27 फ़रवरी, 2024
मूर्ख बनाने के अचूक उपाय/ नीरज दइया
19 फ़रवरी, 2024
लोकप्रियता का फार्मूला और आइंस्टीन/ नीरज दइया
जो
सही है वह हमेशालोकप्रिय नहीं होता और जो लोकप्रिय होता है वह हमेशा सही
नहीं होता।’ पता नहींअल्बर्ट आइंस्टीन ने यह कब कहा था? मुझे इस बात से
कोईसरोकार नहीं है कि किसने क्या कहा? कब कहा? मैं बस यह जानता हूं कि सवाल
करनालोकप्रिय बनने का प्रथम सौपान है। जितना बड़ा सवाल और जितने बड़े आदमी
पर सवालकरेंगे आपकी लोकप्रिया का पायदान उतना ही बड़ा होगा। मैं जानता हूं
कि आइंस्टीन केइस विचार के विषय में आपको भी पता नहीं है कि यह कब कहा गया
था... और आप चुप बैठेहैं।
देश-विदेश में अनेकविद्वान,
बुद्धिजीवी, वैज्ञानिक औरदार्शनिक हुए हैं और उन्होंने अनेक बातें कही हैं।
मेरा मानना है कि इन सभीश्रेणियों में जो नहीं आते हैं, वे भी कोई बात
कहने काअधिकार तो रखते ही हैं। अगर ऐसी बात कहनी नहीं आती है तो मेरे जैसे
सवाल उठाने औरदूसरों की कही बातों का प्रतिरोध करने का अधिकार तो संविधान
ने दिया है। हमें बससही के सामने आना है। अगर सही जो सही है, तो वह हमें
हटाकर खुद सामने आ जाएगा।नहीं तो हम सही का दर्जा ले लेंगे।
आजकल कुछ नया नियम चलरहा है कि खुद को सही साबित करने के लिए किसी को गलत
साबित करना पड़ता है। यह यदिनहीं हो सकता तो बहुत आसान तरीका है कि बस आप
सही के सामने आ जाओ और उसे ढक लो। बसथोड़ा इंतजार करो। कोई किसी को सामने
आने देना नहीं चाहता। सब एक दूसरे को पीछेधकेल रहे हैं। इस सामने आने के
फंडे में आपके पास आत्मविश्वास भरपूर होना चाहिए।दूसरी बात- आपको किसी से
डरना नहीं है भले वह आइंस्टीन ही क्यों नहीं हो। अगर आप आइंस्टीनका विरोध
करेंगे तो वह वापस इस संसार में आपको कोई जबाव देने नहीं आएगा। यह भीसत्य
है कि यदि कुछ कहना है तो किसी परलोक वासी को पकड़ना चाहिए। उसके विषय में
आपकुछ कहेंगे तो उसे ‘सही’ को झूठ कहने के लिए कम से कम वह खुद तो नहीं
आएगा।
अब दूसरी स्थिति यह बनती है कि आत्मविश्वाससे भरपूर
केवल आप और हम नहीं है। बहुत ऐसे भी हैं जो आत्मविश्वास से सही में भरपूरहै
और वे सही है तो वे आपके सामने आएंगे। कोई सामने आए तो इसका पहला और सीधा
अर्थयही समझना चाहिए कि आप सही हैं और इसका प्रमाण है कि कोई आपके सामने आ
रहा है, खुदको सही साबित करने के लिए।
अनेक बार कोई बात
जो बहुत सही होती हैवह मामूली सा मेरे जैसा आदमी भी कह देता है। मेरे पक्ष
में अल्बर्ट आइंस्टीन को मैंरख सकता हूं जो कह कर गए हैं कि जो सही है वह
हमेशा लोकप्रिय नहीं होता। मैं सहीहूं और लोकप्रिय नहीं हुआ हूं, किंतु
किसे हसरत नहीं होती लोकप्रिय होने की! इसलिएमैं भी लोकप्रिय होना चाहता
हूं। मैं नहीं जानता कि लोकप्रिय होने के लिएमूल-मंत्र क्या है... इसलिए
सही-सही बातें करता रहता हूं और सोचता हूं कि पता नहींकिस बात में वह असर
हो कि मुझे लोकप्रिय बना दे। मैं कभी भी लोकप्रिय हो सकता हूं।मेरे
लोकप्रिय होने का मुझे इंतजार है। सही हमेशा नहीं कभी कभी या कभी
कभारलोकप्रिय होता है।
मैं तो हमेशा से मानता आया हूं
किशास्त्र से बड़ा ज्ञान लोक में होता है। यह मुझे लगता है कि आइंस्टीन को
भी यह बातपता थी, इसलिए ही तो उन्होंने ‘सही और लोकप्रिय कासिद्धांत’ दिया।
मैं इस रचना का शीर्षक भी इसी सिद्धांत के नाम पर रखना चाहता थाकिंतु पंच
काका का कहना था कि इसे लोकप्रिय करना है तो इसके शीर्षक में आइंस्टीनका
नाम फिट होना जरूरी है। मैं पंच काका और मेरी पत्नी का हमेशा से मुरीद हूं।
येदोनों सही हैं या गलत इस विषय में मैं कुछ कह नहीं सकता हूं किंतु ये
दोनों ही मेरीगली और मोहल्ले में लोकप्रिय हैं। पत्नी इसलिए कि उसे कहीं भी
शादी-विवाह या कोईमांगलिक अवसर हो गीत गाने के लिए बुलाते हैं और पंच काका
के बिना कोई महफिल सजतीनहीं। मुझे मेरी कविता सुनने के लिए कोई नहीं
बुलाता। यही कसक मेरे भीतर रही है औरसंभव है यही कारण हो मेरे लोकप्रिय
होने की अभिलाषा का।
असल में लोकप्रिय होना ‘लोक’
मेंप्रिय होना है। लोक में प्रिय होना वैसे भी आसान नहीं है। और आइंस्टीन
