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18 मार्च, 2018

मेरे लिए हर रचना अपनी ही तलाश है : डॉ. नीरज दइया

डॉ.नीरज दइया से डॉ. मदन गोपाल लढ़ा की बातचीत
(मेरे लिए हर नयी रचना स्वयं की तलाश है, यह कहते हैं, कवि, आलोचक, व्यंग्यकार, अनुवादक और संपादक के रूप में राजस्थानी और हिंदी साहित्य में जाने माने नाम डॉ. नीरज दइया। आपने “निर्मल वर्मा के कथा साहित्य में आधुनिकता बोध” विषय पर शोध किया है। आपकी दो दर्जन से अधिक पुस्तकें राजस्थानी और हिंदी में प्रकाशित हुई है। डॉ. दइया को साहित्य अकादेमी नई दिल्ली द्वारा राजस्थानी भाषा मुख्य पुरस्कार एवं बाल साहित्य पुरस्कार के अतिरिक्त राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं सस्कृति अकादेमी, बीकानेर के अनुवाद पुरस्कार सहित अनेक पुरस्कारों मान-सम्मानों से नवाजा जा चुका है। डॉ. दइया से डॉ. मदन गोपाल लढ़ा की बातचीत के प्रमुख अंश यहां प्रस्तुत हैं)

'बिना हासलपाई' पर साहित्य अकादमी पुरस्कार (राजस्थानी) की घोषणा से कैसा अनुभव कर रहे हैं?

पुरस्कार किसे अच्छा नहीं लगता, जाहिर है मुझे भी अच्छा लगा किंतु बहुत आश्चर्य हुआ कि गत वर्ष कहानीकार बुलाकी शर्मा और उनसे पूर्व उपन्यासकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ को यह पुरस्कार मिला था। संयोग से दोनों कथाकार बीकानेर के हैं। इस बार बीकानेर में यह तीसरा पुरस्कार प्रमाणित करता है कि अकादेमी और निर्णायकों के मूल्यांनक में पुस्तक ही सर्वोपरि होती है। लेखक के लिए कोई भी पुरस्कार सामाजिक प्रतिष्ठा के अतिरिक्त कुछ महत्त्व नहीं रखता है। बतौर लेखक यह पुरस्कार मेरे लिए नई जिम्मेदारियां लाया है।
राजस्थानी के समकालीन परिदृश्य को किस रूप में देखते हैं?
‘बिना हासलपाई’ आधुनिक राजस्थानी कहानी पर केंद्रित पुस्तक है। भारतीय कहानी अथवा साहित्य का चेहरा हिंदी के साथ प्रादेशिक भाषाओं से निर्मित होता है। राजस्थानी भाषा के समकालीन साहित्य को हिंदी और अन्य भाषाओं के साहित्य से कदम मिलाकर चलने के साथ ही उसका लौकिक स्वरूप और माटी की सौंधी महक को भी संजोए रखना चाहिए।
हिंदी व राजस्थानी दोनों भाषाओं में कई विधाओं को एक साथ कैसे साध पाते हैं?
मेरे लिए जीना और लिखना पर्याय है। वैसे लेखन के संस्कार मुझे मेरे दिवंगत लेखक पिता सांवर दइया से मिले हैं। मैं केवल लिखने के नहीं लिखता हूं, मेरा मानना है कि मेरे भीतर एक बेचैन लेखक रहता है। वही मुझे लेखन के लिए बाध्य करता है। उसे प्रतिदिन लिखने के लिए अवकाश देना मेरी नियति है। राजभाषा हिंदी व मातृभाषा राजस्थानी दोनों भाषाओं में लिखने को मैं देशभक्ति और मातृभक्ति से रूप में देखता हूं। शरीर को हिंदी और आत्मा को राजस्थानी पोषित करती है। विधाओं का चयन परिस्थितियां और सम-सापेक्ष है।
कभी ऐसा लगा कि आलोचना की राह में बहुत कांटे हैं?
बिल्कुल, ऐसे कांटें हैं जिन को चाह कर भी कोई बुहार नहीं सकता है। किसी रचना अथवा रचनाकार की आलोचना एक अंगुली से संकेत करने जैसा है। जब हम किसी दिशा में एक अंगुली करते है तो तीन अंगुलियां हमारी तरफ स्वतः मुड़ जाती है। खुद से मैं तीन सवाल करने के बाद ही प्रतिपक्ष से सवाल किए जाने के पक्ष में हूं। आलोचन में अनेकानेक सवालों से मुठभेड़ होती है। कृति और कृतिकार की दिशा से मैं चीजों को देखने-समझने का प्रयास करता हूं। किसी रचना के प्रति पूर्वधारणाओं की बजाए नए आयुधों की तलाश में रहता हूं। परंपरा और आधुनिक विकास-यात्रा में रचना के मर्म को जानना-समझना और मूल्यांकन करना हमारे पाठ के आनंद को छिन्न-भिन्न कर देता है। इसलिए सच्ची, खरी और बेलाग आलोचना तो सदा हमारे पाठक ही किया करते हैं।
आपने अनुवाद के क्षेत्र में खूब काम किया है। अनुवाद के लिए रचना का चयन कैसे करते हैं?
अनुवाद को मैं अनुसृजन मानता हूं। किन्हीं दो भाषाओं के बीच पुल बनाने का काम अनुवाद से संभव होता है। अमृता प्रीतम, निर्मल वर्मा, भोलाभाई पटेल, नंदकिशोर आचार्य, सुधीर सक्सेना जैसे अनेक रचनाकारों से भारतीय साहित्य का चेहरा बनता है। इनको अपनी भाषा में लाकर मैंने भाषा के सामर्थ्य को प्रमाणित करने का प्रयास किया है। अनुवाद का चयन रचना और रचनाकार की गुणवत्ता से स्वयं प्रभावित होकर करता हूं। भारतीय कविता की एक झांकी देखने दिखाने के लिए ‘सबद-नाद’ में लगभग सभी भारतीय भाषाओं की कविताएं राजस्थानी में देख सकते हैं।
अन्य भाषाओं से राजस्थानी में हुए अनुवाद की तुलना में राजस्थानी से अन्य भाषाओं में अनुवाद बहुत कम हुए हैं?
राजस्थानी भाषा की रचनाओं को अधिक मात्रा में हमें हिंदी और अंग्रेजी में लाना होगा। माध्यम भाषा से फिर आगे अनुवाद होने संभव हो सकेंगे। मोहन आलोक की काव्य-कृति ‘ग-गीत’ का मेरा हिंदी अनुवाद साहित्य अकादेमी से प्रकाशित हुआ है। अब मधु आचार्य ‘आशावादी’ के उपन्यास ‘गवाड़’ का हिंदी अनुवाद आने वाला है।
खुद को मूल रूप से क्या मानते हैं- कवि, आलोचक, बाल साहित्यकार, व्यंग्यकार, अनुवादक या संपादक?
मैं मूल रूप से तो इन सब का एक आवास-स्थल हूं। मेरे भीतर का लेखक ही हर बार यह चयनित करता है कि वह क्या करने वाला है। मैं लेखक के रूप में लिखने की कोई मशीन नहीं हूं, रचना के समय ही सब कुछ निर्धारित होता है। बादल आते हैं तब यह कहां तय होता है कि वे बरसने वाले हैं। कभी कभी किसी विधा का एक दौर चलता है जैसे बरसात की झड़ी लगती है।
आपकी वैचारिक प्रतिबद्धता क्या है?
मैं अपने भीतर के लेखक को कभी दायरों में कैद करने के पक्ष में नहीं हूं। कुछ मित्र मेरे लेखन के आधार पर मुझे वाद अथवा धाराओं में बांधते हैं और मैं उनकी घोषणाओं पर सहमति प्रकट करता हूं किंतु मैं हमेशा के लिए यहीं स्थिर रहूंगा यह वादा नहीं कर सकता। मेरी आस्था विचार के स्तर पर सही के पक्ष में खड़ा रहने की मेरी आस्था है और रहेगी।
आप किन लेखकों से प्रभावित हुए?
मेरा सौभाग्य यह रहा कि मैं लेखक सांवर दइया के घर जन्मा और मेरे अनेक गुरुजन साहित्य-लेखन से जुड़े थे। दिखावा नहीं करता कि फलां-फलां को पढ़ा और प्रभावित हुआ। अनेक देशी-विदेशी लेखकों से सीखने का प्रयास किया है। जब भी कोई नई रचना लिखता हूं तो मेरा पूर्व अध्ययन अथवा लेखन-कौशल काम नहीं आता। मैं हर बार खुद को खाली हाथ पाता हूं और अनुभूति के महासागर से रचना में कुछ नया लेकर लौटने का प्रयास करता हूं। मेरे लिए रचना स्वयं की तलाश है। मैं प्रयास करूंगा कि अपने लेखन की योजनाओं को फलीभूत कर सकूं।
राजस्थानी की संवैधानिक मान्यता से क्या हिंदी कमजोर हो जाएगी?
यह कुछ मूढ़ों ने भ्रम फैलाया है कि हिंदी कमजोर हो जाएगी। आदिकाल से हिंदी को राजस्थानी पोषित करती रही है। पृथ्वीराज रासो से मीरा तक की यात्रा के बाद आधुनिक काल में तो हिंदी के हित में राजस्थानी ने अपना बलिदान दिया। राजस्थानी की संवैधानिक मान्यता से हिंदी उऋण ही होगी।
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29 जनवरी, 2018

