14 अप्रैल, 2026

ना कहना हमने नहीं सीखा/ डॉ. नीरज दइया

इस संसार में जीना भी एक कला है, और इस कला का पहला नियम है—“ना” शब्द को शब्दकोश से बाहर निकाल देना। क्योंकि “ना” में जितनी ताकत होती है, उतना ही खतरा भी छिपा रहता है। कौन कब नाराज हो जाए, कौन कब किस रूप में सामने आ जाए- यह कोई नहीं जानता। इसलिए समझदार लोग “ना” कहना सीखते ही नहीं, और जो सीख लेते हैं, वे जीवन की दौड़ में अक्सर पिछड़ जाते हैं।

आज का जमाना “हां” का जमाना है। यहां “हां” कहना केवल सहमति नहीं, बल्कि एक रणनीति है- एक निवेश है भविष्य के लिए। आप किसी से कहिए, “भाई साहब, यह काम हो जाएगा?” सामने से उत्तर आएगा- “अरे क्यों नहीं! हो जाएगा, आप तो बस समझिए... हो ही गया।” इस “हो जाएगा” में इतनी मिठास होती है कि सुनने वाला अपने सारे दुख भूल जाता है। अब काम हुआ या नहीं, यह बाद की बात है।

मान लीजिए आपको अपने बच्चे का एडमिशन किसी अच्छे स्कूल में कराना है। आप किसी “जाने-माने” व्यक्ति के पास जाते हैं। वह मुस्कुराते हुए कहता है, “आप तो अपने आदमी हैं, एडमिशन क्या, प्रिंसिपल को फोन करके अभी बात कर देता हूं।” आप खुशी-खुशी घर लौटते हैं। एक हफ्ता बीतता है, फिर दो, फिर एक महीना। जब आप फिर पूछते हैं, तो जवाब मिलता है, “अरे, वो प्रिंसिपल छुट्टी पर था, अब आया है, हो जाएगा।” और यह “हो जाएगा” महीनों तक चलता रहता है। अंत में जब आप खुद जाकर एडमिशन करवा लेते हैं, तब वही सज्जन कहते हैं- “देखा, मैंने कहा था ना, हो जाएगा! करवा दिया है।”

अब आप सोच में पड़ जाते हैं कि काम हुआ किससे, आपकी कोशिश से या उनकी “हां” से?

इसी तरह ट्रांसफर का मामला ले लीजिए। सरकारी दफ्तरों में यह एक ऐसा खेल है जिसमें “ना” शब्द का कोई अस्तित्व नहीं होता। आप किसी नेता जी के पास जाते हैं, और निवेदन करते हैं- “सर, मेरा ट्रांसफर गृह जिले में करवा दीजिए।” नेता जी तुरंत कहेंगे, “हो जाएगा, आप तो अपने हैं।” फिर वह आपके सामने फोन उठाकर किसी अधिकारी को कॉल करने का अभिनय करेंगे- “हाँ भाई, देखना इनका काम हो जाए।” आप भावुक हो जाते हैं, लगता है जैसे आपका जीवन बदलने वाला है। फिर शुरू होता है इंतजार का असली खेल।

एक महीना, दो महीना, छह महीना- आप फोन करते हैं, पहले तो वे उठाएंगे नहीं। अगर उठा लिया तो जवाब मिलता है- “फाइल चल रही है, ऊपर से अप्रूवल आना है, थोड़ा समय लगेगा।” और अगर किसी दिन अचानक आपका ट्रांसफर हो जाता है, तो नेता जी का पहला वाक्य होगा- “देखा, मैंने कहा था ना, हो जाएगा!”

यह “हां” का जादू इतना प्रभावशाली है कि आदमी सच्चाई जानकर भी कुछ नहीं कह पाता।

बड़े लोगों की दुनिया में “हां” एक मुद्रा है। जितनी ज्यादा “हां”, उतनी ज्यादा कीमत और वोट, पक्षधरता। मंत्री जी से लेकर छोटे-मोटे कार्यकर्ता तक, सभी इस कला में निपुण होते हैं। कोई उनसे कहे- “सर, सड़क बनवा दीजिए” तो जवाब मिलेगा- “अवश्य, बन जाएगी।” कोई कहे- “बिजली की समस्या है” तो उत्तर होगा- “हल हो जाएगी।” और अगर कोई थोड़ा साहस करके पूछ ले- “कब?” तो तुरंत उत्तर मिलेगा- “बहुत जल्द।” आपको इंतजार में लगना होता है, नेता जी नहीं तो समय आपका काम एक दिन करता है और श्रेय मिलता है नेता जी को, यह जरूरी भी है क्योंकि समय तो अबोला होता है। “बहुत जल्द” एक ऐसा समय है जो कभी आता नहीं, लेकिन उम्मीद को जिंदा रखता है।

कुछ लोग तो इस “हां” को व्यवसाय बना लेते हैं। वे हर काम के लिए “हां” कहते हैं, और साथ में थोड़ा “प्रोसेसिंग फीस” भी ले लेते हैं। आप उनसे कहें- “मेरा काम जल्दी करवा दीजिए” तो वे कहेंगे- “बस थोड़ा खर्चा आएगा, बाकी काम मेरा।” आप उनकी मनमानी रकम दे देते हैं, और फिर वही पुरानी कहानी- “काम हो जाएगा।” यदि आप धैर्यवान हैं तो एक न एक दिन काम हो जाता है। अगर काम हो गया तो वह उनका श्रेय, और अगर नहीं हुआ तो “ऊपर से अटक गया”।

