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05 मार्च, 2017

नियति के आगोश में

सुबह कितनी जल्दी हो जाती है पता ही नहीं चलता। लगा अभी थोड़ी देर पहले ही तो रात को सोए थे, और इतनी जल्दी कैसे पूरी रात गुजर गई। अभी मेरी आंखें पूरी खुली भी नहीं थी, खुलने को तैयार भी नहीं थी कि लगा कोई बाहर हमारा दरवाजा पीट रहा है। एक सपना अभी आंखों में अटका था, कुछ स्मृति में और कुछ विस्मृत होते हुए। किसी ने सपने की हत्या कर दी। मैं अपने सपने को भूल सोचने लगा कि कुछ लोग बेवकूफ होते हैं। वे किसी के घर का दरवाजा बजाना भी नहीं जानते, और वह भी सुबह-सुबह के वक्त। सोचते नहीं- अरे, कोई सो रहा होगा। क्यों किसी की नींद में खलल डाला जाए। कोई सपने न जाने कहां तक जाता कैसे पूरा होता। ऐसे लोगों को कौन समझाएं कि भैया किसी का दरवाजा बजाना सीखो। क्या यह नहीं होना चाहिए कि आहिस्ता से दरवाजे पर दस्तक करें और फिर इंतजार की मुद्रा में तकिन विश्राम। मानता हूं ऐसा थोड़ा-सा इंतजार भी बहुत बड़ा लगता है। पर यह भी तो सोचिए कि भीतर जो कोई भी है, उसे थोड़ा वक्त लगेगा या नहीं। क्या वह बस इसी इंतजार में है कि आप दरवाजा बजाएं और वह झट से खोल दें। ऐसा भी नहीं है कि आपने बटन दबाया और मेरे घर का दरवाजा किसी तिलस्म की तरह सिम-सिम पलक झपकते ही अपने आप खुल जाए।
      मैं झुंझलाते-झल्लाते हुए उठ कर नाराजगी लिए दरवाजे तक पहुंचा और दरवाजा खोला। सूनी आंखों से निहारते दो अपरिचित-से चेहरे थे। उन के पीछे कुछ दूरी पर सामने वाली आंटी खड़ी थी, जो अपने हाथ से इशारा करते हुए मुझ से कहने लगी- ‘सामने वाले दादा जी गुजर गए हैं।’ मैं सामने के घर की दिशा में देखते हुए उन लड़कों को पहचानने की कोशिश करने लगा। लगा अरे ये तो यहीं के, सामने घर में ही रहते हैं। काफी बार इनको देखा है। जिन दादा जी की बात बताई जा रही थी, वे उनके पोते हैं। मैं अपने सपने को याद करता हुआ इस सच को पहचान नहीं सका। मेरा पहले का गुस्सा और खीज जा चुके थे। वे चले गए और मैं भीतर आ गया। पत्नी ने पूछा- ‘कौन थे।’ मैंने सारी कहानी एक पंक्ति में बता दी- ‘सामने घर में दादा जी गुजर गए हैं।’ मैंने पाया बिना किसी भाव के वह बोली- ‘ये तो होना ही था। अच्छा हुआ जीवन सुधर गया। मुक्त हो गए, अगर एक दिन पहले संसार छोड़ते तो बड़ा पुन्न रहता। आब तो वैशाख भी उतर गया।’ मैं जिरह करने के मूड में जरा भी नहीं था, किंतु अब वैशाख के उतरने ने मुझे गहरे तक हिला कर रख दिया- ‘क्या फर्क पड़ता है इन सब बातों से। ये बातें बस कहने-सुनने में अच्छी लगती हैं। तुम तो जल्दी से चाय बनाओ।’ मेरे प्रतिवाद से वह कुछ झुंझला जरूर गई थी, किंतु मौत की खबर उस में किसी आश्चर्य या दुख के भाव को ला पाने में असमर्थ रही। मैं अपने सपने को जैसे पूरा भूल चुका था। मानो वह स्मृति कहीं चली गई थी और मैं उसका पीछा कर रहा था। अंततः मैं हार गया मुझे कुछ भी याद नहीं आ रहा था। मौत एक जीवन ले जा चुकी थी और मेरा सपना भी बिना किसी मौत के मुझ से दूर चला गया।
      मुझे ऐसा क्यों लगने लगा कि यह जीवन भी एक सपना है और उसे एक दिन चले जाना है। जीवन के रंगमंच पर जैसे कोई नया नाटक आरंभ हो चुका था। कोई भी मौत कभी नाटक नहीं, सच्चाई होती है। मैं सोचने लगा कि कितनी सहजता से हम किसी के अंत पर ऐसी चर्चा कर लेते हैं। कुछ विमर्श बाहरी-भीतरी यहां बस चलते रहते हैं। पूरे संसार में कहना-सुनना और निरंतर विचार करना जारी था, संसार तो बहुत बड़ा था। उसका हृदय भी बड़ा था। वह ऐसे कितने ही गम वर्षों से झेलता आया था। पर गली तो छोटी थी। बेहद तंग तो नहीं पर इतनी बड़ी भी नहीं। इतने लोगों के कारण गली तंग लगने लगी थी। सभी बड़ी सहजता-सरलता से अपने विचारों में खोए थे और अंतिम यात्रा के लिए जरूरी काम जारी थे।
      जीवन का सत्य क्या है? किसी जीवन की सच्चाई क्या है? जो जीवन जा चुका है, वही तो जानता है- अपनी सच्चाई। कैसे वह इस संसार से चला गया। वह गया है या उसे कोई ले कर गया है। वह किसी के साथ अपनी इच्छा से या अनिच्छा से चला गया। वह इस संसार में अकेला आया था और गया भी अकेले। पर ऐसे अकेले कोई कैसे जा सकता है। इस आने जाने में किसी की इच्छा क्यों नहीं होती। ऐसे कोई कहीं आना-जाना नहीं चाहता। सब यहीं रहना चाहते हैं। हमारे हाथ में कुछ भी नहीं। ना हमारा आना, ना हमारा जाना और ना ही हमारा ठहरना। यही जीवन की सच्चाई है।  जब जीवन हमारा है, तो इस पर हमारा अधिकार क्यों नहीं है। जीवन पर हमारा अधिकार होना ही चाहिए। यह क्या भला, जीवन हमारा और अधिकार हमारे नहीं। मैं सोचने लगा कि मौत भी जब आती है, तब वह जीवन का दरवाजा पीटती है, या फिर हल्के-से दस्तक देकर थोड़ा इंतजार करती है। नहीं मौत तो बिना किसी दरवाजे पर दस्तक दिए आती है, उसके लिए कोई दरवाजा बंद हो नहीं सकता। मैं भी क्या-क्या सोचने लगा। मैं अभी जरा जल्दी में हूं और ये गंभीर बातें तो हमें आराम से करनी चाहिए। ऐसा हम कभी सोचते भी नहीं। ऐसा कुछ सोचने के लिए जीवन में अवकाश नहीं। आज अवकाश है- रविवार। मैं सोच रहा हूं। आज का दिन ही मौत ने चुना, जब मौत पास के घर में आई और किसी जीवन को चुरा कर ले गई। आना उसकी नियती है। 
      उसके आ कर जाने से गली में स्त्रियों का विलाप अब किसी गीत की भांति रुक रुक कर फिर फिर जारी हो रहा था। इस रोने में दर्द तो था, किंतु बहुत ठहरी हुई सहजता भी थी। जैसे उन सब से सोच रखा था कि ऐसा होना नियति है। दादा जी ने अस्सी बरस ले लिए। अब उनको इस संसार से जाना ही था। वे बीमार भी रहने लगे थे। घर-परिवार के सभी काम तो उन्होंने कब के कर दिए। उनका अब कोई काम नहीं था। जैसे वे पिछले काफी वर्षों से इसी दिन का इंतजार कर रहे थे। मैं भी इंतजार कर रहा था कि कब घर से बाहर निकलूं। मुझे भी उन लोगों में शामिल होना था। चाय-नाश्ते के बाद अब मैं भी घर के बाहर अंतिम-यात्रा में शामिल होने पहुंचे लोगों के बीच पहुंच चुका था। मातम में पूरी गली जैसे मौन होकर विलाप सुन रही थी। वहां काफी लोग जमा थे, पर सभी मौन और भाव-शून्य बस शव-यात्रा की तैयारियों में व्यस्त थे। इन दिनों धूप अधिक होने लगी है, इसलिए सब कुछ जल्दी-जल्दी निपट जाए तो अच्छा। इस जल्दबाजी में मैं भी शामिल था। यह तो अच्छा हुआ, आज रविवार है नहीं तो एक छुट्टी शहीद हो जाती।
      मौत को डरावनी कहा जाता है पर हम सब को देख कर कोई हमें डरे हुए नहीं कह सकता था। हम मौत से डरे हुए नहीं थे। यह मौत जो एक जीवन ले कर चली गई थी, बड़ी जानी-पहचानी थी। हम सब जैसे तैयार थे कि उसको आना है। जिस देह में एक जीवन था वह जीवन भी अब थक चुका था। वह जीवन जहां वर्षों रहा था, वह शरीर अब किसी काम का नहीं था। अंततः जीवन मुक्त हो गया। जैसे जीवन जाते जाते अपनी छांया यहीं छोड़ गया। देह उस जीवन की प्रतिलिपि थी और घर वाले उस प्रतिलिपि को घर से बाहर कर देना चाहते थे। जीवन से रहित देह को रखने का स्थान घर नहीं होता। यह कोई नयी बात नहीं है, सभी यहां ऐसा ही करते हैं। करते क्या है, हम सब को ऐसे करना होता है। बस एक बंदरिया को देखा है जो अपने मृत बच्चे को छाती से चिपकाए-चिपकाए घूमती रहती है। हम ऐसा नहीं करते, ऐसा नहीं कर सकते। घर वालों के लिए खुशी की बात थी जो कोई किसी को कह नहीं रहा था पर उन सब ने स्वीकार कर लिया था कि दादा जी चले गए हैं तो घर में एक कमरा खाली हो जाएगा। यह उनका कमरा अब किसी और को मिल जाएगा। हमेशा के लिए नहीं। ठीक ऐसे ही जैसे दादा जी को कभी यह मिला था। उन के जाने से बाकी किसी दूसरे के हिस्से था। कहीं कुछ भी खाली नहीं हुआ था। कमरे के फिर से भर जाने की बात और सब कुछ भरा-भरा था। वे अपने पीछे भरा पूरा परिवार छोड़ कर गए हैं।
      आज वह घर औरतों से भरा हुआ था और गली आदमियों से। औरतों को तो घर में ही रोने का काम करना था। और कुछ जानती थी कि उनको बस चुपचाप यहां काफी देर तक बैठना है। उन औरतों में जो बस अभी-अभी आईं थी, वे पूछ रही थी- ‘ऐसे कैसे हुआ?’ वे बस पूछने के लिए पूछ रही थी। उन सब को सब मालूम था। नहीं भी मालूम होता तो भी यह मालूम होना कोई बहुत जरूरी नहीं था। वे कुछ पूछने और बात करने का रिवाज निभा रहीं थीं। आदमियों में भी रिवाज निभाने वाले काफी थे।
      हम सब को शव-यात्रा के पीछे-पीछे जाना था। हमारी सब की अपनी अपनी समस्याएं थी। अलग-अलग समस्याओं थी पर मेरी कोई समस्या नहीं थी। आज रविवार जो था। मैं ऐसे लोगों में शामिल हूं जो हर रविवार को तो कम से कम समस्याओं की छुट्टी रखते हैं। मेरे पास बैठे सज्जन को रविवार के होते हुए भी दुख था कि नगर निगम को समय पर फोन कर के गाड़ी मंगावा लेते तो इतनी दूर पैदल नहीं चलता पड़ता। एक दूसरे सज्जन को समस्या थी कि हम नई पीढ़ी के लोग पुराने रस्मो-रिवाज भूलते जा रहे हैं। अब के लोगों को अर्थी तक बांधना नहीं आता। क्या हमें इन सब बातों को जानना नहीं चाहिए। कैसे-क्या संस्कार होने चाहिए यह तो सभी को ध्यान होना चाहिए। जो कुछ संस्कार जानते थे वे जो जानते थे वैसा कर रहे थे, उन करने वालों के कामों में भी कमियों का बखान कुछ अधिक जानने वाले लोगों में होने लगा। वे कर कुछ भी नहीं रहे थे। न रोका-टोकी बस एक दूसरे को बता रहे थे- ऐसे नहीं, हमारे तो ऐसा होता है।
      इतने में सुबह जो लड़का मुझे कहने आया था, वह आया और मेरे पास बैठे एक बुजुर्ग को पूछने लगा- ‘दादा जी, ये मोती और सोने का तुस कैसे करना है।’ दादा जी ने बताया- ‘आंखों में मोती और मुंह में सोने का तुस देना है।’ ये बात मुझे परेशान करने लगी कि ऐसे जानने वाले लोग जब चले जाएंगे तब कौन ध्यान रखेगा इन बातों का। मैंने पाया दादा जी के लड़के रमेश को भी ऐसा कुछ ध्यान नहीं था। बस सारा काम हो रहा था, अंतिम क्रिया का सामान लाने वालों से लेकर उस सामान का प्रयोग करने वालों तक का जैसे कोई क्रम बिना किसी निर्धारण के किया हुआ था।
      वह समय आया जब अर्थी को उठा कर गली में लाया गया और हम शमशान की तरफ ‘राम नाम सत्य है’ कहते हुए हजूम में चल निकले। अब घर से रोने के स्वर में काफी तेजी आई किंतु लोगों के समवेत स्वर-घोष में वह मंद लगा। शव को कंधा देने वाले जवान थे वे तेजी से चले तो पीछे चलने वालों पीछे छूटने लगे। किसी ने दौड़ कर शव को कंधा देने वालों को धीरे चलने का कहा तब पीछे वालों को थोड़ी राहत मिली। फिर भी चार जवानों और कुछ बूढ़ों की इस दौड़ में मुकाबला काफी देर तक होना था। सभी राम नाम की सत्यता को जैसे कंठस्त फिर फिर कर रहे थे। सभी को यह सत्य विदित था। इस झूठे जगत में जिस की सत्यता का जयघोष हो रहा था, वह कौन था? वह वहां आगे था या कहीं पीछे छूटता चला जा रहा था। ऐसा तो नहीं उस परम सत्य को बूढे दादा जी ने मौत से मिल कर पा लिया था और वे उस के पास पहुंच गए थे या हम उनको नियति के आगोश में सौंपने चले जा रहे थे।
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22 मार्च, 2015

प्रेम से मिलता जुलता कोई शब्द

कमरे की साफ-सफाई झाड-फौंछ के सिलसिल में हाथ में एक पुरानी डायरी आ गई है। यह संयोग ही है कि जो पृष्ठ मेरे सामने खुला है, उस पर बड़े अक्षरों में लिखा है- प्रेम से मिलता-जुलता कोई शब्द। आगे के पृष्ठ पर एक फूल का अधूरा-सा चित्र बनाने की गई मेरी कोशिश देखते ही हरी हो गई है। पहली पंक्ति- वह उससे आखिरी मुलाकात थी, को पढ़कर एक स्मित भीतर ही भीतर जैसे खिल आई। जैसे कोई पुरानी कहानी जवान हो गई हो। कुछ क्षण पहले सब कुछ सामान्य था, बस पलक झकते ही किसी एक शब्द, चित्र या पंक्ति से बंधा मैं कहां से कहां चला गया।
एक ही बस में हम दोनों एक ही शहर से रवाना हुए थे। उसकी और मेरी मंजिल जुदा-जुदा थी, बस हमारा रास्ता एक था। मेरा शहर उसके रास्ते में आता था। सोचा थोड़ा सफर साथ-साथ रहेगा। मैंने कहा कुछ नहीं बस सोचा था कि यदि वह चाहती तो मेरे यहां रुक सकती थी। आगे दो दिन की छुट्टी थी। उसे या मुझे कोई जल्दी नहीं थी। अब इस पल भी सोचता हूं कि मैंने उससे रुकने का कहा क्यों नहीं। वह रुकती या फिर नहीं रुकती किंतु मुझे कहना तो चाहिए था। पता नहीं रुकने का कहता तो वह रुकती भी या नहीं। कहीं एक डर और संदेह था कि मेरे रुकने का कहने का वह क्या अर्थ लेगी? कोई स्त्री-पुरुष साथ या पास-पास आते ही कहानी जन्म लेती है। कहानी तो कोई भी पास-पास और साथ-साथ आए तो आरंभ होती ही है। हमारे समय में ऐसी मित्रता कठिन है। उसके रुकने का अथवा मेरे इस सोचने का सिरा आप पकड़ कर इस कहानी को कहां से कहां ले जाएंगे। क्या एक इन्सान का दूसरे इन्सान से प्रेम के अतिरिक्ति कोई दूसरा संबंध भी होता है।
उसकी समय की याद एक खुशबू की तरफ अब भी अपने अहसास को लिए जिंदा है। मैं इतने वर्षों बाद अब तक मैं इसे अपनी प्रेम कहानी की तरह संभाले हुए हूं। आज भी लगता है कि वह जख्म हरा है। पीड़ा नहीं, बस कोई सुखद अहसास है जो किसी हवा के झोंके के साथ आया है। वैसे आप जानते हैं कि वर्तमान में जीते हुए, हमारा अतीत में विचरण कभी सुखद और कभी दुखद होता है। मैं अपना काम करते-करते, क्यों सुखद-दुखद जैसी बातें लेकर आत्म-संवाद करने लगा हूं। अभी काम काफी बाकी है। आपका कभी किसी लेखक के कमरे को देखने का अनुभव रहा होगा तो आप जानते होंगे कि कितनी किताबें, पत्र- पत्रिकाएं और भी ढेर सारी सामग्री रहा करती है लेखकों के कमरों में… कोई जरा-सा कागद या पुर्जा भी बेहद जरूरी होता है। किसी कविता की कोई पंक्ति या फिर कहानी की शुरुआत की कुछ पंक्तियां ना जाने कहां कहां लिखी हुई मिल जाती है। हमारे भीतर बहुत सारे नदी-नाले और खिड़कियां-दरवाजे आदी-आदी हुआ करते हैं, जहां से हम जब चाहे-अनचाहे निकलते हैं, और बस खो जाते हैं।