तो आगाह करगए हैं कि सही कभी-कभार ही प्रिय होता है। चुनाव में पक्ष और
विपक्ष के साथनिर्दलीय उम्मीदवारों के लिए यह सिद्धांत लागू होता है किंतु
जब दूध में पानी मिलजाता है तो दूध का दूध और पानी का पानी करना बिरलों का
खेल है। ऐसे अनेक सच हैंजिनको सुनते ही मिर्ची लगती है। सही तब तक छुपे
रुस्तम की तरह होता है जब तक कि वहलोकप्रिय नहीं हो जाए। सही को लोकप्रिय
नहीं बनने देने के लिए अनेक संगठन औरसत्ताएं प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में
काम करती हैं। सही अपने आप कभी भी लोकप्रियनहीं सकता है। उसे लोकप्रिय
बनाना पड़ता है और बहुत बार तो जब तक वह लोकप्रिय होताहै वह खुद प्रिय हो कर
इस संसार से चला जाता है। सही का मार्ग सरल नहीं होता इसलिएकहना चाहिए कि
लोकप्रियता के मार्ग में अवरोध बहुत होते हैं।
अब मान भी
लिया जाए कि जैसे-तैसे मैं सही लोकप्रिय हो भी जाता हूं तो संदिग्ध बन जाता
हूं। अब फिर सामने संकट है- ‘जो लोकप्रियहोता है वह हमेशा सही नहीं होता।’
अभिप्राय यह है कि पूरी जिंदगी संहेद ही संदेहबना रहेगा। इसका कारण जहां
तक मुझे समझ आया है वह है- सही को लोकप्रिय होने केमार्ग में अनेक समझौते
करने पड़ते हैं कि वह लोकप्रिय हो सके। ऐसे में पहले सही कोलगता है कि वह
सही है या नहीं। अगर सही है तो वह लोकप्रिय क्यों नहीं हो रहा है। असलमें
आइंस्टीन का सही और लोकप्रिय होना अपने आप में एक पहेली है। इस जटिल समय
मेंसही की उम्मीद करने वाले बहुत कम बचे हैं। वर्षों पहले ही आज के समय की
जटिलताओंका अहसास आइंस्टीन को हो गया था। हमें मान लेना चाहिए कि हमारे समय
में सही कालोकप्रिय होना बेहद कठिन है और उसके से भी कठिन है किसी
लोकप्रिय का सही होना।
नीरज दइया
26 मार्च, 2023
‘जय हो’ की नाराजगी / डॉ. नीरज दइया
17 मार्च, 2023
पुरस्कारों की अर्थी/ डॉ. नीरज दइया
सुबह-सुबह अखबार मेरे हाथों में आते ही मैं खोजना आरंभ कर देता हूं। अखबार की पहली खबर से चालू होकर अंतिम पंक्ति तक बस मैं बस खोजता और खोजता रहता हूं कि कहीं कोई मेरे काम की खबर मिल जाए। रविवार और साहित्य परिशिष्ठ के दिन तो मैं अपनी रचना को खोजता हूं कि संपादक ने मेरी रचना को स्थान दिया है या नहीं बाकी दिनों में मेरी खोज अलग होती है। अब आपसे क्या छिपाना आप कोई मुझ से अलग थोड़ी हैं मैं तो जैसे कोई कुंवरा वैवाहिक विज्ञापनों में वधू को खोजता है वैसे ही पुरस्कारों को ढूंढ़ता हूं। यह मेरा दुर्भाग्य कि मुझे सफलता बहुत कम नसीब होती। संपादकों के लिए मैं आदर के अतिरिक्त अन्य शब्दों का प्रयोग करते हुए कुछ कह भी कैसे सकता हूं वर्ना जो कभी कभार मेरी रचना को स्थान देते हैं वह भी बंद कर देंगे।
मैं निवेदन की मुद्रा में यह तो कह सकता हूं कि वे पुरस्कारों की खबरें जरा विस्तार से और पूरी प्रकाशित किया करें। जनता को इससे कोई सरोकार नहीं है कि यह पुरस्कार कैसे मिला है, पर मैं लेखक के रूप में यह जानने का थोड़ा हक और अधिकार रखता हूं। मेरे लिए यह जानकारी बहुत जरूरी है कि पुरस्कार किसे मिला, किस रचना पर मिला, कितनी राशि का मिला और संस्था ने किन-किन को निर्णायक बनाया है। सबसे अधिक जरूरी यह पुरस्कार सम्मान दूसरे लेखकों यानी कि मुझे कैसे मिल सकता है। मैं इसे पाने के लिए क्या क्या तैयारी करूं। जैसे कंपटीशन की तैयारी के लिए देश में जगह जगह कोचिंग सेंटर खुले हैं वैसे ही पुरस्कार पाने के लिए संस्थाओं को ऐसे सेंटर भी खोलने चाहिए।
सुना है कि कुछ जुगाड़ू किस्म के लेखक पुरस्कार पाने के लिए डोनेशन के नाम पर बढ़ चढ़ कर रकद सहायता-सहयोग के नाम पर देते हैं। आश्चर्य की बात है कि पुरस्कार और सम्मान का पूरा खर्च गोपनीय रूप से उठाने वाले लेखकों को हसंते खिलखिलाते देखा गया है। उनके कांधे या सिर पर कोई शिकन या बोझ कहीं दिखाई ही नहीं देता है। माना कि संपादक यह सब गोपनीय बातें नहीं छाप सकता है किंतु कुछ तो उसका उत्तरदायित्त्व होता है। कुछ लेखक किस्म के संपादक खुद तो ऐसे जानकरियों से लाभ उठा लेते हैं किंतु अपने पाठकों और अन्य लेखकों को वंचित रखते हैं जिससे वे पुरस्कार की दौड़ में पीछे रह जाते हैं।
