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05 जुलाई, 2018

कागद हो तो हर कोई बांचे / डॉ. नीरज दइया

    कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ (05 जुलाई, 1957 - 12 अगस्त, 2016) के ब्लॉग का नाम है- ‘कागद हो तो हर कोई बांचे’। यह आज से करीब दस वर्ष पहले 2009 में जब बनाया था, तब उनके साथ मैं था। चिट्ठियां हो तो हर कोई बांचे की तर्ज पर रखे इस शीर्षक में ‘भाग ना बांच्या जाय’ की व्यंजना आज अधिक व्यापक रूप में समझ आती है। कागदजी भाग्य बांचना भी जानते थे, लेकिन उन्होंने सदा कर्म पर ही विश्वास किया। वे एक आदर्श शिक्षक के रूप में अपना सामाजिक दायित्व निभाते हुए समाज में रचनाकार के रूप में भाषा, साहित्य और संस्कृति की अलख जगाते रहे। वे गीता के ज्ञान को आत्मसात किए निरंतर कर्मशील रहते हुए साहित्य-समाज में खोए रहे। राजस्थान शिक्षा विभाग में उन्होंने एक चित्रकला-शिक्षक के रूप में सेवाएं देते हुए, शैक्षिक प्रकोष्ठ अधिकारी पद तक का सफर किया।
    दो अवधारणाएं परस्पर विरोधी हैं। एक कहती है कि इस संसार का प्रत्येक व्यक्ति कवि होता है। हरेक के पास कवि-मन है। ऐसा मन जिसका परिष्कार संभव है। दूसरी अवधारणा के अनुसार कवि जन्मजात होते हैं। वे बनाएं नहीं जाते। कारयित्री और भावयित्री प्रतिभा को साहित्य-शास्त्र में अपने ढंग से समझाया गया है। कागद हो तो हर कोई बांचे में जो पठनीयता का भाव है वह सपाट बयानी किंतु संवेदनशीलता से पोषित है। बहुधा ऐसा भी होता है कि किसी एक कवि का चेहरा दूसरा कवि धारण कर लेता है। कहीं अंशिक साम्य और विरोधाभाव के साथ कविता-यात्रा के आरंभ में प्रत्येक कवि का संघर्ष खुद का व्यक्तिगत चेहरा निर्मित करता रहता है।
    कविता के क्षेत्र में कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ एक ऐसा चेहरा है, जिन्होंने तीस  वर्षों की सतत साधाना से अपना व्यक्तिगत चेहरा निर्मित किया है। यह ऐसी निर्मिति है जिसे हर कोई धारण नहीं कर सकता। चार हिंदी और आठ राजस्थानी कविता-संग्रह ओम पुरोहित ‘कागज’ के प्रकाशित हुए हैं। अनेक कविताएं अब भी अप्रकाशित हैं। सही अर्थों में बड़ा कवि वही होता है जो अपनी विशिष्टताओं का दंभ नहीं पालता। ऐसे अनेक कवियों के बीच कागद जी हमें बराबर अहसास कराते रहे हैं कि वे कवि तो हैं पर किसी दूसरे लोक के प्राणी नहीं हैं। उनका जीवन इतना सहज और सरल रहा कि उनकी सहजता-सरलता के रहते बहुत बार वे कवि-रूप में अस्वीकार किए गए थे। किंतु कवि कागद को भी जैसे कवि होने से जरूरी नेक आदमी होना ही सदा मंजूर रहा।
    हम सब के बीच कागद जी एक सामान्य इंसान की भांति सखा भाव में रहते रहे। कभी उन्हें उग्र या प्रतिरोध की मुद्रा में आक्रोशित होते हुए नहीं देखा गया। उनके भीतर स्वाभाविक रूप से एक कवि  था, जो बेहद विनम्र, सौम्य, शांत, सरल था। ये वे गुण थे जिनसे वे हर किसी को प्रभावित करने की क्षमता रखते थे। वे सदा संयमित होकर जीवन-राग की बातें किया करते थे। बहुत बार मैंने पाया कि वे बहुत कुछ भीतर छिपा कर भी बाहर सर्वानुकूल और सहजता धारण किए रहते थे।
    ओम पुरोहित ‘कागद’ के समग्र साहित्य का अवलोकन करें तो वे भाषाओं के बंधनों से परे ऐसे भारतीय कवि के रूप में लगते हैें। हिंदी और राजस्थानी भाषा महज एक माध्यम है। वे हमारे मनोभावों और अनुभूतियों को वाणी देने वाले प्रमुख कवि हैं। अकाल और कालीबंगा पर आधारित कविताओं को क्या किसी भाषा के बंधनों में बांधा जा सकता है! यह शब्दों के माध्यम से रंगों और रेखाओं की ऐसी धरोहर है जिसे किसी सीमा में बांधना उचित नहीं है।
    हिंदी और राजस्थानी के साथ साथ आपको पंजाबी भाषा में भी समान गति प्राप्त थी। आपने कुछ काविताएं पंजाबी में भी लिखी हैं। भाषाओं का क्षेत्र इतना व्यापक और विशाल है कि भारत की किस भाषा में कहां क्या हो रहा है, यह सहजता से जानना कठिन है। अपने राजकोट प्रवास के दौरान कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ की अकाल से संबंधित कुछ कविताओं का गुजराती अनुवाद मैंने प्रख्यात साहित्यिक पत्रिका ‘कविता’ में देखे। मैं बहुत खुश हुआ और कवि को बधाई का फोन लगाया। जब बात हुई तो पता चला कि उन्हें इसकी खबर तक नहीं है! यह अनुवादक और संपादक की गलत परंपरा है। ऐसा भी संभव है कि उन्हें सूचना दी गई हो और मिली नहीं हो। किंतु अनुवाद बिना कवि की अनुमति के प्रकाशित नहीं होना चाहिए।
    यहां एक बात जरूर स्पष्ट होती है कि समय, समाज, संस्कृति और देश-काल से जुड़ी रचनात्मकता किसी विशेष क्षेत्र तक सीमित नहीं रहती। उसकी महक दूर-दूर तक किसी न किसी रूप में किसी माध्यम से पहुंच ही जाती है। प्रत्येक क्षेत्र और आंख की अपनी-अपनी सीमाएं हैं, इन सीमाओं का अतिक्रमण करने वाली रचनात्मकता को मैं प्रणाम करता हूं। निसंदेह कागदजी व्यापक जन-सरोकारों के कवि हैं। ‘कागद की कविताई’ उनकी कविता के साथ उनके कवि-मन और अंतर्संबंधों को देखने-दिखाने का एक छोटा सा प्रयास है। 
    बचपन से ही ओम पुरोहित को कागज इकट्ठा कर उसे जेब में रखने का शौक था। यही कारण था कि उन्हें उनके नाना श्री तेजमाल बोहरा ‘कागदिया’ कह कर बुलाया करते थे। ‘कागज’ को राजस्थानी में ‘कागद’ कहते हैं। लोक में प्रसिद्ध है- ‘हीमत कीमत होय, विन हिमत कीमत नही। / करे न आदर कोय, रद कागद ज्यूं राजिया॥’ नाना जी का स्नेहिल ‘कागदिया’ जैसे इसी सोरठे से प्रेरणा ग्रहण कर हमारी पूरी पीढ़ी के आदरणीय बन गए। उनको दिशा देने वाला घर-परिवार और विद्यालय मिला।
    जन्म जिस घर परिवार में हुआ वहां घर-आंगन में कविता खेला करती थी। पिता श्री रिद्धकरण पुरोहित साहित्यिक रुचि से सुसम्पन्न लोक साहित्य के मर्मज्ञ थे। पिताजी कविता के इस कदर रसिक थे कि कविता सुनना-सुनाना और पढऩा-पढ़ाना उनकी दैनिक दिनचर्या में था। अनेक लोककथाएं, लोकगीत और लोक कहावतों के मर्म पर गंभीरता से चर्चा करते थे। उन्होंने न केवल राजस्थानी वरन हिंदी साहित्य की अनेक कृतियों को घर में सहेज रखा था। वे मीरा, कबीर, बिहारी, तुलसी से अमीर खुसरो की बातों में खो जाते थे। ढोला मारू रा दूहा, वीर सतसई उनकी प्रिय पुस्तकें थी। अनेक चारण कवि मित्रों की रचनाएं उन्हें कंठस्थ थी। इस साहित्यिक विरासरत में बालक ओम पुरोहित को कविताई सिखाई जाने लगी।
    वर्ष 1970 में ज्ञान ज्योति उच्च माध्यमिक विद्यालय, श्रीकरनपुर (श्रीगंगानगर) ने प्रवेश लिया और वहां प्रिंसिपल प्रख्यात कवि जनकराज पारीक का मिलना संयोग बना। आखिर एक दिन वह आया जब स्कूल में पारीकजी को लगा बालक ओम में काव्य-प्रतिभा है। वैसे ओम पुरोहित ने 9 वर्ष की आयु में कविता लिखना आरंभ कर दिया था। मराठी के प्रख्यात लेखक आनंद यादव के आत्मकथात्मक उपनयास ‘जूझ’ में जिस भांति बालक आनंद का कविता प्रेम स्कूल में जाग्रत होता है, कुछ वैसे ही भविष्य के एक कवि ओम पुरोहित ने भी अपने गुरु की भांति कविताएं गाने का प्रयास किया। उसे बहुत जल्द ही पता चल गया कि गुरुजी की भांति कविताएं, गीत-गायन उसके बस की बात नहीं है।
    ओम पुरोहित बताते थे कि उन पर सुरीले कंठ के धनी उनके गुरु जनकराज जी पारीक का कवि-रूप छाया रहता था। उनकी आरंभिक रचनाओं में कोरा आदर्शवाद था। वर्ष भर के अंतराल के बाद उनकी रुचि व्यंग्य-कविता की दिशा में बढ़ी। उनकी हास्य-व्यंग्य की कविताएं 1975-76 में लोकप्रिय होने लगी। इन्हीं दिनों श्रीगंगानगर के कवि और डांखला विधा के प्रेरक कवि मोहन आलोक से उनकी मुलाकात हुई। मोहन आलोक के सान्निध्य ने ओम पुरोहित के कवि को दिशा दी। कागद जी का जीवन पर्यंत मानना रहा कि इस आपाधापी और अपसंस्कृति के दौर में मनुष्य का कोई साथी नहीं है, केवल कविता ही एक हथियार है जो हमें संवेदनशील बनाती है।
    विचित्र संयोग यह है कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ के कवि को पहले पहल पहचानने वाले उनके गुरुजी जनकराज पारीक की राजस्थानी कविताओं की कोई किताब वर्षों तक नहीं आई और अपने गुरुजी की अप्रकाशित कविताओं को उनके शिष्य ‘कागद’ ने ‘थार सप्तक-5’ में प्रकाशित किया। बाद में जनकराज पारीक की राजस्थानी कविताओं की स्वतंत्रत पुस्तक प्रकाशित हुई।
    मान-सम्मान और पुरस्कारों की बात करें तो ओम पुरोहित ‘कागद’ को कविता संग्रह ‘आदमी नहीं है’ पर राजस्थान साहित्य अकादमी का ‘सुधीन्द्र पुरस्कार’, राजस्थानी कविता संग्रह ‘बात तो ही’ पर राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर से काव्य विधा का गणेशी लाल व्यास ‘उस्ताद’ पुरस्कार अर्पित किया गया। उन्हें भारतीय कला साहित्य परिषद, भादरा का कवि गोपी कृष्ण ‘दादा’ राजस्थानी पुरस्कार मिला, सरस्वती साहित्यिक संस्था (परलीका) और जिला प्रशासन, हनुमानगढ़, कन्हैयाला सेठिया सम्मान, छोटीखाटू आदि द्वारा सम्मानित किया गया।  सन् 1989 में राजस्थान साहित्य अकादमी से प्रकाशित ‘राजस्थान के कवि’ शृंखला के तीसरे भाग ‘रेत पर नंगे पाँव’ (संपादक-नंद भारद्वाज) में उनकी कविताएं संकलित की गई हैं।
    कागदजी का मानना था कि हमारे यहां राजस्थानी आलोचना विधा में पर्याप्त कार्य होना शेष है। संभवत: यही कारण था कि जब मेरी पहली आलोचनात्मक कृति ‘आलोचना रै आंगणै’ प्रकाशित हुई तो वे बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि मेरे ऐसे कार्यों से आलोचना का सूनापन दूर होगा। वे कहते थे कि कवि कुं.चंद्रसिंह बिरकाळी से लेकर पारस अरोड़ा तक और कहानीकार नृसिंह राजपुरोहित से लेकर सांवर दइया तक की यात्रा में आधुनिक राजस्थानी गद्य-पद्य साहित्य का पर्याप्त विकास हुआ है किंतु राजस्थानी आलोचना ठहरी हुई है। उनका मानना था कि डा.किरण नाहटा के शोधग्रंथ से वह आगे नहीं बढ़ी और यदि बी.एल. माळी के हाथों विकसित हुई तो नंद भारद्वाज के हाथों उसे सजने-संवरने का उसे किंचित अवसर मिला। अनेक कार्यों को लेकर कुछ सहमतियों-असहमतियों के विषय में भी हमारी चर्चा खुल कर होती थी। उनका मत था कि कुंदन माळी, डा. अर्जुनदेव चारण, डा.रमेश मयंक, श्यामसुन्दर भारती ने भी आलोचना की दिशा में कार्य किया है, किंतु केवल आलोचक के रूप में किसी की ख्याति नहीं बनी है। मुझे इसके लिए प्रयास करना चाहिए। मैं कहता- ऐसा सोच कर कुछ करने के पक्ष में मैं नहीं हूं। किंतु यह सच है कि आधुनिक साहित्य और खासकर आजादी के बाद के साहित्य का विकास और समृद्धि का परचम आलोचना के अभाव में पूरा लहराने से वंचित है।
    राजस्थानी के आधुनिक साहित्य की भारतीय भाषाओं तक पहुंच जरूरी है और इसके लिए हमें आलोचना और अनुवाद के क्षेत्र में बहुत कार्य करना होगा। फु टकर आलोचनाओं से ना वे संतुष्ट थे और ना मैं। पत्र-पत्रिकाओं में विभिन्न आलेखों और साहित्यिक कार्यक्रमों में पढ़े जाने वाले पत्रवाचनों में एक बंधे बंधाए प्रारूप और कुछ विशेष रचनाकारों को ही केंद्र में रखे जाने पर वे असहमत थे। धड़ैबंध आलोचना उनको रास नहीं आती थी। वे कहते थे कि यदि कोई आलोचक आलोचना के नाम पर केवल वाह-वाह बटोरने के लिए तारीफ ही तारीफ लिखे और सबको संतुष्ट रखने का प्रयास करे तो उसे सात सलाम। यह आलोचक और आलोचना का धर्म नहीं है। आलोचना में तो रचना के पाठ से मुठभेड़ होनी चाहिए। हमारे साहित्यकार भी कितने भोले और मासूम हैं कि वे ऐसे आलेखों में अपने नाम जुड़े होने से मुंह के ताले रखते हैं। कागदजी राजस्थानी साहित्य के वैज्ञानिक काल विभाजन, विधागत बदलाव-विकास-दशा-दिशा, प्रवृत्तियां, सरोकारों और बदलते प्रतिमानों की स्थापनाओं पर गंभीरता से कार्य किए जाने की सलाह देते थे।
    उन्हें स्मरण कराया कि ‘सबद गळगळा’ पर युगपक्ष में 1995 में और ‘बात तो ही’ पर जागती जोत में 2003 में मैंने उनकी समीक्षाएं लिखी। ‘बात तो ही पण बैठी कोनी’ समीक्षा से वे कुछ असहमत भी हुए, किंतु उन्होंने स्वीकार किया कि वे कविता में सजग हुए हैं। आलोचना की सजगता ही रचनाकार को सजगता की दिशा देती है। आलोचना का अभिप्राय केवल कमियां निकालना नहीं वरन प्रेरणा और प्रोत्साहन भी होता है। कुछ संभावनाओं को देखकर ही आलोचना में कुछ निर्णय अग्रिम रूप से भी प्रस्तावित करने होते हैं। मुझे हर्ष है कि मैंने ‘राजस्थली’ त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका के 100वें अंक के लिए जो आलेख ‘राजस्थानी कविता रा साठ बरस’ लिखा, उसमें उन्हें मैंने दस महत्त्वपूर्ण कवियों में शामिल किया था। ओम पुरोहित ‘कागद’ के साहित्यिक अवदान पर बहुत कम लिखा गया है किंतु कागदजी पर विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों ने लघु-शोध लिखें हैं- ओम पुरोहित ‘कागद’ के काव्य की संचेतना (2008), ओम पुरोहित ‘कागद’ द्वारा रचित ‘थिरकती है तृष्णा’ में अकाल की विभीषिका (2008-09), कवि ओम पुरोहित का हिंदी-काव्य : एक मूल्यांकन (2008-09), ओम पुरोहित ‘कागद’ के काव्य की संवेदना और शिल्प (2011-12) आदि।
ओम पुरोहित ‘कागद’ ने अनुवाद के रूप में अनेक रचनाओं का राजस्थानी, पंजाबी और हिंदी में परस्पर अनुवाद किए। अनूदित पुस्तक अभी कोई प्रकाशित नहीं हुई है किंतु कवि मायामृग के हिंदी कविता-संग्रह का उन्होंने राजस्थानी अनुवाद ‘कै जीवण कठैई ठैर नीं जावै’ नाम से किया है। उनकी अनेक रचनाओं का इतर भारतीय भाषाओं में अनुवाद होने के अनेक उदाहरण है, किंतु किसी संपूर्ण कृति के अनुवाद का प्रकाशन नहीं हुआ है। कुछ राजस्थानी कविता-संग्रह अंकिता पुरोहित ‘कागदांश’ द्वारा अनुवाद किए गए हैं जो ‘कविता कोश’ अंतरजाल पृष्ठों पर देखे जा सकते हैं।  
    ओम पुरोहित ‘कागद’ राजस्थानी-हिंदी कविता में एक मुकाम पर पहुंचने के बाद भी अंत तक कविता और रचना-प्रक्रिया को लेकर बहुत विनीत रहे। छोटा होते हुए भी मुझे बहुत स्नेह और मान देते थे। इतना मान दिया कि मुझे लगता है कि उनकी मुझे लेकर जो आशाएं-संभावनाएं थीं उन्हें जिम्मेदारी से पूरित करना है। उनका कहना था कि मेरी आलोचना पुस्तक ‘आलोचना रै आंगणै’ को यश मिलेगा क्यों कि इस कृति के माध्यम से मैंने साहित्य आलोचना के पर्याप्त दरवाजों को खोलने का प्रयास किया है। यह सच भी हुआ कि मुझे आलोचना पुस्तक ‘बिना हासलपाई’ पर साहित्य अकादेमी नई दिल्ली का सर्वोच्च पुरस्कार अर्पित किया गया। उनके नहीं रहने पर ‘कागद सम्मान’ का मिलना भी मेरे लिए बहुत बड़ा सम्मान है। वैसे उन्होंने अपने जीवन काल में ही मुझे और मेरी कृति को बहुत बड़ा सम्मान दे दिया था। उन्होंने राजस्थानी साहित्य को एक अलग दिशा देने वाली कृति ‘आलोचना रै आंगणै’ के पक्ष में अपनी सार्वजिक टिप्पणी में लिखा था- ‘आ पोथी आगै री आलोचना सारू च्यानणो करसी, जकै री खासा दरकार ही। नीरज री इण पोथी में कमियां हो सकै पण नीत में खोट नीं। कोई सडयंतर नीं! आज तक घणकरी राजस्थानी आलोचना में नीत रै खोट री बात होंवती ही, अब ईमानदारी री बात चालसी! आज ताईं थरपीज्यैड़ै कूड़ रै टूटण रा चरड़का भी सुणीजसी!’
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25 जून, 2018

