12 जुलाई, 2026

तुम कब मरोगे?

 राजस्थानी कहानी-

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मूल : सांवर दइया
हिंदी अनुवाद : नीरज दइया

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उफ़! यह तो बड़ी घटिया बात हो गई। मैं तुम्हारा नाम ही भूल गया। खैर, नाम में रखा भी क्या है? फिर तुम्हारा कोई एक नाम तो है नहीं। सच तो यह है कि तुम्हारा कोई नाम ही नहीं है। तुम तो बिना रंग, रूप और आकार के हो। आँखों से दिखाई भी नहीं देते, फिर भी चौबीसों घंटे हमारे बीच मौजूद रहते हो। तुम्हारा तो कहना ही क्या! तुम यहाँ होते हो और वहाँ की बात बताते हो। तुम कहाँ-कहाँ की बात नहीं बताते हो। तुम्हारा तो काम ही यही है- यहाँ की बातें वहाँ और वहाँ की बातें यहाँ पहुँचाना। बताओ, ऐसी कौन-सी जगह है जहाँ की बातें तुम नहीं जानते? यही तो तुम्हारा धंधा है।

लो, आज भी रोज़ की तरह घर से निकले हो। सब्ज़ी लेने जाना है। मन हो तो दूसरी चीज़ें भी खरीद सकते हो। वैसे अब तुम्हारी उम्र इतनी नहीं रही कि भारी सामान उठा सको। शरीर भी पहले जैसा मजबूत नहीं रहा। दो-चार हड्डियाँ तो ज़रा-सी बात पर चटकने लगती हैं। लेकिन यह बात तुम किसी को नहीं बताते। सबको यही कहते फिरते हो कि जवानी में खूब कसरत किया करते थे। हो सकता है कभी-कभार दस-बीस दंड-बैठक लगा ली हों, दो-चार बार गदा घुमा ली हो या गणेश चौथ पर अखाड़े में कुश्ती लड़ ली हो और हर बार पटखनी खाई हो। हुआ कुछ भी हो, पर कहते ऐसे हो जैसे बड़े पहलवान रहे हो। खैर, मुझे क्या, जो भी हुआ हो।

तुम्हारी कौन-सी बात पर भरोसा किया जाए? आज जो बात कहते हो, कल खुद ही भूल जाते हो। छोटी-छोटी बातें भूल जाते हो, लेकिन रोज़ एक नई कहानी इस तरह गढ़ लेते हो कि सामने वाले को वह एकदम सच लगती है!

तुम्हारी बातों का सबसे बड़ा विषय तुम्हारे पड़ोसी होते हैं। पड़ोसियों के मामलों में तुम्हारी रुचि ज़रूरत से कहीं ज़्यादा है। तुम तो बंद कमरों के भीतर की खबरें भी ले आते हो। पास और दूर की चीज़ें तुम्हें कितनी साफ़ दिखाई देती हैं, यह तो नहीं मालूम; लेकिन इतना तय है कि तुम्हारे चश्मे का नंबर रोज़ बढ़ता जा रहा है। जिन बंद कमरों की खबरें तुम लाते हो, उन्हें देखने के लिए तुम्हारा कद भी इतना ऊँचा नहीं कि दीवारों के पार झाँक सको। और अगर मान भी लें कि तुम्हारा कद इतना ऊँचा हो, तब भी लोग इतने नासमझ नहीं कि कमरे में पत्नी को बुलाने से पहले खिड़की-दरवाज़े खुले छोड़ दें। और अगर कभी भूल से खुले रह भी जाएँ, तो तुम्हारे चश्मे का नंबर बेकार हो जाएगा। पाँच हाथ दूर खड़े अपने बच्चे का चेहरा तो तुम पहचान नहीं पाते, फिर पचास हाथ दूर की मंज़िल के भीतर कैसे देख लेते हो?

