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27 दिसंबर, 2017

मूल : बुलाकी शर्मा / अनुवाद : नीरज दइया

राजस्थानी कहानी- हिलोर

    हमीद ने झोंपड़ी के पास मोटरसाइकिल रोकी और क्वाटरों के काम का जायजा लेने के लिए आगे रवाना हुआ।
    लाइन से क्वाटर बन रहे थे। पंद्रह-बीस आदमी-औरतें काम में लगे थे।
    “बालनजोगी, टांगों में सत नहीं है क्या? ऐसे कैसे बेसके पड़ रही है? फुर्ती से हाथ-पैर नहीं चलाए जाते?... अरे रामले, तुझे क्या हुआ? टी.बी. के मरीज जैसे क्या मरा मरा सा फावड़ा चलता है? गारा बनाने में इस साहब को क्या जोर आता है भाई..... ?”
    सोहन चलवे की बातें सुन कर हमीद मुस्कुराया। एक तरफ रखी खाट पर बैठते हुए कुछ जोर से बोला, “कैसे चलवोजी, काम ठीक-ठाक चल रहा है ना?”
    बीड़ी का कश खींचते हुए सोहनजी ने पीछे मुड़ क्र देखा, “ओह... ठेकेदारजी आप।”
    “जल्दी-जल्दी हाथ-पैर चलावो देखें।” सोहनजी मजदूरों को हिदायत देते हुए हमीद के पास पहुंचे और खाट के पैताने बैठ गए।
    कमीज के जेब से हमीद ने सिगरेट का पाकेट निकाला। उस में से एक सिगरेट निकाल कर पाकेट सोहनजी के आगे कर दिया। फिर पेंट की जेब से लाइटर निकाल कर सिगरेट जलाई और एक जोरदार कश खींचा। सोहनजी ने भी सिगरेट जलाई।
    “बहुत कामचोर है ये लड़के-लड़कियां। इन से तो बूढ़े भले जो बेचारे अपने वश से भी अधिक काम करते हैं। इन नलायकों को कितना ही डांटो, किंतु चलेंगे तो अपनी ही चाल से।” काम करते मजदूर की तरफ देखते हुए सोहनजी ने कहा।
    भोमा पानी के दो मग ले कर आया।
    हमीद ने मग मुंह से थोड़ा ऊंचा कर एकधार गटागट पानी पीया। पी कर एक कुरला किया और मग को खाट के नीचे रख दिया।
    “आपकी गालियों का भी असर नहीं होता?” हमीद ने मुस्कुराते हुए पूछा।
    “नहीं जी।” एक हाथ से पगड़ी ऊंची करते हुए दूसरे से सिर खुजाते वह बोला, “मेरा ही गला खराब होता है, इन नालायकों को क्या फर्क पड़ता है।”
    इतने में वे गरजे- “तुझे बहुत हंसी आ रही है चिड़कली। कामचोर से काम तो होता नहीं, खड़े-खड़े दांत निकालती है। जल्दी से तगारी भर कर पहुंचाया नहीं जाता क्या?”
    पगड़ी उन्होंने वापस सिर पर रखली।
    चिड़कली की हंसी थम गई पर आंखें अब भी हंस रही थी। होले से बोली- “मैं क्या करूं, संतिया ई तगारी नहीं भरता।”
    “किस बात की मजाक करता है रे संतिया।” अब वे संतिये पर गुस्सा हुए- “यह क्या तेरे, मैं कह दूंगा अभी लगती है। तगारी भरी नहीं जाती क्या? कहां से आ कर जम गए ऐसे ढीठ?”
    संतिये ने गारे से तगारी भरी। चिड़कली उठा कर कारीगर की तरफ रवाना हो गई।
    हमीद उसे ही देखता रहा। उसे यह नई लगी। करीब अठारह साल की होगी। मंझला कद। सुंदर नैन-नक्स, उन में किनारे तक लगाया कजल। गहरी मांग भरे थी। पीली ओढ़नी और हरी छींट का लंहगा पहने हुए। ओढ़नी का एक सिरा कांचली में दबाए हुए।
    सोहनजी ने उसकी नजरों का कहा जैसे सुन लिया- “कल ही आई है यह। बहुत हाथ-पैर जोड़ने लगी तब रख ली।”
    “अच्छा किया।” हमीद ने कहा।
    संतिया गारे से तगारी भरता है, चिड़कली झुक कर उठाती है और इंटे लगाते कारीगर तक गारा पहुंचाती है। फिर से आती है, गारे से तगारी भरावती है और वही क्रम।
    हमीद की नजरें लगातार उस के पीछे।
    सोहनजी उसे देख कर मुस्कुराए। आवाज दी- “अरे चिड़कली, जा लिच्छू की होटल से ठेकेदारजी के लिए चाय ले कर आ।”
    उस ने गारे की तगारी भरवाई, उठाई और रवाना हो गई। जैसे सुना ही नहीं।
    वे गुस्सा होते खाट से खड़े हुए। जोर से कहा- “बहरी है क्या? सुना नहीं मैं क्या कह रहा हूं?”
    “मैं अपना काम कर रही हूं ना, किसी दूसरे से कह दें।” कारीगर के पास तगारी खाली करती हुई वह वापस आ कर भोमले से तगारी भरवाने लगी। तगारी भर गई, उस ने उठाई और फिर रवाना हो गई।
    अब सोहनजी से कहां सब्र होता। वे उसी के पास पहुंच गए और तगारी छीन कर दूर फेंकते तीखे स्वर में बोले- “बहुत काम कर के निहाल कर दिया। जा केतली ले कर चाय ला। आई है बहुत काम करने वाली।”
    चिड़कली के सिर पर तीन सलवटें घिर आई। कुछ समय वह चलवोजी की तरफ देखती रही। चलवोजी गुस्से में थे। केतली ले कर वह चुपचाप रवाना हो गई।
    सोहनजी ने चलवे हमीद के सामने देखा और दोनों एक ही भाव से होले-से मुस्कुराए।
    हमीद ने नई सिगरेट जलाई। एक शानदार कश लिया और खाट से खड़ा हो लिया।
    काम करने वालों की तरफ आया। बनते क्वाटरों का चक्कर लिया। कुछ समय कारीगरों को ईंटें लगाते देखता रहा। फिर होले-होले उस के कदम झोंपड़ी की तरफ बढ़ने लगे।

  
    चिड़कली चाय ले कर आई। केतली और कप खाट के करीब रखे और कुछ गर्म हो कर बोली- “यह लो चाय, चलवोजी।”
    सोहनजी मजदूरों की तरफ खड़े थे। वहीं से नाराज होते कहा- “तुम तो एकदम पागल हो। अरे कपों में डाल। एक कप ठेकेदारजी को दे कर आ। वे झोंपड़ी में बैठे हैं।”
    बेमन उस ने कपों में चाय डाली। एक कप ले कर झोंपड़ी के सामने पहुंची और वहीं खड़ी होकर बोली- “लिजिए चाय।”
    हमीद भीतर खाट पर बैठा था। नजरे मिलाती बोली- “लेना।”
    चिड़कली के पैर वहीं चिपक गए।
    “अरे भाई, चाय ठंडी हो रही है ना।” हमीद कोमलता से बोला।
    वह भीतर गई। एक कदम दूर से ही कहा- ‘लिजिए” आउर कप जमीन पर रखने के लिए नीचे झुकी।
    “नहीं-नहीं, नीचे नहीं रखना।” हमीद तपाक से खड़ा हो गया- “धूल गिर जाएगी।... लाओ मुझे दो।”
    हमीद ने हाथ लंबा किया। कप लिए उसा ने हाथ आगे कर दिया।
    “आ बैठ... ” वह चिड़कली को कहने वाला ही था पर उस से निजरे मिलते ही उस की आंखों से गुस्सा बरस रहा था। आंखों में भड़का हुआ गुस्सा जोर पर था। गुलाबी पंखुड़ियों सरीखे होंठ फड़फड़ाने लगे। सांसें तेज चलने लगी।
    हमीद यह तेज लावा सहन नहीं कर सका और उसका हाथ सुस्त हो गया।
    चिड़कली ने कप नीचे रखा। लाल आंखों से उस को देखा और झोंपड़ी से बहार निकल गई। हमीद को जैसे पसने छूट गए। सुन्न-सा निढाल खाट पर गिर गया।
    उस में डर समा गया। चिड़कली ने शोर-शराबा कर दिया तो? इस प्रकार की लपटों से पहली बार सामना हुआ था। खूब औरतों को देखा था लेकिन चिड़कली जैसी एक भी नहीं। वह मजाक करता तब मजदूरनियां खुश होती, आंखें मटकारती हंसती और उसे आगे का रास्ता मिल जाता।
    पर यह चिड़कली? जरूर उस ने गुस्से में उस के बारे में उलट-पुलट कर दिया होगा। मजदूर कुछ नहीं कहेंगे, पर उन की आंखों में घिरते सवालों के उत्तर उस के पास कहां होंगे? उस की बरसों की साख आज मिट्टी में मिलेगी। झोंपड़ी से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं हुई उस की।
    चिड़कली झोंपड़ी से बाहर आ कर काम करने लगी। किसी से कुछ नहीं कहा। पर चेहरे पर गुस्से की टेढी-मेढ़ी रेखाएं साफ नजर आ रही थी।
    दोपहर का समय हुआ तब उस की सहेली झमकू ने पास आ कर कहा- “आ, नाश्ता कर लें।”
    “मुझे भूख नहीं।” उस ने सामने ही नहीं देखा।
    “क्या हुआ री भूख के?” झमकू ने उसे शक की निगाहों से देखते कहा।
    “कह दिया ना, इच्छा नहीं है।”
    झमकू आगे कुछ पूछे उस से पहले वह अलग दिशा में चली गई।
    पानी के कुंड के पास पहुंच कर चिड़कली ने दोनों हाथों से पानी ले कर मुंह को छींटे दिए। सिर को भी गिला किया। फिर कांचली में ठूंसी हुई ओढ़नी का सिर निकाल कर उस से सिर-मुंह पोंछा।
    फिर वह बजरी पर पलाथी लगा कर बैठ गई। कोहनियां पलाथी से सटा कर हथेलियों में अपना चेहरा लिए सोचती रही।
    मजदूरी पर आते आज उस का दूसरा ही दिन था। काम करने आना जरूरी था। घर के हालात किसे से छुपे नहीं। शादी की मेंहदी अभी हाथों से गई नहीं। छह महीने ही नहीं हुए शादी को। घर में बड़ा परिवार। बस एक कमाऊ उस का पति। उस ने तो मनाही दी, बोला रहने दे ऐसे ही गुजार-बसर हो जाएगी। जैसे-तैसे कर लेंगे। पर उस से अपने मरद की दौड़-भाग नहीं देखी गई। कितना काम करता है। सुबह हाथ गाड़ा ले कर निकलता है। दिन में ऊन के बोरे एक कोटड़ी से दूसरी कोटड़ी में पहुंचाता है। रात गए आता है तब बैठने की भी हिम्मत नहीं रहती।
    पर ठेकेदारजी ऐसे करेंगे तब कैसे बसर होगा। अपने आदमी को बताए तो और भी बुरा। वह मरने-मारने पर उतर आएगा। उसे काम छोड़ना होगा और एकेला घाणी के बैल जैसा वह शरीर तोड़ता रहेगा।
    चिड़कली की आंखें गिली हो आईं।


