08 अक्टूबर, 2026

साहित्य के संबंधशास्त्री/ डॉ. नीरज दइया

साहित्य में कवि-लेखक, व्यंग्यकार और आलोचक होते हैं। कुछ समीक्षक होते हैं, कुछ शोधार्थी होते हैं और कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें देखकर लगता है कि साहित्य ने अपने लिए एक अदृश्य खुफिया विभाग भी खोल रखा है। ये साहित्य पढ़ते कम हैं, साहित्यकारों को पढ़ते अधिक हैं। किताब उनके लिए सिर्फ बहाना है, असली विषय होता है- कौन किसके कितना करीब है! कौनसा समीकरण कहां बन बिगड़ रहा है। यह दूरगामी और अंतरयामी सोच के हमारे सह-यात्री परम मित्र का मुखौटा पहने हुए होते हैं।

मेरे एक परिचित हैं, जिनको दोस्त भी कहा जा सकता है। वे कौनसा अर्थ कहां खोजकर कहां परोस देंगे, कुछ कहा नहीं जा सकता है। साहित्यिक कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति अपने आप में एक अलग घटना होती है। वे सभी कार्यक्रमों में हाजिर रहते हैं, रहना चाहते है। यह उनके लिए बहुत जरूरी है। कारण जिस कार्यक्रम में बाकी लोग पुस्तक, लेखक और वक्ताओं को सुनने जाते हैं, वे वहां संबंधों की नब्ज टटोलने जाते हैं। उनके लिए किसी पुस्तक का लोकार्पण तभी पूरा होता है, जब उसके साथ जुड़े लोगों के संबंधों का भी लोकार्पण हो जाए। जहां वे मौजूद नहीं हो पाते अगले दिन खबर को खुरच-खुरच के उदरस्थ करते हैं। सभी सूत्रों से मोबाइल पर बात करते हुए सूत्र बटोरते हैं।

हाल में एक पुस्तक का कार्यक्रम हुआ। मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि, लेखक, पत्रवाचक और साहित्यप्रेमी उपस्थित थे। वे भी वहां होने ही थे और थे भी। कार्यक्रम समाप्त हुआ। लोगों ने कहा- बहुत अच्छा आयोजन रहा।

उन्होंने कहा- “अच्छा... लेकिन असली बात अभी पता करनी है।”

और फिर शुरू हुआ उनका साहित्यिक अनुसंधान।

सबसे पहले लेखक पकड़े गए।

“कार्यक्रम कैसा रहा?”

लेखक ने सहजता से कहा- “बहुत अच्छा।”

“मुख्य अतिथि से आपके पुराने संबंध हैं?”

“जी, परिचय है।”

“सिर्फ परिचय?”

लेखक ने उनकी ओर देखा। सवाल में ऐसी गंभीरता थी जैसे परिचय की भी श्रेणियां होती हों- सामान्य परिचय, साहित्यिक परिचय, आत्मीय परिचय, पारिवारिक परिचय और वह परिचय जिसके बारे में सार्वजनिक रूप से कुछ न कहा जाए।

लेखक ने कहा- “जी, पुराने परिचित हैं।”

अब विशेषज्ञ की आँखों में चमक आई।

“कितने पुराने?”

यह प्रश्न सुनकर लेखक को लगा कि शायद जन्मपत्री माँगी जा रही है।

इसके बाद मुख्य अतिथि की बारी थी।

“आपको पुस्तक कैसी लगी?”

मुख्य अतिथि ने पुस्तक की प्रशंसा की।

“लेखक से पहले से परिचय है?”

“हाँ।”

“अच्छे संबंध हैं?”

“हाँ, ठीक हैं।”

“कितने अच्छे?”

मुख्य अतिथि शायद पहली बार समझे कि साहित्यिक कार्यक्रम में पुस्तक पर बोलना आसान है, लेकिन इस व्यक्ति के सामने ‘अच्छे संबंध’ की परिभाषा देना कठिन।

फिर विशिष्ट अतिथि।

फिर पत्रवाचक।

फिर आयोजक।

फिर मंच पर बैठे एक सज्जन।

फिर वह व्यक्ति जिसने लेखक को कार्यक्रम के बाद गले लगाया था।

गले मिलने का भी संज्ञान लिया गया।

“ये आपसे कब से परिचित हैं?”

