० नीरज दइया
मैं सत्यनिष्ठ यह घोषणा करता
हूँ कि आज से पहले मैंने कभी कोई संस्मरण नहीं लिखा है। साथ ही यह भी कि
जिस व्यंग्य लेखक बुलाकी शर्मा पर संस्मरण लिखना है वे विल्कुल कोरे हैं,
अर्थात उन पर कोई संस्मरण लिखा नहीं गया है। अगर आप अपनी रिक्स पर यह पढ़ना
चाहते हैं तो आभार। एक संस्मरण क्या मैं इतना प्रतिभावान हूं कि शर्माजी की
पूरी जीवनी लिख सकता हूं।
समस्या यह है कि आजकल कोई किसी को महान
नहीं कहता। यहां गिव एंड टेक का फार्मूला बेस्ट है। तुम मुझे गोडफादर कहो,
मैं तुम्हें जीनियस कहूंगा जैसी अटकलें सर्वविदित है। यह संस्मरण जिस
पत्रिका में आप पढ़ रहे हैं, उसके संपादक बड़े खेले हुए खिलाड़ी है। इन्होंने
व्यंग्य विधा को और व्यंग्य विधा ने इनको इतना मांजा है कि काले बालों का
पूरा मैल उतर कर सफेद-झक्क हो गए। यह संस्मरण मैं जापानी तकनीक से बने एक
ओटोमैटिक पेन से लिख रहा हूं। इस पेन में सारे कानून-कायदे सेट कर दिए हैं।
लिखते समय अगर मैं तयशुदा पटरी से नीचे उतरा कि पेन लिखना बंद कर देगा।
इतना ही नहीं देखिए- सुना आपने सीटी बजी ना।
बुलाकी शर्मा हिंदी और
राजस्थानी दो भाषाओं में लिखते हैं। वे तीसकी भाषा अंग्रेजी जानते हैं। पर
इतनी नहीं जानते कि साहित्य सृजन कर सकें। ऐसा भी कह सकते हैं कि इसमें
उनको इतना कोन्फीडेंस नहीं हुआ कि कुछ लिखने का ट्राई करते। उन्होंने
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के बाल-साहित्य का राजस्थानी अनुवाद किया, जो
साहित्य अकादेमी से प्रकाशित हुआ है। इस बीच एक रहस्य यह है कि बे बांगला
नहीं जानते और मुस्कुराते हुए कहते हैं कि अनुवाद का अनुवाद किया है।
हम दोनों बीकानेर के मूल निवासी हूं। हमारे पास इसका प्रमाण-पत्र भी है।
बिना प्रमाण पत्र के सत्य भी झूठ है। किंतु यह ऐसा सत्य है जिसे हम झूठलाना
चाहते हैं। एक बार मैंने किसी अन्य प्रसंग में बुलाकी शर्मा के लिए जब
लिखा बीकानेर के साहित्यकार तो बे बोले बीकानेर शब्द हटा दो। साहित्यकार
किसी एक शहर का नहीं होता। मुझे भी यह ठीक लगा और मैंने उनके सामने ही
बीकानेर शब्द के स्थान पर राजस्थान लिख दिया तब भी उन्हें आपत्ति थी। वे
पूरे देश और विश्व के साहित्यकार होना चाहते थे। अब साहित्य अकादेमी का
मुख्य पुरस्कार इस बात का प्रमाण है कि वे एक भारतीय साहित्यकार हैं।
भारतीय साहित्यकर बुलाकी शर्मा को अकादेमी पुरस्कार का रहस्य मेरी भाभी जी
राधा शर्मा ने खोल दिया है। उनकी धर्मपत्नी यानी बकौल हमारी भाभी साहित्य
अकादेमी पुरस्कार इसलिए मिला कि पुरस्कृत पुस्तक के लोकार्पण में वे उन्हें
पहली बार साथ ले गए थे। बाकी किताबों का लेखा-जोखा यह है कि वे या तो
लोकार्पण करवाते ही नहीं और कभी किसी कृति का लोकार्पण करवाया तो सपत्नीक
नहीं पहुंचते। इसके साथ ही भाभी जी ने यह भी बताया कि पुरस्कार समारोह में
भी वे उनके साथ दिल्ली गई थीं और भव्य आयोजन में वे उन्हें देख कर मुस्कुरा
रहे थे।
बुलाकी शर्मा कवि नहीं है। उनका कोई कविता संग्रह प्रकाशित
नहीं हुआ है। खबर है कि वे कविता के पाठक और प्रेमी है। गोपनीय बात यह है