एक समय में एक जीवन के साथ, समांनतर हम अनेक जीवन जिया करते हैं। करने को तो मैं अब भी अपने कमरे को ठीक-ठाक करने का नाटक कर रहा हूं, किंतु खो गया हूं उस कहानी में। मैंने उससे कहा था कि घर पहुंच कर मिस कॉल जरूर करना, और उसका उस रात मिस कॉल आया भी था। वह अच्छे से अपने घर पहुंच गई और फिर कभी नहीं मिली। जरा-सी कोई बात जीवन में खलबली मचा सकती है। एक कोड वर्ड हो सकता है- मिस कॉल वाली। अतीत की यह छोटी-सी कहानी वर्तमान में अनेक कहानियों को जन्म दे सकती है। पत्नी, बेटे-बेटियां और मेरे मित्र, सब के सब अपनी अपनी नजर से इसका पोस्टमार्टम करेंगे।
सच में ऐसी कहानियां जग-जाहिर नहीं करते। बहुत-सी कहानियां पुरानी होकर भी पुरानी नहीं होती, जैसे- यह प्रेम-कहानी। आप उत्सुक हैं जानने को कि आगे मैं क्या लिखने वाला हूं। हम दोनों किसी एक कार्यशाला के सिलसिले अपने अपने शहरों से रवाना होकर किसी एक शहर में मिले थे। वह देखने में सुंदर और दूसरों से अलग-सी दिखती थी। मेरा उसके प्रति आकर्षण का कारण उसकी सुंदरता या विपरित लिंगी होना नहीं था। हम दोनों के अलग-अलग समूह थे। चाय के वक्त जब मैंने पहली बार उसको देखा और उसकी तरफ देखता रहा, तो इसका कारण उसके हाथ में हिंदी की प्रसिद्ध कथा-पत्रिका का होना था। उसका साहित्य-प्रेम जाहिर हो रहा था। मैं हैरान था कि इस उजाड़ में और हिंदी साहित्य के आधुनिक काल के आरंभिक दौर को जानने-पहचानने वाले मास्टरों और मास्टरनियों में इक्कीसवी शताब्दी की आधुनिक साहिबा कौन है? मेरा अनुमान ठीक निकला वह कहानी लेखिका थी और उसकी कहानी उस पत्रिका में प्रकाशित हुई थी।
अपनी और उसकी कहानी मैं आगे बढ़ाता हूं, किंतु बीच में जो मैंने एक आकलन प्रस्तुत कर दिया है उसके भी स्पष्ट करता चलू। जिससे आपको लगे कि मैं सही हूं। मेरा कोई पूर्वाग्रह नहीं है। वहां मौजूद जमात से यदि सवाल किया जाए कि हिंदी कहानीकार कौन-कौन? तो जबाब होगा- प्रेमचंद। और उनके लिए प्रेमचंद के आगे-पीछे भी प्रेमचंद। जिनकी दुनिया सूर, कबीर, तुलसी से आरंभ होकर पंत, प्रसाद, निराला और महादेवी तक पूरी हो जाती हो, वह भला उस कथा-पत्रिका को क्या जानेंगे। उस पत्रिका के बारे में उससे कुछ मित्रों ने पूछा और उन्हें अफसोस हुआ- अरे यह पत्रिका तो प्रेमचंदजी निकाला करते थे, क्या फिर से निकालने लगे? मैं बिना किसी नाटकीय मुद्रा और व्यंग्य के यह सत्य वचन लिख रहा हूं कि हिंदी साहित्य को पढ़ाने वाले समकालीन साहित्य से पर्याप्त सरोकार नहीं रखते। मैं जानता हूं कि आपको भी इस कहानी की नायिका से सरोकार है, कि कैसे-क्या हुआ?