जय प्रकाश मानस : गूगल से भी आगे / नीरज दइया

जयप्रकाश मानस से मेरा परिचय बहुत पुराना है। कोई जान-पहचान दो दशक को छूने लगे तो उसे पुराना कहा जा सकता है। समय परिचय को प्रगाढ़ करे अथवा नहीं करें किंतु किसी व्यक्ति आकलन में मदद जरूर करता है। इस दौरान हम अपने संबंधों को ठीक-ठीक समझ और परिभाषित कर सकते हैं। मैं मेरे और मानस जी के विषय में कुछ लिखने से पहले उस दिन का स्मरण करना चाहता हूं जब जयप्रकास जी ने मेरे मानस में एक दस्तक दी। बात उन दिनों की है जब मैंने राजस्थान सरकार की अपनी मास्टरी छोड़कर केंद्रीय विद्यालय, राजकोट में पी.जी.टी. हिंदी के रूप में वर्ष 2003 में कार्यग्रहण किया था। वहां मुझे उच्च माध्यमिक स्तर की कक्षाओं में हिंदी अध्यापन के साथ राजभाषा हिंदी और अन्य कार्य भी मिले थे।
किसी तारीख, दिन और महीने के चक्कर में पड़े बिना सीधे-सीधे कहना यह है कि जयप्रकाश मानस मेरे मानस गुरु उन्हीं दिनों बने थे। ऐसे गुरु जिन्हें वर्षों तक खबर नहीं हुई कि उनका कोई शिष्य नीरज दइया राजकोट गुजरात में बैठा है। भले उस समय मैं अपने इस संबंध को परिभाषित नहीं कर सका पर अब यह पक्का है कि वे मेरे गुरुजनों की श्रेणी में हैं। मेरे कुछ मित्रों को मुझ से शिकायत है कि मेरे गुरुजनों की संख्या अधिक है। मैं मानता रहा हूं जिससे हम कुछ सीखते हैं, जो हमें कुछ सीखाता है वह आदरणीय गुरु ही होता है। उन्होंने मुझे कंप्यूटर के भीतर छुपी हुई राजभाषा हिंदी लेखन से परिचित होने की प्रेरणा दी। उन दिनों मैं कंप्यूटर द्वारा देवनागरी हिंदी में लिखने का प्रयास बेबदुनिया के की-बोर्ड से किसी प्राथमिक स्तर के विद्यार्थी जैसे कर रहा था। मेरे पास एक ई-मेल आया। ऐसा मेल जिसे मैं अपने याहू आई-डी पर पढ़ नहीं पा रहा था। जानकार मित्र ने बताया कि यह फोंट की समस्या हो सकती है, यहां खुल नहीं रहे हैं। मित्र के सुझाव दिया और वह मेल जीमेल एकाउंट मैं पढा गया। सृजनगाथा संपादक के रूप में जयप्रकाश मानस के मेल से पता चला कि उन्होंने मेरे दो अनुवाद प्रकाशित किए हैं।
यह किसी के प्रति सम्मान और श्रद्धा की बात है। कुछ बातें हम कह देते हैं और कुछ मनों में रह जाती है। मैं शब्दों के माध्यम से जयप्रकास मानस जी मिलता रहा हूं। उनसे संवाद का भी लंबा सिलसिला रहा हैं। बीकानेर में हमारी पहली रू-ब-रू मुलाकात वर्ष 2017 में हुई। जब वे अपने दल-बल के साथ ‘द्वितीय अंतराष्ट्रीय लघुकथा हिन्दी सम्मेलन’ के दौरान मेरे शहर में आए थे। मैंने उन्हें अपनी इन भावनों से अवगत कराया तो वे हंसने लगे और ‘अरे नहीं’ शब्द उनके मुख से निकले। उनके ‘अरे नहीं’ कहने और हंसने से मैं अपना शिष्य पद छोड़ने वाला नहीं था और नहीं छोड़ा है। वे भले मुझे मित्र, छोटा भाई या एक लेखक जैसा जो कुछ समझे उनका अपना दृष्टिकोण है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने जिस श्रद्धा-भक्ति का पाठ पढ़ाया है उससे मैंने बहुत कुछ सीखा है। मैं तो जय, प्रकाश और मानस तीनों से शब्दों के गहरे अर्थों से प्रभावित होता रहा हूं, फिर ऐसे दुर्लभ संयोग को कैसे छोड़ सकता हूं।
मेरा उनसे संबंध कवि-अनुवादक के रूप में भी रहा है। मैंने उनकी कुछ कविताओं के राजस्थानी अनुवाद किए थे। जो पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुए हैं। आप और हम उन्हें फेसबुक पर लंबे समय से सक्रिय देख रहे हैं। वे किसी एनसाइक्लोपीडिया की भांति इतनी जानकारिया और स्रोत का भंडार है कि उन्हें प्रणाम करने का मन करता है। खैर मैं तो उन्हें अपना गुरु मान चुका हूं और उनकी इन सभी सेवाओं के लिए उन्हें हार्दिक वंदन करता ही हूं। अंत मैं मेरा बस इतना सा आग्रह है कि जो तटस्थ रहेगा, समय लिखेगा उसका भी इतिहास, फैसला आपका है कि आप अपना इतिहास कैसा चाहते हैं। मुझे तटस्थ की भूमिका से बेहतर स्नेह और आशीष का आकांक्षी होना बेहतर लगता है। मैं अपने गुरु जयप्रकाश रथ के रथ के साथ हूं और रहूंगा।
व्यक्ति का स्वभाव है कि वह थोड़ा बहुत स्वार्थी होता है। मैं कुछ अधिक हूं और जयप्रकास रथ यानी मानस जी के संदर्भ में इतने लंबे समय में मुझे उनके कार्य, व्यवहार और अदम्य उत्साह में अनेकानेक स्वार्थ नजर आते हैं। वे एक सक्रिय रचनाकार के साथ गहरे अध्येता हैं। अपने समय और परिवेश से जुड़ कर वे जैसा जो कुछ कर चुके हैं अथवा अब भी कर रहे हैं बहुत उल्लेखनीय है। किसी एक व्यक्ति में इतनी क्षमताएं और योग्यताएं होना अद्वितीय है। उन्होंने साहित्य लेखन के साथ संपादक और हिंदी के प्रचार-प्रसार-विकास के लिए अतुलनीय कार्य किए हैं। यह सब उनके परिचय में विस्तार से देखा जा सकता है। अगर आपको यह सब पता नहीं तो गूगल जिंदाबाद तो आप जानते ही हैं। गूगल के साथ मेरे गुरुजी मानस जी को भी जिंदाबाद इसलिए कहना है कि वे बहुत सी बातों में गूगल से भी आगे हैं।
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24 जून, 2018

ना जाने कैसी ऊहापोह / डॉ. नीरज दइया

स्मृति शेष कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ का स्मरण

    वह दिन और महीना कौनसा था, अब ठीक-ठीक स्मृति में नहीं है। वैसे मैं जिस दिन और महीने में अभी पहुंचा हूं और जिस स्मृति तक आपको ले जाना चाहता हूं, वहां यह सूचना इतनी आवश्यक भी नहीं है। आवश्यक यह है कि मैं आज से करीब आठ साल पहले बारिश के बाद के किसी उजले दिन में कालीबंगा में कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ के साथ था।
    राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित कालीबंगा ऐतिहासिक महत्त्व का स्थल है। इसी जिले के कवि कागद राजस्थानी और हिंदी के ही नहीं वरन भारतीय कविता के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर रहे हैं। आपका जन्म 05 जुलाई, 1957 को केसरीसिंहपुर (श्रीगंगानगर) में हुआ और 12 अगस्त, 2016 को इस संसार से विदा होना अंकित किया गया है। वे विदा जरूर हो गए हैं किंतु ऐसा बहुत कुछ है जो अब भी अहसास करता रहा है कि वे यहीं कहीं हमारे आस-पास है। यहीं हमारे आस-पास उनके होने की अनेक स्मृतियां है।
    मैं स्मरण कर रहा हूं, उस दिन उन्होंने मुझे कहा कि कालीबंगा के इन थेहड़ों में वे अनुभूत करते हैं कि किसी विगत समय में वे यहीं आदिम जाति के संग-संग रहे हैं। जैसे वे समय के पार बहुत दूर विगत में धड़कते जीवन की धड़कनें अपनी सांसों में महसूस करते हुए कहीं दूसरे ही लोक में खो गए थे। मैंने उनके चेहरे पर अजीब से भावों को देखा था। उनके मन में ना जाने कैसी ऊहापोह चल रही थी।
    हमारी तमाम तकनीकी उपलब्धियों के बाद भी मन के भावों और भीतर चलने वाली ऊहापोह की थाह बेहद मुश्किल है। साहित्य इस मुश्किल को आसान करता है। खासकर काव्य में ऐसे जटिल और गुंफित भावों की अभिव्यक्ति होती है। कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ का राजस्थानी कविता-संग्रह ‘आंख भर चितराम’ (2009) है, जो उन्हीं दिनों आया था। यह संयोग है कि इस कृति का ब्लर्ब मैंने लिखा था। इस संग्रह में ‘कालीबंगा’ शृंखला के अंतर्गत इक्कीस कविताएं हैं। सघन अनुभूतियों से इन कविताओं में कालीबंगा को कवि ने शब्दों में साकार किया है।
    एक वरिष्ठ कवि ने कहा कि इस पुस्तक का नाम ‘आंख भर चितराम’ ठीक नहीं है। हथेली चित्रों से भरी हो सकती हैं, पर आंख का भरना तो रोना होता है। इस नाम का सुझाव भी मेरा था, जिसे कागद जी बड़ी सहजता से स्वीकार कर लिया था। इसलिए इसका यश-अपयश मेरा भी है। इस संग्रह में बहुत-सी कविताएं चित्रात्मक है, उन्होंने काफी कविताओं में शब्दों के माध्यम से जैसे अनेक चित्रों को प्रस्तुत किया है। हर आंख री सीमा है, पर हर आंख में असीम भाव भरे हुए हैं। आंख एक ऐसा आइना है, जिनमें ना जाने कितने चित्र समाहित हैं। हमारे जीवन के सभी चित्रों की आंख एक शरण-स्थली है। कठौती में गंगा कहने वाला राजस्थानी समाज क्या आंख को चित्रों का अक्षय-पात्र नहीं मान सकता है। शब्द के अर्थों को विस्तारित भावों के साथ लिया जाना चाहिए या संकुचित और रूढ़ अर्थों तक हमें रुक जाना चाहिए?
    दृश्य के रूप में एक चित्र हमारी आंखों के ठीक सामने उपस्थित होता है और दूसरा चित्र ऐसे किसी दृश्य की अनुभूति से कवि सृजित करता है। किनारों के रूप में ऐसे दोनों छोर मेरे सामने थे। कालीबंगा का वर्तमान अपने अतीत को लिए सामने था और कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ के काव्य-संग्रह ‘आंख भर चितराम’ की कालीबंगा पर केंद्रित कविताओं की अनुभूतियां अंतस में हिलोरे ले रही थीं। यह समय का ऐसा पुल था, जिस के पार कवि के साथ चहलकदमी करते हुए मैं पहुंच गया था। कवि के साथ ऐसे ही किसी पुल पर मैं खड़ा था। मुझे डर लगने लगा था।
    कालीबंगा के उस सूने उजाड़ में कोई नहीं बस हम दो ही थे। कागद जी की भावुकता मुझे भीगने पर विवश कर रही थी। मैं कवि के व्यक्तिगत जीवन के कुछ पन्नों का अध्येयता था, इसलिए डरता था कि उनकी तबियत बिगड़ गई तो क्या होगा? मैं उस समय कहना तो बहुत चाहता था, पर मुझे मौन ने जकड़े रखा। मेरा मौन रहना ही उचित था, क्योंकि ऐसे समय में जो कुछ भी मैं कह सकता था उससे वे भली-भांति परिचित थे। फिर मैं कवि होकर किसी अग्रज कवि को यह कैसे कहता कि भाई साहब इतना भावुक होना ठीक नहीं है!
    मैं तो हिरोशिमा और नागासाकी परमाणु बम के संदर्भ पर अज्ञेय जी की कविता- ‘एक दिन सहसा / सूरज निकला / अरे क्षितिज पर नहीं, / नगर के चौक / धूप बरसी / पर अंतरिक्ष से नहीं, / फटी मिट्टी से।’ में खोया हुआ था। साथ ही उनकी अनुभूति और अभिव्यक्ति की बात को ओम पुरोहित ‘कागद’ से जोड़ कर देख रहा था कि यह होता है किसी विषय में डूबना। कवि  अज्ञेय जी की भांति ओम पुरोहित ‘कागद’ भी कालीबंगा को आत्मसात कर के कविताएं रच सके थे। 
    ‘थेहड में सोए शहर / कालीबंगा की गलियां / कहीं तो जाती हैं / जिनमें आते-जाते होंगे / लोग / अब घूमती है / सांय-सांय करती हवा...’
    कालीबंगा में मिले कितने ही अवशेषों को सुरक्षित कर लिया गया है।  संग्रहालयों के लिए न जाने यहां से कितने अवशेषों को ले जाया जा चुका हैं। समय के लंबे अंतराल के बाद भी यहां की मिट्टी चुप नहीं है, वह बहुत कुछ बोलती है। उसे सुनने वाले कान चाहिए। कागद जी ने इसी मिट्टी का बोलना बहुत पहले सुना था और कविताओं के रूप में हमें अब सुनाया है। वे पारखी हाथ किसी इतिहासकार या भूगोलवेत्ता के नहीं वरन एक कवि के थे, जिन्होंने कुछ अवशेष बटोर लिए थे। कुछ ठीकरियां और चमकदार मिट्टी के अलग-अलग आकारों के पतले बरते जैसे कुछ अवशेष मेरी हथेली पर रख देते हैं। यह कोई जादू ही था कि वे अवशेष वे मेरे हाथ में किसी बड़े बर्तन और ढक्कनों के साथ छोट-छोटे गोल पहियों के रूप में मुझे दिखाई देने लगते हैं।
    किसी वृत्ताकार घेरे को देखकर मुझे कालीबंगा में कागज जी की पंक्तियों का स्मरण होने लगता- ‘मिट्टी का / यह गोल घेरा / कोई मांडणा नहीं / चिह्न है / डफ का / काठ से / मिट्टी होने की / यात्रा का।’ इन कविताओं के माध्यम से कालीबंगा का जीवन हमारे भीतर प्राणवाना होता है और हम कवि की उन भावनाओं तक पहुंचने में सक्षम होते हैं तो यह कवि कागद की सबसे बड़ी सफलता कही जानी चाहिए। ‘कालीबंगा’ शीर्षक की राजस्थानी कविताओं का हिंदी अनुवाद डॉ. मदन गोपाल लढ़ा ने किया है।
    कालीबंगा पर केंद्रित कविताओं पर मर्मज्ञ सामूहिक रूप से ध्यान देंगे तो पाएंगे कि इतिहास केंद्रित इतनी सांद्र संवेदनाओं से पूरित इन कविताओं की तुलना में बहुत कम कविताओं को हम रख सकेंगे। घरातल की बात करें तो कुछ कवियों की कुछ कविताएं स्वतंत्र रूप से भले अपना अस्थित्व नहीं बना पाती हो, किंतु उनकी शृंखला अथवा सामूहिक प्रारूप से जो काव्य-बोध होता है वह लंबे समय तक अपनी उपस्थिति का अहसास कराता रहता है।

