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12 जुलाई, 2025

गुड़लिपटी बात/ डॉ. नीरज दइया

पति ने पत्नी को समझाते हुए कहा, "तुम जरा मम्मी जी से अच्छे से बात किया करो।"

पत्नी ने पूछा, "अच्छे से का क्या मतलब है, मैं तो हमेशा अच्छे से ही बात करती हूं।"

पति मुस्कुराया और बोला, "नहीं, जैसे तुम मुझसे बात करती हो..."

"तुम से कैसे बात करती हूं मैं?"

"गुड़लिपटी बात करती हो न तुम मुझसे। मेरी स्वीट हनी।"

"वो तो जैसे का तैसा है। आप जैसे बात करोगे, वैसा ही आपको जवाब मिलेगा। यह मुझे मम्मी जी को सीखना है।"

बेटा बेचारा क्या करे। हारकर उसने कहा, "देखो समझा करो, थोड़े दिनों की ही तो बात है।"

पत्नी चुप कहां रहने वाली थी। उसने पूछा, "थोड़े दिन बाद क्या होगा?"

बेटे ने कहा, "बुढ़िया मर जाएगी।"

बहू के चेहरे पर मुस्कान थी।

● डॉ. नीरज दइया

24 जनवरी, 2024

उत्तर-आधुनिक चरण-स्पर्श/ नीरज दइया

     मैंने अपने पोते से पूछा- ‘चरण शब्द से तुम क्या समझते हो?’
    उसने कहा- ‘दादा चरण या चारण, मेरे एक फ्रेंड का सरनेम चारण है। यू नो मूल शब्द चरण नहीं चरन है और चरन का मतलब पैर भी होता है।’
    अब सवाल करने की बारी उसकी थी, उसने कहा- ‘लेकिन आप यह पूछ क्यों रहे हैं?’
    मैंने कहा- ‘ऐसे ही, क्योंकि तुम आजकल चरण-स्पर्श करना भूल गए हो...?’
    - ‘नहीं, नहीं। किसने कहा आपसे? मैंने सब के चरण-स्पर्श कर लिए थे आज। मैं तो हमेशा करता हूं।’
    - ‘हें, मैंने तो नहीं देखा...!’
    - ‘आप कैसे देखते, जब मैं बेडरूम में था तब कर लिए थे।’
    - ‘कैसे?’
    - ‘अरे आप सब के चरणों की फोटो खींच कर मैंने अपने मोबाइल में रख ली है। रोज सुबह उठ कर मैं चरण स्पर्श कर लेता हूं, इसलिए आपको लग रहा है कि नहीं किए चरण-स्पर्श। मैंने तो सब के किए, मेरे पास सब के चरणों की फोटो है- आपकी, दादी जी की और पापा-मम्मी की भी। यह देखिए...’
    वह अपने मोबाइल में हम सब के चरणों के चित्र दिखा रहा था।
००००

20 मार्च, 2023

लघुकथा- नई नौकरानी / डॉ. नीरज दइया

            अभी दो महीने ही पूरे नहीं हुए मुझे इस घर में काम करते हुए और अचानक आज मां सा ने कह दिया- ‘सुनो! कल से काम पर नहीं आना।’ इस दिनोदिन बढ़ती मंहगाई में हम जैसी को जब तक दो-चार घरों में काम नहीं मिले तो गुरज-बरस कैसे हो... चारों तरफ हायतौबा मची हुई है। मुझे रहा नहीं गया, मैं बोल पड़ी- ‘क्यों मां सा क्या हुआ? मुझ से कोई गलती हो गई क्या?’
            मां सा नरम पड़ गई और बोली- ‘नहीं री... गलती कैसी। ऐसा है मुझे से इस उमर में घर का कामकाज होता नहीं। वैसे हमारे घर में काम है भी कितना सा... चार जनों की रोटी बनाना और साफ-सफाई।’
            - ‘तो मैं आप जब कहो आ जाती ना.... बताओ जल्दी आना है या फिर लेट...?’
            - ‘अरे नहीं तू बहुत भोली है री। देख इत्ते दिन बहू अपने पीहर गई हुई थी। अब वो कल आ रही है। वही करती थी पहले और अब भी कर लेगी...।’
            मैं मन मसोस कर रह गई। क्या कहती? पर मन ही मन में तो अपने आप बोल फूट ही गए- ‘अच्छा कल तुम्हारे वाली नई नौकरानी आ रही है।’
- डॉ. नीरज दइया
००००
 

लघुकथा- मामूली खर्च/ डॉ. नीरज दइया

 रामगोपाल को एकएक आवेश आया। मन विचलित हो उठा। ‘ऐसा कैसे कर सकते हैं वे?’ उन्होंने जोर से कहा तो उनकी पत्नी ने बताया- ‘ऐसा तो वे पहले भी कर चुके हैं? जो फ्रिज हमने बेटी के दहेज में दिया उसे उन्होंने आगे किसी को गिफ्ट दे दिया।’ रामगोपाल के गुस्से का बांध सीमा लांध रहा था- ‘यह कब की बात है, मुझे पहले बताया क्यों नहीं?’ पत्नी ने धीरे से कहा- ‘बताती कैसे, तुम्हारी बेटी अब तुम्हारी हमारी नहीं रही। वह उनकी तरफ हो गई है, उसने बताया ही नहीं। यह तो बातों बातों में उसके मुंह से निकल गया कि वाशिंग मसीन जो हमने दहेज में दी उसे वे किसी रिश्तेदार की शादी में गिफ्ट देंगे।’
    रामगोपाल ने सोचा कि वह फोन लगा कर अपने समधी जी से बात करे पर अगले ही पल यह विचार त्याग दिया। आगे भी ऐसा हुआ कि उसने फोन किया और उन्होंने फोन उठाया ही नहीं, ना ही वापस उनका फोन आया। पत्नी ने पूछा- ‘क्या हुआ?’
    ‘कुछ नहीं।’ कहते हुए उन्होंने धीरज बंधाते हुए कहा- ‘शांता, तुम चिंता मत करो। भगवान के घर न्याय है और देखना यहीं का यहीं है। जो जैसा करेगा, वैसा भरेगा। ऊपरवाला सारे कर्मों का हिसाब रखता है।’
    शांता को यह सुनकर भी धीरज नहीं आया। उसने कहा- ‘ऊपरवाला तो करेगा जब करेगा, अब मैं करूंगी।’
    ‘क्या करोगी भागवान?’ रामगोपाल को आश्चर्य हुआ कि यह तो कभी ऐसा नहीं करती। उनको उत्तर मिला- ‘ऑनलाइन ऑडर कर के समधी के घर मैं एक नई वाशिंग मसीन भिजवा दूंगी। बेटी के दहेज में इतने रुपये खर्च किए, इस मामूली खर्च से क्या डरना।’ वह मुस्कुरा रही थी।    
- डॉ. नीरज दइया