27 फ़रवरी, 2024

मूर्ख बनाने के अचूक उपाय/ नीरज दइया

क्षमा करें, मुझे यहां इस पहली ही पंक्ति में यह नहीं कहना चाहिए किंतु कहना पड़ रहा है कि आप मेरे जाल में फस चुके हैं। शीर्षक देखकर आप का आकर्षित होना और यहां किसी उम्मीद में आंखें गड़ाना क्या कोई अच्छी बात है? मैं तो चाहता हूं कि आप आंखें गड़ाएं और इसे अंत तक पढ़े किंतु अपने दिल पर आप रखें और विचार करें- क्या सच में आप किसी को मूर्ख बनाने के अचूक उपाय जानना चाहते हैं? मतलब आप किसी को या फिर बहुत सारों को मूर्ख बनाना चाहते हैं या फिर यह भी हो सकता है कि आप बुद्धिमान बनना चाहते हैं। यह बात कुछ जमी। आप यदि जान लेंगे कि कोई किसी को मूर्ख कैसे बना सकता है तो फिर जब कोई आपको मूर्ख बनाना चाहेगा तब आप आसानी से बच सकते हैं। यानी कि आप खुद तो मूर्ख बनना चाहते नहीं है। यह बहुत अच्छी और सकारात्मक बात है कि आप खुद को बचाने के लिए इसे पढ़ रहे हैं। मैं धन्यवाद देता हूं कि आपके भीतर किसी के प्रति दुर्भावना नहीं है।
मूर्ख बनाने के अचूक उपाय धर्म है। धर्म के नाम पर मूर्ख बनाने का कारोबार सबसे तेज चल रहा है। दुनिया में आस्तिक और नास्तिक दो प्रकार के लोग हैं। किसी दूसरे से क्यों, अब आपसे ही सवाल है कि आप क्या हैं? आस्तिक या नास्तिक? दुनिया में आस्तिकों की संख्या बहुत अधिक है। यदि आप आस्तिक हैं और ईश्वर को मानते हैं तो पक्के मूर्ख है। नाराज होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह मैंने नहीं कहा है। पेरियार जी ने कहा कि ईश्वर को पूजने वाले मूर्ख हैं। पेरियार जी का पूरा नाम इरोड वेंकट रामासामी पेरियार है और यहां यह भी बता दूं कि तमिल भाषा में ‘परियार’ का अर्थ सम्मानित व्यक्ति होता है। अब जब कोई सम्मानित व्यक्ति ईश्वर के विषय में यह कहे कि उसे मानने वाले मूर्ख हैं तो विचार करन पड़ेगा।
आप आपके पास दूसरा विकल्प है कि आप खुद को नास्तिक कह देंगे। मैं मानता हूं कि जो खुद को नास्तिक कहते हैं, वे भी कहीं न कहीं भीतर से आस्तिक होते हैं। आस्था से विरोध सहज संभव नहीं और उसे जाने बिना तो बिल्कुल ही नहीं। आस्था तो हमारे खून में है। अगर आप नास्तिकों के छोटे से समूह में शामिल हो जाते हैं तो बहुसंख्यक आस्तिक लोग आपको मूर्ख समझेंगे।
मूर्खता के प्रचार प्रसार के लिए ही हम एक अप्रैल को मूर्ख दिवस मानते हैं। बड़े खुश होते हैं। होली पर तो मूर्खता का बड़ा राज चलता है। होली पर भला कोई समझदारी की बातें करता है क्या है? जगह जगह महामूर्ख सम्मेलन होते हैं। कवियों में भी महामूर्ख बनने की होड़ लग जाती है। कुछ ऐसे काल निर्धारित किए गए हैं जिनमें किसी को मूर्ख बनाने का दोष नहीं लगता है। सभी मूर्ख बनने पर आमादा है और जैसे पुकार कर कहते रहते हैं- अरे! हमें मूर्ख बनाओ, हमें मूर्ख बनाओ। नशा करने से भीतर की दबी-छिपी मूर्खताएं अपने आप बाहर आ जाती है। काफी बार तो मूर्खता अपनी सीमा लांघ जाती है और व्यक्ति अपने आप गधे पर विराजित होकर हंसता है।
क्या केवल भारत में ही गधे होते हैं क्या? गधा मूर्ख होता है क्योंकि वह बेहिसाब भार लेकर चलता है। आदमी भी मूर्ख कहा जाएगा यदि वह बेहिसाब बोझ लेकर चलेगा। बोझ यानी बहुत सारी बिना सिर-पैर की बातें लिए घूमना। यह सत्य है कि प्रत्येक इंसान के भीतर मूर्खता थोक के भाव से भरी हुई होती हैं। असल में बहुत सी बातों को नहीं जानना ही मूर्ख बनने और बनाने का अचूक उपाय है। कोई समझदार व्यक्ति किसी को मूर्ख नहीं बनता है। प्रकृति ने मूर्ख बनाने का काम भी मूर्खों को सौंप रखा है। इस पर यकीन कीजिए कि मैं आपको तभी मूर्ख बना सकता हूं जब मेरे पास उसका भरपूर अनुभव और प्रचुर ज्ञान हो। फर्क बस इतना है कि बड़ा मूर्ख कुछ पर्दों को उठा कर अपनी मूर्खता दिखा देता है और मेरे जैसा मूर्ख जो थोड़ा स्याना होता है आपको यहां यह बताने का प्रयास करता है कि ऐसे पर्दों को कैसे उठाएं कि उसके पीछे छिपी मूर्खता दिखाई देने लग जाए।
आदमी आदमी के बीच भेदभाव करना क्या किसी मूर्खता से कम है? जो भेदभाव करते हैं वे क्या हैं? भेदभाव को सब जानते हैं, भेदभाव करने वाले और सहन करने वाले भी! भेदभाव सहन करना क्या बुद्धिमानी की बात है? आप कहेंगे भेदभाव पहले करते थे अब नहीं करते हैं, तो इसका अभिप्राय पहले मूर्ख तो थे ही। इसलिए मूर्खता वह लेबल है जिससे आदमी छुटकारा पाना चाहता है। किंतु यह लेबल ना जाने किस प्रविधि से किस किस पर चिपकाया गया है कि छूटता नहीं है। बाहर का लेबल किसी तरह निकाल बाहर करते हैं तो पता चलता कि भीतर भी लेबल चिपका हुआ है। भीतर का लेबल यह है कि आदमी खुद तो समझदार बनना और कहलाना चाहता है किंतु उसके मन में यह इच्छा कूट-कूट कर भरी हुई है कि मूर्ख बनाने के अचूक उपाय मिल जाए तो वह अपना काम कर दिखाए। अब आप बता दीजिए कि किसी को मूर्ख बनाने की बात सोचना कैसा काम है? किसी को मूर्ख बनाने का विचार छोड़ देना ही सबसे बड़ी समझदारी या कहें बुद्धिमानी है। क्या अब भी आप मूर्ख बनाने के अचूक उपाय जानना चाहते हैं? नहीं, तो बात खत्म।

