04 नवंबर, 2026

बाल कहानी- मेरा स्क्रीन टाइम/ डॉ. नीरज दइया


आरव को गेम खेलना बहुत पसंद था।

स्कूल से घर आते ही वह बैग सोफे पर रखता और सीधे टैबलेट उठा लेता।

“बस दस मिनट,” वह रोज खुद से कहता।

लेकिन उसके दस मिनट कभी दस मिनट नहीं रहते।

गेम शुरू होते ही उसे दुनिया की बाकी चीजें याद नहीं रहतीं।

“आरव, खाना लगा दिया है।”

माँ की आवाज आती।

“बस आ रहा हूँ।”

“कितनी देर?”

“बस पाँच मिनट।”

पाँच मिनट बीत जाते।

फिर माँ की आवाज आती।

“आरव!”

“आ रहा हूँ!”

एक दिन वह खेल में आखिरी स्तर तक पहुँच गया था।

तभी पापा कमरे में आए।

“चलो, पार्क चलते हैं।”

आरव ने स्क्रीन से नजर हटाए बिना कहा, “आज नहीं।”

“क्यों?”

“जरूरी गेम है।”

पापा कुछ नहीं बोले।

वे चले गए।

आरव खेलता रहा।

जब उसने आखिर में गेम बंद किया तो शाम हो चुकी थी।

उसने खिड़की से बाहर देखा।

पार्क की लाइटें जल चुकी थीं।

उसे याद आया कि कब से वह बाहर नहीं गया था।

अगले दिन स्कूल में गणित की कक्षा थी।

मैडम ने कहा, “कल का गृहकार्य निकालो।”

आरव ने कॉपी खोली।

पन्ने खाली थे।

उसे याद आया कि उसने गृहकार्य करने के बजाय रात को गेम खेला था।

मैडम उसके पास आईं।

उन्होंने कॉपी देखी।

“काम क्यों नहीं किया?”

आरव चुप रहा।

“भूल गए?”

आरव ने सिर हिला दिया।

मैडम ने कुछ नहीं कहा।

उन्होंने बस इतना पूछा, “कल तुम्हारे पास समय नहीं था या समय कहीं और चला गया?”

आरव को सवाल थोड़ा अजीब लगा।

वह पूरे दिन उसी बारे में सोचता रहा।

घर लौटकर उसने अपना टैबलेट उठाया।

फिर अचानक रुक गया।

उसने घड़ी देखी।

चार बजे।

उसने एक कागज लिया।

ऊपर लिखा—मेरे दिन के 24 घंटे।

फिर उसने कल का हिसाब लिखना शुरू किया।

स्कूल—छह घंटे।

सोना—आठ घंटे।

खाना और तैयार होना—तीन घंटे।

होमवर्क—एक घंटा।

बाकी समय—छह घंटे।

फिर उसने गेम का समय याद किया।

करीब चार घंटे।

आरव ने कागज को देखा।

“चार घंटे?”

उसे खुद विश्वास नहीं हुआ।

उसने नीचे लिखा—गेम—4 घंटे।

फिर उसने सोचा, “ये चार घंटे गए कहाँ?”

उसने अगले दिन एक नया प्रयोग करने का फैसला किया।

उसने अपने लिए टाइम-टेबल बनाया।

सुबह स्कूल।

दोपहर खाना और आराम।

शाम होमवर्क।

फिर खेलना।

और रात में सिर्फ तीस मिनट गेम।

उसने कागज दीवार पर चिपका दिया।

माँ ने देखा।

“यह क्या है?”

आरव ने कहा, “मेरा टाइम-टेबल।”

माँ मुस्कराईं।

“किसने बनाया?”

“मैंने।”

“और गेम?”

“तीस मिनट।”

माँ ने कुछ नहीं कहा।

अगले दिन आरव ने पहली बार टाइमर लगाया।

गेम शुरू किया।

तीस मिनट बाद अलार्म बजा।

उसने तुरंत गेम बंद नहीं किया।

“एक मिनट और।”

फिर दो मिनट।

फिर पाँच।

आखिर उसने खुद टैबलेट बंद कर दिया।

वह उठने ही वाला था कि गेम में एक नया स्तर खुल गया।

आरव वापस बैठ गया।

फिर उसने दीवार पर अपना टाइम-टेबल देखा।

कुछ देर स्क्रीन को देखता रहा।

फिर बोला, “कल।”

और उठ गया।

यह आसान नहीं था।

अगले दिन वह फिर समय से ज्यादा खेला।

तीसरे दिन भी।

चौथे दिन उसने गेम खेलने से पहले ही टाइमर लगा दिया।

धीरे-धीरे उसे फर्क दिखाई देने लगा।

होमवर्क जल्दी पूरा होने लगा।

शाम को वह पार्क जाने लगा।

दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलने लगा।

एक दिन कबीर ने पूछा, “तू गेम कम कैसे कर रहा है?”

आरव ने कहा, “कम नहीं कर रहा।”

“फिर?”

“मैं तय कर रहा हूँ कि कब खेलना है।”

कबीर ने पूछा, “और अगर मन करे कि बस खेलते रहो?”

आरव हँसा।

“तो घड़ी देखता हूँ।”

कुछ दिनों बाद स्कूल में मैडम ने बच्चों से पूछा, “आप लोग समय का इस्तेमाल कैसे करते हैं?”

कई बच्चों ने अलग-अलग बातें बताईं।

किसी ने पढ़ाई की बात की।

किसी ने खेल की।

किसी ने टीवी की।

आरव ने अपना टाइम-टेबल दिखाया।

मैडम ने पूछा, “अब गेम कितना खेलते हो?”