21 मार्च, 2018

बाल मनोविज्ञान के जादूगर / डॉ. नीरज दइया

बाल साहित्य को गंभीरता से अंगीकार कर विकसित करने का बड़ा कार्य करने वाले लेखकों में दीनदयाल शर्मा का नाम प्रथम पंक्ति में लिखा जाता है। दीनदयालजी ने बाल साहित्य की अलग अलग विधाओं में सतत रूप से हिंदी और राजस्थानी दोनों भाषाओं में रचनाएं दी हैं। लेखन के साथ संपादन का कार्य भी महत्त्वपूर्ण कहा जाएगा। लंकेश्वर, महाप्रयाग, दिनेश्वर, दीद आदि अनेक उपनामों से भी आपने निरंतर लेखन किया है। शर्मा के लेखक का मिलनसार अर स्नेहिल स्वभाव का होना अतिरिक्त विशेषता कही जा सकती है।     आपका जन्म 15 जुलाई 1956 को हनुमानगढ़ जिले की नोहर तहसील के गांव जसाना में हुआ। राजस्थानी बाल साहित्य की पुस्तकों की बात करें तो अब तक आपकी चन्दर री चतराई (1992), टाबर टोळी (1994), शंखेसर रा सींग (1997),तूं कांईं बणसी (1999), म्हारा गुरुजी (1999), बात रा दाम (2003) और बाळपणै री बातां (2009) आदि पुस्तकें निरंतर सृजन की साक्षी है। पाक्षिक समाचार पत्र टाबर टोल़ी का संपादन का श्रेय भी आपको ही है। सुणो के स्याणो, घणी स्याणप, डुक पच्चीसी, गिदगिदी आदि पुस्तकों की राजस्थानी में हास्य व्यंग्य के खाते बहुत कीर्ति है। 
    राजस्थानी में बच्चों के लिखते लिखते दीनदायल शर्मा ने कुछ आधुनिक कविताएं भी लिख कर व्यस्क लेखक होने का प्रयास किया है। आपकी नई कविताओं का प्रथम संग्रह ‘रीत अर प्रीत’ राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के सहयोग से प्रकाशित हुआ है। इन की कविताओं में हम कवि का व्यक्तिगत जीवन अनेक प्रसंगों से जुड़ी उनकी हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति देख सकते हैं। वर्ष 1975 से आरंभ हुई आपकी लेखन यात्रा से भरोसा होता है कि राजस्थानी बाल साहित्य और दीनदयाल शर्मा एक दूसरे के पर्याय हो चुके हैं।
    कहा जा सकता है कि राजस्थानी बाल साहित्य की बात आरंभ करते ही पहला जो चेहरा स्मृति पटल पर कौंधता है वह दीनदयाल शर्मा का होता है। अपना सम्पूर्ण जीवन बाल साहित्य को समर्पित करने वाले शर्मा बाल मनोविज्ञान के जादूगर है। शिक्षा विभाग की नौकरी और बाल साहित्य सृजन में अपना मन रमने वाले शर्मा सदैव बच्चों के प्रिय शिक्षक और लेखक रहे हैं। साहित्य की यही लगन ऐसी है कि उन्होंने अपने पूरे परिवार को साहित्य से जोड़ कर एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया है। राजस्थानी भाषा-साहित्य के लिए परलीका तो एक साहित्यिक गांव है और दीनदयाल जी का पूरा -घर-परिवार साहित्यिक है, अस्तु उनका घर भी एक साहित्यिक तीर्थ है। 
    केन्द्रीय साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली का बाल साहित्य पुरस्कार वर्ष 2012 का पुस्तक ‘बाळपणै री बातां’ के लिए अर्पित किया जाना पुरस्कार का सम्मान है। राजस्थानी संस्मरण लेखन के लिहाज से यह पुस्तक अब तक प्रकाशित पुस्तकों में अपना विशेष स्थान रखती है। युगबोध और विषयगत बदलाव के मानदंड से यह कृति महत्त्वपूर्ण है। इस पुरस्कृत पुस्तक में 47 आलेख हैं, जो अपनी सहज सरल भाषा और आत्मीय घटना प्रसंगों से जिस शिल्प में प्रस्तुत की गई है वह अनेक स्थलों पर बेहद मार्मिक है।
    बाल साहित्य लेखन के लिए पहली शर्त है कि बाल मन रचनाकार का होना चाहिए। वैसा बाल मन दीनदयाल शर्मा के पास वर्षों से है। बचपना इतना है कि ‘बाळपणै री बातां’ की भूमिका में मन की बातें वे इतनी लंबी खींचते हैं कि भूमिका ही किसी बाल-पुस्तक जैसी है। परिवार के बच्चों के बीच एक लेखक का खेलना-कूदना ‘बाळपणै री बातां’ में सांगोपांग उजागर हुआ है। इनके घर-परिवार के प्रतीक में हम समय के साथ बदलते अनेक बदलाव संकेत रूप में देख-समझ सकते हैं। बाल नाटकों में दीनदयाल शर्मा बेहद सावधानी से रचना करते हैं कि कम कालावधि और अनुकूल साज-सज्जा से आधुनिक नाटक खेले जा सकते हैं। ‘म्हारा गुरुजी’ बाल नाटक अपने व्यंग्य के कारण, ‘बात रा दाम’ चतराई की बात और ‘तूं कांईं बणसी’ अपनी शिक्षा के कारण स्मरणीय है। हिन्दी में भी आपरी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई है। जैसे- सारी खुदाई एक तरफ..., मैं उल्लू हूं (व्यंग्य) चिंटू-पिंटू की सूझ, पापा झूठ नहीं बोलते, चमत्कारी चूर्ण, बड़ों के बचपन की कहानियां, सूरज एक सितारा है, सपने, कर दो बस्ता हल्का, फैसला, फैसला बदल गया (बाल साहित्य) आदि।        
    देश और प्रांतीय अकादमियों से बाल साहित्य के अनेक पुरस्कारों से सम्मानित दीनदयाल जी को अनेक संस्थाओं ने भी सम्मानित किया है। आकाशवाणी और दूरदर्शन से अनेक प्रसारण हुए हैं। अंतरजाल देखें तो केई ब्लोग, फेसबुक और यू-ट्यूब के आंगन में अपनी पूरी ऊर्जा और लगन के साथ दीनदयाल शर्मा का बहुत व्यापक मित्र और समार्थक परिवार देखा जा सकता है। दुनियाभर के अनेक कामों के बीच अब भी वे बहुत आराम से बात करते हुए राजस्थानी बाल साहित्य की समृद्धि का सपना संजोए हैं। बाल साहित्य के विकास हेतु त्रैमासिक पत्रिका पारसमणि का प्रकाशन उनके इसी सपने का परिणाम है। टाबर टोल़ी पाक्षिक का नियमित प्रकाशन हो रहा है और अनेक संभावनाएं अभी भविष्य के गर्भ में है। देखें आने वाले समय में 60 वर्षीय युवा दीनदयाल शर्मा व्यस्क कवि के रूप में साहित्य में नजर आएंगे या फिर प्रेमचंद जी की उक्ति बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन हुआ करता है को सिद्ध करते हुए बच्चों के लिए सृजन करते रहेंगे। वैसे वे दोनों काम एक साथ करने में भी समर्थ है। उन्हें ढेर सारी शुभकामनाएं।
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10 दिसंबर, 2017