मैं यह अध्ययन अर शोध लंबे समय से कर रहा हूं और अब मेरे अध्ययन के परिणाम या कहें सार आपके सामने प्रस्तुत करने का समय आ गया है। मैं योग्य लेखक हूं और आप में से भी अनेक योग्य लेखक होंगे। हमें कुछ ऐसा करना यह है कि साहित्य के जुगाड़ू लेखकों की टें बोल जाए। मेरे इस अध्ययन में अकादमी के पुरस्कारों पर विशेष अध्ययन किया गया है क्यों कि वहां सूचना का अधिकार सक्रिय है। सेठों और साहूकारों की संस्थाओं के नाम भले सेठ-साहूकार रखें हो किंतु असल में ये सब चोरों-लुटेरों की संस्थाएं होती हैं। इनका साहित्य और पुरस्कार से लेश मात्र का लोभ नहीं होता ये बस इस नाम पर वीआईपी को बुलाकर उनके हाथों पुरस्कार प्रदान कराते समय अपनी फोटो और लाभों को ध्यान में रखते हैं।
पुरस्कार रहस्य जो जितना मैंने जाना वह यह है कि पुरस्कार की प्रविधि को शमशाम में ले जाने वाली अर्थी से समझ सकते हैं। जिस प्रकार अर्थी को उठाने की होड लगी रहती है वैसे ही पुरस्कार को पाने के लिए और कंधा देने के लिए चारों तरफ होड़ लगी हुई है। यह विचित्र संयोग है कि पुरस्कार समिति में भी एक संयोजक और तीन निर्णायक अर्थात कुछ चार होते हैं और अर्थी भी चार लोग मिलकर उठाते हैं। अर्थ काच की तरफ एकदम साफ है कि ये चारों साहित्य के ठेकेदार चाहे तो किसी लेखक की अर्थी उठाएंगे और कहेंगे तो नहीं उठाएंगे। मना कर देंगे। कहने को तो कहा जाता है कि संयोजक की भूमिका मूकदर्शक भर होती है किंतु मूक बधिर भी इशारे में बहुत कुछ कह देते हैं फिर यह तो ठहरा तुर्रम खां संयोजक। कभी निर्णायक कोई बाप किस्म का आदमी आ जाए तो बात अलग है वर्ना सारी बात संयोजन के संकेतों पर ही रहती है।
मेरे देश के महान संपादकों और अखबारों को मालिकों मैं आपके किस्म किस्म के पत्रकारों और पत्रकारिता के घटकों की दुहाई देते हुए वॉच डॉग पत्रकारिता के मसीहाओं का आह्वान करता हूं कि मेरे इस अध्ययन का फायदा उठाएं और अकादमी पुरस्कारों को अर्थी से समझें कि अर्थी को वैसे तो कोई भी कंधा दे देता है एक राह चलता राहगीर भी। किंतु असल सवाल है कि किसी की अर्थी को कंधा देने का असली हकदार कौन है? शव किसी बाप का है तो बेटे हकदार होगा और बेटे का है तो उसके बाप-दादा। साहित्य पुरस्कारों में घोर अंधेरा देखा जा रहा है। कंधा देने वाले ऐसे गैरे नत्थू खैरे हैं। जो साहित्य के अ-आ-ई सीख रहे हैं उनको संयुक्ताक्षरों तक पहुंचा दिया गया है। निर्णायक स्कूल कॉलेज के अध्यापक प्रोफेसर बन रहे हैं जिनको सृजनात्मक साहित्य का अर्थ केवल पाठ्यक्रम में लगी पाठ्यपुस्तकों के अतिरिक्त कुछ आता है। निर्णायक की हैसियत नहीं है कि वह पुरस्कार के लिए सामने प्रस्तुत पुस्तकों का अर्थ अभिप्राय और साहित्य-परंपरा में प्रासंगिकता का आकलन तो बहुत दूर की बात वे अच्छे से उनका वाचन नहीं कर पाएंगे।
अस्तु हे संपादक श्रेष्ठ आप ही आशा का केंद्र है कि कुछ ऐसा करें कि इस युग के जुगाड़ू लेखकों की टें बोल जाए। आदरणीय आपसे इतना कुछ संभव नहीं हो तो इतनी कृपा अवश्य करें कि मेरी इस अधकचरी तृतीय कोटि की रचना को थोड़ा सा स्थान आपने प्रतिष्ठित अखबार में प्रदान करें। आपकी इसी अनुकंपा से मैं स्वयं को धन्य समझूंगा।
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11 मार्च, 2023
पेपर लीक/ डॉ. नीरज दइया
‘पेपर लीक’ यह दो शब्द पढ़ते ही खलबली मच जाती है। विगत वर्षों से पेपर देदे कर लगातार असफल होने वाले बेरोजगारों के मुंह से भद्दी गालियों की रेलगाड़ी छूटती है। उनके पिताओं को पूरी सरकार और व्यवस्था नाकारा लगने लगती है। माताएं कहती हैं- ‘हमारे समय तो ऐसा नहीं होता था।’ दादा-दादी अपने आशीर्वाद को रिपेयर करते हुए कहते हैं- ‘कोई बात नहीं बेटा, फिर तैयारी कर। भगवान सब ठीक करेगा।’ सत्ता पक्ष वाले इन दो शब्दों से बेहद दुखी होते हैं तो विपक्ष वाले लड्डू बाँटने की तैयारी में लग जाते हैं। इन सब से अलग मेरे जैसा कोई लेखक इन शब्दों को चेलेंज देता हुआ इनके अर्थ में परिवर्तन कर ‘होली अंक’ के लिए रचना तैयार करने की सोचता है!