“आधे घंटे।”

“और पहले?”

आरव ने मुस्कराकर कहा, “पता नहीं।”

पूरी कक्षा हँस पड़ी।

मैडम ने पूछा, “अब क्या पता है?”

आरव ने घड़ी की तरफ देखा।

“अब मुझे पता रहता है कि मेरा समय कहाँ जा रहा है।”

शाम को घर पहुँचकर उसने टैबलेट खोला।

गेम का नया अपडेट आया था।

वह कुछ देर उसे देखता रहा।

फिर उसने टाइमर लगाया।

खेलना शुरू किया।

तीस मिनट बाद अलार्म बजा।

उसने गेम बंद किया।

खिड़की के बाहर देखा।

पार्क में बच्चे खेल रहे थे।

आरव ने जूते पहने और बाहर निकल गया।

उस दिन खेल में वह कोई नया स्तर नहीं जीत पाया।

लेकिन पार्क में उसने कबीर के साथ लगातार तीन मैच जीते।

घर लौटते समय कबीर ने पूछा, “कल फिर गेम?”

आरव ने कहा, “हाँ।”

“कितनी देर?”

आरव ने मुस्कराकर कहा, “जितनी मेरे टाइम-टेबल में है।”

फिर उसने घड़ी देखी।

“बाकी समय मेरा है।”

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'सोच विचार' पत्रिका नवंबर, 2026 में प्रकाशित

बाल कहानी- कूड़ेदान का रोबोट/ नीरज दइया

सोमवार की सुबह स्कूल का मैदान कुछ ज्यादा ही गंदा दिखाई दे रहा था।

प्रार्थना सभा के बाद बच्चे अपनी-अपनी कक्षाओं में जाने लगे। तभी आरव की नजर मैदान के कोने पर पड़ी।

एक केले का छिलका कूड़ेदान के बाहर पड़ा था।

पास ही पानी की खाली बोतल थी। उसके बगल में चिप्स का पैकेट।

आरव ने नाक सिकोड़ ली।

“कूड़ेदान सामने है, फिर भी कचरा बाहर!”

मीरा ने कहा, “लोग कूड़ेदान तक पहुँचते-पहुँचते थक जाते होंगे।”

दोनों हँस पड़े।

तभी विज्ञान की शिक्षिका सीमा मैडम वहाँ से गुजरीं।

उन्होंने कचरा देखा और बोलीं, “मजाक ठीक है। लेकिन इसे बदलना कौन चाहता है?”

आरव ने हाथ उठा दिया।

मीरा ने भी।

मैडम ने कहा, “तो इस बार विज्ञान प्रदर्शनी के लिए कोई ऐसी चीज बनाओ, जो इस समस्या को थोड़ा आसान कर सके।”

अगले दिन दोनों ने विज्ञान कक्ष में रखी पुरानी चीजों को देखना शुरू किया।

एक टूटा खिलौना रोबोट।

पुरानी कंप्यूटर कीबोर्ड।

खराब पंखे का मोटर।

कुछ तार।

एक पुराना डिब्बा।

और कबाड़ में पड़ा एक छोटा पहिया।

कबीर भी आ गया।

उसने टूटा रोबोट उठाया।

“इससे क्या बनेगा?”

आरव ने कहा, “रोबोट।”

“यह तो पहले से रोबोट है।”

“लेकिन यह चलता नहीं।”

“तो फिर?”

आरव ने मुस्कराकर कहा, “इसे चलाएँगे।”

तीनों काम में लग गए।

पहले उन्होंने डिब्बे को रोबोट का शरीर बनाया।

नीचे चार छोटे पहिए लगाए।

सामने दो छोटी-सी बाँहें लगाईं।

लेकिन सबसे मुश्किल काम था कचरा पहचानना।

मीरा ने सुझाव दिया, “अगर कचरा लोहे का है तो?”

कबीर बोला, “चुंबक!”

उन्होंने एक पुराना चुंबक लगाया।

लोहे की चीजें अलग होने लगीं।

“वाह!” आरव चिल्लाया।

लेकिन केले का छिलका चुंबक से नहीं उठा।

तीनों कुछ देर चुप रहे।

फिर मीरा बोली, “यह गीला कचरा है।”

उन्होंने रोबोट के अंदर दो अलग डिब्बे बनाए। एक गीले कचरे के लिए और दूसरा सूखे कचरे के लिए।

प्लास्टिक की बोतल डालकर देखा।

रोबोट रुक गया।

“इसे क्या समझ नहीं आ रहा?” कबीर ने पूछा।

आरव ने सिर खुजलाया।

मैडम ने कहा, “हर बार मशीन को सही जवाब तुरंत नहीं मिलेगा। कोशिश करते रहो।”

उन्होंने सेंसर लगाए।

कई बार रोबोट ने गलती की।

केले का छिलका सूखे कचरे में चला गया।

कागज गीले कचरे में पहुँच गया।

एक दिन तो रोबोट ने कूड़ेदान छोड़कर सीधा खिड़की की तरफ दौड़ लगा दी।

पूरी टीम उसके पीछे भागी।

“पकड़ो!”

रोबोट दीवार से टकराकर रुक गया।

सब हँस पड़े।

आरव ने कहा, “यह तो हमसे भी ज्यादा शरारती है।”

धीरे-धीरे मशीन सुधरने लगी।

एक दिन उन्होंने उसे मैदान में आजमाया।

कबीर ने जानबूझकर तीन चीजें जमीन पर रखीं—कागज, प्लास्टिक की बोतल और केले का छिलका।

रोबोट धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

पहले उसने बोतल उठाई।

उसे एक तरफ रखा।

फिर कागज।

वह दूसरी तरफ चला गया।

अंत में केले के छिलके के पास पहुँचा।

कुछ सेकंड रुका।

फिर उसे तीसरे डिब्बे में डाल दिया।

तीनों खुशी से उछल पड़े।

“हो गया!”

अगले दिन विज्ञान प्रदर्शनी थी।

बहुत-से बच्चों ने सुंदर मॉडल बनाए थे।

किसी ने ज्वालामुखी बनाया था। किसी ने सौरमंडल। किसी ने वर्षा जल संग्रह का मॉडल।

आरव और उसके दोस्तों के सामने एक पुराना-सा डिब्बा रखा था।

ऊपर लिखा था- “कूड़ेदान का रोबोट”

एक बच्चा हँसकर बोला, “यह रोबोट है?”

आरव ने कहा, “अभी देखो।”

उसने कागज, बोतल और केले का छिलका सामने रखा।

रोबोट चल पड़ा।

सब बच्चे उसके आसपास जमा हो गए।

रोबोट ने तीनों चीजें अलग-अलग कर दीं।

तालियाँ बज उठीं।

प्रधानाचार्य जी भी वहाँ आ गए।

उन्होंने पूछा, “इसे बनाने में कितना खर्च आया?”

आरव ने कहा, “बहुत कम।”

“कैसे?”

कबीर बोला, “ज्यादातर सामान कबाड़ का है।”

प्रधानाचार्य जी मुस्कराए।

“तो इस रोबोट ने केवल कचरा अलग करना नहीं सीखा।”

मीरा ने पूछा, “और क्या सीखा?”

प्रधानाचार्य जी ने सामने पड़े पुराने सामान की ओर देखते हुए कहा, “शायद यह कि बेकार समझी जाने वाली चीजों में भी नया काम छिपा हो सकता है।”

आरव ने रोबोट की तरफ देखा।

उसे अपना पहला दिन याद आया, जब उसने मैदान में केले का छिलका देखकर केवल शिकायत की थी।

आज उसी समस्या के सामने उसका बनाया रोबोट खड़ा था।

प्रदर्शनी खत्म होने के बाद बच्चों ने रोबोट को विज्ञान कक्ष में रख दिया।

अगली सुबह मैदान में फिर कचरा पड़ा था।

आरव उसे उठाने के लिए आगे बढ़ा।

तभी कबीर ने कहा, “रोबोट को बुलाएँ?”

आरव ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

उसने कागज उठाया।

“रोबोट अपना काम करेगा।”

फिर उसने बोतल उठाई।

“और हम अपना।”

तीनों ने मिलकर मैदान साफ करना शुरू कर दिया।

कोने में रखा उनका रोबोट चुपचाप उन्हें देख रहा था।

उसकी छोटी-सी लाल बत्ती जल रही थी।

जैसे वह मुस्करा रहा हो।

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30 अक्टूबर, 2026

राजस्थानी व्यंग्य- तेरूंडे में किताब

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मूल : बुलाकी शर्मा

अनुवाद : नीरज दइया

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अपने हाथ में एक पुरानी कॉपी पकड़े मेरी पत्नी काफी देर से मानो कोई हिसाब-किताब करने में लगी हुई थी।

मैंने पूछा, "आज किस काम में उलझी हुई हो सुबह से ही?"

कॉपी के पन्ने पलटते हुए उसने उत्तर दिया, "मकर संक्रांति आ गई है ना। तेरूंडे (संक्रांति पर दान की जाने वाली 14 वस्तुएं) की चीजें बांटने के लिए सोच रही हूं कि इस बार क्या बांटूं? काम आने वाली बहुत सी चीजें तो मैं पहले ही बांट चुकी हूं।"

"पर इस कॉपी में क्या देख रही हो भाग्यवान?"

वह मुस्कुराकर बोली, "इसमें अब तक तेरूंडे में बांटी गई चीजें लिखी हुई हैं। जो पहले दे दी हैं, उन्हें छोड़कर इस बार कोई दूसरी चीज देना चाहती हूं ताकि परलोक में कोई परेशानी न हो।"

मैंने उस कॉपी पर नजर डाली। बहुत सी चीजें लिखी हुई थीं- खाने-पीने से लेकर ओढ़ने-बिछाने तक की।

मैंने हंसते हुए कहा, "वहां परलोक में तुम्हें कोई दिक्कत नहीं आएगी। जरूरत की सारी चीजें तुमने वहां पहुंचा दी हैं। पर तुम्हारी ये चीजें अगर वहां खाते में दर्ज नहीं हुईं तो?"

वह मुस्कुराई, "हम औरतें तुम आदमियों जितनी मूर्ख नहीं हैं, समझे! तेरूंडे में हम चौदह वस्तुओं में से तेरह वस्तुओं के अलावा एक वस्तु चित्रगुप्त जी के लिए अलग से दान देते हैं। हमें पता है कि वहां के बही-खाते में दर्ज कराने का काम उन्हीं के हाथ में है। उन्हें खुश रखना हमें आता है।"

चेहरे पर चिंता झलकाते हुए मैं बोला, "लगता है परलोक में हम पुरुषों को कुछ मिलने वाला नहीं है। दान-पुण्य तुम औरतें करती हो। संक्रांति पर जो चीजें तुम बांटती हो, वे तो चित्रगुप्त जी तुम्हारे खाते में लिखेंगे। वहां जाते ही वे तुम्हारे लिए तैयार मिलेंगी। पर वहां मेरा क्या होगा भगवान?"