नीरज दइया 

19 फ़रवरी, 2024

लोकप्रियता का फार्मूला और आइंस्टीन/ नीरज दइया

 जो सही है वह हमेशालोकप्रिय नहीं होता और जो लोकप्रिय होता है वह हमेशा सही नहीं होता।’ पता नहींअल्बर्ट आइंस्टीन ने यह कब कहा था? मुझे इस बात से कोईसरोकार नहीं है कि किसने क्या कहा? कब कहा? मैं बस यह जानता हूं कि सवाल करनालोकप्रिय बनने का प्रथम सौपान है। जितना बड़ा सवाल और जितने बड़े आदमी पर सवालकरेंगे आपकी लोकप्रिया का पायदान उतना ही बड़ा होगा। मैं जानता हूं कि आइंस्टीन केइस विचार के विषय में आपको भी पता नहीं है कि यह कब कहा गया था... और आप चुप बैठेहैं।
देश-विदेश में अनेकविद्वान, बुद्धिजीवी, वैज्ञानिक औरदार्शनिक हुए हैं और उन्होंने अनेक बातें कही हैं। मेरा मानना है कि इन सभीश्रेणियों में जो नहीं आते हैं, वे भी कोई बात कहने काअधिकार तो रखते ही हैं। अगर ऐसी बात कहनी नहीं आती है तो मेरे जैसे सवाल उठाने औरदूसरों की कही बातों का प्रतिरोध करने का अधिकार तो संविधान ने दिया है। हमें बससही के सामने आना है। अगर सही जो सही है, तो वह हमें हटाकर खुद सामने आ जाएगा।नहीं तो हम सही का दर्जा ले लेंगे।
आजकल कुछ नया नियम चलरहा है कि खुद को सही साबित करने के लिए किसी को गलत साबित करना पड़ता है। यह यदिनहीं हो सकता तो बहुत आसान तरीका है कि बस आप सही के सामने आ जाओ और उसे ढक लो। बसथोड़ा इंतजार करो। कोई किसी को सामने आने देना नहीं चाहता। सब एक दूसरे को पीछेधकेल रहे हैं। इस सामने आने के फंडे में आपके पास आत्मविश्वास भरपूर होना चाहिए।दूसरी बात- आपको किसी से डरना नहीं है भले वह आइंस्टीन ही क्यों नहीं हो। अगर आप आइंस्टीनका विरोध करेंगे तो वह वापस इस संसार में आपको कोई जबाव देने नहीं आएगा। यह भीसत्य है कि यदि कुछ कहना है तो किसी परलोक वासी को पकड़ना चाहिए। उसके विषय में आपकुछ कहेंगे तो उसे ‘सही’ को झूठ कहने के लिए कम से कम वह खुद तो नहीं आएगा।
अब दूसरी स्थिति यह बनती है कि आत्मविश्वाससे भरपूर केवल आप और हम नहीं है। बहुत ऐसे भी हैं जो आत्मविश्वास से सही में भरपूरहै और वे सही है तो वे आपके सामने आएंगे। कोई सामने आए तो इसका पहला और सीधा अर्थयही समझना चाहिए कि आप सही हैं और इसका प्रमाण है कि कोई आपके सामने आ रहा है, खुदको सही साबित करने के लिए।
अनेक बार कोई बात जो बहुत सही होती हैवह मामूली सा मेरे जैसा आदमी भी कह देता है। मेरे पक्ष में अल्बर्ट आइंस्टीन को मैंरख सकता हूं जो कह कर गए हैं कि जो सही है वह हमेशा लोकप्रिय नहीं होता। मैं सहीहूं और लोकप्रिय नहीं हुआ हूं, किंतु किसे हसरत नहीं होती लोकप्रिय होने की! इसलिएमैं भी लोकप्रिय होना चाहता हूं। मैं नहीं जानता कि लोकप्रिय होने के लिएमूल-मंत्र क्या है... इसलिए सही-सही बातें करता रहता हूं और सोचता हूं कि पता नहींकिस बात में वह असर हो कि मुझे लोकप्रिय बना दे। मैं कभी भी लोकप्रिय हो सकता हूं।मेरे लोकप्रिय होने का मुझे इंतजार है। सही हमेशा नहीं कभी कभी या कभी कभारलोकप्रिय होता है।