    उस दिन के बाद चिड़कली की हंसी-मजाक सब बंद हो गई। चुपचाप काम करना, किसी के बिना मतलब के बोलना नहीं। सहेलियां कभी मजाक करती- “घरवाले की याद सताती रहती है, ऐसे क्या गुमसुम बनी रहती हो?”
    वह कुछ जबाब नहीं देती।
    चलवोजी भी उस से अधिक गुस्से से नहीं बतियाते। क्या कहे, वह बिना आराम किए काम करती रहती, काम में ढीठाई करे तब अवसर मिले उन्हें कुछ कहने का।
    हमीद दस बजते ही खाट पर आकर बैठ जाता। बैठा-बैठा सिगरेटे फूंकता। दो-चार बार घूम कर काम का जायजा लेता, कभी झोंपड़ी में आ कर आराम करता। उस ने यह सोच कर धैर्य धारण किया कि चिड़कली ने किसी से कुछ नहीं कहा। काम पर भी लगातार आ रही है, समय के साथ खुद ही मजदूरी के नियम-कायदे सीख जाएगी। उस की निगाहें चिड़कली पर ही रहती।
    नीचे झुक कर ईंटें उठाती, गारे की तगारी उठाती, ओढ़नी के छोर से पसीना पोंछती, प्याज-रोटी खाते, सहेलियों को आंखें निकालती, हथनी जैसी मंथर चाल से घूमती-फिरती चिड़कली- यकायक हमीद की निगाहों में स्थिर हो जाती है।
    हंस कर उस की बात मानने वाली लड़कियों को वह दूसरे ही दिन भूल जाता पर चिड़कली की रक्तिम आंखें वह नहीं भूला सका। गुस्से से तमतमाये चेहरे की जगह वह मुस्कुराता चेहरा देखना चाहता है और चाहता है कि चिड़कली अपने आप मान जाए।
    दोपहर के समय एक बार चिड़कली कीकर के नीचे बैठी सुस्ता रही थी। होले-होले पैर रखते हुए हमीद उस कीकर के पास पहुंचा। चिड़कली खुद में खोई थी। उसे के आने की उसे खबर ही नहीं लगी।
    कुछ दूरी पर खड़ा वह चिड़कली को निहारता रहा। चेहरे पर चिंता और मजबूरी की रेखाएं। बाएं हाथ में एक तिनका लिए, वह उस से दांत कुचर रही थी।
    सिर पर होले-से थपकी दे कर हमीद ने उसे सचेत करने की सोची पर हिम्मत का हाथ बढ़ ना सका।
    “सुस्त कैसे है, चिड़कली?” मधुर स्वर में हमीद बोला।
    वह चौंकी जैसे बिच्छू ने डंक मार दिया हो। फुर्ती से खड़ी होने लगी।
    “बैठी रहो, बैठी रहो” हमीद ने हाथ से टोक दिया- “मैं कुछ नहीं करूंगा।"
    वह सचेत हो कर बैठ गई। अब वह तिनके से जैसे मिट्टी पर मांडने बनाने लगी।
    “क्या हुआ तुम्हारे? ऐसे कैसे सुस्त और उदास रहती है?”
    उस ने जबाब नहीं दिया।
    कीकर की फली तोड़ कर हमीद ने उसे होले-होले मसला और दूर गिराते कहा- “मेरी नियत खराब नहीं पर तुम मुझे अच्छी लगती हो। जिस समय देखा, उसी समय से मेरे मन में तेरी ठौर बन गई।”
    “इस में मैं क्या करूं ठेकेदारजी”, चिड़कली शांत नहीं थी, यह बात उसकी ऊपर-नीचे होती कांचली कह रही थी।
    “अच्छा लगता है उसे हर कोई पाना चाहता है।” हमीद का स्वर बहुत धीमा था।
    “आप को तो मेरा काम अच्छा लगना चाहिए, तभी मुझे रोजगार मिलेगा।”
    “तुम तो निरी भोली हो, चिड़कली”, वह उसे समझाने लगा- “तू ने मेरे मन को गिरफ्त में ले लिया। एक बार मन की बात रख दे। रोजगार की चिंता फिर रहेगी ही नहीं।”
    गर्दन उठा कर उस ने उस के सामने देखा। कुछ समय एकटक देखती रही, फिर पूछा- “मन रखने के बाद आप अपने घर ले कर चलेंगे क्या? पत्नी बना क्र रखेंगे मुझे?”
    उस से जल्दी से उत्तर नहीं बना। कीकर की डाले पकड़ता छोड़ता रहा। कांट गड गया और अंगुली से खून गिरने लगा। अंगुली चूस कर खून बंद किया। फिर दीनता से हंसने की चेष्टा करते हुए बोला- “मजाक कर रही है क्या? तुम दूसरे की ब्याहता घर में कैसे रख सकता हूं।"
    “मैं मेरे मरद को छोड़ कर आ जाऊंगी। बोलिए है मंजूर? फेर जैसा आप चाहे होगा।” चिड़कली की नजरें उस पर टिक हुई थी।
    हमीद का गला सूखने लगा। माथे पर पसीने की बूंदे चमकने लगी। उसे समझ नहीं आया कि आज इतना बेवश कैसे हो गया। दूसरी मजदूरनियां उस के सामने होंठ तक नहीं हिला सकती पर यह तो सवालों के और वे भी इतने ऊंचे टीलों जैसे खड़े कर दिए कि वह उन टीलों में धंसता ई जा रहा है।
        कुछ समय चिड़कली उस को देखती रही, फिर नम्रता से बोली- “आप मेरे माई-बाप हो ठेकेदारजी। मजबूरी की मारी मैं आती हूं। आप को पैसों के बल पर मुझ से भी रूपवती मिल जाएगी। आप के किस बात की कमी। आप मुझे माफ कर दें ठेकेदारजी।”
    चिड़कली ने हमीद के पैर पकड़ लिए।
    “आपकी चाहत मैं पूरी नहीं कर सकती। अप को मेरी चाम प्यारी है पर यह मेरे मरद की है। उस पर मैं आंच नहीं आने दूंगी।” चिड़कली खड़ी हो गई- “अब यहां नहीं तो किसी दूसरी जगह काम करूंगी। मुझे माफ करना ठेकेदारजी।”
    उस ने एक बार हमीद की तरफ देखा, फिर गर्दन नीची किए रवाना हो गई।
    हमीद संज्ञाविहीन हो गया। जाते उसे देखता रहा। फिर जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाता उस के करीब पहुंचा और दीनता से बोला- “नहीं-नहीं यहीं काम कर। तुझे मेरी सौगंध। तुझे यहीं काम करना है। ... तुझे कोई कुछ नहीं कहेगा। किसी चीज वस्तु की जरूरत हो तो चेलवोजी से कह देना।”
    वह चिड़कली के सामने भी नहीं देख सका।
    तेज-तेज कदमों को उठाता मोटरसाइकिल के करीब पहुंचा, किक लगा कर स्टार्ट की और धुंआ छोड़ता निकल गया।
  
    ढाई-तीन महीनों क्वाटरों का काम चला पर हमीद एक बार भी नहीं आया। चलवोजी ही काम देखते रहे।
    काम करते हुए चिड़कली ने एक दिन अचानक सोचा- “ठेकेदारजी इन दिनों एक बार भी नहीं आए, क्या हुआ होगा उन के.... एक बार आए तो कितना अच्छा रहे....।”
०००००
अनुवाद : नीरज दइया


अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति,अमेरिका की प्रमुख त्रैमासिक पत्रिका “विश्वा” (प्रधान संपादक श्री रमेश जोशी, ओहायो) के अक्टूबर, 2017 अंक में प्रख्यात कहानीकार श्री बुलाकी शर्मा की प्रसिद्ध राजस्थानी कहानी का हिंदी अनुवाद प्रकाशित हुआ है। 




24 जून, 2017

राजस्थानी कविता / अर्जुनदेव चारण / अनुवाद : नीरज दइया

अर्जुनदेव चारण
उमादे  

मारवाड़ में रूठी रानी नाम से विख्यात उमादे जैसलमेर के राजा की पुत्री थी- उसका विवाह जोधपुर के राजा मालदेव से हुआ। विवाह के समय ही जैसलमेर के राजा मालदेव को मारने का षड्यंत्र किया, किंतु मालदेव को पहले ही षड्यंत्र की भनक लग जाती है और वह अपनी चतुराई से बच जाता है। विवाहोपरांत जब पहली रात मालदेव रानी उमादे से मिलने उसके महल पहुंचता है तब वह शृंगार कर रही होती है। राजा को आया देख उमादे अपनी सखी भारमल को कहती है कि मैं जितने तैयार हो कर आती हूं तुम राजाजी की खातरदारी करना। भारमली राजा मालदेव की आवभगत करती है- वह उनको शराब देती है। मालदेव शराब पीते-पीते भारमल को अपनी गोद में बिठा कर शराब पिलाने लगता है। ऐसे समय में उमादे वहां पहुंचती है- वह दृश्य देख उमादे क्रोधित हो जाती है और दीपक को ठोकर से बुझा कर वहां से वापस चली जाती है। उसके बाद वह जब तक जिंदा रही मालदेव से अनबन रखी और रूठी रानी के नाम से विख्यात हुई। वह मालदेव की पहली रानी से उत्पन पुत्र राम को गोद लेती है और जिंदा रही तब तक उसके साथ रही। अपने पहले पुत्र राम को मालदेव ने जोधपुर से निष्कासित कर दिया तो उसके ससुराल वाले उसे “कीरवै” की जागीर दे देते हैं। ताजिंदगी अपने पति से संवादहीनता के उपरांत उमादे को जब मालदेव की मृत्यु का समाचार मिलता है तब वह सती होती है। सती होने से पूर्व दुनिया के समक्ष अपनी पीड़ा प्रकट करती है- “औरतों अपने पति से अधिक समय रूठना मत और दूसरे के पैदा किए को गोद मत लेना, वह अपना कभी नहीं होता।“ प्रीत को तरसती रानी की पीड़ा को प्रकट करती हैं ये कविताएं-
 
(1)

 
जिंदगी के आह्वान में
अक्षरों का महत्त्व नहीं है उमादे
महत्त्व है मात्रा का
जिसके बल पर
सृष्टि रचती है
शब्दों का आवरण
और शब्दों के हिस्से में है-
उनका लघु या गुरु होना।
वह मात्रा ही होती है उमादे
जो ‘ना’र’ (नाहर) को ‘नार’ (नारी) बना कर 

                  
छीन लेती है नाखून और दांत।
किंतु इसमें भी
सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होती है
वह आधी मात्रा
जो सभी अक्षरों के अर्थ
कर देती है परिवर्तित
और उसी के बल पर
बदल जाते हैं-
अपनी जिंदगी के अर्थ।

तुम
सभी वर्णों को कर वशीभूत
करती रही जद्दोजहद
जिंदगी जीने की
परंतु वह आधी मात्रा
सदैव तुम्हारी पकड़ से बाहर
कोसों दूर खड़ी हंसती रही।
‘पीव’ और ‘प्रीत’ में
सिर्फ आधी मात्रा का ही
होता है अंतराल उमादे 


छंद तो इस आधी मात्रा को
बोलते समय अस्तित्वहीन मान नकार देता है
परंतु मनुष्य जीवन में
यह नाकुछ आधी मात्रा
मनों भार लिए स्थिर रहती है।
बड़े-बड़े गढ़पतियों की औकात
दिल्लगी में बिखरा जाती है
यही नाकुछ आधी मात्रा।

‘रीस’ (क्रोध) और ‘रूस’ (रूठना) का
वजन तो बराबर ही होता है
मात्राएं भी होती हैं एक जैसी
लघु-गुरु-लघु
तो फिर
क्यों है इतना अंतर?
रीस मनुष्य को सदैव
लघु से लघूत्तर बना
खड़ी रहती है अकेली,
रूठने के संग
हमेशा दिखाई देती है- मनुहार
छुप्पम-छुपा का खेल खेलती
झुकने को प्रयासरत
करती हुई स्वयं की ही
मान मर्दना/यह आधी मात्रा
अपनी पूरी जिंदगी में
सातों रंगों को
पकड़ने में प्रयासरत रहती।

रीस तो
सिर्फ एक रंग ई जानती है
दूसरों को
स्वयं के पैरो में झुका कर
होती है खुश,
अपने बड़प्पन का
गर्व पोषित करता
यह लाल रंग
कब गहरा हो कर
बन जाता है किरमिचिया
और अंततः
अंधकार से सूत्र जोड़ता
हो जाता है अदृश्य।
फिर ऐसी आंखें
तुमने तुम्हारे चेहरे पर
क्यों चिपका ली?

झुकने का अर्थ
हार नहीं होता है उमादे!


इस आधी मात्रा के समक्ष
समर्पण
हमें सौंप देता है-
संपूर्ण दुनिया का साम्राज्य।
भारमली तुम्हारी सखी
जानती थी यह तथ्य
उसके पास था
इस आधी मात्रा का
अनमोल खजाना।
तुम्हारे ही तो
संग रहती थी वह।
तो फिर क्यों था
इतना फर्क।
वह प्रीत नगर की
नामचीन अमीर बनी
और तुम?
तुम सिर्फ एक मोती की आशा लिए
जीती रही जिंदगी
जिसकी चमक
समय-सागर में
अंततः उतर ही जानी थी।
तुम्हारे हिस्से तो
प्रीत-खजाने से
एक कण भी नहीं आया उमादे,
रानी होने का मद
तुझे ताजिंदगी
प्रीत की सीढ़ियां
चढ़ने से रोकता रहा।

बड़ा होने के लिए
लघुता का भेद जानना
जरूरी होता है जिंदगी में,
जो लघु होने की
जानता है कला
वही हो सकता है विराट
किंतु जब हम
दो लघुओं के मध्य बैठे गुरु को
दे देते हैं उतना सम्मान
तो यही गुरु
हमें लघु से भी लघूत्तर बना कर छोड़ता है।
इतिहास
काफी बार
इसी तरह से
मजाक करता है
मानवता से।
आने वाली पीढ़ियां
जब इस मजाक का
रहस्य समझ लेती हैं
तभी अक्षरों के बाजार में
उन ढाई अक्षरों का
मूल्यांकन हो सकता है।
समर्पण तो
समान अर्पण है
दोनों पक्षों का
इसलिए
दोनों ही पक्ष
आनंद के अंदर
झुके दिखाई देते हैं
तुम इतनी ऐंठ गई
कि झुकना ही भूल गई उमादे।
अपने अंतिम दिनों
तुम्हारे समक्ष खुला
इस आधी मात्रा का अर्थ
औरतों अपने पति से
अधिक समय रूठना मत
चिता चढ़ने से पहले
यही थे तुम्हारे अंतिम शब्द
यह था पूरे जीवन का सार
कि तुम्हें दिखाई दिए
आगामी सातों संसार
और तुम
जाग्रत करना चाहती थी
आने वाली पीढ़ियों को।
तुमने
अनावृत्त कर दिया
दुनिया की आधी आबादी के समक्ष
झूठ के कठोर दरवाजों में बंद
सच का
अनदेखा अक्श
कि यह आधी मात्रा ही
दुनिया की
पूरी आबादी का
मान वर्धन करेगी।
०००

(2)

 
क्या प्रीत से पगी देह
हो जाती है अबोली?
तो फिर
यह रस
रूठने में
और रूठना क्रोध में
क्यों और कैसे हो जाता है परिवर्तित
तुम्हें पहचानते हुए
मैं पहचानना चाहता हूं उमादे।

प्रीत की जबान
किस प्रकार बंद कर देती है द्वार
कि सिर्फ रूठना ही दिखाई देता है
दिखाई देता है क्रोध
परंतु बहुत दूर
छिपी हुई प्रीत
दुनिया को दिखाई क्यों नहीं देती।
क्या हर बार
ऐसे ही
प्रीत को प्रगट करने के लिए
जाग्रत करनी होगी अग्नि
लपटों का रंग तो
प्रीत के रंग से
बेहद अलहदा होता है उमादे
तो फिर
स्वय़ं को पहचान के लिए
तुमने यह रंग क्यों स्वीकारा?
युगों-युग
आने वाली पीढ़ियों को
सुनाने के लिए एक कहानी?
शायद पीढ़ियां
इसी को इसी बहाने
प्रेम-कथा कहकर पहचानेगी?
छल
सिर्फ छलावा है तुम्हारा जीवन उमादे,
पिता का
पति का
सखी का
और गोद लिए
किसी दूसरे के पुत्र का।
प्रीत को स्वीकारने
खड़े होने की जिद
और ऐसी कठोर सजा?