उसने पूरे भरोसे के साथ जवाब दिया, "मैं आपकी धर्मपत्नी हूं। मेरे किए हुए धर्म-पुण्य में से आधा आपको मिल जाएगा, चिंता मत करो।" फिर वह चिंतित होकर बोली, "आप बताओ न, इस बार संक्रांति पर कौन सी चीज बांटूं?"

मैंने आनंद लेते हुए कहा, "खाने-पीने और ओढ़ने-बिछाने की चीजें तो तुमने बहुत दे दीं। इस बार किताब बांटने का काम करो। मेरी नई किताब आई हुई है ना, वही तेरूंडे में बांट दो।"

वह हंसी, "बांट दी आपकी किताब! यहां तो आपकी किताब आपके दोस्त भी नहीं पढ़ते, वहां परलोक में कौन पढ़ने बैठेगा? चित्रगुप्त जी अपनी बही में इसे दर्ज भी नहीं करेंगे।"

अचानक उसके चेहरे पर चमक आ गई। बोली, "याद आ गया!"

"क्या याद आया?"

"इस बार मास्क और सैनिटाइजर बांटूंगी। दुष्ट कोरोना वहां भी पहुंच गया तो जरूरत पड़नी ही है। वैक्सीन का क्या पता वहां पहुंचे या न पहुंचे!"

निश्चिंत होकर उसने अपनी कॉपी में ये चीजें लिखीं और मुझे आदेश दिया, "अब बातों में समय खराब न करके बाजार जाइए और चौदह-चौदह नग मास्क और सैनिटाइजर की बोतलें लेकर आइए।"

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08 अक्टूबर, 2026

साहित्य के संबंधशास्त्री/ डॉ. नीरज दइया

साहित्य में कवि-लेखक, व्यंग्यकार और आलोचक होते हैं। कुछ समीक्षक होते हैं, कुछ शोधार्थी होते हैं और कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें देखकर लगता है कि साहित्य ने अपने लिए एक अदृश्य खुफिया विभाग भी खोल रखा है। ये साहित्य पढ़ते कम हैं, साहित्यकारों को पढ़ते अधिक हैं। किताब उनके लिए सिर्फ बहाना है, असली विषय होता है- कौन किसके कितना करीब है! कौनसा समीकरण कहां बन बिगड़ रहा है। यह दूरगामी और अंतरयामी सोच के हमारे सह-यात्री परम मित्र का मुखौटा पहने हुए होते हैं।

मेरे एक परिचित हैं, जिनको दोस्त भी कहा जा सकता है। वे कौनसा अर्थ कहां खोजकर कहां परोस देंगे, कुछ कहा नहीं जा सकता है। साहित्यिक कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति अपने आप में एक अलग घटना होती है। वे सभी कार्यक्रमों में हाजिर रहते हैं, रहना चाहते है। यह उनके लिए बहुत जरूरी है। कारण जिस कार्यक्रम में बाकी लोग पुस्तक, लेखक और वक्ताओं को सुनने जाते हैं, वे वहां संबंधों की नब्ज टटोलने जाते हैं। उनके लिए किसी पुस्तक का लोकार्पण तभी पूरा होता है, जब उसके साथ जुड़े लोगों के संबंधों का भी लोकार्पण हो जाए। जहां वे मौजूद नहीं हो पाते अगले दिन खबर को खुरच-खुरच के उदरस्थ करते हैं। सभी सूत्रों से मोबाइल पर बात करते हुए सूत्र बटोरते हैं।

हाल में एक पुस्तक का कार्यक्रम हुआ। मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि, लेखक, पत्रवाचक और साहित्यप्रेमी उपस्थित थे। वे भी वहां होने ही थे और थे भी। कार्यक्रम समाप्त हुआ। लोगों ने कहा- बहुत अच्छा आयोजन रहा।

उन्होंने कहा- “अच्छा... लेकिन असली बात अभी पता करनी है।”

और फिर शुरू हुआ उनका साहित्यिक अनुसंधान।

सबसे पहले लेखक पकड़े गए।

“कार्यक्रम कैसा रहा?”

लेखक ने सहजता से कहा- “बहुत अच्छा।”

“मुख्य अतिथि से आपके पुराने संबंध हैं?”

“जी, परिचय है।”

“सिर्फ परिचय?”

लेखक ने उनकी ओर देखा। सवाल में ऐसी गंभीरता थी जैसे परिचय की भी श्रेणियां होती हों- सामान्य परिचय, साहित्यिक परिचय, आत्मीय परिचय, पारिवारिक परिचय और वह परिचय जिसके बारे में सार्वजनिक रूप से कुछ न कहा जाए।

लेखक ने कहा- “जी, पुराने परिचित हैं।”

अब विशेषज्ञ की आँखों में चमक आई।

“कितने पुराने?”

यह प्रश्न सुनकर लेखक को लगा कि शायद जन्मपत्री माँगी जा रही है।

इसके बाद मुख्य अतिथि की बारी थी।

“आपको पुस्तक कैसी लगी?”

मुख्य अतिथि ने पुस्तक की प्रशंसा की।

“लेखक से पहले से परिचय है?”

“हाँ।”

“अच्छे संबंध हैं?”

“हाँ, ठीक हैं।”

“कितने अच्छे?”

मुख्य अतिथि शायद पहली बार समझे कि साहित्यिक कार्यक्रम में पुस्तक पर बोलना आसान है, लेकिन इस व्यक्ति के सामने ‘अच्छे संबंध’ की परिभाषा देना कठिन।

फिर विशिष्ट अतिथि।

फिर पत्रवाचक।

फिर आयोजक।

फिर मंच पर बैठे एक सज्जन।

फिर वह व्यक्ति जिसने लेखक को कार्यक्रम के बाद गले लगाया था।

गले मिलने का भी संज्ञान लिया गया।

“ये आपसे कब से परिचित हैं?”

“काफी समय से।”

“अच्छा! और ये मुख्य अतिथि को भी जानते हैं?”

अब सामने वाला चौंका- “शायद।”

विशेषज्ञ ने 'शायद' को वहीं नहीं छोड़ा। 'शायद' उनके लिए कोई उत्तर नहीं, एक नया शोध-विषय है।

उन्होंने किसी और से पूछा।

फिर किसी तीसरे से।

फिर चौथे से।

धीरे-धीरे उन्हें कार्यक्रम की पूरी रिपोर्ट मिल गई- सिवाय उस पुस्तक की, जिसका कार्यक्रम था।

लेकिन उन्हें इसकी कोई चिंता नहीं थी। पुस्तक तो छप चुकी थी। असली सामग्री तो लोगों के बीच थी!

वे ऐसे व्यक्ति हैं जिनके लिए साहित्यिक कार्यक्रम में मंच पर क्या कहा गया, यह गौण है; मंच से उतरने के बाद कौन किससे कितनी देर मिला, यह प्रधान है।

कौन पहले आया?

किसके पास बैठा?

किसने किससे हाथ मिलाया?

किसे देखकर कौन मुस्कराया?

किसके कंधे पर किसने कितनी देर हाथ रखा?

किसके साथ चाय पी?

किसे फोन किया?

किसे फोन नहीं किया?

किसकी फोटो किसके साथ आई?

और सबसे महत्वपूर्ण- किसकी फोटो में कौन नहीं आया?

कौन किस पार्टी का है? कौन सत्ता पक्ष का आदमी है? कौन विपक्ष का? कौन फायदा दिला सकता है? कौन रूखा, अड़ियल और बेकार आदमी है? किसे बुलाना और बोलवाना था किसे नहीं? किसे मंच पर बिठना था किसे नहीं? उनके लिए सारा गणित का मामला है। 

इन प्रश्नों के बिना उनका कार्यक्रम अधूरा रहता है।

उनके पास साहित्य का अपना एक गणित है।

लेखक + मुख्य अतिथि = पुराना संबंध।

मुख्य अतिथि + विशिष्ट अतिथि = अलग समीकरण।

पत्रवाचक + आयोजक = संभावित निकटता।

फलां साहित्यकार + लेखक = कुछ तो है!

और यदि कोई व्यक्ति कार्यक्रम समाप्त होने के बाद लेखक के साथ पांच मिनट खड़ा रह गया, तो समझिए विशेषज्ञ की नोटबुक में एक नया अध्याय जुड़ गया।

उनका सूत्र बड़ा सरल है- “जहां दो साहित्यकार खड़े हों, वहां कोई न कोई समीकरण अवश्य होगा।”

और यदि तीन लोग साथ खड़े मिल जाएं तो फिर यह साधारण समीकरण नहीं रहता, 'साहित्यिक त्रिकोण' का युगपत समीकरण बन जाता है।

वे कभी-कभी इतने उत्साह से पूछताछ करते हैं कि सामने वाला सोचने लगता है- मैं साहित्यिक कार्यक्रम में आया हूँ या किसी आयोग के सामने बयान देने?

मजेदार बात यह है कि वे किसी से एक ही बात सीधे नहीं पूछते। पहले एक से पूछेंगे, फिर दूसरे से वही बात थोड़ी बदलकर पूछेंगे, फिर तीसरे से उसकी पुष्टि करेंगे। इस तरह वे साहित्य में वह बहुत बड़ा काम कर रहे हैं जो बड़े-बड़े शोधार्थी भी नहीं कर पाते- एक ही घटना के कई मौखिक प्रामाणिक संस्करण एकत्र करना।

उनकी स्मृति भी अद्भुत है।

पांच साल पहले किस कार्यक्रम में कौन किसके बगल में बैठा था, उन्हें याद रहता है। वैसे वे पूरा रिकार्ड भी मेंटेन रखते हैं, कुछ भी नहीं छोड़ते। सब का खाताबही हिसाब-किताब रखना कोई छोटी बात नहीं, इसलिए वे बड़े और महान हैं। सबके प्रिय ना सही किंतु संवाद समर्थ बने रहते हैं।

किसने किस पुस्तक के विमोचन में किसे बुलाया था, क्या खिलाया-पिलाया, सब याद रहता है। यहां तक कि कहां किस प्रकार रस-रंजन हुआ और उसके बाद का पूरा ऑफ दा रिकार्ड का भी वे रिकार्ड रखते हैं। हो सकता है कि यहीं या ऐसे ही कुछ कारण होंगे जिससे वे सब को संवादी बना सकने का सामर्थ्य रखते हैं।

खास बात यह भी कि उन्हें नए जमान की नई तकनीक और सोशल मीडिया से प्रेम है, किसने किसकी पोस्ट पर कितनी आत्मीय टिप्पणी की थी, क्या कब लिखा सब हिसाब उनके पास रहता है।