इस पूरे खेल में सबसे दिलचस्प बात यह है कि “ना” कहने वाला व्यक्ति समाज में असफल माना जाता है। अगर कोई साफ-साफ कह दे- “भाई, यह काम मेरे बस का नहीं है” तो लोग उसे नकारा समझ लेते हैं। लेकिन जो व्यक्ति हर बात पर “हां” कहता है, भले ही कुछ भी न करे, वह “जुगाड़ू” और “प्रभावशाली” कहलाता है।

हमारा समाज भी इस आदत को बढ़ावा देता है। हमें सच्चाई से ज्यादा उम्मीद पसंद है, भले ही वह झूठी क्यों न हो। हमें “ना” सुनने की आदत नहीं है, इसलिए हम “हां” सुनने वालों के पीछे भागते रहते हैं।

कभी-कभी तो यह स्थिति हास्यास्पद हो जाती है। एक व्यक्ति दस लोगों से एक ही काम के लिए “हां” सुनता है, और अंत में काम किसी ग्यारहवें व्यक्ति से हो जाता है। लेकिन श्रेय लेने के लिए सभी दस लोग तैयार रहते हैं- “मैंने कहा था ना, हो जाएगा!”

इस “हां” की संस्कृति ने हमें एक अजीब मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां काम से ज्यादा उसका श्रेय महत्त्वपूर्ण हो गया है। लोग काम करने से ज्यादा “काम करवा देने” का दावा करते हैं।

अंततः सवाल यह उठता है कि क्या सच में “ना” कहना इतना खतरनाक है? या हमने इसे बिना वजह ही डर का विषय बना लिया है? शायद सच्चाई यह है कि “ना” कहना साहस मांगता है, और “हां” कहना सुविधा देता है। “ना” कहने से रिश्ते टूट सकते हैं, लेकिन “हाँ” कहने से उम्मीदें बनती रहती हैं—यद्यपि अगर वे कभी पूरी न हों। और इसलिए, हमने “ना” कहना नहीं सीखा। क्योंकि इस दुनिया में जीने के लिए सच से ज्यादा जरूरी है- उम्मीद, और उम्मीद का दूसरा नाम है—“हां, हो जाएगा।” और अगर यह कहने वाला अपना परिचित खास मित्र है, तो वह आपसे पैसे ले भी नहीं सकता और बिना पैसों के कोई काम वह करने वाला भी नहीं है। इसलिए लगातार आपको हां-हां सुनना पड़ेगा, सुनने को मिलेगा लेकिन काम आपका नहीं होगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई है, इससे संबंधों की ऊर्जा, ऊष्मा समाप्त होने को है।






26 दिसंबर, 2025

पुरस्कार में चड्डी/ नीरज दइया

हमारे समय की सबसे बड़ी सांस्कृतिक उपलब्धि यह है कि अब पुरस्कार मान-सम्मान नहीं, वे सिर्फ एक दैनिक, मासिक, त्रैमासिक पहचान-पत्र बन चुके हैं। पहचान-पत्र भी ऐसे कि बिना नवीनीकरण के यहां लगने लगा है कि उसके बिना आदमी साहित्यिक नागरिक ही नहीं माना जाएगा। इन दिनों पुरस्कारों की ऐसी भरमार है कि जिधर देखो, उधर पुरस्कार ही पुरस्कार दिखाई देते हैं और पतंगों की तरह उनको लूटने वालो की दौड़, छीना छपट्टी। पुरस्कार देने वाले स्वयं वीआईपी हो गए हैं, और लेने वालों की स्थिति ऐसी है मानो पुरस्कार नहीं, कोई दुम मिल गई हो। जैसे कुत्ता अपने इलाके में पूंछ उठाकर चलता है, वैसे ही पुरस्कारधारी अपने-अपने सम्मान उठाए घूमते हैं। कोई अगर गलती से उसे न देखे, या कम तवज्जो दे दे, तो तुरंत नाराजगी प्रकट होती है। हरेक पुरस्कार के लिए बहुत बहुत बधाई लिखते लिखते मैं परेशान हो गया हूं। लबें समय से मेरा सारा समय मित्रों को बहुत बहुत बधाई देने में ही निकल गया है और मुझे लगने लगा है कि मैं ही सबको यह देता रहूंगा क्या? 

कुछ दिन पहले मैं एक साहित्यिक कार्यक्रम में मंच संचालन कर रहा था। एक साहित्यकार को आमंत्रित करना था। आमंत्रण से पहले उन्होंने एक पूरा पन्ना भेज दिया, जिसमें उनके अब तक प्राप्त सभी पुरस्कारों की सूची थी। निर्देश साफ था कि पहले सारे पुरस्कार बताए जाएं, फिर ससम्मान नाम लिया जाए। लोगों को पता चलना चाहिए कि मैं कितना बड़ा सम्मानित लेखक हूं। अब कार्यक्रम की भी अपनी एक गरिमा और समय-सीमा होती है। मैंने सोचा, दो-तीन प्रमुख पुरस्कारों का उल्लेख पर्याप्त होगा। मेरा ऐसा विचार विवेक दिखाना मुसीबत बन गया। समस्या खड़ी हो गई। महोदय मंच पर आए ही नहीं। मंच के नीचे से ही टिप्पणी आई- “यह तो मेरे पुरस्कारों का बीस प्रतिशत भी नहीं है। कम से कम अस्सी प्रतिशत तो बताइए। नहीं तो सौ प्रतिशत बताइए। दस-बीस प्रतिशत परिचय से क्या होगा? आपको सब कुछ लिख कर देने के बाद यह हालत है कमाल है बंधु।”

क्षण भर के लिए मुझे लगा कि मैं साहित्यिक कार्यक्रम नहीं, किसी शेयर बाजार का उद्घाटन कर रहा हूं, जहां लेखक का मूल्य उसकी पुरस्कार-सूची से तय हो रहा है।

