08 अक्टूबर, 2026

साहित्य के संबंधशास्त्री/ डॉ. नीरज दइया

साहित्य में कवि-लेखक, व्यंग्यकार और आलोचक होते हैं। कुछ समीक्षक होते हैं, कुछ शोधार्थी होते हैं और कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें देखकर लगता है कि साहित्य ने अपने लिए एक अदृश्य खुफिया विभाग भी खोल रखा है। ये साहित्य पढ़ते कम हैं, साहित्यकारों को पढ़ते अधिक हैं। किताब उनके लिए सिर्फ बहाना है, असली विषय होता है- कौन किसके कितना करीब है! कौनसा समीकरण कहां बन बिगड़ रहा है। यह दूरगामी और अंतरयामी सोच के हमारे सह-यात्री परम मित्र का मुखौटा पहने हुए होते हैं।

मेरे एक परिचित हैं, जिनको दोस्त भी कहा जा सकता है। वे कौनसा अर्थ कहां खोजकर कहां परोस देंगे, कुछ कहा नहीं जा सकता है। साहित्यिक कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति अपने आप में एक अलग घटना होती है। वे सभी कार्यक्रमों में हाजिर रहते हैं, रहना चाहते है। यह उनके लिए बहुत जरूरी है। कारण जिस कार्यक्रम में बाकी लोग पुस्तक, लेखक और वक्ताओं को सुनने जाते हैं, वे वहां संबंधों की नब्ज टटोलने जाते हैं। उनके लिए किसी पुस्तक का लोकार्पण तभी पूरा होता है, जब उसके साथ जुड़े लोगों के संबंधों का भी लोकार्पण हो जाए। जहां वे मौजूद नहीं हो पाते अगले दिन खबर को खुरच-खुरच के उदरस्थ करते हैं। सभी सूत्रों से मोबाइल पर बात करते हुए सूत्र बटोरते हैं।

हाल में एक पुस्तक का कार्यक्रम हुआ। मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि, लेखक, पत्रवाचक और साहित्यप्रेमी उपस्थित थे। वे भी वहां होने ही थे और थे भी। कार्यक्रम समाप्त हुआ। लोगों ने कहा- बहुत अच्छा आयोजन रहा।

उन्होंने कहा- “अच्छा... लेकिन असली बात अभी पता करनी है।”

और फिर शुरू हुआ उनका साहित्यिक अनुसंधान।

सबसे पहले लेखक पकड़े गए।

“कार्यक्रम कैसा रहा?”

लेखक ने सहजता से कहा- “बहुत अच्छा।”

“मुख्य अतिथि से आपके पुराने संबंध हैं?”

“जी, परिचय है।”

“सिर्फ परिचय?”

लेखक ने उनकी ओर देखा। सवाल में ऐसी गंभीरता थी जैसे परिचय की भी श्रेणियां होती हों- सामान्य परिचय, साहित्यिक परिचय, आत्मीय परिचय, पारिवारिक परिचय और वह परिचय जिसके बारे में सार्वजनिक रूप से कुछ न कहा जाए।

लेखक ने कहा- “जी, पुराने परिचित हैं।”

अब विशेषज्ञ की आँखों में चमक आई।

“कितने पुराने?”

यह प्रश्न सुनकर लेखक को लगा कि शायद जन्मपत्री माँगी जा रही है।

इसके बाद मुख्य अतिथि की बारी थी।

“आपको पुस्तक कैसी लगी?”

मुख्य अतिथि ने पुस्तक की प्रशंसा की।

“लेखक से पहले से परिचय है?”

“हाँ।”

“अच्छे संबंध हैं?”

“हाँ, ठीक हैं।”

“कितने अच्छे?”

मुख्य अतिथि शायद पहली बार समझे कि साहित्यिक कार्यक्रम में पुस्तक पर बोलना आसान है, लेकिन इस व्यक्ति के सामने ‘अच्छे संबंध’ की परिभाषा देना कठिन।

फिर विशिष्ट अतिथि।

फिर पत्रवाचक।

फिर आयोजक।

फिर मंच पर बैठे एक सज्जन।

फिर वह व्यक्ति जिसने लेखक को कार्यक्रम के बाद गले लगाया था।

गले मिलने का भी संज्ञान लिया गया।

“ये आपसे कब से परिचित हैं?”

“काफी समय से।”

“अच्छा! और ये मुख्य अतिथि को भी जानते हैं?”

