28 दिसंबर, 2021
डॉ. शक्तिदान कविया की स्वर्णिम आभा / डॉ. नीरज दइया
कृति ‘धरती घणी रूपाली’ के अनुवाद के बारे में डॉ. आनंद प्रकाश दीक्षित ने लिखा- ‘तरुण की कुछ चुनी हुई कविताओं का राजस्थानी के सरस हृदय कवि डॉ. शक्तिदान कविया ने राजस्थानी में उन कविताओं की संपूर्ण गरिमा और अर्थ एवं भाव की रक्षा करते हुए सुघड अनुवाद प्रस्तुत करके बड़ा ही उपयोगी कार्य किया है। उनका अनुवाद मूल रचना के सन्निकट और उसके लिए सोने में सुगंध जैसा है।’ पचास कविताओं की इस कृति में प्रस्तावना विद्वान लेखक डॉ. मनोहर शर्मा ने लिखी और स्वयं अनुवादक ने भी अपनी बात भूमिका ‘अनुवादक रा आखर’ में विस्तार से रखी है। यही नहीं अंग्रेजी भाषा के कवि टॉमस ग्रे की ‘एलीजी’ का अनुवाद भी कविया जी ने किया जो बेहद चर्चित रहा है। इनकी भूमिकाओं के माध्यम से हम कविता और अनुवाद की अनेक बातें जान सकते हैं।
दो बातें स्पष्ट है एक तो यह कि कविया जी कविता के अच्छे अनुवादक रहे हैं और दूसरी यह कि उनका अध्ययन व्यापक-विशद रहा है। वैसे उन्होंने स्वयं भी कविताएं लिखी है। एक कवि हृदय दूसरे कवि हृदय को बेहतर ढंग से समझ सकता है। परंपरागत डिंगळ शैली और छंदबद्ध काव्य-रचनाओं के लिए पहचाने जाने वाले कविया जी की सर्वाधिक जनप्रिय कविता को राजस्थानी भाषा की वंदना कह सकते हैं। ‘इणरौ इतिहास अनूठो है, इण मांय मुलक री आसा है।/ चहूंकूंटां चावी नै ठावी, आ राजस्थानी भासा है।’ जब-जब राजस्थानी भाषा और मंचीय कविता की बात होगी हमें इस अद्वितीय कविता का स्मरण करना होगा। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि सपूता री धरती, दारू-दूषण, धरा सुरंगी धाट, धोरां री धरोहर जैसी काव्य-कृतियों के द्वारा कवि के रूप में अनेक छंदबद्ध रचनाएं देने वाले कविया जी ने आधुनिक कविता के क्षेत्र में भी किंचित योगदान दिया है, किंतु वे डिंगळ के छंदवद्ध कवि के रूप में ही ख्याति प्राप्त कर सके हैं। आधुनिक गद्य विधाओं खासकर उपन्यास, कहानी, कविता, नाटक आदि के विषय में उनका चिंतन लेखन मेरे अध्ययन में नहीं आया है किंतु वे महाविद्यालय में राजस्थानी विभागाध्यक्ष रहे तो निसंदेह इन सब पर भी उनका समान अधिकार रहा है।
कविता और अनुवाद की बात करते हुए प्रसंगवश हमें यहां यह भी विचार करना चाहिए कि किसी अनुवादक के द्बारा किसी रचना अथवा कृति को अनुवाद के लिए चयन करने का मूल आधार क्या होता है। इसमें सर्वाधिक अभिमत तो अनुवादक की अपनी पसंद है जो निसंदेह महत्त्व भी रखती है। कविया जी के साथ भी ऐसा ही रहा है। साहित्य अकादेमी के अनुवाद पुरस्कार से सम्मानित कृति के अनुवाद का बीजारोपण अनुवादक कविया जी के मन में वर्ष 1958 में हुआ, जब वे कविवर तरुण की कविता ‘बटोही ठंडी सांस न ले’ रचना से बेहद प्रभावित हुए थे। वर्ष 1989 में महाकवि तरुण की ‘तरुण-काव्य ग्रंथावली’ का प्रकाशन हुआ और दिसंबर 1990 में उन्होंने उनकी चयनित लगभग पचास कविताओं का राजस्थानी रूपांतरण किया। यहां यह भी रेखांकित किया जाना जरूरी है कि किसी मूल कविता के मूल छंद को अनुवाद की भाषा में उसी छंद और भाव गरिमा के साथ साधना बेहद श्रमसाध्य होता है जो उन्होंने इस अनुवाद में किया है।
जब हम कविया जी के विशद कार्य को देखते हैं तो उनको किसी एक रूप अथवा विधा के बंधन में नहीं बांध सकते हैं। वे कवि और अनुवादक तो थे ही किंतु उससे भी अधिक उनका मान-सम्मान निबंध विधा में रहा है। उन्होंने एक बेजोड़ गद्यकार के रूप में जहां वचनिका शैली को साधने का प्रयास किया, वहीं विविध विषयों के व्यापक अध्ययन-मनन-चिंतन से पुष्ट उनके निवंध विषयगत आधरभूमि कहे जाते हैं। ‘संस्कृति री सोरम’ (1984) निबंध-संग्रह में दस निवंधों के माध्यम से राजस्थानी संस्कृति के अनेक परिचित-अपरिचित पक्षों को कविया जी ने वाणी दी है। यहां परंपरा और आधुनिकता का सुंदर समन्वय देखा जा सकता है। लोक-संस्कृति, लोक-परंपराओं, लोक-विश्वासों और लोक-साहित्य के व्यापक अध्यान को यहां शब्द-शब्द सुवास और लालित्यपूर्ण गद्य में देख सकते हैं।
यह देखकर आश्चर्य होता है कि उन्होंने जिस विद्वता से अनेक ग्रंथों की भूमिकाएं और प्रस्तावनाएं लिखी उनमें स्वतंत्र रचनाओं-विचारों के अनेक अंश मौजूद है। शायद यही कारण रहा होगा कि अनेक कृतियों की भूमिकाओं और प्रस्तावनाओं में से चयनित 24 को उन्होंने कृति ‘प्रस्तावना री पीलजोत’ (2009) में संकलित किया था। मेरा मानना है कि शक्तिदान कविया की स्वर्णिम आभा इन रचनाओं के अतिरिक्त अनेक ऐसे ग्रंथ संपादनों की भूमिकाओं में भी मिलती है। उदाहरण के लिए भारतीय विद्या मंदिर शोध प्रतिष्ठान से प्रकाशित राजस्थानी की चर्चित कृति ‘छन्द राउ जइतसी रउ’ (1991) का संपादन मूलचंद ‘प्राणेश’ ने किया जिसमें प्रस्तावना डॉ. शक्तिदान कविया की प्रकाशित हुई है। इसी प्रकार राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान से प्रकाशित ‘सोढायण’ (1966) के संपादक के रूप में कविया जी ने 92 पृष्ठीय भूमिका में बहुत विस्तार से विविध आयामों को स्पर्श करते हुए जो कुछ लिखा है वह अपने आप में अद्वितीय मेधा का अनुपम उदाहरण है। कैसे एक व्यक्ति ने इतिहास, साहित्य और संस्कृति को एकमेक करते हुए अतीत के पन्नों को प्रामाणिकता के साथ उजागर किया है यह देखने-समझने की बात है। उनको कवि-अनुवाद के साथ निबंधकार और आलोचक के रूप में मानना समीचीन होगा।