आज स्थिति यह है कि जिनके पास संस्थाएं हैं, जिनके हाथ में पुरस्कार हैं, उनका साहित्यिक कद स्वतः बढ़ गया है। उनकी किताबें अचानक पठनीय हो जाती हैं। लोग उन पर लेख लिखने लगते हैं। वे गोष्ठियों, सभाओं, सेमिनारों में विशेष आमंत्रित होने लगते हैं। उन्हें चाय, पान, भोजन और प्रशंसा सब कुछ उपलब्ध होता है। यहां तक कि शादी-ब्याह में भी “विशिष्ट अतिथि” के रूप में बुला लिए जाते हैं। साहित्य पीछे छूट जाता है, सम्मान आगे चलने लगता है।

यह सब देखकर मैं एक विचित्र मानसिक स्थिति में पहुंच गया। थोड़ा आक्रोश, थोड़ा दुख और काफी निराशा। तब मैंने गंभीरता से सोचना शुरू किया कि अगर पूरा साहित्यिक संसार पुरस्कारों के सहारे चल रहा है, तो मुझे भी कोई नया पुरस्कार शुरू करना चाहिए। कुछ खास मित्रों से विचार-विमर्श हुआ। अंततः तय हुआ कि हम ऐसा पुरस्कार देंगे, जो अब तक किसी ने नहीं दिया।

मैंने देखा कि अनेक बड़े-बड़े पुरस्कार प्राप्त कर चुके लेखक भी जब बोलते हैं, तो ज्ञान कम और उनका नंगापन ज्यादा दिखाई देता है। शब्दों में विचार अथवा तथ्य नहीं, केवल आत्मप्रदर्शन होता है। तब समझ में आया कि समस्या पुरस्कार की नहीं, नंगाई की है। और नंगाई को ढकने के लिए हमने समाधान खोज लिया- पुरस्कार में चड्डी।

यह चड्डी साहित्यिक जरूरत के अनुसार दी जाएगी। अलग-अलग वर्गों में। अभिषेक चड्डी, जांगिया चड्डी, अंडरवियर चड्डी, डबल-साइड चड्डी। विभिन्न विधाओं के लिए अलग-अलग रंग तय होंगे। कविता के लिए लाल चड्डी। कहानी के लिए पीली, जो दोनों लिखते हैं उनके लिए लाल-पीली चड्डियां नाप लेकर बनवाओ। आलोचना के लिए थोड़ी मोटी और महंगी चड्डी। महिला साहित्यकारों के लिए अलग डिजाइन और वरिष्ठों के लिए अलग क्वालिटी की रहेगी।

यदि किसी विशेष वर्ग, समुदाय या अल्पसंख्यक को सम्मानित करना हो, तो उसके लिए भी चड्डी के रंग और साइज निर्धारित होंगे। युवा साहित्यकारों को छोटी चड्डी दी जाएगी और वरिष्ठों को बड़ी। जिनकी नंगाई अधिक ढीली हो, उनके लिए गेट-टाइट चड्डी की व्यवस्था रहेगी। वितरण के लिए एक चयन समिति बनेगी, ताकि कोई भी नंगापन बिना ढके मंच पर न आए।

इस तरह ‘चड्डी पुरस्कार’ की पूरी योजना तैयार की गई। नियम बनाए गए। मेरा और मेरे मित्रों का उद्देश्य साफ है- साहित्य में फैली नंगाई को ढकना। क्योंकि आज के समय में सच्चाई को नहीं, छवि को बचाने की जरूरत है। और छवि सबसे अच्छे ढंग से पुरस्कार की चड्डी से ही ढकी जा सकती है।

अब उम्मीद है कि साहित्यिक मंच पहले से ज्यादा सभ्य, सुरक्षित और सम्मानित दिखाई देंगे। चड्डी को पुरस्कृत जन पहन कर गुड फील करेंगे। इससे साहित्य और साहित्यकार दोनों का विकास होगा। भले भीतर जो हो, वह अलग बात है। नंगाई को ढकने के लिए देखना सब मुझे और मेरे मित्रों को भी सम्मानित करेंगे। हमारी वेल्यू बढ़ जाएगी और चड्डियों को पुरस्कार में पाने के लिए लेखक रुपये और डॉलर लेकर हमारे पीछे दौड़ते नजर आएंगे। फिर हम देश विदेश तक अपनी अलग अलग ब्रांच खोलेंगे... उसके बाद? उसके बाद राजा प्रजा कोई पुरस्कृत नहीं रहेगा। लोग पुरस्कार के मोह से मुक्त हो जाएंगे और आगे कुछ नहीं... एक बच्चा मंच पर आएगा और कहेगा- राजा नंगा है। 


 

12 नवंबर, 2025

पांच कविताएं/ डॉ. नीरज दइया

भुलावा

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आगे प्रेम 

पीछे प्रेम 

इस यात्रा के बीच 

जिंदगी - एक भुलावा ।


हाथ बढ़ाते हैं 

जिन्हें छूने के लिए 

वो हर बार 

खिसक जाते हैं चुपचाप ।


मंजिल पास लगती है 

फिर भी 

रह जाती हैं- दूरियां...


आगे प्रेम 

पीछे प्रेम 

बीच में हम-

बस प्रेम-मार्गी।


ढाई आखर

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प्रेम को जानना 

यानी पढ़ लेना 

ढाई आखर-

और बन जाना पंडित।


पर जानना ही 

तो अंत है, 

और मुझे नहीं चाहिए 

प्रेम का अंत।


इसलिए हर बार 

कह देता हूं-

मुझे समझ नहीं आए 

ढाई आखर, 

तुम रचते रहो 

मैं बांचता रहूं


अनजान अनाम सही 

प्रेम में बना रहूं...


प्रेम चाहिए... हर जगह

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मैंने कहा-

प्रेम चाहिए पृथ्वी पर। 

भूलभुलैया बन गए हैं रास्ते, 

हृदयों में उग आए हैं कांटे,

मनुष्यता सिसक रही है, 

प्रेम चाहिए... हर जगह।


देवता प्रेम के हुए प्रसन्न, 

बोले-

'प्रेम भेज रहा हूं, 

कहां भेजूं इस पृथ्वी पर ?'


मैंने कहा-

मेरी पृथ्वी की अपनी सीमाएं हैं,

नक्शों में बंटी, भाषाओं में बंधी, 

धर्म, जाति, रंग की दीवारों से 

घिरी हुई है सारी दुनिया।


मगर नहीं हैं सीमाएं प्रेम की 

वह उगता है सूरज-सा, 

बरसता है बादलों-सा, 

बहता है नदियों-सा 

एक छोर से दूसरे तक


जहां जरूरत हो, 

पहुंच जाता है वह।


तो कैसे कहूं 

किस पते पर भेजो प्रेम? 

किस नगर, किस जाति, किस धर्म के नाम 

मांगूं मैं उसे?


नहीं, 

प्रेम चाहिए हर एक कण में, 

हर जीव, हर जड़, हर चेतन में।

जन-जन के मन में, 

श्वास-श्वास में हो प्रेम।


संबंधों में ही नहीं, 

विचारों में, 

नीतियों में, 

भाषाओं और पाठ्यक्रमों में 

और सबसे जरूरी, 

बच्चों की आंखों में हो प्रेम।


देवता मौन रहे 

और मैं भी। 

मौन में ही कुछ उत्तर था 

शायद प्रेम अब भेजा जा चुका है।

हवाओं में घुल चुका है वह।


क्योंकि प्रेम अब पृथ्वी पर है-

और वह जीवित रहेगा 

केवल तब तक, 

जब तक हम प्रेम होंगे।


सांस-सांस गाती है...

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'झीनी-झीनी चदरिया', 

ओढ़ रखी है मैंने भी 

तुम्हारे नाम की।


मेरी सांस-सांस 

गाती है दिन-रात।


भीतर-बाहर आती-जाती

गुनगुनाती है हवा 

बस एक ही आलाप....।


कौन तय करता है

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कोई हल्की सी चिंगारी 

कमाल की रोशनी बन सकती है

यह भी हो सकता है-

हो जाए उदय के साथ-

अचानक उसका अंत। 

कौन तय करता है ?


जरा सी सहानुभूति 

बदल जाए प्रेम में 

या उसे स्वार्थ समझ 

भूलने के कुचक्र में 

रखा जाएगा- रौंदने के लिए 

कौन तय करता है ?


घने अंधकार के बीच 

सब कुछ भूल कर खुलती-

जैसे ही आँख 

जग जाती - स्मृति 

पेड़ की शाखाओं की तरह

सज जाता है 

भीतर हरा-भरा संसार... 

कौन तय करता है ?


डॉ. नीरज दइया

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‘प्रभात खबर’ के दीपावली विशेषांक 2025 में





14 सितंबर, 2025

पांच रुपये में मौत/ डॉ. नीरज दइया

'यम आएगा साकी बनकर साथ लिए काली हाला' बच्चन जी की यह पंक्तियां 'हाला' के शौकीन लोगों के लिए कही गई हों, परंतु इसमें एक गहरा सत्य छिपा है। यमराज को रोकने का दम किसी में नहीं है। जिसके लिए वह आते हैं, उसे लेकर ही जाते हैं। चाहे उनके हाथ में काली हाला हो, चाहे मौत का प्याला। कौन जाने, वह अपनी मर्जी से किसे पिलाएं और किसे नहीं। कभी-कभी लगता है कि उनका धर्म ही यही है कि सबको एक-एक घूंट पिलाकर अपने साथ ले जाएं।

मेरे भीतर यह दार्शनिकता बिहार आने के बाद और भी गहरी हो गई है। बिहार की भयावयता पहले की तुलना में काफी कम हो गई है। फिर भी यहां चारों तरफ मुझे मौत की काली छाया फैली दिखती है। सड़कें हों या गलियां, हर जगह ऐसा प्रतीत होता है कि यमराज ने अड्डा जमा लिया हो। ओवरलोड ट्रक, तेज रफ्तार ऑटो, बिना हेलमेट बाइक चालक, दो-तीन नहीं बस पांच सवारियों को ढोते दुपहिया वाहन, और लापरवाही का ऐसा आलम कि पैदल चलना भी जोखिम भरा है। लगता है कि यहां मौत की कीमत बहुत मामूली है- बस पांच रुपये। 

आप पूछेंगे कि यह पांच का आंकड़ा कैसे? इन दिनों में जहां रहता हूं वहां से मेरा कार्य स्थल लगभग एक या सवा किलोमीटर दूर होगा। जब यहां मैं नया-नया था तो ऑटो वाले मुझ से दस रुपये लेते थे। बाद में पता चला की रेट तो केवल पांच रुपये ही है। सुनने में आया कि पांच रुपये अग्रिम किराया देकर मेरे मित्र के मित्र आनंद जी परम आनंदधाम पहुंच गए।

जीवन और मरण के विषय में तुलसीदास ने भी कहा है- 'सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेऊ मुनिनाथ। हानि-लाभ, जीवन-मरण - जस-अपजस बिधि हाथ।' सोचता हूं, कैसी विधि है यह कि यमराज कभी सड़क दुर्घटनाओं के बहाने, कभी बीमारियों के बहाने, तो कभी यूं ही किसी की सांसों को खींचकर ले जाते हैं। उनकी सत्ता इतनी प्रबल है कि कोई उन्हें चुनौती नहीं दे सकता। गीता कहती है- 'आत्मा अजर-अमर है, शरीर तो केवल वस्त्र है।' लेकिन जब मौत सामने आती है, तब यह और ऐसे अनेक दार्शनिक ज्ञान धरे के धरा रह जाते हैं।

यहां की सड़कों का हाल देखिए- बड़े-बड़े ट्रक सड़क पर ऐसे दौड़ते हैं जैसे शेर अपने इलाके में दहाड़ते हों। ऑटो तो किसी अजूबे से कम नहीं। जैसे छोटी सी किसी डिबिया में चालक ऐसी कलाकारी दिखाता है कि आठ-दस लोगों को ठूंस देता है। बच्चों को स्कूल ले जाते हुए दृश्य देखता हूं तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। आधे से ज्यादा बच्चे हवा में लटके रहते हैं, मानो मौत से आंख-मिचौली खेल रहे हों। इन हालात में बैठना अपने आप में बहादुरी है। ऑटो में बैठते ही मेरी सांसें तेज हो जाती हैं। हर झटका, हर मोड़ दिल की धड़कनें बढ़ा देता है। मन-ही-मन हनुमान चालीसा जपने लगता हूं और प्रार्थना करता हूं कि किसी तरह यह सफर सकुशल पूरा हो जाए तो अगली बार ऐसे तो हर्गिज नहीं बैठूंगा। कई बार देखा है, ऑटो के पीछे दो-तीन लोग लटककर यात्रा कर रहे हैं और ड्राइवर हँसते हुए रेडियो पर गाना बजा रहा है- 'जीना यहां, मरना यहां इसके सिवा जाना कहां…।' लगता है जैसे यमराज को भी इस गीत की धुन भा गई हो। कल खेल में हम हो ना हो... मेरा सवाल है फिर खेल ही क्यों?

जब यहां आया था, तभी सुना कि आंनद जी की मौत हो गई। कारण? ऑटो किसी कार से टकरा गया, पलटा और मौत ने दस्तक दे दी। अस्पताल की औपचारिकता के बाद बस खबर आई- 'वह नहीं रहे।' बताने वाला मित्र इस तरह कह रहा था मानो यह कोई सामान्य घटना हो। और सचमुच यह सामान्य ही है। रोज कुछ ना कुछ होता रहता है। यह बात सुनकर मैं भीतर तक दहल गया। लगा जैसे मौत मेरे दरवाजे तक आकर लौट गई हो। तभी से हर सफर में सोचता हूं- क्या यह पांच रुपये मंजिल तक पहुंचने का किराया है या मौत खरीदने की कोई कीमत? पैदल चलना स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है किंतु पैदल चलना भी सरल कहां।

वैसे जिंदगी और मौत का सौदा पांच रुपये में! यह वाक्य सुनने में व्यंग्य लगता भले हो, पर सच यही है। ना मालूम किसी पांच रुपये के सिक्के पर ही मौत लिखी हो। और जब वह आएगी तो हर किसी नोट को खुल्ले पैसों में बदल देगी। पता नहीं किस किस के पांच रुपये में अपना उपहार देकर ले जाएगी। जीना है तो डरना नहीं और डर डर के जीना नहीं। हम ऑटो में बैठते हैं, रोज बैठते है यानी डर के आगे जीत है। कोई गारंटी नहीं कि जीत किस दिन हार में बदल जाएगी। यही तो जीवन का असली रंग है, सच्चाई है। हम ऐसे ही एक किसी दिन हमारी असली मंजिल तक पहुंचेंगे। फिर नहीं डरना इस बात से कि बीच रास्ते ही कोई ट्रक धक्का मार दे और हमारी कहानी खत्म कर जाए। 

कभी-कभी लगता है कि यहां ऑटो सिर्फ सवारी नहीं ढोते, बल्कि पूरे समाज की विवशता ढोते हैं। ये पांच रुपये सिर्फ किराया नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का प्रमाण हैं जिसमें गरीब आदमी अपनी जान जोखिम में डालकर रोज यात्रा करता है। सरकार सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाती है, हेलमेट अभियान चलाती है, पर यहाँ सच्चाई यह है कि लोग दो वक्त की रोटी के लिए मौत से सौदा करते नहीं थकते हैं। 

एक दिन का किस्सा याद आता है। मैं ऑटो में बैठा था। ड्राइवर के आजू-बाजू तीन-तीन लोग ठूंसे हुए थे। एक बुज़ुर्ग महिला गोदी में बच्चा लिए बैठी थी। बच्चा लगातार रो रहा था और महिला उसे चुप कराने के लिए झुला रही थी। अचानक सामने से आती बस को बचाने के लिए ड्राइवर ने ऑटो को तेज़ी से मोड़ा। सबके शरीर एक-दूसरे से टकराए। महिला का बच्चा लगभग छूटकर गिर ही जाता कि किसी ने उसे थाम लिया। उस क्षण लगा, मौत कितनी सस्ती और कितनी पास है।

कबीर दास जी ने कहा है- 'माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर। कर का मनका छोड़ दे, मन का मनका फेर।' सच यही है। मौत से बचने के लिए हम चाहे माला फेरें या हनुमान चालीसा पढ़ें, अंततः सब कुछ विधि के हाथ में है। परंतु यह ख्याल भी आता है कि क्या हम केवल विधि को दोष देकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकते हैं? सड़कों पर गड्ढे हैं, ऑटो में क्षमता से दोगुनी सवारी बैठती है, हेलमेट का नामोनिशान नहीं। यह सब यमराज का नहीं, हमारी लापरवाही का खेल है।