अब सामने वाला चौंका- “शायद।”

विशेषज्ञ ने 'शायद' को वहीं नहीं छोड़ा। 'शायद' उनके लिए कोई उत्तर नहीं, एक नया शोध-विषय है।

उन्होंने किसी और से पूछा।

फिर किसी तीसरे से।

फिर चौथे से।

धीरे-धीरे उन्हें कार्यक्रम की पूरी रिपोर्ट मिल गई- सिवाय उस पुस्तक की, जिसका कार्यक्रम था।

लेकिन उन्हें इसकी कोई चिंता नहीं थी। पुस्तक तो छप चुकी थी। असली सामग्री तो लोगों के बीच थी!

वे ऐसे व्यक्ति हैं जिनके लिए साहित्यिक कार्यक्रम में मंच पर क्या कहा गया, यह गौण है; मंच से उतरने के बाद कौन किससे कितनी देर मिला, यह प्रधान है।

कौन पहले आया?

किसके पास बैठा?

किसने किससे हाथ मिलाया?

किसे देखकर कौन मुस्कराया?

किसके कंधे पर किसने कितनी देर हाथ रखा?

किसके साथ चाय पी?

किसे फोन किया?

किसे फोन नहीं किया?

किसकी फोटो किसके साथ आई?

और सबसे महत्वपूर्ण- किसकी फोटो में कौन नहीं आया?

कौन किस पार्टी का है? कौन सत्ता पक्ष का आदमी है? कौन विपक्ष का? कौन फायदा दिला सकता है? कौन रूखा, अड़ियल और बेकार आदमी है? किसे बुलाना और बोलवाना था किसे नहीं? किसे मंच पर बिठना था किसे नहीं? उनके लिए सारा गणित का मामला है। 

इन प्रश्नों के बिना उनका कार्यक्रम अधूरा रहता है।

उनके पास साहित्य का अपना एक गणित है।

लेखक + मुख्य अतिथि = पुराना संबंध।

मुख्य अतिथि + विशिष्ट अतिथि = अलग समीकरण।

पत्रवाचक + आयोजक = संभावित निकटता।

फलां साहित्यकार + लेखक = कुछ तो है!

और यदि कोई व्यक्ति कार्यक्रम समाप्त होने के बाद लेखक के साथ पांच मिनट खड़ा रह गया, तो समझिए विशेषज्ञ की नोटबुक में एक नया अध्याय जुड़ गया।

उनका सूत्र बड़ा सरल है- “जहां दो साहित्यकार खड़े हों, वहां कोई न कोई समीकरण अवश्य होगा।”

और यदि तीन लोग साथ खड़े मिल जाएं तो फिर यह साधारण समीकरण नहीं रहता, 'साहित्यिक त्रिकोण' का युगपत समीकरण बन जाता है।

वे कभी-कभी इतने उत्साह से पूछताछ करते हैं कि सामने वाला सोचने लगता है- मैं साहित्यिक कार्यक्रम में आया हूँ या किसी आयोग के सामने बयान देने?

मजेदार बात यह है कि वे किसी से एक ही बात सीधे नहीं पूछते। पहले एक से पूछेंगे, फिर दूसरे से वही बात थोड़ी बदलकर पूछेंगे, फिर तीसरे से उसकी पुष्टि करेंगे। इस तरह वे साहित्य में वह बहुत बड़ा काम कर रहे हैं जो बड़े-बड़े शोधार्थी भी नहीं कर पाते- एक ही घटना के कई मौखिक प्रामाणिक संस्करण एकत्र करना।

उनकी स्मृति भी अद्भुत है।

पांच साल पहले किस कार्यक्रम में कौन किसके बगल में बैठा था, उन्हें याद रहता है। वैसे वे पूरा रिकार्ड भी मेंटेन रखते हैं, कुछ भी नहीं छोड़ते। सब का खाताबही हिसाब-किताब रखना कोई छोटी बात नहीं, इसलिए वे बड़े और महान हैं। सबके प्रिय ना सही किंतु संवाद समर्थ बने रहते हैं।

किसने किस पुस्तक के विमोचन में किसे बुलाया था, क्या खिलाया-पिलाया, सब याद रहता है। यहां तक कि कहां किस प्रकार रस-रंजन हुआ और उसके बाद का पूरा ऑफ दा रिकार्ड का भी वे रिकार्ड रखते हैं। हो सकता है कि यहीं या ऐसे ही कुछ कारण होंगे जिससे वे सब को संवादी बना सकने का सामर्थ्य रखते हैं।