आलोचना में अपना-पराया सब व्यर्थ की बातें हैं : डॉ. दइया

साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत राजस्थानी कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया से संवाद ० नवनीत पाण्डे
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• आपको साहित्य अकादेमी के सर्वोच्च सम्मान के साथ-साथ पिछले साल मिले दर्जन भर पुरस्कारों, वे भी इतनी कम उम्र में, आपको बहुत- बहुत बधाई! इतने पुरस्कार-सम्मान कैसे मिल गए?
• पता नहीं। प्रत्येक पुरस्कार की अपनी एक प्रक्रिया होती है। साहित्य अकादेमी में तो पुरस्कारों के लिए आवेदन भी मांगे नहीं जाते हैं। उनकी एक गोपनीय प्रक्रिया है। कभी-कभार प्रकाशक सूचना दे देते हैं कि किस किस किताब को साहित्य अकादेमी ने खरीदा है। इससे एक संभावना बनती है कि पुरस्कार के अंतिम दौर में कौन-सी किताबें पहुंची है। अनेक किताबों के बीच से किसी एक किताब को चयनित करना सरल काम नहीं है। यह निर्णायकों का सामूहिक निर्णय होता है। ऐसे में जिसका चयन होता है उसे लगता है कि निर्णय ठीक हुआ है, और जो वंचित रह जाते हैं उनको लगता है यह गलत हो गया। मेरा मानना है कि अगर कोई ढंग का लिखता है तो उसे पुरस्कार मिलेगा, हां कभी देर हो सकती है पर यहां अंधेर नहीं है। उम्र के आधे मुकाम पर मैं पहुंच चुका हूं और आपको 50 की उम्र कम लगती है... खैर आपकी बधाई के लिए आभारी हूं।
• आप के लेखन को देख कर आप ही की तरह बहुमुखी विलक्षण प्रतिभा असमय हमें छोड़ गए आपके पिता कवि-कथाकार सांवर दइया याद आते हैं, उन्हें 35 वर्ष की उम्र में साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला, उनके बाद आपको अब 50 की उम्र में... कैसा लग रहा है?
• कोई भी बेटा कभी अपने बाप की बराबरी नहीं कर सकता है। कम से कम किसी एक जीवन में तो हर्गिज नहीं। अपने पिता सांवर दइया जितना बड़ा लेखक मैं नहीं हूं। वे असाधारण प्रतिभा के धनी थे और यह उनका आशीर्वाद है कि मैं लेखन के क्षेत्र में कुछ करने का प्रयास करता हूं। वे 44 वर्ष ही लेकर आए पर वह उनके जाने की उम्र नहीं थी। वे होते तो आज तुम से सवाल करते कि नवनीत तुम्हें भी तो पुरस्कार मिले हैं फिर तुम पुरस्कारों के खिलाफ क्यों हो?
• मैं पुरस्कारों के खिलाफ नहीं हूँ, अगर कोई लेखक ईमानदारी से काम करता है, उसे स्वीकृति-सराहना, सम्मान मिलना चाहिए लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि आज पुरस्कारों-सम्मानों की गरिमा को ठेस पहुंचायी जा रही है।
• हम जिस दौर में पहुंच चुके हैं उसमें शब्द अपने अर्थ खोते चले जा रहे हैं या कहें कि शब्द खोखले, बेजान और अर्थहीन हो चुके हैं। ऐसे में हमें उनकी गरिमा के कार्य करना है। मैं मानता हूं कि साहित्य और समाज का दायित्व आज पहले से अधिक हो गया है। पुरस्कारों-सम्मानों की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले कुछ स्वार्थी किस्म के लोग हमारे बीच हैं, जो अपने लाभ के लिए ऐसा कुछ करते हैं कि पूरे साहित्य-समाज की प्रतिष्ठा दांव पर लग जाती है। किंतु पुरस्कार और सम्मान की गरिमा बनी रहनी चाहिए।
• पुरस्कारों के लिए मारामारी, लॉबिंग करना हद दर्जे तक घटियापन पर उतर आना भी तो होता है?
• आज हमारे चारों तरफ बाजार का बोलबाला है। हम सब नए बाजारीकरण के दौर में हैं। ऐसे में सभी तरह के रंग रूप यहां देखने को मिलते हैं तो हमें इसे सहजता से स्वीकारना चाहिए। पुरस्कार किसी की श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं है। यह महज एक बार समाज का ध्यान खींचता है। इसे सामाजिक स्वीकृति कह सकते हैं। साहित्य का इतिहास गवाह है कि वह पुरस्कार को एक ब्यौरे की भांति दर्ज करता है जब कि रचनाओं का उसमें विधिवत उल्लेख होता है। चर्चा किसी पुरस्कार की बजाय रचना पर होनी चाहिए।
• साहित्य अकादेमी राजस्थानी पुरस्कारों के इतिहास में राजस्थानी की बात करें तो डॉ कुंदन माली के बाद केवल आपने आलोचना में यह पुरस्कार पाया है। डॉ. माली पुरस्कार मिलने के बाद से लेखन से नदारद हैं, तो क्या अब आप भी...?
• ऐसा नहीं है। डॉ. कुंदन माली लिखते रहे हैं और मैं भी इस पुरस्कार के बाद लिखता रहूंगा। कोई पुरस्कार किसी लेखक की मंजिल नहीं होता है। हम जो कुछ कहते हैं हमारी जानकारी के आधार पर कहते हैं और उसमें सदैव संभवानाओं को बनाए रखना चाहिए।
• पुरस्कारों के सिलसिले में यह देखा गया है कि पुरस्कार का अभिप्राय लेखक की संभावनाओं का अंत। ऐसा क्यों हो रहा है?
• पुरस्कार तो संभावनाओं का सम्मान है उसे अंत नहीं मानना चाहिए। आपके संकेत कुछ मामलों में सही भी हैं किंतु कुछ अपवाद रूप छोड़ दें तो पाएंगे कि सम्मान और पुरस्कार ने नई ऊर्जा का संचार किया है। वैसे संभावनाओं के अंत पर भी अनेक संभावनाएं शेष होती है। साहित्य में अंत जैसा कुछ नहीं होता, वह तो स्वयं अनंत है।
• राजस्थानी में आपने पुरस्कारों और लेखक का एक रिकार्ड बनाया है। पुरस्कारों के बारे में अक्सर आरोप लगते हैं कि इनके देने-लेने के पीछे साहित्येत्तर कारण होते हैं। वास्तव में ऐसा होता है?
• आपके सवाल में ही जबाब छिपा है। पुरस्कारों के देने लेने में यदि साहित्येत्तर कारण होते भी होंगे तो क्या हर बार यह संभव होता होगा। अगर हर बार यह संभव नहीं होता तो फिर पुरस्कारों और लेखन का रिकार्ड कैसे बन सकता है? आरोप हमेशा लगने के होते हैं और सच्चाई किसी आरोप की परवाह नहीं करती। अगर कोई किसी पर आरोप लगता है और आरोप सच्चा है तो उसे साबित किया जाना चाहिए। लेखक का काम ही सच्चाई को सामने लाने का होता है।
• क्या आपको इस बार साहित्य अकादेमी से इस निर्णय की उम्मीद थी?
• एकदम नहीं थी। इस वर्ष के लिए तो बिल्कुल नहीं थी। मैंने इस विषय में सोचा भी नहीं था। जब यह सूचना मिली तो मुझे आश्चर्य हुआ और खुशी भी हुई।
• अकादेमी इतिहास में क्षेत्रीय भाषा में शायद यह पहला ही उदाहरण है कि एक शहर में लगातार तीन वर्षों से पुरस्कार आ रहे हैं, सवाल उठने, उठाने स्वाभाविक हैं, आप क्या कहते हैं?
• लगातार चार वर्ष और पांच वर्ष भी हो सकते हैं। क्यों कि साहित्य अकादेमी यह पुरस्कार किसी शहर को नहीं देती है। मैं नहीं जानता कि आपको पता है या नहीं, पर साहित्य अकादेमी केवल किताब और लेखक के नाम के साथ अपना सर्वेक्षण करती है। एक शहर का यह संयोग बना है कि मधु आचार्य ‘आशावादी’, बुलाकी शर्मा और नीरज दइया बीकानेर में रहते हैं।
• राजस्थानी में बीकानेर और जोधपुर संभाग में अधिक लेखन हो रहा है, प्रांत के बाकी हिस्सों में बहुत कम... ऐसा क्यों है?
• राजस्थानी में अधिक से अधिक लेखन की आवश्यकता है और राजस्थान के प्रत्येक शहर में लेखन हो रहा है। आज सूचना तंत्र और मीडिया के विकास के कारण छोटे छोटे गांवों-कस्बों से लेखक आ रहे हैं। तुलनात्मक रूप से बीकानेर-जोधपुर संभाग आगे हो सकते हैं किंतु वह दिन दूर नहीं जब अन्य संभागों के लेखक भी अधिक सक्रिय होंगे।
• आलोचना की अक्सर निंदा होती है, आलोचकों को प्रतिष्ठा और पुरस्कार कम मिलते हैं। ऐसा क्यों?
• आलोचना सहन करने की क्षमता लेखकों में नहीं है। इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि आलोचकों में भी भय रहता है कि संबंध खराब हो जाएंगे। आलोचक और लेखक सभी सामाजिक प्राणी ही तो है। समाज में अपना-पराया सब होता है। द्वंद्व यह है कि आलोचना में अपना-पराया सब व्यर्थ की बातें हैं। ऐसे में आलोचना की निंदा होना स्वभाविक है।
• आपकी आलोचना में आलोच्य लेखकों और कृतियों के चयन को लेकर कुछ लेखकों की असहमति रही है और सवाल उठाए गए हैं, इसका क्या कारण है?
• सहमति और असहमति एक ही सिक्के के दो पक्ष है। आलोचना में ऐसा होना भी चाहिए अन्यथा सब ठीक है तो फिर आलोचना होगी किस की। साहित्य में प्रत्येक आलोचक अपने दृष्टिकोण से सही कार्य करने का प्रयास करता है। हरेक का अपना नजरिया होता है। कोई भी चयन कभी भी निरपेक्ष हो नहीं सकता है। मैं आप से ही कहता हूं कि अगर आप मुझे कोई चयन देंगे तो क्या उस पर सभी की सहमति संभव है क्या? आरोप लगाने से पहले हमें यह सब सोचना-विचारना चाहिए। हवा में बातें कहने वाले बहुत मिलते हैं पर आलोचना में जमीन पर खड़े होकर यर्थाथ को देखना होता है।
• आलोचना के लिए आप किस आधार पर लेखक अथवा कृति का चयन करते हैं?
• आरंभ में तो मैंने संपादकों और मित्रों के आग्रह पर आलोचनात्मक आलेख लिखे जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। एक लंबी यात्रा से कुछ आलेखों का चयन मेरी किताब ‘आलोचना रै आंगणै’ में आप देख सकते हैं। ‘बिना हासलपाई’ के लिए कार्य करते हुए आदरणीय नंद भारद्वाज से लंबा संवाद रहा और इस किताब की रूपरेखा पहली से भिन्न बनी। राजस्थानी में आधुनिक कहानी को लेकर अनेक अंतर्विरोध और द्वंद्व की स्थितियां रही है। इस यात्रा में अनेक कहानीकारों का समायानुकूल सम्यक मूल्यांकन भी नहीं हुआ। ऐसे में यह प्रयास किया गया कि कहानी विधा पर एक विविध आयामों को लेकर बात हो, जिसका परिणाम आप देख रहे हैं। मैं किसी लेखक अथवा कृति के प्रति कोई पूर्वाग्रह लेकर नहीं चलता हूं, ‘आंगळी-सीध’ कृति में आप पाएंगे कि राजस्थानी उपन्यास की समग्र यात्रा को देखने-दिखाने और समझने का मेरा प्रयास है। इस से आप या अन्य कोई कितना सहमत अथवा असहमत होता है यह उसकी अपनी स्वतंत्रता है।
• आपने ‘नेगचार’ पत्रिका निकाली और वह खूब चर्चित हुई, फिर अकादमी की मासिक पत्रिका ‘जागती जोत’ का भी संपादन किया। राजस्थानी में अब भी पत्रिकाएं कम है ऐसे में ‘नेगचार’ को फिर से आरंभ क्यों नहीं करते?
• पत्रिका निकालना अथवा संपादन का कार्य करना बहुत कठिन है। ‘नेगचार’ के संपादन की अपनी परिस्थितियां थीं। संपादन और सक्रिय लेखन दो भिन्न-भिन्न कार्य-क्षेत्र है। जो दोनों को साधते हैं वे निसंदेह महान हैं। क्योंकि इन दोनों में बहुत समय की आवश्यकता होती है। दिन-रात एक करना पड़ता है। किसी भी संपादक का महत्त्व किसी लेखक से कम नहीं आंका जाना चाहिए। संपादक यदि संपादन के नाम पर केवल प्राप्त रचनाओं को एकत्रित कर पत्रिका प्रकाशित कराएं तो मैं इसे अनुचित मानता हूं। संपादक में एक दृष्टि की अनिवार्यता होती है। उसे अनेक बार बहुत चयन और आग्रह करने होते हैं। संपादक ही दूरदर्शी होता है जो भविष्य के साहित्य का निर्माण को दिशा देता है। उदाहरण के लिए संपादक तय करता है कि किस कृति की समीक्षा होनी है और किस से होनी है। राजस्थानी की बात करें तो भाषागत अनेक समस्याओं और समरूपता के लिए विवेकवान संपादकों से उम्मीद है।
• आपने अनुवाद के क्षेत्र में भी बहुत काम किया है। किसी कृति अथवा रचना को अनुवाद के लिए चयन करने का क्या आधार रहता है?
• चयन का आधार मेरी आलोचनात्मक दृष्टि ही कही जा सकती है। हमारी यह अभिलाषा है कि अनुवाद के क्षेत्र में सभी भारतीय भाषाओं का आस्वाद राजस्थानी में आए। समकालीन भारतीय साहित्य की चर्चा हम ऐसे अनेक कार्यों को देखते हुए ही कर सकते हैं। अनुवाद से ही राजस्थानी की साहित्यिक महानता को हम भारतीय साहित्य में सिद्ध कर सकेंगे। अमृता प्रीतम, निर्मल वर्मा, भोलाभाई पटेल, मोहन आलोक, नंदकिशोर आचार्य, सुधीर सक्सेना आदि अनेक ऐसे नाम हैं जिन्होंने अपने अपने क्षेत्र में अद्वितीय कार्य किया है। मैंने साहित्य अकादेमी के लिए भी अनुवाद किए हैं किंतु मैं किसी रचना का अनुवाद के लिए अनुवाद करने की तुलना में अपने तर्कों और इच्छा के आधार पर रचना लेता हूं। तकनीकी अनुवाद के पक्ष में मैं अनुवाद की मशीन नहीं बनता हूं।
• मैं तुम्हारी रचना का अनुवाद करता हूं तुम मेरी करो, क्या अनुवाद में यह टेक एंड गिव का सिद्धांत काम करता है?
• आप खुद अनुवाद करते हैं और सब स्थितियों से परिचित हैं। इसमें कितना सच है और कितना झूठ यह किसी से छिपा नहीं है। मैं इसे भाषा के लिए हितकर भी मानता हूं कि ऐसे में कुछ आदान-प्रदान ही होता है। अगर दो लेखकों में ऐसा अनुवंध होता है तो यकीन कीजिए कि कुछ काम ही सामने आता है। आपके इस टेक एंड गिव को एक साहित्यिक अनुष्ठान समझा जाना चाहिए जहां दो रचनाकार अपनी अपनी भाषा के लिए कुछ रचनात्मक काम ही करते हैं। परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूप से ऐसे सभी कार्य भाषा की क्षमता को और लेखकों की सक्रियता को बढ़ाते हैं।
• पढ़ने-लिखने की बजाय लेखक पुरस्कार बटोरने का जुगाड़ करते दिखायी देते हैं, वे भाषा की मान्यता के लिए भी खुल कर आगे क्यों नहीं आते हैं?
• बहुत से लेखकों का मत है कि सभी पुरस्कार बंद हो जाने चाहिए। पुरस्कार विजेता ही ऐसी घोषणाएं करते हैं। जिन्हें पुरस्कार कभी नहीं मिला उन से पूछेंगे तो पुरस्कार का महत्त्व समझ में आएगा। पुरस्कार बटोरने का जुगाड़ करने वाले किसी एक पुरस्कार के लिए अपना जुगाड़ कितनी बार करेंगे, बाद में वह बिना जुगाड़ वालों को मिलने हैं। साहित्य के क्षेत्र में और खासकर राजस्थानी अथवा हिंदी के क्षेत्र में लेखन से किसी लेखक ने आज तक अपने लिए महल नहीं बनाएं है। साहित्य थेंकलेस जोब है। बहुत बार मैं खुद से सवला करता हूं कि मैं क्यों लिखता हूं, मैं लिखता हूं कि बिना लिखे रह नहीं सकता हूं। अनेक लेखक भाषा के लिए खुल कर आगे आएं हैं, आप क्या चाहते हैं? भाषा मान्यता के लिए शर्म बेचकर नंगे हो जाएं! भाषा मान्यता का मुद्दा केवल हम लेखकों का नहीं राजस्थान के आम नागरिक का भी है।
• हमारे प्रदेश के आम नागरिकों में भी राजस्थानी भाषा-साहित्य और संस्कृति के प्रति क्या अनुराग दिखाई देता है?
• अनुराग है और उसी अनुराग को बनाए रखने लिए हम सभी सक्रिय हैं। आप गांव-गांव ढाणी-ढाणी जा कर देख सकते हैं कि लोगों को अपनी भाषा से अथाह प्यार है। राजस्थानी उनके लिए जीवन का सवाल है। बहुत से लोगों को तो हिंदी-अंग्रेजी आती ही नहीं। ऐसे में राजस्थान के जन जन से यह हनुमान जी की भांति अपेक्षा करना कि अपना हृदय चीर कर दिखाए कि भाषाई अनुराग है मेरी दृष्टि में बेमानी है। राजस्थान सरकार ने केंद्र को व्यापक समर्थक से प्रस्ताव भेज रखा है और आशा है केंद्र सरकार द्वारा जल्दी ही स्वीकृति मिल जाएगी।
• राजस्थान में रोजगार की भाषा हिंदी है फिर राजस्थानी में लिखना-पढ़ना जरूरी क्यों मानते हैं?
• आप और हम आने मां-बाप और पूर्वजों को क्यों याद करते हैं? मेरी कविता में मैंने लिखा है- राजस्थानी म्हारी रगत रळियोड़ी भाषा है। जो भाषा मेरे रक्त में घुली हुई है। जिस भाषा को मैं अपने भीतर दौड़ता हूं पाता हूं और जिससे होने से ही मुझे लगता है मेरा होना है। उसके लिए आप ऐसा सवाल करते हैं तो मुझे यह ठीक नहीं लगता है। हिंदी से मेरा शरीर बेशक पोषित होता है किंतु मेरी आत्मा का पोषण करने वाली मेरी मातृभाषा मेरा स्वाभिमान है। राजस्थानी को हम सभी ने आत्मिक रूप से स्वीकार किया है और हिंदी में जो भी काम-काज करते हैं अथवा किया है उसमें घुलने में हमें बहुत समय लगा है। बहुत बार अनेक राजस्थानी शब्दों के हिंदी पर्याय ही नहीं मिलते थे। आप राजस्थान के आम आदमी की हिंदी देखेंगे तो उसमें राजस्थानी का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देगा। प्राथमिक स्तर के स्कूल में जा कर देखें कि भाषा की समस्या से हमारे शिक्षक कैसे जूझ रहे हैं। आप या कोई भी सत्ता सरकर बालकों के मन की भाषा को मसोस नहीं सकते हैं।
• कुछ का कहना है कि राजस्थानी कोई स्वतंत्र भाषा ही नहीं है, यह तो बस कुछ बोलियां है?
• जो ऐसा कहते हैं उनकी अज्ञानता है। किसी भी मूर्ख को कभी लगता ही नहीं कि वह मूर्खता कर रहा है। भाषा विज्ञान का पूरा अपना आधार राजस्थानी के पक्ष में है। सदियों पुरानी बात है कि राजस्थानी की बोलियों को हिंदी की बोलियों के रूप में वर्णित किया गया। इक्कीसवीं शताब्दी में आप अगर अठारहवीं शताब्दी की जानकारी रखेंगे तो यह मूर्खता नहीं तो भला क्या है? और अगर राजस्थानी कोई स्वतंत्र भाषा नहीं है तो साहित्य अकादेमी और अनेक विश्वविद्यालयों ने इसे मान्यता क्यों दी है। राजस्थान सरकार ने भी राजस्थानी की मान्यता के लिए जो प्रस्ताव एक मत से भेजा है क्या वह भी गलत है? राजस्थानी ने सदा हिंदी को बल दिया है और राजस्थानी की मान्यता से हिंदी अधिक बलशाली होगी। हम राजभाषा हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखना चाहते हैं इसके बाद भी हम हिंदी के विरोधी कैसे हो गए...!
• अब तक राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता नहीं मिलने का प्रमुख कारण क्या है?
• राजस्थानी भाषा मान्यता के लिए राज्य सरकार द्वारा प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा जा चुका है। राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का निर्णय जल्द ही माननीय प्रधानमंत्री जी करेंगे। प्रदेश में राजस्थानी को अब तक लागू नहीं करने का सबसे बड़ा कारण राजनीति में हमारे नेताओं की इच्छा-शक्ति की कमी माना जा सकता है। राज्य सरकार चाहे तो राजस्थानी को दूसरी राजभाषा घोषित कर काम काज के लिए अनुमति दे सकती है।
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 आभार : भाई राजेश चड्ढ़ा जी & डॉ.हरिमोहन सारस्वत 'रूंख' जी

