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12 नवंबर, 2025

पांच कविताएं/ डॉ. नीरज दइया

भुलावा

------

आगे प्रेम 

पीछे प्रेम 

इस यात्रा के बीच 

जिंदगी - एक भुलावा ।


हाथ बढ़ाते हैं 

जिन्हें छूने के लिए 

वो हर बार 

खिसक जाते हैं चुपचाप ।


मंजिल पास लगती है 

फिर भी 

रह जाती हैं- दूरियां...


आगे प्रेम 

पीछे प्रेम 

बीच में हम-

बस प्रेम-मार्गी।


ढाई आखर

------

प्रेम को जानना 

यानी पढ़ लेना 

ढाई आखर-

और बन जाना पंडित।


पर जानना ही 

तो अंत है, 

और मुझे नहीं चाहिए 

प्रेम का अंत।


इसलिए हर बार 

कह देता हूं-

मुझे समझ नहीं आए 

ढाई आखर, 

तुम रचते रहो 

मैं बांचता रहूं


अनजान अनाम सही 

प्रेम में बना रहूं...


प्रेम चाहिए... हर जगह

-------

मैंने कहा-

प्रेम चाहिए पृथ्वी पर। 

भूलभुलैया बन गए हैं रास्ते, 

हृदयों में उग आए हैं कांटे,

मनुष्यता सिसक रही है, 

प्रेम चाहिए... हर जगह।


देवता प्रेम के हुए प्रसन्न, 

बोले-

'प्रेम भेज रहा हूं, 

कहां भेजूं इस पृथ्वी पर ?'


मैंने कहा-

मेरी पृथ्वी की अपनी सीमाएं हैं,

नक्शों में बंटी, भाषाओं में बंधी, 

धर्म, जाति, रंग की दीवारों से 

घिरी हुई है सारी दुनिया।


मगर नहीं हैं सीमाएं प्रेम की 

वह उगता है सूरज-सा, 

बरसता है बादलों-सा, 

बहता है नदियों-सा 

एक छोर से दूसरे तक


जहां जरूरत हो, 

पहुंच जाता है वह।


तो कैसे कहूं 

किस पते पर भेजो प्रेम? 

किस नगर, किस जाति, किस धर्म के नाम 

मांगूं मैं उसे?


नहीं, 

प्रेम चाहिए हर एक कण में, 

हर जीव, हर जड़, हर चेतन में।

जन-जन के मन में, 

श्वास-श्वास में हो प्रेम।


संबंधों में ही नहीं, 

विचारों में, 

नीतियों में, 

भाषाओं और पाठ्यक्रमों में 

और सबसे जरूरी, 

बच्चों की आंखों में हो प्रेम।


देवता मौन रहे 

और मैं भी। 

मौन में ही कुछ उत्तर था 

शायद प्रेम अब भेजा जा चुका है।

हवाओं में घुल चुका है वह।


क्योंकि प्रेम अब पृथ्वी पर है-

और वह जीवित रहेगा 

केवल तब तक, 

जब तक हम प्रेम होंगे।


सांस-सांस गाती है...

------

'झीनी-झीनी चदरिया', 

ओढ़ रखी है मैंने भी 

तुम्हारे नाम की।


मेरी सांस-सांस 

गाती है दिन-रात।


भीतर-बाहर आती-जाती

गुनगुनाती है हवा 

बस एक ही आलाप....।


कौन तय करता है

-------

कोई हल्की सी चिंगारी 

कमाल की रोशनी बन सकती है

यह भी हो सकता है-

हो जाए उदय के साथ-

अचानक उसका अंत। 

कौन तय करता है ?


जरा सी सहानुभूति 

बदल जाए प्रेम में 

या उसे स्वार्थ समझ 

भूलने के कुचक्र में 

रखा जाएगा- रौंदने के लिए 

कौन तय करता है ?


घने अंधकार के बीच 

सब कुछ भूल कर खुलती-

जैसे ही आँख 

जग जाती - स्मृति 

पेड़ की शाखाओं की तरह

सज जाता है 

भीतर हरा-भरा संसार... 

कौन तय करता है ?


डॉ. नीरज दइया

-----

‘प्रभात खबर’ के दीपावली विशेषांक 2025 में





06 जून, 2025

युद्ध निरंतर/ नीरज दइया

 डर बना हुआ है
फिर भी- जीवन चल रहा है...