हिंदी लेखक की बात करें तो उनके विपुल लेखन को संग्रहित किया जाना है। अब तक उनकी तीन कृतियां- राजस्थानी साहित्य का अनुशीलन, डिंगल के ऐतिहासिक प्रबंध काव्य और राजस्थानी काव्य में सांस्कृतिक गौरव हिंदी में प्रकाशित हुई है। उन्होंने राणी लक्ष्मी कुमार चूड़ावत पर विशेष कार्य किया है। राजस्थानी दूहा संग्रह, राजिया रा सोरठा और ऊमरदान ग्रंथावली जैसे अनेक ग्रंथों के संपादन के लिए उनकी अक्षय कीर्ति है। डॉ. शक्तिदान कविया के संपूर्ण कार्यों की प्रारंभिक जानकारी के लिए राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर द्बारा प्रकाशित राजस्थानी साहित्य रा अगीवाण शृंखला में डॉ. गजादान चारण द्वारा लिखित विनिबंध देख सकते हैं।
डॉ. शक्तिदान कविया को यदि मैं गुरुओं का गुरु कहता हूं तो यह कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। उन्होंने शिक्षा विभाग राजस्थान के शिक्षक रचनाकारों की संपादित कृति ‘फूल सारू पांखड़ी’ (1984) की भूमिका भी अनेक ऐसे बिंदुओं को उजागर किया है कि वे आज भी भाषाई दृष्टिकोण से प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। ‘फूल सारू पांखड़ी’ में गहरी व्यंजना है जो गागर में सागर उक्ति से मिलती-जुलती है। गागर में सागर में अधिकता का भाव है, वहीं फूल सारू पांखड़ी में न्यूनता की अभिव्यक्ति है। बहुत अधिक के स्थान पर बस थोड़ा-सा अथवा उसका अंश मात्र अभिव्यक्त करना अथवा होना ‘फूल सारू पांखड़ी’ में समाहित है। आठ-दस पृष्ठों की भूमिका में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात भाषा के प्रति गंभीर और सजग होने की प्रेरणा गुरुजनों को देना है। उन्होंने अनेक उदाहरणों-उद्धरणों के द्वारा शिक्षक विभाग में सेवारत राजस्थानी लेखकों का आह्वान किया है कि यदि वे सजगता से कार्य करेंगे तो निकट भविष्य में भाषा मानकीकरण का कार्य बेहद सरल-सहज हो जाएगा। उनका मानना रहा कि राजस्थानी में ‘लेखक’ के लिए ‘लिखारौ’ शब्द उचित नहीं है। इसका कारण वे देते हैं कि ‘लेखक’ में ‘क’ कर्त्ता का बोधक है, जबकि ‘लिखारौ’ में अर्जीनवीस या प्रतिलिपिकार ही हो सकता है। निसंदेह यह उनका लेखन के लिए जिस सृजनात्मक क्षमता का अहसास समाहित करने की बात का उदाहरण है। इसी भांति उन्होंने राजस्थानी के लिए ‘पाठक’ या ‘पढ़णहार’ दोनों शब्दों को ‘पढ़ार’ की तुलना में अधिक उचित-बेहतर बताया है। यहां यह कहने का अभिप्राय है कि शिक्षकों को उनकी भाषा और वर्तनी की अनेक जानकारियों के साथ प्रेरित और प्रोत्साहित करने वाले कविया जी ने स्वयं एक रचनाकार के रूप में समरूपता का निर्वाहन करने का प्रयास जीवन पर्यंत किया है। इस लिहाज से वे भाषाविद अथवा भाषा वैज्ञानिक के रूप में भी पहचाने जा सकते हैं। ऐसे पुरोधा की स्मृति को नमन।
25 दिसंबर, 2021
जूते का स्वाद / डॉ. नीरज दइया
एक दिन अकबर ने बीरबल से पूछा- “बीरबल, दुनिया में सब से बेहतर स्वाद किसका होता है?” बीरबल सोच में पड़ गया। वह जब भी सोच में पड़ता, अकबर से कहा अदब से कहता- ‘‘जहांपनाह ! थोड़ा वक्त दीजिए।’’ इस बार भी उसने यही कहा, और उसे वक्त दे दिया गया। अब दिन-रात बीरबल को चिंता सताने लगी कि अगर किसी खाने-पीने या फल आदि का नाम लिया और बादशाह अकबर को वह पसंद नहीं आया तो क्या होगा? यहां तो उसकी हाजिर-जवाबी पर दाग लगने की नौबत आ पहुंची। वह यही सोच सोच कर परेशान रहने लगा- अगर उसकी और जहांपनाह की पसंद जुदा निकली तो क्या होगा! हो सकता है कि बूढ़े जहांपनाह बूढ़े होते बीरबल की अंतिम परीक्षा ले रहे हो और इसके बाद उसे सदा-सदा के लिए विदा कर दिया जाए। विदा क्या धक्के मार कर दरबार से बाहर कर दिया जाए... बीरबल की आंखों में आंसु आ गए। हाय अल्लाह! इतने सालों की वफादारी का यह ईनाम बख्सा जाएगा!
आंसु तो मेरे भी आने वाले हैं, कारण यह कि मेरे पाठक आप श्रीमान तो शीर्षक देखकर यह विचार कर चुके हैं कि स्वादों में सबसे निराला स्वाद जूतों का ही बताया जाएगा। क्या आप इस बात से सहमत हैं? अब मैं बीरबल बन कर आपसे थोड़ा समय लेकर बात को आगे बढ़ा रहा हूं कि कहीं कोई स्वाद जूतों से बेहतर आपको समझा सकूं। यह तो बेहद सरल था कि मैं बीरबल के श्रीमुख से अकबर को तपाक से उत्तर दिला देता- “जहांपनाह स्वादों में सबसे बेहतरीन स्वाद तो जूते का स्वाद होता है।” यों बात वहीं खत्म हो जाती। हो जाती तो ठीक ही थी, पर नहीं हुई और बिना कुछ किए कराए मुंह में जूते का स्वाद भर गया है। दुनिया में हजारों चीजे हैं जनाब, और जूता भी भला कोई खाने की चीज और स्वाद में आता है क्या? पर क्या करें सबकी अपनी अपनी पसंद होती है और ना मालूम बदशाह सलामत की पसंद क्या हो। और खुदा का खौफ नहीं उनकी पसंद तो बदलती रहती है!
