(1.)
उसे खुश देखकर
मैंने पूछा नहीं
बस सोचा-
खुशी का क्या राज है?
उसकी खुशी
बहुत अच्छी थी
इतनी अच्छी कि सोचते हुए
खुश हो गया
मैं भी!
(2.)
यह वही चेहरा है!
मैं सोचने लगा
कल जो उदासी में डूबा था
हैरान-परेशान
अपने रंगों को कहीं भूलकर,
बेसुध-बेरंग बेजान।
यह खनकती हुई हंसी
कहां से आई?
क्या गुमसुम उदास तुम को
तुम्हारे भीतर छुपी-
अल्हड़ लड़की मिल गई है
या किसी नई उम्मीद में
भीतर बहने लगी है-
एक साथ कई चंचल नदियां,
जिनकी कलकल से
खनक रही हंसी तुम्हारी।
(3.)
प्रेम में
भीतर बजती है-
घंटी या घंटियां?
यह संगीत की बात है....
खलनायक नहीं मानते
घंटी या घंटियां
वे इन शब्दों के
केवल पुल्लिंग रूप जानते हैं,
उनके लिए प्रेम
केवल हासिल करना है!
उनका शब्दकोश ही नहीं
अलग है व्याकरण भी हमसे।
(4.)
प्रेम में लड़का
प्रेम में लड़की
प्रेम में आदमी
प्रेम में औरत
प्रेम में बुढ़ा
प्रेम में बुढ़िया....
प्रेम इतना बावला है
कि देखता ही नहीं
वह किसे भिगो रहा है।
समा जाते हैं इसके भीतर-
छोटे-बड़े देवता-दानव
या फिर पूरी दुनिया के शब्द।
(5.)
इतना गुस्सा क्यों?
अपने अतीत पर
जो बीत चुका है
वह लौटकर नहीं आएगा।
छोड़ दो
जाने दो उसे-
दूर... बहुत दूर तुमसे
वह मुक्त होना चाहता है
और उसे थामे बैठे हो तुम...
माना कि यह कहना सरल है-
'वर्तमान को थाम लो
और भविष्य को देखो।'
सच में कठिन है-
आज में रहना-सहना...
इतना गुस्सा क्यों है?
गुस्से को बह जाने दो-
उसी कल के प्रवाह में।
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