पेपर का मतलब केवल परीक्षा का प्रश्न पत्र नहीं होता। प्यारे, जिसे प्रतिदिन आप पढ़ते हैं- अखबार वह न्यूज पेपर कहलता है और लोग उसे केवल पेपर कहते हैं। मैं जिस कागज पर लिख रहा हूं, उसे भी पेपर संज्ञा से सुशोभित किया जाता है। मैं यहां किसी अज्ञात पेपर की बात कर रहा हूं, जिसे होली में सालियों ने जीजाजी के लिए तैयार किया था। नए नए जीजाजी को अपनी नई नवेली सालियों के संग होली खेलने-खिलाने का आनंद रसगुल्लों के स्वाद से भी ज्यादा होता है। रंग और गाल तो वही होते हैं, जो पिछली होली में थे। किंतु इस बार के रंग को छूने वाले कोमल-कोमल हाथों से और एक दूसरे के गालों तक पहुंचने के लिए जो खुशी होती है वह निराली होती है। जैसे खुशी खुद मचलती-इठलाती दिखाई देती है। सालियों में उत्साह-उमंग की मात्रा चरम को पार करती देखी जा सकती है। जीजाजी के मन में लड्डू फूटते हैं कि कैसी कैसी कितनी सालियां मिलेंगी। दोनों पक्षों में बस विचारों की तेज आंधियां चलती है। जब मौका मिलेगा तो उनके साथ ऐसा करेंगे, वैसा करेंगे और भी ना जाने कैसा-कैसा करेंगे।
बडी, मझली और छोटी सालियों के संग आस-पड़ौस की लड़कियों और बहुओं ने भी जीजाजी की सालियों की संख्या में इजाफा कर दिया। अब जीजाजी के ठाठ हो गए। एक साली ने कहा- ‘जैसे ही जीजू गेट पर पहुंचेंगे, मैं छत से रंग की बालटी उन पर उडेल दूंगी।’ दूसरी बोली- ‘तेरे नंबर से पहले तो मेरा नंबर आएगा। मैं अपनी बॉलकनी से रंग के गुब्बारों से जीजाजी और उनके दोस्तों पर धावा बोल दूंगी और मेरा पिंटू अपनी पिचकारी से उन पर रंग बरसाएगा।’ फिर क्या था सब ने बारी बारी से अपने-अपने कामों को बड़े जोश के साथ वर्णित किया- ‘मैं दरवाजे के पीछे छिपी रहूंगी, जैसे ही भीतर आएंगे पीछे से उन पर जबरदस्त रंग डाल कर पूरा रंग दूंगी।’ एक के बाद एक रंगारंग कार्यक्रम फिक्स हुए। उनको क्या-क्या खियाला-पिलाया जाएगा। उनके दोस्तों के साथ कैसे-क्या बात होगी। भांग के भजिया से रंगीन काजू कतली और पान-सुपारी तक की सारी बातों को एक फुलस्कैप कागज पर सुंदर लिखावट के साथ सालियों द्वारा लिखी गई।
काश! सुंदर सालियों की हसरतें पूरी हो पाती। जीजाजी का संदेश आ गया कि उनका रीट का पेपर बहुत अच्छा हुआ था पर पपेर लीक होने से बहुत उदास है। इसलिए इस बार होली नहीं खेलेंगे। आग लगे इस पेपर लीक को पिछले सालों होली को कोरोना खा गया इसबार यह लीकेज खा गया। इस स्टोरी की के असली सूत्रों का खुलासा करें तो सुंदर लिखावट के साथ पूरी योजना जिस पेपर पर लिखी गई थी उसे जीजाजी की एक प्रिय साली साहिबा ने उनको वाट्सएप कर दिया तो वे नाराज हो गए। उनको लगा कि पेपर लीक करने वाले भरे पड़े हैं। वे नहीं आए। उन्होंने सुगुन के तौर पर अपनी प्रिय सालियों को तिलक लगा अपना फोटो भेजकर होली की शुभकामनाएं देकर इतिश्री कर दी।
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25 दिसंबर, 2021
जूते का स्वाद / डॉ. नीरज दइया
एक दिन अकबर ने बीरबल से पूछा- “बीरबल, दुनिया में सब से बेहतर स्वाद किसका होता है?” बीरबल सोच में पड़ गया। वह जब भी सोच में पड़ता, अकबर से कहा अदब से कहता- ‘‘जहांपनाह ! थोड़ा वक्त दीजिए।’’ इस बार भी उसने यही कहा, और उसे वक्त दे दिया गया। अब दिन-रात बीरबल को चिंता सताने लगी कि अगर किसी खाने-पीने या फल आदि का नाम लिया और बादशाह अकबर को वह पसंद नहीं आया तो क्या होगा? यहां तो उसकी हाजिर-जवाबी पर दाग लगने की नौबत आ पहुंची। वह यही सोच सोच कर परेशान रहने लगा- अगर उसकी और जहांपनाह की पसंद जुदा निकली तो क्या होगा! हो सकता है कि बूढ़े जहांपनाह बूढ़े होते बीरबल की अंतिम परीक्षा ले रहे हो और इसके बाद उसे सदा-सदा के लिए विदा कर दिया जाए। विदा क्या धक्के मार कर दरबार से बाहर कर दिया जाए... बीरबल की आंखों में आंसु आ गए। हाय अल्लाह! इतने सालों की वफादारी का यह ईनाम बख्सा जाएगा!
आंसु तो मेरे भी आने वाले हैं, कारण यह कि मेरे पाठक आप श्रीमान तो शीर्षक देखकर यह विचार कर चुके हैं कि स्वादों में सबसे निराला स्वाद जूतों का ही बताया जाएगा। क्या आप इस बात से सहमत हैं? अब मैं बीरबल बन कर आपसे थोड़ा समय लेकर बात को आगे बढ़ा रहा हूं कि कहीं कोई स्वाद जूतों से बेहतर आपको समझा सकूं। यह तो बेहद सरल था कि मैं बीरबल के श्रीमुख से अकबर को तपाक से उत्तर दिला देता- “जहांपनाह स्वादों में सबसे बेहतरीन स्वाद तो जूते का स्वाद होता है।” यों बात वहीं खत्म हो जाती। हो जाती तो ठीक ही थी, पर नहीं हुई और बिना कुछ किए कराए मुंह में जूते का स्वाद भर गया है। दुनिया में हजारों चीजे हैं जनाब, और जूता भी भला कोई खाने की चीज और स्वाद में आता है क्या? पर क्या करें सबकी अपनी अपनी पसंद होती है और ना मालूम बदशाह सलामत की पसंद क्या हो। और खुदा का खौफ नहीं उनकी पसंद तो बदलती रहती है!