तुम कितनी बार मरती रही
उसी एक जीवन में
बचाए रखने को
अपनी प्रीत को स्वच्छ
तो फिर
छल करने वाली इस दुनिया में
तुमने प्रीत रचने के स्वप्न क्यों देखे?
प्रीत कहां बसती है
संबंधों के उन तंतुओं के मध्य?
किस प्रकार पहुंचती है वह
अपने उस दूसरे स्वरूप तक?
उन तंतुओं को
अपने से दूर
 

विकसित होने की कल्पना करने वाला
हर बार क्यों मारा जाता है बेमौत?
क्या प्रीत इसी प्रकार फैलती है
एक देही से दूसरी देही तक?
वह स्पर्श
उष्मित होता है या राख कर देने वाला?
या कि होता है
हिमालय से भी बड़ा?
इस विशालता को
चेतनावान बनाने के प्रयास करती जिंदगी
प्रीत की अग्नि को
संपूर्ण सृष्टि को
प्रकाशवान करने का स्वप्न देखती है।

फिर ऐसा क्यों हुआ
कि वह विशालता ले बैठी
तुम्हारे अधर
क्यों उसने पकड़ ली
तुम्हारी गर्दन
क्यों उतर आई गहरे
तुम्हारे अंतस तक
अब यह रहस्य
कौन बताएगा?
भारमली?
या कि मालदेव?
पूछें उस दरवाजे से
कि पूछंे उस दीपक से
जिसे तुमने
पैर की ठोकर से बुझाया और
तुम वापस लौट गई।
उस ठोकर की धमक
यह संसार
आज तक सुन रहा है उमादे
तुमने किसकी जिंदगी में
किया अंधेरा?
मालदेव के महलों तो
उसके बाद भी
सदा-सदा रही
जगमगाहट,
जगमगाती ही रही
भारमली
बिना किसी कांकण-डोर
बिना चंवरी-फेरों के भी
वह राज करने को बैठी
गढ़ जोधांण,
और तुम
‘कीरवा’ की सीमाओं में खड़ी
सहलाती रही अपना मान।
घर तो तुम्हारा था उमादे
परन्तु उस एक ठोकर के बल
बिखर गया वह घर।
उस रात्रि
कपाट रंग-महल के
तुम्हीं ने बंद किए थे
परंतु तुम्हारे भाग्य-कपाट के
हमेशा-हमेशा के लिए
लग गए हांे जैसे ताले
जिनकी चाबियां
न मालूम किस अबूझ कुएं में
ले जाकर गिराई उस रात ने
जो तुम्हारी बैरन बन
आई थी।

‘कीरवा’ की सीमाओं से
जोधपुर बहुत दूर था उमादे
परंतु वह हमेशा
तुम्हारे अपनापे
तुम्हारे भरोसे को
ठोकरें मारता हुआ
करता रहा लहूलुहान।

तुम जब कभी
करती थी याद उस रात को
जो छौंकती रही
तुम्हारे क्रोध को
और अबोलेपन की
वह घुलगांठ
अधिक मुश्किल में घिर जाती।
‘कीरवा’ के छोर पर ही तो
बैठा था चारभुजाधारी
प्रीत को मान देने वाला
राधा का, मीरा का
और लाखों लाख अनाथों का नाथ
तो फिर तुम्हें
वह क्यों याद नहीं आया उमादे?
तुम्हारी यादों में तो
बसता था फकत मालदेव
तुमने उसे
जितना खुद से दूर किया
वह उतना ही
बींधता रहा कलेजा तुम्हारा।
प्रीत में
मान-अपमान कहां होता है उमादे?
यदि होता है मान
तो फिर कहां रहती है प्रीत?
प्रीत की सीढ़ियां चढ़ने की
पहली शर्त है
मान को बिठाए रखना
कभी पूछना राधा से
या फिर मीरा से
आभल को पूछ लेती
या फिर पूछती नागवंती को
‘‘सोए खूंटी तान,
बतलाएं, बोलते नहीं।
कभी पड़ेगा काम,
मनुहार करोगे नागजी।’’
प्रीत के पास तो सिर्फ मन होता है
आंखें कहां होती हैं?
वह तो हमेशा जिंदा रहती है
कबंध-शरीर
शायद इसी लिए अंधी कहलाती है।
तुम्हारी जिंदगी की कामना
सहेजना चाहती थी
प्रीत के पुहुपों की
पहली-पहल सुवास
परंतु तुम्हारे हिस्से
किसने डाल दी
कांटों भरी भारी
यदि नहीं होती भारमली
तो कोई दूसरी होती
तुम्हारे जीवन में
दूसरी का योग
ताजिंदगी बना रहता।

अपने क्रोध में
तुम भूल बैठी
कि तुमने ही तो भेजा था उसे
करने खातरदारी अपने पति की,
एक दासी
कैसे करे खातरदारी राजा की?
रानियों का मान
यह बात
क्या नहीं जानती थी?
क्या तुमने जानी कभी
भारमल की पीड़ा?

अपनी पीड़ा का पर्वत
बड़ा और बड़ा करती रही तुम
और सारा दोषारोपण
भारमल के हिस्से मंड दिया।

तुम दोनों छली गईं
अपनी-अपनी जगह
तुम दोनों को तो
मिल कर करना था प्रतिकार
बचाने के लिए खुद की अस्मिता
अपनी पहचान।
शायद इसी से बच जाता
तुम्हारा और उसका
दोनों का मान
और उस मान के खूंटे
तुम बांध देती
भोग की गंदगी में कुलबुलाते
वहां खड़े उस जीव को
जिसने झूठा हाथी बना कर
खड़ा कर दिया था
आसानंद ने तुम्हारी तुलना में।
‘‘मान रखे तो पीव तज,
पीव रखे तज मान।
दो हाथी बंधते नहीं,
एक ही खूंटे-ठान।।’’
झूठा था कवि
पीव और मान
दोनों को हमेशा चाहिए
एक पहनावा
जिसको पहन कर वे धारण करते हैं
अपना-अपना स्वरूप
पिता-भाई-पति
इनके पास होता है
सिर्फ अपने पैरों में
झुकाने का आदेश
इनके हाथों में होती है
नियमों की ताजा बैंत
परंतु
प्रीत कोई नियम नहीं मानती उमादे।
सड़ाक-सड़ाक-सड़ाक के सरड़ाटे
पड़ते रहते कमर पर
वह जमी हुई लील
उन मानधारियों का यश गाती है
तुमने वहां
मान रखने की जिद क्यों की?
०००००

18 मार्च, 2017

कविता का पंजाबी अनुवाद / अमरजीत कौंके

कैनेडा से निकलने वाली पत्रिका ‘‘पंजाब टुडे” के नए अंक में `भाषांतर’ में श्री अमरजीत कौंके द्वारा किए कविताओं के अनुवाद मेरी कविता भी शामिल हुई है। साथ अन्य कवि हैं- श्री मंगलेश डबराल, डा.अनीता सिंह, अन्नू प्रिया, डा. ऋतू भनोट, डा. संतोष अलेक्स, आशा पांडेय ओझा और ज्योति आर्य।
शुक्रिया पंजाब टुडे टीम और कवि मित्र कौंके जी
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ਸ਼ਬਦਾਂ ਦੀ ਨਦੀ ਵਿਚ / ਨੀਰਜ  ਦਈਆ

ਮੈਂ
ਸੰਭਾਲ ਕੇ
ਰੱਖਿਆ ਹੈ
ਤੇਰਾ ਦਿੱਤਾ ਹੋਇਆ
ਗੁਲਾਬ

ਜਦੋਂ
ਤੂੰ ਦਿੱਤਾ ਸੀ
ਉਦੋਂ ਮੈਂ ਨਹੀਂ ਸੀ ਜਾਣਦਾ
ਉਸਨੂੰ ਲੈਣ ਦਾ
ਮਤਲਬ

ਨਹੀਂ ਜਾਣਦਾ ਸੀ
ਮੈਂ
ਕਿ ਕਿਸੇ ਨੂੰ
ਵੀ ਮਿਲ ਸਕਦਾ ਹੈ
ਚਾਹੇ ਅਣਚਾਹੇ
ਕੋਈ ਵੀ ਗੁਲਾਬ

ਹੁਣ ਤੂੰ
ਮੇਰੀ ਆਤਮਾ ਦੇ
ਵਿਹੜੇ ਵਿਚ
ਗੁਲਾਬ ਦੇ
ਫੁੱਲ ਦੇ ਨਾਲ
ਜਿਉਂਦੀ ਹੈਂ

ਤੇ ਮੇਰੇ
ਸ਼ਬਦਾਂ ਦੀ ਨਦੀ ਵਿਚ
ਉਡੀਕ ਦੇ ਨਾਲ
ਵਗਦੀ ਹੈਂ......

हिंदी कविता 
शब्दों की नदी में

मैंने संभाल रखा है
तुम्हारा दिया हुआ-
गुलाब ।

जब तुमने दिया था
तब मैं नहीं जानता था
उसे लेने का अर्थ।

नहीं जानता था मैं
कि किसी को भी मिल सकता है
चाहे-अनचाहे अचानक
कोई भी गुलाब ।

अब तुम
मेरे अंतस के आंगन में
गुलाब के फूल के साथ जीती हो
और मेरे शब्दों की नदी में
इंतजार के साथ बहती हो ।
००००

26 नवंबर, 2016

प्रेम का कांटा

लेखक परिचय
मधु आचार्य ‘आशावादी’
जन्म : 27 मार्च, 1960 (विश्व रंगमंच दिवस)
शिक्षा : एम. ए. (राजनीति विज्ञान), एलएल.बी.
सृजन : 1990 से हिंदी और राजस्थानी की विविध विधाओं में निरंतर लेखन। ‘स्वतंत्रता आंदोलन में बीकानेर का योगदान’ विषय पर शोध।
प्रकाशन : राजस्थानी साहित्य : ‘अंतस उजास’ (नाटक), ‘गवाड़’, ‘अवधूत’, ‘आडा-तिरछा लोग’ (उपन्यास) ‘ऊग्यो चांद ढळ्यो जद सूरज’, ‘आंख्यां मांय सुपनो’ (कहाणी-संग्रह), ‘अमर उडीक’ (कविता-संग्रह), ‘सबद साख’ (राजस्थानी विविधा) का शिक्षा विभाग, राजस्थान के लिए संपादन।
हिन्दी साहित्य : ‘हे मनु!’, ‘खारा पानी’, ‘मेरा शहर’, ‘इन्सानों की मंडी’, ‘@24 घंटे’, ‘अपने हिस्से का रिश्ता’ (उपन्यास), ‘सवालों में जिंदगी’, ‘अघोरी’, ‘सुन पगली’, ‘अनछुआ अहसास और अन्य काहनियां’ (कहानी-संग्रह), ‘चेहरे से परे’, ‘अनंत इच्छाएं’, ‘मत छीनो आकाश’, ‘आकाश के पार’, ‘नेह से नेह तक’, ‘देह नहीं जिंदगी’ (कविता-संग्रह), ‘रास्ते हैं, चलें तो सही’ (प्रेरक निबंध), ‘रंगकर्मी रणवीर सिंह’ (मोनोग्राफ) अपना होता सपना (बाल उपन्यास)
पुरस्कार : उपन्यास ‘गवाड़’ पर राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर का ‘मुरलीधर व्यास राजस्थानी कथा-पुरस्कार’, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, जोधपुर द्वारा ‘राज्य स्तरीय नाट्य निर्देशक अवार्ड’, ‘शंभू-शेखर सक्सेना विशिष्ट पत्राकारिता पुरस्कार’
अन्य : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली के राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल के सदस्य, लगभग 75 नाटकों का निर्देशन और 200 से अधिक नाटकों में अभिनय, कुछ रचनाएं अन्य भारतीय भासाओं में अनूदित-प्रकाशित। विश्वविद्यालयों द्वारा रचनाओं पर शोध-कार्य।
स्थाई संपर्क : कलकत्तिया भवन, आचार्यां का चौक, बीकानेर (राजस्थान)
ई मेल : ashawaadi@gmail.com  /  मो. 9672869385
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राजस्थानी कहानी
प्रेम का कांटा
मूल : मधु आचार्य ‘आशावादी’ ० अनुवाद : नीरज दइया
    बचपन से ही उसे घर में सारी सुविधाएं मिल गई। इसलिए मंजू उम्र से पहले ही व्यस्क हो गई। घर में ए.सी. था, एल.ई.डी. था, हाथ में स्मार्ट फोन था और कहीं आने-जाने की आजादी के साथ स्कूटी थी। ये सभी चीजें कुछ उम्र लेने पर किसी को मिला करती है, परंतु मंजू को तो समझ पकड़ते ही सब कुच मिल गया था।
    घर में किसी भी काम-काज के लिए नौकर थे, इसलिए कुछ काम तो उसे करना ही नहीं पड़ता था। मुह से बाहर आए शब्दों के साथ ही सब कुछ हाजिर हो जाता। समय ही समय था। हाथों में स्मार्ट फोन था इसलिए जैसा मन करता, वही करती। नई तकनीक और फोन ने तो दुनिया को मुट्ठी में ला दिया।
    घर बैठे पूरे संसार का भ्रमण, चाहे विदेश जाओ। कई भांति के तरीके हैं जिस से दूर बैठों को नजदीक देखो। आमने-सामने बात कर लो। एक दूसरे की तश्वीरें देख लो। चैटिंग कर लो। फेसबुक जैसा साधन है, जिसे चाहो दोस्त बनाओ और बातें करो। इंटरनेट ने दुनिया की सारी दूरियां तो पाट ही दी। फेसबुक तो लिखने और लिखे हुए पर कुछ कहने का बड़ा साधन बन गया। मंजू भी फेसबुक का बहुत उपयोग करती। उसकी फ्रेंडलिस्ट बहुत लंबी थी। उसी में वह दिन-रात लगी रहती।
    मां रोटी खाने के किए आवाजे लगाती रहती, तो मंजू कहा करती- मां, अभी मेरी अमेरिका की सहेली से बात चल रही है। यह पूरी हो जाए तो आती हूं।
    - तुमने तुम्हारी उस सहेली को देखा है क्या?
    - मां, फोटो लगी हुई है ना।
    - उसके बारे में जानती है क्या?
    - जानने की क्या जरूरत है। अपने को तो बातें करनी हैं।
    - बिना पहचाने कोई किसी का दोस्त कैसे हो सकता है।
    - मां, अब जमाना बदल गया है।
    - क्या बदल गया।
    - इंटरनेट से तो लोग व्यापार चलाते हैं और इस से बड़े-बड़े दूसरे काम भी करते हैं।
    - मुझे भी बता तो सही कि क्या क्या काम करते हैं।
    - अरे मां, तुम नासमझ हो। तुमको कुछ समझ नहीं आता।
    - मुझे समझ नहीं आता तभी तो तुझ से कह रही हूं कि तू समझा।
    - देख मां, पहले नेता चुनाव के समय वोट मांगने घर-घर जाया करते थे। पर अब तो एक साथ सभी वोटरों से वर्ता कर लेते हैं। पान की दुकान हो, चाय की दुकान हो या गांव की चौपाल, दूर बैठे उन से सीधी बात कर लेते हैं नेता।
    - हां, मैंने अखबार में पढ़ा तो था।
    - यह सच्ची बात है मां ! देख लो लोगों ने इसी इंटरनेट के बल पर सरकारें उखाड़ दी और खुद कुर्सी पर बैठ गए। चारों तरफ इसी इंटरनेट का जोर है, तुमको पता है क्या?
    - किस बात का।
    - एक सरकार तो इसलिए बन गई कि उसने सत्ता में आते ही सभी जगह इंटरनेट फ्री कर देने का कहा। लड़के-लड़कियां पीछे पड़ गए और उस पार्टी की सरकार बनवा दी।   
    - मेरी बिटिया, इस तुम्हारे इंटरनेट से सारी चीजें दूर से देखते हैं। एक न एक दिन तो उनकी पोल खुलती ही है।
    - फिर चाहे पोल खुलो, पर एक बार तो सत्ता में आ गए ना।
    - मुझे तो तुम्हारी बातें पसंद नहीं आती। तुम्हारे इस नेट को छोड़ और पहले खाना खा ले। खाना खा कर फिर से चला लेना। यह कहीं जा थोड़ी ही रहा है।
    - हां, यह बात तुम्हारी ठीक है। चलो, खाना खाते हैं।
    मंजू उठ कर मां के साथ रसोईघर में आ गई। खाना खाने बैठी। पापा भी आ गए थे। वे भी खाना खाने बैठ गए। मां ने खाना खाते खाते फिर बात चालू की।
    - यह तुम्हारी बेटी तो सभी काम नेट से करती है। पूरा दिन उसी से चिपकी रहती है।
    - आजकल इसी का चलन है। यह क्या गलत करती है।
    - अरे नेट पर सब कुछ अच्छा ही नहीं होता। यह भी तो लोग कहते हैं।
    - जो नेट चलता है उसको अच्छे-बुरे का ज्ञान होता है।
    - छोड़ो तब तो आपकी सह हो गई इसे। चलाना बेटी, मर्जी है तुम्हारी और तुम्हारे पापा की।
    पिता-पुत्री ने खाना खाया और अपने-अपने कमरे में आ गए। मां नेट को लेकर बड़-बड़ करती रही, पर दोनों पर कुछ असर नहीं था।