खास बात यह भी कि उन्हें नए जमान की नई तकनीक और सोशल मीडिया से प्रेम है, किसने किसकी पोस्ट पर कितनी आत्मीय टिप्पणी की थी, क्या कब लिखा सब हिसाब उनके पास रहता है।

किसने किसकी पोस्ट पर केवल 'बधाई' लिखकर काम चला दिया था, वह भी याद रहता है। बधाई और हार्दिक बधाई अथवा बहुत-बहुत बधाई में कितना क्या अंतर होता है, वे विस्तार से उदाहरण के साथ बता सकते हैं।

किसी दिन यदि उनसे पूछा जाए कि फलां लेखक की नई किताब कैसी है, तो वे शायद कहेंगे- “किताब तो मैंने अभी नहीं पढ़ी, लेकिन लेखक के संबंधों में पिछले दो वर्षों में काफी परिवर्तन आया है।”

यही उनकी विशेषज्ञता है।

वे रचना के भीतर अर्थ खोजने के बजाय रचनाकारों के बीच अर्थ खोजते हैं।

उनके लिए आलोचना का नया सिद्धांत है- ‘किसने किसे बुलाया और किसने किसे नहीं बुलाया।’

पुरानी आलोचना पूछती थी- रचना में कथ्य क्या है?

नई आलोचना पूछती है- लेखक के साथ मंच पर कौन था?

पुरानी आलोचना भाषा, शिल्प और संवेदना देखती थी।

नई आलोचना फोटो में चेहरों की दूरी नापती है।

पुराने आलोचक कहते थे- “रचना को उसके संदर्भ में समझना चाहिए।”

हमारे विशेषज्ञ कहते हैं- “व्यक्ति को उसके संपर्कों में समझना चाहिए।”

उनकी दृष्टि में साहित्य का सबसे महत्त्वपूर्ण शब्द 'संबंध' है।

और यदि कभी उनसे पूछा जाए कि आप कार्यक्रम में क्या लेने आते हैं, तो वे शायद कहें- “मैं तो कार्यक्रम की रिपोर्ट के लिए कुछ जानकारी ले रहा था।”

बस, यही 'कुछ जानकारी' उनकी पूरी साहित्यिक साधना है।

कार्यक्रम समाप्त होने के बाद जहां दूसरे लोग कहते हैं- “बहुत सुंदर आयोजन था”, वहां उनका काम शुरू होता है- “हां, आयोजन तो ठीक था... लेकिन आपको पता है, मुख्य अतिथि और लेखक के संबंध पहले जैसे नहीं रहे।”

“अच्छा!”

“हां। और विशिष्ट अतिथि का तो मामला अलग है।”

“क्या हुआ?”

अब उनके चेहरे पर वह संतोष दिखाई देता है जो किसी पुरातत्ववेत्ता को हजार साल पुराना सिक्का मिलने पर होता होगा।

और सामने वाला, जो अभी तक कार्यक्रम को साहित्यिक आयोजन समझ रहा था, अचानक समझ जाता है कि वह जिस कार्यक्रम में गया था, उसका असली विषय पुस्तक नहीं था। विषय था- साहित्यिक समीकरण।

साहित्य में ऐसे विशेषज्ञों की उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता। आखिर कोई तो हो जो यह हिसाब रखे कि साहित्य में कौन किसके साथ है, किससे कितना है और कब तक साथ है या साथ रहेगा।

वे बहुत-बहुत किताबों को उलट-पलटकर देख चुके हैं, हर बार लेखक का नाम पढ़ेंगे और मुस्कराकर कहेंगे- “किताब बाद में पढ़ लेंगे। पहले यह देखिए- इसकी भूमिका किसने लिखी है? इस पर टिप्पणियां किस-किस की हैं।”

यही हैं हमारे साहित्यिक समीकरणों के विशेषज्ञ।

इनकी दृष्टि में साहित्य वह नहीं जो लिखा गया है।

साहित्य वह है- कौन किससे मिला, किसके साथ बैठा और किसके साथ उठकर चला गया। किसे कैसे पुरस्कार मिला और कौन-कौन किस पुरस्कार के लिए कितने पापड़ बेल चुका है कितने बेलने बाकी है। उनकी प्रतिभा का कोई मुकाबला नहीं कर सकता है।

बाकी सब तो किताब में छपा हुआ है- उसे कोई भी पढ़ सकता है, असली गणित तो यही है और उन्हें उसमें महारथ हासिल हो चुकी है।

●