सफर करते हैं, हँसते हैं और अगले दिन फिर जैसे पांच रुपये थमा कर वही यात्रा करते हैं। यही जीवन की सबसी बड़ी त्रासदी है। हम जानते हैं कि मौत पास खड़ी है, फिर भी उससे सौदा करते हैं। यहां मौत भी सस्ती है और जिंदगी भी। बस पांच रुपये का खेल है बाबू।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें