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23 अगस्त, 2024

पांच प्रेम कविताएं ● नीरज दइया


1.

प्रेम चाहिए पृथ्वी पर

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मेरे खून में- प्रेम है

आदम और हवा का

उसी प्रेम की असंख्य बेलें

फैली हैं- पूरी पृथ्वी पर,

जुड़ा हुआ हूं मैं

जुड़ी हुई हैं- पीढ़ियां सारी।


उस समय के साक्षी-

सूरज, चांद और सितारे

कहते हैं सारे

प्रेम चाहिए पृथ्वी पर।

हवा में चंचलता है

उसी से थिरकती है पृथ्वी

चकित है आकाश।

००००

2.

यह कवि की कल्पना नहीं

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यह कवि की कल्पना नहीं

शुद्ध यथार्थ है-

लाल पान जैसा ही होता है दिल।

वह दिखाया नहीं जा सकता

छलिया होता है वह,

ईश्वर के सारे छल

छिपाए रखता है-

अपने भीतर।


कभी धड़कता है- धीरे-धीरे

कभी जोर-जोर से

और कभी रुक जाता है-

अचानक!


विज्ञान के सारे शिक्षकों ने

देश दुनिया के सारे डॉक्टरों ने

बहरूपिये दिल को जाना

मगर मान नहीं

जैसे कवि ने माना

अगर मान लेते

वे कवि हो जाते!

००००००

3.

खरोंच

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हमारा दिल

एक पहेली है अबूझ

सब कुछ समझा जा सकता है

सिवाय दिल के।

किसी नियम या सूत्र में

बांधा नहीं जा सकता है-

प्रेम।

उम्र और देश काल की सीमाएं भी

बांध नहीं सकती उसे।

अनेक बार मैंने कहा दिल से-

अभी समय है सही

किया जा सकता है प्रेम

किंतु स्थिर रहा वह अपनी जगह

और एक दिन अचानक

करने लगा- नृत्य।

बेमौसम बिना बादल

कर सकता है वह नृत्य

मैंने पाया

इस नृत्य में

टूटा नहीं दिल

बस हल्की सी खरोंच लगी।

००००

4.

यकीन कीजिए

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प्रेम जैसा द्रव्य

दूसरा कोई नहीं है

पूरी पृथ्वी पर।

किसी सारणी में

नहीं है उसका

तयशुदा स्थान।

वह अवस्थाओं से परे

किसी भी अवस्था में

बदलता है अवस्था,

छोड़ सकता है-

अपना रंगकिसी भी रूप में

उसे दाग या धब्बा मानने वालों की कमी नहीं

पर यकीन कीजिए-

प्रेम जैसा द्रव्य

दूसरा कोई नहीं

पूरी पृथ्वी पर....।

००००००

5.

लौटना संभव नहीं

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जब-जब भी मैं

पहुंचा हूं-

प्रेम के परिसर में

लौटा नहीं पूरा

संभव नहीं- लौटना।

हरेक यात्रा का

अपना समय होता है

नहीं लौटता समय भी

चलता रहता है-

आगे और आगे

साथ-साथ समय के

चलते हुए मैं

देख रहा हूं- लगातार

पीछे और पीछे

जानते हुए-

कि लौटना संभव नहीं....।

००००


 

23 जुलाई, 2024

पांच प्रेम कविताएं ● नीरज दइया


(1.)

उसे खुश देखकर 

मैंने पूछा नहीं

बस सोचा-

खुशी का क्या राज है?


उसकी खुशी 

बहुत अच्छी थी 

इतनी अच्छी कि सोचते हुए 

खुश हो गया 

मैं भी!



(2.)

यह वही चेहरा है!

मैं सोचने लगा 

कल जो उदासी में डूबा था 

हैरान-परेशान 

अपने रंगों को कहीं भूलकर,

बेसुध-बेरंग बेजान।


यह खनकती हुई हंसी 

कहां से आई? 

क्या गुमसुम उदास तुम को

तुम्हारे भीतर छुपी-

अल्हड़ लड़की मिल गई है

या किसी नई उम्मीद में 

भीतर बहने लगी है-

एक साथ कई चंचल नदियां,

जिनकी कलकल से 

खनक रही हंसी तुम्हारी।



(3.)

प्रेम में 

भीतर बजती है- 

घंटी या घंटियां?

यह संगीत की बात है....


खलनायक नहीं मानते 

घंटी या घंटियां 

वे इन शब्दों के 

केवल पुल्लिंग रूप जानते हैं,

उनके लिए प्रेम 

केवल हासिल करना है!

उनका शब्दकोश ही नहीं

अलग है व्याकरण भी हमसे।



(4.)

प्रेम में लड़का 

प्रेम में लड़की 

प्रेम में आदमी 

प्रेम में औरत 

प्रेम में बुढ़ा 

प्रेम में बुढ़िया....


प्रेम इतना बावला है 

कि देखता ही नहीं

वह किसे भिगो रहा है। 


समा जाते हैं इसके भीतर- 

छोटे-बड़े देवता-दानव

या फिर पूरी दुनिया के शब्द।



(5.)

इतना गुस्सा क्यों? 

अपने अतीत पर 

जो बीत चुका है 

वह लौटकर नहीं आएगा।


छोड़ दो 

जाने दो उसे- 

दूर... बहुत दूर तुमसे

वह मुक्त होना चाहता है

और उसे थामे बैठे हो तुम...


माना कि यह कहना सरल है-

'वर्तमान को थाम लो 

और भविष्य को देखो।'

सच में कठिन है-

आज में रहना-सहना...

इतना गुस्सा क्यों है?

गुस्से को बह जाने दो-

उसी कल के प्रवाह में।