कि प्रेम-कविताएं छुप कर लिखते हैं और छुपा कर रखते हैं। सार्वजनीक बात यह
है कि कविता-संग्रहों की समीक्षाएं लिखने से परहेज नहीं है। चूंकी वे कभी
भी कवि हो सकते हैं क्यों कि कवि कम शब्दों में काम चला लेते हैं और
कहानी-व्यंग्य में शब्दों का कुछ अधिक उपयोग करना होता है। इस पीड़ा का
आंशिक इलाज उन्होंने व्यंग्य विधा में इस प्रकार किया है कि पहले वे लंबे
व्यंग्य लिखा करते थे अब व्यंग्य लिखने से पहले मन में उसे धो लेते हैं और
इतना धोते हैं कि धो धो कर उसे छोटे साइज का कर देते है।
‘धोना’
क्रिया के संग वे प्रेम से सपत्नीक संलग्न है। घर में बर्तन और कपड़े भाभीजी
धोती हैं और वे व्यंग्य में अपनी मरजी से पूरे देश-दुनिया को धोते हैं। वे
अपने चालीस वर्षीय अनुभव के आधार पर शरमाते हुए कहते हैं कि वर्ष 1978 में
‘मुक्त्ता’ पत्रिका में ‘बजरंगबली की डायरी’ से उन्होंने अपने आपको
व्यंग्य लेखन मान लिया था। बाद में वे साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बिनी,
आजकल, अमर उजाला, ट्रिब्यून, सन्मार्ग आदि अनेक पत्र-पत्रिकाओं में व्यंग्य
समेत विविध विधाओं में प्रकाशित हुए। अब उनके पास खुद ऐसी कोई लिस्ट नहीं
है कि वे कब-कब कहां-कहां छपे। इसलिए ऐसा कहना ठीक रहेगा कि उनकी सैकड़ों
रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं।
बुलाकी शर्मा क्या मैं व्यंग्यकार हरिशंकर
परसांई तक को बहुत बाद में पहचान पाया। यह तो भला हो के.पी. सक्सेना और
श्वेत-श्याम टेलीविजन युग का कि उन्होंने एक कवि सम्मेलन में ऎखा व्यंग्य
पढ़ा। मैंने व्यंग्य क्या सुना, मैं व्यंग्य का मुरीद हो गया। फिर तो शरद
जोशी का प्रतिदिन कॉलम पढ़ने लागा। बहुत बाद में पता चला कि मेरे घर जो बहुत
सारी पुस्तकें हैं और पिताजी लिखते-पढ़ते रहते हैं वे भी व्यंग्यकार हैं।
मेरे स्व. पिता श्री सांवर दइया ने साहित्य के प्रति मेरी प्रतिभा का आकलन
मेरी युवावस्था में कर लिया था। वे अपनी रचनाएं मुझे सुनाया करते थे। उनके
राजस्थानी व्यंग्य मुझे सुनने पड़ते थे। बाद में उन्होंने मेरा प्रमोशन किया
और मैं उनकी रचना का पहला पाठक होने लगा। पेन रुक रहा है। विषयांतर हो रहा
है।
राजस्थानी के संदर्भ में हरिशंकर परसांई को दो टुकड़े करने
पड़ेंगे। राजस्थानी के हरिशंकर परसांई बुलाकी शर्मा हैं या मेरे स्वर्गवासी
पिता सांवर दइया हैं इस बात पर संदेह है। वोट किए जाएंगे तो दोनों को आधे
आधे मत मिलेंगे। फिर पेन रुक रहा है। तो आप जान लिजिए कि राजस्थानी में
बुलाकी शर्मा के दो व्यंग्य संग्रह ‘कवि कविता अर घरआळी’ (1987) तथा ‘इज्जत
में इज्जाफो’ (2000) प्रकाशित हैं। जिनमें 32 व्यंग्य हैं। हिंदी में चार
व्यंग्य संग्रह- ‘दुर्घटना के इर्द-गिर्द’ (1997), ‘रफूगीरी का मौसम’
(2008), ‘चेखव की बंदूक’ (2016) और ‘आप तो बस आप ही हैं !’ (2017) प्रकाशित
हैं। जिनमें 156 व्यंग्य हैं।
बुलाकी शर्मा कालम राइटिंग के लिए भी
जाने जाते हैं। पहले जब धारदार व्यंग्य लिखते थे बहुत डरते थे। सोचते थे
कहीं कोई लड़ाई नहीं कर बैठे इसलिए वे छद्म नाम से लिखा करते थे। अब तो यह
