29 दिसंबर, 2013

बेटी के नए जूते

मूल कहानी - मोहन आलोक 
अनुवाद- नीरज दइया
    ‘पापा, आज तो आप की छुट्टी है। मेरे जूते ला दो ना। धूप में पैर जलते है।’ लड़की ने इसे लय के साथ इस प्रकार कहा जैसे कोई लोरी गा रही हो, और उसके सामने आकर खड़ी हो गई।
    आज वास्तव में उस की छुट्टी थी। महीने का दूसरा शनिवार। इस दिन छुट्टी इसलिए होती है कि नौकरी-पेशा आदमी आराम से बाजार जा सके और महीने भर का सौदा-सुल्फ खरीद सके।
    ‘हां बेटी, आज तुमको जूते जरूर दिला दूंगा। आज मेरी छुट्टी भी है। तू ऐसा कर कि तैयार हो जा। मेरे साथ अभी चल चलना, सुंदर देखकर पसंद करना और अपनी नाप के पहन लेना। क्यों, ठीक है ना ?’
    आज उस के मुंह से इस प्रकार दुलार-प्यार बरसता देख कर उसकी पत्नी को बहुत आश्चर्य हुआ। आंगन में झाड़ू लगाते लगाते वह अपनी कमर सीधी करती बोली- ‘आज न जाने किधर से सूर्योदय हुआ है रे छोरी। तेरा तो भाग्य जाग उठा। अच्छे से छांट के पसंद के लेना।’ और मन ही मन सोचने लगी कि चलो छोरी की रोज-रोज की एक झिक-झिक तो बंद होगी।
    पिछले तीन महीनों से लड़की अपने जूतों के लिए बार-बार कह रही थी। उस की मां बार बार कहते कहते थक गई- ‘छोरी बेचारी नंगे पैर जाती है, बेटी के पिता हो कुछ तो दया करो! इसे कोई मंहगे-सस्ते कोई भी जूते या चप्पल तो दिला दो। आप जाकर नहीं दिला सकते तो मुझे रुपये दो मैं दिलाकर लाती हूं।’
    पर वह इस बात को आगे से आगे पर टालता रहा। आज नहीं कल। कहता- ‘लाऊंगा, लाऊंगा... कल जरूर लेता आऊंगा।’ हमेशा उसका यही जबाब होता। कभी-कभी तो कहता- ‘आओ रे बच्चो! आज तुम सब नाप दे दो... आज लौटते हुए अच्छी सी चप्पले लेते आऊंगा।’ नाप लिखा वह कागज आठ-दस दिन तो उसकी जेब में रहता बाद में कहीं गुम हो जाता।
    और बच्चों का गीत बना रहता-
    ‘पापा मेरे जूते लाए?’
    ‘मेरी चप्पल।’
    ‘मेरी जूतियां।’
    शाम को घर पहुंचने पर तीनों बच्चे एक साथ उस को घेर लेते। बाद में साइकिल की टोकरी में देखते, पर वहां कुछ नहीं मिलता। बच्चों का हर रोज इस तरह टोकरी की तरफ दौड़ते आना अर फिर मुंह लटका कर बैठ जाना.... ऐसी बात नहीं कि उसे यह सब दिखाई नहीं देता और वह अंधा भी तो नहीं था किंतु... और इस किंतु के साथ ही उसकी आंखों के आगे थोड़े दिन पहली मिली साढ़े चार हजार पगार के रुपयों का इतिहास घूम जाता। उस में डॉक्टर माया शंकर की दवाइयों के बिलों से लेकर चाय वाले मक्खन सिंह तक की उधारी के लिए लड़ी लड़ाइयों का सारांश यही होता था कि अगले माह की मौहलत। अगली पगार पर कर्ज चुकाने के मियादी संधि प्रस्ताव।
    बच्चों के उदास चेहरे और निराशा में बुझी आंखें उस को घर में आते ही घेर लेती। इन सब से जैसे पीछे छुडाने के लिए ही वह फुर्ती से अपनी साइकिल आंगन में खड़ी करके अपने कमरे में जाते जाते कहता- ‘ना भाई ना, आज नहीं। आज तो मैं दफ्तर से सीधे ही आ गया, बाजार की तरफ गया ही नहीं...। कल जरूर लेते हुए आऊंगा।’
    ‘क्या हुआ, भूल से आए तो... कह तो रहे हैं कि कल जरूर लेते हुए आएंगे।’ उस की पत्नी हमेशा अपने निराश हुए बच्चों को भरोसा बंधाती। फिर दोनों पक्षों की में सुलह करवाती। कहती- ‘कल जरूर याद कर के ले आना। भूलना नहीं।’ और वह बोलते बोलते खुद रुआंसी-सी हो जाती। कारण साफ था कि उस से असलियत छुपी नहीं थी.. और वह कल कभी नहीं आता।
    ‘लो चलो पापा! मैं तैयार हो गई।’ लड़की उसके सामने खड़ी थी। वह जैसे नींद से जगा। उस ने सामने देखा तो वादे के अनुसार लड़की घुली फ्राक और पायजामी पहने कमर के दरवाजे के पास खड़ी थी।