12 जनवरी, 2018

केन्द्रीय साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत आलोचक डॉ. नीरज दइया से बातचीत

मैं प्रयास करूंगा कि पाठकों का भरोसा कायम रखूं
• लगभग तीस से अधिक वर्षों की साधान के बाद साहित्य अकादेमी का मुख्य पुरस्कार पा कर कैसा लग रहा है?
• मुझे इसकी कोई उम्मीद नहीं थी। जब मुझे मालूम चला खुश हुआ किंतु मुझे बेहद आश्चर्य भी हुआ।
• आश्चर्य क्यों, पुरस्कार तो हर बार किसी न किसी को मिलता ही है?
• हां, मगर विगत दो वर्षों से मुख्य पुरस्कार बीकानेर के खाते था। कहानीकार बुलाकी शर्मा और उपन्यासकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ के बाद इस बार यह आश्चर्यजनक और ऐतिहासिक निर्णय है। इससे प्रमाणित होता है कि अकादेमी की निगाह में कृति पर रहती है।
• कृतियां तो अन्य भी बहुत रही फिर आपकी ‘बिना हासलपाई’ में ऐसा क्या खास है?
• ‘बिना हासलपाई’ आधुनिक कहानी के सिलसिले में मेरा आलोचनात्मक प्रयास है। राजस्थानी कहानी के विकास, बदलते स्वरूप और उतार-चढ़ाव का पच्चीस कहानीकारों के संदर्भ में मैंने विशेष अध्ययन प्रस्तुत किया है। वैसे यह पुरस्कार महज इस बात का प्रमाण है कि वर्ष 2011 से 2015 के बीच प्रकाशित कृतियों में निर्णयाकों ने इसे अति-उत्तम माना है। अन्य कृतियां जो अंतिम चयन में रहीं, वे भी महत्त्वपूर्ण हैं।
• मेरी और अनेक अन्य कहानीकारों की बात ‘बिना हासलपाई’ में नहीं की गई है। ऐसा क्यों है?
• प्रत्येक काम की अपनी एक सीमा होती है। राजस्थानी में अनेक कहानीकार हैं और सब पर पृथक आलेख लिखे जाने चाहिए, किंतु क्या यह काम केवल मुझे ही करना चाहिए? मैंने अगाज किया है और ‘बिना हासिलपाई’ में किसी कहानीकार विशेष पर आलेख लिखने की तुलना में मेरा ध्येय कहानी आलोचना के लिए एक नई दृष्टि विकसित करने का रहा है। चयनित कहानीकार तो महज उदाहरण स्वरूप देखें जाने चाहिए। रही बात आप की तो मैंने ‘देवकिशन राजपुरोहित री टाळवीं कहाणियां’ का संपादन करते हुए आप पर लिखा है। अन्य कहानीकारों पर भी काम करूंगा।
• आप अनेक विधाओं में लिखते हैं फिर आपका आलोचक रूप इतना प्रमुख क्यों है?
• यह तो आप जैसे विद्वान रचनाकार बता सकते हैं कि मेरी प्रमुखता क्या है। मैं तो पूरी ईमानदारी से बस अपना लेखन करता हूं। मुझे लगता है कि मैं बेबाक हूं, सही को सही लिखता हूं। मुझ पर पाठकों का यह भरोसा है। मैं प्रयास करूंगा कि उनका भरोसा कायम रखूं।
• उपन्यास विधा पर भी कुछ आलोचना का काम आने वाला है?
• हां, राजस्थानी उपन्यास-यात्रा पर मेरी किताब नई कृति ‘आंगळी-सीध’ लगभग तैयार है। मैं प्रयास करूंगा कि इस वर्ष वह पाठकों के हाथों में पहुंच जाए। राजस्थानी में संकट लिखने से अधिक उसके प्रकाशन का है। बहुत से रचनाकारों की कृतियां समय पर प्रकाश में नहीं आती है। यह महत्त्वपूर्ण है कि राजस्थानी उपन्यास विधा का पर्याप्त विकास रचनाकारों ने संभव बनाया है। इस क्षेत्र में आपका भी बड़ा योगदान रहा है।
• आपको आलोचना के लिए साहित्य अकादेमी सम्मान मिल रहा है, राजस्थानी में आलोचना की स्थिति कैसी है।
• आलोचना एक गंभीर कार्य है। इसमें पहले पर्याप्त अध्ययन, चिंतन-मनन के साथ विशेष दृष्टि की आवश्यकता होती है। रचनाकार के प्रति सम्मान भावना के साथ मैं निर्मम तुलनात्मक अध्ययन का पक्षधर हूं। राजस्थानी भाषा में तुलना यहां की परिस्थितियों को देख-समझ कर करेंगे तो बेहतर रहेगा। कहानी आलोचना में समग्र रूप से डॉ. अर्जुनदेव चारण के बाद मेरा काम आया है। अभी इस दिशा में अन्य काम भी सामने आने वाले हैं। ऐसे में यह तो नहीं कहा जा सकता कि आलोचना की स्थिति बहुत अच्छी है किंतु निराशाजनक भी नहीं है।
• राजस्थानी भाषा की मान्यता के विषय में क्या मनना है?
• मान्यता इसी वर्ष मिल जाएगी। आप जैसे वरिष्ठ रचनाकारों का इसके लिए पूरा संघर्ष रहा है। अब जब सारी औपचारिकताएं पूरी हो चुकी है, मैं मानता हूं कि माननीय प्रधानमंत्री जी शीतकालीन सत्र में संवैधानिक मान्यता की घोषणा करेंगे।
- देवकिशन राजपुरोहित

दैनिक नवज्योति 11-01-2018

07 जनवरी, 2018

आलोचना विधा में पढ़ना पहली शर्त है : डॉ दइया

साहित्य अकादेमी के मुख्य पुरस्कार 2017 से सम्मानित डॉ. नीरज दइया से डॉ. गौरीशंकर प्रजापत की बातचीत

साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्ति निसंदेह एक बड़ा सम्मान माना जाता है, ऐसे शुभ अवसर पर आप कैसा अनुभव कर रहे हैं?
सम्मान की घोषणा से निसंदेह हर्षित हुआ हूं, किंतु साथ ही मैं आश्चर्यचकित हूं। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि इस बार यह सम्मान मुझे मिलेगा। गत वर्ष हमारे ही शहर के श्री बुलाकी शर्मा और उनसे पहले श्री मधु आचार्य ‘आशावादी’ को यह सम्मान मिला था, इसलिए सभी का यह विचार लगभग पक्का था कि इस बार राजस्थान के किसी अन्य क्षेत्र का कोई लेखक होगा। किंतु यह घोषणा इस बात को प्रमाणित करती है कि साहित्य अकादेमी के मूल्यांकन का आधार कोई क्षेत्र अथवा लेखक नहीं होकर कृति होती है। ‘बिना हासलपाई’ राजस्थानी कहानी आलोचना के संदर्भ में बड़ी मेहनत और लगन से किया हुआ मेरा काम है। मैं समझता हूं कि यह मेरे आलोचना-कार्य का सम्मान है। मेरा मानना है कि इस सम्मान से मेरी जिम्मेदारी और जबाबदेही बढ़ी है।  
लेखन धर्मिता एवं साहित्य अकादेमी पुरस्कार के संदर्भ में आपके प्रेरणा स्रोत क्या रहे हैं?
मैं लेखक के रूप में कार्य करता रहा हूं और मेरा मानना है कि लेखक को पुरस्कार की आकांक्षा नहीं रखनी चाहिए। हमारा काम बस बेहतर लिखना होता है, पुरस्कार तो लेखन और प्रकाशन के बाद की महज एक प्रक्रिया है। यह कहना भी आपका गलत नहीं है कि पुरस्कार से प्रेरणा मिलती है। मेरे पिता श्री सांवर दइया को साहित्य अकादेमी सम्मान 1985 में मिला था। संभव है कि कहीं अवचेतन में ऐसे बीज रहे भी हो किंतु मैंने अपने पिता से सतत लेखन की प्रेरणा ग्रहण की है।  
ऐसा माना जाता है कि रचनाधर्मिता पर परिवेश का प्रभाव पड़ता है, परिवेश को अगर व्यापक संदर्भों में देखें तो पारिवारिक परिवेश भी सम्मिलित होता है। इस विषय पर क्या कहना चाहते हैं?
परिवेश का व्यापक प्रभाव पड़ता है। मेरा आरंभिक लेखन पिता के पद्चिह्नों पर चलते हुए हुआ। विधाता को उनका अधिक साथ मंजूर नहीं था इसलिए वे 1992 में इस संसार से विदा हो गए। उनके रहते मेरी केवल एक किताब 1989 में श्री सूर्यप्रकाश बिस्सा ने प्रकाशित की थी। उनके नहीं रहने पर मैंने निश्चय किया कि पहले उनका साहित्य प्रकाश में आएगा। जब उनका अधिकांश लेखन लगभग पांच वर्षों में प्रकाशित हो गया तब मैंने अपना पहला कविता संग्रह ‘साख’ 1997 में प्रकाशित किया। पिता की स्मृति में नेगचार पत्रिका के तीन अंक भी प्रकाशित किए और प्रकाशन से जुड़ना उस समय की मांग थी।
तो क्या आप स्वीकार करते हैं कि स्मृतिशेष सांवर दइया साहब के रचना-संसार से आपकी लेखनी प्रभावित हुई है?
एकदम। मैंने सदा उन्हें एक आदर्श लेखक के रूप में पाया है। मुझे याद आता है बचपन का वह दिन जब प्रार्थना-सभा में मेरे पिता के बारे में घोषणा हो रही थी। यह वह दिन था जब उनको कहानी संग्रह ‘धरती कद तांई धूमैली’ पर राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी का पुरस्कार घोषित हुआ था। मैं उनको वर्षों पढ़ते-लिखते देखते रहा था, ऐसे में पता ही नहीं चला कि कब मैंने कलम थाम ली और पहली कविता लिखी। बाद में मुझे उनका मार्गदर्शन मिला और मैं लघुकथाकार के रूप में पहचाना जाने लगा। तब कुछ लोगों का यह भी कहना था कि मेरे पिता लघुकथाएं मेरे नाम से लिख रहे हैं, यह मेरे लिए बहुत बड़ा पुरस्कार था। मैं नया लेखक होकर भी इतना सधा हुआ समझा जाने लगा था।   
स्मृतिशेष दइया साहब के अतिरिक्त उनके समकालीन साहित्यकारों का कितना प्रभाव रहा है?
उनके मित्रों से भी मैं प्रभावित रहा। बचपन में हरदर्शन सहगल, महेशचंद्र जोशी, बुलाकीदास ‘बाबरा’ और कन्हैयालाल भाटी जैसे वरिष्ठ लेखकों का स्नेह मिला तो बाद में भंवरलाल ‘भ्रमर’, माणक तिवाड़ी ‘बंधु’ और बुलाकी शर्मा आदि अनेक रचनाकारों से मेरा विमर्श होने लगा था। अकादमी द्वारा प्रकाशित कहानी संग्रह ‘उकरास’ के संपादन के दौरान मुझे उनके साथ काम करने और खास कर समग्र राजस्थानी कहानी का काम देखने का सुअवसर मिला। संभवतः वर्ष 1985 में उनको और हिंदी कहानीकार निर्मल वर्मा को एक साथ साहित्य अकादेमी पुरस्कार ने मुझे प्रेरणा दी होगी कि मैंने निर्मल वर्मा के कथा साहित्य को शोध के लिए चुना। शिक्षा ग्रहण करते समय मेरे अनेक गुरुजन कवि थे। मोहम्मद सद्दीक, अजीज आजाद, जगदीश प्रसाद ‘उज्जवल’, भवनीशंकर व्यास ‘विनोद’, पृथ्वीराज रतनू, सरल विशारद और प्रो. अजय जोशी आदि अनेक नाम है। डॉ, उमाकांत जी के मर्गदर्शन में शोध करते हुए मैं आलोचना के पथ पर व्यवस्थित रूप से बढ़ा। मेरा मानना है कि हमें हमारे वरिष्ठ लेखकों से बहुत कुछ सीखना चाहिए।
मूलतः आप राजस्थानी साहित्य के लब्ध प्रतिष्ठित आलोचक हैं, वर्तमान में समग्रतः राजस्थानी साहित्य के बारे में आप क्या कहना चाहते हैं?
मैं आलोचक हूं यह आपका मानना है। कुछ ऐसा भी कहते हैं कि मैं आलोचक ही नहीं हूं। कुछ मुझे कवि, अनुवादक, बाल साहित्यकार और संपादक के रूप में श्रेष्ठ मानते हैं। सबकी अलग अलग धारणा है। मैं जो भी हूं किंतु मैं वर्तमान राजस्थानी साहित्य को लेकर बहुत आशावादी हूं। एक समय था जब राजस्थानी में लोककथाओं का जमाबड़ा था, किंतु अब कहानी और आधुनिक कहानी के बाद उत्तर आधुनिक कहानियां हम देख सकते हैं। पहले अनेक विधाओं में बहुत कम सृजन होता था किंतु विगत वर्षों में देखें तो पता चलेगा कि विपुल सृजन हुआ है। राजस्थानी में नए रचनाकारों का पूरे विश्वास के साथ लिखना उत्साहजनक है। अनेक पत्रिकाएं प्रकाशित होने लगी है। अब राजस्थानी साहित्य के विकास के प्रति समाज भी जागरूक हो रहा है।
समूचे प्रदेश में राजस्थानी की मान्यता का प्रश्न युगीन संदर्भ में नितांत आवश्यक अनुभूत किया जा रहा है, आपकी दृष्टि में कौन-कौन सी बाधाएं इस मध्य उत्पन्न हो रही है।
राजस्थानी की मान्यता एक ऐसा प्रश्न है जिसका जबाब पूरे प्रांत द्वारा दिया जा चुका है। राज्य सरकार के प्रस्ताव पर केवल केंद्र सरकार की मंजूरी लंबित है। आशा की जाती है कि हमारी जनभावनाओं को देखते हुए माननीय प्रधानमंत्री जी शीतकालीन सत्र में राजस्थानी मान्यता की घोषणा करेंगे। भाषा वैज्ञानिक आधारों पर राजस्थानी एक स्वतंत्र भाषा सिद्ध हो चुकी है। हमारी सारी बाधाएं दूर हो चुकी है अब हमें केवल सरकारी घोषणा का इंतजार है। यह मानता हूं कि सरकारी उदासीनता के चलते राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के कार्य लंबे समय से बंद पड़े हैं। ऐसे में हमें एकजुट होकर आवाज बुलंद करनी चाहिए। राजस्थान की जनता को अपनी भाषा के लिए मरणा मांडना होगा।    
छतीसगढ़ राज्य की विधान सभा मे छतीसगढ़ी भाषा को प्रस्ताव द्वारा मान्यता प्रदत्त कर दी, आज संपूर्ण राज्य में कामकाज की भाषा के रूप में प्रयुक्त हो रही है। राजस्थानी के लिए ऐसा क्यों नहीं हुआ है?
राजस्थानी के प्रति नेताओं में इच्छा शक्ति का अभाव है। वे जिस भाषा में वोट मांगते हैं जीतने के बाद उसे भूल जाते हैं। भाषा और साहित्य की तुलना में उन्हें अपनी सीट अधिक प्यारी है। भाषा का संबंध आत्मा से है और अगर हमें हमारी संस्कृति को बचाना है तो हमें छत्तीसगढ़ से प्रेरणा लेनी चाहिए। पूरा राजस्थानी समाज इन दिनों सोया हुआ है और ऐसे में मुझे मनुज देपावत का स्मरण होता है। जिन्होंने वर्षों पहले लिखा था- धोरावाळा देस जाग रे, ऊंठावाळा देस जाग, छाती पर पैणां पड्या नाग  रे..। जिस दिन सभी राजस्थानी जाग जाएंगे, उसी दिन हमें हक मिल जाएगा।
कहते हैं कि सफल व्यक्ति के पीछे पत्नी का सहयोग होता है आप क्या मानते हैं?
घर ही वह स्थल है जहां मैं शांतिपूर्वक लेखन कर सकता हूं। जाहिर है ऐसे में पत्नी और बच्चों का बड़ा त्याग रहा है कि वे लेखन के लिए अवकाश उपलब्ध कराते हैं। 
युवा रचनाकारों को क्या संदेश देना चाहते हैं?
फिलहाल तो मैं खुद ही पचास की उम्र का युवा रचनाकार हूं। पुरानी पीढ़ी के रचनाकार जो मेरे पिता के समकालीन रहे हैं उनके सामने मुझे युवा बने रहने में ही गर्व महसूस होता है। मैं दावा तो नहीं करता किंतु प्रयास करता हूं कि अधिक से अधिक नए और पुराने साहित्य के बारे में जानकारी कर सकूं। लिखने के लिए पढ़ना बहुत जरूरी है और आलोचना विधा में पढ़ना पहली शर्त है। हम युवाओं को भाषा और साहित्य के प्रति गंभीरतापूर्वक ठोस कार्य करने हैं। युवाओं को भाषा और साहित्य के प्रति जिम्मेदारी और जबाबदेही समझनी चाहिए।