भारत-पाकिस्तान, चीन-ताइवान
और रूस-नाटो के बीच
कभी भी कुछ भी हो सकता है
डर बना हुआ है
फिर भी- जीवन चल रहा है...

यह डर केवल बाहर नहीं
कुछ अधिक है- भीतर...
बाहर से अधिक है- भीतर
देश-दुनिया की बात छोड़ दीजिए-
घर में भी जारी है- शीतयुद्ध
भाई-भाई में जंग जारी है...

यह जंग नहीं तो भला क्या है...
अब खून के रिश्तों में भी
घर कर चुका- जंग
जो बहुत कोमल थे
और जो बहुत मुलायम थे
वे अब हैं- एकदम कठोर
पत्थर जैसे संवेदन-शून्य
और लोहे से भी अधिक सख़्त
बंद है कपाट!
युद्ध जारी है... निरंतर।


 

05 जून, 2025

नीरज दइया की कविताएं

 अंजाम
=====
सत्य वचन है श्रीमान
यूज एंड थ्रो आइटम हूं मैं
यह बाजार है श्रीमान
मुझे यूज करें.... 
जानता हूं मैं
मेरा अंजाम
फिर भी कहता हूं-
श्रीमान! यूज करें मुझे.. 
‘थ्रो’ से पहले
क्या यह स्मृति काफी नहीं
‘यूज’ किया गया मैं
श्रीमान के द्वारा!
००००
अधूरी कहानी
=====
चलता जा रहा हूं मैं 
जैसे चलती है पेन की रिफिल
लिखता जा रहा हूं मैं
जैसे कोई कहानी....
और एक दिन 
यानी किसी आखिरी दिन
पेन से नहीं लिख सकूंगा मैं 
कैसे करूंगा पूरी कहानी...
०००० 
निवेदन
=====
जीवन के दो छोर हैं-
‘यूज’ और ‘थ्रो’।
मेरे ‘यूज’ में तुम साथ रहे,
‘थ्रो’ से ठीक पहले 
नजर बचा के निकल जाना
थोड़ी देर के लिए ही सही
मैं तुम्हें दुखी नहीं देख सकूंगा।
००००
एक जैसी बातें नहीं
=====
‘यूज’ किया तुमने मुझे
‘यूज’ हुआ मैं तुम्हारे द्वारा
दोनों एक जैसी बातें नहीं है।
तुमने मुझे ‘थ्रो’ किया
मैं ‘थ्रो’ हुआ तुम्हारे द्वारा
दोनों एक जैसी बातें नहीं है।
तुम्हें भ्रम है
मुझे भी भ्रम है
दोनों एक जैसी बातें नहीं है।
तुमने मुझे प्रेरणा दी
मैंने तुमसे प्रेरणा ली
दोनों एक जैसी बातें नहीं है।
००००
तिल भर जगह
=====
किसे बचा कर रखूं
क्या बचा कर रखूं
रखने को कोई कोना नहीं मेरा
यहां तिल भर जगह भी नहीं है मेरी
सब कुछ है तुम्हारा....
०००


 

06 जनवरी, 2025

तीन प्रेम कविताएं/ नीरज दइया


1.
पारस पत्थर है प्रेम
-----
पारस पत्थर है प्रेम
वह नहीं मिलता उसे
जो खोजता है....

इस संसार में
है हर किसी के पास-
पारस पत्थर....

वह दिया नहीं जा सकता है,
मांग कर भी-
लिया नहीं जा सकता है।
००००

2.
पर्याप्त प्रेम
----
प्रेम में सफल होने का अभिप्राय
मेरे लिए बस इतना है
कि दो दिल
ठीक उसी तरह आएं करीब
जैसे आते हैं करीब
किसी समय किसी वेग से दो पत्थर
और जन्म लेती है- चिंगारी
वैसे ही....
हां, ठीक वैसे ही.....
अगर दिख जाए कहीं प्रेम
किसी चिंगारी सरीखा
मेरे लिए पर्याप्त है....
उसे संभाले रखूंगा मैं
उसी की स्मृति में
सफल होगा- वह प्रेम।
००००

3.
विरह को चुनना
-----
प्रेम में यदि चुनना हो
तो विरह को चुनना पसंद करूंगा मैं
प्रेम में जीना
नहीं है संभालना प्रेम को
भारती रहती है झोली
प्रेम में रहती है- मदहोशी।

भूल जाता है प्रेमी- दिन दुनिया
उसे कुछ भी नहीं दिखता
सिवाय- प्रेम के....