X    X    X     X

    उस दिन मंजू के इनबॉक्स में एक मैसेज था। उस में किसी लड़के ने उसे फ्रेंड रिक्वेक्ट मंजूर करने का लिखा था। मंजू ने उसकी प्रोफाइल खोल कर देखी। वह जवान था और फोटो में सुंदर दिखाई देता था। उस की टाइम लाइन पर या तो कविताएं थी या फिर भगवान के चित्रों के साथ भक्ति की पंक्तियां। किसी प्रकार की बुरी पोस्ट तो एक भी नहीं थी। मंजू को लगा कि इसे मित्र बनाने में ना नहीं करनी चाहिए। ठीक ही दिखाई देता है। उस की फ्रेंड रिक्वेट उसने एक्सेप्ट कर ली।
    बस, बन गए दोनों दोस्त। उसने बहुत ही सुंदर शब्दों में हाथोहाथ मंजू का आभार प्रदर्शित किया। उसका नाम अरुण था। फिर तो रोजाना कविता की पंक्तियां डालनी आरंभ कर दी। टाइम जब भी मिलता चैटिंग चालू कर देते। उसने बताया कि वह इंजीनियर है और एक कंपनी में काम करता है। घर में माता-पिता और दो बहने हैं, जिन का विवाह कर दिया। खुद ने अभी तक विवाह नहीं किया है।
    अरुण ने जब इतना बताया तो मंजू ने भी अपने घर के बारे में सब बातें बता दी। यह भी बता दिया कि वह करोड़पति पिता की इकलौती संतान है और घर में किसी चीज की कमी नहीं है, उसके पूछने पर यह भी बता दिया कि अभी तक ना तो मेरा विवाह हुआ है और ना सगाई।
    अरुण दूसरे शहर में रहता था। अब तो दिन में कई बार अरुण और मंजू चैटिंग करने लगे। बहुत बातें होने से दोनों नजदीक आते हैं, यह तो स्वभाविक ही है। अब दोनों ने आपस में ‘जी’ लगाना छोड़ कर मन लगा लिया। नाम से ही एक दूजे को लिखने लगे। दिन-भर की हर बात एक दूसरे को बताते रहते और यह भी कि बताते कि अभी कहां हैं।
    इंटरनेट ने उन दोनों के बीच की सारी दूरियों को कम कर दिया। अब तो रात को भी लंबी-लंबी चैटिंग होने लगी। दोस्ती की बातें प्रेम में बदलने लगी। आरंभ में तो दोनों डरते रहे, पर उम्र के असर के चलते एक दिन मंजू ने हां कह दिया। अब तो आपस में बहुत बातें होने लगी और बातें प्रेम की ही होती। दोनों आपस में वे बातें भी करने लगे जिनसे लोग बचा करते हैं। यह भी तय कर लिया कि यदि घर वाले नहीं मानेगे तो भाग कर विवाह कर लेंगे। मंजू में अब बदलाव आने लगा था, जो उसकी मां को तो साफ दिखाई देता था।
    एक दिन मंजू ने अपनी मां के सामने अरुण की बात की और कह दिया कि मैं शादी उसी से करूंगी। मां ने मंजू के पापा के सामने यह बात तो उन्हें धक्का लगा। इंटरनेट की दुनिया से खोजा गए दुल्हे की बात हलक से नहीं उतरी।
    माता-पिता ने मंजू को बहुत समझाने की कोशिश की, पर वह तो टस से मस नहीं हुई। कह दिया कि आप हंसी-खुशी शादी कर दें तो ठीक है, नहीं तो हम दोनों अपने आप ही शादी कर लेंगे। मां का मानना था यह सब इंटरनेट के कारण ही हुआ है। इसे बंद करवाएं। पर बेटी की जिद के सामने अड़ना पिता के भी बस की बात नहीं रही।

X    X    X     X

    विवाह के इस झगड़े में कई दिन निकल गए। मंजू और अरुण की रोजाना बातें होती थीं। मंजू ने एक दिन उसे अपने शहर में आने का कहा। पहले तो उसने ना कह दिया लेकिन फिर आने के लिए राजी हो गया। मंजू उसके शहर नहीं जा सकती थी।
    आमने-सामने तो अब तक कभी वे नहीं हुए थे। इसलिए ही मंजू ने ऐसा कहा था। दिन तय हो गया और अरुण ने आने का कह दिया। दोनों मन खोल कर मिले। शादी की बात हुई और तय कर लिया कि घर वाले यदि नहीं मनते हैं तो हम अपने निर्णय पर अटल रहेंगे।
    शादी कब करेंगे इस विषय पर बातें हुई। मंजू ने तो उसी दिन साथ चलने की बात कर ली थी। अरुण ने बताया हुआ था कि उसने घरवालों से बात कर रखी है उन्हें कोई ऐतराज नहीं है। मंजू ने कहा कि बस मुझे तो तुम्हारे घर में ही रहना है। यहां से चलें। नहीं तो घरवाले हमें एक नहीं होने देंगे।
    अरुण ने यह नहीं सोचा था कि मंजू तुरंत ही साथ चलने का कह देगी। वह कुछ असमंजस में पड़ गया। मंजू अपने मां-पापा की बात जानती थी। चाहे वे शादी के लिए हां नहीं कर रहे हो, पर मंजू उनकी इकलौती बेटी थी, इसलिए उसकी बात टालने की हिम्मत उनमें नहीं थी।
    मंजू ने देखा कि अरुण कुछ डर रहा है तो उसने अपने घर चलने का कह दिया। पर अरुण को यह भी ठीक नहीं लगा। उसने बातों में उसे राजी किया और एक महीने के बाद शादी करने की हां कर दी। साथ में यह भी कह दिया कि अगर घरवाले नहीं मानेंगे तो हम खुद शादी कर लेंगे।
    अरुण ने जाते-जाते मंजू को कल की फेसबुक पोस्ट देखने का कहा। मंजू ने कहा कि मैं तो हमेशा ही देखती हूं। पर उसने अखरा कर फिर कहा कि कल जरूर देखना। कसमें खा कर दोनों एक दूसरे से जुदा हुए। अरुण अपने शहर वापिस चल गया। मंजू खुशी-खुशी घर लौट आई। एक महीने की ही तो बात है। यह समय भी जल्दी-जल्दी बीत जाएगा।
    उस दिन वह मां से नहीं झगड़ी। हंसती रही। मां को भी यह बात कुछ अजीब लगी, पर उससे कुछ नहीं पूछा। रात को सोने गई तो सुबह का इंतजार था। अरुण कह गया था कि फेसबुक की पोस्ट देखनी है। मंजू ने सोचा कि वह कोई कविता लिखेगा।
    आज उसे अरुण से चैटिंग करनी थी पर वह एक बार भी ऑनलाइन नहीं आया। फोन मिलाया तो स्विच ऑफ था। पर इस बात को मंजू ने गंभीरता से नहीं लिया। उसे तो सुबह की पोस्ट और एक महीने का इंतजार था। इसी में खोई रही वह।
    सुबह मंजू की आंख जल्दी खुल गई। चाय भी नहीं पी। उसे अरुण की बात याद थी। इसलिए सबसे पहले फेसबुक खोली और उस की प्रोफाइल पर गई। देख कर चक्कर आ गया।
    अरुण ने अपनी पत्नी और दो लड़कों का चित्र डाल रखा था। लिखा हुआ था कि आज मेरी बारहवीं एनीवर्सी है। मंजू को यकीन नहीं हुआ। फिर फिर देखा। फोन लगाया तो स्विच ऑफ था। उस की निगाह प्रोफाइल पर गई तो प्रोफाइल की बातें भी बदली हुई थी। खुद को ‘मैरिड’ बताया हुआ था और पत्नी का नाम गीता लिख रखा था।
    इंटरनेट से बने हुए सारे सपने टूट गए। सच सामने आ गया। मंजू ने सब से पहले तो अरुण को ‘अनफ्रेंड किया। मोबाइल में से उसके नंबर निकाले और ‘रिजेक्ट लिस्ट’ में डाल दिए। फिर उठ कर खुद ही चाय पीने गई।
    वहां मां-पापा दोनों बैठे थे। चाय ली और सामने बैठ गई।
    - पापा, यह स्मार्ट फोन रखिए। मुझे अब फोन नहीं रखना। और घर का इंटरनेट कनेक्शन भी कटवा देना।
    दोनों चक्करा गए, यकायक यह क्या हुआ, कुछ मालूम नहीं चला। मंजू उठी और चलते-चलते बोली- आप जहां कहेंगे वहां शादी करूंगी। बस मेरी एक प्रार्थना है कि मुझे उम्रभर फोन मत देना। यदि फोन दें तो इंटरनेट मत देना।
    पिता बात समझ गए।
    - बेटा, इंटरनेट खराब नहीं है। पर इंसानी रिश्तों में केवल इसी से काम नहीं चलता। इस के लिए तो सभी कुछ देखना होता है। इसे केवल जानकारी के लिए काम में लेंवे तो कोई खराबी नहीं है। तुम यह फोन रखो और इंटरनेट भी रहेगा। बस तुम इसे रिश्तों का नहीं, बस जानकारी का साधन समझना शुरू कर दो।
    मंजू ने निगाहें झुका ली। फोन उठाया और धीमें कदमों से अपने कमरे की तरफ चल दी।
००००००
अनुवाद : डॉ. नीरज दइया
  

