04 नवंबर, 2026

बाल कहानी- मेरा स्क्रीन टाइम/ डॉ. नीरज दइया

आरव को गेम खेलना बहुत पसंद था।

स्कूल से घर आते ही वह बैग सोफे पर रखता और सीधे टैबलेट उठा लेता।

“बस दस मिनट,” वह रोज खुद से कहता।

लेकिन उसके दस मिनट कभी दस मिनट नहीं रहते।

गेम शुरू होते ही उसे दुनिया की बाकी चीजें याद नहीं रहतीं।

“आरव, खाना लगा दिया है।”

माँ की आवाज आती।

“बस आ रहा हूँ।”

“कितनी देर?”

“बस पाँच मिनट।”

पाँच मिनट बीत जाते।

फिर माँ की आवाज आती।

“आरव!”

“आ रहा हूँ!”

एक दिन वह खेल में आखिरी स्तर तक पहुँच गया था।

तभी पापा कमरे में आए।

“चलो, पार्क चलते हैं।”

आरव ने स्क्रीन से नजर हटाए बिना कहा, “आज नहीं।”

“क्यों?”

“जरूरी गेम है।”

पापा कुछ नहीं बोले।

वे चले गए।

आरव खेलता रहा।

जब उसने आखिर में गेम बंद किया तो शाम हो चुकी थी।

उसने खिड़की से बाहर देखा।

पार्क की लाइटें जल चुकी थीं।

उसे याद आया कि कब से वह बाहर नहीं गया था।

अगले दिन स्कूल में गणित की कक्षा थी।

मैडम ने कहा, “कल का गृहकार्य निकालो।”

आरव ने कॉपी खोली।

पन्ने खाली थे।

उसे याद आया कि उसने गृहकार्य करने के बजाय रात को गेम खेला था।

मैडम उसके पास आईं।

उन्होंने कॉपी देखी।

“काम क्यों नहीं किया?”

आरव चुप रहा।

“भूल गए?”

आरव ने सिर हिला दिया।

मैडम ने कुछ नहीं कहा।

उन्होंने बस इतना पूछा, “कल तुम्हारे पास समय नहीं था या समय कहीं और चला गया?”

आरव को सवाल थोड़ा अजीब लगा।

वह पूरे दिन उसी बारे में सोचता रहा।

घर लौटकर उसने अपना टैबलेट उठाया।

फिर अचानक रुक गया।

उसने घड़ी देखी।

चार बजे।

उसने एक कागज लिया।

ऊपर लिखा—मेरे दिन के 24 घंटे।

फिर उसने कल का हिसाब लिखना शुरू किया।

स्कूल—छह घंटे।

सोना—आठ घंटे।

खाना और तैयार होना—तीन घंटे।

होमवर्क—एक घंटा।

बाकी समय—छह घंटे।

फिर उसने गेम का समय याद किया।

करीब चार घंटे।

आरव ने कागज को देखा।

“चार घंटे?”

उसे खुद विश्वास नहीं हुआ।

उसने नीचे लिखा—गेम—4 घंटे।

फिर उसने सोचा, “ये चार घंटे गए कहाँ?”

उसने अगले दिन एक नया प्रयोग करने का फैसला किया।

उसने अपने लिए टाइम-टेबल बनाया।

सुबह स्कूल।

दोपहर खाना और आराम।

शाम होमवर्क।

फिर खेलना।

और रात में सिर्फ तीस मिनट गेम।

उसने कागज दीवार पर चिपका दिया।

माँ ने देखा।

“यह क्या है?”

आरव ने कहा, “मेरा टाइम-टेबल।”

माँ मुस्कराईं।

“किसने बनाया?”

“मैंने।”

“और गेम?”

“तीस मिनट।”

माँ ने कुछ नहीं कहा।

अगले दिन आरव ने पहली बार टाइमर लगाया।

गेम शुरू किया।

तीस मिनट बाद अलार्म बजा।

उसने तुरंत गेम बंद नहीं किया।

“एक मिनट और।”

फिर दो मिनट।

फिर पाँच।

आखिर उसने खुद टैबलेट बंद कर दिया।

वह उठने ही वाला था कि गेम में एक नया स्तर खुल गया।

आरव वापस बैठ गया।

फिर उसने दीवार पर अपना टाइम-टेबल देखा।

कुछ देर स्क्रीन को देखता रहा।

फिर बोला, “कल।”

और उठ गया।

यह आसान नहीं था।

अगले दिन वह फिर समय से ज्यादा खेला।

तीसरे दिन भी।

चौथे दिन उसने गेम खेलने से पहले ही टाइमर लगा दिया।

धीरे-धीरे उसे फर्क दिखाई देने लगा।

होमवर्क जल्दी पूरा होने लगा।

शाम को वह पार्क जाने लगा।

दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलने लगा।

एक दिन कबीर ने पूछा, “तू गेम कम कैसे कर रहा है?”