यदि चुनना हो-
विरह को चुनना खुशी-खुशी
जिद मत करना
प्रेम को पकड़ने की
विरह ही है- सच्चा प्रेम।
००००

डॉ. नीरज दइया

दो कविताएं/ नीरज दइया

 1.

चकित है आकाश
------
बवंडर बनने को बेताब
जब-जब भी तेज चलती हैं हवाएं
कोई कहता है-
जरा धीरे, प्यार से...।
गुस्सा तो आग का भी नहीं चलता
धीमी आंच पर वह सेकती है-रोटियां
जब-जब बेकाबू होता है पानी
कोई कहता है-
जरा धीरे, प्यार से...।
आकाश देखता है-
अपने बोझ से परेशान दबी धरती
बदलना चाहती है अपनी गति
वह भी सुनती है-
जरा धीरे, प्यार से...।
चकित है आकाश
कहां से आ रही आवाज-
जरा धीरे, प्यार से...।
००००
2.
गालिब चाचा से सवाल
-----
कोई अपनी मर्जी से
कहां छूता है-
किसी भी आग को...
कोई अपनी मर्जी से
कहां पाता है-
कोई दरिया
और वह भी आग का...
मैंने नहीं
आग के दरिया ने ही
चुना है मुझे....
आग के दरिया ने ही
चाचजान चुना था तुम्हें!
सवाल है-
जाना कहां है
तैर कर मुझे
तुम डूबे, मैं डूबा
अब कौन है बाहर?
कौन समझाने से
समझा तुम्हारे??
००००
● डॉ. नीरज दइया
('प्रेरणा-अंशु' अक्टूबर, 2024 में प्रकाशित)

 

23 अगस्त, 2024

पांच प्रेम कविताएं ● नीरज दइया


1.

प्रेम चाहिए पृथ्वी पर

----

मेरे खून में- प्रेम है

आदम और हवा का

उसी प्रेम की असंख्य बेलें

फैली हैं- पूरी पृथ्वी पर,

जुड़ा हुआ हूं मैं

जुड़ी हुई हैं- पीढ़ियां सारी।


उस समय के साक्षी-

सूरज, चांद और सितारे

कहते हैं सारे

प्रेम चाहिए पृथ्वी पर।

हवा में चंचलता है

उसी से थिरकती है पृथ्वी

चकित है आकाश।

००००

2.

यह कवि की कल्पना नहीं

------

यह कवि की कल्पना नहीं

शुद्ध यथार्थ है-

लाल पान जैसा ही होता है दिल।

वह दिखाया नहीं जा सकता

छलिया होता है वह,

ईश्वर के सारे छल

छिपाए रखता है-

अपने भीतर।


कभी धड़कता है- धीरे-धीरे

कभी जोर-जोर से

और कभी रुक जाता है-

अचानक!


विज्ञान के सारे शिक्षकों ने

देश दुनिया के सारे डॉक्टरों ने

बहरूपिये दिल को जाना

मगर मान नहीं

जैसे कवि ने माना

अगर मान लेते

वे कवि हो जाते!

००००००

3.

खरोंच

----

हमारा दिल

एक पहेली है अबूझ

सब कुछ समझा जा सकता है

सिवाय दिल के।

किसी नियम या सूत्र में

बांधा नहीं जा सकता है-

प्रेम।

उम्र और देश काल की सीमाएं भी

बांध नहीं सकती उसे।

अनेक बार मैंने कहा दिल से-

अभी समय है सही

किया जा सकता है प्रेम

किंतु स्थिर रहा वह अपनी जगह

और एक दिन अचानक

करने लगा- नृत्य।

बेमौसम बिना बादल

कर सकता है वह नृत्य

मैंने पाया

इस नृत्य में

टूटा नहीं दिल

बस हल्की सी खरोंच लगी।

००००

4.

यकीन कीजिए

-----

प्रेम जैसा द्रव्य

दूसरा कोई नहीं है

पूरी पृथ्वी पर।

किसी सारणी में

नहीं है उसका

तयशुदा स्थान।

वह अवस्थाओं से परे

किसी भी अवस्था में

बदलता है अवस्था,

छोड़ सकता है-

अपना रंगकिसी भी रूप में

उसे दाग या धब्बा मानने वालों की कमी नहीं

पर यकीन कीजिए-

प्रेम जैसा द्रव्य

दूसरा कोई नहीं

पूरी पृथ्वी पर....।

००००००

5.