15 अक्टूबर, 2016

राजस्थानी कहानी : देश बिराना है

मूल : नवनीत पाण्डे
अनुवाद : नीरज दइया
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कहानीकार का परिचय : 
 नवनीत पाण्डे जन्म: 26 दिसम्बर, 1962 बीकानेर, राजस्थान। राजस्थानी और हिंदी में समान गति से लेखन। प्रमुख कृतियाँ : हेत रा रंग (कहानी संग्रह) माटी जूण (उपन्यास) और बाल साहित्य की कई पुस्तकें राजस्थानी में। सच के आस पास’, ‘छूटे हुए संदर्भ’ और ‘जैसे जिनके धनुष’ (हिंदी कविता संग्रह) प्रकाशित। राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी एवं राजस्थान साहित्य अकादमी से सम्मानित।
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    बात छोटी-सी है कि सरकारी कॉलोनी में क्वाटर आवंटित हो गया है। इस छोटी-सी बात को घर में बताना कितना कठिन है। पिताजी क्या सोचेंगे? बड़े भाई साहब क्या कहेंगे? और मां- वह तो बस.. जैसे सुनते ही रोने लगेगी। कोई रास्ता नहीं, कुछ तो करना ही होगा। सभी को खुश रखना भी जरूरी है। आज ही श्याम बाबू कॉलोनी जाकर आएं हैं, कितने सुंदर क्वाटर्स बने हैं। सभी तिमंजिले, किसी फिल्मी तिलस्म से लुभाते। हरेक में बॉलकोनी और सामने लंबी-चौड़ी सड़क। कितनी खुश होगी सुशीला। उनको सुशीला पर जैसे दया आई- बेचारी! क्या सुख मिला उसे। सुबह-सवेरे सब से पहले उठना, उठते ही चौका-बर्तन। मां-पिताजी, भैया-भाभी और विमला की चाकरी करना, उनको खुश रखना और सांझ ढले थक-हार कर सोने का इंतजार करना। ‘कितने दिन गुजर गए उसे मुझसे बात किए हुए..!’ यह सोच श्याम बाबू अनमने-से हो गए। सुशीला से बतियाए उनको पूरे दो सप्ताह हो गए। इस बीच एक रात को पूरा घर सो गया तो श्याम बाबू उसके करीब पहुंचे तो वह नींद में थी और अचानक किसी को आया देख बेहद डर गई, श्याम बाबू ने कितने मुश्किल से समझाया कि मैं तेरा पति हूं। सात फेरे लिए हैं साथ। उठाकर नहीं लाया। लेकिन वह पत्त्थर कहां समझी। बस- ‘मां उठ जाएगी, विमाला दीदी जाग जाएंगी’ की रट लगाए श्याम बाबू को दूर करती रही। गुस्सा तो बहुत आया पर क्या करते कोई रास्ता नहीं था। अगले ही दिन सरकारी क्वाटर के लिए आवेदन किया और हाथों-हाथ आवटंन भी करवाया। ऐसा कर इतनी खुशी हुई कि शायद ही पहले किसी दिन हुई होगी।
    - क्या बात है, आज गुमसुम कैसे बैठे हो? तबियत तो ठीक है? पिताजी ने पूछा।
    - नहीं कुछ नहीं। श्याम बाबू सवाल सुनकर हकबका गए। बात तो थी और कहना भी चाहते थे किंतु कैसे कहे? पिताजी जैसे स्थिति समझ गए या अपने बेटे का मन पढ़ लिया हो। बोले- कुछ तो है..।
    - बात यह है कि पिताजी.. । बाहर आते आते फिर बात कहीं भीतर अटक गई।
    - बोलो-बताओ। मन पर कोई बोझ नहीं रहना चाहिए। पिताजी ने पीठ पर हाथ फिराते हुए हिम्मत दी।
    - मुझे सरकारी क्वाटर मिल गया है। श्याम बाबू ने जैसे एक ही सांस में भीतर धधकता लावा जैसे उगल दिया।
    - क्या? पिताजी का हाथ जहां था वहीं जड़ हो गया और श्याम बाबू तो जैसे उस बोझ से धरती में धसे जा रहे थे। बेबस थे कहना तो था ही, आज नहीं तो कल।
    - हां S.. पिताजी, कितनी तकलीफ होती है हमें यहां। इतने बड़े परिवार में देखिए इन तीन छोटे-छोटे कमरों से क्या होता है। ना तो ढंग से बैठ सकते हैं और ना रह सकते हैं। श्याम बाबू ने जैसे सफाई दी।
    - पर आज ही ऐसी कौनसी बात हो गई। हमारी तो पुश्तें कट गई यहीं इन कमरों में। क्या तकलीफ है तुम्हें यहां? अलग कमरा चाहिए तो बता, बनवा देता हूं। पिताजी शांत दबे स्वर में बोले।
    - नहीं-नहीं, मैं तो बस...। श्याम बाबू आगे कुछ बता नहीं सके।
    - लोग क्या कहेंगे? रिस्तेदार क्या सोचेंगे। पिताजी लड़खड़ाए स्वर में बुदबुदाए।
    इसी बीच मां और भैया भी आ गए।
    - श्याम अलग होना चाहता है। पिताजी लंबी सांस लेकर बोले।
    - श्याम अलग होना चाहता है। मां और बड़े भैया ने एक साथ दोहराया। भीतर कमरे में ऐसी ही फुसफुसाहट विमला और भाभी की सुनाई दी।
    - बता क्या कुछ बात हो गई? किसी ने कुछ कहा तो अभी फैसला हो जाएगा। बड़े भैया ने कहा।
    - हां कोई बात है तो बता .. । मां की आंखें डबडबा आईं।
    - बात कुछ नहीं, इतने जनों में यह दुखी हो रहा है। पिताजी के स्वर में व्यंग उभरा तो श्याम बाबू ने गर्दन झुका ली।
    - देख श्याम! मैं मानता हूं कि साथ रहने में थोड़ी-बहुत तकलीफ जरूर होती होगी पर अपनापन तो है। सब एक दूजे के सुख-दुख में शरीक हैं। जगह की तंगी जरूर है पर मनों में प्रेम का सागर उमड़ा रहता है। और तू तो जानता ही है कि एक जीव के सौ झंझट होते हैं उसका कौन मालिक होता है। भाई साहब समझा रहे थे।
    - पर मैं कोई लड़ाई कर के थोड़ी ना जा रहा हूं। आना-जाना लगा रहेगा। श्याम बाबू नाराज होते बोले।
    - किंतु घर तो दो हो गए ना। मां आगे बोली- सुशीला ने तो कुछ नहीं कहा। मां का दिमाग चकरा गया।
    - उसे तो कुछ पता भी नहीं। श्याम बाबू ने खीज कर कहा।
    - मुझे तो ये लच्छन उसी के लगते हैं। मां भीतर कमरे में जाती हुई क्या बोल गई कि कमरे से रोने की आवाज आने लगी। बेचारी सुशीला ने शायद मां की बात सुन ली।
    फिर किसी ने कुछ नहीं कहा और एक एक कर सभी इधर-उधर हो लिए। पीछे रह गए एक अकेले श्याम बाबू।
    - कितना छोटा होता है मन। सुशीला सोच रही थी। पांच वर्षों से घर की प्यारी और लाडली बहू पांच सैकिंड में ऐसी हो गई। क्या कुछ नहीं किया-सहा इस घर के लिए। पांच वर्षों में मुश्किल से पांच मिनिट भी पति के साथ बैठकर बतियाई होंगी। घर से साथ निकलना तो जैसे सपना था। क्यों मैं इंसान नहीं। क्या मेरा कोई मन हीं। हम कब-कहां साथ बैठें! कब सुख-दुख की कोई बात की। विवाह का क्या मतलब है? घर में लड़ाई नहीं हो, बस यही सोचकर कि कोई यह ना कह दे कि घर में पत्नी के आते ही बेटा पराया हो गया। इसे कौन देखे कि हमने अपनी सभी इच्छाओं का गला घोंट दिया। कितना भी कर लो, मर-खप जाओ फिर भी दोष का भांडा औरत के सिर पर ही फूटेगा। औरत ही औरत की सबसे बड़ी दुश्मन। पहली बार सुशीला को मां जैसी सास डायन सरीखी लगने लगी।
    - रोते क्यों है? यह तो होता आया है। गनीमत समझ कि तेरा पति तेरे मुताबिक सोचता है। मुझे देख पन्द्राह बरस हो गए। पर कोई नहीं सोचता। जेठानी ने सुशीला के सिर पर हाथ फिराते हुए कहा। उसकी आंखें बरस रही थीं- टप टप। सुशीला के जी में जैसे जान आई।
    अगले पांच दिन घर में पांच युगों जैसे बीते। आपसी संवाद नपी-तुली बातों में सिमट गया। वे मीठे बोल, हंसी-मजाक और साथ उठना-बैठना-बतियाना जैसे हवा हो गए।
    सुशीला खुश थी। दूसरी मंजिल के क्वाटर में सारा सामान घर से दो-तीन चक्कर में यहां आ गया। वह काफी समय अपनी बॉलकोनी में खड़ी सामने के क्वाटर को देखती मन ही मन हर्षित होती रही। एक के अलावा सभी क्वाटरों के दरवाजे बंद थे। खुले दरवाजे के क्वाटर के बाहर टैंट लगा था। रंगीन लाइटों की सजावट टांगी जा रही थी। सुंदर गीत-संगीत बज रहा था। उसने सोचा जरूर कोई शादी होगी, पर अपने यहां तो कोई बुलावा आया ही नहीं। आ जाएगा। सुशीला को हंसी आ गई। उन बेचारों को क्या मालूम कि इस क्वाटर में कोई आया है।
    सुशीला पलंग पर लेट गई। वह बहुत खुश थी। उसे घर की याद आने लगी। सास-ससुर, जेठ-जेठानी, ननद सब थे घर में और यहां कौन है? कोई नहीं, अकेले में सूनापन जैसे काट खाने को दौड़ता। श्याम बाबू भी शाम ढले लौटेंगे। क्या वह इसी घड़ी के लिए कल्पनाएं किया करती थीं। पर इस में वह सुख कहां है। उस समय तो बहुत खुश हो रही थी और अब जैसे कोई आफत गले आ पड़ी हो। समय काटना ही मुसिबत हो गया। जितने बार भी दरवाजा खोले बाहर सामने बंद दरवाजे दिखाई देते। दिन काटना जैसे पहाड़ चढ़ना हो गया।
    - धीरे-धीरे सब आदत हो जाएगी। श्याम बाबू ने शाम को हंसते हुए समझाया।
    - सामने के क्वाटर में क्या है? सुशीला ने पूछा।
    - ए. ओ. साहब के यहां लड़की की शादी है। शाम को मुझे जान है।  श्याम बाबू ने कहा तो जैसे सुशीला की समझ में कुछ नहीं आया, उसने पूछा- और मैं?
    - बेवकूप है तू.. यह अपना गली-मौहल्ला तो नहीं ना। यहां के अपने कानून कायदे हैं। यहां लोग आना-जाना, उठना-बैठना हिसाब से रखते हैं। अब तो शाम को बस हाजरी देनी है। श्याम बाबू समझाने लगे।
    - यह क्या बात हुई? गली में तो शादी वगैरा में लोग एक दूसरे को बड़े सम्मान मनुहार के साथ ले जाते थे ... फिर वहां अपनापन और लगाव। सुशीला सोचने लगी।
    जाते जाते श्याम बाबू बोले- यह अपनी गली नहीं है पगली। दरवाजा बंद कर ले। मुझे आते-आते थोड़ी देर हो जाएगी। रोटी बना कर खा लेना, मैं तो वहीं खाना खा कर आऊंगा।
    - क्या कॉलोनी के आदमी खाना खिला देते हैं? सुशीला व्यंग में बोली। श्याम बाबू हंसे और चल दिए।
    सप्ताह भर में ही सुशीला की समझ आ गया कि उसका यहां निबाह मुश्किल है। श्याम बाबू भी कुछ अनमने थे। उन्हें अचरज था कि यहां के लोग आदमी है या पत्थर। घरों के दरवाजे केवल दफ्तर आने-जाने के लिए ही खुलते और बंद होते थे। कोई किसी से मेल-मुलाकात चाहता ही नहीं। बैठना-बतियाना तो दूर की बात ठीक सामने मिल जाए तो बस नाम की दुआ-समाल। यहां का सारा हिसाब-किताब ही कुछ अलग लगा।
    आज तो हद हो गई। जरा-जरा सी बातों को यहां के लोग कितना बड़ा बना देते हैं। नीचे के क्वाटर से कोई आया कि बॉलकोनी में कपड़े वगैरह ना सुखाया करें, नीचे छींटें गिरते हैं। सुशीला के तो जैसे आग लग गई। श्याम बाबू भी गुस्सा हुए, पर क्या करें? कहा- ठीक है आगे से ध्यान रखेंगे।
    यह क्या बात हुई? कपड़े सुखेंगे कहां-कैसे? सुशीला को गुस्सा आया।
    - नहीं नहीं। यह बात नहीं। नीचे भी तो लोग रहते हैं, ध्यान तो रखना ही होगा। श्याम बाबू समझाने लगे।
    - नीचे लोग रहते हैं, ऊपर लोग रहते हैं। फिर कपड़े सुखेंगे कहां? कमरे में। सुशीला अभी तक गुस्से में थी।
    - मैं नीचे तार बांध दूंगा। श्याम बाबू ने रास्ता सुझाया।
    - मेरा मन यहां नहीं लगता। घर चलें। सुशीला घर की याद से घिर गई और आंखें भर आईं।
    क्या! क्या सुख है वहां, ना तो आराम से रह सकते हैं और ना ही साथ बैठकर दो घड़ी बतिया सकते हैं। थोड़ा धीरज रख। सब आदत हो जाएगी। श्याम बाबू का मन घर का नाम सुनते ही जैसे खट्टा हो गया।
    - मुझे घर में सब के साथ रहने के सुख के साथ सारे दुख मंजूर है। सुशीला की इस सीधी सच्ची बात का जबाब देना उनकी बस की बात नहीं थी।
    इस सूनेपन में सुशीला का मन अपनी जगह छोड़ चुका था। वह काफी देर तक अकेली सुबकती रही।
    - आंटी-आंटी। बाहर से आवाज आई।
    - क्या है? सामने ऊपर के क्वाटर से सोनीजी की लड़की को अचानक आया देख पहले तो सुशीला हर्षित हुई कि आज कोई तो आया, पर यह क्या लड़की ने पूछा- अंकल है क्या? पापा को ऑफिस से बुलाना है। दादाजी मर गए है। और लड़की रोने लगी।
    - क्या.. ! सुशीला की आंखें फटी की फटी रह गई। सारी खुशी गम में बदल गई। वह ताला लगाकर सोनीजी के क्वाटर में पहुंची। दोपहर के समय कोई आदमी नहीं था, सभी दफ्तर थे, खबर कैसे पहुंचाए। कोई साधन नहीं। बस तीन-चार औरतें थीं। उनके आते-आते शाम हो गई और रिस्तेदारों को खबर करते-करते रात हो गई। दाह-संस्कार अगले दिन हुआ और उसमें भी दूरी के रहते गिनती के लोग आ सकें।
    सुशीला के मन में जैसे युद्ध चल रहा था। वह घर में अकेली थी। बेचैन इधर-उधर टहल रही थी। मन में अशांति और उथल-पुथल। श्याम बाबू समशान गए हुए थे।
    दावाजे पर दस्तक सुनते ही एक निश्चय मन में कर उसने दरवाजा खोला। श्याम बाबू काफी देर तक उसको देखते रहे और फिर आहिस्ता से बोले- जल्द ही घर लौट चलेंगे।
००००
समकालीन भारतीय साहित्य के अंक 187 सितम्बर-अक्टूबर 2016 में प्रकाशित 
  