श्रीमान सुनिए बात यूं है कि यह कोई झूठा किस्सा या बनी बनाई झूठी कहानी नहीं है। बिल्कुल सच्ची घटना है कि एक लेखक अपने आस-पास अनेक लेखकों के चित्रों को अपने आस-पास बिखेर कर उन्हें जूते का स्वाद चखा रहा था- “दुष्टों, साहित्य का तुम सब ने मिलकर बेड़ा गर्क कर दिया है। मैं जब तक इस संसार में पैदा हुआ तुम सब ने मिलकर वह सब कुछ लिख डाला जो-जो मैं लिखने की सोच कर यहां आया था।” देखिए, आजादी ने हमें बहुत सारी हिम्मत दे दी है। माना कि इस जूता प्रकरण में उसका स्वाद हमारे लेखक मित्रों तक नहीं पहुंच सका। उनमें से कुछ लेखक तो स्वगवासी थे किंतु जो इसी संसार के वासी थे उनको इसकी खबर तक नहीं लगी कि कोई नया लेखक उनको जूतों का प्रसाद दे रहा है। मुझे लगने लगा है कि अब तो आपके मुंह में भी कुछ कुछ स्वाद जूतों का आने लग गया है।
वैसे तो यह मेरी कल्पना ही थी कि जूते का स्वाद बेहतरीन होता है किंतु अब यकीन हो चला है कि दुनिया में सबसे बेहतरीन स्वाद जूते का ही है। उम्र के साथ उसका स्वाद बदलता जाता है। जूते की ऐड़ी और ऊंची ऐड़ी का स्वाद समान नहीं हो सकता। मित्र और हसीना के जूते का स्वाद तो भैया भिन्न-भिन्न होता ही है। आजकल जमाना बदल गया है किसी को मर्दाना जूते का स्वाद पसंद है तो किसी को फैशनेबल जनाना। अपना ख्याल यहां तो हाई हील के जूते खाने के लिए दुनिया में ऐसे स्टोर भी खुल रहे हैं जहां ग्राहक बड़ी संख्या में आते हैं और उनकी लाइन लगती है। एक रेस्टोरेंट सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना कि वहां खाने में जूते परोसे जाते हैं। खाने वाले जूता, चॉकलेट से बना है। अकबर-बीरबल ने तो उसी जमाने में यह स्वाद रहस्य जान लिया था किंतु अब इस नई दुनिया का मानना है कि जूते का स्वाद गजब का होता है।
जते का स्वाद ऐसा है कि सब जानते और मानते हैं। हो सकता है इसे स्वीकार करने की हिम्मत नहीं हो। इसका स्वाद तो सभी जानते हैं और कोई जीवन ऐसा नहीं जिसने इसका स्वाद ना जाना हो। किंतु सत्य यह भी है कि इस विषय में पूछे जाने पर हर कोई किन्नी काटता हैं। यह संकोच कैसा…? दरसल जूता सदैव एक संभावनाशील विषय रहा है और हर युग में रहेगा। बीरबल ने जाना कि हमारे भरत जी जूते का स्वाद बखूबी जानते थे इसलिए तो रामजी के खड़ाऊ लेकर अयोध्या वापस लौट आए और जूते यानी खड़ाऊ को पूजते रहे। अब विचार कीजिए कि पूरा भक्तिकाल भगवान के श्रीचरणों में बैठा कर कौन से स्वाद को लेकर साहित्य का स्वर्णयुग बन बैठा है। साहब को कभी मेम साहब के जूतों का स्वाद पूछ कर देखिए। ऐसे गोपनीय प्रकरण रसरंजन के बाद श्रीमुख की शोभा होते हैं, अस्तु इसके साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ करना अधोषित अपराध है।
- डॉ. नीरज दइया
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एक दिन अकबर ने बीरबल से पूछा- “बीरबल, दुनिया में सब से बेहतर स्वाद किसका होता है?” बीरबल सोच में पड़ गया। वह जब भी सोच में पड़ता, अकबर से अदब से कहता- ‘‘जहांपनाह ! थोड़ा वक्त दीजिए।’’ इस बार भी उसने यही कहा, और उसे वक्त दे दिया गया। अब दिन-रात बीरबल को चिंता सताने लगी कि अगर किसी खाने-पीने या फल आदि का नाम लिया और बादशाह अकबर को वह पसंद नहीं आया तो क्या होगा? यहां तो उसकी हाजिर-जवाबी पर दाग लगने की नौबत आ पहुंची। वह यही सोच सोच कर परेशान रहने लगा- अगर उसकी और जहांपनाह की पसंद जुदा निकली तो क्या होगा! हो सकता है कि बूढ़े जहांपनाह बूढ़े होते बीरबल की अंतिम परीक्षा ले रहे हो और इसके बाद उसे सदा-सदा के लिए विदा कर दिया जाए। विदा क्या धक्के मार कर दरबार से बाहर कर दिया जाए... बीरबल की आंखों में आंसु आ गए। हाय अल्लाह! इतने सालों की वफादारी का यह ईनाम बख्सा जाएगा!
आंसु तो मेरे भी आने वाले हैं, कारण यह कि मेरे पाठक आप श्रीमान तो शीर्षक देखकर यह विचार कर चुके हैं कि स्वादों में सबसे निराला स्वाद जूतों का ही बताया जाएगा। क्या आप इस बात से सहमत हैं? अब मैं बीरबल बन कर आपसे थोड़ा समय लेकर बात को आगे बढ़ा रहा हूं कि कहीं कोई स्वाद जूतों से बेहतर आपको समझा सकूं। यह तो बेहद सरल था कि मैं बीरबल के श्रीमुख से अकबर को तपाक से उत्तर दिला देता- “जहांपनाह स्वादों में सबसे बेहतरीन स्वाद तो जूते का स्वाद होता है।” यों बात वहीं खत्म हो जाती। हो जाती तो ठीक ही थी, पर नहीं हुई और बिना कुछ किए कराए मुंह में जूते का स्वाद भर गया है। दुनिया में हजारों चीजे हैं जनाब, और जूता भी भला कोई स्वाद में आता है क्या? पर क्या करें सबकी अपनी-अपनी पसंद होती है और ना मालूम बदशाह सलामत की पसंद क्या हो। और खुदा का खौफ नहीं, उनकी पसंद तो बदलती रहती है!