यह भी सही है कि लोग मजबूरी में सफर करते हैं। नौकरी का समय हो या स्कूल का, साधन यही है। ऑटो वाले जानते हैं कि लोग मजबूर हैं, इसलिए चाहे जितनी भीड़ हो, लोग चढ़ ही जाएंगे। कभी हँसी आती है कि ड्राइवर खुद को कलाकार समझता है- किस तरह दो इंच की जगह में पांच सवारी फिट कर सकता है। वह बड़े गर्व से कहता है- 'भइया, सबका जगह बन जाएगा।' और सचमुच, जगह बन भी जाती है। यह जगह केवल शरीर की नहीं, बल्कि मौत के साथ समझौते की जगह है।

बिहार की गलियों और कस्बों में चलते हुए बार-बार यही महसूस होता है कि यमराज का सबसे प्रिय वाहन यही ऑटो है। ट्रक और बसें तो बड़ी घटनाओं के लिए हैं, पर रोज की छोटी मौतों का हिसाब यही ऑटो रखता है। कोई बच्चा स्कूल जाते समय कुचल गया, कोई ऑफिस जाते हुए गिर पड़ा, कोई घर लौटते समय किसी लापरवाह मोड़ का शिकार हो गया। अखबार में एक-आध कॉलम की खबर छपती है, और फिर अगले दिन कोई नई दुर्घटना पुराने दर्द पर परदा डाल देती है।

कभी-कभी सोचता हूं कि यह मौतें इतनी सामान्य क्यों हो गई हैं। समाज ने इन्हें स्वीकार कर लिया है। ड्राइवर की लापरवाही, पुलिस की नजरअंदाजी, प्रशासन की चुप्पी- सब मिलकर मानो यही कह रहे हैं कि गरीब की जान की कोई कीमत नहीं। किसी बड़ी हस्ती की मौत पर शोक संदेश दिए जाते हैं, भाषण होते हैं, सुरक्षा बढ़ाई जाती है। लेकिन यहां रोज कोई गुमनाम चेहरा पांच-दस रुपये में मौत खरीद लेता है और यह खबर किसी को विचलित नहीं करती।

मैंने जमालपुर से मुंगेर और खगड़िया तक कई बार ऐसी यात्राएं की हैं- बात पांच-दस या बीस रुपये की नहीं है। हर सफर ने मेरी सहनशक्ति की परख ली है। बिहटा में खचाखच भरे ऑटो, धूल से अटी सड़कें, अचानक उभरते ट्रक और लापरवाह ड्राइवर। एक क्षण ऐसा आता जब लगता कि अब कुछ नहीं बचेगा। पर फिर किसी तरह बच जाते। हर बार यही सवाल मन में गूंजता- 'यह पांच रुपये का किराया है या मौत का टिकट?' कभी-कभी तो ऐसा महसूस होता है कि यमराज खुद ओवरटेक कर रहे हैं। जब भीड़ में फसा ऑटो तेज रफ्तार से किसी ट्रक के बराबर चलता है, तब लगता है यमराज पास से गुजरते हुए मुस्कुरा रहे हैं। जैसे कह रहे हों- बाबू चलो, अभी तो बच गए, अगली बार देखेंगे।' यह दृश्य किसी फिल्मी खलनायक की तरह डरावना भी है। 

पांच रुपये देकर कोई बच्चा, बड़ा या बुजुर्ग स्कूल, बाजार या दफ्तर  कहीं जाता है। किसी का ठिकाना कोई दफ़्तर, कोई बाजार या कोई स्कूल के साथ साथ परमधाम भी किसी कोने में अंकित है। व्यवस्था इतनी लापरवाह है कि हर यात्रा मौत के निमंत्रण को ठुकराती चलती है। यहां सब लोग जीते हैं, सफर करते हैं, हँसते हैं और अगले दिन फिर जैसे पांच रुपये थमा कर वही यात्रा करते हैं। यही जीवन की सबसी बड़ी त्रासदी है। हम जानते हैं कि मौत पास खड़ी है, फिर भी उससे सौदा करते हैं। यहां मौत भी सस्ती है और जिंदगी भी। बस पांच रुपये का खेल है बाबू।


13 सितंबर, 2025

मछली काहे नहीं खाते.../ डॉ. नीरज दइया


बहुत पहले कहीं पढ़ा या सुना था कि एक हवाई जहाज में दो दोस्त सफर कर रहे थे। सफर लंबा था और बातचीत के लिए विषय कम पड़ रहे थे तो एक ने मजाक ही मजाक में पूछा- 'डू यू लाइक फिस?' सामने वाले ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया। उस समय तो यह बात हवा में उछल गई, लेकिन जिसने पूछा था, उसने इस उत्तर को बड़ी गंभीरता से ले लिया। दोस्ती में कई बार एक छोटी-सी बात दिल के कोने में टिक जाती है और फिर वक्त आने पर वह असली रूप दिखाती है। कुछ दिन बाद वही दोस्त अपने साथी को डिनर पर बुलाता है। पूरा इंतज़ाम किया गया, बड़ी तैयारी से मछली बनाई गई। जब थाली सामने आई और महकदार नॉनवेज की खुशबू फैली तो मेहमान का चेहरा अचानक बदल गया। वह घबराकर पीछे हट गया और बोला- 'भाई, मैं तो प्योर वेजीटेरियन हूं।' अब जिसने इतना मन लगाकर मछली बनाई थी, उसकी हैरानी देखिए। उसने तुरंत कहा- 'अरे! तुमने ही तो कहा था। यू लाइक फिस।' इस पर मेहमान हँसते-हँसते लोटपोट हो गया। बोला- 'भाई साहब! मुझे मछली देखना पसंद है, एक्वेरियम में। खाना नहीं।' 