डॉ. नीरज दइया का परिचय

प्रकाशन सूची
मौलिक पुस्तकें-
• भोर सूं आथण तांई (लघुकथा संग्रह) 1989 मुन्ना प्रकाशन, बीकानेर
• साख (कविता संग्रह) 1997 नेगचार प्रकाशन, बीकानेर
• देसूंटो (लांबी कविता) 2000 नेगचार प्रकाशन, बीकानेर
• आलोचना रै आंगणै (आलोचनात्मक निबंध) 2011 बोधि प्रकाशन, जयपुर
• जादू रो पेन (बाल साहित्य) 2012 शशि प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर
• उचटी हुई नींद (हिंदी कविता संग्रह) 2013 बोधि प्रकाशन, जयपुर
• बिना हासलपाई (आधुनिक कहाणी आलोचना) 2014 सर्जना, बीकानेर
• पाछो कुण आसी (कविता संग्रह) 2015 सर्जना, बीकानेर
• मधु आचार्य ‘आशावादी’ के सृजन-सरोकार (आलोचना) 2017 सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर
• बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार (आलोचना) 2017 सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर
• पंच काका के जेबी-बच्चे (व्यंग्य संग्रह) 2017 सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर
• टांय टांय फिस्स (व्यंग्य संग्रह) 2017 सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर
अनूदित पुस्तकें-
• कागद अर कैनवास (अमृता प्रीतम की पंजाबी काव्य-कृति का अनुवाद) 2000 नेगचार प्रकाशन, बीकानेर
• कागला अर काळो पाणी (निर्मल वर्मा के हिंदी कहाणी संग्रह का अनुवाद) 2002 साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
• ग-गीत (मोहन आलोक के कविता संग्रह का हिंदी अनुवाद) 2004 साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित।
• सबद नाद (भारतीय भाषाओं की कविताएं) 2012 बोधि प्रकाशन, जयपुर
• देवां री घाटी (भोलाभाई पटेल के गुजराती यात्रा-वृत) 2013 साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित।
• ऊंडै अंधारै कठैई (डॉ. नन्दकिशोर आचार्य की चयनित कविताएं) 2016 सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर
• अजेस ई रातो है अगूण (सुधीर सक्सेना री की चयनित कविताओं का राजस्थानी अनुवाद) 2016 लोकमित्र, दिल्ली
संपादित पुस्तकें-
• मंडाण (युवा कविता) संपादक : नीरज दइया 2012 राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर
• मोहन आलोक री कहाणियां (संचै : नीरज दइया) 2010 बोधि प्रकाशन, जयपुर
• कन्हैयालाल भाटी री कहाणियां (संचै : नीरज दइया) 2011 बोधि प्रकाशन, जयपुर
• देवकिशन राजपुरोहित री टाळवीं कहाणियां (संचै : नीरज दइया) 2017 राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर
• आधुनिक लघुकथाएं (संपादन) प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, नेहरु मार्ग, बीकानेर- 334003
• नेशनल बिब्लियोग्राफी ऑफ इंडियन लिटरेचर (राजस्थानी : 1981-2000) साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली

प्राप्त पुरस्कार एवं सम्मान   
• साहित्य अकादेमी नई दिल्ली से राजस्थानी बाल साहित्य पुरस्कार 2014
• राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं सस्कृति अकादेमी, बीकानेर से “बापजी चतुरसिंहजी अनुवाद पुरस्कार”
• नगर विकास निगम से “पीथळ पुरस्कार” ।
• नगर निगम बीकानेर से वर्ष 2014 में सम्मान
• अखिल भारतीय पीपा क्षत्रिय महासभा युवा प्रकोष्ठ बीकानेर द्वारा सम्मान- 2014
• सादूल राजस्थानी रिसर्च इन्स्टीट्यूट, बीकानेर से तैस्सितोरी अवार्ड- 2015
• रोटरी क्लब, बीकानेर द्वारा “खींव राज मुन्नीलाल सोनी” पुरस्कार-2016
• कालू बीकानेर द्वारा नानूराम संस्कर्ता राजस्थानी साहित्य सम्मान-2016
• कांकरोली उदयपुर द्वारा मनोहर मेवाड़ राजस्थानी साहित्य सम्मान-2016
• फ्रेंड्स एकता संस्थान बीकानेर द्वारा साहित्य सम्मान-2016
• दैनिक भास्कर बीकानेर द्वारा शिक्षक सम्मान- 2016
• सृजन साहित्य संस्थान, श्रीगंगानगर द्वारा सुरजाराम जालीवाला सृजन पुरस्कार-2017
• राजस्थानी रत्नाकर, दिल्ली द्वारा श्री दीपचंद जैन साहित्य पुरस्कार’- 2017
• ओम पुरोहित ‘कागद’ फाउण्डेशन हनुमानगढ़ द्वारा कागद सम्मान- 2017
• साहित्य कला एवं संस्कृति संस्थान नाथद्वारा द्वारा हल्दीघाटी में साहित्य रत्न सम्मान- 2017
• जिला लोक शिक्षा समिति, बीकानेर द्वारा साक्षरता दिवस पर सम्मान- 2017
• मावली प्रसाद श्रीवास्तव सम्मान 2017 अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन द्वारा
• अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन द्वारा सीताराम रूंगटा सीताराम रूंगटा राजस्थानी साहित्य पुरस्कार- 2017
• केंद्रीय विद्यालय संगठन, जयपुर संभाग द्वारा क्षेत्रीय प्रोत्साहन पुरस्कार, 2017
• गौरीशंकर कमलेश स्मृति राजस्थानी भाषा पुरस्कार- 2017
•  कथा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थान द्वारा डॉ. नारायणसिंह भाटी अनुवाद सम्मान

अन्य   
राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर की मासिक पत्रिका ‘जागती जोत’ का संपादन। माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की उच्च माध्यमिक कक्षा की पाठ्यपुस्तक का संपादन।
माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान, अजमेर की राजस्थानी पाठ्यक्रम विषय-समिति के पूर्व-संयोजक।
राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं सस्कृति अकादेमी, बीकानेर की कार्यकारणी और सामान्य सभा के सदस्य।
“कविता कोश” राजस्थानी विभाग सहायक-संपादक।
समन्वयक : राजस्थानी भाषा साहित्य संस्कृति विभाग, हिन्दुस्तानी भाषा अकादमी, दिल्ली।
राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के प्रचार प्रसार के लिए अंतरजाल पर सक्रिय रचनाकार, अनेक ब्लॉगों के लेखक।
राजस्थान भाषा मान्यता के प्रवल समर्थक।

03 जनवरी, 2018

डॉ.नीरज दइया से पांच सवाल / डॉ. मदन गोपाल लढ़ा

आलोचानात्मक कृति 'बिना हासलपाई' पर साहित्य अकादमी पुरस्कार की घोषणा से कैसा अनुभव कर रहे हैं। बतौर लेखक पुरस्कार के क्या मायने हैं?
पुरस्कार और सम्मान किसे अच्छा नहीं लगता, किंतु इस घोषणा से मुझे आश्चर्य हुआ है। पिछली बार कहानीकार बुलाकी शर्मा और उससे पहले उपन्यासकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ को यह पुरस्कार मिला और संयोग से दोनों कथाकार बीकानेर के हैं। तीसरा पुरस्कार की इस घोषणा से यह प्रमाणित होता है कि अकादेमी और निर्णायकों की निगाह में पुस्तक सर्वोपरि होती है। वैसे कोई भी पुरस्कार सामाजिक प्रतिष्ठा के अतिरिक्त भला क्या महत्त्व रखता है? बतौर लेखक मैं मानता हूं कि यह पुरस्कार मेरे लिए नई जिम्मेदारियां लेकर आया है।
लिखने की प्रक्रिया क्या रहती है। हिंदी व राजस्थानी दोनों भाषाओं में कई विधाओं को एक साथ कैसे साध पाते हैं?
जीवन जीना और लिखना मेरे लिए पर्याय है। लेखन के संस्कार मुझे मेरे लेखक पिता सांवर दइया से मिले हैं। मैं केवल लिखने के नहीं लिखता हूं, मेरे भीतर एक बेचैन लेखक रहता है जो मुझे लेखन के लिए बाध्य कर देता है। जैसे उसे प्रतिदिन लिखने के लिए अवकाश देना मेरी नियति है। राजभाषा हिंदी व मातृभाषा राजस्थानी दोनों भाषाओं में लिखने को मैं देशभक्ति और मातृभक्ति से रूप में देखता हूं। हिंदी मेरे पेट को पोषित करती है तो राजस्थानी मेरी आत्मा को। विधाओं का चयन परिस्थितियां और समय-सापेक्ष होता है।       
क्या आपको कभी ऐसा लगा कि आलोचना की राह में बहुत कांटे हैं?
बिल्कुल, बहुत कांटें हैं और ऐसे हैं कि चाह कर भी उन्हें बुहारा नहीं जा सकता है। आलोचना किसी रचना अथवा रचनाकार की तरफ एक अंगुली करने जैसा है। जब किसी दिशा में हम एक अंगुली करते है तो तीन अंगुलियां हमारी तरफ स्वतः हो जाती है। मैं खुद से तीन सवाल करने के बाद प्रतिपक्ष से सवाल किए जाने के पक्ष में हूं। मैं तीन नहीं आलोचन में अनेक सवालों से मुठभेड़ करता हूं। कृति और कृतिकार की दिशा से मैं चीजों को देखने-समझने का प्रयास करता हूं। किसी रचना के प्रति पूर्वधारणाओं की बजाए नए आयुधों की तलाश में रहता हूं। मेरा मानना है कि परंपरा और आधुनिक विकास-यात्रा में रचना के मर्म को जानना-समझना और मूल्यांकन करना हमारे पाठ के आनंद को छिन्न-भिन्न कर देता है। इसलिए सच्ची और खरी आलोचना तो सदा हमारे पाठक ही करते हैं।
खुद को मूल रूप से क्या मानते हैं- कवि, आलोचक, बाल साहित्यकार, व्यंग्यकार, अनुवादक या संपादक?
मूल रूप से तो मैं इन सब का एक आवास-स्थल हूं। मेरे भीतर का लेखक ही हर बार यह चयनित करता है कि वह क्या है और क्या लिखने वाला है, क्या करने वाला है।
राजस्थानी की मान्यता का सपना कब पूरा होगा?
जिस दिन पूरी राजस्थानी जनता जाग जाएगी, उसी दिन सपना पूरा होगा।