रहस्य खुल गया कि दैनिक भास्कर बीकानेर में अफलातून नाम से लंबे समय तक
‘उलटबांसी’ लिखने वाले कोई दूसरे नहीं अफलातून शर्माजी हैं। लोगों को उन पर
पहले भी शक था। बीकानेर के ‘विनायक’ में ‘तिर्यक की तीसरी आंख’ में भी
डरपोक बुकाकी शर्मा लंबे समय तक लिखते रहे। बाद में जब सरकारी सेवा से
शर्माजी ने ऐच्छिक सेवानिवृति ली, तब से ‘विनायक’ में तिर्यक का रहस्य भी
खोल दिया। रहस्य यह भी है कि सरकारी सेवा से सामन्य ढंग से मुक्त होने पर
लोगों को पता चल जाता है कि उम्र साठ हो चुकी है। बस साठ को छूने से दो-चार
महीने आपने ऐच्छिक सेवानिवृति का नाटक दिखाया और घर बैठ गए। सरकार के घर
बिठाने और खुद के घर में खुद बैठने में तनिक अंतर है। जवान शर्माजी को जो
जानते हैं वे यह जान ले। भ्रम में मत रहना काल बाल जो दिखते हैं, सब डाई का
कमाल है। लेखा-सेवा वाले सफेद को काले और काले को सफेद करने का मर्म बखूब
जानते हैं। इतने वर्षों तक व्यंग्य लिखने वाले शर्माजी अब बहादुर बन चुके
हैं। वे अपने नाम से लिखने लगे हैं। दैनिक युगपक्ष में ‘शब्द बाण’ कालम
उनके नाम से प्रत्येक रविवार पढ़ा जा सकता है।
पहले बुलाकी शर्मा बड़े
आकार के व्यंग्य लिखा करते थे आजकल व्यंग्य का आकार कालम के चक्कर में छोटा
करते गए हैं। कहना चाहिए कि तलवार और गुप्ती का काम वे अब कटार और चाकू से
निकालने का फार्मूला जान गए हैं। वैसे भी धारदार हथियार रखना कानून अपराध
है। गुप्त बात यह है कि जब यह रहस्य उजागर हुआ कि ‘चेखव की बंदूक’ बुलाकी
शर्मा के पास है। तब उन्होंने एक व्यंग्य लिखा ‘चेखव की बंदूक’ और कालांतर
में इसी नाम से व्यंग्य संग्रह प्रकाशित करवा कर मित्रों को बांटने लगे
जिससे कि असलियत इस मजाक में छिप जाए। हुआ यह कि कुछ मित्रों ने मेरी अक्कल
निकाल ली और बोले- तुम शर्माजी को भाई साहब कहते हो और घर आते-जाते हो,
पता करो कि चेखव की असली बूंदक उन्होंने कहा छिपा कर रखी है।
मैंने एक
बार उनके घर मौका मिलने पर खोजा तो बंदूक तो नहीं मिली पर बारूद का खजाना
मिला। बारूद इस अर्थ में कि वे ना जाने किस वर्ष से लगातार डायरी लिखते है
और असली डायरी लिखते हैं जिसमें जिस किसी चेहर पर कोई मुखौटा अगर उन्होंने
देखा है तो उसे भी दर्ज कर दिया है। बुलाकी शर्मा वास्तव में बजरंग बली है
जो आज तक अच्छा-बुरा सब कुछ सहन कर सभी से अच्छे संबंध बनाएं हुए हैं किंतु
डायरियां जो चुपके से सरसरी निगाह में देखी गई कुछ अंश पढ़े गए से ज्ञात
होता है कि उनके आस-पास की असलियत क्या रही हैं। मित्रों के अनेक राज दफन
किए हैं। किसी दिन सच्ची बही सामने आ गई तो यकीन जानिए कि वो बारूद का असला
होगा कि बहुत-सी चलती दुकाने बंद हो जाएंगी। पेन रुक रहा है और वैसे भी
ऐसी नितांत निजी बातें कम से कम मुझे सार्वजनिक नहीं करनी चाहिए बेशक भले
मेरी अक्कल निकाल ली गई हो फिर भी इतना होश तो मुझे है।
क्या यह कमाल
नहीं है कि 188 व्यंग्य पुस्तकार होने के बाद भी अब भी उनके मन में यह बात
बार बार आती है कि व्यंग्य संग्रह आना चाहिए। एक हिंदी में एक राजस्थानी