श्रीमान सुनिए बात यूं है कि यह कोई झूठा किस्सा या बनी बनाई झूठी कहानी नहीं है। बिल्कुल सच्ची घटना है कि एक लेखक अपने आस-पास अनेक लेखकों के चित्रों को अपने आस-पास बिखेर कर उन्हें जूते का स्वाद चखा रहा था- “दुष्टों, साहित्य का तुम सब ने मिलकर बेड़ा गर्क कर दिया है। मैं जब तक इस संसार में पैदा हुआ तुम सब ने मिलकर वह सब कुछ लिख डाला जो-जो मैं लिखने की सोच कर यहां आया था।” देखिए, आजादी ने हमें बहुत सारी हिम्मत दे दी है। माना कि इस जूता प्रकरण में उसका स्वाद हमारे लेखक मित्रों तक नहीं पहुंच सका। उनमें से कुछ लेखक तो स्वगवासी थे किंतु जो इसी संसार के वासी थे उनको इसकी खबर तक नहीं लगी कि कोई नया लेखक उनको जूतों का प्रसाद दे रहा है। मुझे लगने लगा है कि अब तो आपके मुंह में भी कुछ कुछ स्वाद जूतों का आने लग गया है।
वैसे तो यह मेरी कल्पना ही थी कि जूते का स्वाद बेहतरीन होता है किंतु अब यकीन हो चला है कि दुनिया में सबसे बेहतरीन स्वाद जूते का ही है। उम्र के साथ उसका स्वाद बदलता जाता है। जूते की ऐड़ी और ऊंची ऐड़ी का स्वाद समान नहीं हो सकता। मित्र और हसीना के जूते का स्वाद तो भैया भिन्न-भिन्न होता ही है। आजकल जमाना बदल गया है किसी को मर्दाना जूते का स्वाद पसंद है तो किसी को फैशनेबल जनाना। अपना ख्याल यहां तो हाई हील के जूते खाने के लिए दुनिया में ऐसे स्टोर भी खुल रहे हैं जहां ग्राहक बड़ी संख्या में आते हैं और उनकी लाइन लगती है। एक रेस्टोरेंट सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना कि वहां खाने में जूते परोसे जाते हैं। खाने वाले जूता, चॉकलेट से बना है। अकबर-बीरबल ने तो उसी जमाने में यह स्वाद रहस्य जान लिया था किंतु अब इस नई दुनिया का मानना है कि जूते का स्वाद गजब का होता है।
जते का स्वाद ऐसा है कि सब जानते और मानते हैं। हो सकता है इसे स्वीकार करने की हिम्मत नहीं हो। इसका स्वाद तो सभी जानते हैं और कोई जीवन ऐसा नहीं जिसने इसका स्वाद ना जाना हो। किंतु सत्य यह भी है कि इस विषय में पूछे जाने पर हर कोई किन्नी काटता हैं। यह संकोच कैसा…? दरसल जूता सदैव एक संभावनाशील विषय रहा है और हर युग में रहेगा। बीरबल ने जाना कि हमारे भरत जी जूते का स्वाद बखूबी जानते थे इसलिए तो रामजी के खड़ाऊ लेकर अयोध्या वापस लौट आए और जूते यानी खड़ाऊ को पूजते रहे। अब विचार कीजिए कि पूरा भक्तिकाल भगवान के श्रीचरणों में बैठा कर कौन से स्वाद को लेकर साहित्य का स्वर्णयुग बन बैठा है। साहब को कभी मेम साहब के जूतों का स्वाद पूछ कर देखिए। ऐसे गोपनीय प्रकरण रसरंजन के बाद श्रीमुख की शोभा होते हैं, अस्तु इसके साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ करना अधोषित अपराध है।
- डॉ. नीरज दइया
---
एक दिन अकबर ने बीरबल से पूछा- “बीरबल, दुनिया में सब से बेहतर स्वाद किसका होता है?” बीरबल सोच में पड़ गया। वह जब भी सोच में पड़ता, अकबर से अदब से कहता- ‘‘जहांपनाह ! थोड़ा वक्त दीजिए।’’ इस बार भी उसने यही कहा, और उसे वक्त दे दिया गया। अब दिन-रात बीरबल को चिंता सताने लगी कि अगर किसी खाने-पीने या फल आदि का नाम लिया और बादशाह अकबर को वह पसंद नहीं आया तो क्या होगा? यहां तो उसकी हाजिर-जवाबी पर दाग लगने की नौबत आ पहुंची। वह यही सोच सोच कर परेशान रहने लगा- अगर उसकी और जहांपनाह की पसंद जुदा निकली तो क्या होगा! हो सकता है कि बूढ़े जहांपनाह बूढ़े होते बीरबल की अंतिम परीक्षा ले रहे हो और इसके बाद उसे सदा-सदा के लिए विदा कर दिया जाए। विदा क्या धक्के मार कर दरबार से बाहर कर दिया जाए... बीरबल की आंखों में आंसु आ गए। हाय अल्लाह! इतने सालों की वफादारी का यह ईनाम बख्सा जाएगा!
आंसु तो मेरे भी आने वाले हैं, कारण यह कि मेरे पाठक आप श्रीमान तो शीर्षक देखकर यह विचार कर चुके हैं कि स्वादों में सबसे निराला स्वाद जूतों का ही बताया जाएगा। क्या आप इस बात से सहमत हैं? अब मैं बीरबल बन कर आपसे थोड़ा समय लेकर बात को आगे बढ़ा रहा हूं कि कहीं कोई स्वाद जूतों से बेहतर आपको समझा सकूं। यह तो बेहद सरल था कि मैं बीरबल के श्रीमुख से अकबर को तपाक से उत्तर दिला देता- “जहांपनाह स्वादों में सबसे बेहतरीन स्वाद तो जूते का स्वाद होता है।” यों बात वहीं खत्म हो जाती। हो जाती तो ठीक ही थी, पर नहीं हुई और बिना कुछ किए कराए मुंह में जूते का स्वाद भर गया है। दुनिया में हजारों चीजे हैं जनाब, और जूता भी भला कोई स्वाद में आता है क्या? पर क्या करें सबकी अपनी-अपनी पसंद होती है और ना मालूम बदशाह सलामत की पसंद क्या हो। और खुदा का खौफ नहीं, उनकी पसंद तो बदलती रहती है!