श्रीमान सुनिए, बात यूं है कि यह कोई झूठा किस्सा या बनी बनाई झूठी कहानी नहीं है। बिल्कुल सच्ची घटना है कि एक लेखक अपने आस-पास अनेक लेखकों के चित्रों को अपने आस-पास बिखेर कर उन्हें जूते का स्वाद चखा रहा था- “दुष्टों, साहित्य का तुम सब ने मिलकर बेड़ा गर्क कर दिया है। मैं जब तक इस संसार में पैदा हुआ तुम सब ने मिलकर वह सब कुछ लिख डाला जो-जो मैं लिखने की सोच कर यहां आया था।” आजादी ने हमें बहुत सारी हिम्मत दे दी है। माना कि इस जूता प्रकरण में उसका स्वाद हमारे लेखक मित्रों तक नहीं पहुंच सका। वैसे तो यह मेरी कल्पना ही थी कि जूते का स्वाद बेहतरीन होता है, किंतु अब यकीन हो चला है कि दुनिया में सबसे बेहतरीन स्वाद जूते का ही है। उम्र के साथ उसका स्वाद बदलता जाता है। जूते की ऐड़ी और ऊंची ऐड़ी का स्वाद समान नहीं हो सकता। मित्र और हसीना के जूते का स्वाद तो भैया भिन्न-भिन्न होता ही है। आजकल जमाना बदल गया है किसी को मर्दाना जूते का स्वाद पसंद है, तो किसी को फैशनेबल जनाना जूतियां। अपना ख्याल यहां तो हाई-हील के जूते खाने के लिए दुनिया में ऐसे स्टोर भी खुल रहे हैं जहां ग्राहक बड़ी संख्या में आते हैं और उनकी लाइन लगती है। एक रेस्टोरेंट सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना कि वहां खाने में जूते परोसे जाते हैं। खाने वाले जूता, चॉकलेट से बना है।
जूते का स्वाद ऐसा है कि सब जानते हैं। हो सकता है इसे स्वीकार करने की हिम्मत नहीं हो। कोई जीवन ऐसा नहीं जिसने इसका स्वाद ना जाना हो। किंतु सत्य यह भी है कि इस विषय में पूछे जाने पर हर कोई किन्नी काटता हैं। यह संकोच कैसा…? हमारे भरत जी जूते का स्वाद बखूबी जानते थे इसलिए तो रामजी के खड़ाऊ लेकर अयोध्या वापस लौट आए और खड़ाऊ पूजते रहे। पूरा भक्तिकाल भगवान के श्रीचरणों में बैठ कर कौन से स्वाद को लेकर साहित्य का स्वर्णयुग बन बैठा है। साहब को कभी मेम साहब के जूतों का स्वाद पूछ कर देखिए। ऐसे गोपनीय प्रकरण रसरंजन के बाद श्रीमुख की शोभा होते हैं। यकीन कीजिए जूतमपाक से बेहतरीन स्वाद इस संसार में दूसरा नहीं है और बीरबल को सारे स्वाद जान लेने के बाद यही उत्तर देना पड़ा। अकबर भी यह उत्तर जाकर ना जाने क्यों चुप रहे!
29 जून, 2018
पैसे का चक्कर / नीरज दइया
05 जून, 2018
नहाना-धोना / डॉ. नीरज दइया
पहले आप मन में अच्छे से यह फैसला करें कि आपको हैरानी है अथवा नहीं है। अरे यह बात भी भूल गए, मैं पूछ रहा हूं कि नहाने-धोने की बात पर आपको हैरानी है अथवा नहीं है? वैसे आपके हैरान होने अथवा नहीं होने के अतिरिक्त भी एक तीसरी स्थिति है आपकी संवेदनहीनता। यानी आपको कुछ पता चल रहा है अथवा नहीं चल रहा इसका कोई फर्क नहीं पड़ता। आप ही से मैं पूछ रहा हूं- क्या आप अब भी जिंदा है? यह कोई बेहूदा सवाल नहीं है। जीवन और मृत्यु के विषय में अब भी बहुत सारी भ्रांतियां हैं। इसका कारण हमारा होना और नहीं होना दोनों का बहुत पास-पास होना है। इतना पास-पास कि क्षण भर में और कहें उससे भी कम समय में हम कभी भी इधर से उधर जा सकते हैं। ‘गीता’ कहती है कि जीवन बार-बार वस्त्र बदलता है। अभिप्राय यही है कि जीवन का सार ‘नहाना-धोना’ ही है। कुछ को नहाने-धोने की जल्दी लगी रहती है। जब फिर फिर नहाना-धोना है तो डरना कैसा!
कुछ लोग चिंतन करते हैं कि जीवन इतने वर्षों से चल आ रहा है और चलता जा रहा है। यहां इतने लोग जन्में और मरे, पर नतीजा क्या निकला? सभी इधर से उधर और उधर से इधर चले आ रहे हैं। यह कोई निरा उपदेश नहीं है भैया। मैं आपसे बतियाने के चक्कर में पंच काका के बारे में बताना ही भूल गया। अगला-पिछला जीवन तो याद नहीं पर इस जीवन को तो याद रखना है। मैं घर में हूं और मेरे काका-काकी मुझे बहुत प्यार करते हैं। काका आज सवेरे से ही गार्डन में खोए हैं। मैंने सोचा लौट आएंगे पर बहुत देर लगा दी तो मुझे चिंता होनी चाहिए कि नहीं। मैं उन्हें देखने पहुंचा तो वे घास-फूस में कुछ ढूंढ रहे थे।
मैंने पूछा- काका, यहां क्या खोजने लगे हो? उन्होंने गर्दन उठाई और बोले- कोई जड़ी-बूंटी खोज रहा हूं। तुझे बताया था ना कि तेरी काकी को जवान करूंगा और फिर हनीमून। इतने में भीतर से काकी चिल्लाई- अरे इतनी देर कर दी, आज नहाना-धोना नहीं है क्या?
