06 जनवरी, 2025

दो कविताएं/ नीरज दइया

 1.

चकित है आकाश
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बवंडर बनने को बेताब
जब-जब भी तेज चलती हैं हवाएं
कोई कहता है-
जरा धीरे, प्यार से...।
गुस्सा तो आग का भी नहीं चलता
धीमी आंच पर वह सेकती है-रोटियां
जब-जब बेकाबू होता है पानी
कोई कहता है-
जरा धीरे, प्यार से...।
आकाश देखता है-
अपने बोझ से परेशान दबी धरती
बदलना चाहती है अपनी गति
वह भी सुनती है-
जरा धीरे, प्यार से...।
चकित है आकाश
कहां से आ रही आवाज-
जरा धीरे, प्यार से...।
००००
2.
गालिब चाचा से सवाल
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कोई अपनी मर्जी से
कहां छूता है-
किसी भी आग को...
कोई अपनी मर्जी से
कहां पाता है-
कोई दरिया
और वह भी आग का...
मैंने नहीं
आग के दरिया ने ही
चुना है मुझे....
आग के दरिया ने ही
चाचजान चुना था तुम्हें!
सवाल है-
जाना कहां है
तैर कर मुझे
तुम डूबे, मैं डूबा
अब कौन है बाहर?
कौन समझाने से
समझा तुम्हारे??
००००
● डॉ. नीरज दइया
('प्रेरणा-अंशु' अक्टूबर, 2024 में प्रकाशित)

 

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