अगर मैं डॉक्टर की बात करूँ तो तुम उसे अनुभवहीन कह कर ढोल पीटने लगते हो। आँखों के डॉक्टर के साथ-साथ दूसरे डॉक्टरों के बारे में भी गलत-सलत बोलने लगते हो। कहते हो- डॉक्टरों को मरीज़ों की ज़रा भी परवाह नहीं। वे अपने वार्ड की नई-नई नर्सों के पीछे घूमते रहते हैं। इधर मरीज़ बिस्तर पर आख़िरी साँसें गिन रहा होता है और उधर डॉक्टर किसी कोने में खड़े होकर मोटी-ताज़ी नर्स से गुनगुना रहे होते हैं- “तुम्हारे लिए मैं आसमान के तारे तोड़ लाऊँगा।”

लगता है तुम अस्पताल में कई दिन रहे हो, क्योंकि यह सब ऐसे विश्वास से बताते हो मानो रोज़ वहीं चक्कर लगाते रहे हो।

तुम्हारी बातों के अनुसार डॉक्टर अस्पताल की दवाइयाँ बेच देते हैं, गरीबों को मिलने वाले मुफ़्त नमूने भी पैसे लेकर बेचते हैं, अपनी निजी प्रैक्टिस के पीछे पागल रहते हैं और जिस घर में मरीज़ देखने जाते हैं, वहाँ की बहू-बेटियों पर भी नज़र रखते हैं।

एक बार डॉक्टर तुम्हारे घर भी आया था। तुम्हारी पत्नी बीमार थी। घर में अठारह बरस की जवान बेटी कम्मो भी थी। अब सच-सच बताओ- क्या डॉक्टर ने कम्मो के साथ कोई ऐसी-वैसी हरकत की थी? अगर की थी तो तुमने मोहल्ले वालों को क्यों नहीं बताया? अरे, यह तो सबको बता देना चाहिए था, ताकि लोग सावधान रहते!

तुम्हें याद है न, जब डॉक्टर खन्ना तुम्हारे पड़ोसी पंवार के घर गया था, तब तुमने कैसी कहानी बना दी थी कि डॉक्टर ने पंवार की बेटी को फँसा लिया है। पंवार की पत्नी की नब्ज़ देखने के बजाय उसकी बेटी से इश्क़ लड़ाता है। पर्ची लिखते समय मन ही मन गाता रहता है- “आओ गौरी, तुम्हें आसमान की सैर कराऊँ।” इसी प्रेम में डूबकर उसने गलत इंजेक्शन लिख दिया और बेचारा पंवार विधुर हो गया। जब लोग पूछते कि तुम्हें शर्म नहीं आती ऐसी बातें करते हुए, तब तुम अपने पीले दाँत निकालकर हँसते और कहते- “मैं झूठ नहीं बोलता, अपनी आँखों से देखा है, भगवान की कसम!”

भगवान की कसम सुनकर लोग तुम्हारी उम्र का लिहाज़ कर जाते हैं। वैसे तुम्हारी कोई उम्र भी कहाँ है? बच्चों के बीच बच्चे, जवानों के बीच जवान और बूढ़ों के बीच बूढ़े बन जाते हो। बूढ़ियों को तुम्हारी बातें बड़ी अच्छी लगती हैं। उन्हें भी यह चस्का लग चुका है। एक मरीज़ को दूसरे मरीज़ की बीमारी सुनने में मज़ा आता ही है।

तुम्हारा यह धंधा 'गिव एंड टेक' की फिलोसफी पर चलता है। तुम दूसरों के घरों की गुप्त बातें सुनाते हो, वे रस लेकर सुनते हैं। फिर जब वे अपनी बातें शुरू करते हैं तो तुम भी उतने ही चाव से सुनते हो। जिन लोगों की ज़िंदगी तुम खोद-खोदकर सुनाते हो, वे खुद अपने बारे में भी उतना नहीं जानते जितना तुम बता देते हो।

हाँ, एक बात और! तुम हमेशा उन्हीं लोगों की बुराई करते हो जो उस समय वहाँ मौजूद नहीं होते। लेकिन अगर संयोग से वही आदमी सामने आ जाए तो तुम्हारी ज़ुबान पर ताला लग जाता है।

याद है गिरधारी? चालीस साल की उम्र में उसने बीस साल की लड़की से शादी की थी। तुमने कैसी कहानी गढ़ दी थी कि भगतिया उसके घर आता-जाता था, उसी ने लड़की को बहका लिया, दोनों भाग गए और दूसरे ही दिन गिरधारी मर गया। फिर तुमने लंबी साँस लेकर कहा- “हे भगवान! स्त्री का चरित्र कौन जान सकता है!”