देखिए आप को फिर से थोड़ी हैरानी हुई है। नहीं हुई तो आप ठीक से खुद को समझ नहीं पा रहे हैं। आप को पता ही नहीं चलता कि आपके भीतर-बाहर क्या हो रहा है। आप वही है जो मैंने कहा- संवेदनहीन। आपको संवेदनहीन कहने से आपकी संवेदनाएं जाग गई है और मुझ पर गुस्सा होने लगे हैं। अपना गुस्सा कंट्रोल कीजिए। सेहत के लिए गुस्सा अच्छा नहीं होता है। पता नहीं कितनी-कितनी बीमारियों ने आपको घेर रखा है। ऐसे गर्दन हिलाने से कुछ नहीं होगा। आप बीमार हैं या नहीं, आपको कहां पता है। आपके कहने से कुछ नहीं होता। पांच सौ रुपये देकर चैक-अप कराओ। देखिए कितनी कितनी बीमारियां हैं आपको। पांच हजार के कुछ टेस्ट कराने की फीस बड़ी है या आपका जीवन? पैसा तो क्या है, आपके हाथ का मैल ही है। आप तो जानते हैं- मैल बीमारी की जड़ है। इसी जड़ को हम खत्म करना चाहते हैं। नहाना-धोना भी असल में मैल-मुक्ति है और हमारी काकी जी इसके लिए चिल्ला रही हैं। अब आप मुस्कुराने लगे...... तो क्या आप सही में संवेदनहीन नहीं है? आपमें संवेदनाएं बची हुई है। अरे वाह, आप अब भी जिंदा है!
अब तो मेरा आपको बस यह बताना शेष है कि पंच काका पागल है। उनसे यह कहना नहीं कि मैंने उन्हें पागल कहा है। लोग क्या बस इधर-उधर ही करते रहते हैं। वे सोचते हैं जीवन का असली आनंद इधर-उधर करने में है। यहां सब कुछ देखा-भाला है और पुरानी चीजों को नए-नए ब्रांड के रूप में बेचते हैं। नया कुछ भी नहीं है। आप और हम सभी, नहा-धो कर फिर से फिर फिर कर आएं हैं। यह जो गार्डन में जड़ी-बूटी ढूंढ़ने का नाटक कर रहे हैं, बहुत पहुंचे हुए आदमी है। कहते हैं कि जवान करने का नुस्का ढूंढ़ रहा हूं, तेरी काकी को जवान करूंगा... ठीक कहा था ना इन्हें मैंने पागल, अरे अगर काकी जवान हो गई तो लोग कहेंगे- बूढ़ा घोड़ा लाल लगाम। नहीं कहेंगे क्या? और हां, मैं यह कहना तो भूल ही गया कि आप संवेदनशील हैं।
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20 अप्रैल, 2018
नाक का बांका बाल / डॉ. नीरज दइया
ऑफिस के खास खास कर्मचारी मंत्रणा के लिए साहब के कमरे में पहुंच गए और बाहर पहरेदार चपरासी ने रटा-रटाया हुआ जुमला- ‘साहब बीजी है, अर्जेंट मिटिंग ले रहे हैं।’ मुंह में दबा लिया, जिससे कोई भी आए या पूछे तो तुरंत जबाब दिया जा सके। साहब बड़े नेकदिल और नियम पसंद आदमी है इसलिए ऑफिस बड़े ढंग से चलता है। ऐसे साहब अगर हरेक ऑफिस में हो जाए तो देश ढंग से चलने लग जाए। मिटिंग में देश के ढंग से नहीं चलने के सबूत पर चर्चा हो रही थी। बड़े बाबू कह रहे थे कि देश अगर ढंग से चलता तो यह गलत विषय साहब तक नहीं आता। विषय में बदलाव बिना हेड ऑफिस की मंजूरी के हो नहीं सकता और अगर विषय केवल ‘नाक का बाल’ होता तो सरलता रहती। अब समस्या यह है कि नाक का बाल बांका है, जिसके बांकपन से छेड़छाड़ नहीं कर सकते हैं। हिंदी अधिकारी अपना ज्ञान दे रहा था कि सर, जरूर कुछ मिस्टेक हुआ है। यह कोई दूसरा विषय होगा- ‘बाल तक बांका न होना’ उसमें से यह बांका सब इधर सिफ्ट हो गया है। जैसे हम समस्या से परेशान हो रहे हैं वैसे ही कोई दूसरा ऑफिस भी समस्या में होगा। जाहिर है उन्हें विषय मिला होगा- ‘बाल तक न होना’। सर आप अपने जानकारों को फोन पर बात कर पूछिए कि उन्हें क्या क्या विषय मिला है।
साहब जरा बिदक गए- इसमें दूसरों को फोन करने वाली कौनसी बात है। जिसे जो मिला है उसे उसी पर काम करना होता है। आप लोग यहां मेरे सामने इतना बोल लेते हैं, आपको खबर होनी चाहिए कि हम हमारे उच्चाधिकारियों से ऐसे चपर-चपर थोड़ी कर सकते हैं। ‘बाल तक न होना’ की तुलना में ‘नाक का बांक बाल’ विषय जरा टेढ़ा है। बाल तक न होना तो सीधा-साधा है कि गंजेपन के बारे में बात करनी है। साहब में डबल एओ साहब की तरफ देखा जो नाक में अंगुली डाले ना जाने किस कार्य में व्यस्त थे।