    ‘अच्छा तो तुम तैयार हो।’ उसने बेमतलब का सवाल किया और मन ही मन अपनी जेब की थाह लेने लगा। एक नोट पांच सौ का और एक नोट सौ रुपये का था। उसने सोचा कि इतने काफी होंगे। डेढ़ सौ रुपये से अधिक क्या खर्च होंगे। अधिक से अधिक दो सौ रुपये। इसके आगे तो हद है।
    उस के अनुसार बच्चों के जूतों के लिए दो सौ रुपये की रकम बहुत बड़ी थी। बड़ी क्या काफी पर्याप्त भी। पर इस बड़ी रकम के कारण ही बाजार पहुंच गया और किसी रईशी ठाठ को दिखाते हुए एक जूतों की दुकान में जा कर बैठ गया।
    ‘पहले आपके दिखा दूं या बहन के?’ दुकानदार नम्र वाणी में बोला।
    ‘नहीं, नहीं... आज तो इस बहन के ही। मेरे लिए फिर कभी देखूंगा।’
    सेल्समैन ने लड़की का पैर ‘तिकठी’ पर रखा। उस के नम्बर देखे और फिर सामने के रेक से भांति भांति के जूते, चप्पले और सेंडिल निकाल निकाल कर ढेर लगाने लगा।
    उसने दो-चार जूते लड़की के पैरों में पहना पहना कर वापस निकाल दिए। फिर एक दूर रखे डिब्बे को अपनी तरफ खिसकाया और उसमें से जूते बाहर निकाल कर लड़की के पैरों में पहना दिए। ये जूते कुछ मजबूत लग रहे हैं। दूसरे जूतों की तुलना में इनका तला कुछ मोटा था और ऐड़िया तीन-चार अंगुल ऊंची। फौजी जूतों जैसी इसकी आगे की नोक गोल और मजबूत दिखती थी।
    ‘बाबू जी। आजकल बच्चों के लिए इन्हीं जूतों का फैशन कुछ अधिक है। आप तो यही लें। मुन्नी के पहने हुए अच्छे लग रहे है।’ सैल्समैन ने उसे अपनी राय दी।
    ‘हां पापा, मेरी क्लास में ऐसे जूते दो-तीन लड़कियों के भी है।’ लड़की ने सैल्समैन के सुर में राग मिलाया, और मेरी मंजूरी की आशा लिए अपने पापा की तरफ देखने लगी। लड़की के इस व्यवहार से तो जैसे सैल्समैन अपनी ड्यूटी से ऑफ हो गया। उस ने बिखरे डिब्बों को तनिक दूर सरकाया और जम कर बैठ गया।
    ‘और कुछ दिखलाऊं साहब?’ सैल्समैन जैसे जूतों की खरीद पुखता करने के लिहाज से बोला।   
    ‘नहीं, रुको। इनकी कीमत क्या है?’ उस ने सैल्समैन से पूछा और सोचने लगा कि मंहगाई और दुकानदारों की लूट के मध्यनजर दो सौ रुपये से अधिक क्या लेगा?... उस ने अंदाजा लगाया और सैल्समैन के मुख से ‘दो सौ’ सुनने की उम्मीद करने लगा।
    ‘कीमत? कीमत का क्या है साहब .... आप को क्या बतलाऊं.. बाजार में यह जोड़ी पांच सौ से कम में नहीं मिलेगी। चाहें तो आप ट्राई कर के देख लीजिए। पर आप हमारे पुराने ग्राहक हैं इसलिए आपके लिए कीमत केवल चार सौ पचास रुपये हैं। कल ही बिल्कुल नया स्टाक आया है। आप तो बेफिक्र हो कर ले जाइए। भाव में फर्क आ जाए तो मेरी गारंटी है। बस...।’
    चार सौ पचास का आंकड़ा सुनकर उस के तो मानो कान के सारे कीड़े ही झड़ गए। उसकी आंखें फटी की फटी रह गई।
    ‘चार सौ पचास के नहीं चाहिए, कुछ कम कीमत के दिखलाओ।’ उसने सामने पड़े ढेर की तरफ देखकर, लड़की की तरफ देखा। लड़की तो अपने नए जूते पहने जैसे तैयार हो कर ही बैठी थी, उसे अपने पिता के मन में चल रही द्विगुणित चिंताओं से दस वर्ष की उम्र में क्या सरोकार हो सकता था? वह मस्त और बेफिक्र बैठी थी, बैठी रही।
    लड़की को ऐसे बेफिक्र बैठे देख कर उसे गुस्सा आया। कितनी बेवकूफ लड़की है! बिना मोल-भाव किए ही जूते पहन कर ऐसे बैठी है जैसे इनकी कीमत चुका दी गई हो। किंतु नहीं बैठे तो क्या करे?.... वह बात को हजम कर गया और सैल्समैन से निगाहे बचाकर लड़की की तरफ आंखें निकालते हुए उसने जूते उतारने का इशारा किया। किंतु लड़की तो दुकान की सजावट देखने में खोयी थी। वह क्यों ऐसा ख्याल करती?