किसने किसकी पोस्ट पर केवल 'बधाई' लिखकर काम चला दिया था, वह भी याद रहता है। बधाई और हार्दिक बधाई अथवा बहुत-बहुत बधाई में कितना क्या अंतर होता है, वे विस्तार से उदाहरण के साथ बता सकते हैं।

किसी दिन यदि उनसे पूछा जाए कि फलां लेखक की नई किताब कैसी है, तो वे शायद कहेंगे- “किताब तो मैंने अभी नहीं पढ़ी, लेकिन लेखक के संबंधों में पिछले दो वर्षों में काफी परिवर्तन आया है।”

यही उनकी विशेषज्ञता है।

वे रचना के भीतर अर्थ खोजने के बजाय रचनाकारों के बीच अर्थ खोजते हैं।

उनके लिए आलोचना का नया सिद्धांत है- ‘किसने किसे बुलाया और किसने किसे नहीं बुलाया।’

पुरानी आलोचना पूछती थी- रचना में कथ्य क्या है?

नई आलोचना पूछती है- लेखक के साथ मंच पर कौन था?

पुरानी आलोचना भाषा, शिल्प और संवेदना देखती थी।

नई आलोचना फोटो में चेहरों की दूरी नापती है।

पुराने आलोचक कहते थे- “रचना को उसके संदर्भ में समझना चाहिए।”

हमारे विशेषज्ञ कहते हैं- “व्यक्ति को उसके संपर्कों में समझना चाहिए।”

उनकी दृष्टि में साहित्य का सबसे महत्त्वपूर्ण शब्द 'संबंध' है।

और यदि कभी उनसे पूछा जाए कि आप कार्यक्रम में क्या लेने आते हैं, तो वे शायद कहें- “मैं तो कार्यक्रम की रिपोर्ट के लिए कुछ जानकारी ले रहा था।”

बस, यही 'कुछ जानकारी' उनकी पूरी साहित्यिक साधना है।

कार्यक्रम समाप्त होने के बाद जहां दूसरे लोग कहते हैं- “बहुत सुंदर आयोजन था”, वहां उनका काम शुरू होता है- “हां, आयोजन तो ठीक था... लेकिन आपको पता है, मुख्य अतिथि और लेखक के संबंध पहले जैसे नहीं रहे।”

“अच्छा!”

“हां। और विशिष्ट अतिथि का तो मामला अलग है।”

“क्या हुआ?”

अब उनके चेहरे पर वह संतोष दिखाई देता है जो किसी पुरातत्ववेत्ता को हजार साल पुराना सिक्का मिलने पर होता होगा।

और सामने वाला, जो अभी तक कार्यक्रम को साहित्यिक आयोजन समझ रहा था, अचानक समझ जाता है कि वह जिस कार्यक्रम में गया था, उसका असली विषय पुस्तक नहीं था। विषय था- साहित्यिक समीकरण।

साहित्य में ऐसे विशेषज्ञों की उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता। आखिर कोई तो हो जो यह हिसाब रखे कि साहित्य में कौन किसके साथ है, किससे कितना है और कब तक साथ है या साथ रहेगा।

वे बहुत-बहुत किताबों को उलट-पलटकर देख चुके हैं, हर बार लेखक का नाम पढ़ेंगे और मुस्कराकर कहेंगे- “किताब बाद में पढ़ लेंगे। पहले यह देखिए- इसकी भूमिका किसने लिखी है? इस पर टिप्पणियां किस-किस की हैं।”

यही हैं हमारे साहित्यिक समीकरणों के विशेषज्ञ।

इनकी दृष्टि में साहित्य वह नहीं जो लिखा गया है।

साहित्य वह है- कौन किससे मिला, किसके साथ बैठा और किसके साथ उठकर चला गया। किसे कैसे पुरस्कार मिला और कौन-कौन किस पुरस्कार के लिए कितने पापड़ बेल चुका है कितने बेलने बाकी है। उनकी प्रतिभा का कोई मुकाबला नहीं कर सकता है।

बाकी सब तो किताब में छपा हुआ है- उसे कोई भी पढ़ सकता है, असली गणित तो यही है और उन्हें उसमें महारथ हासिल हो चुकी है।

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12 जुलाई, 2026

तुम कब मरोगे?

 राजस्थानी कहानी-

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मूल : सांवर दइया
हिंदी अनुवाद : नीरज दइया

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उफ़! यह तो बड़ी घटिया बात हो गई। मैं तुम्हारा नाम ही भूल गया। खैर, नाम में रखा भी क्या है? फिर तुम्हारा कोई एक नाम तो है नहीं। सच तो यह है कि तुम्हारा कोई नाम ही नहीं है। तुम तो बिना रंग, रूप और आकार के हो। आँखों से दिखाई भी नहीं देते, फिर भी चौबीसों घंटे हमारे बीच मौजूद रहते हो। तुम्हारा तो कहना ही क्या! तुम यहाँ होते हो और वहाँ की बात बताते हो। तुम कहाँ-कहाँ की बात नहीं बताते हो। तुम्हारा तो काम ही यही है- यहाँ की बातें वहाँ और वहाँ की बातें यहाँ पहुँचाना। बताओ, ऐसी कौन-सी जगह है जहाँ की बातें तुम नहीं जानते? यही तो तुम्हारा धंधा है।