लौटना संभव नहीं

-----

जब-जब भी मैं

पहुंचा हूं-

प्रेम के परिसर में

लौटा नहीं पूरा

संभव नहीं- लौटना।

हरेक यात्रा का

अपना समय होता है

नहीं लौटता समय भी

चलता रहता है-

आगे और आगे

साथ-साथ समय के

चलते हुए मैं

देख रहा हूं- लगातार

पीछे और पीछे

जानते हुए-

कि लौटना संभव नहीं....।

००००


 

23 जुलाई, 2024

पांच प्रेम कविताएं ● नीरज दइया


(1.)

उसे खुश देखकर 

मैंने पूछा नहीं

बस सोचा-

खुशी का क्या राज है?


उसकी खुशी 

बहुत अच्छी थी 

इतनी अच्छी कि सोचते हुए 

खुश हो गया 

मैं भी!



(2.)

यह वही चेहरा है!

मैं सोचने लगा 

कल जो उदासी में डूबा था 

हैरान-परेशान 

अपने रंगों को कहीं भूलकर,

बेसुध-बेरंग बेजान।


यह खनकती हुई हंसी 

कहां से आई? 

क्या गुमसुम उदास तुम को

तुम्हारे भीतर छुपी-

अल्हड़ लड़की मिल गई है

या किसी नई उम्मीद में 

भीतर बहने लगी है-

एक साथ कई चंचल नदियां,

जिनकी कलकल से 

खनक रही हंसी तुम्हारी।



(3.)

प्रेम में 

भीतर बजती है- 

घंटी या घंटियां?

यह संगीत की बात है....


खलनायक नहीं मानते 

घंटी या घंटियां 

वे इन शब्दों के 

केवल पुल्लिंग रूप जानते हैं,

उनके लिए प्रेम 

केवल हासिल करना है!

उनका शब्दकोश ही नहीं

अलग है व्याकरण भी हमसे।



(4.)

प्रेम में लड़का 

प्रेम में लड़की 

प्रेम में आदमी 

प्रेम में औरत 

प्रेम में बुढ़ा 

प्रेम में बुढ़िया....


प्रेम इतना बावला है 

कि देखता ही नहीं

वह किसे भिगो रहा है। 


समा जाते हैं इसके भीतर- 

छोटे-बड़े देवता-दानव

या फिर पूरी दुनिया के शब्द।



(5.)

इतना गुस्सा क्यों? 

अपने अतीत पर 

जो बीत चुका है 

वह लौटकर नहीं आएगा।


छोड़ दो 

जाने दो उसे- 

दूर... बहुत दूर तुमसे

वह मुक्त होना चाहता है

और उसे थामे बैठे हो तुम...


माना कि यह कहना सरल है-

'वर्तमान को थाम लो 

और भविष्य को देखो।'

सच में कठिन है-

आज में रहना-सहना...

इतना गुस्सा क्यों है?

गुस्से को बह जाने दो-

उसी कल के प्रवाह में।



17 जून, 2018

डॉ. नीरज दइया की तीन कविताएं-

घर वह घर नहीं है

पता तो वही है
घर वह घर नहीं है
जो था आपका
पिताजी !

नाम तो वही है
भाई पर भाई नहीं है
जो था आपके रहते
पिताजी !

घर जिस में आप रहते थे पिताजी।
भाई जिस में मैं था पिताजी।
पता ही नहीं चला
कव कैसे क्या हो गया...।

पुराने घर को गिरा कर
खड़ा किया नया घर।
पिताजी ! आपने बनवाया
वह घर अब नहीं है।
भाई कहता है- पुश्तैनी घर है।
इस घर के बारे में
अब मैं क्या कहूं पिताजी ?
००

कोई बात नहीं !

बहुत पुरानी हो गई
फिर भी अपनी मुस्कान लिए
दीवार पर सजी है-
तश्वीर पिताजी की।

सुबह-सवेरे वे रोज
भरते हैं मुझ में नया जीवन
घर से निकते समय देखता हूं उन्हें
जीवन की भागा-दौड़ में
सोचता हूं- इस रविवार को
तश्वीर साफ करूंगा।

काफी महीने हो गए
वह रविवार नहीं आया,
मैं ग्लानि से भरता हूं
फिर भी दीवार पर-
तश्वीर में पिताजी
मुस्कान लिए कहते हैं-
कोई बात नहीं !
००

अधूरी कविताओं के बारे में

मुझे कविताओं को सौंपा पिताजी ने
पर नहीं सौंपी मुझे
आपनी कविताएं।

कई कविताएं
जो सहेजती है मुझे
और जिन्हें सहेजता हूं मैं
नहीं लगी अच्छी
क्यों कि वे नहीं हो सकी
पूरी!