 
 
 

17 अप्रैल, 2016

राजस्थानी उपन्यास “गवाड़” से चयनित अंश

साहित्य अकादेमी पुरस्कार (राजस्थानी) 2015 से सम्मानित 
राजस्थानी उपन्यास “गवाड़” से चयनित अंश 
उपन्यासकार : मधु आचार्य ‘आशावादी’ / हिंदी अनुवाद : नीरज दइया 
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 साहित्य अकादेमी की टिप्पणीमधु आचार्य ‘आशावादी’ (जन्म : 1960) प्रतिष्ठित राजस्थानी कथाकार और रंगकर्मी है। हिंदी पत्रकारिता से संबद्ध ‘आशावादी’ की गणना जमीन से जुड़े हुए पत्रकारों में होती है।पुरस्कृत उपन्यास गवाड़ अपनी विधागत संरचना में एक विलक्षण और चित्ताकर्षक प्रयोग है। उपन्यास के परंपरा-रूढ़ ढांचे अथवा उसके दोहराव से अछूता है। चरित्रों के ‘कोलाज’ से एक ऐसा प्रच्छन्न कथासूत्र पिरोया गया है, जो उपन्यास विधा की एक नई प्रस्तावना प्रस्तुत करता है।
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अंधेरा
आंखें खोलने के बाद मैंने अंधेरा ही अंधेरा देखा। जन्म के साथ नए प्रकाश की बात एकदम झूठी। अंधेरे में कुछ दिखाई नहीं देता। चाहे देखने का व्यर्थ प्रयास करते रहें। निगाह किसी स्थान पर स्थिर होनी बेहद कठिन। घर, गवाड़ (मोहल्ले), चौगान, देश, चारों तरफ अंधेरा, आदम जात में अंधेरा, दिमाग में अंधेरा, विचारों में अंधेरा।
    इस अंधेरे को समझने मैं घर से निकला। देखें तो सही, कहां से आता-जाता है अंधेरा? बाहर कदम रखते ही चारों तरफ रोते-बिलखते मनुष्यों को चलते-फिरते देखा, उन की देह पर किसी न किसी अंग की कोई कमी थी। उन चेहरों की हवाइयां उड़ी हुई थी और वे पागलों की तरह दौड़ने में व्यस्त थे। उन को चेहरों से पहचानना मुश्किल कि वे किसी शहर के हैं अथवा गांव के! कहीं के हो चाहे से, हैं तो मनुष्य ही। मनुष्य-मनुष्य में अंतर करने की बात विचारते मुझे ग्लानि हुई। सोचा- मैं तो स्वयं सर्वथा अंधेरे में हूं।
    कुछ अंतराल बाद फटाखों के छोड़े जाने की तेज-तेज आवाजें सुनाई दी। पास दीपावली तो थी नहीं। इसलिए आश्चर्य हुआ, उन आवाजों की दिशा में मैं दौड़ने लगा। जैसे-जैसे नजदीक पहुंचता जाता, वे आवाजें दूर होती जाती, किंतु बंद नहीं हो रही थी। मुझे लगा, जैसे पूरी पृथ्वी पर इसी तरह की आवाजें ही आवाजें हो रहीं है। तीक्ष्ण आवाजें और दौड़ते-भागते मनुष्य, बस हर तरफ ऐसा ही नजारा दिखाई दे रहा था।
    आवाजों से डर कर भागते मनुष्यों में, इन आवाजों के खिलाफ आवाज उठाने की तनिक भी हिम्मत नहीं थी। मुझे अंधेरे का कुछ अर्थ समझ आने लगा। कोई उजाला करने की हिम्मत नहीं करता। अंधेरा डर बन कर मनुष्यों के हृदयों में राज करने लगा। मनुष्य निर्दोश बना उस के कहे अनुसार चलने लगा।
    हर मनुष्य जैसा दिखाई देता है, असल में वैसा होता नहीं। बुद्धिजीवी मूर्ख बन गए, कलाकार अंधे, समाज-सेवक चोर और मनुष्य फकत जानवर। ये दो-दो मुखौटे पहने फिरते हैं और मनुष्यों को अपनी गिरफ्त में ले लेते हैं। सच जानिए गजब हो गया है।
    मैंने दौड़ते-भागते मनुष्यों को रोकने का किंचित प्रयास किया, पर वे मुझे गिराते हुए आगे निकल गए। मैं सड़क पर गिरा सोचने लगा। ऐसी कौनसी बात हुई कि मनुष्य मनुष्य को गिराने का प्रयास करता है! मनुष्य खुद को और दूसरों को पहचानने में भूल करता है। मेरे इस विचार का कोई अंत नहीं, मैं सोचता रहा।
    मैंने खड़े होने की चेष्टा की, पर भागमभाग में खड़ा भी नहीं हो सका। खड़े होने की कोशिस करते ही दूसरा कोई धक्का दे कर गिरा जाता। मुझे लगा, बच्चों और जानवरों की भांति सड़क पर रेंगना होगा। तभी कुछ आगे पहुंच सकूंगा, ध्येय पर पहुंचने में देरी होने की पूरी-पूरी संभावना थी। पहुंचना भी तय कहां था। मार्ग में अवरोधों का क्या ठिकाना, कितने आएंगे-रोकेंगे! अवरोध के समक्ष प्रत्येक मनुष्य विवश होता है। आहिस्ता-आहिस्ता अंधेरा, मुझे अपना-सा लगने लगा। मैं अंधेरे में और अंधेरा मुझ में समाता गया।  
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पहचान
मैं सोचने लगा कि इस धरती पर आने से पहले मैं कहां था? जबाब मिलना इतना आसान नहीं था। विगत विचारते इतिहास पर दृष्टिपात किया। पुस्तकें पढ़ने की चेष्टा की। गुरु जी के पास गया। एक ही जबाब मिला। परमात्मा जिसे चाहे जन्म देता है। जन्म लेना-देना तो उसके हाथ में है। इसका अभिप्राय मैं परमात्मा के पास था। लोगों की बातों से तो यही लगा।
    परमात्मा ने मनुष्य को क्यों बनाया! यह बात चिंता की नहीं थी, परंतु मनुष्य को ऐसा क्यों बनाया, यह बात जरा विचारणीय थी। कलाकार जब अपनी रचना को रूप देता है, तब उसमें उम्दा विशेषताएं भरता है। मैंने तो किसी कलाकार को जान-बूझ कर निकृष्ट रचना का सृजन करते देखा नहीं। फिर परमात्मा से यह चूक कैसे हो गई।
    परंतु परमात्मा क्या है? इस प्रश्न का जबाब कहीं नहीं मिला। कल्पनाओं के घोड़े दौड़ने के अतिरिक्त हम क्या कर सकते हैं, परंतु कल्पनाओं का आधार ही जब परमात्मा हो तब उसका होना मान कर ही कुछ सोचना-समझना होगा। यह त्रासदी है। सोची-समझी और जानी-पहचानी त्रासदी।
    परंतु मुझे जन्म देने का उपकार तो मेरे माता-पिता ने किया। इसका अर्थ मेरी पहचान तो उन दोनों से हैं। मैंने मां से पूछा- मैं तुम्हारे पास आने से पहले कहां था?
    उत्तर मिला- परमात्मा के पास।
    मैं फिर से उलझनों में घिर गया। मुझे लगा कि सभी लोगों की बातों का आधार परमात्मा ही है। वही एक कुबुद्धि है जिसने मनुष्य को धरा पर अलग-अलग जगहों पर भेजा है। एक परमात्मा से हम सभी की पहचान जुड़ी है। परमात्मा के बारे में सोचने की बात बाद में करेंगे। करनी तो होगी कभी।
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परलोक
परमात्मा और जन्म की बातें सोचते-सोचते परलोक की तरफ पहुंचा। मुझे लगा मैं खुद परमात्मा हूं और मेरे आस-पास दो शिष्य खड़े हैं। मैं इस चिंतन में कष्ट पा रहा हूं, छटपटा रहा हूं। पृथ्वी पर ही चमचागिरी चलती हो ऐसी बात नहीं, परलोक में भी इसका चलन है।
    मेरे हालत देख कर एक चम्मच बोला- नारायण! नारायण!! नारयण!!!
    दूसरा बिदका- बंद कर अपना यह अखंड जाप! इसे अब कोई नहीं सुनता।
    मैंने शांत करते हुए कहा- लोक-परलोक तो जीवों की परेशानियां बन गए। पृथ्वी पर चहुंदिस खून ही खून दिखता है, ऐसा लगता है जैसे धरत पर रक्त का कोई सागर फैल गया है। हम चील-कौओं की भांति मंडराते लाशें ढोने का का काम करते हैं।
    मेरी दशा पृथ्वी पर हड्डियां ही हड्डियां देख बिगड़ती गई। शिष्य सलाह देते रहे कि पृथ्वी पर चलें, देखें कि क्या हो रहा है? प्रत्यक्ष-दर्शन के बिना कुछ भी ठीक से मालूम नहीं हो सकता।
    परमात्मा बनने में भी मुश्किल है। परमात्मा मनुष्यों को बनता है, बुद्धि देता है, पर खुद दुखी रहता है। आठों पहर निरंतर पापाचार से मनुष्य जीवन कठिन होता जाता है, तब बेचारे परमात्मा की आत्मा भी द्रवित तो होगी है। शिष्यों के चक्कर में फंस कर पृथ्वी पर जाने का फैसला लिया, तो जाने का साधन विमान बेकार-बेचार नाकारा दिखाई दिया। वर्षों से पृथ्वी पर नहीं जाने से यह हालत होनी स्वभाविक भी थी। फिर पेट्रोल की समस्या अलग से। अरब मुल्कों के लोग अपने झगड़ों में फंसे हैं। तेल लेन-देने की सोचे तो भी कैसे-कौन? तेल का भंडार तो उन के पास है, वे चाहे जिसे दें, ना दें।
    परलोक के लोगों को भी ब्लैक-मार्केटिंग में तेल लेना पड़ता है, लिया और पृथ्वी पर पहुंचे भी। बुराइयां सिर्फ पृथ्वीलोक पर हों ऐसा नहीं था, परलोक में भी अनेक थीं। मुझे तो दोनों स्थानों में कोई फर्क ही नहीं लगता।
    मन की शांति और स्वयं की पहचान के लिए मैं परलोक गया, परंतु सब व्यर्थ जान वापस पृथ्वी पर ही आना पड़ा। वहां जाना कि जीवन का समग्र सार इसी पृथ्वी पर है। इसलिए यहीं कुछ देखना-खोजना होगा। बहुत दूर जाने से कुछ नहीं मिलने वाला। कहीं कोई अंतर नहीं है। फ़कत फर्क है सोचने-समझने का। 
००००

रहमत चाचा
गवाड़ के प्रत्येक छोटे-बड़े से रहमत चाचा को प्रेम था। रहमत चाचा नमाज के नित-नेमी थे। प्रत्येक से स्नेह रखते। गवाड़ के सभी घरों की रसोई तक उनकी सीधी पहुंच थी। किसी की भी रसोई में जा बैठते। चाय पीते। इच्छा होती तो भोजन भी कर लेते। सरकारी नौकरी से सेवानिवृति के पश्चात वे ‘फ्री’ थे।
    बच्चे सुबह-सुबह ही चाचा के घर के आगे एकत्र हो जाते। उन के घर में जाते और जिस किसी चीज की जरूरत होती भीतर से उठा लाते। चाचा और उन के घरवाले कभी मना नहीं करते। गवाड़ के हर कार्य में रहमत चाचा की हिस्सेदारी रहती। नमाज पढ़ने जाते, तब भी चुन्नू-मुन्नू साथ हो जाते। उन को मस्जिद की चौकी पर बाहर बिठाते और वे बच्चे भी चाचा की नमाज पूरी होने का इंतजार करते। फिर चाचा को जिद कर के मंदिर तक ले कर जाते। इसी तरह प्रतिदिन की दिनचर्या थी चाचा की।
    गली की किसी लड़की की शादी होती तो बारात की अगवानी में चाचा खड़े मिलते। दीपावली होती तो पटाखे जलाने में चाचा पीछे नहीं रहते। गवाड़ की रम्मत के पीछलग्गूओं में भी वे साथ मिल जाते। रम्मत के गीतों भी सुर में सुर मिला कर गाते। उन को गीत कंठस्थ थे। आप जी भर के होली की गुलाल भी उड़ाते।
    ताजिया आते तो रहमत चाचा गवाड़ के सभी बच्चों को साथ ले कर जाते और काम में जुटते। किसी प्रकार का कोई भेदभाव-फर्क नहीं था। प्रत्येक के दुख में रहमत चाचा सबसे पहले पहुंचते। रहमत चाचा की सीख प्रत्येक का पथ-प्रदर्शन करती। इस प्रकार के चाचा प्रत्येक गवाड़ में होते है। आवश्यकता है फकत उन को विस्तार देने की। जाति और धर्म से भी विशाल है गवाड़ और उस में रहने वाले। यह बात मेरी गवाड़ के रहमत चाचा तो प्रमाणित करते हैं। प्रत्येक गवाड़ के रहमत चाचा ऐसे ही लगें रहे तो मनुष्य-मनुष्य में जाति-धर्म का भेद ही नहीं रहेगा। मैं विचार करता हूं कि अब मेरी गवाड़ कैसे किसी एक देश से कम है।
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बता, धन कहां है?  