और जब कोई पूछे कि उन दोनों को जेल क्यों नहीं हुई, तो तुरंत कहते- “बस, मुझे थोड़ा-सा सबूत मिल जाए, मैं उसे बड़े घर की हवा खिला दूँ।”

लेकिन सच बताओ- अगर सचमुच कोई सबूत मिल भी जाए, तो क्या तुम पुलिस के पास जाओगे? पुलिस का नाम सुनते ही तो तुम्हारी हालत खराब हो जाती है।

याद करो युद्ध के दिनों की बात। तुमने अफ़वाह फैलाई थी कि शकूर के घर पाकिस्तानी जासूस रहता है, उसके घर में ट्रांसमीटर है और रात को छत पर बैटरी की रोशनी जलती है। यह कहानी सुनाकर लौट रहे थे कि सादे कपड़ों में एक आदमी तुम्हारे सामने आ गया। उसने जेब से पहचान-पत्र निकाला। बस, तुम्हारे तो प्राण सूख गए। पसीना छूट गया। हाथ जोड़कर गलती मान ली और कसम खाई कि आगे से ऐसी बातें नहीं करोगे। उसने गुस्से में लात मारकर कहा- “दफ़ा हो जा!” खुफ़िया पुलिस की वह लात खाने के बाद तुमने देशद्रोह वाली बातें करना छोड़ दिया।

अब तुम्हें देश की बड़ी-बड़ी समस्याओं पर बोलने में डर लगता है। कहीं फँस न जाओ। इसलिए अब तुम्हारी रुचि सिर्फ़ मसालेदार बातों में है- प्रेम-प्रसंग, औरत-मर्द के किस्से, घर-परिवार की गुप्त बातें। इन्हें सुनाने में भी मज़ा आता है और सुनने वालों को भी। दूसरों की निजी ज़िंदगी में झाँकने की बीमारी हम सबमें है, इसलिए तुम्हारे आसपास हमेशा भीड़ लगी रहती है।

आजकल तुम्हारी कृपा महावीर पर है। तुम कहते फिरते हो कि उसने अपने घर में एक पंजाबी औरत रख ली है। लेकिन लोगों का कहना है कि असली वजह यह है कि महावीर तुम्हारी बेटी कम्मो को देखकर गाना गाता है, सीटी बजाता है और तुम्हारे घर के चक्कर लगाता है। तुमने कम्मो को समझाया- “बेटी, दुनिया बड़ी खराब है।” लेकिन उसने तुम्हारी एक न सुनी।

फिर एक दिन वह फ़िल्म देखने गई और वापस नहीं लौटी। सारी रात तुम इंतज़ार करते रहे। देवी-देवताओं से मन्नतें माँगीं। सुबह उसके नाम की एक चिट्ठी मिली। उसमें महावीर का भी संदेश था।

पूरा पत्र पढ़ने से पहले ही तुम्हारी आँखों के आगे अँधेरा छा गया और तुम बेहोश होकर गिर पड़े। घरवालों ने डॉक्टर बुलाया। डॉक्टर ने कहा- दिल की धड़कन रुकने से मौत हुई।

अगर तुम ज़िंदा होते तो ज़रूर कहते- “मौत दिल की घड़कन रुकने से नहीं हुई, डॉक्टर की लापरवाही से हुई। मैं तो आख़िरी साँसें ले रहा था और डॉक्टर किसी कोने में नर्स के साथ हँसी-मज़ाक कर रहा था।”

लेकिन आज यह सब कहने के लिए तुम हो ही कहाँ?

नहीं, यह भी सच नहीं। तुम तो आज भी हो। एक तुम जाते हो तो तुम्हारी जगह कई और पैदा हो जाते हैं। मुझे तो लगता है कि तुम कभी मरते ही नहीं। बार-बार मरकर भी जी उठते हो। कीचक तो एक बार मरा था, लेकिन तुम…?

अब मैं क्या कहूँ? तुम ही बताओ- तुम कब मरोगे?