उन कविताओं के लिए
मेरा बड़ा दुख है
कि वे रह गईं हैं अधूरी।

जब-जब मैं बतियाता हूं उनसे
वे रोती हैं, साथ मेरे
उनकी पीड़ा परखने वाला
मेरे अतिरिक्त
कोई नहीं है।
कोई नहीं है अन्य !
००

28 जनवरी, 2018

नीरज दइया की कविताएं

(डॉ. नीरज दइया का जन्म 22 सितम्बर,1968 को रतनगढ़ (चूरू) राजस्थान में हुआ। कवि, आलोचक, व्यंग्यकार, अनुवादक और संपादक के रूप में राजस्थानी और हिंदी साहित्य में उनकी पहचान है। साख, देसूंटो और पाछो कुण आसी जैसी काव्य कृतियों के अलावा उनकी आलोचना रै आंगणै और बिना हासलपाई कृति चर्चित हुई हैं। साहित्य अकादेमी नई दिल्ली से उन्हें पुरस्कृत किया है। उनकी कुछ कविताएं यहां प्रस्तुत है, संपर्क 09461375668)  
तुम को संबोधित
कौन हो तुम ?
कौन हो सकते हो तुम ?
तुम को संबोधित है-
मेरी सारी कविताएं।

मैं खोजता हूं-
कविताओं में तुम को !

हमारे समय में
यह एक रहस्य है
जब कविताओं में तुम
खोजते नहीं खुद को...
खोजता हूं मैं जिसे
पा लेता हूं- तुम को।

तुम से जुदा
मैं स्मृतियों में खोया-
तुम को सामने पाकर
तुम को संबोधित हूं !
००००

मुझे क्या ?
इस पृथ्वी पर
कुछ भी हो जाए कहीं
मेरे आस-पास या दूर कहीं
मुझे क्या ?

मैं खैरियत में हूं
बस अपना काम करूंगा-
खाना-पीना और सोना
इस के अलावा
नहीं है जीवन....

यह जीवन भी
बस एक सपना है-
मैं सुख में हूं
खाता हूं, पीता हूं,
भर नींद सोता हूं....
मेरा सपना टूटेगा
गुजते दिनों में
किसी दिन गुजर जाऊंगा
मुझे क्या इस पृथ्वी से!

कहीं भी कुछ भी हो जाए
मेरे आस-पास या दूर कहीं
इस पृथ्वी पर
मैं बस धीरे-धीरे गुजर रहा हूं....
००००

सीधा खड़ा
इतना झुका हूं
सब कुछ मानते हुए
सब कुछ जानते हुए
सहज स्वीकारते हुए
होना चाहता रहा- एक

तुम ऐंठते रहे
नहीं मिलना चाहते
इतने इंतजार के बाद
लेना है एक फैसला

भाई ! तुम ऐंठे रहो
ऐसे ही ऐंठे रहो
और ऐंठते चले जाओ
अगर कुछ गलत रहा मैं
पूरे सही तो तुम भी कहां !
अब मैं हो गया हूं सीधा खड़ा
देखता हुआ आगे-पीछे के रास्तों को
चलूंगा आगे बिना तुम्हारे

रोना और गिड़गिड़ाना भी
नहीं होगा मुझसे
मैं निर्दोष
क्यों दूं तुम्हें दोष
नहीं होता दोष किसी का
दोष प्रारब्ध का
कर्मों की रेखाओं का

कैसी भी बने सूरत
नहीं दूंगा दोष 
अब हर सूरत
मिलूंगा मैं 
सीधा खड़ा....
००००

भाड़
मैं अकेला चना
सोचता हूं-
किसलिए बना ?

सोचते-सोचते मैं चला
पहुंचा झुंड के पास...

अरे, अब मैं
अकेला कहां!
हम चनों का है-
एक संसार....

तुम हां तुम
क्यों खड़े हो वहां
आ जाओ यहां
मिलकर हम चलेंगे 
भाड़ के पास....
००००

जानना चाहिए जितना !
नहीं-नहीं, मैं नहीं जानता
मैं कुछ भी नहीं जानता
सिवाय मेरे

और कहां जानता हूं मैं
अपने को भी पूरा
या कि जानना चाहिए जितना !
००००

कोई कवि है मेरे भीतर

हो गया हूं तैयार....
लिखूंगा एक कविता
वैसे बता दूं-
मैं नहीं लिखता कविता
कोई कवि है मेरे भीतर
जो कविता लिखने की सोचता है,
मैं तो अक्सर सोचता हूं-
क्या होगा लिखने से कविता !