लो, आज भी रोज़ की तरह घर से निकले हो। सब्ज़ी लेने जाना है। मन हो तो दूसरी चीज़ें भी खरीद सकते हो। वैसे अब तुम्हारी उम्र इतनी नहीं रही कि भारी सामान उठा सको। शरीर भी पहले जैसा मजबूत नहीं रहा। दो-चार हड्डियाँ तो ज़रा-सी बात पर चटकने लगती हैं। लेकिन यह बात तुम किसी को नहीं बताते। सबको यही कहते फिरते हो कि जवानी में खूब कसरत किया करते थे। हो सकता है कभी-कभार दस-बीस दंड-बैठक लगा ली हों, दो-चार बार गदा घुमा ली हो या गणेश चौथ पर अखाड़े में कुश्ती लड़ ली हो और हर बार पटखनी खाई हो। हुआ कुछ भी हो, पर कहते ऐसे हो जैसे बड़े पहलवान रहे हो। खैर, मुझे क्या, जो भी हुआ हो।

तुम्हारी कौन-सी बात पर भरोसा किया जाए? आज जो बात कहते हो, कल खुद ही भूल जाते हो। छोटी-छोटी बातें भूल जाते हो, लेकिन रोज़ एक नई कहानी इस तरह गढ़ लेते हो कि सामने वाले को वह एकदम सच लगती है!

तुम्हारी बातों का सबसे बड़ा विषय तुम्हारे पड़ोसी होते हैं। पड़ोसियों के मामलों में तुम्हारी रुचि ज़रूरत से कहीं ज़्यादा है। तुम तो बंद कमरों के भीतर की खबरें भी ले आते हो। पास और दूर की चीज़ें तुम्हें कितनी साफ़ दिखाई देती हैं, यह तो नहीं मालूम; लेकिन इतना तय है कि तुम्हारे चश्मे का नंबर रोज़ बढ़ता जा रहा है। जिन बंद कमरों की खबरें तुम लाते हो, उन्हें देखने के लिए तुम्हारा कद भी इतना ऊँचा नहीं कि दीवारों के पार झाँक सको। और अगर मान भी लें कि तुम्हारा कद इतना ऊँचा हो, तब भी लोग इतने नासमझ नहीं कि कमरे में पत्नी को बुलाने से पहले खिड़की-दरवाज़े खुले छोड़ दें। और अगर कभी भूल से खुले रह भी जाएँ, तो तुम्हारे चश्मे का नंबर बेकार हो जाएगा। पाँच हाथ दूर खड़े अपने बच्चे का चेहरा तो तुम पहचान नहीं पाते, फिर पचास हाथ दूर की मंज़िल के भीतर कैसे देख लेते हो?

अगर मैं डॉक्टर की बात करूँ तो तुम उसे अनुभवहीन कह कर ढोल पीटने लगते हो। आँखों के डॉक्टर के साथ-साथ दूसरे डॉक्टरों के बारे में भी गलत-सलत बोलने लगते हो। कहते हो- डॉक्टरों को मरीज़ों की ज़रा भी परवाह नहीं। वे अपने वार्ड की नई-नई नर्सों के पीछे घूमते रहते हैं। इधर मरीज़ बिस्तर पर आख़िरी साँसें गिन रहा होता है और उधर डॉक्टर किसी कोने में खड़े होकर मोटी-ताज़ी नर्स से गुनगुना रहे होते हैं- “तुम्हारे लिए मैं आसमान के तारे तोड़ लाऊँगा।”

लगता है तुम अस्पताल में कई दिन रहे हो, क्योंकि यह सब ऐसे विश्वास से बताते हो मानो रोज़ वहीं चक्कर लगाते रहे हो।

तुम्हारी बातों के अनुसार डॉक्टर अस्पताल की दवाइयाँ बेच देते हैं, गरीबों को मिलने वाले मुफ़्त नमूने भी पैसे लेकर बेचते हैं, अपनी निजी प्रैक्टिस के पीछे पागल रहते हैं और जिस घर में मरीज़ देखने जाते हैं, वहाँ की बहू-बेटियों पर भी नज़र रखते हैं।

एक बार डॉक्टर तुम्हारे घर भी आया था। तुम्हारी पत्नी बीमार थी। घर में अठारह बरस की जवान बेटी कम्मो भी थी। अब सच-सच बताओ- क्या डॉक्टर ने कम्मो के साथ कोई ऐसी-वैसी हरकत की थी? अगर की थी तो तुमने मोहल्ले वालों को क्यों नहीं बताया? अरे, यह तो सबको बता देना चाहिए था, ताकि लोग सावधान रहते!

तुम्हें याद है न, जब डॉक्टर खन्ना तुम्हारे पड़ोसी पंवार के घर गया था, तब तुमने कैसी कहानी बना दी थी कि डॉक्टर ने पंवार की बेटी को फँसा लिया है। पंवार की पत्नी की नब्ज़ देखने के बजाय उसकी बेटी से इश्क़ लड़ाता है। पर्ची लिखते समय मन ही मन गाता रहता है- “आओ गौरी, तुम्हें आसमान की सैर कराऊँ।” इसी प्रेम में डूबकर उसने गलत इंजेक्शन लिख दिया और बेचारा पंवार विधुर हो गया। जब लोग पूछते कि तुम्हें शर्म नहीं आती ऐसी बातें करते हुए, तब तुम अपने पीले दाँत निकालकर हँसते और कहते- “मैं झूठ नहीं बोलता, अपनी आँखों से देखा है, भगवान की कसम!”