राजस्थान की साहित्यिक पत्रकारिता

डॉ. नीरज दइया
    साहित्यिक पत्रकारिता के विकास में राजस्थान का महत्त्वपूर्ण योगदान इस रूप में रहा है कि यहां न केवल हिंदी, वरन राजस्थानी, उर्दू, सिंधी व अन्य भाषाओं की साहित्यिक पत्रिकाएं भी प्रकाशित हुई है। वर्तमान में भी अनेक पत्र-पत्रिकाएं राजस्थान के साहित्यिक वातावरण को गतिशील किए हुए है। कहा जा सकता है कि राजस्थान के संपादकों-पत्रकारों ने इस तथ्य को समझा है कि साहित्य की समाज में अहम भूमिका होती है। भारतीय साहित्य में अगर हम विविध विधाओं के विकास और संवर्द्धन की बात करें तो यहां के साहित्य का पर्याप्त मूल्यांकन नहीं हो सका है। यहां के रचनाकारों की दोहरी भूमिका उल्लेखनीय है कि उन्होंने साहित्य लेखन के साथ साहित्यिक पत्रिकाओं का प्रकाशन भी किया है। वैसे साहित्यिक पत्रकारिता के मूल में मुख्य आधार वही सफल हुए हैं जहां संगठित होकर प्रयास किए गए हैं। फिर भी सरकारी और गैर सरकारी साहित्यिक संस्थाओं के अतिरिक्त अनेक व्यक्तिगत प्रयासों की भी सराहना करनी होगी कि जिनके अथक प्रयासों से यह परंपरा पोषित होती रही है। अधिकांश पत्रिकाओं का संपादन अवैतनिक और अव्यवसायिक रहा है।
    साहित्यिक पत्रकारिता में स्थितियां भले कभी कुछ लाभ की नहीं रही हो किंतु यह घर फूंक कर तमाशा देखना एक मिशन की बात है। आज तकनीकी विकास और आधुनिकता के दौर में साहित्यिक पत्रकारिका के संबंध में रहीम जी की पंक्तियां स्मरणीय हैं- रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि। जहां काम आवे सुई, कहा करे तरवारि। राजस्थान की पत्रकारिता के संदर्भ में यह बात कुछ अधिक प्रासंगिक हो जाती है। राजस्थान के इतिहास में जाएं तो कहना होगा कि शौय-वीरता की इस धरती पर राजपूताना रियासतों के समय पत्रकारिता का आगाज हुआ। तत्कालीन समाज में राजनैतिक और समाजिक चेतना की जागृति हेतु समाचार पत्रों की महती भूमिका रही है। यहां की जनता पर राष्ट्रीय समाचार पत्रों का विशेष योगदान रहा, वहीं अजमेर, ब्यावर और जयपुर से अनेक समाचार पत्र प्रकाशित हुए। विभिन्न स्वतंत्रता सेनानियों जिनमें विजय सिंह पथिक, रामनारायण चौधरी, जयनारायण व्यास, सेठ जमनालाल बजाज आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय है जिनका योगदान राजस्थान केसरी, नवीन राजस्थान, तरुण राजस्थान, प्रजा सेवक, अखंड भारत व आगीवाण जैसे पत्रों को प्रकाशित करने में रहा। साथ ही उन्होंने अनेक ने कविताओं और आलेखों के माध्यम से जनचेतना का संचार कर आजादी की अलख जगाने का प्रसार किया।
    पुस्तक ‘राजस्थान में जन-जागरण एवं पत्रकारिता’ के लेखक डॉ. रामचन्द्र रूण्डला अपनी शोध-खोज के आधार इस पर इस बात पर सहमत होते हैं कि राजस्थान में पत्रकारिका का आरंभिक दौर मनोरंजन और सुधारवादी दृष्टिकोण पर आधारित रहा। भारत में जहां पहला समाचार पत्र 1780 में प्रारंभ हुआ तो राजस्थान में 1949 में भरतपुर के शासक द्वारा हिंदी-उर्दू द्विभाषी पत्र ‘मजहरूल सरूर’ आरंभ हुआ। इस मासिक पत्र को राजपूताना का प्रथम पत्र माना जाता है। डॉ. कृष्णबिहारी मिश्र अपनी कृति ‘हिंदी पत्रकारिता’ में जातीय चेतना और खड़ी बोली साहित्य के निर्माण की भूमि तलाश करते हुए विभिन्न तथ्यों को उजागर करते हैं। किंतु राजस्थान की पहली साहित्यिक पत्रिका के विषय में अब भी शोध शेष है। इस दिशा में स्वतंत्र कार्य किए जाने की आवश्यकता है।
    आजादी के बाद प्रांतीय सरकारों ने साहित्य के विकास और उत्थान को ध्यान में रखते हुए अकादमियों की स्थापना की। इसी क्रम में राजस्थान में भी अकादमियां स्थापित हुई। आरंभ में राजस्थान साहित्य अकादमी (संगम) के नाम से वह हिंदी के साथ राजस्थानी भाषा के लिए कार्य करती रही थी प्रकारांतर में राजस्थानी के लिए पृथक से राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर की स्थापना हुई। वर्तमान में राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर की मासिक पत्रिका मधुमति की सक्रियता इस रूप में है कि यह पत्रिका नियमित प्रकाशित हो रही है। सरकारी पत्रिकाओं का स्वरूप और रूपरेखा उसके संपादक और यहां कहा जाना चाहिए कि अध्यक्ष के बदल जाने से परिवर्तित होती है। देश में प्रकाशित होने वाली इस प्रकार की पत्रिकाओं में प्रायः जो सरकारी ढंग की एकरूपता-एकरसता को देखा जा सकता है उससे यह अकादमी भी अछूती नहीं है। नए अध्यक्ष और संपादक जो कुछ करना चाहते हैं अथवा करते हैं वह कुछ गतिशील होता है कि उनका समय समाप्त हो जाता है। नए चेहरे बाजय काम को देखने के पुराने चेहरों के काम को नकारते हुए अपने ढंग से कोइ नया काम करने की चेष्टा में फिर से नई पारी का आरंभ करते हैं।
    इस विषय का एक पक्ष यह भी है कि साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादक पत्रकारिता से जुड़ कर भी पत्रकार कहलाने के अधिकारी नहीं हैं। समाचार पत्रों के पत्रकार साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों को पत्रकार की श्रेणी में नहीं मानते हैं। ऐसे संपादक-पत्रकार सदैव प्रकाशन संकट से जूझते, सीमित संसाधनों में पत्रिका निकालते हैं। वे रचनाकारों को मानदेय नहीं दे पाते हैं, रचनाकार भी अपनी वरियताओं के रहते इन्हें रचनाएं देने का अपना क्रम रखते हैं।
    कहने को तो अन्य प्रांतों की भांति राजस्थान से बहुत अधिक साहित्यिक पत्रिकाएं प्रकाशित हुई अथवा हो रही हैं किंतु ये अपने जिले-प्रांत की सीमाओं से बाहर निकल कर कुछ रचनात्मक पहचान बनाए तभी इनकी सार्थकता है। साहित्यिक पत्रिका के संपादक जो लेखक-कवि हैं ने पत्रकारिता को एक जरिया बनाने का प्रयास किया है जिससे कि वे स्वयं और अपने मित्रों को महान सिद्ध करने का उपक्रम सिद्ध कर सकें। साहित्य में कुछ लाभ लेने-देने के दृष्टिकोण से आरंभ की गई ऐसी पत्रिकाओं का प्रकाशन ऐसी सिद्धियों के बाद रोक दिया जाता है। कहना होगा कि खरी और सच्ची पत्रिकाएं बहुत कम है, जिनसे राजस्थान का नाम वर्तमान परिदृश्य में गर्व से लिया जा सके। खैर जैसे भी स्थितियां और हालात रहे हों किंतु इन साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं का वातावरण निर्माण और नए लेखकों को मंच देने में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। भाषा, साहित्य तथा संस्कृति के क्षेत्र में साहित्यिक पत्रिकाओं का अतुलनीय योगदान स्वीकारा गया है।
    राजस्थान के अनेक दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक समाचार पत्र साहित्य को प्रमुखता देते हुए अपने परिशिष्ट प्रकाशित करते हैं। साहित्यिक लघु पत्र-पत्रिकाओं के सम्बन्ध में कहा जा सकता है कि ’लहर‘, ’बिन्दु‘, ’वातायन‘ ‘कृति ओर’ और ’पुरोवाक‘ आदि अनेक पत्रिकाओं ने हिन्दी जगत में अपनी पहचान बनाई। लघु संसाधनों के बावजूद भी इन पत्रिकाओं ने बड़े पाठक वर्ग तक अपनी पहुंच का दायरा बनाया।
    वैसे तो राजस्थान से अनेक लघु पत्र पत्रिकाएं प्रकाशित हुई और हो रही है किंतु यहां कुछ प्रमुख पत्रिकाओं की चर्चा इस आश्य से कर रहा हूं कि इस दिशा में व्यापक शोध-खोज से नए तथ्य प्रकाश में आएंगे। यहां किसी पत्रिका अथवा संपादक के कार्य का मूल्यांकन कम या अधिक के आधार पर नहीं किया जा रहा है, यह तो बस एक विहंगम परिदृश्य को देखने देखाने का प्रयास भर है।
अक्सर : त्रैमासिक रूप में प्रकाशित होने वाली इस पत्रिका के संपादक प्रख्यात कवि हेतु भारद्वाज है। जयपुर राजस्थान से प्रकाशित इस पत्रिका के अपने खास तेवर हैं। इस पत्रिका में जहां हिंदी साहित्य की विविध गतिविधियों और घटनाक्रम को समाहित किया जाता है वहीं परंपरा बोध के परिपेक्ष्य में साहित्यिक आलेख और अन्य सामग्री दी जाती है। गहरी सूझ-बूझ और विचारोत्तेजकता देख सकते हैं।
अनुकृति : यह त्रैमासिक पत्रिका जयश्री शर्मा के संपादन में जयपुर से प्रकाशित होती है।
अनुक्षण- प्रयास संस्थान चूरू की त्रैमासिक पत्रिका अनुक्षण के संपादक उम्मेद सिंह गोठवाल हैं। वर्ष 2015 में आरंभ हुई इस पत्रिका में कविता, कहानी, साक्षात्कार, संस्मरण आदि विधाओं को शामिल कर इसे भरा पूरा बनाए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
अभिनव संबोधन- इसका प्रवेशांक हाल ही में आया है। इसमें दो अनुभवी रचनाकार जुड़े हुए हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि इनके द्वारा बेहतर काम होगा। प्रसिद्ध संपादक कमर मेवाड़ी पत्रिका के सलाहकार संपादक हैं तथा कहानीकार-कवि माधव नागदा संयुक्त संपादक है।
अरावली उद्घोष : इसका मासिक प्रकाशन उदयपुर से होता है। इसके संपादक बी पी वर्मा पथिक हैं। आदिवासी मीडिया व साहित्य के लिए समर्पित यह पत्रिका उल्लेखनीय है।
इतवारी पत्रिका : यह राजस्थान पत्रिका का प्रकाशन था, जिसमें प्रति रविवार साहित्य के अतिरिक्त समाज,देश और राजनीति पर साहित्यिक दृष्टिकोण से सजग साहित्यकारों के वैचारिक आलेख प्रकाशित होते थे। बड़े प्रकाशन समूह से जुड़े होने के बाद भी इतवारी पत्रिका ने व्यवसायिकता के साथ साहित्यिक दृष्टिकोण से लंबा सफर तय किया।
उत्पल : बोधि प्रकाशन द्वारा साहित्यिक पत्रिका प्रकाशन के क्रम में ‘उत्पल’ पत्रिका आरंभ की गई। कवि-संपादक और प्रकाशक मायामृग ने पत्रिका बड़े साज-सज्जा के साथ निकाली किंतु इसे नियमित नहीं रखा जा सका। इसके अंक संग्रहणीय कहे जा सकते हैं।
एक और अंतरीप : जयपुर से अजय अनुरागी इस पत्रिका को पिछले 23 वर्षों से प्रकाशित कर रहे हैं। इसका ताजा अंक अप्रैल-जून, 2017 को वरिष्ठ लेखक हेतु भारद्वाज पर केन्द्रित किया गया है।
कथारंग- युवा नाटककार-कवि हरीश बी. शर्मा ने बीकानेर शहर और संभाग में कथा साहित्य की परंपरा में तेजी से आए बदलावों को केंद्रित करते हुए अनेक कहानीकारों को कथारंग पत्रिका के माध्यम से मंच दिया है। यह एक अनुपम उदाहरण है कि किसी क्षेत्र विशेष में इतनी संख्या में कथाकार हो सकते हैं। इसका नया और तीसरा अंक लघुकथा पर केंद्रित आया है।
कथाराज- श्रीडूंगरगढ़ जब चूरू जिले में था तब यह कहानी केंद्रित पत्रिका चेतन स्वामी के संपादन में प्रकाशित होती थी। राजस्थान में नई कहानी के दौर में इस पत्रिका की अहम भूमिका रही है। 
कालबोध : प्रख्यात लेखक यादवेन्द्र शर्मा ‘चंद्र’ ने बीकानेर से कालबोध पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया। विशेष रूप से यह गद्य साहित्य और कथा केंद्रित पत्रिका कही जाती थी। बाद में 1957-58 के आस पास ‘नई चेतना’ नाम से पत्रिका का प्रकाशन किया गया।
किरसा : सूरतगढ़ से युवा साहित्यकार सतीश छिम्पा ने इस अनियतकालीन पत्रिका के तीन चार अंक प्रकाशित हुए। इसमें युवा रचनाशीलता के साथ संपादक की गहरी सूझ-बूझ देखी जा सकती है।
कुरजा संदेश : पत्रकर लेखक ईश मधु तलवार के संपादन में इस पत्रिका के अनेक विशेषांकों से कीर्तिमान स्थापित किया है। इसके सभी विशेषांक बेहद चर्चित रहे हैं। फिलहाल राजस्थानी कहानी पर केंद्रित भव्य और विशाल विशेषांक चर्चा के केंद्र में है।
कृति ओर- वरिष्ठ कवि विजेंद्र और डॉ. रमाकांत शर्मा के संयुक्त प्रयासों से इस पत्रिका ने कविता और आलोचना के क्षेत्र में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बनाया है। अपनी सुदीर्घ यात्रा में यह पत्रिका रुकी पर कभी झुकी नहीं। लंबे अंतराल पर भी अपने पाठकों-लेखकों का विश्वास बनाए रखा। इस पत्रिका का “लोकधर्मी कविता विशेषांक” अंक 60-61 विशेष चर्चा में रहा। इसका नया अंक 83-84 जनवरी-जून, 2017 विजेंद्र के निर्देशन में संपादक अमीरचंद वैश्य द्वारा प्रकाशित किया गया है।
खोजो और जाने : यह पत्रिका विद्या भवन उदयपुर की है जो शिक्षा जगत और समाजिक वैचारिकता पर केंद्रित है।
चर्चा : जोधपुर के कवि योगेन्द्र दवे ने लंबे समय तक कविता के विविध रूपों पर केंद्रित इस पत्रिका को चलाया। चर्चा के कवि और कविता पर केंद्रित अनेक अंक चर्चा में रहे।
तटस्थ : सीकर के शोध विद्वान डॉ. कृष्णबिहारी सहल ने इस त्रैमासिक पत्रिका को लघुपत्रिकाओं के निराशाजनक दौर में चालीस से अधिक वर्ष सतत सक्रिय बनाए रखा। यह बहुत पुरानी पत्रिका है जिसमें रचनात्मकता व विविधता किसी व्यवसायिक पत्रिका से कमतर नहीं है।
दृष्टिकोण : यह पत्रिका नरेन्द्र कुमार चक्रवर्ती कोटा से प्रकाशित कर रहे हैं।
नई गुदगुदी- जयपुर से प्रकाशित होने वाली इस पत्रिका का आकार भले छोटा हो किंतु हास्य और व्यंग्य के क्षेत्र में इसका बहुत नाम है। वर्षों से सक्रिय इस पत्रिका ने अनेक लेखकों और व्यंग्यकारों को जहां मंच दिया, वहीं सही और सच्ची बात करने से भी कभी गुरेज नहीं किया।
नजरिया : युवा कवि दिनेश चारण ने 2013 में इस पत्रिका को आरंभ किया और अब तक के प्रकाशित अंकों के आधार पर वे संभावनाओं से भरे संपादक के रूप में छवि बना चुके हैं। नजरिया में भाषा, साहित्य और संस्कृति के साथ समग्र कला माध्यमों को एक नजरिये से देखने-परखने और प्रस्तुत करने का साहस देखा जा सकता है। एक पुस्तक पर अनेक समीक्षकों से मूल्यांकन और भारतीय भाषाओं की रचनाओं को हिंदी में प्रस्तुत करना इसकी अन्य विशेषता कही जा सकती है। 
नया शिक्षक : शिक्षा विभाग राजस्थान की इस द्विभाषी पत्रिका का प्रकाशन त्रैमासिक होता था। इसका शिक्षा जगत में बड़ा नाम रहा है। इसमें साहित्यिक पुस्तकों की समीक्षा का अपना स्तर था। 
परंपरा- राजस्थानी शोध संस्थान जोधपुर की इस शोध पत्रिका ने अपनी सुदीर्घ यात्रा में राजस्थान और राजस्थानी को केन्द्र में रखा। इसके अनेक अंक आज भी स्मरणीय और धरोहर के रूप में याद किए जाते हैं। प्राचीन, मध्यकालीन साहित्य और अप्रकाशित साहित्य भंडार पर उल्लेखनीय कार्य हुआ।
पुरोवाक- पीयूष दईया के संपादन का यह उनकी पत्रकारिता का पहला आस्वाद था। इसमें निर्मल वर्मा और कृष्ण बलदेव बैद सरीखे लेखकों के साथ राजस्थान के कला जगत को और आधुनिक दृष्टिकोण को केंद्र में रखा गया था। एक दो अंकों के बाद इसका प्रकाशन स्थगित हो गया।
प्रतिलिपि : कवि गिरिराज किराडू ने इसे आरंभ में इंटरनेट पर और बाद में प्रिंट रूप में प्रकाशित किया। विशेष चयन दृष्टि और कुछ प्रिय लेखकों-कवियों के रचना-संसार में एक नए लेखक की उत्सुकता और सम्मान की दृष्टि यहां देखी जा सकती है। वर्तमान में भी अपनी वेव साइट और प्रिंट अंकों से कुछ खास रुचि के रचनाकारों पर इनका कार्य मंथर गति से चल रहा है।
प्रतिश्रुति : इसे जोधपुर से साहित्यकार रामप्रसाद दाधीच ने त्रैमासिक प्रकाशित किया। मरुधर मृदुल द्वारा संपादित यह पत्रिका लगभग दस वर्षों तक राजस्थान की रचनाशीलता को व्यापक परिदृश्य में स्थापित करती रही।
बनास : संपादक पल्लव ने उदयपुर से ’बनास‘ का प्रकाशन आरंभ में अनियतकालीन रखा। अब यह दिल्ली से प्रकाशित हो रही है। यह साहित्य में व्यक्ति और साहित्य केंद्रित उपक्रम से अपने हर अंक में एक नयी और जीवंत बहस को स्थापित करने वाली पत्रिका है। ‘काशी का अस्सी‘ के बहाने इस पत्रिका ने हिन्दी उपन्यास के स्वरूप पर गंभीर बहस कर साहित्यकारों एवं पाठकों का ध्यान खींचा। समकालीन रचनाशीलता पर किसी कृति अथवा कृतिकार पर अंक प्रकाशित करना संपादक की जिद और जनून है, जिसके रहते वे हर बार असंभव दिखने वाला कार्य संभव कर दिखाते हैं।
बाल वाटिका- प्रख्यात बाल साहित्यकार भैरूंलाल गर्ग ने बाल साहित्य के क्षेत्र में अनुपम काम कर दिखया है। अब तक दो सौ पचास से अधिक अंकों में बाल वाटिका राजस्थान ही नहीं वरन देश की ऐसी पत्रिका है जिसे बाल साहित्य के क्षेत्र में किसी भी प्रकार की चर्चा से पृथक नहीं किया जा सकता है। बाल साहित्य की विविध विधाओं और आलोचना के साथ विचार-विमर्श में संपादक भैरूंलाल गर्ग की गहरी सूझ-बूझ और प्रखर दृष्टि देखी जा सकती है।
बालहंस (पाक्षिक) राजस्थान पत्रिका के इस प्रकाशन ने बाल पाठकों में अपना गहरा स्थान बनाया है। यह पत्रिका राष्ट्रीय स्तर भी चर्चित और लोकप्रिय पत्रिका रही है।
मधुमति- राजस्थान सहित्य अकादमी की मासिक पत्रिका मधुमति की सुदीर्घ यात्रा रही है। यह उदयपुर से नियमित प्रकाशित हो रही है। वर्तमान में डॉ. इन्दुशेखर ‘तत्पुरुष’ अपनी साहित्यिक दृष्टि से इस पत्रिका को एक नया स्वरूप देने में संलग्न हैं।
मरूदीप - बीकानेर से प्रकाशित होने वाली इस पत्रिका में मक्खन जोशी का योगदान रहा। चौथा सप्तक के कवि आलोचक डॉ. नंदकिशोर आचार्य की ख्याति संपादक-पत्रकार के रूप हुई जिसमें इस पत्रिका का स्मरण किया जाता हैं। अपने वैचारिक आलेखों और रचनात्मकता से मरूदीप ने अपने समय में पूरे देश का ध्यान आकृषित किया।
मरूभारती- बिड़ला एज्यूकेशन ट्रस्ट, पिलानी की यह पत्रिका लंबे समय तक प्रकाशित होती रही। इसने शोध-खोज की दिशा में सराहनीय कार्य किया।
मारवाड़ी डाइजेस्‍ट : इसके संपादक रतन जैन, पडि़हारा (चूरू) हैं। यह नियमित प्रकाशन है।
लहर- प्रकाश जैन के संपादन में प्रकाशित होने वाली इस पत्रिका का साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में बड़ा नाम रहा है।
वरदा- राजस्थान साहित्य समिति बिसाऊ की यह शोध पत्रिका डॉ. मनोहर शर्मा के संपादन में देश-दुनिया में चर्चित रही है। प्रचानी और मध्यकालीन साहित्य पर इस पत्रिका ने विशद कार्य किया है।
वातायन- बीकानेर के कवि हरीश भादाणी ने अपने संघर्ष के दिनों में अपने मित्रों के साथ तत्कालीन हिंदी साहित्य में इसे वरेण्य पत्रिका बना दिया था। वातायन चर्चा और विचार विमर्श के साथ समकालीन रचनाशीलता की प्रमुख पत्रिका रही। लंबे अर्से बाद इसका पुनर्प्रकाशन भी हुआ किंतु फिर से इसे बंद करना पड़ा। सूर्यप्रकाशन मंदिर के सूर्यप्रकाश बिस्सा ने भी वातयन के पुनर्प्रकाशन का दायित्व संभाला किंतु यह नियमित नहीं हो सकी।
विकल्प- बीकानेर के अजीत फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित इस पत्रिका में वैचारिक आलेख, शोध और समीक्षा आदि प्रकाशित होती है।
शबनम ज्योति : इस अनियतकालीन पत्रिका का संपादन अब्दुल समद राही सोजत सिटी से करते हैं। वे पिछले तीस वर्षों से पत्रकारिता से जुड़े हैं। इस पत्रिका में राजस्थान के लेखकों की विविध विधाओं की रचनाओं को महत्त्व दिया जा रहा है। प्रतिष्ठ रचनाकारों के साथ नए और उदयीमान रचनाकारों के उत्थान में इस पत्रिका का सराहनीय योगदान रहा है।
शिविरा- शिक्षा विभाग राजस्थान की बीकानेर से प्रकाशित होने वाली इस शैक्षिक पत्रिका के प्रत्येक अंक में पुस्तक समीक्षाएं प्रकाशित होती है। इसका प्रचार-प्रसार पूरे राजस्थान के गांव गांव ढाणी ढाणी में है क्यों कि इसमें शिक्षा विभाग के आदेश प्रकाशित होते हैं। विगत वर्षों से सितम्बर महिने का अंक साहित्य की विविध विधाओं पर केंद्रित किया जा रहा है जिसमें राजस्थान के सृजनशील कर्मचारियों की रचनाशीलता को देखा जा सकता है।
शेष : त्रैमासिक पत्रिका के रूप में हसन जमाल ने इसे राजस्थान की सीमाओं से बाहर पाकिस्तान तक में लोकप्रिय बनाया है। वे इसे जोधपुर से विगत 16 वर्षों से प्रकाशित करा रहे हैं। इस पत्रिका में शोध-खोज के साथ विषय केंद्रित विशेषांक अपनी पूरी गरिमा और गंभीरता के साथ प्रकाशित किए गए हैं।
संबोधन- यह त्रैमासिक पत्रिका कमर मेवाड़ी के संपादन में कांकरोली (राजसमंद) से प्रकाशित हो रही है। पिछले 44 वर्षों से नियमित प्रकाशित हो रही इस लघु पत्रिका ने अनेक कीर्तिमान स्थापित किए हैं। इसके अनेक महत्त्वपूर्ण विशेषांकों को राजस्थान की हिंदी पत्रिकारित के क्षेत्र में उल्लेखनीय कहे जा सकते हैं। इसमें विविधतापूर्ण रचनाओं का प्रकाशन होता है। विविध विधाओं और स्थापित रचनाकारों के साथ नए लेखकों को स्थान मिलता रहा है। कुछ ऐसे भी विशेषांक आए है जिनका संपादन संपादन ने राजस्थान के बाहर के रचनाकारों को सौंप कर इस पत्रिका की गरिमा को बढ़ाया है।
संस्कृति-मीमांसा : इसमें चिंतनपरक सांस्कृतिक लेखों और टिप्पणियों के साथ ही सृजनात्मक पक्षों को भी यथोचित स्थान दिया जाता है। समान्तर संस्थान जयपुर से आलोचक राजाराम भादू ने इसे विचारोत्तेजक आलेख और संवाद की पत्रिका के रूप में लोकप्रिय बनाया है।
समय माजरा : यह मासिक प्रकाशन है जिसका प्रकाशान राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हिन्दी भवन, जयपुर से होता है। यह विगत 17 वर्षों से प्रकाशित हो रही है। विचार, सृजन और जनसरोकारों की इस पत्रिका के संपादक ओम सैनी हैं। 
साहित्य समर्था- नीलिमा टिक्कू इस पत्रिका की संस्थापक और संपादिका हैं। वे एक रचनाकार के साथ-साथ स्पंदन महिला साहित्यिक संस्थान जयपुर की अध्यक्ष के रूप में भी सक्रिय हैं। विगत 6 वर्षों से प्रकाशित होने वाली इस त्रैमासिक पत्रिका के वरिष्ठ महिला रचनाकारों पर केंद्रित अंक चर्चा में रहे हैं। पद्मश्री सम्मान से सम्मानित लेखिका डॉ. सुनीता जैन के रचनाकर्म पर केंदित अंक अप्रैल-जून 2016 आदि साहित्य समाज में व्यापक चर्चा का विषय रहे हैं। इसके प्रत्येक अंक को विख्यात साहित्यकारों पर केंद्रित कर उनके अवदान पर चर्चा की जाती है।
सिम्पली जयपुर : इस पत्रिका में पुस्तक समीक्षा और साहित्यिक विषय पर आलेख के अतिरिक्त वर्तमान सरोकारों के साथ समय, समाज और राजनीति की चर्चा विशेष रहती है।
सुजस- सूचना एवं जनसंपर्क निदेशालय, राजस्थान जयपुर की इस पत्रिका को साहित्यिक नहीं कहा जा सकता किंतु जिस लकदक साज-सज्जा और रंग-रूप में यह प्रकाशित होती है वह उल्लेखनीय है। इसमें साहित्य, कला व संस्कृति के विविध घटकों को समाहित किया जाता है।
सृजन कुंज : विगत चार वर्षों से श्रीगंगानगर से पत्रकार और व्यंग्यकार कृष्णकुमार आशु इस पत्रिका का त्रैमासिक प्रकाशन कर रहे हैं। सृजन कुंज सीमित संसाधनों के उपरांत भी महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहा है। इन दिनों इस पत्रिका का ‘महिला लेखन अंक’ चर्चा में है।
    कहना होगा कि हिन्दी भाषी व्यापक समाज में इन और ऐसी लघुपत्रिकाओं की आवश्यकता सदा बनी हुई है और आलोच्य पत्रिकाओं के साथ सैकडों छोटी-बडी पत्रिकाएँ यह दायित्व पूरा भी कर रही है। राजस्थान में अनेक पत्रिका प्रकाशित हुई, बंद हुई। कुछ का स्मरण यहां अपनी सीमाओं के कारण नहीं हो सका है उसके लिए लेखक खेद व्यक्त करता है। ऐसे छूटे हुए संपादक इसे अन्यथा नहीं लेंगे। जो पत्रिकाएं अपने संसाधनों से प्रकाशित हो रही हैं, वे निसंदेह सम्मान की अधिकारी हैं।
    वर्तमान में प्रतिलिपि, अपनी माटी, हस्ताक्षर आदि अनेक ई-पत्रिकाएं नई तकनीक से जुड़ते हुए इस कार्य में नई संभावनाओं के साथ सामने आ रही है। अनेक दैनिक समाचार पत्र नियमित रूप से अथवा साप्ताहिक रूप से साहित्य पर केंद्रित अपने परिशिष्टों से अनेक रचनाकारों को सक्रिय बनाए हुए हैं, वहीं साहित्यिक परिदृश्य को विकासित करने में दूरदर्शन और आकाशवाणी का भी सराहनीय योगदान है। यह आलेख राजस्थान की साहित्यिक पत्रकारिता का एक आइना भर है, इस विषय में अनेक तथ्यों और संभावनाओं को जोड़ा जाना शेष है। यह तो बस एक आगाज है, इसका अंजाम आपके सहयोग से ही होगा।
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लालित्य ललित की व्यंग्य-यात्रा - डॉ. नीरज दइया