में। उनके व्यंग्य खजाने में अब भी दस व्यंग्य प्रकाशित हो जाएं जितना
मसाला है। संभव है कुछ ऐसा हो भी। होना भी चाहिए। उन्हें व्यंग्य विधा के
लिए अनेक सम्मान मिले हैं। बीसवीं शताब्दी में यानी 1999 में राजस्थान
साहित्य अकादमी उदयपुर ने पुरस्कृत किया। नवीन शोध से पता चला है कि बुलाकी
शर्मा बिना चोटी रखे देश में चोटी के व्यंग्यकार बनना चाहते हैं। पुरानी
बात है कि एक चोटी वाले ज्योषित ने उन्हें कहा कि बुलाकी तुमको उदयपुर
अकादमी से संग्रह ‘दुर्घटना के इर्द-गिर्द’ के लिए पुरस्कार इसलिए मिला कि
उस में 21 व्यंग्य थे। अब इस आंकड़े को पकड़ लो और अगर पुरस्कार पाना है तो
अगले व्यंग्य संग्रह में 21 व्यंग्य ही आने चाहिए। हमारी भाभीजी वहीं बैठी
वार्ता सुन रही थी जो तपाक से बोली- महाराज इन दिनों ये छोटे साइज के
व्यंग्य लिखते हैं तो किताब छोटी होगी इसलिए कुछ दूसरा उपाय बताओ?
बुलाकी शर्मा पर पूरा विश्वास किया जा सकता है। वे पूरे विश्वासी है। कभी
कभी अंधविश्वासी भी बन जाते हैं खासकर पुरस्कार लेने का मसला हो तो।
ज्योषित ने बोला था कि 21 नहीं तो 42 व्यंग्य ले लो। देखिए उनके अगले
व्यंग्य संग्रह ‘रफूगीरी का मौसम में’ यही हुआ है। जब मामला नहीं बैठा तो
‘चेखव की बंदूक’ में 51 व्यंग्य रखे गए और इसकी भनक जैसे ही ज्योषित महाराज
को हुई वे उनके घर पहुंच गए और इसी वर्ष प्रकाशित व्यंग्य संग्रह ‘आप तो
आप ही हैं !’ में 42 व्यंग्य ही रखे गए हैं। मैं ज्योषित नहीं जानता पर राय
देने का अवसर नहीं छोड़ना चाहता। कुछ अटपटी बात कहने से चर्चा होती है।
सीधी-साधी बात पर कौन दिल फेंकता है। मेरा दावा है कि अगर इक्कीस-इक्कीस
व्यंग्यों के इक्कीस संग्रह बुलाकी शर्मा के निकाले जाएं तो उन्हें चेखव की
बंदूक जो असली वाली उन्होंने छिपा कर रखी है बेचनी पड़ेगी। एक पंथ दो काज
का इससे बढ़िया उदाहरण नहीं हो सकता। यह एक झलक है हमारे स्वदेशी शोध की।
वैसे हमारे देश में शोध की हालत यह है कि बुलाकी शर्मा जैसे बड़े
व्यंग्यकार पर कोई बड़ा शोध नहीं हुआ है। हां, बुलाकी शर्मा के लेखन पर
यूनीवर्सिटी के कुछ बालक और बालिकाओं ने लघुशोध लिखें है, व्यक्तिगत और
सामूहिक। सारी स्थितियों को देखते हुए और व्यंग्यकार शर्माजी की साठी-पाठी
उम्र का ध्यान रखते हुए, एक नवजात व्यंग्यकार नीरज दइया ने उनके समग्र लेखन
पर आलोचनात्मक पुस्तक का मानस बनाया है। व्यंग्य-यात्रा के संपादकजी
संस्मरण में व्यंग्य की फुल मात्रा डालने का आदेश दे रहे हैं तो उनकी
प्रेरणा से ही इस आलेख को मेरे मानस ग्रंथ का हिस्सा मान लिया जाए। मिलावट
का दौर है। शुद्धता जैसी चीज बाजार में अब बची नहीं। बचा हुआ है अथवा अगर
बचाना हो तो प्रेम को बचाएं। जहां प्रेम का आकाल हो तो प्रेम जनमेजय या
बुलाकी शर्मा का स्मरण किया जाए। उनकी आत्मीयता से आपके हदय में प्रेम
स्रोत से प्रेम छलकने लगेगा। देखिए- सुना आपने सीटी बजी। पेन में सारे
कानून-कायदे सेट कर दिए थे इसलिए पेन रुक रहा है। लो एकदम रुक गया।
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