गवाड़ में काफी लोग ऐसे थे जिनका काम सिर्फ पैसे कमाना था। उन्हें रोटी खाने की भी फुर्सत नहीं थी। फायदा होता तो वे साठ किलोमीटर तक भी आते-जाते। उनका तो जैसे एक ही नारा था- बता, धन कहां है?  
    धन कमाने के चक्कर में वे भूल चुके थे कि भाईचारा, घर और परिवार भी कुछ होता है। वे लोग तो प्रत्येक कार्य को पैसों की तराजू में तोलते। लक्की कुमार, ऊमाराम और भीखमचंद इन तीनों को देखते ही लोग तकिया कलाम जैसे कह उठते- ‘बता, धन कहां है?’ इनकी समझ में बस यह था कि पैसों से ही यह दुनिया चलती है। पैसों के अतिरिक्त यहां कुछ भी नहीं है!
    पैसा ही मां-बाप है। वे सुबह सात बजे घर से निकलते और रात गए उन की वापसी होती। हर समय उन को काम-धंधे की ही लगन लगी रहती। कमाई होनी चाहिए, भले कहीं से हो- कैसे भी हो- चाहे ब्लैक हो या मेहनत की हो। कमाई के लिए वे चोबीसों घंटों तैयार रहते। यह भी सच्चाई है कि कमाई के लिए रिस्क उठाते थे। उन को जरा भी डर नहीं लगता था। वे अपने संबंधियों से भी हर काम के पूरे पैसे लेते थे। कभी किसी को कोई रियायत नहीं।
    एक दिन लक्की कुमार की टांग मोटर साइकिल से गिरने से टूट गई। जैसे-तैसे वह घर पहुंचा, परंतु टूटी-टांग तो इलाज करवाने से ही ठीक होगी। अब इलाज करवाने के पैसे लगेंगे। जैसे-तैसे पैसों की हामी भरी तो अस्पलात दिखाने कौन ले कर जाए। बिना पैसों के तो कभी किसी का एक भी काम किया नहीं था, इसलिए जिस से पूछा वह अपनी गाथा कहता चलता बना। पैसे होते हुए भी अस्पलात पहुंचने में भारी असुविधा।
    जिसे साथ चलने को कहते, वही अपना पीछा छुड़ा लेता। आज लक्की कुमार को पता चला कि सब काम-काज पैसों से नहीं होते। उस की आंखों से अश्रु बह निकले। इस दशा को जब मुनीम जी ने देखा तब दो लड़कों बुला कर भेजा- जाओ! इसे अस्पताल दिखा कर पट्टा बंधवावो।
    मुनीमजी के कहने पर लड़के लक्की कुमार को अस्पताल ले जाने को तत्पर हुए, किंतु अपनी शर्त पर कि ईलाज का खर्चा हमीं करेंगे। लड़कों ने उस दिन प्रमाणित कर दिया कि गवाड़ में लक्की कुमार से गरीब दूजा कोई नहीं है। ईलाज करवाने की मजबूरी थी, इसलिए लक्की कुमार को हामी भरनी पड़ी। दबदबा धन का नहीं, मनुष्यों का होता है। यदि सभी गवाड़ों के लोग इस तथ्य को अंगीकार कर लें तो सहयोग की भावना से हर समस्या का समाधान संभव है।
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बदर गुरु का क्या कहना!
गवाड़ के लोग एक कवि की कविता गाते- “बदर गुरु का क्या कहना! क्या कहना! हां जी हां, जी में ही रहना।” बदर एक आदमी नहीं, चरित्र है। अपनी कुछ विशेषताओं के कारण उसका नाम ‘बदर’ एक प्रतीक रूप समझें। ऐसे बदर तो हर किसी गवाड़ में देखने को मिलेंगे।
    बदर की विशेषता थी कि अपने मुंह से कभी किसी को ‘नहीं’  नहीं बोलना। घर से बाहर निकला तो उस की चाची जी दिखाई देती है। देखते ही कहा- बदर, तुम्हारे चाचा जी को दफ्तर जाना है, बाजार से तरकारी तो ला दे।
    - अभी लाता हूं चाची जी!
    बदर थेला और पैसे लेता, वह तरकारियां लाने बाजार के रास्ते चल देता है। जल्दी-जल्दी चलता है। उस के दिमाग में चाचा जी के दफ्तर जाने की चिंता है। इसलिए जल्द से जल्द सब्जी-मंड़ी पहुंचने की लगी है। परंतु बदर गुरु का इंतजार तो सभी को रहता। गली से जरा आगे निकलता तो सामने भंवर बैठा दिखाई दिया।
    - अरे बदर, तेरा ही इंतजार कर रहा था। मुझ से चला नहीं जाता, टांगों में दर्द है। रामजी मोदी के यहां से दही तो ला कर दे। कढ़ी बनानी है। कढ़ी खा कर ही रामू स्कूल जाएगा।
    - भंवर भाई साहब, अभी लाता हूं।
    तरकारी लाने वाला थेला तो जेब में चला जाता और हाथ में बरनी आ जाती है। बरनी में पहले दही लाकर देना जो था। स्कूल की बात थी। जरा देर होगी तो लड़के की मास्टर जी खबर लेंगे। हांफता-हांफता बदर पहले रामजी मोदी के यहां पहुंचता है। दही लेता और फिर लौटता। भंवर भाई साहब को दही दे कर चाची जी के लिए तरकारी लेने वापिस जाने को हुआ कि सामने से मास्टर जी आते हुए दिखाई दिए। मास्टर जी रिटायर हो चुके थे। बीमार रहते थे। वैसे भी वे बेगार देने वाले मास्टर जी हैं। फिर बदर तो दिखाई देना चाहिए।
    - बदर, कोई काम नहीं है क्या?
    - मास्टर जी, चाची जी ने तरकारी ला कर देने को कहा है।
    - अरे, वह तरकारी तो कोई घर की ही बना लेगी। मुझे कल से बुखार है। डाक्टर के पास चलते हैं, दवाई लानी है। मरने जैसे हालत हो गई है। जा कर साइकिल किराए पर ले कर आ।
    मास्टर जी ने बदर को सामने से कुछ कहने का मौका ही नहीं दिया। बदर मास्टर जी के साथ अस्पताल रवाना हो गया। डाक्टर को दिखाया। पेंशनवाली डायरी में दवाइयां लिखवाई। वापिस आए। इस काम में तीन घंटे तो लग ही गए थे।
    बदर मास्टर जी को घर तक पहुंचाने आया। उन्होंने कहा- जल्दी में है, खाना तो खा कर जा। भोजन का समय हो गया। बदर ने डपट कर पेट पूजा की। कमर सीधी करने के बहाने जरा-सा लेटा क्या, आंख लग गई। शाम को चार बजे उठा तो काम फिर तैयार था। मास्टरनी जी ने कहा- बदर, लड़के ने सारा दूध पी लिया, अब चाय बानानी है। तुझे भी पीनी है और ये भी लेंगे... ऐसा कर, दूध ले कर आ जल्दी।
    बदर को बर्तन और पैसे दे दिए। वह बाजार की तरफ रवाना हुआ। दूध लाया। चाय बनी। दिमाग में चाची जी की तरकारी तो जाने कब-कहां गुम हो गई। वहां से निकल कर गली में बहार आया तो ठेकेदार जी खड़े दिखाई दिए। देखते ही बोले- बदर, चल आ जा। रविवार है, भैंरू बाबा के दर्शन करने जरूरी है। पुण्य होगा।
    - लेकिन ठेकेदार जी मैं तो हनुमान जी जाया करता हूं।
    - आज भैंरूनाथ के यहां चल चल। एक ही बात है। सभी देवता एक है। मुझे भी साथ मिल जाएगा।
    ठेकेदार जी के कहने पर बदर गाड़ी में जा बैठा और कोड़मदेसर के भैंरू दर्शन हेतु साथ निकल गया। मंदिर में प्रसाद चढ़ाया। आरती की। वापसी तक रात घिर आई। रास्ते में एक तरकारी का गाड़ा दिखाई दिया तब कहीं बदर को स्मरण हुआ कि सर्वप्रथम चाची जी ने तरकारी लाने को कहा था और वह चला भी था। गाड़े वाले को रोक कर बदर ने तरकारी ली। चाची जी के पास पहुंचा तब तक रात्रि का भोजन भी हो चुका था। बदर को चाची जी ने बेशुमार गालियां निकाली। उन का बदर के पास कोई उत्तर नहीं था। सभी के कहे-कहे काम किए, किंतु रहा अयोग्य का अयोग्य। ऐसे बदर हर किसी गवाड़ में मिलेंगे। उन के दर्द की चिंता करने वाला कोई नहीं है।    
००००

मरे हुए लोग
मैं सच कहता हूं- मरे हुए लोग भी इस धरा पर चलते-फिरते दिखाई देते हैं। लाशों का एक बड़ा सागर देखा जा सकता है। लाश का अभिप्राय क्या है, यही ना कि जिस्म में कोई विचार जिंदा नहीं हो। विचार-विहीन मनुष्य लाश कहे जाते हैं और इस भांति के मनुष्य थोक में दिखाई देते हैं, चलते-फिरते तो सभी है परंतु जिंदा नहीं है। उन के ऐसे जीने का कोई अर्थ नहीं है।
    मुझे एक मनुष्य कहा करता था- जन्म लेकर बड़ा होना, बड़े हो कर शादी करना, बच्चे पैदा करना, बच्चों को पढ़ाना और काम-धंधे लगाना, बूढ़े हो जाएं तब सेवा करवानी और अंततः एक दिन मर जाना, यह काम तो बहुत करते है। जन्म ले कर फिर नया क्या कुछ किया? मुझे पता है कि लोग नए-पुराने का जरा भी चिंतन कहां करते हैं।
    मैं विचार-मग्न हूं कि जिंदा लाशों का परिणाम कितना भयानक है। ऐसे लोग जिंदा रहे उस से पहले मर जाएं तो बेहतर नहीं है क्या? जीवन जीने के कुछ मायने नहीं हों तो फिर कोई जिंदा रहे ही क्यों?
    मैं यही विचार करता हूं कि मनुष्यों को जिंदा लाशों में किसने तब्दील कर दिया? कौन था वह जिसने इतना महान और भयानक अंजाम दिया। मरे हुए लोग, मरे हुए लोगों को मारने में लगे हुए हैं, परंतु लाशों पर कोई असर होता है क्या? इन चलती-फिरती लाशों का भविष्य क्या है और ताजिंदगी मुट्ठी भर लोगों ने इन को अपने अधीन कर रखा है। बंद मुट्ठी किए लोग ही लाशों के कारखाने चलाते हैं।
    गरीब शब्द को एक मजाक बना छोड़ा है, पढ़े-लिखे लोग देखते रहे और वह मार सहन करता गया। गरीब को मनुष्य होने का अहसास किसी ने कभी भी नहीं करवाया!  
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उजाला कहां है?

जानवरों और मनुष्यों में कोई अंतर नहीं लगता है। मनुष्य के खूनी पंजों की शक्ति जानवरों से अधिक हो गई है। मनुष्य ने चुस्ती और फुर्ती भी जानवरों से अधिक हासिल कर ली। छिप कर वार करने का गुण भी मनुष्य ने जानवरों से अधिक पा लिया। इस प्रकार भक्ष्ण के कामों में भी मनुष्य ने जानवरों को पीछे छोड़ दिया है।
       हमें इस बदलाव का संपूर्ण यश अपनी समाज-व्यवस्था को देना चाहिए। द्रोपदी के चीर की भांति मनुष्य का जंगलीपन निरंतर बढ़ता जा रहा है, इस के अंत का कोई सिरा दिखाई नहीं देता। ऐसा लगता जैसे मनुष्य ही जानवर बन गया। इसके जानवर बन जाने के पीछे बड़ा कारण हमारी चुप्पी है।
    परलोक के मनुष्य अपनी धरा पर आ पहुंचे तो इन मनुष्यों को मार ढेर करे।
    भय। चारों तरफ भय। भय निरंतर मनुष्य का भक्ष्ण करता जाता है, ना तो उसे जिंदा रहने देता है और ना ही मरने देता है। सभी शक्ति से बंधे, एक-दूजे के सहारे जिंदा हैं। अजगर की सांसों में हर अदमजात खींचता जाता है। आदमजात, आदम से भयाक्रांत है। वह भयग्रस्त एक आदम से रहता है और दूसरे को भयग्रस्त रखता है। मन, बुद्धि और विचार सभी यहां भयाक्रांत, इस लिए नया कुछ भी होना संभव नहीं लगता है।
    भय का भयानक नाटक यहां जारी रहता है। कारण है कि नाटक देखने वाले सभी दर्शक भयाक्रांत है। वे मंच तक पहुंचने का साहस ही नहीं कर रहे। बिना आधार के कोई वस्तु टिक नहीं सकती। त्रिशंकु की बात सर्वथा व्यर्थ! अगर सच्ची होती तो बीच आकाश कई बस्तियां बस चुकी होती।
    मैं भयग्रस्त हूं कि दर्शकों में से कोई प्रथमतः मंच पर पहुंच ना जाए, डराने वालों की कहीं कोई पोल ना खोल दे, सच का अभिप्राय कहीं जग-जाहिर ना कर दे। मैं देख रहा हूं- दर्शकों में से कुछ लोग उचक रहे हैं- वे देखिए! खड़े हो रहे हैं- क्या मैं उन्हें एक आवाज लगा दूं?
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दुनिया इन दिनों 30 अप्रैल 2016 में प्रकाशित
 


29 मार्च, 2014

तेरी उम्मीद तेरा इंतजार....