“काफी समय से।”

“अच्छा! और ये मुख्य अतिथि को भी जानते हैं?”

अब सामने वाला चौंका- “शायद।”

विशेषज्ञ ने 'शायद' को वहीं नहीं छोड़ा। 'शायद' उनके लिए कोई उत्तर नहीं, एक नया शोध-विषय है।

उन्होंने किसी और से पूछा।

फिर किसी तीसरे से।

फिर चौथे से।

धीरे-धीरे उन्हें कार्यक्रम की पूरी रिपोर्ट मिल गई- सिवाय उस पुस्तक की, जिसका कार्यक्रम था।

लेकिन उन्हें इसकी कोई चिंता नहीं थी। पुस्तक तो छप चुकी थी। असली सामग्री तो लोगों के बीच थी!

वे ऐसे व्यक्ति हैं जिनके लिए साहित्यिक कार्यक्रम में मंच पर क्या कहा गया, यह गौण है; मंच से उतरने के बाद कौन किससे कितनी देर मिला, यह प्रधान है।

कौन पहले आया?

किसके पास बैठा?

किसने किससे हाथ मिलाया?

किसे देखकर कौन मुस्कराया?

किसके कंधे पर किसने कितनी देर हाथ रखा?

किसके साथ चाय पी?

किसे फोन किया?

किसे फोन नहीं किया?

किसकी फोटो किसके साथ आई?

और सबसे महत्वपूर्ण- किसकी फोटो में कौन नहीं आया?

कौन किस पार्टी का है? कौन सत्ता पक्ष का आदमी है? कौन विपक्ष का? कौन फायदा दिला सकता है? कौन रूखा, अड़ियल और बेकार आदमी है? किसे बुलाना और बोलवाना था किसे नहीं? किसे मंच पर बिठना था किसे नहीं? उनके लिए सारा गणित का मामला है। 

इन प्रश्नों के बिना उनका कार्यक्रम अधूरा रहता है।

उनके पास साहित्य का अपना एक गणित है।

लेखक + मुख्य अतिथि = पुराना संबंध।

मुख्य अतिथि + विशिष्ट अतिथि = अलग समीकरण।

पत्रवाचक + आयोजक = संभावित निकटता।

फलां साहित्यकार + लेखक = कुछ तो है!

और यदि कोई व्यक्ति कार्यक्रम समाप्त होने के बाद लेखक के साथ पांच मिनट खड़ा रह गया, तो समझिए विशेषज्ञ की नोटबुक में एक नया अध्याय जुड़ गया।

उनका सूत्र बड़ा सरल है- “जहां दो साहित्यकार खड़े हों, वहां कोई न कोई समीकरण अवश्य होगा।”

और यदि तीन लोग साथ खड़े मिल जाएं तो फिर यह साधारण समीकरण नहीं रहता, 'साहित्यिक त्रिकोण' का युगपत समीकरण बन जाता है।

वे कभी-कभी इतने उत्साह से पूछताछ करते हैं कि सामने वाला सोचने लगता है- मैं साहित्यिक कार्यक्रम में आया हूँ या किसी आयोग के सामने बयान देने?

मजेदार बात यह है कि वे किसी से एक ही बात सीधे नहीं पूछते। पहले एक से पूछेंगे, फिर दूसरे से वही बात थोड़ी बदलकर पूछेंगे, फिर तीसरे से उसकी पुष्टि करेंगे। इस तरह वे साहित्य में वह बहुत बड़ा काम कर रहे हैं जो बड़े-बड़े शोधार्थी भी नहीं कर पाते- एक ही घटना के कई मौखिक प्रामाणिक संस्करण एकत्र करना।

उनकी स्मृति भी अद्भुत है।

पांच साल पहले किस कार्यक्रम में कौन किसके बगल में बैठा था, उन्हें याद रहता है। वैसे वे पूरा रिकार्ड भी मेंटेन रखते हैं, कुछ भी नहीं छोड़ते। सब का खाताबही हिसाब-किताब रखना कोई छोटी बात नहीं, इसलिए वे बड़े और महान हैं। सबके प्रिय ना सही किंतु संवाद समर्थ बने रहते हैं।