श्रीमान सुनिए, बात यूं है कि यह कोई झूठा किस्सा या बनी बनाई झूठी कहानी नहीं है। बिल्कुल सच्ची घटना है कि एक लेखक अपने आस-पास अनेक लेखकों के चित्रों को अपने आस-पास बिखेर कर उन्हें जूते का स्वाद चखा रहा था- “दुष्टों, साहित्य का तुम सब ने मिलकर बेड़ा गर्क कर दिया है। मैं जब तक इस संसार में पैदा हुआ तुम सब ने मिलकर वह सब कुछ लिख डाला जो-जो मैं लिखने की सोच कर यहां आया था।” आजादी ने हमें बहुत सारी हिम्मत दे दी है। माना कि इस जूता प्रकरण में उसका स्वाद हमारे लेखक मित्रों तक नहीं पहुंच सका। वैसे तो यह मेरी कल्पना ही थी कि जूते का स्वाद बेहतरीन होता है, किंतु अब यकीन हो चला है कि दुनिया में सबसे बेहतरीन स्वाद जूते का ही है। उम्र के साथ उसका स्वाद बदलता जाता है। जूते की ऐड़ी और ऊंची ऐड़ी का स्वाद समान नहीं हो सकता। मित्र और हसीना के जूते का स्वाद तो भैया भिन्न-भिन्न होता ही है। आजकल जमाना बदल गया है किसी को मर्दाना जूते का स्वाद पसंद है, तो किसी को फैशनेबल जनाना जूतियां। अपना ख्याल यहां तो हाई-हील के जूते खाने के लिए दुनिया में ऐसे स्टोर भी खुल रहे हैं जहां ग्राहक बड़ी संख्या में आते हैं और उनकी लाइन लगती है। एक रेस्टोरेंट सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना कि वहां खाने में जूते परोसे जाते हैं। खाने वाले जूता, चॉकलेट से बना है।
जूते का स्वाद ऐसा है कि सब जानते हैं। हो सकता है इसे स्वीकार करने की हिम्मत नहीं हो। कोई जीवन ऐसा नहीं जिसने इसका स्वाद ना जाना हो। किंतु सत्य यह भी है कि इस विषय में पूछे जाने पर हर कोई किन्नी काटता हैं। यह संकोच कैसा…? हमारे भरत जी जूते का स्वाद बखूबी जानते थे इसलिए तो रामजी के खड़ाऊ लेकर अयोध्या वापस लौट आए और खड़ाऊ पूजते रहे। पूरा भक्तिकाल भगवान के श्रीचरणों में बैठ कर कौन से स्वाद को लेकर साहित्य का स्वर्णयुग बन बैठा है। साहब को कभी मेम साहब के जूतों का स्वाद पूछ कर देखिए। ऐसे गोपनीय प्रकरण रसरंजन के बाद श्रीमुख की शोभा होते हैं। यकीन कीजिए जूतमपाक से बेहतरीन स्वाद इस संसार में दूसरा नहीं है और बीरबल को सारे स्वाद जान लेने के बाद यही उत्तर देना पड़ा। अकबर भी यह उत्तर जाकर ना जाने क्यों चुप रहे!
‘म्हारो काळजो’ संग्रै
‘म्हारो काळजो’ री कवितावां मिनखाजूण री अणथक जातरा नै अरथावण-बिड़दावण अर लगोलग बधावण री कवितावां है। कवि आपरै आसै-पासै अर मांयली दुनिया मांय हुय रैया बदळावां कानी ध्यान करण री बात करै। जीवण रो खरो साच सेवट मरण मानीजै पण मरण नै मंगळ मानण वाळी कविता परंपरा मांय अबै पैली दांई रणखेत मांय जुध नीं हुय’र नितूकै अंतस मांय जुध चालै। कवि जूण-खेत मांय बेफिकरी सूं आगै बधण अर भरोसो राखण रो संदेस देवै। कवि बदळतै बगत मांय छूटतै संस्कारां अर मिनखाजूण मांय खूटतै मिनखपणै नै समझण-समझावण अर चेतावण री बात करै।
‘म्हारो काळजो’ री कवितावां जाण्यै-अणजाण्यै साच नै फेर फेर जाणकारी मांय लावण री कवितावां है। ‘कठै सूं चाल/ कठै तांई पूगणो है/ कुण जाणै’ जैड़ी ओळ्यां इण बात री साख भरै। कवि जूण रै हरेक साच रो मन सूं स्वागत करण री बात करै। आं कवितावां री खासियत नवी बुणगट रै साथै कवि री आपरी भासा अर भावां है जिण रै पाण कविता बांचणियां रा मन मोवै।
‘म्हारो काळजो’ री कवितावां मांय युवा कवि री मनगत भेळै प्रौढ हुवतै कवि-मन री चिंतावां ई आपां देख सकां। जूण रा साच सूं ओ काळजो आकळ-बाकळ हुयोड़ो है। अठै अंतस रै लूण नै बचावण री बात भेळी अंतस सूं जुड़ी केई बातां है जिण मांय भासा अर जुबान री खास बात मिलैला। आं कवितावां नै बांचणो आपरै जुगबोध सूं अरू-भरू हुवणो है। आस करां कै कवि भेळै आखो मानखो ई आपरी भासा, साहित्य अर संस्कारां री हेमाणी नै बचावण खातर संभैला। जूण मांय बिसरता मूल्यां नै बचावण री साची अर खरी आफळ खतार कवि नै मोकळी बधाई रै साथै मंगळकामनावां कै कवि री काव्य-जातरा अणथक आगै आगै बधैला।