     “किसी पर ऐसे मजाक कर जाना, जो किसी को चुभे भी नहीं और अपना काम भी कर जाए।” यह आत्मकथन हमें लालित्य ललित के पहले व्यंग्य संग्रह के लिए लिखे उनके आरंभिक बयान ‘मेरी व्यंग्य-यात्रा’ में मिलता है। उनके दोनों व्यंग्य संग्रह ‘जिंदगी तेरे नाम डार्लिंग’ (2015) और ‘विलायतीराम पांडेय’ (2017) इस आत्मकथन पर एकदम खरे उतरते हैं। यह कथन उनकी इस यात्रा की संभवानाओं और सीमाओं का भी निर्धारण करने वाला है। यहां यह भी उल्लेख आवश्यक है कि दोनों व्यंग्य संग्रह की भूमिका प्रख्यात व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय ने लिखी है। जनमेजय ने प्रशंसात्मक लिखते हुए अंत में रहस्य उजागर कर दिया कि वे नए व्यंग्यकार लालित्य ललित के प्रथम व्यंग्य संग्रह का नई दुल्हन जैसा स्वागत कर रहे हैं। ‘उसकी मुंह-दिखाई की, चाहे कितनी भी काली हो, प्रशंसा के रूप में शगुन दिया और मुठभेड़ भविष्य के लिए छोड़ दी। ललित यदि इस प्रशंसा से कुछ अधिक फूल गए तो यह उनके साहित्यिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होगा।’ जाहिर है कि अब मुठभेड़ होनी है और यह भी देखा जाना है कि उनका साहित्यिक स्वास्थ्य फिलहाल कैसा है क्यों कि उनका दूसरा व्यंग्य संग्रह भी आ चुका। दूसरे संग्रह ‘विलायतीराम पांडेय’ में भूमिका लिखते हुए प्रेम जनमेजय ने ‘दिवाली का सन्नाटा’ व्यंग्य रचना को लालित्य ललित की अब तक की रचनाओं में सर्वश्रेष्ठ कहा है। पहले व्यंग्य संग्रह को अनेक आरक्षण दिए जाने के उपरांत दूसरा संकलन जिस कठोरता और किंतु-परंतु के साथ परखे जाने की कसौटी के साथ ही आलोचना के विषय में भी अनेक संभावनाएं और सीमाओं का उल्लेख करते हुए मेरा काम आसान कर दिया है। साथ ही व्यंग्यकार लालित्य ललित ने अपने बयान में अपने व्यंग्यकार के विकसित होने में अनेक व्यंग्य लेखकों का स्मरण और आभार ज्ञाप्ति करते हुए पूरी प्रक्रिया को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। वहीं पहले संग्रज के फ्लैप पर ज्ञान चतुर्वेदी, यज्ञ शर्मा, डॉ. गिरिजाशरण अग्रवाल, सुभाष चंदर, हरीश नवल और गौतम सान्याल की टिप्पणियों को देख कर बिना व्यंग्य रचनाएं पढ़े ही लालित्य ललित को महान व्यंग्यकार कहने का मन करता है।
    मन को नियंत्रण में लेते हुए दोनों पुस्तकों में संग्रहित 66 व्यंग्य रचनाओं का गंभीरता से पाठ आवश्यक लगता है। यह गणित का आंकड़ा इसलिए भी जरूरी है कि दोनों व्यंग्य संग्रह में रचनाएं का जोड़ 67 हैं पर एक व्यंग्य ‘पांडेजी की जलेबियां’ दोनों व्यंग्य संग्रहों में शामिल है। यहां यह कहना भी उचित होगा कि इन दोनों व्यंग्य संग्रह में लालित्य ललित ने व्यंग्य के नाम पर कुछ जलेबियां पेश की है। वैसे भी व्यक्तिगत जीवन में आप स्वाद के दीवाने हैं और संग्रह के अनेक व्यंग्य आपके इसी स्वाद के रहते जरा स्वादिष्ठ हो गए हैं। जाहिर है कि आपकी इन जलेबियों में आपके अपने निजी स्वाद की रंगत और कलाकारी है जो आपको अन्य व्यंग्यकारों से अलग सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है। कलाकारी इस अर्थ में कि लालित्य ललित कवि के रूप में जाने जाते हैं और संख्यात्मक रूप से भी आपकी कविताओं की किताबों का कुल जमा आंकड़ा डराने वाला है। अपनी धुन के धनी ललित का 32 वां कविता संग्रह "कभी सोचता हूं कि" आ रहा है। ऐसे में बिना पढ़े-सुने उन्हें कवि-व्यंग्यकार मानने वाले बहुत है तो जाहिर है उनके व्यंग्यकार की पड़ताल होनी चाहिए जिससे वास्तविक सत्य उजागर हो सके। उनके कवि की बात फिर कभी फिलहाल व्यंग्यकार की बात करे तो गद्य को कवियों का निकष कह गया है। निबंध गद्य का निकष कहा जाता है, इसमें व्यंग्य को भी समाहित ही नहीं विशेष माना जाना चाहिए। अस्तु कवि-कर्म को कसौटी व्यंग्य भी है।
    लालित्य ललित के व्यंग्य की तुलना किसी अन्य व्यंग्यकार ने इसलिए नहीं की जा सकती कि उन्होंने स्वयं की एक शैली विकसित करने का प्रयास किया है। उनके व्यंग्य किसी अन्य व्यंग्यकार या हिंदी व्यंग्य की मुख्य धारा से अलग अपने ही तरह के व्यंग्य लेखन का परिणाम है। उनकी यह मौलिकता उनकी निजता भी है जो उन्हीं के आत्मकथन मजाक करने में उनकी अपनी सावधानी कि किसी को चुभे नहीं और अपना काम कर जाए की कसौटी के परिवृत में समाहित है। उनकी रचनाओं का औसत आकार लघु है और कहना चाहिए कि आम तौर पर दैनिक समाचार पत्रों को संतुष्ट करने वाला है। जहां उन्होंने इस लघुता का परित्याग किया है वे अपने पूरे सामर्थ्य के साथ उजागर हुए हैं। साथ ही यह भी कि वे व्यंग्यकार के रूप में भी अनेक स्थलों पर अपने कवि रूप को त्याग नहीं पाए हैं। सौंदर्य पर मुग्ध होने के भाव में उनकी चुटकी या पंच जिसे उन्होंने मजाक संज्ञा के रूप चिह्नित किया है चुभे नहीं की अभिलाषा पूरित करता है।
    व्यंग्य का मूल भाव ‘दिवाली का सन्नाटा’ में इसलिए प्रखरता पर है कि उन्होंने करुणा और त्रासदी को वहां चिह्नित किया है। इस व्यंग्य के आरंभ में पैर और चादर का खेल भाषा में खेलते हुए वे चुभते भी है और अपना काम भी करते हैं। मूल बात यह है कि उनका यह चुभना अखरने वाला नहीं है। उनकी व्यंग्य-यात्रा में कुछ ऐसे भी व्यंग्य हैं जहां उनका नहीं चुभना ध्यनाकर्षक का विषय नहीं बनता है। यहां यह भी कहना आवश्यक है कि इसी व्यंग्य का बहुत मिलता जुलता प्रारूप इसी संग्रह में संकलित अन्य व्यंग्य ‘महंगाई की दौड़ में पांडेयजी’ में देखा जा सकता है। जाहिर है मेरी यह बात चुभने वाली हो सकती है पर अगर इसने अपना काम किया तो आगामी संग्रहों में ऐसा कहने का अवसर किसी को नहीं मिलेगा। सवाल यहां यह भी उभरता है कि विलायतीराम पांडेय ने क्या सच में अपने परिवार की खुशी के लिए किडनी का सौदा कर लिया है। यह हो सकता है कहीं हुआ भी हो किंतु यहां मूल भाव ऐसा किया जाने में जो करुणा है वह रेखांकित किए जाने योग्य है। आधुनिक जीवन में घर-परिवार और बच्चों की फरमाइशों के बीच पति और पिता का किरदार निभाने वाला जीव किस कदर उलझा हुआ है। लालित्य ललित की विशेषता यह है कि वे इस पिता और खासकर पति नामक जीव की पूरी ज्यामिति वर्तमान संदर्भों-स्थितियों में उकेरने की कोशिश करते हैं।
    उनका मुख्य पात्र विलायतीराम पांडेय दोनों संग्रहों में सक्रिय है और दूसरे में तो वह पूरी तरह छाया हुआ है। धीरे धीरे उसकी पूरी जन्म कुंडली हमारे सामने आ जाती है। नाम- विलायतीराम पांडेय, पिता का नाम- बटेशरनाथ पांडेय, माता का नाम- चमेली देवी, पत्नी- राम प्यारी यानी दुलारी और दोस्त- अशर्फीलाल जैसे कुछ स्थाई संदर्भ व्यंग्यकार ने अपने नाम करते हुए विगत चार-पांच वर्षों का देश और दुनिया का एक इतिहास इनके द्वारा हमारे समाने रखने का प्रयास किया है। यहां दिल्ली और महानगरों में परिवर्तित जीवन की रंग-बिरंगी अनेक झांकियां है तो उनके सुख-दुख के साथ त्रासदियों का वर्णन भी है। पति-पत्नी की नोक-झोंक और प्रेम के किस्सों के साथ एक संदेश और शिक्षा का अनकहा भाव भी समाहित है। कहना होगा कि लालित्य ललित मजाक मजाक में अपना काम भी कर जाते हैं। यहां व्यंग्य का मूल केवल कुछ पंक्तियों में निहित नहीं है, वरन व्यंग्य का वितान जीवन के इर्द-गिर्द दिखाई देता है। स्वार्थी और मोल-भाव करने वाले प्राणियों के बीच इन रचनाओं का नायक विलायतीराम पांडेय कहीं-कहीं खुद व्यंग्यकार लालित्य ललित नजर आता है तो कहीं-कहीं उनके रंग रूप में पाठक भी स्वयं को अपने चेहरों को समाहित देख सकते हैं। आज का युवा वर्ग इन रचनाओं में विद्यमान है। उसके सोच और समझ को व्याख्यायित करते हुए एक बेहतर देश और समाज का सपना इनमें निहित है।
    यहां लालित्य ललित की अब तक की व्यंग्य-यात्रा के सभी व्यंग्यों की चर्चा संभव नहीं है फिर भी उनके दोनों संग्रहों से कुछ पंक्तियां इस आश्य के साथ प्रस्तुत होनी चाहिए कि जिनसे उनके व्यंग्यकार का मूल भाव प्रगट हो सके। पहले व्यंग्य संग्रह से कुछ उदाहरण देखें- ‘आप भारतीय हैं यदि सही मायनों में, तो पड़ोसी से जलन करना, खुन्नस निकालना आपका जन्मसिद्ध अधिकार है।’ (पृष्ठ-15); ‘जमाना चतुर सुजानों का है। मक्खन-मलाई का है, हां-जी, हां-जी का है, अगर आप यह टेक्नीक नहीं सीखोगे तो मात खा जाओगे, दुनियादारी से पिछड़ जाओगे।’ (पृष्ठ-20); ‘मगर यह बॉस किसिम के जीव जरा घाघ प्रजाति के होते हैं, जो न आपके सगे होते हैं और संबंधी तो बिल्कुल नहीं।’ (पृष्ठ-29); ‘सांसारिक लोगों का हाजमा होता ही कमजोर है।’ (पृष्ठ-37); ‘इन दिनों बड़ा लेखक छोटे को कुछ नहीं समझता तो छोटा लेखक बड़े को बड़ा नहीं समझता, हिसाब-किताब बराबर।’ (पृष्ठ-52); ‘जो लेते हैं मौका, वही माते हैं चौका।’ (पृष्ठ-58); ‘यह हिंदुस्तान है, यहां कुछ भी हो सकता है। अंधे का ड्राइविंग लाइसेंस बन सकता है। मृत को जीवित बनाया जा सकता है।’ (पृष्ठ-65);  ‘यही तो भारतीय परंपरा है- हम एक बार किसी से कुछ उधार लेते हैं तो देते नहीं।’ (पृष्ठ-92) आदि
    कुछ उदाहरण दूसरे व्यंग्य संग्रह से- ‘विलायतीराम पांडेय ने सोचा पल्ले पैसा हो तो साहित्यकार क्या, मंच क्या, अखबार क्या कुछ भी मैनेज किया जा सकता है।’ (पृष्ठ-21); ‘घूस देना आज राष्ट्रीय पर्व बन चुका है। अपने दी, आपकी फाइल चल पड़ी और नहीं दी तो आपका काम अटक गया, भले ही आप कितने बड़े तोपची हों।’ (पृष्ठ-24); ‘एक वो जमान था, एक अब जमाना है। बच्चे पहले तो सुन लेते थे, पर अब लगता है जैसे हम भैंक रहे हैं और वह अनसुना करने में यकीन करते हैं।’ (पृष्ठ-28); ‘कामवाली बाई भी वाट्सअप पर बता देती है, आज माथा गर्म है, मेमसाब, नहीं आ पाऊंगी, वेशक पगार काट लेना। (पृष्ठ-30); ‘बाजार में नोटबंदी के चलते कर्फ्यू-सा माहौल था।’ (पृष्ठ-38); ‘अब देश के नेता बाढ़ में जाने के बजाय अपना दुःख ट्विटर पर व्यक्त कर देते हैं।  (पृष्ठ-66); ‘मंदी ने बजाया आज सभी का बाजा, लेकिन राजनेताओं का कभी नहीं बजता बाजा, पता नहीं वो दिन कब आएगा।’ (पृष्ठ-80); ‘नंगापन क्या समाज के लिए अनिवार्य योग्यताओं में शामिल एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है। कितने पोर्न पसंदीदा हो गए हम।’ (पृष्ठ-92); आदि उदाहरणो से जाहिर है कि उनके यहां विषय की विविधा के साथ समसामयिक स्थितियों से गहरी मुठभेड भी है। वे साहित्य और समाज के पतन पर चिंतित दिखाई देते हैं और साथ ही जनमानस की बदलती प्रवृतियों और लोक व्यवहार को रेखांकित करते हुए कुछ ऐसे संकेत छोड़ते हैं जिन्हें पाठकों को पकड़ना है। वे अपनी बात पर कायम है कि उनका कोई भी मजाक हिंसक नहीं है वरन वे अहिंसा के साथ उस रोग और प्रवृत्ति को स्वचिंतन से बदलने का मार्ग दिखलाते हैं।
    लालित्य ललित के पास गद्य का एक कौशल है जिसके रहते वे किसी उद्घोषक की भांति अपनी बात कहते हुए आधुनिक शव्दावली में अपने आस-पास के बिम्ब-विधान के साथ नए रूपकों को निर्धारित करने का प्रयास करते हैं। काफी जगहों पर हम व्यंग्य में कवि के रूप में ‘यमक’ और ‘श्लेष’ अलंकारों पर उनका मोह भी देख सकते हैं। एक उदाहरण देखें- ‘बॉस यदि शक्की है तो आपको ‘ऐश’ हो सकती है, बच्चन वाली ‘ऐश’ नहीं। नहीं तो अभिषेक की ठुकाई के पात्र बन सकते हैं।’ (‘जिंदगी तेरे नाम डार्लिंग’, पृष्ठ-35) वे व्यक्तिगत जीवन में खाने और जायकों के शौकीन हैं तो उनके व्यंग्य में ऐसे अनेक स्थल हैं जहां उनकी इस रुचि के रहते हमें मजेदार परांठों और पकौड़ों के बहुत स्वादिष्ट अनुभव ज्ञात होते हैं। नमकीन और मिठाई पर उनकी मेहरबानी कुछ अधिक मात्रा में है कि वे अपनी पूरी बिरादरी का आकलन भी प्रस्तुत करते हैं- ‘शुगर के मरीज लेखक लगभग अस्सी पर्सेंट हैं पर मुफ्त की मिठाई खाने में परहेज कैसा!’ (‘विलायतीराम पांडेय’, पृष्ठ-16)
    विलायतीराम पांडेय उनके लिए सम्मानित पार है और वे उसे यत्र-तत्र ‘नत्थू’ बनने की प्रविधियों में बचाते भी हैं। भारतीय पतियों और पत्नियों के संबंधों में मधुता होनी चाहिए इस तथ्य की पूर्ण पैरवी करते हुए भी पतियों और पत्नियों की कुछ कमजोरियों को भी वे बेबाकी के साथ उजागर भी करते हैं। जैसे संग्रह ‘जिंदगी तेरे नाम डार्लिंग’ के दो उदाहरण देखिए- ‘अधिकतर मर्द जिनकी प्रायः बोलती घरों में बंद रहती है, यहां नाई की दुकान पर उनकी जबान कैंची की तरह चलती है।’ (पृष्ठ-78); ‘शादी-शुदा है यानी तमान बोझों से लदा-फदा एक ऐसा आदमी, जिसकी न घर में जरूरत है और न समाज में।’ (पृष्ठ-24) दूसरे संग्रह ‘विलायतीराम पांडेय’ से- ‘जिंदगी में क्या और किस तरह एक पति को पापड़ बेलने पड़ते हैं यह पति ही जानता है, जो दिन रात खटता है।’ (पृष्ठ-59); ‘हे भारतीय पुरुष ! तू केवल खर्चा करने को पैदा हुआ है। खूब कमा, पत्नियों पर खर्चा कर। बच्चों के लिए ए.टी.एम. बन।’ (पृष्ठ-74); ‘हद है यार, महिला दिखी नहीं कि छिपी हुई सेवा-भावना हर पुरुष की उजागर हो जाती है।’ (पृष्ठ-101)
    लालित्य ललित के व्यंग्यों में प्रतुक्त अनेक उपमाएं रेखांकित किए जाने योग्य है। वे परंपरागत उपमानों के स्थान पर नए और ताजे उपमान प्रयुक्त करते देखे जा सकते हैं। यह नवीनता बाजार की बदलती भाषा और रुचियों से पोषित है। वे एक ऐसे युवा चितेरे हैं जिन्हें अपनी परंपरा से गुरेज नहीं है तो साथ ही अतिआधुनिक समाज की बदलती रुचियों और लोक व्यवहार से अरुचि भी नहीं है। हलांकी वे कुछ ऐसे शब्दों को भी व्यंग्य में ले आते हैं जिनसे आमतौर पर अन्य व्यंग्यकार परहेज किया करते हैं अथवा कहें बचा करते हैं। ‘मेरा भारत महान, जहां मन हो थकने का और जहां मन हो मूतने का,कही कोई रूकावट नहीं है।’ (‘जिंदगी तेरे नाम डार्लिंग’, पृष्ठ-55) ये अति आवश्यक और सहज मानवीय क्रियाएं हैं। सभी का सरोकार भी रहता है फिर भी उनके यहां शब्दों की मर्यादा है और वे संकेतों में बात कहने में भी सक्षम है- ‘हम भारतीय इतने प्यारे हैं कि अपने शाब्दिक उच्चारण से किसी का भी बी.पी. यानी रक्तचाप तीव्र कर सकते हैं या आपकी चीनी घटा सकते हैं।’ (‘जिंदगी तेरे नाम डार्लिंग’, पृष्ठ-17);
    अंत में यह उल्लेखनीय है कि लालित्य ललित के व्यंग्य अपनी समग्रता और एकाग्रता में जो प्रभाव रचते हैं, वह प्रभावशाली है। ऐसा भी कहा जा सकता है कि वे संभवतः पृथक-पृथक अपनी व्यंजनाओं से हमें बेशक उतना प्रभावित नहीं करते भी हो किंतु धैर्यपूर्वक पाठ और उनकी सामूहिक उपस्थिति निसंदेह एक यादगार बनकर दूर तक हमारे साथ चलने वाली है। विविध जीवन स्थितियों से हसंते-हसंते मुठभेड करने वाला उन्होंने अपना एक स्थाई और यादगार पात्र रचा है। अब आप ही बताएं कि हिंदी व्यंग्य साहित्य की बात हो तो कोई भला विलायतीराम पांडेय को कैसे भूल सकता है।
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 लालित्य ललित के पास गद्य का एक कौशल है जिसके रहते वे किसी उद्घोषक की भांति अपनी बात कहते हुए आधुनिक शव्दावली में अपने आस-पास के बिम्ब-विधान के साथ नए रूपकों को निर्धारित करने का प्रयास करते हैं। काफी जगहों पर हम व्यंग्य में कवि के रूप में ‘यमक’ और ‘श्लेष’ अलंकारों पर उनका मोह भी देख सकते हैं। एक उदाहरण देखें- ‘बॉस यदि शक्की है तो आपको ‘ऐश’ हो सकती है, बच्चन वाली ‘ऐश’ नहीं। नहीं तो अभिषेक की ठुकाई के पात्र बन सकते हैं।’ (‘जिंदगी तेरे नाम डार्लिंग’, पृष्ठ-35)
वे व्यक्तिगत जीवन में खाने और जायकों के शौकीन हैं तो उनके व्यंग्य में ऐसे अनेक स्थल हैं जहां उनकी इस रुचि के रहते हमें मजेदार परांठों और पकौड़ों के बहुत स्वादिष्ट अनुभव ज्ञात होते हैं। नमकीन और मिठाई पर उनकी मेहरबानी कुछ अधिक मात्रा में है कि वे अपनी पूरी बिरादरी का आकलन भी प्रस्तुत करते हैं- ‘शुगर के मरीज लेखक लगभग अस्सी पर्सेंट हैं पर मुफ्त की मिठाई खाने में परहेज कैसा!’ (‘विलायतीराम पांडेय’, पृष्ठ-16)
लालित्य ललित के व्यंग्यों में प्रतुक्त अनेक उपमाएं रेखांकित किए जाने योग्य है। वे परंपरागत उपमानों के स्थान पर नए और ताजे उपमान प्रयुक्त करते देखे जा सकते हैं। यह नवीनता बाजार की बदलती भाषा और रुचियों से पोषित है। वे एक ऐसे युवा चितेरे हैं जिन्हें अपनी परंपरा से गुरेज नहीं है तो साथ ही अति आधुनिक समाज की बदलती रुचियों और लोक व्यवहार से अरुचि भी नहीं है।
लालित्य ललित के व्यंग्य अपनी समग्रता और एकाग्रता में जो प्रभाव रचते हैं, वह प्रभावशाली है। ऐसा भी कहा जा सकता है कि वे संभवतः पृथक-पृथक अपनी व्यंजनाओं से हमें बेशक उतना प्रभावित नहीं करते भी हो किंतु धैर्यपूर्वक पाठ और उनकी सामूहिक उपस्थिति निसंदेह एक यादगार बनकर दूर तक हमारे साथ चलने वाली है।
- नीरज दइया
(“लालित्य ललित 51 व्यंग्य रचनाएं” पुस्तक के दूसरे फ्लैप पर प्रकाशित टिप्पणी)