किसने किस पुस्तक के विमोचन में किसे बुलाया था, क्या खिलाया-पिलाया, सब याद रहता है। यहां तक कि कहां किस प्रकार रस-रंजन हुआ और उसके बाद का पूरा ऑफ दा रिकार्ड का भी वे रिकार्ड रखते हैं। हो सकता है कि यहीं या ऐसे ही कुछ कारण होंगे जिससे वे सब को संवादी बना सकने का सामर्थ्य रखते हैं।

खास बात यह भी कि उन्हें नए जमान की नई तकनीक और सोशल मीडिया से प्रेम है, किसने किसकी पोस्ट पर कितनी आत्मीय टिप्पणी की थी, क्या कब लिखा सब हिसाब उनके पास रहता है।

किसने किसकी पोस्ट पर केवल 'बधाई' लिखकर काम चला दिया था, वह भी याद रहता है। बधाई और हार्दिक बधाई अथवा बहुत-बहुत बधाई में कितना क्या अंतर होता है, वे विस्तार से उदाहरण के साथ बता सकते हैं।

किसी दिन यदि उनसे पूछा जाए कि फलां लेखक की नई किताब कैसी है, तो वे शायद कहेंगे- “किताब तो मैंने अभी नहीं पढ़ी, लेकिन लेखक के संबंधों में पिछले दो वर्षों में काफी परिवर्तन आया है।”

यही उनकी विशेषज्ञता है।

वे रचना के भीतर अर्थ खोजने के बजाय रचनाकारों के बीच अर्थ खोजते हैं।

उनके लिए आलोचना का नया सिद्धांत है- ‘किसने किसे बुलाया और किसने किसे नहीं बुलाया।’

पुरानी आलोचना पूछती थी- रचना में कथ्य क्या है?

नई आलोचना पूछती है- लेखक के साथ मंच पर कौन था?

पुरानी आलोचना भाषा, शिल्प और संवेदना देखती थी।

नई आलोचना फोटो में चेहरों की दूरी नापती है।

पुराने आलोचक कहते थे- “रचना को उसके संदर्भ में समझना चाहिए।”

हमारे विशेषज्ञ कहते हैं- “व्यक्ति को उसके संपर्कों में समझना चाहिए।”

उनकी दृष्टि में साहित्य का सबसे महत्त्वपूर्ण शब्द 'संबंध' है।

और यदि कभी उनसे पूछा जाए कि आप कार्यक्रम में क्या लेने आते हैं, तो वे शायद कहें- “मैं तो कार्यक्रम की रिपोर्ट के लिए कुछ जानकारी ले रहा था।”

बस, यही 'कुछ जानकारी' उनकी पूरी साहित्यिक साधना है।

कार्यक्रम समाप्त होने के बाद जहां दूसरे लोग कहते हैं- “बहुत सुंदर आयोजन था”, वहां उनका काम शुरू होता है- “हां, आयोजन तो ठीक था... लेकिन आपको पता है, मुख्य अतिथि और लेखक के संबंध पहले जैसे नहीं रहे।”

“अच्छा!”

“हां। और विशिष्ट अतिथि का तो मामला अलग है।”

“क्या हुआ?”

अब उनके चेहरे पर वह संतोष दिखाई देता है जो किसी पुरातत्ववेत्ता को हजार साल पुराना सिक्का मिलने पर होता होगा।

और सामने वाला, जो अभी तक कार्यक्रम को साहित्यिक आयोजन समझ रहा था, अचानक समझ जाता है कि वह जिस कार्यक्रम में गया था, उसका असली विषय पुस्तक नहीं था। विषय था- साहित्यिक समीकरण।

साहित्य में ऐसे विशेषज्ञों की उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता। आखिर कोई तो हो जो यह हिसाब रखे कि साहित्य में कौन किसके साथ है, किससे कितना है और कब तक साथ है या साथ रहेगा।

वे बहुत-बहुत किताबों को उलट-पलटकर देख चुके हैं, हर बार लेखक का नाम पढ़ेंगे और मुस्कराकर कहेंगे- “किताब बाद में पढ़ लेंगे। पहले यह देखिए- इसकी भूमिका किसने लिखी है? इस पर टिप्पणियां किस-किस की हैं।”