- डॉ. नीरज दइया
18 दिसंबर, 2021
सुधीर सक्सेना मानवीय चेतना के कवि : तिवाड़ी
हमारे समय के महत्त्वपूर्ण कवि सुधीर सक्सेना मानवीय चेतना के कवि हैं।
उनके मन में जीव मात्र के प्रति प्रेम और करुणा है और वे किसी को दुःखी
नहीं देख सकते। विषम स्थितियाँ उन्हें ईश्वर से प्रश्न करने को विवश करती
रही है। इसी प्रश्नाकुलता में कवि की गहरी मानवीय आस्तिकता को हम देख सकते
हैं। साहित्य अकादमी से पुरस्कृत लब्धप्रतिष्ठ कवि-कथाकार मालचंद तिवाड़ी ने
सुधीर सक्सेना के कविता संग्रह 'ईश्वर : हाँ, नहीं.. तो' पर वरिष्ठ
साहित्यकार बुलाकी शर्मा के सम्पादन में प्रकाशित विमर्श-पुस्तक तथा
सुपरिचित कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया की राजस्थानी अनुवाद पुस्तक का लोकार्पण
करते हुए मुख्य अतिथि के रूप में ये उद्गार व्यक्त किए।
होटल जोशी में
मुक्ति संस्था की ओर से आयोजित इस समारोह में मालचंद तिवाड़ी ने कहा कि
ईश्वर से प्रश्न करती ये कविताएं हिंदी के साथ अन्य भाषा के सुधि पाठकों को
ही नहीं, साहित्य के आलोचकों को भी विमर्श के लिए विवश कर रही हैं। इस
विमर्श पर बुलाकी शर्मा के सम्पादन में पुस्तक का आना और नीरज दइया द्वारा
इसका राजस्थानी में अनुवाद किया जाना इसकी सार्थकता का प्रमाण है।
कवि सुधीर सक्सेना ने कहा कि ईश्वर के अस्तित्व को सकारने के पक्ष में जितने तर्क हो सकते हैं, उससे कहीं अधिक उसे नकारने के पक्ष में भी हो सकते हैं। लेकिन हम तर्क के विपरीत भावनाओं में जीते हैं। सत्य को ईश्वर मानकर ही हम सत्यशोधक और सत्याग्रही हो सकते हैं। ऐसे सत्याग्राही जिसके लिए असत्य, घृणा, वैमनस्य, हिंसा, वैर-विरोध कोई अर्थ नहीं रखते। उन्होंने कहा कि मुझे खुशी है कि मेरी इन कविताओं को समालोचकों ने गम्भीरता से लेते हुए इन पर विमर्श करना आवश्यक माना।
डॉ नीरज दइया ने कहा कि सुधीर सक्सेना के ईश्वर में राम-रहीम, वाहे गुरु, यीशु आदि सबकी उपस्थिति है। कवि के ईश्वर से प्रश्न हमारे अपने प्रश्न हैं जिनसे हम रोजमर्रा के जीवन में रूबरू होते हैं। साकार-निराकार सत्ताओं के बीच कवि उस ईश्वर से हमारा साक्षात कराते हैं, हमारा हमारा है। इन तरह की कविताएं राजस्थानी में कम हैं इसलिए इन्हें राजस्थानी पाठकों तक पहुंचाना मैंने अपना दायित्व माना।
समारोह अध्यक्ष वरिष्ठ कवि-कथाकार नवनीत पांडे ने कहा कि सुधीर सक्सेना यायावर हैं। देश-विदेश में घूमते हुए वे स्वयं को पूरी दुनिया का मानते हैं और उनके सरोकार आम जन से हैं। ईश्वर से सवाल करने वाले सुधीर सक्सेना सत्ता और व्यवस्था से सवाल करने में भी अग्रणी रहे हैं। वे हमारी मरुधरा बीकानेर आते हैं तो यहां की माटी और यहां की तासीर उनसे कविता रचवा लेती है।
साहित्यकार रामप्रकाश जोशी मन्नू, श्रीप्रकाश जोशी, राजेंद्र जोशी समेत कई साहित्यकारों और प्रबुद्धजनों ने अपने विचाररखे। आभार प्रदर्शन वरिष्ठ चित्रकार प्रफुल्ल पळसुलेदेसाई ने किया।
17 दिसंबर, 2021
रजनी छाबड़ा के कविता संग्रह ‘आस की कूंची से’ का लोकार्पण
01 दिसंबर, 2021
श्री जितेंद्र निर्मोही अर श्याम शर्मा जी खातर मोकळी मोकळी बधाई
आदरजोग
श्री जितेंद्र निर्मोही अर श्याम शर्मा जी काल बीकानेर पधारिया तो बां सूं
मानजोग श्री बुलाकी शर्मा, श्री राजेंद्र जोशी अर डॉ. प्रशांत बिस्सा जी
रै भेळप मांय लांबी हथाई रो जोग बण्यो। साहित्यिक चरचा पछै जितेंद्र जी अर
श्यामा जी नै ‘सांवर दइया की चयनित राजस्थानी कविताएं’ अर ‘अंतरंग’ पत्रिका
रो राजस्थानी कहाणी विशेषांक भेंट करियो। यादगार मुलाकात-चरचा, भळै-भळै
निर्मोही जी नै श्री नानूराम संस्कर्ता सम्मान खातर मोकळी मोकळी बधाई अर मंगळकामनावां। 
महत्त्वपूर्ण कवि डॉ. असंगघोष जी का बीकानेर में नेगचार संस्था द्वारा स्वागत-सम्मान....