01 जनवरी, 2018

डॉ. नीरज दइया से डॉ. लालित्य ललित की बातचीत

1
पहले तो आप बधाई स्वीकारें कि यह जाता हुआ वर्ष और आता हुआ वर्ष यानि 2017 और 2018 आपके लिए सृजनात्मक रहा और पुरस्कारों के लिए भी, आप राजस्थान के साथ कोलकाता और देश की राजधानी में भी सम्मानित होंगे यह समाचार सभी को खुशियां दे रहा है। कैसा लग रहा है?
अच्छा लग रहा है। मेरी लेखक के रूप में जिम्मेदारी और जबाबदेही बढ़ी है। हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जिसमें समाज और साहित्य में अंतराल बढ़ रहा है, इन पुरस्कारों और साहित्यिक आयोजनों का बड़ा महत्त्व है। इनसे समाज का साहित्य के प्रति ध्यानाकर्षक होता है। मैं पुरस्कारों को एक समाजिक स्वीकृति के रूप में देखता हूं। कोलकता के अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन अथवा दिल्ली के साहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कारों की चर्चा से मेरे आसपास के सामाजिक जीवन में हलचल है। उन्हें लगता है कि लेखन के क्षेत्र में मैंने कोई बड़ा काम किया है जिसके रहते अनेक पुरस्कारों के लिए चयनित हो रहा हूं। यह अच्छा होगा कि नए पाठक मेरी रचनाओं तक पहुंचेंगे। 
2
कभी सोचा था कि आप आलोचना से सृजनात्मक लेखन में आएंगे?
आलोचना अपने आप में सृजनात्मक होती है, और होनी चाहिए। किसी सृजन के बाद आलोचना का जन्म होता है और सृजन ही वह प्रेरणा है जिससे आलोचना का उद्भव संभव है। जैसे अनुवाद में अनुवाद का मौलिक हो जाना उसका परम लक्ष्य है, वैसे ही आलोचना में आलोचना का रचना हो जाना एक उपलब्धि है। मैं रचना को किसी बंधी-बंधाई शास्त्रीय आलोचना के पक्ष में नहीं हूं। प्रत्येक रचना अपने आप में सृजन के क्षेत्र में अभिनव प्रयास है और उसका मूल्यांकन करते समय आलोचना को हर बार अभिनव होना होता है। परंपरा और आधुनिकता की विकास-यात्रा में किसी रचना का निर्धारण अथवा स्थापना बिना सृजनात्मकता के संभव ही नहीं है। आलोचना में काम करते हुए भी मैं सृजनात्मक लेखक में ही हूं। मेरी सृजनात्मकता ही मुझे बेहतर आलोचनात्मक दृष्टिकोण देती है।
3
क्या कारण है कि राजस्थानी लेखन और बीकानेर अब पर्याय होने लगा है?
राजस्थान के अन्य जिलों की तुलना में बीकानेर जिले और बीकानेर संभाग में लेखन प्रचुर मात्रा में हुआ है और हो रहा है। यहां राजस्थानी भाषा की मान्यता की मांग लंबे समय से प्रमुखता से उठाई जाती रही है। बीकानेर में राजस्थानी, हिंदी, उर्दू और सिंधी के साथ अन्य भाषाओं के साहित्य को पढ़ने-लिखने वाले तुलनात्मक रूप से अधिक संख्या में हैं। यहां साहित्यिक आयोजनों की बाहर रहती है। साहित्य के प्रति लोगों का रुझान इन वर्षों में बढ़ा है। ऐसे में बीकानेर राजस्थानी लेखक का पर्याय है तो अन्य जिलों को इससे प्रेरणा लेनी चाहिए। 
4.
राजस्थानी के साहित्य अकादेमी पुरस्कार में पहले मधु आचार्य, बुलाकी शर्मा और अब आप? क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि बीकानेर को लगातार पुरस्कार मिले हैं। यह सोची-समझी रणनीति तो नहीं, या इसे करनी माता का आशीर्वाद समझ लिया जाएं ?
राजस्थानी संस्कृति में आस्था और आशीर्वाद का बड़ा तो महत्त्व है। आप इसे मेरे माता-पिता और परमपिता का आशीर्वाद कह सकते हैं। वर्ष 1985 में यह पुरस्कार मेरे पिता श्री सांवर दइया को उनके कहानी संग्रह ‘एक दुनिया म्हारी’ के लिए मिला और 32 वर्षों के बाद मुझे कहानी-आलोचना पर मिल रहा है। लगातार तीन वर्षों की बात भी सही है। पर इसमें कोई रणनीति नहीं, यह महज एक संयोग है। यदि रणनीति से पुरस्कार मिलते हों तो हमें मिलकर नोबल पुरस्कार के लिए रणनीति बनानी चाहिए। वैसे आप जानते ही है कि साहित्य अकादेमी नई दिल्ली के पुरस्कारों की अपनी लंबी और गोपनीय प्रक्रिया है। वह लेखकों से पुस्तकें आमंत्रित नहीं करती। अकादेमी अपने स्तर पर ग्राउंड लिस्ट बनवा कर अपने पैनलों से उसे रिफाइंड करवाती है। साहित्य अकादेमी के भाषा सलाहकारों अथवा संयोजक को भी पता नहीं रहता कि निर्णायक कौन है। संयोजक के सामने अंतिम बैठक के दिन ही यह भेद खुलता है। इस प्रक्रिया में कोई रणनिति काम कर सकती। अगर कोई ऐसा करता है तो उसे हमेशा के लिए इस प्रक्रिया से बाहर करने का नियम है। हां इस बार यह आश्चर्य का विषय है कि लगातार तीसरी बार मुख्य पुरस्कार बीकानेर के रचनाकार को मिल रहा है। राजस्थानी कहानी आलोचना की पुस्तक “बिना हासलपाई” (2014) को साहित्य अकादेमी पुरस्कार का अभिप्राय बस इतना है कि वर्ष 2011 से 2015 के बीच प्रकाशित पुस्तकों में यह पुस्तक निर्णायकों की नजर में बेहतर सिद्ध हुई है।   
5.
आप व्यंग में भी उतने सहज है जितने आलोचना में ऐसे कैसे हुआ?
व्यंग्य और आलोचना मैं स्वयं को समान भावभूमि पर खड़ा पाता हूं। दोनों के उद्देश्यों में भी कुछ मायनों में समानता है। बिना सहजता के व्यंग्य और आलोचना विधा में काम नहीं किया जा सकता। पाठकों और संबंधितों को भी इन्हें सहजता से लेना चाहिए क्यों कि इन दोनों के पीछे सुंदर और आदर्श समाज का भाव निहित होता है।     
6.
आप लगातार लिख रहे हैं, घर की सभी जिम्मेवारियों को भी निभा रहे हैं, फिर भी कहीं लगता है कि कहीं कुछ छूट रहा हैं?
असल में हमारा जीवन ही ऐसा है कि जिसमें निरंतर बहुत कुछ पीछे छूटता चला जाता है। इस पीछे छूटते जीवन को कुछ अंश तक साहित्य द्वारा बचाने का प्रयास रचनाकार करते हैं। वर्तमान दौर में हिंदी अथवा राजस्थानी लेखन से कोई अपना घर-परिवार नहीं चला सकता। ऐसे में आपको नौकरी भी करनी होती है। मैं नौकरी करते समय एक राजकीय कर्मचारी और घर में अपने संबंधों के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभाने के बाद ही अपने भीतर के लेखक को जगाता हूं कि आ जा भैया अब तेरा समय है। हां इतना जरूर है कि घर में पत्नी और बेटे-बेटियां इस बात कि चिंता रखते हैं कि जब मैं लिखता हूं अथवा पढ़ता हूं तब वे मुझे बहुत अवकाश देते हैं। उनके और मित्रों के इसी सहयोग के चलते मैं अपना काम ठीक से करने का प्रयास करता हूं।    
7.
आप एक शिक्षक है और केन्द्रीय विद्यालय में पढ़ा रहे है और अपने विद्यार्थियों में खासे लोकप्रिय भी, जब उनको पता लगा कि आप को साहित्य अकादेमी के सम्मान से सम्मानित किया जाएगा तो पहली प्रतिक्रिया कैसी थीं, उनकी?
बच्चों को बड़ी खुशी होती है और जाहिर हैं वे पहली प्रतिक्रिया के रूप में पार्टी मांगते हैं। एक बार की बात है मैं किसी प्रशिक्षण में था और वहां भोजनावकाश के बाद एक सवाल किया गया कि आपके बच्चे कितने हैं। बहुत से संभागी अपने अपने विषय में बता रहे थे और जब मेरी बारी आई तो मैंने जबाब दिया दो हजार। सारे चौंके और सवाल करने वाले ने ताली बजाकर सही उत्तर की घोषणा की। मैं मनाता हूं कि एक शिक्षक के रूप में विद्यालय में पढ़ने वाले सभी विद्यार्थी मेरे अपने बच्चे हैं। इस भावना के बिना हम बच्चों के साथ न्याय नहीं कर सकते। इसलिए उनका हक है कि वे पार्टी मांगे, उन्हें पार्टी मिलेगी। हमारे प्राचार्य सरजीत जी ने भी पुरस्कार के बाद बच्चों की पार्टी को पुरस्कार का टीडीएस की संज्ञा दी है। बच्चों को यह टेक्स देते हुए खुशी होती है।
8.
कितना समय लेखन को, कितना पर्यटन को और कितना घर को देते हैं ?
मेरी एक राजस्थानी कविता है। जिसकी कुछ पंक्तियां हिंदी अनुवाद में यहां साझा करना चाहता हूं। कविता का शीर्षक है- ‘रक्त में मिली हुई भाषा’ आरंभिक पंक्तियां कुछ इस तरह है- “राजस्थानी भाषा मेरे रक्त में मिली हुई है / यह पंक्ति आपको कविता की पंक्ति नहीं लगे / तो कोई बात नहीं है... / कविता से ज्यादा अधिक जरूरी है भाषा को संभालना / भाषा की हेमाणी लिए खड़ा हूं मैं...” मैंने लेखन के संस्कार अपने लेखक पिता से पाए हैं और मैं अपने भीतर के लेखक को मेरे आस-पास की परिस्थियों के अनुरूप कभी भी सक्रिय कर सकता हूं। मैं जितना भी समय संभव होता है लेखक को देता हूं और देना चाहता हूं, पर्यटन कम संभव होता है पर मैं घर में ही रहना अधिक पसंद करता हूं। किसी आयोजन के लिए बाहर निकलना भी मुझे जरा मुश्किल लगता है। ऐसे में आयोजक मित्रों की यह शिकायत भी रहती है। 
9.
दिनचर्या क्या रहती हैं, मसलन लेखन की और घर के संदर्भ में ?
सुबद जल्दी उठकर कंप्यूटर पर लिखने-पढ़ने की आदत है। विद्यालय जाने से पहले कुछ जरूरी काम करने के बाद अपने लेखक को भूल जाता हूं। मैं हिंदी पीजीटी के रूप में विद्यालय के कार्यों में व्यस्त रहता हूं। पुस्तकालय में जब कभी लेखक जागता है तो उसे मना लेता हूं कि भैया घर पर लौटकर बात करेंगे। घर लौटकर मैं घर-परिवार के छोटे-मोटे काम के बाद मेरी प्राथमिकता लिखना-पढ़ना है। मैंने छोटा-मोटा एक पुस्तकालय घर में ही बना रखा है। किताबों में खो जाने बाद मैं बाहर भी दुनिया को भूल जाता हूं। हां कोई पारिवारिक काम हो तो उसे मैं मेरी प्राथमिकता उसे मानता हूं।  
10.
पहली रचना कौन सी थीं, व्यंग को अपने दिल के करीब मानते हैं या आलोचना से उतना ही सरोकार हैं ?
आज ठीक से पहले रचना की जानकारी नहीं है पर मैंने संभवतः उच्च प्राथमिक स्तर पर लिखना आरंभ किया था। मेरे पिता श्री सांवर दइया को उनके कहानी संग्रह पर राज्य की साहित्य अकादमी के पुरस्कार की घोषणा मैंने दसवीं कक्षा में मंच से होती सुनी तो मुझे गर्वानुभूति हुई और किताब के रूप में मेरा पहला लघुकथा संग्रह 1989 में अकादमी अनुदान से प्रकाशित हुआ था। मेरी साहित्यिक यात्रा में मेरे पिता का योगदान इसलिए भी है कि जब 1992 में उनका असामयिक निधन हो गया तब पहले मैंने उनके साहित्यिक कार्यों को प्रकाश में लाने को प्राथमिकता पर रखा और लगभग पांच वर्षों में उनका अप्रकाशित साहित्य पारिवारिक संसाधनों से प्रकाशित करवाया। उसके बाद मैंने अपना पहला कविता संग्रह ‘साख’ 1997 में प्रकाशित किया। व्यंग्य की तुलना में मैं खुद को आलोचना के करीब मानता हूं। मैंने आलोचना के क्षेत्र में कुछ नवीन प्रयोग करने का प्रयास किया और मुझे खुशी है कि मेरे प्रयास को ‘अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन’ के अवसर पर बाबू मावली प्रसाद श्रीवास्तव साहित्य पीठ, रायपुर द्वारा प्रदत्त पुरस्कार ‘बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार’ पर अर्पित किया गया। चयन समिति ने संस्तुति में कहा- श्री दइया की इस कृति में संग्रहित निबंध किसी रचनाकार के व्यक्तित्व और कृतित्व को समझने और परखने की कथित रूप से जरूरी अकादमिक और क्लासिक परंपरावाली क्लिष्टता और संशलिष्टता के बरक्स आत्मीय और सहज रागात्मक भाषा में मूल्यांकन के नये और कारगर टूल्स को चिह्नांकित करते हैं ।
11.
जिंदगी का लक्ष्य क्या है?
मातृभाषा राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में देखना मेरा एक सपना है, यह पूरा हो जाए। मैं लेखन में अपनी सक्रियाता बनाए रख सकूं और मेरे विद्यार्थी देश के सुयोग्य नागरिक बने। 
12.
पुरस्कारों की राजनीति भी होती हैं, क्या ? इस पर कुछ कहेंगे ?
हां, कुछ पुरस्कारों में राजनीति हुई है। राजनीति की बात करें तो इसमें जनमत बदलता है, वैसे ही ऐसे पुरस्कारों और लेखकों की साख भी बदलती रहती है। महानता से पुरस्कार मिल सकते हैं, पर पुरस्कारों से महानता हासिल नहीं की जा सकती है। इस दौर में मूल्यों और आदर्शों का पतन हुआ है किंतु यह लंबे समय तक यह चलने वाला नहीं है। मेरा अपने कार्य के प्रति विश्वास बना रहता है, अगर असहमतियों के बीच भी मुझे लगता है कि मैं सही हूं तो मुझे रुकना नहीं है, निरंतर आगे बढ़ना है। 
13.
साहित्य अकादेमी का वाल साहित्य पुरस्कार आपको 1994 में मिला और मुख्य पुरस्कार 2017 मिल रहा है, अनुवाद पुरस्कार कब मिलेगा?
पुरस्कार मिलना या नहीं मिलना किसी लेखन के हाथ में नहीं है। पुरस्कारों की अपनी अपनी प्रक्रिया होती है। मैंने राजस्थानी बाल साहित्य, कविता, आलोचना आदि विधाओं के साथ अनुवाद के क्षेत्र में भी काफी कार्य किया है। मैं अनुवाद के क्षेत्र में राजस्थानी और हिंदी के लिए कार्य कर सका यह बात किसी भी पुरस्कार से बड़ी है। मैंने अमृता प्रीतम, निर्मल वर्मा, मोहन आलोक, भोलाभाई पटेल, डॉ. नन्दकिशोर आचार्य और सुधीर सक्सेना जैसे रचनाकारों की पुस्तकों का अनुवाद किया है। ‘सबद-नाद’ पुस्तक में मैंने भारतीय भाषाओं की कविता को आधुनिक राजस्थानी कविता के संदर्भ में समझने-समझाने का एक प्रयास किया है। अनेक रचनाओं का हिंदी अनुवाद और पाठकों की सराहना ही मेरा पुरस्कार है। रही बात साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार की तो वह प्रक्रिया है कि मिलने पर ही पता चलेगा कि मिल गया है। 
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27 अप्रैल, 2017