यही हैं हमारे साहित्यिक समीकरणों के विशेषज्ञ।

इनकी दृष्टि में साहित्य वह नहीं जो लिखा गया है।

साहित्य वह है- कौन किससे मिला, किसके साथ बैठा और किसके साथ उठकर चला गया। किसे कैसे पुरस्कार मिला और कौन-कौन किस पुरस्कार के लिए कितने पापड़ बेल चुका है कितने बेलने बाकी है। उनकी प्रतिभा का कोई मुकाबला नहीं कर सकता है।

बाकी सब तो किताब में छपा हुआ है- उसे कोई भी पढ़ सकता है, असली गणित तो यही है और उन्हें उसमें महारथ हासिल हो चुकी है।

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12 जुलाई, 2026

तुम कब मरोगे?

 राजस्थानी कहानी-

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मूल : सांवर दइया
हिंदी अनुवाद : नीरज दइया

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उफ़! यह तो बड़ी घटिया बात हो गई। मैं तुम्हारा नाम ही भूल गया। खैर, नाम में रखा भी क्या है? फिर तुम्हारा कोई एक नाम तो है नहीं। सच तो यह है कि तुम्हारा कोई नाम ही नहीं है। तुम तो बिना रंग, रूप और आकार के हो। आँखों से दिखाई भी नहीं देते, फिर भी चौबीसों घंटे हमारे बीच मौजूद रहते हो। तुम्हारा तो कहना ही क्या! तुम यहाँ होते हो और वहाँ की बात बताते हो। तुम कहाँ-कहाँ की बात नहीं बताते हो। तुम्हारा तो काम ही यही है- यहाँ की बातें वहाँ और वहाँ की बातें यहाँ पहुँचाना। बताओ, ऐसी कौन-सी जगह है जहाँ की बातें तुम नहीं जानते? यही तो तुम्हारा धंधा है।

लो, आज भी रोज़ की तरह घर से निकले हो। सब्ज़ी लेने जाना है। मन हो तो दूसरी चीज़ें भी खरीद सकते हो। वैसे अब तुम्हारी उम्र इतनी नहीं रही कि भारी सामान उठा सको। शरीर भी पहले जैसा मजबूत नहीं रहा। दो-चार हड्डियाँ तो ज़रा-सी बात पर चटकने लगती हैं। लेकिन यह बात तुम किसी को नहीं बताते। सबको यही कहते फिरते हो कि जवानी में खूब कसरत किया करते थे। हो सकता है कभी-कभार दस-बीस दंड-बैठक लगा ली हों, दो-चार बार गदा घुमा ली हो या गणेश चौथ पर अखाड़े में कुश्ती लड़ ली हो और हर बार पटखनी खाई हो। हुआ कुछ भी हो, पर कहते ऐसे हो जैसे बड़े पहलवान रहे हो। खैर, मुझे क्या, जो भी हुआ हो।

तुम्हारी कौन-सी बात पर भरोसा किया जाए? आज जो बात कहते हो, कल खुद ही भूल जाते हो। छोटी-छोटी बातें भूल जाते हो, लेकिन रोज़ एक नई कहानी इस तरह गढ़ लेते हो कि सामने वाले को वह एकदम सच लगती है!

तुम्हारी बातों का सबसे बड़ा विषय तुम्हारे पड़ोसी होते हैं। पड़ोसियों के मामलों में तुम्हारी रुचि ज़रूरत से कहीं ज़्यादा है। तुम तो बंद कमरों के भीतर की खबरें भी ले आते हो। पास और दूर की चीज़ें तुम्हें कितनी साफ़ दिखाई देती हैं, यह तो नहीं मालूम; लेकिन इतना तय है कि तुम्हारे चश्मे का नंबर रोज़ बढ़ता जा रहा है। जिन बंद कमरों की खबरें तुम लाते हो, उन्हें देखने के लिए तुम्हारा कद भी इतना ऊँचा नहीं कि दीवारों के पार झाँक सको। और अगर मान भी लें कि तुम्हारा कद इतना ऊँचा हो, तब भी लोग इतने नासमझ नहीं कि कमरे में पत्नी को बुलाने से पहले खिड़की-दरवाज़े खुले छोड़ दें। और अगर कभी भूल से खुले रह भी जाएँ, तो तुम्हारे चश्मे का नंबर बेकार हो जाएगा। पाँच हाथ दूर खड़े अपने बच्चे का चेहरा तो तुम पहचान नहीं पाते, फिर पचास हाथ दूर की मंज़िल के भीतर कैसे देख लेते हो?