आरव ने कहा, “कम नहीं कर रहा।”

“फिर?”

“मैं तय कर रहा हूँ कि कब खेलना है।”

कबीर ने पूछा, “और अगर मन करे कि बस खेलते रहो?”

आरव हँसा।

“तो घड़ी देखता हूँ।”

कुछ दिनों बाद स्कूल में मैडम ने बच्चों से पूछा, “आप लोग समय का इस्तेमाल कैसे करते हैं?”

कई बच्चों ने अलग-अलग बातें बताईं।

किसी ने पढ़ाई की बात की।

किसी ने खेल की।

किसी ने टीवी की।

आरव ने अपना टाइम-टेबल दिखाया।

मैडम ने पूछा, “अब गेम कितना खेलते हो?”

“आधे घंटे।”

“और पहले?”

आरव ने मुस्कराकर कहा, “पता नहीं।”

पूरी कक्षा हँस पड़ी।

मैडम ने पूछा, “अब क्या पता है?”

आरव ने घड़ी की तरफ देखा।

“अब मुझे पता रहता है कि मेरा समय कहाँ जा रहा है।”

शाम को घर पहुँचकर उसने टैबलेट खोला।

गेम का नया अपडेट आया था।

वह कुछ देर उसे देखता रहा।

फिर उसने टाइमर लगाया।

खेलना शुरू किया।

तीस मिनट बाद अलार्म बजा।

उसने गेम बंद किया।

खिड़की के बाहर देखा।

पार्क में बच्चे खेल रहे थे।

आरव ने जूते पहने और बाहर निकल गया।

उस दिन खेल में वह कोई नया स्तर नहीं जीत पाया।

लेकिन पार्क में उसने कबीर के साथ लगातार तीन मैच जीते।

घर लौटते समय कबीर ने पूछा, “कल फिर गेम?”

आरव ने कहा, “हाँ।”

“कितनी देर?”

आरव ने मुस्कराकर कहा, “जितनी मेरे टाइम-टेबल में है।”

फिर उसने घड़ी देखी।

“बाकी समय मेरा है।”

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'सोच विचार' पत्रिका नवंबर, 2026 में प्रकाशित





बाल कहानी- कूड़ेदान का रोबोट/ नीरज दइया

सोमवार की सुबह स्कूल का मैदान कुछ ज्यादा ही गंदा दिखाई दे रहा था।

प्रार्थना सभा के बाद बच्चे अपनी-अपनी कक्षाओं में जाने लगे। तभी आरव की नजर मैदान के कोने पर पड़ी।

एक केले का छिलका कूड़ेदान के बाहर पड़ा था।

पास ही पानी की खाली बोतल थी। उसके बगल में चिप्स का पैकेट।

आरव ने नाक सिकोड़ ली।

“कूड़ेदान सामने है, फिर भी कचरा बाहर!”

मीरा ने कहा, “लोग कूड़ेदान तक पहुँचते-पहुँचते थक जाते होंगे।”

दोनों हँस पड़े।

तभी विज्ञान की शिक्षिका सीमा मैडम वहाँ से गुजरीं।

उन्होंने कचरा देखा और बोलीं, “मजाक ठीक है। लेकिन इसे बदलना कौन चाहता है?”

आरव ने हाथ उठा दिया।

मीरा ने भी।

मैडम ने कहा, “तो इस बार विज्ञान प्रदर्शनी के लिए कोई ऐसी चीज बनाओ, जो इस समस्या को थोड़ा आसान कर सके।”

अगले दिन दोनों ने विज्ञान कक्ष में रखी पुरानी चीजों को देखना शुरू किया।

एक टूटा खिलौना रोबोट।

पुरानी कंप्यूटर कीबोर्ड।

खराब पंखे का मोटर।

कुछ तार।

एक पुराना डिब्बा।

और कबाड़ में पड़ा एक छोटा पहिया।

कबीर भी आ गया।

उसने टूटा रोबोट उठाया।

“इससे क्या बनेगा?”

आरव ने कहा, “रोबोट।”

“यह तो पहले से रोबोट है।”

“लेकिन यह चलता नहीं।”

“तो फिर?”

आरव ने मुस्कराकर कहा, “इसे चलाएँगे।”

तीनों काम में लग गए।

पहले उन्होंने डिब्बे को रोबोट का शरीर बनाया।

नीचे चार छोटे पहिए लगाए।

सामने दो छोटी-सी बाँहें लगाईं।

लेकिन सबसे मुश्किल काम था कचरा पहचानना।

मीरा ने सुझाव दिया, “अगर कचरा लोहे का है तो?”