मैं तो हमेशा से मानता आया हूं किशास्त्र से बड़ा ज्ञान लोक में होता है। यह मुझे लगता है कि आइंस्टीन को भी यह बातपता थी, इसलिए ही तो उन्होंने ‘सही और लोकप्रिय कासिद्धांत’ दिया। मैं इस रचना का शीर्षक भी इसी सिद्धांत के नाम पर रखना चाहता थाकिंतु पंच काका का कहना था कि इसे लोकप्रिय करना है तो इसके शीर्षक में आइंस्टीनका नाम फिट होना जरूरी है। मैं पंच काका और मेरी पत्नी का हमेशा से मुरीद हूं। येदोनों सही हैं या गलत इस विषय में मैं कुछ कह नहीं सकता हूं किंतु ये दोनों ही मेरीगली और मोहल्ले में लोकप्रिय हैं। पत्नी इसलिए कि उसे कहीं भी शादी-विवाह या कोईमांगलिक अवसर हो गीत गाने के लिए बुलाते हैं और पंच काका के बिना कोई महफिल सजतीनहीं। मुझे मेरी कविता सुनने के लिए कोई नहीं बुलाता। यही कसक मेरे भीतर रही है औरसंभव है यही कारण हो मेरे लोकप्रिय होने की अभिलाषा का।
असल में लोकप्रिय होना ‘लोक’ मेंप्रिय होना है। लोक में प्रिय होना वैसे भी आसान नहीं है। और आइंस्टीन तो आगाह करगए हैं कि सही कभी-कभार ही प्रिय होता है। चुनाव में पक्ष और विपक्ष के साथनिर्दलीय उम्मीदवारों के लिए यह सिद्धांत लागू होता है किंतु जब दूध में पानी मिलजाता है तो दूध का दूध और पानी का पानी करना बिरलों का खेल है। ऐसे अनेक सच हैंजिनको सुनते ही मिर्ची लगती है। सही तब तक छुपे रुस्तम की तरह होता है जब तक कि वहलोकप्रिय नहीं हो जाए। सही को लोकप्रिय नहीं बनने देने के लिए अनेक संगठन औरसत्ताएं प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में काम करती हैं। सही अपने आप कभी भी लोकप्रियनहीं सकता है। उसे लोकप्रिय बनाना पड़ता है और बहुत बार तो जब तक वह लोकप्रिय होताहै वह खुद प्रिय हो कर इस संसार से चला जाता है। सही का मार्ग सरल नहीं होता इसलिएकहना चाहिए कि लोकप्रियता के मार्ग में अवरोध बहुत होते हैं।
अब मान भी लिया जाए कि जैसे-तैसे मैं सही लोकप्रिय हो भी जाता हूं तो संदिग्ध बन जाता हूं। अब फिर सामने संकट है- ‘जो लोकप्रियहोता है वह हमेशा सही नहीं होता।’ अभिप्राय यह है कि पूरी जिंदगी संहेद ही संदेहबना रहेगा। इसका कारण जहां तक मुझे समझ आया है वह है- सही को लोकप्रिय होने केमार्ग में अनेक समझौते करने पड़ते हैं कि वह लोकप्रिय हो सके। ऐसे में पहले सही कोलगता है कि वह सही है या नहीं। अगर सही है तो वह लोकप्रिय क्यों नहीं हो रहा है। असलमें आइंस्टीन का सही और लोकप्रिय होना अपने आप में एक पहेली है। इस जटिल समय मेंसही की उम्मीद करने वाले बहुत कम बचे हैं। वर्षों पहले ही आज के समय की जटिलताओंका अहसास आइंस्टीन को हो गया था। हमें मान लेना चाहिए कि हमारे समय में सही कालोकप्रिय होना बेहद कठिन है और उसके से भी कठिन है किसी लोकप्रिय का सही होना।

नीरज दइया