अगर मैं डॉक्टर की बात करूँ तो तुम उसे अनुभवहीन कह कर ढोल पीटने लगते हो। आँखों के डॉक्टर के साथ-साथ दूसरे डॉक्टरों के बारे में भी गलत-सलत बोलने लगते हो। कहते हो- डॉक्टरों को मरीज़ों की ज़रा भी परवाह नहीं। वे अपने वार्ड की नई-नई नर्सों के पीछे घूमते रहते हैं। इधर मरीज़ बिस्तर पर आख़िरी साँसें गिन रहा होता है और उधर डॉक्टर किसी कोने में खड़े होकर मोटी-ताज़ी नर्स से गुनगुना रहे होते हैं- “तुम्हारे लिए मैं आसमान के तारे तोड़ लाऊँगा।”

लगता है तुम अस्पताल में कई दिन रहे हो, क्योंकि यह सब ऐसे विश्वास से बताते हो मानो रोज़ वहीं चक्कर लगाते रहे हो।

तुम्हारी बातों के अनुसार डॉक्टर अस्पताल की दवाइयाँ बेच देते हैं, गरीबों को मिलने वाले मुफ़्त नमूने भी पैसे लेकर बेचते हैं, अपनी निजी प्रैक्टिस के पीछे पागल रहते हैं और जिस घर में मरीज़ देखने जाते हैं, वहाँ की बहू-बेटियों पर भी नज़र रखते हैं।

एक बार डॉक्टर तुम्हारे घर भी आया था। तुम्हारी पत्नी बीमार थी। घर में अठारह बरस की जवान बेटी कम्मो भी थी। अब सच-सच बताओ- क्या डॉक्टर ने कम्मो के साथ कोई ऐसी-वैसी हरकत की थी? अगर की थी तो तुमने मोहल्ले वालों को क्यों नहीं बताया? अरे, यह तो सबको बता देना चाहिए था, ताकि लोग सावधान रहते!

तुम्हें याद है न, जब डॉक्टर खन्ना तुम्हारे पड़ोसी पंवार के घर गया था, तब तुमने कैसी कहानी बना दी थी कि डॉक्टर ने पंवार की बेटी को फँसा लिया है। पंवार की पत्नी की नब्ज़ देखने के बजाय उसकी बेटी से इश्क़ लड़ाता है। पर्ची लिखते समय मन ही मन गाता रहता है- “आओ गौरी, तुम्हें आसमान की सैर कराऊँ।” इसी प्रेम में डूबकर उसने गलत इंजेक्शन लिख दिया और बेचारा पंवार विधुर हो गया। जब लोग पूछते कि तुम्हें शर्म नहीं आती ऐसी बातें करते हुए, तब तुम अपने पीले दाँत निकालकर हँसते और कहते- “मैं झूठ नहीं बोलता, अपनी आँखों से देखा है, भगवान की कसम!”

भगवान की कसम सुनकर लोग तुम्हारी उम्र का लिहाज़ कर जाते हैं। वैसे तुम्हारी कोई उम्र भी कहाँ है? बच्चों के बीच बच्चे, जवानों के बीच जवान और बूढ़ों के बीच बूढ़े बन जाते हो। बूढ़ियों को तुम्हारी बातें बड़ी अच्छी लगती हैं। उन्हें भी यह चस्का लग चुका है। एक मरीज़ को दूसरे मरीज़ की बीमारी सुनने में मज़ा आता ही है।

तुम्हारा यह धंधा 'गिव एंड टेक' की फिलोसफी पर चलता है। तुम दूसरों के घरों की गुप्त बातें सुनाते हो, वे रस लेकर सुनते हैं। फिर जब वे अपनी बातें शुरू करते हैं तो तुम भी उतने ही चाव से सुनते हो। जिन लोगों की ज़िंदगी तुम खोद-खोदकर सुनाते हो, वे खुद अपने बारे में भी उतना नहीं जानते जितना तुम बता देते हो।