असंवेदनशील बयानों के बीच उलझती फिल्म / डॉ. नीरज दइया


कला के भीतर सतत साधना की मांग अंतर्निहित है। अन्य कला माध्यमों में अपेक्षाकृत सिनेमा के सर्वाधिक लोकप्रिय होने का श्रेय अथवा आधार सामूहिक रचनात्मक कहा जा सकता है। प्रत्येक कला माध्यम की अपने समाज के प्रति जबाबदेही होती है और होनी भी चाहिए। ऐसे में सिनेमा जैसे माध्यम में यह जिम्मेदारी और जबाबदेही सामूहिक है। संभवतः फिल्म ‘पद्मावती’ के निर्माण से जुड़े कलाकार दीपिका पादुकोण, शाहिद कपूर, रणवीर सिंह और निर्माता-निर्देशक इसलिए सामूहिक रूप से विवादों के घेरे में हैं। दोष किसी एक का नहीं फिर भी इसके सूत्रधार निर्देशन संजय लीला भंसाली हैं जिन्होंने फिल्म की पटकथा लिखी और साथ ही प्रकाश कपाड़िया जिनका नाम भी लेखक के रूप में दिया गया है। इस पूरे विवाद के बाद ताजा स्थिति में संजय लीला भंसाली का जबाब चर्चा में है- “फिल्म को लेकर सारा विवाद अफवाहों पर आधारित है। मैंने तथ्यों के साथ छेड़छाड़ नहीं किया है। फिल्म मलिक मुहम्मद जायसी के काव्य पर आधारित है।” यह उनका खुद को और फिल्म को बचने का एक संकट-द्वार है जिससे उम्मीद है कि वे इस प्रयास में बच सकते हैं। यदि मान भी लिया जाए कि इस फिल्म का आधार यह कृति है तो अब यह देखना होगा कि इनमें कितना साम्य है और कितने कहां बदलाव किए गए हैं। यह शोध-खोज का विषय है पर इतना जरूर है कि लोक विश्वास और ऐतिहासिक सत्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करना जनभावनाओं को आहत कर सकता है। बिना पर्याप्त तथ्यों के काल्पनिक अथवा सपने में ऐसा कुछ दिखाया जाना मनोवैज्ञानिक आधार एवं गहरी सूझ-बूझ की अपेक्षा तो रखता ही है।
    वैसे सत्य यह भी है कि आज स्त्री-पुरुष समानता की बातें करने वाले हमारे भारतीय समाज में राजस्थान का भी अपना एक अध्यय रहा है जिसमें स्त्री को पर्दों में रखा जाता था। यहां तक कि उसे पैर की जूती के बाराबर दर्जा दिया हुआ था। स्त्री-चेतना और अस्मिता की बात करें तो हमारे समक्ष प्राचीनतम उदाहरण कन्नड़ कवयित्री अक्क महादेवी और उसके बाद मध्यकालीन समय में मीरा है। इन संदर्भों और यात्रा के बीच एक अध्याय और सुनहरा पन्ना अपनी अस्मिता के लिए रानी पद्मिनी ने जौहर की आग में कूद कर रचा। अपनी आन-बान और शान पर आंच नहीं आने देना का यह अनुपम उदाहरण है। कहना होगा कि यह स्त्री जाति का प्रवल प्रतिरोध है कि उनका प्राणोत्सर्ग गरिमामय है। नारी जाति और रानी पद्मिनी के प्रति जनता में यह सम्मान है कि संजय लीला भंसाली की फिल्म-प्रोमो देखकर वे उसके तामझाम और चकाचौंध में नहीं उलझे। रानी पद्मावती के प्रति इसे उनकी श्रद्धा और सम्मान माना जाना चाहिए कि वे न्याय के लिए वगावत पर आमादा हुए।
    एक दूसरा पक्ष यह भी ध्यान दिए जाने योग्य है कि फिल्म को सेंसर बोर्ड से पास होने पहले चयनित दर्शकों को दिखाना अनुचित है। माना कि फिल्म के विरोधियों को फिल्म के बारे में पर्याप्त और पूरी जानकारी नहीं है। उन्हें नहीं पता कि ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ हुई है या यह उनका भ्रम है। भीड़ और विरोधी शोर में शामिल जनता की अपेक्षाएं भी अनुचित हो सकती है। कहा जा रहा है कि इतिहासकारों और प्रचलित कहानियों के अनुसार पद्मिनी की कहानी में गोरा-बादल प्रमुख चरित्र है, जिन्होंने राणा रतन सिंह की मदद की थी। इस विषय पर प्रसिद्ध कथाकार यादवेंद्र शर्मा ‘चंद्र’ की ‘गौरा-बादल’ पुस्तिका और पं. नरेन्द्र मिश्र की कविता बेहद लोकप्रिय है। वहीं पद्मावती की कहानी और संदर्भ ‘भारत एक खोज’ (जवाहर लाल नेहरू) में भी आता है। जिसे पर्दे पर दिखाया भी जा चुका है। उनमें कहीं विवाद नहीं हुआ तो फिर ऐसा इस फिल्म में क्या है जिस पर इतना विवाद हो रहा है। रानी पद्मिनी (पद्मावती) विषय लोक आस्था यह है कि चित्तौड़ की औरतों से दो विकल्पं से जौहर को चुना। उन्हें विजयी सेना के समक्ष अपमानित होने को अस्वीकार किया। सभी महिलाओं की एक राय पर विशाल चिता सजाई गई और रानी पद्मिनी के बाद सारी औरतें धधकती अग्नि में स्वाभिमान के लिए कूद गईं और दुश्मन बाहर खड़े देखते रह गए। इस अविस्मरणीय जौहर का गौरव लोकगीतों और कथाओं में आज भी जीवित है।   
    अगर फिल्म कवि जायसी के प्रेमकाव्य पर आधारित है तो यह जानकारी अनिवार्य है कि यह एक लोकप्रिय कृति है जो अनेक विश्वविद्यालयों के हिंदी पाठ्यक्रमों में वर्षों से पढ़ाई जा रही है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल, विजयदेव नारायण साही सहित अनेक आलोचकों-रचनाकारों ने इस के संबंध में बहुत कुछ लिखा और कहा है। रानी पद्मिनी के जौहर की अमरगाथा से संबंधित अनेक तथ्य और प्रमाण राजस्थान के इतिहास में विभिन्न इतिहासकारों ने अभिव्यक्त किए हैं। ‘त्रिवेणी’ की भूमिका में आचार्य शुक्ल ने लिखा हैं- “जायसी का क्षेत्र तुलसी की अपेक्षा परिमित है, पर प्रेमवेदना अत्यंत गूढ़ है।” तो साही ने तो जायसी को हिंदी का पहला विधिवत कवि कह कर अपनी पुस्तक ‘जायसी’ में सम्मानित-चर्चित किया है। इस कृति में इतिहास और कल्पना का मणिकंचन योग स्वीकारा गया है। मूल कृति ‘पद्मावत’ में चित्तौड़ के राजा रत्नसेन और सिंहलद्वीप की राजकुमारी पद्मावती की प्रेमकथा है, जो सूफी मसनवी शैली में 57 खंडों में अभिव्यक्त हुई है। इसके पूर्वाद्ध को कल्पना और उत्तरार्द्ध को ऐतिहासिक आधार से युक्त स्वीकारा गया है। ‘पद्मावत’ महाकाव्य में रहस्यवाद और आध्यात्मिक रंग और संदर्भों की अपनी कहानियां हैं जिनको जाने-समझे बिना संजय लीला भंसली द्वारा दिया गया बयान संभवतः बहुत दूर तक नहीं चलेगा।
    गौर किए जाने वाली बात यह है कि किसी भी श्रव्य-माध्यम की रचना को जब दृश्य-श्रव्य-माध्यम में रूपांतरित करते हैं तो अनेक समस्याएं आती है। यदि मलिक मुहम्मद जायसी के इस काव्य पर आधारित यह फिल्म बनानी होती तो इसमें अनेक घटनाओं, तथ्यों और विवरणों के साथ देश-काल की सम्यक जानकारी आवश्यक थी। यह विवाद थमने वाला नहीं है क्यों कि श्री राजपूत करणी सेना के संरक्षक और संस्थापक लोकेंद्र सिंह काल्वी ने कहा था- “हम किसी भी कीमत पर फिल्म में विकृत तथ्यों को दिखाए जाने की अनुमति नहीं देंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि फिल्म भारत के आधे हिस्से में प्रदर्शित ना हो सके।” अब इस मुद्दे पर राज्य सरकार कानून और व्यवस्था की दुहाई पर सक्रिय हुई है। कोर्ट ने किसी भी प्रकार के फैसले को पहले देने से इंकार कर दिया है। ऐसी स्थिति में अभिनेत्री रवीना टंडन का अपना मत है कि ‘पद्मावती’ विवाद केवल राजनीतिक ड्रामा है और इलेक्शन खत्म होते ही सब ठीक हो जाएगा। वहीं इस फिल्म की अभिनेत्री दीपिका पादुकोण जो रानी पद्मिनी या चित्तौड़ की पद्मावती का किरदार निभा रही हैं का कहना ठीक लगता है कि बिना फिल्म देखे ही विरोध अनुचित है। कलाकारों से विरोध की प्रराकाष्ठा यह है कि उन्हें जान से मारने की धमकियां दी जा रही है और करणी सेना ने तो पादुकोण को यह धमकी दी है कि रामायण में जिस तरह शूर्पणखा की नाक काट दी गई थी, करणी सैनिक उसी तरह उनकी भी नाक काट सकते हैं। लोकतांत्रिक देश में ऐसा गर्व प्रदर्शन भी बेहद चिंताजनक और असंवेदनशील है। यहां संजय लीला भंसाली से यह भी कहना है कि अगर फिल्म जायसी के काव्य पर आधारित है तो इसका श्रेय और नाम क्यों नहीं दिया गया। ऐसी स्थिति में यह एक पटकथा लेखक और निर्देशक की असंवेदनशीलता कही जाएगी।
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16 अक्टूबर, 2017