राजस्थानी को मान्यता तो मिलकर रहेगी : देवकिशन राजपुरोहित

बातचीत / डॉ. नीरज दइया

     श्री देवकिशन राजपुरोहित एक ऐसा नाम है जिनके परिचय में कुछ कहा जाना इसलिए जरूरी नहीं है कि उनके बारे में हम सब बहुत कुछ जानते हैं। बहुत कुछ जानते हुए भी उनके अनेक पहलुओं से हम अब भी अनजान हैं। आपकी लंबी साधाना के अनेक मुकाम है। शिक्षा विभाग में शिक्षक, बाद में पत्रकार और संपादक के साथ यायावरी का आपको लंबा अनुभव है। राजस्थानी और हिंदी की विविध विधाओं में विपुल साहित्य सृजन करते हुए अनेक दौर आपने ना केवल देखे-सुने वरन अनुभूत किए हैं। कहानी, उपन्यास, व्यंग्य, संस्मरण आदि में सृजनरत रहते हुए वे देश-प्रदेश की राजनीति, समाज और साहित्य के अनेक पक्षों के गंभीर जानकार के रूप में पहचाने गए हैं। आपने लोक साहित्य और संस्कृति का विशद अध्ययन, मनन और चिंतन किया है। देश-विदेश की अनेक यात्राएं की हैं तो आप राजस्थानी भाषा के प्रवल पैरोकार और प्रखर वक्ता हैं। छद्म और आड़म्बर से परे सदा खरी-खरी बात कहने वाले आप समालोचक हैं। मीरा के जीवन और साहित्य पर काम करने वाले विशेष विद्वानों की श्रेणी में आपकी गणना देश में कोटी के शोधकर्ता के रूप में की जाती हैं, इन सब से परे आप हमारे ऐसे आत्मीय पुरखे है जो सभी छोटे, बड़े और अपने समव्यस्कों पर समान रूप से स्नेह और आत्मीयता की वर्षा करते हुए अविस्मरणीय-अद्वितीय इंसान है। हमारे आग्रह पर ‘मरु नवकिरण’ के लिए खास तौर से एक संवाद कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया ने राजपुरोहित जी से किया है। यहां प्रस्तुत है चयनित अंश। -संपादक

० इन दिनों आप क्या लिख रहे हैं?
- लिखे बिना किसी भी लेखक का जीना संभव नहीं। वह अगर लेखक है तो उसे अपना लेखन जीवित रखना चाहिए। इन दिनों में व्यंग्य लिख रहा हूं, कुछ विषयों पर स्वतंत्र निबंध लिखें हैं तो इन दिनों कुछ समसामयिक निबंध भी मैंने लिखे हैं। कुछ छपे हैं पत्र-पत्रिकाओं में और कुछ छपने वाले हैं।
० आप अनेक विधाओं में सृजनरत रहे हैं तो जाहिर है कि एक जिज्ञासा है कि आपकी प्रिय विधा कौनसी है?
- लेखक की प्रिय विधा जैसा कोई विचार मैंने नहीं किया। मैं या कोई भी लेखक जिस समय जिस विधा में काम करता है वह उसकी प्रिय विधा ही होती है। लगभग सभी विधाओं में काम करते हुए मैंने अपने लेखन से प्रेम किया है। विधाएं मेरी प्रिय रही हैं फिर भी अगर इसका जबाब ही देना हो तो मैं अपनी प्रिय विधा के रूप में उपन्यास, संस्मरण और व्यंग्य का नाम लेना चाहूंगा।
० आप को क्या कहलाना पसन्द है- आपके अनेक रूप हैं- पत्रकार, संपादक, साहित्यकार, व्यंग्यकार, हिंदी लेखक, राजस्थानी रचनाकार, गुरूजी, फिल्मी कलाकार, दाता अनेक नाम हैं। आप बहुत से क्षेत्रों से जुड़े रहे हैं।
- इन सब रूपों में तो मैं हूं ही लेखन इन सब से पहले मैं एक संवेदनशील इंसान के रूप में खुद को पाता हूं। मुझे घर-परिवार और देश-दुनिया की बहुत सी बातें प्रभावित करती है। मैं अपसंस्कृति और विकृत होती मानसिकता से बहुत आहत होता हूं। मैं कोई योद्धा या नेता तो हूं नहीं। अब राजा-महाराजा का युग भी चला गया। ऐसे में किसी परिवर्तन के लिए कोई एक आदेश कहीं से जारी नहीं हो सकता। मेरे पास मेरे शब्द हैं जो मैं एक साहित्यकर और पत्रकार के रूप में काम में लेता रहा हूं। मैं असल में अनेक रूपों में खुद के भीतर एक साहित्यकार और पत्रकार को सदा महसूस करता हूं। मेरा संपादक होना भी इसमें सामिल है। वैसे फिल्मी कलाकार आदि के रूप में कभी कार्य कर लेना तो केबल रूचि है।
० भाषाओं की बात करें तो आप खुद को हिंदी साहित्यकार कहेंगे या राजस्थानी साहित्यकार?
- पहले राजस्थानी और बाद में कोई दूसरा। राजस्थानी हमारी मातृभाषा है। मां का दर्जा कोई नहीं ले सकता। मां आखिर मां होती है और हरेक की होती है। हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है। मां भाषा राजस्थानी से रक्त का संबंध है तो हिंदी ने हमें संस्कार और रोजी-रोटी दी। दोनों का ही ऋण है। राजस्थान तो नमक के लिए विख्यात है कि हम राजस्थानी हिंदी की अवमाना कर ही नहीं सकते हैं। देशभक्ति और स्वाभिमान हमारे रक्त में है।
० आपने पहले राजस्थानी में लिखा या हिंदी में?
- जिसे लिखना जैसा कुछ कहा जा सकता है तो वह राजस्थानी में ही लिखा। राजस्थानी से ही मैंने हिंदी को सीखा। आगे चल कर राजस्थानी से ही बच्चों को हिंदी और अंग्रेजी भाषाओं का ज्ञान कराया। राजस्थानी में पत्रकारिता का सपना देखा। काम भी किया। किसी काम की सफलता और असफलता से बड़ी बात मैं किसी काम को अंजाम देने को मानता हूं। पत्रिकारिता के इतिहास जब कभी लिखा जाएगा उसमें ‘मरुधर ज्योति’ पत्रिका की चर्चा जरूर होगी। राजस्थानी के लिए दिन-रात एक किया है। भाषा, साहित्य के काम के लिए ना दिन देखा ना रात। पत्रकारिता से जुड़ा रहा हूं इसलिए कह सकता हूं कि दिन-रात कुछ नहीं होता बस काम ही काम होता है। दुनिया जब सोती हैं तब पत्रकार और लेखक जागते हैं।   
० आप एक पत्रकार और साहित्यकार के लेखन में क्या कोई अंतर पाते हैं?
- अंतर इन दोनों के लेखन के जीवन को लेकर है। पत्रकारिता में लिखा हुआ शब्द समय विशेष तक जिंदा रहता है। आज का अखबार कल बासी हो जाता है। पत्रिकाएं जब नई पत्रिका आ जाती है तो पुरानी हो जाती है। साहित्य में कालजयी साहित्य टिका रहता है। किताब कभी पुरानी नहीं होती। आज का अखबार पांच-दस वर्ष बाद फिर से नहीं प्रकाशित होता जब कि किताबों के नए संस्करण प्रकाशित होते हैं। लोकप्रियता लेखन की लंबे समय तक रहती है। मेरा मानना है कि जो सामयिक और अच्छा लिख पाते है वे पत्रकार ही साहित्य-लेखन में सफल होते हैं। जो खुद को केवल खबरों तक सीमित रहते हैं, वे केवल पत्रकार ही रहते हैं।
० अपने लेखन के विषय में क्या कहना चाहते हैं?
- मैं वर्ष 1967 से निरन्तर लिख रहा हूं। नवरात्रि 2017 में मेरे लेखन के 50 वर्ष पूरे होंगे। मैं सबसे पहले नवज्योति में 1967 में छपा था। मुझे याद है तब भी नवरात्रि ही चल रही थी। अब तक मेरी 65 पुस्तकें आ चुकी है। आगमी दिनों में एक बड़ा अभिनंदन कार्यक्रम और ग्रंथ मित्रों द्वारा प्रस्तावित है।
० राजस्थानी की मान्यता के विषय में आपका क्या मानना है?
- मैं तो राजस्थानी के सुनहरे भविष्य को देखता हूं। पूरे दावे के साथ कह रहा हूं कि राजस्थानी को मान्यता तो मिलकर रहेगी। आज नहीं तो कल इस भाषा को मान्यता देनी ही पड़ेगी। मान्यता देने में देरी कर सकते हैं पर इसे मान्यता मिलना अटल है।
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13 फ़रवरी, 2017

पूर्णता की तलाश है अलग-अलग विधाओं में लिखना : डॉ. नीरज दइया

साक्षात्कारकर्त्ता : देवकिशन राजपुरोहित
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हर रचना का जन्म सुख देता है। यह समय और मनःस्थितियों की बात होती है कि एक रचनाकार विविध विधाओं में लेखन करता है। लिखना और अलग अलग विधाओं में लिखना असल में किसी पूर्णता की तलाश है। जो बात एक विधा में नहीं है वह दूसरी में होती है और इस प्रकार बहुत सी विधाएं मिलकर ही एक रचनाकार का सुख निर्मित करती है। सब का अपना अपना महत्त्व है और निरंतर लिखना और सक्रिय रहना असल में किसी स्थाई सृजन-सुख की लालसा है। यह कहना है केंद्रीय साहित्य अकादेमी से बाल साहित्य में पुरस्कृत कवि, कहानीकार, अनुवादक, संपादक और आलोचक डा. नीरज दइया का। जो उन्होंने देवकिशन राजपुरोहित से बातचीत में व्यक्त किया।
- राजस्थानी की नई कविता परंपरागत कविता से अलग क्यों हो गई है?
० हरेक विधा और रचना का अपना एक युग और कालखंड होता है। परंपरागत कविताओं की जड़ें ही नई कविता को पोषित करने वाली रही है। समय के साथ प्राथमिकताएं और चुनौतियां बदले हुए रूप में सामने आती है। नई कविता में भी परंपरागत कविता का सौंदर्य नाद और शब्द विन्यास में देखा जा सकता है।
- आपकी आलोचक के रूप में पहचान बानने के क्या कारण रहे?
० मैं नहीं जानता और मानता भी नहीं कि आलोचक के रूप में मेरी पहचान बनी है या नहीं बनी है। यह मेरा काम नहीं है। मेरा उद्देश्य आलोचना में रचना की पहचान करना रहता है। मेरा काम तो बस आलोचना को सृजन जैसे रचना है। मैंने प्रयास किया है कि मैं प्रामाणिकता के साथ अपनी रचना का अहसास बटोरते हुए कुछ तथ्यात्मक और मूलभूत बातों को समझने का प्रयास कर सकूं। इस क्षेत्र में हमें बहुत काम करना होगा।
- मौलिक लेखन के साथ अनुवाद का कार्य कहीं मूल लेखन में बाधा तो नहीं बनाता ?
० अनुवाद से बहुत कुछ सीखने-समझने को मिलता है। असल में अनुवाद जहां भाषाओं में मध्य पुल का कार्य करता है वहीं अनुवादक को नए नए वितान और अनुभव प्रदान करता है। ‘सबद-नाद’ जैसी कृतियों से हम पूरी भारतीय कविता थोड़ा-सा अहसास पा सकते हैं। भारतीय भाषाओं के अलग अलग स्वरों को जानने-समझने के लिए अनुवाद ही एक मात्र रास्ता है।
- इन दिनों हिंदी में खूब व्यंग्य लेखन कर रहे हैं? ऐसा क्यों? क्या राजस्थानी लेखन से मन भर गया है, जो हिंदी में लिख रहे हैं।
० राजस्थानी म्हारै रगत रळियोड़ी है सो रक्त में घुली हुई भाषा से मन कैसे भर सकता है। राजस्थानी लेखन के साथ हिंदी में लिखना गलत तो नहीं है। हां गलत तब है जब लिखें तो हिंदी में और लाभ के लिए उसे ही अनुवाद कर मूल के रूप में राजस्थानी में प्रस्तुत कर दिया जाए। ऐसे लाभ लेने वाले हिंदी के कुछ रचनाकार हैं। मेरे लेखन में मुझे मेरा लाभ सृजन-सुख लगता रहा है। दैनिक नवज्योति ने मुझे व्यंग्यकार के रूप में लगातार प्रकाशित कर अब जब व्यंग्यकार बना दिया है तो कुछ इस क्षेत्र में भी बड़ा काम करने की अभिलाषा है।
- अंतिम सवाल राजस्थानी की मान्यता के बारे में।
० राजस्थानी के लिए बीकानेर में मुक्ति संस्था ने संकल्प यात्रा आरंभ की है। मुझे भरोसा है कि मान्यता राजस्थानी को मिल कर रहेगी। भाषा वैज्ञानिक और सभी शिक्षाविदों के साथ जन-जन का समर्थन इसे मिल चुका है।