यह किस्सा मुझे हमेशा याद दिलाता है कि ‘पसंद’ शब्द का अर्थ हर किसी के लिए अलग होता है। किसी को देखना अच्छा लगता है, किसी को खाना। किसी के लिए मछली तैरते हुए सुंदरता का प्रतीक है, तो किसी के लिए थाली का स्वाद। यह फर्क ही दुनिया को रोचक और विविध बनाता है।

मैं जब राजस्थान से बिहार आया तो इस किस्से की याद और भी गहरी हो गई। राजस्थान में शाकाहारी भोजन और मिठाइयों का अपना दबदबा है। मेरा बीकानेर तो भुजिया और नमकीन के लिए बहुत प्रसिद्ध है। अब तो गांव-कस्बों से लेकर शहर तक पनीर, दाल-बाटी-चूरमा और तरह-तरह की राजस्थानी सब्जियां ही घर-घर का स्वाद हैं। नॉनवेज खाने वाले भी मिलते हैं, लेकिन बहुतायत में नहीं। वहां नॉनवेज कुछ खास मौकों पर ही पकाया जाता है और कई बार लोग इसे छुपाकर खाते हैं, ताकि सामाजिक आलोचना न हो। बीकानेर राजस्थान के पुष्करणा ब्राह्मण तो लहसुन प्याज से भी परहेज करते हैं, लेकिन इसमें कुछ अपवाद भी हो सकते हैं।

मैंने बिहार आकर देखा कि यहां तो नॉनवेज खानपान का मुख्य हिस्सा है। एक सामान्य-सी दावत में भी नॉनवेज का प्रबंध ऐसे किया जाता है, जैसे बिना उसके जश्न अधूरा हो। 

एक बार दफ्तर में पार्टी का आयोजन हुआ। सभी कर्मचारियों से भोजन की चॉइस पूछी जा रही थी। मेरे लिए यह एक नया अनुभव था। पार्टी यानी पार्टी, उसमें चॉइस पूछने का कभी अनुभव नहीं रहा। यहां मैं यह देख कर चौंक गया सभी स्टाफ के सदस्यों के नाम के आगे कलम बने हुए हैं, जिसमें आपको वेज और नॉनवेज दोनों में से किसी एक पर टिक लगाना है ताकि उसकी अनुरूप व्यवस्था की जा सके। मुझे लगा कि अधिकतर लोग वेज ही चुनेंगे, पर यह देखकर हैरानी हुई कि अधिक लोगों ने नॉनवेज कॉलम में टिक किया है। उन सब ने मिलकर तय किया कि क्या बनाना है- मटन, चिकन या फिश। हर किसी की अपनी पसंद थी किंतु बहुमत के आधार पर बीस किलो मटन बनाया गया। उस अगुवाई करने वाले मित्रों का कहना था कि नॉनवेज की ऐसी शानदार व्यवस्था करेंगे कि खाने वाले खाते खाते थक जाएंगे। जो लोग वेजिटेरियन थे, उन्हें पहले खाना मटर पनीर इस मजाक के साथ खिला दिया गया कि मटन और मटर पनीर की राशि एक ही है। राशि में छुपे श्लेष पर मित्र खुश हो रहे थे। इसी ज्ञान के मित्रों ने हमारी मंडली को मूर्ख मानते हुए उस दिन बड़े शौक से नॉनवेज खाया-खिलाया। 

यह खुलापन और सहजता मेरे लिए नई बात थी। राजस्थान में लोग अपनी खाने-पीने की पसंद को छुपाते हैं, यहां लोग बड़े गर्व से कहते हैं- 'यस भाई, हम नॉनवेज खाते हैं। पीने का इंतजाम भी कर सकते हैं। वैसे यहां शराबबंदी है फिर भी आपके आदेश की पालना हो जाएगी।'

मित्र प्रभात मिलन से मुलाकात जमालपुर में हुई थी। वे बहुत अच्छे अनुवादक हैं और साहित्य के गहरे रसिक-पाठक भी। जमालपुर में मारवाड़ियों का एक पूरा इलाका है। वे वहीं रहते हैं। खाने-पीने को लेकर उनकी राय बड़ी मजेदार थी। वे हँसते हुए कहते- 'अगर हम नॉनवेज न परोसें तो लोग मानेंगे ही नहीं कि हमने तुम्हें भोजन कराया।' यह सुनकर मुझे हमेशा हँसी आती थी। मानो नॉनवेज परोसना ही मेजबानी का असली सबूत हो। यह बात उन्होंने मजाक में कही थी, लेकिन उसमें एक गहरी सच्चाई भी छिपी है। समाज में कई बार खान-पान का स्तर ही मेजबानी की कसौटी बन जाता है। उनके यहां का लजीज मारवाड़ी भोजन दो-तीन बार करने का स्वाद और आनंद आज भी नहीं भूला हूं। 

इसी सिलसिले में एक और प्रसंग का स्मरण होता है। मैं एक साहित्यिक कार्यक्रम में गया तो देखा- एक बड़ी प्लेट में सभी आगंतुकों को उबले हुए अंडे की पेशकश की जा रही है, और लोग बड़े मजे से उनका सत्कार स्वीकार कर रहे हैं। नमक मिर्च के साथ उनका बड़े आनंद से मुदित होते देखना मेरे लिए अद्भुत था। ऐसा मैंने पहले जीवन में कभी-कभी नहीं देखा था। 