    ‘मेरी गारंटी है जी। मैं फिर कहता हूं कि इस से कम कीमत में ऐसे मजबूत जूते आप को पूरे बाजार में कहीं नहीं मिलेंगे। आप बेफिक्र होकर ले जाइए। आप को कोई शिकायत नहीं होगी। आप तो हमारे पुराने ग्राहक है, नहीं तो मैं ये जूते पचास रुपये कम करके नहीं देता।... आप कहें तो इसके साथ जुराब दिखाऊं साहब?’
    ‘नहीं भाई, नहीं। कोई दूसरे जूते दिखाइए। कम कीमत के। लड़की अभी बच्ची है। कल कहीं खो देगी।’ बात अभी पूरी मुंह से भी नहीं निकली थी कि लड़की बीच में ही बोल पड़ी- ‘नहीं पापा, मैं कहीं नहीं खूऊंगी...।’
    लड़की के इस उत्तर से उस का रहा साहा पानी भी एकदम जाता रहा। उसे ऐसा लगा जैसे उसका झूठ पकड़ा गया हो। उसे इस बात का पछतावा हुआ कि उसे कोई दूसरा बहाना गढ़ना चाहिए था। लड़की अपने पापा की इस बात पर जैसे उदास हो गई- एकदम उदास। किंतु जूते उस ने फिर भी नहीं उतारे। एक बार तो उसके जी में आया कि लड़की को झिड़क दे। साफ साफ कह दे कि अपने को नहीं लेने यह जूते। पैरों से बाहर निकाल दे। दूसरी दुकान पर चलेंगे।.... पर लड़की की उदासी और सैल्समैन के लिहाज के आगे उसकी कुछ कहने की हिम्मत जबाब दे गई।
    ‘जुराब दिखलाऊं साहब?’ सैल्समैन ने हिम्मत नहीं हारी।
    ‘नहीं रे भाई... नहीं देखने।’ वह थोड़े गुस्से में बोला और तुरंत खड़ा हो गया। उसे ऐसा लगा कि जैसे वह बैठा रह गया तो जुराबों का खर्च भी साथ चेंठ जाएगा। वह उठा तो लड़की भी उसके पीछे-पीछे धीरे से रवाना हो गई। दुकान के काउंटर पर जा कर उसने अपनी जेब से पांच सौ रुपये का नोट निकाला और दुकानदार को पकड़ा दिया। पचास रुपये वापस उसने सावधानी से जेब में रखे और वह दुकान से बाहर आ गया।
    बाजार से ले कर घर तक सड़क लोगों से भरी हुई थी। उसने घर पहुंचने तक लड़की से कुछ नहीं कहा। संयम रखा किंतु उसके साइकिल चलाने के ढंग और चढ़ी हुई त्यौरियों को देख कर कोई भी कह सकता था कि वह गुस्से में है। ऐसे में जसा-सी बात उसे भड़का सकती है।
    साइकिल के आगले चक्के में हवा बिल्कुल कम थी। सड़क के खड्डों से हिचकोले आ रहे थे और लड़की बार-बार जैसे उछल रही थी। लड़की का मुंह सुर्ख लाल हि चला था और वह बस रोने जैसी हालत में थी। उसने किसी बात की जरा भी कोई परवाह नहीं की, बस वह साइकिल तेज और तेज चलाता रहा।
    घर में प्रवेश कर जैसे ही साइकिल एक तरफ खड़ी की वैसे ही हाथ पकड़ कर लड़की को जैसे नीचे पटक गिराया। उसकी पत्नी आंगन में खड़ी इंतजार कर रही थी। वह उसे साइकिल रखने के ढंग से और लड़की की उठा-पटक की गति से ही समझ गयी कि कुछ तो हुआ जरूर है। बात को सामान्य करने की गरज से वह बाहर निकली और जबरदस्ती हंसती हुयी बोली- ‘देखें तो सही, गुड्डी कितने सुंदर जूते तू लायी है?’
    पत्नी को इस प्रकार खुशी प्रगट करते देख उसका गुस्सा और भड़का। जैसे जलते में किसी ने घास की ढेरी गिरा दी हो। लड़की अभी गुमसुम नीचे गिराई वहीं जमीन पर साइकिल के पास खड़ी थी।
    ‘लायी है मां रांड का सिर...।’ वह जोर से चीखा और फिर एक जोरदार थप्पड़ लड़की के गाल पर जड़ दिया।.... ‘पैरों में पहनने के बाद वापस उतारने का नाम ही नहीं लिया।... ’ उसने जाड़ भींची और दूसरा हाथ हवा में उछाल दिया।
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मूल राजस्थानी कहानी ‘बाप’ (पिता) नाम से राजस्थानी मासिक माणक के दिसम्बर 1989 अंक में प्रकाशित हुई, जिसे ‘मोहन आलोक री कहाणियां (संचै नीरज दइया)’ 2010 में में संकलित किया गया। बाजारवाद पर केंद्रित इस अनुपम कहानी में अनुवादक ने रुपयों के हलावे में एक शून्य की वृद्धि कर इसे समसामयिक बनाने का प्रयास मूल लेखक की अनुमति से किया है। 


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