16 अक्टूबर, 2016

आलोचना में कोई मित्र नहीं होता : डॉ. नीरज दइया

 डॉ. नीरज दइया से राजेन्द्र जोशी की बातचीत (आधुनिक राजस्थानी साहित्य में कविता, आलोचना, अनुवाद, संपादन और बाल साहित्य आदि क्षेत्र में बहुत तेजी से उभते हुए लेखक के रूप में डॉ. नीरज दइया ने अपने काम के बल पर एक ऐसी स्थिति ला खड़ी कर दी है कि वे राजस्थानी साहित्य के एक जरूरी लेखक माने जाने लगे हैं। आपको बाल साहित्य पर साहित्य अकदेमी का बाल साहित्य पुरस्कार और अनुवाद कार्य पर राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी ने सम्मानित किया साथ ही अनेक संस्थाओं ने भी पुरस्कृत किया है। हाल ही में आपको आलोचना पुस्तक बिना हासलपाई पर इक्कीस हजार का पुरस्कार रोटरी क्लब द्वारा घोषित हुआ है। डॉ. नीरज दइया से पुरस्कृत पुस्तक और उनकी आलोचना प्रक्रिया पर कवि-कहानीकार राजेन्द्र जोशी ने लंबी बातचीत की है। जिसका संपादित अंश पाठकों के लिए प्रस्तुत है। ० संपादक )
आपकी आलोचना पुस्तक ‘बिना हासलपाई’ पर रोटरी क्लब का पहला-पहल राज्य स्तरीय पुरस्कार घोषित होने पर कैसा लगा?
इसका जबाब तो आप जानते ही हैं। अच्छा लगा। पुरस्कार किसे अच्छा नहीं लगता? खुशी की बात है कि मुझे आलोचना विधा की पुस्तक पर पुरस्कार मिलेगा।
कहा जाता है कि राजस्थानी में आलोचना विधा पर लेखन बहुत कम हुआ है और जो हुआ है उसमें भी बहुत बातें हैं। जैसे आलोचना के नाम पर जो लिखा जा रहा है वह आलोचना है भी या नहीं इस पर भी संदेह है।
केवल राजस्थानी आलोचना ही क्यों, क्या हम समग्र आधुनिक राजस्थानी साहित्य लेखन से संतुष्ट हैं? हम ऐसी बात करते हुए कटघरे में तो बीसियों को रखते हुए अनेक बातों में व्यर्थ समय बर्बाद कर सकते हैं पर मैं मानता हूं कि एक लेखक के रूप में अपने आप से सबाल करना चाहिए कि जो मैंने लिखा है वह पर्याप्त है क्या? साथ में यह भी कि यदि आप राजस्थान में रहते हैं और राजस्थानी भाषा आपकी आपनी है तो आपने क्या किया है इसके लिए? अपनी भाषा, साहित्य और संस्कृति के लिए हम सभी की साझी जिम्मेदारी है। क्या पाठक और लेखक के रूप में आपने राजस्थानी किताब को खरीद कर पढ़ाने की आदत डाल ली है? स्थिति बेहद दुखद है कि लेखक किताब भेंट करते हैं और मित्र लेखक पढ़ते भी नहीं है। ऐसे लेखक मित्रों को मैं अनपढ़ कहा करता हूं। संभवतः आलोचना के बारे में संदेह करने वाले ऐसे ही हमारे अनपढ़ लेखक मित्र हैं, उन्हें खुद जानने-पढ़ने की जरूरत है कि आलोचना क्या होती है। तथ्य और तर्क के बिना कही गई बात का कोई महत्त्व नहीं होता।
ऐसे अनपढ़ कहना हमारे लेखकों द्वारा शायद अपमान समझा जाएगा।
यदि इसे अपमान समझ कर भी वे कुछ पढ़ने-लिखने लगे तो राजस्थानी के लिए अच्छा होगा। अनपढ़ लेखक केवल बातें करते और बातें बनाते हैं। यह साहित्य का भला नहीं।
मेरा सवाल अधूरा रह गया कि आज जो आलोचना के नाम पर लिखा जा रहा है और आपने जो अपनी किताब में लिखा है उसमें बहुत लेखकों को शामिल नहीं किया है।
यदि आप मेरी किताब में बस लेखकों के नाम ही देख रहे हैं तो माफ करें आपको लेखक परिचय कोष देखना चाहिए। आधुनिक राजस्थानी कहानी को मैंने समझने का प्रयास किया है। इस प्रयास में कहानी विधा के विकास की बात बिना कहानीकरों और कहानियों के नहीं हो सकती थी। इसलिए पच्चीस कहानीकारों को प्रमुखता के साथ आधार बनाया है। इसमें आरंभ में दो आलेख अलग से है, जिनमें कहानी आलोचना और शिल्प-संवेदना के पक्षों पर चर्चा है। मेरा मानना है कि वर्तमान में आधुनिक कहानी पर यह पुस्तक पर्याप्त विवेक के साथ मैंने लिखन की एक कोशिस की है। 
कहानी आलोचना पर आप से पहले डॉ. अर्जुन देव चारण ने ‘आधुनिक राजस्थानी कहाणी : परंपरा विकास’ पुस्तक में सभी कहानीकारों की चर्चा की थी पर आपने सभी को नहीं लिया।
यदि आपने उस पुस्तक को देखा है तो यह भी कहिए कि डॉ. चारण ने पांच कहानीकारों पर विशेष आधार बना कर विवेचना की थी और अब जब मैंने पांच से पच्चीस कहानीकारों को आधार बनाया है। इस क्षेत्र में बहुत काम करने की आवश्यकता है। मैं मूलतः रचनाकार था और रचनाकार ही हूं, आलोचना का काम भी उसे रचना मान कर ही करता हूं। 
ऐसे में हम क्या यह समझे कि बिना हासलपाई में आलोचना की हासलपाई यह है कि आपने जानबूझ कर अपने मित्र कहानीकारों को ले लिया है और कुछ नामी गिरामी कहानीकारों को छोड़ दिया है।
‘बिना हासलपाई’ आलोचना पुस्तक की एक सीमा है, हर पुस्तक की होती है और मेरा मानना है कि आलोचना में कोई मित्र नहीं होता। इसमें शामिल बहुत से कहानीकारों से मेरा परिचय बस उनकी रचनात्मता से है। मैंने राजस्थानी के लगभग सभी कहानीकारों को पढ़ा है और इस आलोचना पुस्तक में छूटे हुए कहानीकारों से भी गहरे मित्रवत संबंध है। ऐसे मित्रों को मैं अपने पारिवारिक आयोजन में आमंत्रण भेज सकूंगा पर आलोचना लिखते समय जब मैं अपने पिता सांवर दइया को भी एक कहानीकार के रूप में पढ़कर ही आलोचना लिखने का प्रयास करता हूं, आप स्वयं इसका आकलन कर सकते हैं कि मैंने अपने पिता पर नहीं एक कहानीकार पर लिखा है, जो राजस्थानी के बड़े कहानीकर माने जाते हैं। असल में ‘बिना हालपाई’ में कहानीकारों के मेरे संबंधों को नहीं उनकी कहानियों के सभी पक्षों को उद्घाटित करने का उदाहरण बनाने का प्रयास है। केवल तारीफ ही तारीफ या फिर परिचय और सूचियां आलोचना नहीं हुआ करती। आदरणीय कवि पारस अरोड़ा ने एक दिन मुझे फोन किया और बोले- नीरज तुझे समीक्षा लिखनी नहीं आती। मैं हैरान रह गया। पूछा- ऐसा क्या लिख दिया मैंने? उन्होंने जो कहा अब वह मेरे लिए किसी बड़े पुरस्कार या प्रमाण-पत्र से कम नहीं है। वे बोले थे- तुम समीक्षा के नाम पर आलोचना लिखते हो। असल में किसी भी समीक्षा का धेय ही आलोचना हो जाना होता है। आलोचना रचना को गहरे अर्थों में स्वीकार करती है।
ऐसे में आपने शामिल पच्चीस कहानीकारों का चयन कैसे किया। किसे लिया जाए और किसे नहीं लिया जाए? इसका कोई तो आधार या बात आप ने ध्यान में रखी होगी?
‘बिना हासलपाई’ का कोई भी किताब जब प्रकाशन की राह आती है तो उसमें रचनाकार के मित्रों और सहयोगियों के साथ अग्रज साहित्यकारों की भी भूमिका होती है। मेरे साथ हमेशा ऐसा रहा है। ‘आलोचना रै आंगणै’ भाई साहब बुलाकी शर्मा और रवि पुरोहित को समर्पित थी और ‘बिना हासलपाई’ भाई साहब मदन सैनी और नवनीत पाण्डे को समर्पित है। इसका फ्लैप नंद भारद्वाज जी ने लिखा है। पहली पुस्तक से इतर जब दूसरी पुस्तक आने वाली थी तब हम सब ने तय किया कि पुस्तक विधा केंद्रित होनी चाहिए। बहुत से आलेखों को बिना हासलपाई में शामिल करने से पहले मैंने अनेक बार देखा परखा। आलोचना जब पत्र-पत्रिकाओं में किसी त्वरा में लिखी जाती है तब कुछ बातें और प्रसंग साथ होते हैं ऐसे में उनका वैसे का वैसा किताब में जाना ठीक नहीं होता है। पत्र-पत्रिका और अखबार का महत्त्व कुछ दिनों और महीनों तक होता है जबकि किताब को तो सालों-साल रहना होता है। ऐसे में उनकी भाषा और वस्तु-भाव सभी को परिमार्जित किया जाना जरूरी समझता हूं। बिना हासलपाई में उन कहानीकारों को लिया गया जिन पर पर्याप्त ध्यान आलोचना ने नहीं दिया है। शामिल कहानीकारों के अलावा भी ऐसे कहानीकार है जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए। पर कुछ ऐसे कहानीकारों को छोड़ दिया गया, जिन्होंने कहानियां तो बहुत कम लिखी है और बातें बहुत की है अथवा अपने कहानीकार होने को उन्होंने खूब प्रचारित करवाया है। आलोचना का काम अज्ञात बातों और बिंदुओं को सामने लाना होता है, ऐसे में कुछ प्रयास मैंने किया है। जो पसंद किया गया है तभी मेरी किताब के बारे में बात होती है। 
आलोचना लिखते समय आप विशेष क्या और किन-किन बातों का ध्यान रखते हैं?
लिखना आज के दौर में बेहद कठिन कार्य है और आलोचना तो उससे भी कठिन। मैं राजस्थानी साहित्य का पाठक हूं इसलिए लेखक हूं। कुछ किताबें और लेखक मुझे प्रभावित करते हैं और वे किताबें ही मुझे आलोचना लिखने की प्रेरणा देती है। ऐसा भी है कि संपादकों के आग्रह पर भी मैंने आलोचना लिखने का प्रयास किया है। आलोचना में समय के साथ नया दृष्टिकोण होना जरूरी है। मैंने आधुनिक कविता के संदर्भ में कवियों के सिलसिले में टोप टेन कवियों की अवधारणा बाजारीकरण के चलते प्रस्तुत की थी जिस पर भिन्न भिन्न प्रतिक्रिया हुई। मैं मानता हूं कि आजादी के बाद के मेरे बताए दस कवियों में से आप सात-आठ पर सहमत हैं तो मेरी आलोचना के मानदंड ठीक है। मैं यह उम्मीद भी नहीं करता कि आप शत प्रतिशत मुझसे सहमत होंगे। आपको सहमत होना भी नहीं चाहिए। यदि आप पूरे सहमत हो जाएंगे तो मैं अपने आप में सुधार क्या करूंगा। अंत में एक बात मन से कहता हूं कि साहित्य की कोई विधा हो बेशक वह आलोचना हो या कोई दूसरी हो, आलोचना का कोई तयशुदा फार्मूला नहीं होता। मैं क्या और किन-किन बातों का ध्यान रखता हूं आपके सवाल पर मेरा कहना है कि मैं लिखते समय बस लिखता हूं। जिस दिन यह क्या और किन-किन का ध्यान रखने लग जाऊंगा तब तो मेरा लेखन ही अवरुद्ध हो जाएगा। भीतर की प्रेरणा और विचार प्रवाह की कुछ ऐसे स्थितियों से मैं अपने भीतर धिर जाता हूं तब यह जानिए कि बिना लिखे रह नहीं सकता और मैं लिखता हूं। हां उसके प्रकाशन से पूर्व जरूर इन क्या और किन-किन के बारे में सोचता हूं। आलोचना में किसी लेखक के आत्म-सम्मान पर चोट नहीं हो यह ध्यान रखता हूं साथ ही मैं अपने लेखक को बड़ा मान कर ही उसके पीछे पीछे चलने का प्रयास करता हूं। मेरी भाषा और तर्क पर्याप्त सुसंगत हो यह भी दुबारा पढ़ते समय देखता हूं। असल में सभी कहानीकारों का अपना अपना ढंग है, इसिलिए सभी लेखकों-कहानीकारों का अपना-अपना महत्त्व है। इस महत्त्व के आलोक में आलोचक अपनी दृष्टि से समय और समाज के अनेक प्रश्नों के साथ किसी व्यापक परिदृश्य अथवा कहें साहित्य की विशाल परंपरा में उन्हें देखने-समझने का प्रयास करता है।
राजेन्द्र जोशी, तपसी भवन, नत्‍थूसर बास, बीकानेर - 334004

(दैनिक युगपक्ष 16-11-2016 रविवार को प्रकाशित)


08 मई, 2016

मूल और अनुवाद में भेद न करना अनैतिक

साहित्य/बातचीत: डॉ. आईदान सिंह भाटी से डॉ. नीरज दइया की बातचीत | दुनिया इन दिनों 1 से 15 मई 2016 | 

 डॉ. आईदान सिंह भाटी। जन्म 10 दिसम्बर, 1952 नोख, जैसलमेर (राजस्थान)। प्रकाशन : हंसतोड़ा होठां रो सांच, रात-कसूंबल, आंख हींयै रा हरियल सपना (कविता-संग्रह), थार की गौरवगाथाएं (इतिहास-कथाएं), समकालीन साहित्य और आलोचना (आलोचना), गांधीजी री आत्मकथा एवं राईनोसोर्स (गैंडौ) अनुवाद पुस्तकें। अकादमी पत्रिका जागती जोत का सम्पादन भी किया। साहित्य अकादमी का मुख्य एवं अनुवाद पुरस्कार के अतिरिक्त राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के सर्वोच्च पुरस्कार से सम्मानित। वर्षों तक कॉलेज शिक्षा में अध्यापन के बाद वर्तमान में जोधपुर में स्थायी आवास एवं स्वतंत्र लेखन।   

 आप वर्षों हिन्दी के प्राध्यापक रहे, फिर भी राजस्थानी में ही लिखते रहे हैं। ऐसा क्यों?
- इसका पहला कारण तो यह है कि राजस्थानी मेरी मातृभाषा रही और हिन्दी मैंने बाद में पढ़ने-लिखने के दौरान सीखी। राजस्थानी तो जुबान के आंटे में थी, इसलिए राजस्थानी में लिखता हूं।

आपका बाद में महाविद्यालयी-शिक्षा से जुड़ाव रहा और हिन्दी में भी आपका लेखन रहा। आप खुद को किस भाषा का रचनाकार कहलाना पसंद करेंगे, भाषा और रचना का अंतर्सम्बन्ध क्या है? 
- कविता का जहां तक सम्बन्ध है सम्वेदन मातृभाषा से ही जुड़ा रहा है, मैंने हिन्दी सीखी और कुछ कविताएं हिन्दी की लिखी भी हैं, लेकिन सहज अनुभव अपने आप को राजस्थानी में करता हूं। कवि खुद को राजस्थानी का मानता हूं, हां गद्य जरूर हिन्दी में लिखा है।

कविता के संदर्भ में क्या भाषा माध्यम ही महत्वपूर्ण है या राजस्थानी में लिखते हुए भी आप खुद को एक भारतीय कवि के रूप में देखते हैं?
- मैं राजस्थानी कवि होकर ही सम्पूर्ण भारतीय भाषाओं के कवियों की बिरादर में खड़ा होता हूं क्योंकि अन्य भारतीय भाषाएं भी लोक भाषाएं हैं। हिन्दी में मैं अपने आपको उस रूप में हिन्दी का कवि नहीं मानता। हां, साक्षरता के दौरान या जहां लोग राजस्थानी नहीं समझते, वहां मैंने उनके लिए यत्र-तत्र कुछ कविताएं हिन्दी में लिखीं।

लेकिन राजस्थानी के कुछ लेखक अपनी रचनाओं को दोनों ही भाषाओं में मौलिक मानते हैं। उनकी एक जैसी रचनाएं राजस्थानी और हिन्दी दोनों में देखी जा सकती हैं, जबकि सच तो यह है कि कोई रचना किसी एक भाषा में मौलिक होती है।
- यह वस्तुत: गलत बात है। मैं राजस्थानी में लिखता हूं तो राजस्थानी की ही बात करूंगा। मेरी राजस्थानी कविता को मैं हिन्दी की कविता कह कर प्रकाशित करता हूं तो यह कोई अच्छी बात तो नहीं है। मैं इसको नैतिकता के स्तर पर भी ठीक नहीं मानता, लेकिन जो लोग ऐसा कर रहे हैं, मेरे विचार से अपना सम्प्रेषण न होने के कारण ऐसा कर रहे हैं। उनको ऐसा लगा होगा कि हमारी बात ढंग से पाठकों तक पहुंची नहीं है। इसी के रहते हिन्दी अनुवाद करके हिन्दी पाठकों को सहज उपलब्ध करवाया।

क्या यह लेखकीय ईमानदारी का प्रश्न नहीं है कि आप मूल और अनुवाद में भेद प्रकट नहीं करते?
- यह बिल्कुल ही गलत बात है, अनैतिक है। मेरा मानना है कि मूल और अनुवाद का भेद होना ही चाहिए। जैसे अभी कुछ दिनों पहले आपने मेरी राजस्थानी कविता का हिन्दी अनुवाद कर पाठकों तक पहुंचाया। उसको देख-पढ़ कर मुझे बहुत से मित्रों ने बधाई भी दी, साथ ही उन्होंने कहा भी कि आप हिन्दी में क्यों नहीं लिखते?