हिंदी दलित साहित्य के महत्त्वपूर्ण कवि डॉ. असंगघोष का नेगचार संस्था द्वारा सम्मान किया गया। भोपाल से पधारे कवि का सम्मान शॉल ओढाकर एवं पुस्तकें भेंट कर किया गया। लालगढ़ पैलेस में आज आयोजित इस सम्मान कार्यक्रम के अध्यक्ष साहित्यकार बुलाकी शर्मा ने कहा कि असंगघोष कवि के रूप में जाना पहचाना नाम है और इनकी कविताओं में दलित समाज के साथ बदलते भारतीय समाज के सुंदर चित्र देखे जा सकते हैं। यह उल्लेखनीय है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के लंबे सफर में अपनी व्यस्तताओं में भी कविता और कला माध्यमों के लिए उन्होंने अपनी संवेदनाओं को बचाए रखा है।
मुख्य अतिथि कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया कहा कि असंगघोष जी की कविताओं में जिस सहजता-सरलता के साथ मन को छूने वाली संवेदनाओं का वर्णन मिलता है वह दलित कविता धारा में ही नहीं वरन समकालीन कविता में महत्त्वपूर्ण है। आपके कविता संग्रह- खामोश नहीं हूँ मैं, हम गवाही देंगे, मैं दूँगा माकूल जवाब, समय को इतिहास लिखने दो, ईश्वर की मौत, हत्यारे फिर आएँगे आदि की चयनित कविताओं का संचयन-संपादन सुधीर सक्सेना द्वारा किया गया है, जिसे पढ़कर उनको समग्रता में जाना जा सकता है। दइया ने बताया कि असंगघोष का जन्म मध्य प्रदेश के जावद नामक छोटे से कस्बे में दलित परिवार में हुआ था किंतु लंबे संघर्ष के बाद आपने अनेक कीर्तिमान स्थापित किए हैं। दलित साहित्य को साहित्य की मुख्य धारा के रूप में चर्चा में लाने का श्रेय जिन कवियों को दिया जाता है उनमें उनका नाम प्रमुख है।
कॉलेज प्राचार्य एवं प्रकाशक डॉ. प्रशांत बिस्सा ने कहा कि असंगघोष प्रशासनिक सेवा में रहते हुए भी साहित्य के प्रति समर्पित हैं। कवि के साथ साथ वे बेहतरीन फोटोग्राफर और पर्यावरण चिंतक हैं । । पक्षियों के प्रति उनका विशेष मोह है और वे देश के विभिन्न अंचलों में घूमकर उनके संरक्षण के लिए सतत सक्रिय हैं । पक्षी विषयक आपका शोध कार्य जल्द ही प्रकाश में आएगा तो इस क्षेत्र को एक नई दिशा मिलेगी।
मरुनगरी में सम्मानित करने के प्रति आभार प्रदर्शित करते हुए कवि असंगघोष ने कहा कि वे मालवा के निवासी हैं और मालवा और राजस्थानी दोनों भाषाएं बहुत करीब की भाषाएं है । इनमें साझा संस्कृति के साथ विपुल शब्द भंडार की परंपरा है। उन्होंने कहा कि भाषा और संस्कृति के विकास के लिए सरकारों को पर्याप्त ध्यान देना चाहिए। इस अवसर पर उन्होंने अपनी कुछ चुनिंदा कविताओं का भी प्रभावी पाठ किया। श्रीमती असंगघोष ने आभार व्यक्त किया।
06 नवंबर, 2021
भारतीय साहित्य के निरमाता : ऊमरदान लाळस / गजेसिंह राजपुरोहित
डॉ. नीरज दइया
साहित्य अकादेमी द्वारा राजस्थानी कवि ऊमरदान लालस (1854-1903) के जीवन और
साहित्य-यात्रा को लेकर मूल राजस्थानी भाषा में लिखित कवि-आलोचक डॉ.
गजेसिंह राजपुरोहित का विनिबंध प्रकाशित हुआ है। साहित्य अकादेमी की सराहना
इसलिए भी की जानी चाहिए कि एक तो वह बहुत कम कीमत में ऐसे प्रकाशनों को
उपलब्ध कराती रही है और दूसरे भारतीय साहित्य निर्माता सीरीज में प्रकाशित
विनिबंधों का वह भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी प्रकाशित करती है। प्रस्तुत
विनिबंध में विद्वान लेखक डॉ. गजेसिंह राजपुरोहित ने कवि ऊमरदान लालस से
संबंधित ‘ऊमर काव्य’ (संपादक- जगदीशसिंह गहलोत) और ‘ऊमरादान ग्रंथावली’
(संपादक- डॉ. शक्तिदान कविया) को आधार ग्रंथ बनाते हुए अनेक नई अवधारणाओं
और शोध निकषों की सम्यक विवेचना की है।
कृति में राजस्थानी कविता के
अध्येयता और आलोचकों की टिप्पणियों के साथ आधुनिक कविता के विविध आयामों के
साथ उसके आरंभ को स्पष्ट करते हुए कवि ऊमरदान जी का कविता परंपरा-विकास
में स्थान निर्धारित करने का महत्त्वपूर्व कार्य भी किया गया है। यहां यह
भी उल्लेखनीय है कि 1857 से पहले और बाद में सक्रिय विभिन्न कवियों को
क्षेत्रवार विवेचना के साथ उनकी मूल काव्य-प्रवृतियों को भी रेखांकित किया
गया है। कवि ऊमरदान लालस के जीवन परिचय को उपलब्ध साक्ष्यों के साथ
प्रस्तुत करते हुए विद्वान लेखक राजपुरोहित ने कवि की संपूर्ण साहित्यिक
यात्रा की रचनात्मकता के मुख्य बिंदुओं को विभिन्न काव्यांशों को प्रस्तुत
करते हुए विशद ढंग से प्रस्तुत किया है। प्रस्तुत विवेचना में कवि के भाव
पक्ष और केंद्रीय धारा की तलाश करते हुए कला पक्ष का भी एक अध्यय पृथक
प्रस्तुत किया है। प्रस्तुत विनिबंध की एक अन्य रेखांकित किए जाने योग्य
विशेषता कवि ऊमरदान लालल के जीवन प्रसंगों के विभिन्न संस्मरणों का एक अलग
से अध्याय है। इसमें अनेक रोचक प्रसंगों के हवाले पाठक कवि ऊमरदान जी की
अनेक विशेषताओं से रू-ब-रू होते हैं।
आज जब हम हमारे समकालीन
रचनाकारों के विषय में भी पर्याप्त और पूरी जानकारी के अभाव में उनका
मूल्यांकन नहीं कर पाते हैं, ऐसे समय में आधुनिक काल के आरंभिक कवियों अथवा
कहें कि मध्यकाल और आधुनिक काल के संधिकाल के कवियों पर अकादेमी द्वारा
ऐसे प्रयास निसंदेह उल्लेखनीय हैं। भाई डॉ. गजेसिंह राजपुरोहित को बहुत
बहुत बधाई और शुभकामनाएं।
05 नवंबर, 2021
भारतीय साहित्य के निर्माता : श्रीलाल शुक्ल / प्रेम जनमेजय
