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मूल : बुलाकी शर्मा
अनुवाद : नीरज दइया
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अपने हाथ में एक पुरानी कॉपी पकड़े मेरी पत्नी काफी देर से मानो कोई हिसाब-किताब करने में लगी हुई थी।
मैंने पूछा, "आज किस काम में उलझी हुई हो सुबह से ही?"
कॉपी के पन्ने पलटते हुए उसने उत्तर दिया, "मकर संक्रांति आ गई है ना। तेरूंडे (संक्रांति पर दान की जाने वाली 14 वस्तुएं) की चीजें बांटने के लिए सोच रही हूं कि इस बार क्या बांटूं? काम आने वाली बहुत सी चीजें तो मैं पहले ही बांट चुकी हूं।"
"पर इस कॉपी में क्या देख रही हो भाग्यवान?"
वह मुस्कुराकर बोली, "इसमें अब तक तेरूंडे में बांटी गई चीजें लिखी हुई हैं। जो पहले दे दी हैं, उन्हें छोड़कर इस बार कोई दूसरी चीज देना चाहती हूं ताकि परलोक में कोई परेशानी न हो।"
मैंने उस कॉपी पर नजर डाली। बहुत सी चीजें लिखी हुई थीं- खाने-पीने से लेकर ओढ़ने-बिछाने तक की।
मैंने हंसते हुए कहा, "वहां परलोक में तुम्हें कोई दिक्कत नहीं आएगी। जरूरत की सारी चीजें तुमने वहां पहुंचा दी हैं। पर तुम्हारी ये चीजें अगर वहां खाते में दर्ज नहीं हुईं तो?"
वह मुस्कुराई, "हम औरतें तुम आदमियों जितनी मूर्ख नहीं हैं, समझे! तेरूंडे में हम चौदह वस्तुओं में से तेरह वस्तुओं के अलावा एक वस्तु चित्रगुप्त जी के लिए अलग से दान देते हैं। हमें पता है कि वहां के बही-खाते में दर्ज कराने का काम उन्हीं के हाथ में है। उन्हें खुश रखना हमें आता है।"
चेहरे पर चिंता झलकाते हुए मैं बोला, "लगता है परलोक में हम पुरुषों को कुछ मिलने वाला नहीं है। दान-पुण्य तुम औरतें करती हो। संक्रांति पर जो चीजें तुम बांटती हो, वे तो चित्रगुप्त जी तुम्हारे खाते में लिखेंगे। वहां जाते ही वे तुम्हारे लिए तैयार मिलेंगी। पर वहां मेरा क्या होगा भगवान?"
उसने पूरे भरोसे के साथ जवाब दिया, "मैं आपकी धर्मपत्नी हूं। मेरे किए हुए धर्म-पुण्य में से आधा आपको मिल जाएगा, चिंता मत करो।" फिर वह चिंतित होकर बोली, "आप बताओ न, इस बार संक्रांति पर कौन सी चीज बांटूं?"
मैंने आनंद लेते हुए कहा, "खाने-पीने और ओढ़ने-बिछाने की चीजें तो तुमने बहुत दे दीं। इस बार किताब बांटने का काम करो। मेरी नई किताब आई हुई है ना, वही तेरूंडे में बांट दो।"
वह हंसी, "बांट दी आपकी किताब! यहां तो आपकी किताब आपके दोस्त भी नहीं पढ़ते, वहां परलोक में कौन पढ़ने बैठेगा? चित्रगुप्त जी अपनी बही में इसे दर्ज भी नहीं करेंगे।"
अचानक उसके चेहरे पर चमक आ गई। बोली, "याद आ गया!"
"क्या याद आया?"
"इस बार मास्क और सैनिटाइजर बांटूंगी। दुष्ट कोरोना वहां भी पहुंच गया तो जरूरत पड़नी ही है। वैक्सीन का क्या पता वहां पहुंचे या न पहुंचे!"
निश्चिंत होकर उसने अपनी कॉपी में ये चीजें लिखीं और मुझे आदेश दिया, "अब बातों में समय खराब न करके बाजार जाइए और चौदह-चौदह नग मास्क और सैनिटाइजर की बोतलें लेकर आइए।"
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