आज के बदलते दौर में लिखना क्यों जरूरी है, या कहूं कि आप क्यों लिखते हैं?
- मैंने लिखने से पहले खुद से ही सवाल किया कि मैं क्या काम कर सकता हूं। अंतस का उत्तर पाया - मुझे मेरे लिए सबसे सहज काम कविता लिखना लगता है, सहज उस रूप में नहीं है। यह ऐसी सहजता है, जो मेरे द्वारा सम्भव है। आज कविता लिखना इतना सहज नहीं रह गया है। जो चीजें समाज में आ रहीं हैं, जैसे बाजारवाद-वैश्वीकरण का जो दौर आरम्भ हो चुका है, उसमें कविता को हाशिये पर डालने के सारे उपक्रम चल रहे हैं और इसलिए मैं मानता हूं कि आज कविता की जरूरत पहले से भी अधिक है।

आपने राजस्थानी कविता का पूरा बदलाव देखा, छंद और मुक्त छंद और उसके बाद आज की कविता। इस बदलाव को आप कवि-आलोचक के रूप में कैसे देखते हैं?

- मैं समझ गया आपकी बात, छंद मैं लिखता था, गांव में डिंगळ काव्य की परम्परा थी, लेकिन जब जोधपुर आया तब लगा कि समकालीनता के लिए मुक्त छंद जरूरी है। मैं पाठ्य या पठित मुक्त छंद जैसा नहीं, आज भी मैं गति लय का निर्वाह करता हूं। छंद लिख कर सीख कर हम मुक्त छंद लिखते हैं तो मैं कहूंगा कि हम निराला की तरह छंद का ही प्रयोग कर रहे होते हैं। छंद नहीं आये और कहूं मैं मुक्त छंद में लिखता हूं, इसे मैं ठीक नहीं मानता।

राजस्थानी साहित्य के सम्वर्धन में आलोचना की स्थिति पर कुछ कहना चाहेंगे?
- कमजोर पक्ष है इसे कहें गत्यात्मक नहीं है, आपकी और अर्जुनदेव चारण की किताबें आयीं। पर यह या अन्य जो लिखा गया है, वह निरंतर नहीं है। इसमें गति और निरंतरता की बहुत जरूरत समझता हूं। साहित्य को भारतीय परिप्रेक्ष्य के लिए आलोचना की प्रवृति विकसित करनी होगी और हमें खुद छायावादियों की तरह आलोचना में लिखना होगा।

तकनीकी बदलावों के चलते आज सोशल मीडिया पर बहुत से नये रचनाकारों की बाढ़ सी आ रही है, इसमें साहित्य के मापदंड नहीं रहे  और होड़ सी लगी है।
- प्रतिस्पर्द्धा में जिसकी सम्वेदना और भाषा में दम होगा, वही बचेगा। संख्यात्मक वृद्धि हमारे लोकप्रिय साहित्य का विस्तार मानता हूं और यह अच्छा भी है। विराट फलक में पाठक और दर्शक बढ़े हैं, यह अच्छा-बुरा दोनों रूपों में है। समय और लोग, अपने आप अच्छे और बुरे की पहचान कर लेंगे।

फेसबुक जैसी आभासी दुनिया में त्वरित टिप्पणियां होती हैं। क्या इसमें गम्भीरता है?
- नहीं, यह गम्भीरता नहीं है, लेकिन आप गम्भीर टिप्पणी कर रहे हैं तो यह महत्वपूर्ण भी है।

लेखकीय धैर्य और विवेक के साथ लिखना और त्वरा में बह कर लिखना दोनों भिन्न-भिन्न है? वास्तविक माध्यम और आभासी माध्यमों के बीच आने वाले साहित्य को आप किस रूप में देखते हैं?
- आपने खुद ही कह दिया कि साहित्य और लोकप्रिय माध्यम की भाषा अलग है, त्वरित टिप्पणियां साहित्यिक नहीं व्यक्तिगत होती हैं। इसमें साहित्यिक मूल्यों का अभाव होता है।

राजस्थानी मान्यता के विषय में आपको क्या लगता है? यह हमारा सपना सच में सम्भव होगा?
- यह मेरे सम्वेदना से जुड़ा मुद्दा है। मैं आरम्भ से ही इसका पक्षधर रहा हूं, लेकिन मैं चिल्लाने वाले लोगों के साथ नहीं हूं। पिछले चालीस-पचास वर्षों से साहित्यकारों ने आंदोलन चलाया, लेकिन बाजारवाद के साथ ही ऐसे लोग इस आंदोलन में आये, जो अपने नामों और चेहरों को ही आगे करने के प्रयास करते रहे हैं। वे राजस्थानी के नाम पर सब कुछ अपने पक्ष में कर लेना चाहते हैं। ऐसी प्रवृतियों ने आंदोलन को न केवल पीछे किया है, बल्कि वे गिनती के चंद लोग लोगों की आंखों में आ गये हैं। पहले मजबूत था, अपने घर परिवार बोलचाल रीत-रिवाज से लेकर सम्बन्धों और संस्कारों के साथ सांस्कृतिक मूल्यों से भी आंदोलन जुड़ा था। ये सब घटक उसके अभिन्न अंग थे। दूसरा एक भाषा, एक राष्ट्र और एक धर्म वालों से मुझे बहुत ज्यादा आशा नहीं है। लोक भाषाओं के समर्थक लोग जो राजनेता हैं, वे निरंतर पिछड़ते जा रहे हैं। अगतिशील लोग क्या हमारी लोक भाषा के सम्वेदन और मर्म को समझेंगे! 

एक लेखक ने कहा कि राजस्थानी के सभी लेखक हिन्दी समझते हैं, वे हिन्दी माध्यम से पढ़े हैं। राजस्थानी में केवल अपनी मातृभाषा के जुड़ाव के वशीभूत या ऋण को चुकाने के लिए राजस्थानी में लिखते हैं। क्या राष्ट्रप्रेम में राजस्थानी को छोड़ दिया जाना चाहिए?   
- नीरज जी कितना शानदार आपने सवाल किया है, मुझे ऐसा लगता है कि क्या हमारी लोक भाषाओं के सम्वेदन में राष्ट्र प्रेम है ही नहीं क्या? क्या राष्ट्र प्रेम किसी एक भाषा में अभिव्यक्त होता है? ऐसा जो कहते हैं उनके लिए मैं कहूंगा कि मेरे पिता इन्हें क्षमा करना, वे नहीं जानते कि वे क्या कह रहे हैं... जबकि सुनीत कुमार चटर्जी वर्षों पहले अपने एक लेख में स्पष्ट रूप से बहुत सी बातें लिख कर बता चुके हैं कि राजस्थानी अपने आप में पूर्ण भाषा है। मैं हिन्दी या किसी भी भारतीय भाषा का विरोध नहीं करता, लेकिन मैं यह मानने को तैयार नहीं कि राष्ट्र प्रेम या धरती प्रेम या ऐसा कोई प्रेम जो हमारी बहुलतावादी संस्कृति से जुड़ा हुआ हो, वह किसी एक भाषा में नहीं वरन सभी भारतीय भाषाओं में परिलक्षित होता है।

राजस्थानी अकादमी लेखकों-राजनेताओं की उपेक्षा के कारण बंद पड़ी है।
- सरकारों की अंतिम दृष्टि में साहित्य-कला है। वे केवल फोटो खिंचवाने के बहाने साहित्य-कला के उपक्रम करते हैं। सब चुप हंै कि कोई लाभ हमें मिलने वाला है, उससे वंचित न हो जाएं।

ऐसे प्रतिकूल समय में साहित्यकार का दायित्व क्या है?

- लेखक को लिखते जाना चाहिए, बिना किसी की परवाह किये कि कोई अकादमी है या नहीं। छपना, नहीं छपना तो बाद की बात है, लिखना बहुत जरूरी है। 
संपर्क - 9461375668

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मूल और अनुवाद में भेद नहीं करना अनैतिक
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(बीकानेर / राजस्थानी के ख्यातनाम लेखक डॉ. आईदान सिंह भाटी ‘आईजी’ एक कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए बीकानेर आए। इस मौके पर ‘भास्कर’ के पाठकों के लिए कवि-कथाकार-आलोचक डॉ. नीरज दइया ने उनसे विशेष बातचीत की। प्रस्तुत है बातचीत के अंश)
० आप वर्षों हिंदी के प्राध्यापक रहे फिर भी राजस्थानी में ही लिखते रहें हैं, ऐसा क्यों?
आईजी- इसका पहला कारण तो राजस्थानी मेरी मातृभाषा रही और हिंदी मैंने बाद में पढ़ने-लिखने के दौरान सीखी। राजस्थानी तो जुबान के आंटे में थी इसलिए राजस्थानी में लिखता हूं।
० कविता के संदर्भ में क्या भाषा माध्यम ही महत्त्वपूर्ण है या राजस्थानी में लिखते हुए भी आप खुद को एक भारतीय कवि के रूप में देखते हैं?
आईजी- मैं राजस्थानी कवि होकर ही संपूर्ण भारतीय भाषाओं के कवियों की विरादर में खड़ा होता हूं। क्यों कि अन्य भारतीय भाषाएं भी लोक भाषाएं है।
० राजस्थानी के कुछ लेखक अपनी रचनाओं को दोनों ही भाषाओं में मौलिक मानते हैं, उनकी एक जैसी रचनाएं राजस्थानी और हिंदी दोनों में देखी जा सकती है?
आईजी- यह वस्तुतः गलत बात है। मैं राजस्थानी में लिखता हूं तो राजस्थानी की ही बात करूंगा, मेरी राजस्थानी कविता को मैं हिंदी की कविता कह कर प्रकाशित करता हूं तो यह कोई अच्छी बात तो नहीं है। मैं इसको नैतिकता के स्तर पर भी ठीक नहीं मानता। लेकिन जो लोग ऐसा कर रहे हैं मेरे विचार से अपना संप्रेषण न होने के कारण ऐसा कर रहे हैं।
० आज के बदलते दौर में लिखना क्यों जरूरी है, या कहूं कि आप क्यों लिखते हैं?
आईजी- मुझे मेरे लिए सबसे सहज काम कविता लिखना लगता है, सहज उस रूप में नहीं है। यह ऐसी सहजता है जो मेरे द्वारा संभव है। आज कविता लिखना इतना सहज नहीं रह गया है। कविता को हासिये पर डालने के सारे उपक्रम चल रहे हैं और इसलिए मैं मानता हूं कि आज कविता की जरूरत पहले से भी अधिक है।
० आपने राजस्थानी कविता का पूरा बदलाव देखा, छंद और मुक्त छंद और उसके बाद आज की कविता। इस बदलाव को आप कवि-आलोचक के रूप में कैसे देखते हैं?
आईजी-मैं समझ गया आपकी बात, छंद में लिखता था गांव में डिंगळ काव्य की परंपरा थी लेकिन जब जोधपुर आया तब लगा कि समकालीनता के लिए मुक्त छंद जरूरी है। मैं पाठ्य या पठित मुक्त छंद जैसा नहीं आज भी मैं गति लय का निर्वाह करता हूं। छंद लिख कर सीख कर हम मुक्त छंद लिखते हैं तो मैं कहूंगा कि हम निराला की तरह छंद का ही प्रयोग कर रहे होते हैं। छंद नहीं आए और कहूं मैं मुक्त छंद में लिखता हूं इसे मैं ठीक नहीं मानता।
० राजस्थानी साहित्य के संवर्धन में आलोचना की स्थिति पर कुछ कहना चाहेंगे?
आईजी-कमजोर पक्ष है इसे कहें गत्यात्मक नहीं है, आपकी और अर्जुनदेव चारण की किताबें आईं। पर यह या अन्य जो लिखा गया है वह निरंतर नहीं है। इसमें गति और निरंतरता की बहुत जरूरत समझता हूं।
० फेसबुक जैसी आभासी दुनिया में त्वरित टिप्पणियां होती है। क्या इसमें गंभीरता है?
आईजी-नहीं यह गंभीरता नहीं है, लेकिन आप गंभीर टिप्पणी कर रहे हैं तो यह महत्त्वपूर्ण भी है। साहित्य और लोकप्रिय माध्यम की भाषा अलग है, त्वरिक टिप्पणियां साहित्यिक नहीं व्यक्तिगत होती है। इसमें साहित्यिक मूल्यों का अभाव होता है।
०एक लेखक ने कहा कि राजस्थानी के सभी लेखक हिंदी समझते हैं, वे हिंदी माध्यम से पढ़े हैं। राजस्थानी में केवल अपनी मातृभाष के जुड़ाव के वशीभूत या ऋण को चुकाने के लिए राजस्थानी में लिखते हैं। क्या राष्ट्रप्रेम में राजस्थानी को छोड़ दिया जाना चाहिए?
आईजी- क्या हमारी लोक भाषाओं के संवेदन में राष्ट्र प्रेम है ही नहीं क्या ? क्या राष्ट्र प्रेम किसी एक भाषा में अभिव्यक्त होता है।
०राजस्थानी अकादमी लेखकों-राजनेताओं की उपेक्षा के कारण बंद पड़ी है।
आईजी-सरकारों की अंतिम दृष्टि में साहित्य-कला है वे केवल फोटो खींचवाने के बहाने साहित्य-कला के उपक्रम करते हैं। सब चुप है कि कोई लाभ हमें मिलने वाल है वह वंचित न हो जाए।
०ऐसे प्रतिकूल समय में साहित्यकार का दायित्व क्या है?
आईजी-लेखक को लिखते जाना चाहिए बिना किसी की परवाह किए कि कोई अकादमी है या नहीं। छपना नहीं छपना तो बाद की बात है लिखना बहुत जरूरी है।
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अप्रगतिशील लोग नहीं समझेंगे राजस्थानी का महत्त्व
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० राजस्थानी मान्यता के विषय में आपको क्या लगता है? यह हमारा सपना सच में संभव होगा?
आईजी- मैं आरंभ से ही इसका पक्षधर रहा हूं लेकिन मैं चिल्लाने वाले लोगों के साथ नहीं हूं। पिछले चालीस-पचास वर्षों से साहित्यकारों ने आंदोलन चलाया लेकिन बाजारवाद के साथ ही ऐसे लोग इस आंदोलन में आए जिनको अपने नामों और चेहरों को ही आगे करने के प्रयास करते रहे हैं। वे राजस्थानी के नाम पर सब कुछ अपने पक्ष में कर लेना चाहते हैं। ऐसी प्रवृतियों से आंदोलन को न केवल पीछे किया है बल्कि वे गिनती के चंद लोग लोगों की आंखों में आ गए हैं। 

राजस्थानी भाषा और साहित्य के उद्भट विद्वान् और कवि आलोचक डॉ आईदान सिंह से नीरज दइया की बातचीत "प्रगतिशील राजस्थान"में 21 अप्रैल 2016 के अंक में प्रकाशित । (सौजन्य: दैनिक भास्कर बीकानेर)