श्रीलाल शुक्ल जी को भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने के समाचार का शीर्षक “उम्र के इस पड़ाव पर खास रोमांचित नहीं करता पुरस्कार- श्रीलाल” पढ़कर प्रेम जनमेजय जी का मन तत्काल फोन करने का हुआ किंतु वे यह सोचकर रुक गए कि उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है। किंतु वे अधिकर देर नहीं रुक सके और उनसे उनका संवाद हुआ, परिणाम श्रीलाल शुक्ल जी ने रोमांच नहीं होने के विषय में कहा- “ऐसा नहीं प्रेम जी, ऐसे पुरस्कारों से संतोष अवश्य होता है। इस उम्र में अक्सर साहित्यकारों को उपेक्षित कर दिया जाता है। यह पुरस्कार संतोष देता है कि मैं उपेक्षित नहीं हूं।’ यह उनका प्रेमजी से अंतिम संवाद था। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि प्रेम जनमेजय जी ने पूरी ईमानदारी से प्रस्तुत विनिबंध में अनेक स्थलों पर सप्रमाण अपनी बात कहने का प्रयास किया है। पुस्तक का आरंभ ‘आरंभ’ शीर्षक के आलेख से होता है जिसमें एक युवा लेखक का अपने वरिष्ठ रचनाकार के प्रति सम्मान है वहीं विभिन्न कथनों के आलोक में श्रीलाल शुक्ल के लेखक मन की पड़ताल भी है। ‘जीवन यात्र के पदचिह्न’ में जन्म से लेकर निधन तक के पूरे घटनाक्रम में श्रीलाल शुल्क के लेखक के साथ घर-परिवार-समाज के जीवन में उनके दृष्टिकोण के साथ आत्मीयता को भी रेखांकित किया गया है। इस कृति के माध्यम से हम हमारे समय के वरिष्ठ लेखक की जीवन शैली और दिनचर्या के साथ विचारधार और प्रतिबद्धता का भी अंदाजा लगा सकते हैं। इसी अध्याय को अधिक गंभीरता से ‘दृष्टिकोण’ में स्पष्ट किया गया है कि एक लेखक किस प्रकार से अपने साहित्य समाज में किन-किन और कैसे-कैसे संघर्षों के साथ आगे बढ़ता चला जाता है।
श्रीलाल शुक्ल के प्रसिद्ध उपन्यास ‘राग दरवारी’ के पहले उनके रचनाक्रम और संघर्ष को ‘आरंभिक रचना-यात्रा’ आध्याय में रेखांकित किया गया है वहीं ‘राग दरबारी युग का रचना-समय’ में यह सिद्ध करने का उपक्रम है कि किस प्रकार एक रचना अपने पुरस्कार के बाद विचारधाराओं को परिवर्तित कर केंद्र में स्थापित हो जाती है। राग दरबारी का अपना एक युग रहा है और रहेगा, उसका भी विस्तार से विवरण और व्यंग्य-यात्रा के अंक का उल्लेख द्वारा प्रेम जनमेजय जी के हवाले उपन्यास विषयक अनेक नवीन तथ्य और जानकारियां यहां है। विनिबंध में न केवल राग दरबारी वरन श्रीलाल शुक्ल जी के समग्र उपन्यास साहित्य का आंशिक परिचय और रचनाओं की केंद्रीय भावभूमि को स्पष्ट किया गया है। श्रीलाल शुक्ल के कहानी-संग्रहों, व्यंग्य-संग्रहों और अन्य विधाओं में उनके अवदान को विनिबंधकार ने बिंदुवार रेखांकित किया है। ‘उपसंहार’ में पूरी चर्चा को समेकित करते हुए श्रीलाल शुक्ल के भारतीय साहित्य में योगदान के विभिन्न स्तरों को उल्लेखित किया गया है। यहां विशेष बात यह भी कि हम इस कृति के माध्यम से प्रेम जनमेजय जी अपने प्रिय लेखक श्रीलाल शुक्ल के समग्र साहित्य के विशद अध्ययन का आस्वाद कराते हैं। यहां उनके व्यक्तिगत चिंतन, मनन के आलोक में तथ्यों को लेकर स्पष्टता भी प्रभावित करती है। अनेक वरिष्ठ और समकालीन लेखकों के विभिन्न कृतियों और प्रसंगों पर कथनों के माध्यम से हम जिस श्रीलाल शुक्ल लेखक की पहचान करने में सक्षम होते हैं निसंदेह वह पहचान हमारी पूर्ववर्ती पहचान को दृढ़, समृद्ध और परिपक्क्व बनाती है। किसी विनिबंध की सफलता यही होती है कि हम हमारे परिचित रचनाकार को समग्रता में जानने का अवसर प्रदान करे।
- डॉ. नीरज दइया
15 अक्टूबर, 2021
डॉ. हरीश नवल के चश्मे से व्यंग्य को देखना / डॉ. नीरज दइया
आज हिंदी व्यंग्य को जिन गिने-चुने नामों ने पहचान दी है, उनमें एक प्रमुख नाम हरीश नवल का है। पहली पुस्तक पर आपको युवा ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलना ध्यानाकर्षकण का विषय रहा है। किंतु बाद में आपकी सतत साहित्य-साधना में भाषा का सयंमित व्यवहार विशेष उल्लेखनीय उपलब्धि है। सद्य प्रकाशित व्यंग्य कृति ‘गांधी जी का चश्मा’ के माध्यम से व्यंग्यकार हरीश नवल यह प्रमाणित करते हैं कि व्यंग्य में बहुत कम शब्दों में बहुत गहरी-गंभीर बात कही जा सकती है।
शीर्षक व्यंग्य ‘गांधी जा चश्मा’ की बात करें तो आरंभ में लगता है कि गांधी का चश्मा जो 2.55 करोड़ रुपये में हुआ नीलाम और अमरीका के एक व्यक्ति ने खरीदा उसका कहीं कोई संदर्भ होगा। किंतु नहीं यह व्यंग्य विगत सात दशकों से दो अक्टूबर को गांधी जंयती पर होने वाले मेलों पर सधा हुआ व्यंग्य है। इसके शीर्षक और आरंभ को पढ़ते हुए कहानीकार संजीव की कहानी ‘नेता जी का चश्मा’ का स्मरण होता है, जिसमें एक बालक की देशभक्ति को बहुत सकारात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। यहां इस व्यंग्य रचना में अहिंसा नगर में जंयती समारोह आयोजन से पूर्व गांधी जी की मूर्ति जो एक बहुत बड़े शिल्पकार ने बनाई है का चश्मा गायब होने का प्रकरण है। बिना चश्मे के गांधी जी आंखें जैसे उनमें अश्रु भरे हैं, होंठ बहुत सूखे हुए हैं... तिस पर व्यंग्कार का कहना कि ‘गांधी जी के चेहरे पर चश्मे के कारण गांधी जी का पूरा चेहरा कहां दिखता था’ हमारे सारे चश्में उतार देने को पर्याप्त है। आखिर चश्मा गया कहां का रहस्य अंत में स्वयं गांधी जी के श्रीमुख से किया गया है। गांधी जी के पूरा कथन स्वयं में परिपूर्ण व्यंग्य है- ‘सुनो तुमसे ही कह सकता हूं, तुम जैसे मेरे आचरण का अनुकरण करने वाले अब मुट्ठी भर ही रह गए हैं, विगत सात दशकों से देखता आ रहा हूं कि मेरे विचारों की रोज हत्या हो रही है, जबकि मेरी हत्या केवल एक बार ही हुई, सोचता रहा, देखता रहा कि बदलती हुई सफेद, लाल, केसरी आदि टोपियों वालों में कोई तो मेरे सपनों को आरंभ करेगा लेकिन सभी एक से ही आचारण को अपनाते रहे। मेरी सोच धीरे-धीरे मरती रही। अब मुझसे देखा नहीं जाता इसलिए मैंने खुद ही अपना चश्मा उतार कर नष्ट कर दिया।’