चेखव की बंदूक बुलाकी शर्मा के पास है

० नीरज दइया

मैं सत्यनिष्ठ यह घोषणा करता हूँ कि आज से पहले मैंने कभी कोई संस्मरण नहीं लिखा है। साथ ही यह भी कि जिस व्यंग्य लेखक बुलाकी शर्मा पर संस्मरण लिखना है वे विल्कुल कोरे हैं, अर्थात उन पर कोई संस्मरण लिखा नहीं गया है। अगर आप अपनी रिक्स पर यह पढ़ना चाहते हैं तो आभार। एक संस्मरण क्या मैं इतना प्रतिभावान हूं कि शर्माजी की पूरी जीवनी लिख सकता हूं।
समस्या यह है कि आजकल कोई किसी को महान नहीं कहता। यहां गिव एंड टेक का फार्मूला बेस्ट है। तुम मुझे गोडफादर कहो, मैं तुम्हें जीनियस कहूंगा जैसी अटकलें सर्वविदित है। यह संस्मरण जिस पत्रिका में आप पढ़ रहे हैं, उसके संपादक बड़े खेले हुए खिलाड़ी है। इन्होंने व्यंग्य विधा को और व्यंग्य विधा ने इनको इतना मांजा है कि काले बालों का पूरा मैल उतर कर सफेद-झक्क हो गए। यह संस्मरण मैं जापानी तकनीक से बने एक ओटोमैटिक पेन से लिख रहा हूं। इस पेन में सारे कानून-कायदे सेट कर दिए हैं। लिखते समय अगर मैं तयशुदा पटरी से नीचे उतरा कि पेन लिखना बंद कर देगा। इतना ही नहीं देखिए- सुना आपने सीटी बजी ना।
बुलाकी शर्मा हिंदी और राजस्थानी दो भाषाओं में लिखते हैं। वे तीसकी भाषा अंग्रेजी जानते हैं। पर इतनी नहीं जानते कि साहित्य सृजन कर सकें। ऐसा भी कह सकते हैं कि इसमें उनको इतना कोन्फीडेंस नहीं हुआ कि कुछ लिखने का ट्राई करते। उन्होंने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के बाल-साहित्य का राजस्थानी अनुवाद किया, जो साहित्य अकादेमी से प्रकाशित हुआ है। इस बीच एक रहस्य यह है कि बे बांगला नहीं जानते और मुस्कुराते हुए कहते हैं कि अनुवाद का अनुवाद किया है।
हम दोनों बीकानेर के मूल निवासी हूं। हमारे पास इसका प्रमाण-पत्र भी है। बिना प्रमाण पत्र के सत्य भी झूठ है। किंतु यह ऐसा सत्य है जिसे हम झूठलाना चाहते हैं। एक बार मैंने किसी अन्य प्रसंग में बुलाकी शर्मा के लिए जब लिखा बीकानेर के साहित्यकार तो बे बोले बीकानेर शब्द हटा दो। साहित्यकार किसी एक शहर का नहीं होता। मुझे भी यह ठीक लगा और मैंने उनके सामने ही बीकानेर शब्द के स्थान पर राजस्थान लिख दिया तब भी उन्हें आपत्ति थी। वे पूरे देश और विश्व के साहित्यकार होना चाहते थे। अब साहित्य अकादेमी का मुख्य पुरस्कार इस बात का प्रमाण है कि वे एक भारतीय साहित्यकार हैं।
भारतीय साहित्यकर बुलाकी शर्मा को अकादेमी पुरस्कार का रहस्य मेरी भाभी जी राधा शर्मा ने खोल दिया है। उनकी धर्मपत्नी यानी बकौल हमारी भाभी साहित्य अकादेमी पुरस्कार इसलिए मिला कि पुरस्कृत पुस्तक के लोकार्पण में वे उन्हें पहली बार साथ ले गए थे। बाकी किताबों का लेखा-जोखा यह है कि वे या तो लोकार्पण करवाते ही नहीं और कभी किसी कृति का लोकार्पण करवाया तो सपत्नीक नहीं पहुंचते। इसके साथ ही भाभी जी ने यह भी बताया कि पुरस्कार समारोह में भी वे उनके साथ दिल्ली गई थीं और भव्य आयोजन में वे उन्हें देख कर मुस्कुरा रहे थे।
बुलाकी शर्मा कवि नहीं है। उनका कोई कविता संग्रह प्रकाशित नहीं हुआ है। खबर है कि वे कविता के पाठक और प्रेमी है। गोपनीय बात यह है कि प्रेम-कविताएं छुप कर लिखते हैं और छुपा कर रखते हैं। सार्वजनीक बात यह है कि कविता-संग्रहों की समीक्षाएं लिखने से परहेज नहीं है। चूंकी वे कभी भी कवि हो सकते हैं क्यों कि कवि कम शब्दों में काम चला लेते हैं और कहानी-व्यंग्य में शब्दों का कुछ अधिक उपयोग करना होता है। इस पीड़ा का आंशिक इलाज उन्होंने व्यंग्य विधा में इस प्रकार किया है कि पहले वे लंबे व्यंग्य लिखा करते थे अब व्यंग्य लिखने से पहले मन में उसे धो लेते हैं और इतना धोते हैं कि धो धो कर उसे छोटे साइज का कर देते है।
‘धोना’ क्रिया के संग वे प्रेम से सपत्नीक संलग्न है। घर में बर्तन और कपड़े भाभीजी धोती हैं और वे व्यंग्य में अपनी मरजी से पूरे देश-दुनिया को धोते हैं। वे अपने चालीस वर्षीय अनुभव के आधार पर शरमाते हुए कहते हैं कि वर्ष 1978 में ‘मुक्त्ता’ पत्रिका में ‘बजरंगबली की डायरी’ से उन्होंने अपने आपको व्यंग्य लेखन मान लिया था। बाद में वे साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बिनी, आजकल, अमर उजाला, ट्रिब्यून, सन्मार्ग आदि अनेक पत्र-पत्रिकाओं में व्यंग्य समेत विविध विधाओं में प्रकाशित हुए। अब उनके पास खुद ऐसी कोई लिस्ट नहीं है कि वे कब-कब कहां-कहां छपे। इसलिए ऐसा कहना ठीक रहेगा कि उनकी सैकड़ों रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं।
बुलाकी शर्मा क्या मैं व्यंग्यकार हरिशंकर परसांई तक को बहुत बाद में पहचान पाया। यह तो भला हो के.पी. सक्सेना और श्वेत-श्याम टेलीविजन युग का कि उन्होंने एक कवि सम्मेलन में ऎखा व्यंग्य पढ़ा। मैंने व्यंग्य क्या सुना, मैं व्यंग्य का मुरीद हो गया। फिर तो शरद जोशी का प्रतिदिन कॉलम पढ़ने लागा। बहुत बाद में पता चला कि मेरे घर जो बहुत सारी पुस्तकें हैं और पिताजी लिखते-पढ़ते रहते हैं वे भी व्यंग्यकार हैं। मेरे स्व. पिता श्री सांवर दइया ने साहित्य के प्रति मेरी प्रतिभा का आकलन मेरी युवावस्था में कर लिया था। वे अपनी रचनाएं मुझे सुनाया करते थे। उनके राजस्थानी व्यंग्य मुझे सुनने पड़ते थे। बाद में उन्होंने मेरा प्रमोशन किया और मैं उनकी रचना का पहला पाठक होने लगा। पेन रुक रहा है। विषयांतर हो रहा है।
राजस्थानी के संदर्भ में हरिशंकर परसांई को दो टुकड़े करने पड़ेंगे। राजस्थानी के हरिशंकर परसांई बुलाकी शर्मा हैं या मेरे स्वर्गवासी पिता सांवर दइया हैं इस बात पर संदेह है। वोट किए जाएंगे तो दोनों को आधे आधे मत मिलेंगे। फिर पेन रुक रहा है। तो आप जान लिजिए कि राजस्थानी में बुलाकी शर्मा के दो व्यंग्य संग्रह ‘कवि कविता अर घरआळी’ (1987) तथा ‘इज्जत में इज्जाफो’ (2000) प्रकाशित हैं। जिनमें 32 व्यंग्य हैं। हिंदी में चार व्यंग्य संग्रह- ‘दुर्घटना के इर्द-गिर्द’ (1997), ‘रफूगीरी का मौसम’ (2008), ‘चेखव की बंदूक’ (2016) और ‘आप तो बस आप ही हैं !’ (2017) प्रकाशित हैं। जिनमें 156 व्यंग्य हैं।
बुलाकी शर्मा कालम राइटिंग के लिए भी जाने जाते हैं। पहले जब धारदार व्यंग्य लिखते थे बहुत डरते थे। सोचते थे कहीं कोई लड़ाई नहीं कर बैठे इसलिए वे छद्म नाम से लिखा करते थे। अब तो यह रहस्य खुल गया कि दैनिक भास्कर बीकानेर में अफलातून नाम से लंबे समय तक ‘उलटबांसी’ लिखने वाले कोई दूसरे नहीं अफलातून शर्माजी हैं। लोगों को उन पर पहले भी शक था। बीकानेर के ‘विनायक’ में ‘तिर्यक की तीसरी आंख’ में भी डरपोक बुकाकी शर्मा लंबे समय तक लिखते रहे। बाद में जब सरकारी सेवा से शर्माजी ने ऐच्छिक सेवानिवृति ली, तब से ‘विनायक’ में तिर्यक का रहस्य भी खोल दिया। रहस्य यह भी है कि सरकारी सेवा से सामन्य ढंग से मुक्त होने पर लोगों को पता चल जाता है कि उम्र साठ हो चुकी है। बस साठ को छूने से दो-चार महीने आपने ऐच्छिक सेवानिवृति का नाटक दिखाया और घर बैठ गए। सरकार के घर बिठाने और खुद के घर में खुद बैठने में तनिक अंतर है। जवान शर्माजी को जो जानते हैं वे यह जान ले। भ्रम में मत रहना काल बाल जो दिखते हैं, सब डाई का कमाल है। लेखा-सेवा वाले सफेद को काले और काले को सफेद करने का मर्म बखूब जानते हैं। इतने वर्षों तक व्यंग्य लिखने वाले शर्माजी अब बहादुर बन चुके हैं। वे अपने नाम से लिखने लगे हैं। दैनिक युगपक्ष में ‘शब्द बाण’ कालम उनके नाम से प्रत्येक रविवार पढ़ा जा सकता है।
पहले बुलाकी शर्मा बड़े आकार के व्यंग्य लिखा करते थे आजकल व्यंग्य का आकार कालम के चक्कर में छोटा करते गए हैं। कहना चाहिए कि तलवार और गुप्ती का काम वे अब कटार और चाकू से निकालने का फार्मूला जान गए हैं। वैसे भी धारदार हथियार रखना कानून अपराध है। गुप्त बात यह है कि जब यह रहस्य उजागर हुआ कि ‘चेखव की बंदूक’ बुलाकी शर्मा के पास है। तब उन्होंने एक व्यंग्य लिखा ‘चेखव की बंदूक’ और कालांतर में इसी नाम से व्यंग्य संग्रह प्रकाशित करवा कर मित्रों को बांटने लगे जिससे कि असलियत इस मजाक में छिप जाए। हुआ यह कि कुछ मित्रों ने मेरी अक्कल निकाल ली और बोले- तुम शर्माजी को भाई साहब कहते हो और घर आते-जाते हो, पता करो कि चेखव की असली बूंदक उन्होंने कहा छिपा कर रखी है।
मैंने एक बार उनके घर मौका मिलने पर खोजा तो बंदूक तो नहीं मिली पर बारूद का खजाना मिला। बारूद इस अर्थ में कि वे ना जाने किस वर्ष से लगातार डायरी लिखते है और असली डायरी लिखते हैं जिसमें जिस किसी चेहर पर कोई मुखौटा अगर उन्होंने देखा है तो उसे भी दर्ज कर दिया है। बुलाकी शर्मा वास्तव में बजरंग बली है जो आज तक अच्छा-बुरा सब कुछ सहन कर सभी से अच्छे संबंध बनाएं हुए हैं किंतु डायरियां जो चुपके से सरसरी निगाह में देखी गई कुछ अंश पढ़े गए से ज्ञात होता है कि उनके आस-पास की असलियत क्या रही हैं। मित्रों के अनेक राज दफन किए हैं। किसी दिन सच्ची बही सामने आ गई तो यकीन जानिए कि वो बारूद का असला होगा कि बहुत-सी चलती दुकाने बंद हो जाएंगी। पेन रुक रहा है और वैसे भी ऐसी नितांत निजी बातें कम से कम मुझे सार्वजनिक नहीं करनी चाहिए बेशक भले मेरी अक्कल निकाल ली गई हो फिर भी इतना होश तो मुझे है।
क्या यह कमाल नहीं है कि 188 व्यंग्य पुस्तकार होने के बाद भी अब भी उनके मन में यह बात बार बार आती है कि व्यंग्य संग्रह आना चाहिए। एक हिंदी में एक राजस्थानी में। उनके व्यंग्य खजाने में अब भी दस व्यंग्य प्रकाशित हो जाएं जितना मसाला है। संभव है कुछ ऐसा हो भी। होना भी चाहिए। उन्हें व्यंग्य विधा के लिए अनेक सम्मान मिले हैं। बीसवीं शताब्दी में यानी 1999 में राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर ने पुरस्कृत किया। नवीन शोध से पता चला है कि बुलाकी शर्मा बिना चोटी रखे देश में चोटी के व्यंग्यकार बनना चाहते हैं। पुरानी बात है कि एक चोटी वाले ज्योषित ने उन्हें कहा कि बुलाकी तुमको उदयपुर अकादमी से संग्रह ‘दुर्घटना के इर्द-गिर्द’ के लिए पुरस्कार इसलिए मिला कि उस में 21 व्यंग्य थे। अब इस आंकड़े को पकड़ लो और अगर पुरस्कार पाना है तो अगले व्यंग्य संग्रह में 21 व्यंग्य ही आने चाहिए। हमारी भाभीजी वहीं बैठी वार्ता सुन रही थी जो तपाक से बोली- महाराज इन दिनों ये छोटे साइज के व्यंग्य लिखते हैं तो किताब छोटी होगी इसलिए कुछ दूसरा उपाय बताओ?
बुलाकी शर्मा पर पूरा विश्वास किया जा सकता है। वे पूरे विश्वासी है। कभी कभी अंधविश्वासी भी बन जाते हैं खासकर पुरस्कार लेने का मसला हो तो। ज्योषित ने बोला था कि 21 नहीं तो 42 व्यंग्य ले लो। देखिए उनके अगले व्यंग्य संग्रह ‘रफूगीरी का मौसम में’ यही हुआ है। जब मामला नहीं बैठा तो ‘चेखव की बंदूक’ में 51 व्यंग्य रखे गए और इसकी भनक जैसे ही ज्योषित महाराज को हुई वे उनके घर पहुंच गए और इसी वर्ष प्रकाशित व्यंग्य संग्रह ‘आप तो आप ही हैं !’ में 42 व्यंग्य ही रखे गए हैं। मैं ज्योषित नहीं जानता पर राय देने का अवसर नहीं छोड़ना चाहता। कुछ अटपटी बात कहने से चर्चा होती है। सीधी-साधी बात पर कौन दिल फेंकता है। मेरा दावा है कि अगर इक्कीस-इक्कीस व्यंग्यों के इक्कीस संग्रह बुलाकी शर्मा के निकाले जाएं तो उन्हें चेखव की बंदूक जो असली वाली उन्होंने छिपा कर रखी है बेचनी पड़ेगी। एक पंथ दो काज का इससे बढ़िया उदाहरण नहीं हो सकता। यह एक झलक है हमारे स्वदेशी शोध की।
वैसे हमारे देश में शोध की हालत यह है कि बुलाकी शर्मा जैसे बड़े व्यंग्यकार पर कोई बड़ा शोध नहीं हुआ है। हां, बुलाकी शर्मा के लेखन पर यूनीवर्सिटी के कुछ बालक और बालिकाओं ने लघुशोध लिखें है, व्यक्तिगत और सामूहिक। सारी स्थितियों को देखते हुए और व्यंग्यकार शर्माजी की साठी-पाठी उम्र का ध्यान रखते हुए, एक नवजात व्यंग्यकार नीरज दइया ने उनके समग्र लेखन पर आलोचनात्मक पुस्तक का मानस बनाया है। व्यंग्य-यात्रा के संपादकजी संस्मरण में व्यंग्य की फुल मात्रा डालने का आदेश दे रहे हैं तो उनकी प्रेरणा से ही इस आलेख को मेरे मानस ग्रंथ का हिस्सा मान लिया जाए। मिलावट का दौर है। शुद्धता जैसी चीज बाजार में अब बची नहीं। बचा हुआ है अथवा अगर बचाना हो तो प्रेम को बचाएं। जहां प्रेम का आकाल हो तो प्रेम जनमेजय या बुलाकी शर्मा का स्मरण किया जाए। उनकी आत्मीयता से आपके हदय में प्रेम स्रोत से प्रेम छलकने लगेगा। देखिए- सुना आपने सीटी बजी। पेन में सारे कानून-कायदे सेट कर दिए थे इसलिए पेन रुक रहा है। लो एकदम रुक गया।
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02 अक्टूबर, 2017