आपको यह जानना अच्छा लगेगा कि मैं जानता हूं कि आपको पता है- आंखें सेकना क्या होता है। यह दोनों तरफ से होता है। चाय के वक्त एक दृश्य बहुत करीब मेरी आंखों के सामने घटित हो रहा था, जिसमें भाई लोग उस कथा-पत्रिका को ले लेकर उलट-पलट कर अपना ज्ञान आलाप कर रहे थे। मैंने एक काम करने की हिम्मत जुटा ली। अपने थेले में से एक पत्रिका निकाली और उस रुपसी को यह कहते हुए दे दी कि मेरी कहानी छपी है। इस उजड़े चमन में यह चुपके-चुपके कोई फिज़ा थी। आश्चर्य कि वहां हिंदी कहानी में अकहानी का दौर कब तक चलेगा… जैसी आवश्यक बहस गर्म थी, और एक साहब तो कह रहे थे कि हिंदी कहानी में प्रेमचंदजी के बाद कोई ढंग का कहानीकार पैदा ही नहीं हुआ। ठीक उस समय हम एक-दूसरे को देख रहे थे! आज इतने लंबे अंतराल के बाद भी मैं उसी जगह जा कर खड़ा हो गया हूं- उसे देखते हुए। थोड़ी देर बाद ही वह मधुर मुस्कान के साथ पत्रिका मुझे लौटाते हुए आंखों ही आंखों में कुछ कहती है। मैं उसका कहना सुनता हूं। अब वह मित्र-मंडली से संबोधित है- प्रेमचंद के बाद… वाह री अकहानी…. उसकी हंसी भीतर गूंज रही है। इस कहानी का यहां कोई सूत्र कस कर हमे एक दूसरे से अब भी जैसे बांधे हुए है।
क्या मैं अब भी उसकी स्मृति में कहीं हूं या यह कोरी मेरी ही स्मृति है जो उसे अब तक बांधे है। आपको यह जादू जैसा नहीं लगता। हम जिसे बांधे बैठे हैं और उसको इसकी खबर नहीं! संबंधों में ऐसा कुछ बीज जैसा होता है कि वह सपना बुनता है। क्या उसकी स्मृति कोई सपना है, जो जड़े फैलाए मेरे भीतर अब भी जिंदा है। आज वह भले ही मुझे भूल गई हो, किंतु जब किसी सूत्र से उसकी स्मृति विगत के उस बिंदु पर पहुंचेगी तब मैं उसके भीतर किसी दृश्य में उपस्थित हो जाऊंगा। मेरी उस उपस्थिति का मुझे भला कैसे अहसास होगा। मुझे इसकी कोई खबर नहीं होगी। बेखबर हमारा ऐसा होना, असल में होना नहीं चाहिए। हम शादी-सुदा ऐसे आकर्षण में अनचाहे बंध गए। हमारी इस कहानी के लिए हमें प्रेम से मिलता-जुलता कोई शब्द नहीं मिल सकता। अंतस में कोई दृश्य कहां से कहां पहुंच कर जुड़ जाता है! इस समय भीतर जैसे गीत बज रहा है- प्यार को प्यार रहने दो…. कोई नाम ना दो…. । इस अनाम कहानी का कोई नाम नहीं, फिर भी एक नाम है। घर-परिवार की आत्मीय बातों, किस्सों-कहानियों में जो संबंध का सिरा बना और विकसित हुआ, वह हमारी आखिरी मुलाकात में कहीं पीछे छूट गया। नहीं ऐसा नहीं हुआ, उसका कोई अंश अब भी भीतर बच है। जो कि अब भी लहरा रहा है। उसका लहराना या रोकना मेरे बस में नहीं।
मैंने एक बार सोचा भी था कि हमारी उस मुलाकात पर एक कहानी लिख कर प्रकाशनार्थ भिजवा दूं। किंतु नहीं लिख सका। सोचता हूं कि हमारा मन क्या किसी कागद की तरह होता है कि उस पर कभी कोई पेपरवेट रख दे, और वह हवा में फड़फड़ाता रहे। ऐसा प्रम जो कभी आकार लेता संभव होता दिखता है, उसे दिखाया कैसे जाए? और क्यों दिखाया जाए? दिखने से दूर सदा छुपा कर रखने वाला प्रेम हमे जिंदा रखता है। भले ऐसे प्रेम पर किसी को यकीन हो या नहीं, किसी के यकीन की आवश्यकता भी नहीं। यह है तो बस है। इस प्रेम को अपना नाम नहीं दिया जा सकता, इसलिए उस पृष्ठ पर मैंने उस दिन लिखा था- प्रेम से मिलता जुलता कोई शब्द … फूल का वह अधूरा-सा चित्र बनाया था, जो अब भी कभी-कभार महक उठता है। बस मेरे लिए, जैसे आज अभी-अभी सजीव हो गया हो।
(राजस्थान पत्रिका 22.03.2015)