वे स्थिति को भांपते हुए जरा चौंक कर बोले- यह सब आपके बस का रोग नहीं है छोटे बाबू। अगर होता तो खुद ही कुछ ना कर लिए होते। साहब ने हाथ के संकेत से उन्हें रोका तो वे कहने लगे- साहब आप पहले चाय-नाश्ते का बोलो, तभी कुछ दिमाग चलेगा। भूखे भजन ना होत गोपाला। साहब कैसे भी हो एकाउंट वाले उन्हें अज्ञाकारी बना ही लेते हैं। डबल एओ साहब का मान रखते हुए साहब ने झटपट व्यवस्था के लिए आदेश जारी किए। फिर मिटिंग में जोश आना ही था। डबल एओ साहब बोले- सर इसके लिए एक पैनल बना देते हैं जो कुछ खोज खबर करेगा फिर जो रिपोर्ट आएगी उसको नोटसीट पर ले लेंगे और हमारा काम बन जाएगा। कोई भी काम हो उसे विधिसम्मत करने से बाद में परेशानी नहीं आती। नहीं तो बाद में यह मुद्दा बनेगा कि हमने तो नाक के दाहिने भाग बाले बांके बाल का लिखा था और अपने बाएं भाग वाले बाल की चर्चा कर दी है। ऐसे ओब्जेक्शन में यह भी ध्यान रखें कि बाल कितना बांका है यह इस पत्र में स्पष्ट नहीं लिखा है। सर, एक बात गौर की आपने.... देखिए इस लेटर में बाल की लेंथ के बारे में भी कुछ नहीं लिखा गया है।
साहब चहकते हुए बोले- यही तो मैं कहता हूं कि हेड ऑफिस में सारे मूर्ख भरे पड़े हैं। क्या करते हैं और क्या नहीं करते हैं कुछ मालूम नहीं चलता। देश में वैसे ही इतनी अफरा-तफरी है ऐसे में नाक जैसे संवेदनशील मुद्दे को टच ही क्यों किया जाए। देखना ये नाक बड़ा इश्यू बन जाएगा। स्टेनो जो अब तक चुप चाप बैठी थी ने हस्तक्षेप किया और बोली- सर, मेरे ध्यान में हमारे शहर में एक लेखक है जो लिखता-पढ़ता है। आप कहें तो उन से बात करें। अच्छा रहेगा कि उनसे ही लिखवा लें।
‘गुड, वेरी गुड।’ और साहब ने कहा- ‘ओके, काम बन गया। ऐसा करो पैनल में ये जो है लेखक उसका नाम डाल कर फाइल पुट अप कीजिए। साथ ही एक मिटिंग भी प्रपोज कर देना।’ सब कुछ साहब के आदेशानुसार हुआ। लेखक महाश्य पधारे और अपने विशद ज्ञानी होने का प्रमाण भी उन्होंने प्रस्तुत कर दिया। अफिस के सभी कर्मचारी तो कर्मचारी साहब भी उनके ज्ञान का लोहा मान गए। लेखक महाश्य ने बताया कि नाक के बाल अगर बांके नहीं हो तो नाक के रास्ते से धूल और दूसरी गंदगी सीधे फेंफड़ों तक पहुंच जाती है। ऐसे में सीधी बालों की तुलना में बालों को बांका रखा जाना चाहिए। यह विषय बड़ा सोच-समझ कर दिया गया है। कोई रचनात्मक रुचि सम्पन्न अधिकारी रहा होगा जिसने यह विषय रखा है। बांका बाल सौंदर्य-शास्त्र का विषय है। वैसे दूसरा पक्ष भी देखिए अगर बाल बांके होंगे तो वे नाक में एडजेस्ट हो जाएंगे और बढ़ने पर भी आपको या फिर हमको शर्मिंदा नहीं करेंगे।
लेखक महाश्य ने नाक के बालों की ट्रिमिंग के अनेक तरीकों को आजमाने की सलाह भी नोट करवा दी। हैरत तो साहब को तब हुई जब लेखक महाश्य ने बताया कि 'हेयरी नोज़' नामक एक फिल्म चीन में बनी है जो वायु प्रदूषण के मुद्दे को उठाती हुई शहरी चीनियों को कार्रवाई करने के लिए प्रेरित कर रही है। साहब ने माना कि सरकारी लोग बस सरकारी होते हैं। ये लेखक किस्म के गैर सरकारी लोग ही सही सूचनाएं रखते हैं। अब देखिए ना इतनी बड़ी सूचना हमें नहीं थी। लेखक महाश्य अगर नहीं बताते तो हमें मालूम ही नहीं चलता कि पिछले साल 'नेचर' पत्रिका में एक रिपोर्ट छपी थी जिसमें चीन में प्रदूषण से होने वाली मौतों की संख्या 13 लाख बताई गई थी।
फिर क्या था साहब के लिए ‘नाक का बांका बाल’ एक नियत मानदेय पर तैयार हो गया। साहब ने अपने बड़े साहब को यह ब्रीफ बताने का विचार किया। उन्होंने सोचा कि मैं बताता हूं कि ‘हेयरी नोज’ फिल्म में बहुत सारे स्टाइलिश चीनी लोगों और एक कुत्ते को दिखाया गया है। जिन्होंने 'बदबूदार, दमघोंटू हवा और कभी ख़त्म न होने वाली धुंध' के बीच जीने का तरीका नाक के लंबे बालों के जरिए ढूंढ़ निकाला है। तो बड़े साहब को झटका लगेगा। साहब मन ही मन में मुदित होते सोचने लगे इस बार तो उन्हें बोलना ही पड़ेगा- कमाल कर दिया है तुमने। रियली यू आर ग्रेट। ये ‘नाक का बांका बाल’ बस तुम्हीं सीधा कर पाए हो। दूसरों को देखो, नोनसेंस। इतनें में बाबू आया और उत्साह के साथ बोला- सर, आठ तारीख वाली कार्यशाला केंसिल हो गई है।... साहब ने उसके हाथ से कागज लिया और यह देखा तो उनका उत्साह ठंडा हो गया।
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