नाराज़ मत होना। बस इतना बता दो- तुम कब मरोगे?


14 अप्रैल, 2026

ना कहना हमने नहीं सीखा/ डॉ. नीरज दइया

इस संसार में जीना भी एक कला है, और इस कला का पहला नियम है—“ना” शब्द को शब्दकोश से बाहर निकाल देना। क्योंकि “ना” में जितनी ताकत होती है, उतना ही खतरा भी छिपा रहता है। कौन कब नाराज हो जाए, कौन कब किस रूप में सामने आ जाए- यह कोई नहीं जानता। इसलिए समझदार लोग “ना” कहना सीखते ही नहीं, और जो सीख लेते हैं, वे जीवन की दौड़ में अक्सर पिछड़ जाते हैं।

आज का जमाना “हां” का जमाना है। यहां “हां” कहना केवल सहमति नहीं, बल्कि एक रणनीति है- एक निवेश है भविष्य के लिए। आप किसी से कहिए, “भाई साहब, यह काम हो जाएगा?” सामने से उत्तर आएगा- “अरे क्यों नहीं! हो जाएगा, आप तो बस समझिए... हो ही गया।” इस “हो जाएगा” में इतनी मिठास होती है कि सुनने वाला अपने सारे दुख भूल जाता है। अब काम हुआ या नहीं, यह बाद की बात है।

मान लीजिए आपको अपने बच्चे का एडमिशन किसी अच्छे स्कूल में कराना है। आप किसी “जाने-माने” व्यक्ति के पास जाते हैं। वह मुस्कुराते हुए कहता है, “आप तो अपने आदमी हैं, एडमिशन क्या, प्रिंसिपल को फोन करके अभी बात कर देता हूं।” आप खुशी-खुशी घर लौटते हैं। एक हफ्ता बीतता है, फिर दो, फिर एक महीना। जब आप फिर पूछते हैं, तो जवाब मिलता है, “अरे, वो प्रिंसिपल छुट्टी पर था, अब आया है, हो जाएगा।” और यह “हो जाएगा” महीनों तक चलता रहता है। अंत में जब आप खुद जाकर एडमिशन करवा लेते हैं, तब वही सज्जन कहते हैं- “देखा, मैंने कहा था ना, हो जाएगा! करवा दिया है।”

अब आप सोच में पड़ जाते हैं कि काम हुआ किससे, आपकी कोशिश से या उनकी “हां” से?

इसी तरह ट्रांसफर का मामला ले लीजिए। सरकारी दफ्तरों में यह एक ऐसा खेल है जिसमें “ना” शब्द का कोई अस्तित्व नहीं होता। आप किसी नेता जी के पास जाते हैं, और निवेदन करते हैं- “सर, मेरा ट्रांसफर गृह जिले में करवा दीजिए।” नेता जी तुरंत कहेंगे, “हो जाएगा, आप तो अपने हैं।” फिर वह आपके सामने फोन उठाकर किसी अधिकारी को कॉल करने का अभिनय करेंगे- “हाँ भाई, देखना इनका काम हो जाए।” आप भावुक हो जाते हैं, लगता है जैसे आपका जीवन बदलने वाला है। फिर शुरू होता है इंतजार का असली खेल।

एक महीना, दो महीना, छह महीना- आप फोन करते हैं, पहले तो वे उठाएंगे नहीं। अगर उठा लिया तो जवाब मिलता है- “फाइल चल रही है, ऊपर से अप्रूवल आना है, थोड़ा समय लगेगा।” और अगर किसी दिन अचानक आपका ट्रांसफर हो जाता है, तो नेता जी का पहला वाक्य होगा- “देखा, मैंने कहा था ना, हो जाएगा!”