शब्दों की यात्रा / डॉ. मदन गोपाल लढ़ा

डॉ. मदन गोपाल लढ़ा
    नामी कवि, कहानीकार एवं व्यंग्यकार सांवर दइया के पुत्र होने के नाते डॉ. नीरज दइया को लिखने के संस्कार विरासत में मिले हैं। कहने को यह कहा तो जा सकता है, मगर क्या विरासत में लेखन में लेखन के संस्कार मिलने भर से कोई लेखक हो जाता है? अगर ऐसा होता तो तमाम बड़े लेखकों की विरासत उनकी संतानें संभाल लेती और लेखन के क्षेत्र में वंश परंपरा अनवरत चलती रहती। सच्चाई तो यह है कि संतानों द्वारा सुध नहीं लिए जाने से अधिकांश लेखकों के जाने के बाद उनकी किताबें धूल फांकती रहती है अथवा रद्दी में बेच दी जाती है। कई नामी लेखकों की अप्रकाशित पांडुलिपियां दीमकों का भोजन बन जाती है। लिहाजा विरासत की बात कहने सुनने में अच्छी लगती है मगर लिखने के लिए बीज रूप प्रतिभा का होना अनिवार्य है। अलबत्ता लेखक के घर का रचनात्मक परिवेश, किताबें-पत्रिकाओं की उपलब्धता, अन्य लेखकों का सान्निध्य, प्रकाशकों से संपर्क आदि खाद-पानी का काम करता है, जिससे प्रतिभा का बीज एक लहलहाते दरख्त में तब्दील हो जाता है। राजस्थानी एवं हिंदी में समान रूप से लिखने वाले चर्चित कवि, आलोचक एवं व्यंग्यकार डॉ. नीरज दइया के लिए यह बात सोलह आना खरी उतरती है।
    अपनी उद्भट प्रतिभा, व्यत्पत्ति एवं सतत अभ्यास के बल पर डॉ. नीरज दइया ने साहित्य अकदेमी पुरस्कार से सम्मानित अपने लेखक पिता सांवर दइया की समृद्ध विरासत को न केवल सहेजा बल्कि सतत साधना के बल पर उसे आगे बढ़ाया है। अथक परिश्रम व अटूट निष्ठा से की गई साधना का सुफल है कि साहित्य के समकालीन परिदृश्य में उनका नाम राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने में सफल रहा है। लेखक के रूप में लघुकथा विधा से शुरुआत करने वाले डॉ. नीरज दइया ने कविता, अनुवाद, व्यंग्य, आलोचना, बाल कहानी एवं साक्षात्कार आदि विधाओं में कलम चलाई है। राजस्थानी व हिंदी दोनों भाषाओं में अधिकारपूर्वक लिखने का सामर्थ्य अनवरत साधना का प्रतिफल है। तीन दशकों लंबी अब तक की साहित्यिक यात्रा में एक दर्जन से अधिक मौलिक कृतियां, दर्जन भर अनूदित कृतियां एवं करीब इतनी ही तादाद में संपादित कृतियां उनके खाते में दर्ज है। विश्व साहित्य की श्रेष्ठ कृतियों को राजस्थानी भाषा में अनुवाद कर उल्लेखनीय कार्य करने वाले लोगों में डॉ. चन्द्र प्रकाश देवल का नाम शीर्ष पर है। इस क्रम में डॉ. नीरज दइया ने अमृता प्रीतम, निर्मल वर्मा, भोलाभाई पटेल, डॉ. नन्द किशोर आचार्य, सुधीर सक्सेना, ओम गोस्वामी आदि नामी लेखकों की चर्चित कृतियों को राजस्थानी में अनुवाद कर के भाषाओं के मध्य पुल बनाने का काम किया है। डॉ. नन्द किशोर आचार्य एवं सुधीर सक्सेना की अब तक की काव्य-यात्रा से चयनित कविताओं का संचयन और अनुवाद इन दिनों चर्चा में है। सुधीर सक्सेना की अनूदित कृति की विशेषता यह है कि इसमें अनुवाद के साथ मूल कविताओं को भी शामिल किया गया है, जिससे अनुवाद की गुणवत्ता सहज जांची-परखी जा सकती है। जो हिंदी और राजस्थानी के समान होने की बात कहते-करते हैं उनके लिए भी यह कृति एक मध्यम हो सकती है कि वे जान सकें दोनों भाषाओं में क्या और कितना विभेद है। डॉ. दइया की अनुवाद के क्षेत्र में एक अन्य उल्लेखनीय और रेखांकित की जाने वाली कृति ‘सबद-नाद’ भी है, जिसमें 24 भारतीय भाषाओं के प्रतिनिधि कवियों की कविताओं का संचयन और अनुवाद उपलब्ध होना एक विशेष उपलब्धि है। प्रख्यात कवि अनिल जनविजय ने इस काम के बारे में टिप्पणी करते हुए लिखा- “भाई नीरज जी ! राजस्थानी में पूरे भारत की कविताएं देख कर मज़ा आ गया। ये बड़ा काम है। ऐसा काम तो अभी तक हिन्दी में भी किसी एक व्यक्ति ने शुरू नहीं किया है। मुझे आपसे ईर्ष्या हो रही है। अद्‌भुत ।”
            राजस्थानी भाषा में कविता व कहानी विधा में भरपूर लिखा गया है मगर आलोचना का पक्ष कमजोर रहा है। आलोचकीय काम के अपर्याप्त होने से अनेक रचनाकारों के रचना-संसार का सम्यक मूल्यांकन नहीं हो पाया। इस खालीपन को महसूस करते हुए डॉ. नीरज दइया ने आलोचना विधा में लिखना आरंभ किया। उनकी आलोचना विधा की चर्चित कृतियां ‘आलोचना रै आंगणै’ व ‘बिना हासलपाई’ इस कमी को दूर करने के ईमानदार प्रयास हैं। ‘आलोचना रै आंगणै’ में जहां विभिन्न विधाओं पर केंद्रित अठारह आलेख शामिल हुए हैं, वहीं ‘बिना हासलपाई’ कृति में राजस्थानी के पच्चीस प्रतिनिधि कहानीकारों के कथा-संसार की पड़ताल करते हुए कहानी आलोचना के मानकों की तलाश की गई है। बहुप्रतीक्षित पुस्तक ‘आंगळी-सीध’ जल्द ही प्रकाशित होगी, जो राजस्थानी उपन्यास यात्रा पर केंद्रित है।
            कविता डॉ. दइया की सबसे प्रिय विधा है। राजस्थानी में वर्ष 1997 में प्रकाशित प्रथम कविता संग्रह ‘साख’ ने उनके कवि रूप की साख बनाई तो लंबी कविता ‘देसूंटो’ को अपनी दार्शनिक पृष्ठभूमि व निराले शिल्प के कारण एक उल्लेखनीय प्रयोग के रूप में देखा माना गया। वर्ष 2015 में प्रकाशित कविता संग्रह ‘पाछो कुण आसी’ की कविताएं अपने समय व समाज की सच्चाइयों को निजी मुहावरे में उजागर करने से चर्चा में है। हिंदी कविता संग्रह ‘उचटी हुई नींद’ ने देखे-भोगे सच को बिना लाग-लपेट सहजता से अभिव्यक्त कर हिंदी पट्टी के आलोचकों का ध्यान खींचा।
    बच्चों के लिए लिखना सबसे कठिन है क्योंकि बाल साहित्य सृजन के लिए लेखक को खुद बच्चा बनना पड़ता है। नीरज दइया ने बाल मनोविज्ञान को साधते हुए ‘जादू रो पेन’ शीर्षक से जो बाल-कहानियां रचीं, वे राजस्थानी बाल-साहित्य में नया आयाम स्थापित करती है। सीख एवं उपदेश से इतर ये कहानियां बच्चों का स्वस्थ मनोरंजन करते हुए उनको जीवन के विविध आयामों से रू-ब-रू करवाती है। ध्यातव्य है कि इस कृति को वर्ष 2014 के साहित्य अकादेमी बाल साहित्य पुरस्कार से नवाजा गया।
            नामी कवि मोहन आलोक, देवकिशन राजपुरोहित, कन्हैयालाल भाटी की कहानियों का संचयन एवं संपादन कर दइया ने राजस्थानी कहानी विधा को नए सिरे से जांचने-परखने के लिए अवसर दिया है। ये वे कहानीकार है जो यादगार कहानियां लिखने के बावजूद विमर्श से बाहर रह गए। अनियतकालीन पत्रिका ‘नेगचार’ से चर्चा में आए डॉ. नीरज दइया ने राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी की मासिक पत्रिका ‘जागती जोत’ का एक वर्ष से अधिक संपादक किया तथा वे अनेक पत्रिकाओं के अतिथि संपादक के रूप से कार्य कर चुके हैं। माध्यमिक शिक्षा बोर्ड अजमेर में राजस्थानी पाठ्यक्रम समिति के संयोजक एवं अकादमी कार्यकारणी सदस्य के रूप में भी उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिकाएं रही हैं। उच्च माध्यमिक कक्षाओं के पाठ्यक्रम में शामिल राजस्थानी पद्य संकलन के वे संपादक भी रहे हैं।
            ‘मंडाण’ के रूप में नीरज दइया ने संपादन का वह ऐतिहासिक काम किया जिसकी ख्याति परंपरा के हेमाणी अंक, राजस्थानी-एक, तीन बीसी पार व साख भरै सबद के क्रम में दर्ज की जाने योग्य है। राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी द्वारा प्रकाशित इस संकलन में राजस्थानी के 55 युवा कवियों की प्रतिनिधि कविताओं को एक ही जिल्द में शामिल किया गया है। राजस्थानी की युवा कविता को समग्र रूप से जानने के लिए यह एक विश्वसनीय एवं जरूरी किताब है।
            साहित्य सृजन के साथ तकनीक के सहारे आभासी दुनिया में राजस्थानी रंग बरसाने वाले लोगों में डॉ. नीरज दइया अग्रणी है। वे राजस्थानी की रचनाओं को हिंदी में उपलब्ध करवाने वाले सुधी रचनाकारों में भी अग्रणी कहे जा सकते हैं। अंतर्जाल पर उनकी सक्रियता को नेगचार वेब पत्रिका, राजस्थानी डाइजेस्ट, कविता कोश के राजस्थानी विभाग व फेसबुक आदि अनेक स्थलों पर देखा जा सकता है। कहना न होगा नीरज दइया राजस्थान के उन चुनिंदा लेखकों में से है जिन्होंने अखिल भारतीय स्तर पर अपनी लेखनी के बलबूते सशक्त हाजरी दर्ज की है। यही वजह है कि उनसे उम्मीदें बढ़ गई हैं।
          व्यंग्य विधा इन वर्षों में लोकप्रियता के शिखर पर है। समय व समाज की हकीकत व व्यवस्था की विसंगतियों को चुटीले अंदाज में उजागर करने में व्यंग्य विधा का कोई सानी नहीं है। डॉ. नीरज के दो व्यंग्य संग्रह हाल ही में प्रकाशित हुए हैं- ‘टांय टांय फिस्स’ एवं ‘पंच काका के जेबी बच्चे’। गौरतलब है कि दइया के व्यंग्य देश के नामी दैनिक पत्रों में नियमित रूप से प्रकाशित होते हैं, जिससे व्यंग्य-पाठकों के बीच वे लोकप्रिय हैं। इसी क्रम में यहां यह भी उल्लेखनीय है कि डॉ. नीरज दइया ने अपने समकालीन दो वरिष्ठ लेखकों बुलाकी शर्मा एवं मधु आचार्य ‘आशावादी’ के समग्र सृजन के सरोकारों को आलोचक के रूप में देखने-परखने का काम भी किया है। ‘बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार’ एवं ‘मधु आचार्य आशावादी के सृजन-सरोकार’ पुस्तकों के माध्यम से न केवल इन दोनों समकालीन लेखकों के सृजन के बहुआयामी पक्षों से परिचित हुआ जा सकता है वरन हिंदी आलोचना में विकसित होती आत्मीय भाषा, नवीन शिल्प एवं अभिनव दृष्टि को भी यहां चिन्हित किया जा सकता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह क्रम अन्य रचनाकारों हेतु भी जारी रहेगा।
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 आभाअर : दुनिया इन दिनों / दिल्ली / अक्टूबर (प्रथम) 2017 / प्रधान संपादक : श्री सुधीर सक्सेना