इस खतरनाक समय में
मैं बचना चाहता हूं
कविता ही नहीं
किसी भी झमेले से
अब जब कुछ भी करना-कहना
नहीं है खतरे से खाली
फिर से कुछ होता है मेरे भीतर

होती है कोई कविता
क्या मैं ही उसे जाल में ले लेता हूं
नहीं मैं तो आजाद रहना चाहता हूं
और भीतर का कवि समझाता है-
यही है आजादी...

मैं उससे पूछता हूं-
कविता लिखना और कविता होना क्या है?
बस कुछ शब्दों से सजी
पंक्तियों की जालसाजी है कविता !
मैं भयभीत हूं
मेरे भीतर है कोई कवि
जो समय के सामने खड़ा होता है
लाता है कुछ शब्दों के संगठित समूह
उन्हें कर देता है नियंत्रित
कुछ इधर करता है कुछ उधर करता है
कुछ पंक्तियों को करीने से रखता है
और बन जाती है कविता !

मैं गौर से देखता हूं-
अपने कंप्यूटर का की-पेड, कभी मोनिटर
नहीं मिलता किसी कविता का सूराग
मैं अपने हाथों को आंखों के सामने ले जाता हूं
मेरे खाली कागज और कलम के करीब जाता हूं
कहीं मिलती कोई कविता
कोई है मेरे भीतर जो देखता है कविता।
कवि, तुम्हारी मर्जी नहीं चलेगी
मैं भी देखना चाहता हूं कविता।
हो गया हूं तैयार....
लिखूंगा एक कविता !
००००

16 जनवरी, 2018

राजस्थानी कविताएं / नीरज दइया / अनुवाद: मदन गोपाल लढ़ा

=============
माँ के लिए कविता
=============
एक शब्द लिखता हूँ
कागज पर- माँ
                 और आगे कुछ नहीं लिखा जाता।
किसी पंक्ति के बीच
जब कभी किसी शब्द के साथ आ जाता है माँ
तब अटक जाती है पंक्ति, आगे कुछ नहीं लिखा जाता।


माँ शब्द से जो यात्रा शुरू होती है
वह यात्रा वहीं हो जाती है संपूर्ण।
जीवन में जैसे सब कुछ परोट लेती है
ठीक वैसे ही कविता-
                    माँ के आगे कुछ नहीं...।
बस टाबर के लीक-लकोळिया
माँ के लिए कविता होते हैं।
००००

=============
रक्त में मिली हुई भाषा
=============
राजस्थानी भाषा मेरे रक्त में मिली हुई है
यह पंक्ति आपको कविता की पंक्ति नहीं लगे
                                              तो कोई बात नहीं है...
कविता से ज्यादा जरूरी होती है भाषा की संभाल
भाषा की हेमाणी लेकर खड़ा हूँ मैं...

आपके मुख से फूल बरसे-
‘मर गई है राजस्थानी भाषा, जला दिया राज ने उसे सालों पहले
नहीं है राजकीय मान्यता।’

कोई बात नहीं है-
जब मर गई है मेरी भाषा
फूल चुगने के लिए दूसरा कौन आएगा
यह पक्का है कि आप अपनी जीवंत भाषा से उतने नहीं जुड़े
                                                         जितना मैं अपनी भाषा से।

यदि यह बात नहीं होती सच
तो ऐसी विकट घड़ी में
फूल बरसाने से बचते आप।
यह पंक्ति आपको कविता की पंक्ति नहीं लगे
तो कोई बात नहीं है...
राजस्थानी भाषा राजस्थानियों के रक्त में घुली हुई है।
००००

=============
घर
=============
तुमने और मैंने पाला
हजार-हजार रंगो का
एक सपना।

तुम्हारी और मेरी निगाहों का
तुम्हारे और मेरे ख्वाबों का
एक घर हो
जो अब धरती पर
नहीं बनेगा कभी।

मां कहती है-
बेवकूफी है
घर होते बियावान में भटकना।
आग लगा दो-
ऐसे नुगरे सपनों को
जो थका डालते हैं
और करवाते हैं
व्यर्थ यात्रा।
००००
=============
रचाव के रंग