हरीश नवल का मानना है कि व्यंग्य की चोट दुशाले में लपेट कर मारे गए जूते जैसी होनी चाहिए। वह सीधा सपाट व्यंग्य प्रस्तुत नहीं करते, वरन कुछ पेच और घुमाव उनकी प्रवृत्ति है। स्वयं को बिना मुखर किए जब व्यंग्यकार कभी बहुत गहन-गंभीर बात प्रस्तुत करता है तो जाहिर है वह पाठकों से एक ज्ञान-स्तर की भी मांग और उम्मीद करता है। ऐसी अपेक्षा के पूरित नहीं होने पर पाठक थम जाता है और सोचने लगता है कि क्या कह दिया गया है... यह सोचने अथवा अवकाश देना हिंदी व्यंग्य में विरल है। हरीश नवल ने वर्षों अध्यापन का कार्य किया और वे साहित्य के विधिवत अध्येयता रहे हैं, अतः उनकी अनेक रचनाओं में साहित्य-इतिहास और परंपरा को बहुत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
‘बिल्लो रानी और ईश वंदना’ में फिल्मी गीतों के माध्यम से भावक के भावों के बदले जाने का और जहां चाह वहां राहा कि उक्ति का विस्तार है। जहां जो नहीं है वहां वह जो मनवांछित है को ढूंढ़ लेने की प्रवृति को यहां अतिरेक के साथ प्रस्तुत करते हुए हरीश नवल पाठकों को हास्य के द्वार तक ले जाते हैं, किंतु कोई खुल कर या खिलखिला कर हंसे उससे पहले ही व्यंग्य की मार से वह तिलमिलाहट से भर देते हैं। कहना होगा कि हरीश नवल के व्यंग्यकार में उनका कहानीकार अधिक मुखर होता है, तब वे अपेक्षाकृत अधिक प्रभावशाली व्यंग्य देते हैं। ‘उफ़ भईया जी चोट’, ‘जन विकास यात्रा’, ‘देश की मिट्टी और नाराद जी’ अथवा ‘प्रिय राजेन्द्र जी’ जैसे व्यंग्य इसके उदाहरण है। देश में नेताओं की मोनोपोली, धन का अपव्यय, व्यवस्था की खामिया और आधुनिक समय-समाज में घर करती संवेदनहीनता को प्रस्तुत करते हुए हरीश नवल के व्यंग्य यदि अपने पाठक में संवेदना जाग्रत करते हैं तो यह बड़ी सफलता है। आधुनिक युग में वैसे तो पाठक सर्वज्ञान है और सब कुछ जानता है, जो जानता हो उसको कुछ बताना बेहद मुश्किल काम है फिर भी व्यंग्यकार उसके जानने को बढ़ाते हुए जैसे द्विगुणित करने का मुश्किल काम बड़ी सरलता से करने का हुनर रखते हैं।
‘निदान नींद का’ की बात करें जो मूलतः लघुकथा के रूप में है और बड़ा मारक व्यंग्य यहां सांकेतिक है। राजा आदंदारित्य का नियम था कि वह प्रातः महामंत्री के साथ नगर का विहंगम दृश्य देखते और जहां से धुआं उठता दिखाई नहीं देता तो महामंत्री को पता करने का आदेश देता कि उस घर में अंगीठी क्यों नहीं जली। वह उसकी व्यवस्था करने का आदेश भी देते और महामंत्री इस नियम से दुखी क्योंकि वे प्रातः की नींद में कोई बाधा नहीं चाहते थे। महामंत्री ने अपने मित्र राज-वैज्ञानिक तारादत्त से निदान के रूप में धुएं रहित अंगीठी का अविष्कार करवा पर्यावरण की शुद्धता की दुहाई देते हुए राजाज्ञा प्राप्त कर वैसी अंगीठी हर घर में पहुंचा दी और अब राजा को कहां भोजन बना और कहां नहीं इसका भेद नहीं मिल पाता था। प्रतीक के माध्यम से व्यवस्था पर सुंदर कटाक्ष किया गया है, किंतु अब ऐसे राजा नहीं रहे और महामंत्री ही राजा बन गए हैं- जो जागते हुए भी गहरी नींद में ही रहते हैं। ऐसी अनेक छोटी और मध्यम आकार की रचनाओं को पढ़ते हुए अभिभूत हुआ जा सकता है, यह प्रभाव कृति और कृतिकार की विशेषता है।
शब्दों के श्लेष और वक्रोकी के अतिरिक्त भाषा-व्यंजना के माध्यम से हरीश नवल हमारे समक्ष ऐसे व्यंग्य को प्रस्तुत करते हैं जो दूसरों से अलग और अपने अंदाज के कारण प्रभावशाली है। वैसे इस पुस्तक की यह विशेषता है कि व्यंग्य भले आकार में छोटा अथवा बड़ा हो, वह निबंध, कथा अथवा लघुकथा के रूप में हो किंतु वह सदैव अपने शिल्प, भाषा के साधा हुआ है, यहां नए विषयों की तलाश के कारण व्यंग्य प्रभावशाली है। पुस्तक के अंत में हरीश नवल के व्यंग्य अवदान को रेखांकित करता पंद्रह पृष्ठों का एक आलेख ‘व्यंग्य कमल : हरीश नवल’ बिना लेखक के नाम के दिया गया है। लेखक प्रकाशक किसी की भी भूल रही हो पर गूगल बाबा नहीं भूलते और उनके द्वारा पता चल सकता है कि यह आलेख डॉ. आरती स्मित द्वारा लिखा गया, जो ‘सेतु’ में वर्ष 2017 में प्रकाशित हुआ है। इस आलेख के अंतिम अनुच्छेदों को हटा कर पुस्तक के अंत में गांधी बाबा को चित्र में मुस्कुराते हुए दिखाया गया है। इस कृति के माध्यम से डॉ. हरीश नवल के चश्मे से समकालीन व्यंग्य को देखना बेहद सुखद है।
------------------------
पुस्तक का नाम : गांधी जी का चश्मा ; लेखक : हरीश नवल
विधा – व्यंग्य ; संस्करण – 2021 ; पृष्ठ संख्या – 132 ; मूल्य – 200/- रुपए
प्रकाशक – किताबगंज प्रकाशन, सवाई माधोपुर
-----------------------
डॉ. नीरज दइया













