सोमवार की सुबह स्कूल का मैदान कुछ ज्यादा ही गंदा दिखाई दे रहा था।
प्रार्थना सभा के बाद बच्चे अपनी-अपनी कक्षाओं में जाने लगे। तभी आरव की नजर मैदान के कोने पर पड़ी।
एक केले का छिलका कूड़ेदान के बाहर पड़ा था।
पास ही पानी की खाली बोतल थी। उसके बगल में चिप्स का पैकेट।
आरव ने नाक सिकोड़ ली।
“कूड़ेदान सामने है, फिर भी कचरा बाहर!”
मीरा ने कहा, “लोग कूड़ेदान तक पहुँचते-पहुँचते थक जाते होंगे।”
दोनों हँस पड़े।
तभी विज्ञान की शिक्षिका सीमा मैडम वहाँ से गुजरीं।
उन्होंने कचरा देखा और बोलीं, “मजाक ठीक है। लेकिन इसे बदलना कौन चाहता है?”
आरव ने हाथ उठा दिया।
मीरा ने भी।
मैडम ने कहा, “तो इस बार विज्ञान प्रदर्शनी के लिए कोई ऐसी चीज बनाओ, जो इस समस्या को थोड़ा आसान कर सके।”
अगले दिन दोनों ने विज्ञान कक्ष में रखी पुरानी चीजों को देखना शुरू किया।
एक टूटा खिलौना रोबोट।
पुरानी कंप्यूटर कीबोर्ड।
खराब पंखे का मोटर।
कुछ तार।
एक पुराना डिब्बा।
और कबाड़ में पड़ा एक छोटा पहिया।
कबीर भी आ गया।
उसने टूटा रोबोट उठाया।
“इससे क्या बनेगा?”
आरव ने कहा, “रोबोट।”
“यह तो पहले से रोबोट है।”
“लेकिन यह चलता नहीं।”
“तो फिर?”
आरव ने मुस्कराकर कहा, “इसे चलाएँगे।”
तीनों काम में लग गए।
पहले उन्होंने डिब्बे को रोबोट का शरीर बनाया।
नीचे चार छोटे पहिए लगाए।
सामने दो छोटी-सी बाँहें लगाईं।
लेकिन सबसे मुश्किल काम था कचरा पहचानना।
मीरा ने सुझाव दिया, “अगर कचरा लोहे का है तो?”
कबीर बोला, “चुंबक!”
उन्होंने एक पुराना चुंबक लगाया।
लोहे की चीजें अलग होने लगीं।
“वाह!” आरव चिल्लाया।
लेकिन केले का छिलका चुंबक से नहीं उठा।
तीनों कुछ देर चुप रहे।
फिर मीरा बोली, “यह गीला कचरा है।”
उन्होंने रोबोट के अंदर दो अलग डिब्बे बनाए। एक गीले कचरे के लिए और दूसरा सूखे कचरे के लिए।
प्लास्टिक की बोतल डालकर देखा।
रोबोट रुक गया।
“इसे क्या समझ नहीं आ रहा?” कबीर ने पूछा।
आरव ने सिर खुजलाया।
मैडम ने कहा, “हर बार मशीन को सही जवाब तुरंत नहीं मिलेगा। कोशिश करते रहो।”
उन्होंने सेंसर लगाए।
कई बार रोबोट ने गलती की।
केले का छिलका सूखे कचरे में चला गया।
कागज गीले कचरे में पहुँच गया।
एक दिन तो रोबोट ने कूड़ेदान छोड़कर सीधा खिड़की की तरफ दौड़ लगा दी।
पूरी टीम उसके पीछे भागी।
“पकड़ो!”
रोबोट दीवार से टकराकर रुक गया।
सब हँस पड़े।
आरव ने कहा, “यह तो हमसे भी ज्यादा शरारती है।”
धीरे-धीरे मशीन सुधरने लगी।
एक दिन उन्होंने उसे मैदान में आजमाया।
कबीर ने जानबूझकर तीन चीजें जमीन पर रखीं—कागज, प्लास्टिक की बोतल और केले का छिलका।
रोबोट धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
पहले उसने बोतल उठाई।
उसे एक तरफ रखा।
फिर कागज।
वह दूसरी तरफ चला गया।
अंत में केले के छिलके के पास पहुँचा।
कुछ सेकंड रुका।
फिर उसे तीसरे डिब्बे में डाल दिया।
तीनों खुशी से उछल पड़े।
“हो गया!”
अगले दिन विज्ञान प्रदर्शनी थी।
बहुत-से बच्चों ने सुंदर मॉडल बनाए थे।
किसी ने ज्वालामुखी बनाया था। किसी ने सौरमंडल। किसी ने वर्षा जल संग्रह का मॉडल।
आरव और उसके दोस्तों के सामने एक पुराना-सा डिब्बा रखा था।
ऊपर लिखा था- “कूड़ेदान का रोबोट”
एक बच्चा हँसकर बोला, “यह रोबोट है?”
आरव ने कहा, “अभी देखो।”
उसने कागज, बोतल और केले का छिलका सामने रखा।
रोबोट चल पड़ा।
सब बच्चे उसके आसपास जमा हो गए।
रोबोट ने तीनों चीजें अलग-अलग कर दीं।
तालियाँ बज उठीं।
प्रधानाचार्य जी भी वहाँ आ गए।
उन्होंने पूछा, “इसे बनाने में कितना खर्च आया?”
आरव ने कहा, “बहुत कम।”
“कैसे?”
कबीर बोला, “ज्यादातर सामान कबाड़ का है।”
प्रधानाचार्य जी मुस्कराए।
“तो इस रोबोट ने केवल कचरा अलग करना नहीं सीखा।”
मीरा ने पूछा, “और क्या सीखा?”
प्रधानाचार्य जी ने सामने पड़े पुराने सामान की ओर देखते हुए कहा, “शायद यह कि बेकार समझी जाने वाली चीजों में भी नया काम छिपा हो सकता है।”
आरव ने रोबोट की तरफ देखा।
उसे अपना पहला दिन याद आया, जब उसने मैदान में केले का छिलका देखकर केवल शिकायत की थी।
आज उसी समस्या के सामने उसका बनाया रोबोट खड़ा था।
प्रदर्शनी खत्म होने के बाद बच्चों ने रोबोट को विज्ञान कक्ष में रख दिया।
अगली सुबह मैदान में फिर कचरा पड़ा था।
आरव उसे उठाने के लिए आगे बढ़ा।
तभी कबीर ने कहा, “रोबोट को बुलाएँ?”
आरव ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
उसने कागज उठाया।
“रोबोट अपना काम करेगा।”
फिर उसने बोतल उठाई।
“और हम अपना।”
तीनों ने मिलकर मैदान साफ करना शुरू कर दिया।
कोने में रखा उनका रोबोट चुपचाप उन्हें देख रहा था।
उसकी छोटी-सी लाल बत्ती जल रही थी।
जैसे वह मुस्करा रहा हो।
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