मूल कहानीकार : डॉ. प्रकाश अमरावत
अनुवाद : डॉ. नीरज दइया
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बीकानेर के डूंगर कॉलेज में राजस्थानी स्नातकोत्तर विभाग की अध्यक्ष डॉ. प्रकाश अमरावत कहानीकार के रूप में अपनी पहचान रखती हैं, वही शोध-संपादन के क्षेत्र में “आजादी री अलख” और “शक्ति लीला सागर” कृतियां उल्लेखनीय कही गई हैं। साहित्य अकादेमी नई दिल्ली द्वारा नवोदय योजना के अंतर्गत राजस्थानी कहानी संग्रह “हियै रा हरफ” प्रकाशित। आपकी कहानियों में हमारे लोक-जीवन में सांस्कृतिक मूल्यों की अभिव्यक्ति हुई है। प्रस्तुत कहानी में स्त्री के धैर्य, स्वयं को समायोजिय कर लेने के पारंपरारिक विकल्प की सांकेतिक प्रस्तुति मिलती है।


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दफ्तर से सीधे आज मैं मेरे सहकर्मी के घर गया। वह काफी दिनों से वह रट लगाए था कि एक दिन मैं उसके साथ घर चलूं। आखिर आज मन बना ही लिया। दफ्तर से छूटते ही उसके संग हो लिया वर्ना रास्ता ढूंढ़ने में काफी झंझट होता। वह घर पहुंचते ही पहले सीधा भीतर गया और ड्राईंगरूम का दरवाजा खोला। मुझे अंदर आने का संकेत किया तो मैं अंदर पहुंचा और कमरे में इधर-उधर ऊपर-नीचे देखा। शानदार सजावट से लकदक, दीवारों पर लगी तश्वीेरों में लोक-जीवन, पारंपारिक संस्कारों की छवियों के साथ आधुनिकता के मनोहर चित्र सजे थे। पेंटिंग देखकर लगता नहीं था कि ये घर पर ही बनाई गई है, यह तो मेरे पूछने से रहस्य उद्धाटित हुआ वर्ना मेरा अंदाजा कुछ और ही रहता। मैं काफी समय तक उन कला-कृतियों को निहारता रहा। एक कला-कृति पर मेरी नजर जैसे ठहर-सी गई। यह किसने बनाई होगी, क्या इस दृश्य के पीछे कोई कहानी है, क्या शीर्षक हो सकता है... इन सब बातों में खोया मैं उसको देखता रहा। बेहद सहज, स्वभाविक और बोधगम्य। परंतु कितना दर्द संजोये थी वह कलाकृति... उसमें चहरे के भावों में दर्द देख रहा था... हल्के रंगों में भावों की गहराई मुखरित हो रही थी। इसे किसने बनाया होगा ? मेरा सहकर्मी दोस्त चाय-नाश्ते को लिए भीतर आया। टेबल पर ट्रे रखते हुए बोला- "इतनी देर से क्या सोचने में लगे थे... चलो थोड़ा नाश्ता कर लो।"
- "हूं... क्या कहा आपने?" मैं तंद्रा से बाहर आया।
वह बोला- "किस सोच में खो गए....?"
मैंने अपना सवाल दाग दिया- "यह पेंटिंग किसने बनाई है ? मैं तो इसे देखने में ही खो गया... कितना गहरा दर्द छुपा है इसमें। इसको देखकर तो कोई कहानी लिखी जा सकती है।" मेरे इतना कहने पर भी जब कोई जबाब नहीं आया तो मैंने उसके चेहरे पर गौर किया कि उसकी आंखें भर आईं थी। मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा- "क्या हुआ... मैंने तो बस इस तश्वी.र के बारे में कह रहा था...."
वह रुंआसे स्वर में बोला- "यह तश्वी.र भी किसी के जीवन का सच है.. बस और क्या कहूं।" यह तो मैंने भी सोचा था कि इसमें कोई गहरा सच छुपा है पर किसका, मैंने पूछा- "किसके जीवन का सच है और तुम्हारी आंखें नम क्यों हो गई ? बोलो यह किसके जीवन का सच है..."
- "यह मेरी भाभी के जीवन का सच है।"
- "क्या.... !"
- "हां... यार। मैं सच कह रहा हूं। यह दस वर्ष पुराना किस्सा है जब मेरे भाई का विवाह हुआ था। घर में लक्ष्मी जैसी भाभी के आते ही भैया की बैंक में नौकरी लग गई। उनके जीवन में खुशियां ही खुशियां थी और यह देख कर हम सब खुश थे... मां, पिताजी, मेरी बहनें और मैं.....। भाभी ने तो जैसे आते ही पूरे घर का काम-काज संभाल लिया था। समय गुजरता गया और ऐसी संस्कारवार गुणवान बहू पा कर मां-पिताजी निश्चिंत हो गए। मैं बड़े आनंद में था, चाचा जो बनने वाला था। घर में हंसी-खुशी के साथ मजाक मस्ती का माहौल था।"  
एक दिन न जाने वह कौनसी सांझ थी कि भाई साहब बैंक से आए चाय पीने के बाद बोले- “मां मेरे सभी दोस्त सपत्नीक घूमने जा रहे हैं.... जिनकी शादी हुए साल-दो साल हुए उनकी यह विशेष मंडली है। तुम कहो तो तुम्हारी बहू और मैं भी घुमने साथ-साथ चले जाते हैं।”
मां ने समझाया- “बेटा ! बहू ऐसी हालत में कैसे जा सकती है ? कहीं कोई बात हो गई तो लोग कहेंगे- सास की मति मारी गई थी जो ऐसी हालत में बहू को भटकने भेज दिया।”
भाई ने कहा- “मां ! तुम भी किस जमाने की बात लेकर बैठ गई हो। अब तो कदम-कदम पर अस्पताल है और हर जगह साधन-सुविधाएं है.. फिर हम क्या कोई गांव-ढाणियों में थोड़े ही जा रहे हैं ?”
“नहीं बेटा ! मेरा मन नहीं मानता .... मैं बहू को ऐसी हालत में नहीं भेज सकती। तुझे जाना है तो तू जा” और मां के इतना कहने पर घर में किसी की क्या हिम्मत थी। सन्नाटा छा गया तो भाभी ने ही कहा- “आप मन क्यों छोटा करते हैं.. इस बार अकेले अपने साथियों के संग घूम आओ... अगली बार सभी साथ चलेंगे।” ऐसा कहते हुए भाभी ने अपने पेट की तरफ संकेत किया तो भाई साहब के चेहरे की मघुर मुस्कान किसी भी छुप नहीं सकी।
- “पंद्राह दिन लग ही जाएंगे, इसी रविवार को रवाना होना है और पंद्रहवें दिन वापस आ जाऊंगा। ऐसा कहने वाले भाई साहब अपने पंद्राह-बीस दोस्तों के संग उत्तरी भारत के बर्फीले टीलों की सैर के लिए रवाना तो हो गया पर... आज तक नहीं लौटे।”
- “क्यों... क्या हुआ ?”
- “ उनके साथियों से पता चला कि वे साथ थे पर न जाने कहां से रास्ता भटक गए... और लौटे ही नहीं। नजरों से दूर गए किसी की खबर आती है पर उसकी खबर का क्या जो कह कर गया हो कि मेरा इंतजार करना....!!
- “तुम्हारी भाभी...?”
- “उन्होंने समय के साथ समझौता कर लिया है। पास के स्कूल में पढ़ाने जाती हैं और कभी ऐसी पेंटिंग में मन रमाते हुए किसी उम्मीद इंतजार में अब भी वैसी ही हैं... वह जो उस वक्त पेट में था आज दस बरस का होने को आया है.... क्या करें.. ।”
मेरी नजर टेबल पर गई जहां चाय ठंडे पानी जैसी हो चुकी थी। मेरे भीतर स्वर-लहरी की गूंज मैंने महसूस की... कोई बरफीलां धोरां सूं आवै संदेश / जी श्यामा प्यारी ऐ.../ मूमल चालै तो ले चालूं....।
उस कलाकृति को फिर से देख कर भीतर देखने की कोशिश की.... तेरी उम्मीद तेरा इंतजार से बेहतर उस पेंटिंग का नाम मुझसे सोचा नहीं जा सकता था।                                                      
(मूल शीर्षक : उडीक)


02 फ़रवरी, 2014

कोई आवाज सुनाई दी है

राजस्थानी कहानी :  भंवरलाल ‘भ्रमर’
अनुवाद : डॉ. नीरज दइया


“क्या लाऊं सरजी ?”
“एक कप चाय और एक कैवेंडर सिगरेट।”
    नजर चारों तरफ दौड़ाते हुए सरजी ने सिगरेट-कश खींच कर घुंए से गोल-गोल चक्कर बनाने लगे। वह घुंए के बादलों में खो गए। उन्हें स्कूल की बातें याद आने लगी। ओफ्फ यह भी कोई नौकरी है ? रोजना लड़ाई-झगड़ा। कभी टाइम-टेबल का झगड़ा तो कभी ट्यूशन का और कभी परीक्षा का। हेडमास्टर भी साला खुद को खुदा समझता है।
    पिछले तीन-चार दिन रो रोज सिर खाता है कि रिजल्ट सुधारिए.. रिजल्ट सुधारिए। यह क्या मेरे बस की बात है ! लड़कों को पूरा क भी नहीं आता लेकिन आदेश दे देते हैं रिजल्ट अच्छा रहना चाहिए। वे कुछ न कुछ लिखेंगे तभी यह होगा। मैं खाली कापी में तो नम्बर देने से रहा। ऐसे तो देश गर्त में जा रहा है और रसातल में चला जाएगा।
    हुंह ! टारगेट प्रतिशत वाली बात भी सिरदर्दी है। मास्टरों को बांध देते हैं कि इतना तो परिणाम रहना ही चाहिए। नहीं तो वेतन-वृद्धि बंद। तब हमें भी जबरदस्ती नम्बर बढ़ा कर पास करना पड़ता है लड़कों को।
    हेडमास्टर भी कहता है- “सभी का भला हो ऐसा काम ही करना चाहिए, बच्चों का परिणाम अच्छा तो बच्चे खुश और उनके मां-बाप भी खुश। हेडमास्टर खुश और इस्पैक्टर खुश मतलब सभी खुश। हमारा क्या ? नहीं पढ़ते अगर बच्चे तो उनका दुर्भाग्य।
    बुद्धि निकल गई है साले की, कहता है कि हमारा क्या लिया ? नहीं पढ़ते अगर बच्चे तो उनका दुर्भाग्य। अरे उनका कैसा दुर्भाग्य ? दुर्भाग्य तो इस देश का है जिसमें ऐसे मास्टर और ऐसे हेडमास्टर हैं।
    मैंने तो जालिम को साफ कह दिया कि मैं कापियों में अंक-वृद्धि नहीं करूंगा। लेकिन आज सभी साथियों के कहने से एक के दस और दो के बीस करने पड़े, रिजल्ट जो सुधारना था। आपसदारी में साथ वालों का तो कहना मानना ही पड़ता है।
    परिणाम सुन कर सभी लड़के हंस रहे थे। हेडमास्टर और स्टाफ भी खुश नजर आ रहा था। परीक्षा-परिणाम सुनने आए अभिभावक भी खुश थे। देखिए परिणाम कितना अच्छा रहा। यहां के मास्टर मेहनती हैं। परंतु मेरा तो कलेजा जल रहा था। घायल की गति घायल जाने, दूसरे किसी को क्या समझ। इस प्रकार जबरदस्ती पास हुए लड़के आगे चलकर देश का क्या भला करेंगे ? यदि यही सब कुछ चलता रहा तो इस देश को फिर से गुलाम होना पड़ सकता है।
    इन बच्चों को जबरदस्ती पास करवा कर उनके साथ भी अन्याय करवाया गया है। स्कूल प्रशासन ने उनकी जिंदगियां बर्बाद की है। इससे बढ़ कर और क्या अपराध हो सकता है ?
    “सर ! चाय लिजिए....।” आवाज सुनकर वह चौंका। चाय की चुस्कियां लेते हुए उसने चारों तरफ गौर किया। पास ही दो-तीन आदमी ऊन की कूटाई वाले आए हुए थे और चाय पी रहे थे। वे आपसी बातों में मशगूल थे। इस कहानी के कथा-नायक सरजी का ध्यान उनकी तरफ चला गया।
“यार तूने वह वूलन मील वाली नौकरी छोड़ कर भूल ही कर दी। वहां मशीनों पर आराम का काम था। अब हाथ में कामड़ी लिए दिनभर माथा-फोड़ी करनी पड़ती है। बंधी-बंधाई नौकरी की कोई होड थोड़े ही होती है।”
    उसने गर्वोन्नत जबाब दिया, “दोस्त मैं दबता क्यों रहूं ? मैनेजर का बच्चा कोई मुझे उधार तोलता है क्या ? पगार फ्री की तो देता नहीं.... बिना काम की गालियां किस बात की सुनता ? मेहनत कर कमता-खाता हूं। हाथ में काम हो तो काम की किसे कमी ? लोग पीछे भाग भाग कर काम करवाते हैं। अब ऊन कूट के कमाई करता हूं तो किसी की सुननी तो नहीं पड़ती ना ?” यह कह कर वह रुक गया। उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया था और कानों के पास की नशे तन हुई थी।
    वह आगे बोला, “मैं मेरे हिसाब से जितनी ऊन तोलवाता हूं उतनी कूट कर दे देता हूं। वह यदि गड़बड करेगा या अक्कड़ दिखाएगा तो दूसरे बहुतेरे काम है। काम में सुनना किस बात का। यह तो मैं आठवीं पास हूं। यदि बी.ए. पास होता तो भी क्या हुआ ? इज्जत गिरवी रख कर मैं काम नहीं कर सकता। भला... आत्मा को कोई बेचा जा सकता है।”   
    इन बातों के हवाले मास्टर ने सोचा कि यह एक मजदूर आदमी है, पर कितना स्वाभिमानी है ! कितनी सच्ची बात कहता है। इसे नौकरी की कोई परवाह ही नहीं.. और एक मैं हूं जो जान-बूझ कर भी इतना अधीन हो गया। जैसे समझदारी में रेत गिर गई।
    फिर मन ही मन विचार किया कि यदि मैं नौकरी छोड़ देता तो करता क्या ? मेरे घर तो खाने-पीने का संकट हो जाएगा। इन हाथों को कोई काम करना ही नहीं आता। और अगर थोड़ा कुछ आता भी है तो अब कैसे करूंगा ? मास्टर हूं मैं तो... अच्छा लगेगा क्या ? मन ही मन मुस्कुरा कर वह उठ गए और चाय-सिगरेट के पैसे चुका कर बाहर निकल गए।
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राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी द्वारा ‘सातूं सुख’ कहानी संग्रह के लिए पुरस्कृत भंवरलाल ‘भ्रमर’ का जन्म 22 अक्टूबर, 1946 को बीकानेर में हुआ। आप राजस्थानी नई कहानी के प्रमुख काहनीकारों में से एक हैं, साथ ही राजस्थानी भाषा में कहानी केंद्रित पहली पत्रिका ‘मरवण’ के संपादक भी रहे हैं। आपके तीन मौलिक कहानी संग्रह, एक लघुकथा संग्रह, एक संपादित कहानी संग्रह और एक उपन्यस प्रकाशित हैं।