आरव को गेम खेलना बहुत पसंद था।
स्कूल से घर आते ही वह बैग सोफे पर रखता और सीधे टैबलेट उठा लेता।
“बस दस मिनट,” वह रोज खुद से कहता।
लेकिन उसके दस मिनट कभी दस मिनट नहीं रहते।
गेम शुरू होते ही उसे दुनिया की बाकी चीजें याद नहीं रहतीं।
“आरव, खाना लगा दिया है।”
माँ की आवाज आती।
“बस आ रहा हूँ।”
“कितनी देर?”
“बस पाँच मिनट।”
पाँच मिनट बीत जाते।
फिर माँ की आवाज आती।
“आरव!”
“आ रहा हूँ!”
एक दिन वह खेल में आखिरी स्तर तक पहुँच गया था।
तभी पापा कमरे में आए।
“चलो, पार्क चलते हैं।”
आरव ने स्क्रीन से नजर हटाए बिना कहा, “आज नहीं।”
“क्यों?”
“जरूरी गेम है।”
पापा कुछ नहीं बोले।
वे चले गए।
आरव खेलता रहा।
जब उसने आखिर में गेम बंद किया तो शाम हो चुकी थी।
उसने खिड़की से बाहर देखा।
पार्क की लाइटें जल चुकी थीं।
उसे याद आया कि कब से वह बाहर नहीं गया था।
अगले दिन स्कूल में गणित की कक्षा थी।
मैडम ने कहा, “कल का गृहकार्य निकालो।”
आरव ने कॉपी खोली।
पन्ने खाली थे।
उसे याद आया कि उसने गृहकार्य करने के बजाय रात को गेम खेला था।
मैडम उसके पास आईं।
उन्होंने कॉपी देखी।
“काम क्यों नहीं किया?”
आरव चुप रहा।
“भूल गए?”
आरव ने सिर हिला दिया।
मैडम ने कुछ नहीं कहा।
उन्होंने बस इतना पूछा, “कल तुम्हारे पास समय नहीं था या समय कहीं और चला गया?”
आरव को सवाल थोड़ा अजीब लगा।
वह पूरे दिन उसी बारे में सोचता रहा।
घर लौटकर उसने अपना टैबलेट उठाया।
फिर अचानक रुक गया।
उसने घड़ी देखी।
चार बजे।
उसने एक कागज लिया।
ऊपर लिखा—मेरे दिन के 24 घंटे।
फिर उसने कल का हिसाब लिखना शुरू किया।
स्कूल—छह घंटे।
सोना—आठ घंटे।
खाना और तैयार होना—तीन घंटे।
होमवर्क—एक घंटा।
बाकी समय—छह घंटे।
फिर उसने गेम का समय याद किया।
करीब चार घंटे।
आरव ने कागज को देखा।
“चार घंटे?”
उसे खुद विश्वास नहीं हुआ।
उसने नीचे लिखा—गेम—4 घंटे।
फिर उसने सोचा, “ये चार घंटे गए कहाँ?”
उसने अगले दिन एक नया प्रयोग करने का फैसला किया।
उसने अपने लिए टाइम-टेबल बनाया।
सुबह स्कूल।
दोपहर खाना और आराम।
शाम होमवर्क।
फिर खेलना।
और रात में सिर्फ तीस मिनट गेम।
उसने कागज दीवार पर चिपका दिया।
माँ ने देखा।
“यह क्या है?”
आरव ने कहा, “मेरा टाइम-टेबल।”
माँ मुस्कराईं।
“किसने बनाया?”
“मैंने।”
“और गेम?”
“तीस मिनट।”
माँ ने कुछ नहीं कहा।
अगले दिन आरव ने पहली बार टाइमर लगाया।
गेम शुरू किया।
तीस मिनट बाद अलार्म बजा।
उसने तुरंत गेम बंद नहीं किया।
“एक मिनट और।”
फिर दो मिनट।
फिर पाँच।
आखिर उसने खुद टैबलेट बंद कर दिया।
वह उठने ही वाला था कि गेम में एक नया स्तर खुल गया।
आरव वापस बैठ गया।
फिर उसने दीवार पर अपना टाइम-टेबल देखा।
कुछ देर स्क्रीन को देखता रहा।
फिर बोला, “कल।”
और उठ गया।
यह आसान नहीं था।
अगले दिन वह फिर समय से ज्यादा खेला।
तीसरे दिन भी।
चौथे दिन उसने गेम खेलने से पहले ही टाइमर लगा दिया।
धीरे-धीरे उसे फर्क दिखाई देने लगा।
होमवर्क जल्दी पूरा होने लगा।
शाम को वह पार्क जाने लगा।
दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलने लगा।
एक दिन कबीर ने पूछा, “तू गेम कम कैसे कर रहा है?”
आरव ने कहा, “कम नहीं कर रहा।”
“फिर?”
“मैं तय कर रहा हूँ कि कब खेलना है।”
कबीर ने पूछा, “और अगर मन करे कि बस खेलते रहो?”
आरव हँसा।
“तो घड़ी देखता हूँ।”
कुछ दिनों बाद स्कूल में मैडम ने बच्चों से पूछा, “आप लोग समय का इस्तेमाल कैसे करते हैं?”
कई बच्चों ने अलग-अलग बातें बताईं।
किसी ने पढ़ाई की बात की।
किसी ने खेल की।
किसी ने टीवी की।
आरव ने अपना टाइम-टेबल दिखाया।
मैडम ने पूछा, “अब गेम कितना खेलते हो?”
“आधे घंटे।”
“और पहले?”
आरव ने मुस्कराकर कहा, “पता नहीं।”
पूरी कक्षा हँस पड़ी।
मैडम ने पूछा, “अब क्या पता है?”
आरव ने घड़ी की तरफ देखा।
“अब मुझे पता रहता है कि मेरा समय कहाँ जा रहा है।”
शाम को घर पहुँचकर उसने टैबलेट खोला।
गेम का नया अपडेट आया था।
वह कुछ देर उसे देखता रहा।
फिर उसने टाइमर लगाया।
खेलना शुरू किया।
तीस मिनट बाद अलार्म बजा।
उसने गेम बंद किया।
खिड़की के बाहर देखा।
पार्क में बच्चे खेल रहे थे।
आरव ने जूते पहने और बाहर निकल गया।
उस दिन खेल में वह कोई नया स्तर नहीं जीत पाया।
लेकिन पार्क में उसने कबीर के साथ लगातार तीन मैच जीते।
घर लौटते समय कबीर ने पूछा, “कल फिर गेम?”
आरव ने कहा, “हाँ।”
“कितनी देर?”
आरव ने मुस्कराकर कहा, “जितनी मेरे टाइम-टेबल में है।”
फिर उसने घड़ी देखी।
“बाकी समय मेरा है।”
●
'सोच विचार' पत्रिका नवंबर, 2026 में प्रकाशित