मुंगेर में मेरे कवि मित्र शहंशाह आलम के घर ईद पर जाने का अवसर मिला। वहां मीठी सवैयां खिलाई गईं, जो बेहद स्वादिष्ट थीं। बातें करते हुए उन्होंने भी मजाक में कहा- 'कभी कभार तो नॉनवेज लेते होंगे।' जामालपुर मुंगेर से बिहटा पटना आ गया, तब भी पाया कि नॉनवेज ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा। बिहार में नॉनवेज सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि संस्कृति का हिस्सा है। चाहे शादी हो, त्योहार हो या सामान्य मिलन-मुलाकात, नॉनवेज की मौजूदगी एक तरह से अनिवार्य मानी जाती है। एक-दो अवसरों पर तो लिट्टी चोखा भोजन में था और चोखा को देखकर मुझे अंदेशा हुआ कि यह नॉनवेज है। यहां मैंने धीरे-धीरे यह महसूस किया कि खान-पान केवल पेट भरने का साधन नहीं है। यह संस्कृति, आदत और परिवेश का आईना है। राजस्थान में पनीर, केर, सांगरी, गट्टा आदि को शान समझा जाता है। अगर शादी-ब्याह में ये सब नहीं हो तो लोग कहते हैं- 'भाई, खाना अधूरा रहा।' वहीं बिहार में यही बात नॉनवेज के लिए कही जाती है। अगर दावत में मटन या फिस-चिकन न हो तो लोग मानते हैं कि असली स्वाद अधूरा रह गया।

कुछ ट्रेन के सफर में भोजन की सुविधाएं हैं। वहां भी विविधता देखने को मिलती है। सबकी अपनी अपनी पसंद। भारतीय रेलवे के भोजन पर अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि वह महंगा है। टिकट का किराया पहले ही इतना अधिक होता है कि यात्री सोचते हैं, कम से कम खाने में तो कुछ अच्छा मिले। अब यात्री मजाक में कहते हैं कि रेलवे के महंगे टिकट का “कंपनसेशन” यही है कि भोजन में नॉनवेज खा लिया जाए। ऐसा लगता है कि महंगे टिकट की कीमत तभी वसूल होती है जब खाने में मटन या चिकन मिले। दूसरी ओर, ट्रेन में मिलने वाला पनीर अक्सर निराश कर देता है। कई लोग कहते हैं- 'इससे तो घर का साधारण खाना ही अच्छा है।' भारतीय रेल के भोजन को लेकर लोग चाहे जितनी शिकायत करें, यह तय है कि सफर के दौरान खाना भी एक अनुभव बन जाता है।

मेरे अपने अनुभवों ने मुझे यह सिखाया है कि स्वाद की कोई सार्वभौमिक परिभाषा नहीं होती। यह पूरी तरह व्यक्ति की पसंद, परवरिश और संस्कृति पर निर्भर करता है। कोई पनीर को राजा मानता है, तो कोई मछली को असली मोती। कोई बिना नॉनवेज के दावत अधूरी मानता है, तो कोई प्योर वेज होकर भी हर स्वाद का आनंद केवल दूसरों को खाते देख कर लेता है। और कोई ऐसा भी है, जो कहता है- 'भाई, मछली हमें बस तैरते हुए अच्छी लगती है, थाली में नहीं।'

कई बार लगता है कि खान-पान को लेकर लोगों की सोच उनके व्यक्तित्व का भी हिस्सा बन जाती है। कोई नॉनवेज खाता है तो उसमें एक बेफिक्री और खुलापन नजर आता है। वह कहता है- 'हां, मुझे यह पसंद है और मैं इसे छुपाकर नहीं खाऊंगा।' वहीं शाकाहारी लोग भी अपनी पसंद पर उतने ही गर्व से टिके रहते हैं। वे कहते हैं- 'भाई, हमें यह अच्छा नहीं लगता, चाहे लोग कुछ भी कहें।' दोनों ही दृष्टिकोण अपने-अपने तरीके से सशक्त हैं।

मेरे एक परिचित ने एक बार बड़ी रोचक बात कही। बोले- 'देखो, नॉनवेज खाना सिर्फ स्वाद का मामला नहीं है, यह एक तरह की सोच भी है। जो मटन खाता है, वह जिंदगी को मसालेदार समझता है, और जो पनीर खाता है, वह जिंदगी को संतुलित।' उनकी यह बात सुनकर मैं हँस पड़ा। लेकिन सच मानिए, उसमें भी थोड़ी बहुत सच्चाई थी। स्वाद केवल ज़ुबान पर नहीं, सोच पर भी असर डालता है।

मैंने यह भी देखा है कि नॉनवेज को लेकर कई मिथक चलते हैं। कोई कहता है कि यह ताकत बढ़ाता है, कोई कहता है कि यह सेहत के लिए अच्छा नहीं। लेकिन हकीकत यह है कि खाना चाहे कोई भी हो, अगर संतुलन से खाया जाए तो वही शरीर और मन दोनों को तृप्त करता है। खाने-पीने की पसंद पर विवाद करना बेकार है। यह वैसा ही है जैसे कोई यह तय करने निकले कि गुलाब का फूल अच्छा है या चमेली का। 

मेरे लिए बिहार यात्रा केवल खान-पान का अनुभव नहीं रही, बल्कि जीवन के उस सत्य की झलक रही जिसमें विविधता ही असली स्वाद है। राजस्थान की शाकाहारी थाली से लेकर बिहार की नॉनवेज दावत तक, रेलवे के पनीर से लेकर दोस्तों की मेहमाननवाजी तक- हर जगह यही सीखा कि भोजन केवल थाली का हिस्सा नहीं, बल्कि संस्कृति, आदत, रिश्ते और जीवन का उत्सव है। और आखिर में वही सवाल मुस्कुराकर मन में उठता है, मेरा एक स्नेही मुझे अनेक अवसरों पर पूछता रहता है- 'सर, आप मछली काहे नहीं खाते हैं?'

डॉ. नीरज दइया