कबीर बोला, “चुंबक!”

उन्होंने एक पुराना चुंबक लगाया।

लोहे की चीजें अलग होने लगीं।

“वाह!” आरव चिल्लाया।

लेकिन केले का छिलका चुंबक से नहीं उठा।

तीनों कुछ देर चुप रहे।

फिर मीरा बोली, “यह गीला कचरा है।”

उन्होंने रोबोट के अंदर दो अलग डिब्बे बनाए। एक गीले कचरे के लिए और दूसरा सूखे कचरे के लिए।

प्लास्टिक की बोतल डालकर देखा।

रोबोट रुक गया।

“इसे क्या समझ नहीं आ रहा?” कबीर ने पूछा।

आरव ने सिर खुजलाया।

मैडम ने कहा, “हर बार मशीन को सही जवाब तुरंत नहीं मिलेगा। कोशिश करते रहो।”

उन्होंने सेंसर लगाए।

कई बार रोबोट ने गलती की।

केले का छिलका सूखे कचरे में चला गया।

कागज गीले कचरे में पहुँच गया।

एक दिन तो रोबोट ने कूड़ेदान छोड़कर सीधा खिड़की की तरफ दौड़ लगा दी।

पूरी टीम उसके पीछे भागी।

“पकड़ो!”

रोबोट दीवार से टकराकर रुक गया।

सब हँस पड़े।

आरव ने कहा, “यह तो हमसे भी ज्यादा शरारती है।”

धीरे-धीरे मशीन सुधरने लगी।

एक दिन उन्होंने उसे मैदान में आजमाया।

कबीर ने जानबूझकर तीन चीजें जमीन पर रखीं—कागज, प्लास्टिक की बोतल और केले का छिलका।

रोबोट धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

पहले उसने बोतल उठाई।

उसे एक तरफ रखा।

फिर कागज।

वह दूसरी तरफ चला गया।

अंत में केले के छिलके के पास पहुँचा।

कुछ सेकंड रुका।

फिर उसे तीसरे डिब्बे में डाल दिया।

तीनों खुशी से उछल पड़े।

“हो गया!”

अगले दिन विज्ञान प्रदर्शनी थी।

बहुत-से बच्चों ने सुंदर मॉडल बनाए थे।

किसी ने ज्वालामुखी बनाया था। किसी ने सौरमंडल। किसी ने वर्षा जल संग्रह का मॉडल।

आरव और उसके दोस्तों के सामने एक पुराना-सा डिब्बा रखा था।

ऊपर लिखा था- “कूड़ेदान का रोबोट”

एक बच्चा हँसकर बोला, “यह रोबोट है?”

आरव ने कहा, “अभी देखो।”

उसने कागज, बोतल और केले का छिलका सामने रखा।

रोबोट चल पड़ा।

सब बच्चे उसके आसपास जमा हो गए।

रोबोट ने तीनों चीजें अलग-अलग कर दीं।

तालियाँ बज उठीं।

प्रधानाचार्य जी भी वहाँ आ गए।

उन्होंने पूछा, “इसे बनाने में कितना खर्च आया?”

आरव ने कहा, “बहुत कम।”

“कैसे?”

कबीर बोला, “ज्यादातर सामान कबाड़ का है।”

प्रधानाचार्य जी मुस्कराए।

“तो इस रोबोट ने केवल कचरा अलग करना नहीं सीखा।”

मीरा ने पूछा, “और क्या सीखा?”

प्रधानाचार्य जी ने सामने पड़े पुराने सामान की ओर देखते हुए कहा, “शायद यह कि बेकार समझी जाने वाली चीजों में भी नया काम छिपा हो सकता है।”

आरव ने रोबोट की तरफ देखा।

उसे अपना पहला दिन याद आया, जब उसने मैदान में केले का छिलका देखकर केवल शिकायत की थी।

आज उसी समस्या के सामने उसका बनाया रोबोट खड़ा था।

प्रदर्शनी खत्म होने के बाद बच्चों ने रोबोट को विज्ञान कक्ष में रख दिया।

अगली सुबह मैदान में फिर कचरा पड़ा था।

आरव उसे उठाने के लिए आगे बढ़ा।

तभी कबीर ने कहा, “रोबोट को बुलाएँ?”

आरव ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

उसने कागज उठाया।

“रोबोट अपना काम करेगा।”

फिर उसने बोतल उठाई।

“और हम अपना।”

तीनों ने मिलकर मैदान साफ करना शुरू कर दिया।

कोने में रखा उनका रोबोट चुपचाप उन्हें देख रहा था।

उसकी छोटी-सी लाल बत्ती जल रही थी।

जैसे वह मुस्करा रहा हो।

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