यह “हां” का जादू इतना प्रभावशाली है कि आदमी सच्चाई जानकर भी कुछ नहीं कह पाता।

बड़े लोगों की दुनिया में “हां” एक मुद्रा है। जितनी ज्यादा “हां”, उतनी ज्यादा कीमत और वोट, पक्षधरता। मंत्री जी से लेकर छोटे-मोटे कार्यकर्ता तक, सभी इस कला में निपुण होते हैं। कोई उनसे कहे- “सर, सड़क बनवा दीजिए” तो जवाब मिलेगा- “अवश्य, बन जाएगी।” कोई कहे- “बिजली की समस्या है” तो उत्तर होगा- “हल हो जाएगी।” और अगर कोई थोड़ा साहस करके पूछ ले- “कब?” तो तुरंत उत्तर मिलेगा- “बहुत जल्द।” आपको इंतजार में लगना होता है, नेता जी नहीं तो समय आपका काम एक दिन करता है और श्रेय मिलता है नेता जी को, यह जरूरी भी है क्योंकि समय तो अबोला होता है। “बहुत जल्द” एक ऐसा समय है जो कभी आता नहीं, लेकिन उम्मीद को जिंदा रखता है।

कुछ लोग तो इस “हां” को व्यवसाय बना लेते हैं। वे हर काम के लिए “हां” कहते हैं, और साथ में थोड़ा “प्रोसेसिंग फीस” भी ले लेते हैं। आप उनसे कहें- “मेरा काम जल्दी करवा दीजिए” तो वे कहेंगे- “बस थोड़ा खर्चा आएगा, बाकी काम मेरा।” आप उनकी मनमानी रकम दे देते हैं, और फिर वही पुरानी कहानी- “काम हो जाएगा।” यदि आप धैर्यवान हैं तो एक न एक दिन काम हो जाता है। अगर काम हो गया तो वह उनका श्रेय, और अगर नहीं हुआ तो “ऊपर से अटक गया”।

इस पूरे खेल में सबसे दिलचस्प बात यह है कि “ना” कहने वाला व्यक्ति समाज में असफल माना जाता है। अगर कोई साफ-साफ कह दे- “भाई, यह काम मेरे बस का नहीं है” तो लोग उसे नकारा समझ लेते हैं। लेकिन जो व्यक्ति हर बात पर “हां” कहता है, भले ही कुछ भी न करे, वह “जुगाड़ू” और “प्रभावशाली” कहलाता है।

हमारा समाज भी इस आदत को बढ़ावा देता है। हमें सच्चाई से ज्यादा उम्मीद पसंद है, भले ही वह झूठी क्यों न हो। हमें “ना” सुनने की आदत नहीं है, इसलिए हम “हां” सुनने वालों के पीछे भागते रहते हैं।

कभी-कभी तो यह स्थिति हास्यास्पद हो जाती है। एक व्यक्ति दस लोगों से एक ही काम के लिए “हां” सुनता है, और अंत में काम किसी ग्यारहवें व्यक्ति से हो जाता है। लेकिन श्रेय लेने के लिए सभी दस लोग तैयार रहते हैं- “मैंने कहा था ना, हो जाएगा!”

इस “हां” की संस्कृति ने हमें एक अजीब मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां काम से ज्यादा उसका श्रेय महत्त्वपूर्ण हो गया है। लोग काम करने से ज्यादा “काम करवा देने” का दावा करते हैं।

अंततः सवाल यह उठता है कि क्या सच में “ना” कहना इतना खतरनाक है? या हमने इसे बिना वजह ही डर का विषय बना लिया है? शायद सच्चाई यह है कि “ना” कहना साहस मांगता है, और “हां” कहना सुविधा देता है। “ना” कहने से रिश्ते टूट सकते हैं, लेकिन “हाँ” कहने से उम्मीदें बनती रहती हैं—यद्यपि अगर वे कभी पूरी न हों। और इसलिए, हमने “ना” कहना नहीं सीखा। क्योंकि इस दुनिया में जीने के लिए सच से ज्यादा जरूरी है- उम्मीद, और उम्मीद का दूसरा नाम है—“हां, हो जाएगा।” और अगर यह कहने वाला अपना परिचित खास मित्र है, तो वह आपसे पैसे ले भी नहीं सकता और बिना पैसों के कोई काम वह करने वाला भी नहीं है। इसलिए लगातार आपको हां-हां सुनना पड़ेगा, सुनने को मिलेगा लेकिन काम आपका नहीं होगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई है, इससे संबंधों की ऊर्जा, ऊष्मा समाप्त होने को है।