भगवान की कसम सुनकर लोग तुम्हारी उम्र का लिहाज़ कर जाते हैं। वैसे तुम्हारी कोई उम्र भी कहाँ है? बच्चों के बीच बच्चे, जवानों के बीच जवान और बूढ़ों के बीच बूढ़े बन जाते हो। बूढ़ियों को तुम्हारी बातें बड़ी अच्छी लगती हैं। उन्हें भी यह चस्का लग चुका है। एक मरीज़ को दूसरे मरीज़ की बीमारी सुनने में मज़ा आता ही है।

तुम्हारा यह धंधा 'गिव एंड टेक' की फिलोसफी पर चलता है। तुम दूसरों के घरों की गुप्त बातें सुनाते हो, वे रस लेकर सुनते हैं। फिर जब वे अपनी बातें शुरू करते हैं तो तुम भी उतने ही चाव से सुनते हो। जिन लोगों की ज़िंदगी तुम खोद-खोदकर सुनाते हो, वे खुद अपने बारे में भी उतना नहीं जानते जितना तुम बता देते हो।

हाँ, एक बात और! तुम हमेशा उन्हीं लोगों की बुराई करते हो जो उस समय वहाँ मौजूद नहीं होते। लेकिन अगर संयोग से वही आदमी सामने आ जाए तो तुम्हारी ज़ुबान पर ताला लग जाता है।

याद है गिरधारी? चालीस साल की उम्र में उसने बीस साल की लड़की से शादी की थी। तुमने कैसी कहानी गढ़ दी थी कि भगतिया उसके घर आता-जाता था, उसी ने लड़की को बहका लिया, दोनों भाग गए और दूसरे ही दिन गिरधारी मर गया। फिर तुमने लंबी साँस लेकर कहा- “हे भगवान! स्त्री का चरित्र कौन जान सकता है!”

और जब कोई पूछे कि उन दोनों को जेल क्यों नहीं हुई, तो तुरंत कहते- “बस, मुझे थोड़ा-सा सबूत मिल जाए, मैं उसे बड़े घर की हवा खिला दूँ।”

लेकिन सच बताओ- अगर सचमुच कोई सबूत मिल भी जाए, तो क्या तुम पुलिस के पास जाओगे? पुलिस का नाम सुनते ही तो तुम्हारी हालत खराब हो जाती है।

याद करो युद्ध के दिनों की बात। तुमने अफ़वाह फैलाई थी कि शकूर के घर पाकिस्तानी जासूस रहता है, उसके घर में ट्रांसमीटर है और रात को छत पर बैटरी की रोशनी जलती है। यह कहानी सुनाकर लौट रहे थे कि सादे कपड़ों में एक आदमी तुम्हारे सामने आ गया। उसने जेब से पहचान-पत्र निकाला। बस, तुम्हारे तो प्राण सूख गए। पसीना छूट गया। हाथ जोड़कर गलती मान ली और कसम खाई कि आगे से ऐसी बातें नहीं करोगे। उसने गुस्से में लात मारकर कहा- “दफ़ा हो जा!” खुफ़िया पुलिस की वह लात खाने के बाद तुमने देशद्रोह वाली बातें करना छोड़ दिया।

अब तुम्हें देश की बड़ी-बड़ी समस्याओं पर बोलने में डर लगता है। कहीं फँस न जाओ। इसलिए अब तुम्हारी रुचि सिर्फ़ मसालेदार बातों में है- प्रेम-प्रसंग, औरत-मर्द के किस्से, घर-परिवार की गुप्त बातें। इन्हें सुनाने में भी मज़ा आता है और सुनने वालों को भी। दूसरों की निजी ज़िंदगी में झाँकने की बीमारी हम सबमें है, इसलिए तुम्हारे आसपास हमेशा भीड़ लगी रहती है।

आजकल तुम्हारी कृपा महावीर पर है। तुम कहते फिरते हो कि उसने अपने घर में एक पंजाबी औरत रख ली है। लेकिन लोगों का कहना है कि असली वजह यह है कि महावीर तुम्हारी बेटी कम्मो को देखकर गाना गाता है, सीटी बजाता है और तुम्हारे घर के चक्कर लगाता है। तुमने कम्मो को समझाया- “बेटी, दुनिया बड़ी खराब है।” लेकिन उसने तुम्हारी एक न सुनी।

फिर एक दिन वह फ़िल्म देखने गई और वापस नहीं लौटी। सारी रात तुम इंतज़ार करते रहे। देवी-देवताओं से मन्नतें माँगीं। सुबह उसके नाम की एक चिट्ठी मिली। उसमें महावीर का भी संदेश था।

पूरा पत्र पढ़ने से पहले ही तुम्हारी आँखों के आगे अँधेरा छा गया और तुम बेहोश होकर गिर पड़े। घरवालों ने डॉक्टर बुलाया। डॉक्टर ने कहा- दिल की धड़कन रुकने से मौत हुई।

अगर तुम ज़िंदा होते तो ज़रूर कहते- “मौत दिल की घड़कन रुकने से नहीं हुई, डॉक्टर की लापरवाही से हुई। मैं तो आख़िरी साँसें ले रहा था और डॉक्टर किसी कोने में नर्स के साथ हँसी-मज़ाक कर रहा था।”

लेकिन आज यह सब कहने के लिए तुम हो ही कहाँ?

नहीं, यह भी सच नहीं। तुम तो आज भी हो। एक तुम जाते हो तो तुम्हारी जगह कई और पैदा हो जाते हैं। मुझे तो लगता है कि तुम कभी मरते ही नहीं। बार-बार मरकर भी जी उठते हो। कीचक तो एक बार मरा था, लेकिन तुम…?

अब मैं क्या कहूँ? तुम ही बताओ- तुम कब मरोगे?

नाराज़ मत होना। बस इतना बता दो- तुम कब मरोगे?

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