=============
रचाव के रंग
खतम नहीं हुए हैं अभी।

अभी तक बाकी है आनी
दुनिया की
कई कालजयी
कविताएँ।

यह छोडो
कि कौन लिखेगा
उनको।
मगर भरोसा रखो
कि अभी तक लिखी जानी है
दुनिया की
कुछ और कविताएँ।

कवियों के इर्द-गिर्द
घूम रही है
उनकी आत्माएँ।

अवश्य देंगी वे
रचाव को
नई राग
नए रंग।
क्योंकि वे
आज भी हैं मुक्त
जीवन और मरण से।
००००
(वागर्थ, जनवरी 2018)
 
 

20 मई, 2017

श्री कुंवर रवीन्द्र द्वारा निर्मित कविता-पोस्टर


साख भरै सबद / नीरज दइया
-------------
दरद रै सागर मांय
म्हैं डूबूं-तिरूं
कोई नीं झालै-
महारो हाथ ।

म्हैं नीं चावूं
म्हारी पीड़ रा
बखाण
पूगै थां तांई
कै उण तांई ।

पण नीं है कारी
म्हारै दरद री
साख भरै-
म्हारो सबद-सबद ।
००००

दर्द / नीरज दइया

--------
दर्द के सागर में
मैं डूबता तिरता हूं
कोई नहीं थामता
मेरा हाथ ।

मैं नहीं चाहता
मेरी पीड़ा का
बखान
पहुंचे आप तक
या उन तक ।

लेकिन कोई चारा भी नहीं है
मेरे दर्द का
साक्षी है
मेरा शब्द-शब्द ।

अनुवाद : मदन गोपाल लढ़ा

अन्य कविताएं देखें

02 अप्रैल, 2017

राजस्थानी कविता का हिन्दी अनुवाद भाषा भारती में प्रकाशित


मैं कविता की प्रतीक्षा में हूं 
-------------
डा. नीरज दइया
अनुवाद : नवनीत पाण्डे 
 
ढूंढ़ने से नहीं मिलती कविता
अयानास ही दीखती है
जब भी करना चाहता हूं संवाद
तो नहीं मिलता कोई ठीक-ठाक प्रश्न
प्रश्न यह है कि कोई कवि क्या पूछे कविता से
क्या किसी कविता से पहचान के बाद भी जरूरी होता है प्रश्न
प्रश्न कि समय क्या हुआ है?
प्रश्न कि बाहर जा रहे हो कब लौटोगे?
प्रश्न कि खाना अभी खाएंगे कि ठहर कर?
प्रश्न कि चाय बना देती हूं पिएंगे क्या?
प्रश्न कि नींद आ रही है लाइट कब ऑफ करोगे?
प्रश्न कि इन किताबों में सारे दिन क्या ढूंढते रहते हो?
प्रश्न कि कोई पैसे-टके का काम क्यूं नहीं करते?
प्रश्न.. प्रश्न... प्रश्न ? शेष है प्रश्न-प्रतिप्रश्न?
किंतु सिर्फ प्रश्नों से क्या बन सकता है?
क्या सभी प्रश्नों को इकठ्ठा कर रच दूं कोई कविता?
पर क्या करुं-
अभी-अभी आया है जो प्रश्न आपके संज्ञान में
इसीलिए तो मैंने सर्वप्रथम लिखा था-
ढूंढने से नहीं मिलती कविता
अयानास ही दीखती है
कविता यह है कि मैं कविता की प्रतीक्षा कर रहा हूं
अगर आपकी भेंट हो
तो कहना उसे कि मैं प्रतीक्षारत हूं।

००००
मूल कविता-
म्हैं उडीकूं कविता
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डा. नीरज दइया
 
जोयां हाथ नीं आवै कविता
अणचींतै सूझै....
जद करणी चावूं बतळावण
तो कोनी सूझै
कोई सावळ सवाल
सवाल ओ पण है-
कोई कवि कविता सूं
कांई करै सवाल?
कांई कविता सूं ओळख पछै ई
जरूरी होवै कोई सवाल?
सवाल है कै कित्ती बजी है?
सवाल है कै बारै जावो पाछा कणा आसो?
सवाल है कै अबार जीमसो का पछै?
सवाल है कै चाय बणा दूं पीसो कांई?
सवाल है कै नींद आवै बत्ती कद बंद करसो?
सवाल है कै आं पोथ्यां में सारो दिन कांई सोधो?
सवाल है कै कोई पइसा-टक्कां रो काम क्यूं नीं करो...?
सवाल... सवाल... सवाल।
सवाल भळै है केई सवाल
पण कोरा सवालां सूं कांई संधै!
कांई सगळा सवाल रळा’र
सांध देवूं कोई कविता
पण कांई करूं
अबार-अबार ई जलम्यो है जिको सवाल
आप रै मगज मांय
इणी खातर तो सगळा सूं पैली कैयो—
जोयां हाथ नीं आवै कविता
अणचींतै सूझै....
कविता आ है
कै म्हैं उडीकूं कविता
जे थानै सूझै कविता
तो उण नै खबर जरूर करजो
-कै म्हैं उडीकूं।
००००
(भाषा भारती में प्रकाशित)

28 अक्टूबर, 2016

दीप जलाए

सभी को
लीलता है-
अंधकार
मूर्त-अमूर्त
नहीं छोड़ता
वह किसी को
मगर मन में
जगमग करता है-
एक दीप सदा....

इस मन-दीपक को
आस-उम्मीद की
रोशनी देते रहना तुम।

तुम जो बैठे हो
दीप जलाएं
मेरे मन-आंगन !

-नीरज दइया

23 अक्टूबर, 2016

दो कविताएं • नीरज दइया

तुम को संबोधित

कौन हो तुम ?
कौन हो सकते हो तुम ?
तुम को संबोधित है-
मेरी सारी कविताएं।

मैं खोजता हूं-
कविताओं में तुम को !
हमारे समय में
यह एक रहस्य है
जब कविताओं में तुम
खोजते नहीं खुद को...
खोजता हूं मैं जिसे
पा लेता हूं- तुम को।
तुम से जुदा
मैं स्मृतियों में खोया-
तुम को सामने पाकर
तुम को संबोधित हूं !
००००

जान से खेल जाती हैं

क्या चिंटियां घूमती हैं-
बस भोजन की तलाश में...
ऐसा क्यों सोचते हो तुम ?
जब भी वे आतीं है पास
बचते हैं हम और तुम
खुद को बचाते हुए
बचते हुए, दूर करते हैं
दूर हो जाना चाहते हैं
फिर भी वे, पास आती हैं
बार-बार आती हैं....
रास्ता बदल-बदल कर आती हैं
क्या हर बार वे आती हैं-
भोजन की तलाश में ?
जान से खेल जाती हैं
कभी-कभी जिद्दी चिंटियां
क्या चिंटियां घूमती हैं-
अपनी मृत्यु का सपना लेकर।
००००

29 फ़रवरी, 2016

नीरज दइया की कविताएं

रिश्ते
आप कहते हैं-
हमें नाकारा-नालायक
काम के नहीं किसी भी
मगर हम, जब भी पुकारोगे
होंगे हाजिर जैसे भी हैं
दूजे कहां से आएंगे?
कहां से लाओगे?
ले भी आए तो
धो देने से नहीं धुलेंगे
रिश्ते हैं जो भी।

जहां कहीं मन लगे
जिस घर में मन लगे
      जहां-कहीं मन लगे
      जीना मन से
            सुख से।

जीना होता है-
      - सुख से रहना
      - दुख भी सुख से भोगना
      - मौन को देखते रहना उत्साह से
      - हर दिन जीना हर्ष से

घर जीने के लिए होता है
बेमन जीना
अपने ही घर में
      मरना होता है।

यदि मरना ही है
      घर मसान क्यों बनें
बदल लें घर- जीने के लिए
      जीना मन लगा कर
जिस घर में मन रमे
      जहां-कहीं मन जमे।

नंगे पैर ऊंट
समय के
पहाड़ पर
संस्कार विहीन ऊंट
घूमता है-
मुंहबाए
अभी तक नंगे पांव।

ठीक ऐसे ही
बिना भाषा के
घूमते हम नंगे पांव।

भाषा है संजीवनी
आप देखते नहीं
या दिखाई नहीं देता आपको।
बिना भाषा के

वस्त्रों के रहते हुए
हम निर्वस्त्र-नंगे।

नित्य तिल-तिल मरते
भीतर ही भीतर
दिन-रात घुट-घुट कर जीते
बोलते ही लड़खड़ाती है जुबान
इसी के रहते तो-
यह हठ किए हैं।

लाइए!
हम मरणासन्नों को भाषा दे दें
भाषा है संजीवनी।
(राजस्थानी से अनुवाद : कवि स्वयं)
“दुनिया इन दिनों” साहित्य विशेषांक-2 में प्रकाशित