हाँ, एक बात और! तुम हमेशा उन्हीं लोगों की बुराई करते हो जो उस समय वहाँ मौजूद नहीं होते। लेकिन अगर संयोग से वही आदमी सामने आ जाए तो तुम्हारी ज़ुबान पर ताला लग जाता है।

याद है गिरधारी? चालीस साल की उम्र में उसने बीस साल की लड़की से शादी की थी। तुमने कैसी कहानी गढ़ दी थी कि भगतिया उसके घर आता-जाता था, उसी ने लड़की को बहका लिया, दोनों भाग गए और दूसरे ही दिन गिरधारी मर गया। फिर तुमने लंबी साँस लेकर कहा- “हे भगवान! स्त्री का चरित्र कौन जान सकता है!”

और जब कोई पूछे कि उन दोनों को जेल क्यों नहीं हुई, तो तुरंत कहते- “बस, मुझे थोड़ा-सा सबूत मिल जाए, मैं उसे बड़े घर की हवा खिला दूँ।”

लेकिन सच बताओ- अगर सचमुच कोई सबूत मिल भी जाए, तो क्या तुम पुलिस के पास जाओगे? पुलिस का नाम सुनते ही तो तुम्हारी हालत खराब हो जाती है।

याद करो युद्ध के दिनों की बात। तुमने अफ़वाह फैलाई थी कि शकूर के घर पाकिस्तानी जासूस रहता है, उसके घर में ट्रांसमीटर है और रात को छत पर बैटरी की रोशनी जलती है। यह कहानी सुनाकर लौट रहे थे कि सादे कपड़ों में एक आदमी तुम्हारे सामने आ गया। उसने जेब से पहचान-पत्र निकाला। बस, तुम्हारे तो प्राण सूख गए। पसीना छूट गया। हाथ जोड़कर गलती मान ली और कसम खाई कि आगे से ऐसी बातें नहीं करोगे। उसने गुस्से में लात मारकर कहा- “दफ़ा हो जा!” खुफ़िया पुलिस की वह लात खाने के बाद तुमने देशद्रोह वाली बातें करना छोड़ दिया।

अब तुम्हें देश की बड़ी-बड़ी समस्याओं पर बोलने में डर लगता है। कहीं फँस न जाओ। इसलिए अब तुम्हारी रुचि सिर्फ़ मसालेदार बातों में है- प्रेम-प्रसंग, औरत-मर्द के किस्से, घर-परिवार की गुप्त बातें। इन्हें सुनाने में भी मज़ा आता है और सुनने वालों को भी। दूसरों की निजी ज़िंदगी में झाँकने की बीमारी हम सबमें है, इसलिए तुम्हारे आसपास हमेशा भीड़ लगी रहती है।

आजकल तुम्हारी कृपा महावीर पर है। तुम कहते फिरते हो कि उसने अपने घर में एक पंजाबी औरत रख ली है। लेकिन लोगों का कहना है कि असली वजह यह है कि महावीर तुम्हारी बेटी कम्मो को देखकर गाना गाता है, सीटी बजाता है और तुम्हारे घर के चक्कर लगाता है। तुमने कम्मो को समझाया- “बेटी, दुनिया बड़ी खराब है।” लेकिन उसने तुम्हारी एक न सुनी।

फिर एक दिन वह फ़िल्म देखने गई और वापस नहीं लौटी। सारी रात तुम इंतज़ार करते रहे। देवी-देवताओं से मन्नतें माँगीं। सुबह उसके नाम की एक चिट्ठी मिली। उसमें महावीर का भी संदेश था।

पूरा पत्र पढ़ने से पहले ही तुम्हारी आँखों के आगे अँधेरा छा गया और तुम बेहोश होकर गिर पड़े। घरवालों ने डॉक्टर बुलाया। डॉक्टर ने कहा- दिल की धड़कन रुकने से मौत हुई।

अगर तुम ज़िंदा होते तो ज़रूर कहते- “मौत दिल की घड़कन रुकने से नहीं हुई, डॉक्टर की लापरवाही से हुई। मैं तो आख़िरी साँसें ले रहा था और डॉक्टर किसी कोने में नर्स के साथ हँसी-मज़ाक कर रहा था।”

लेकिन आज यह सब कहने के लिए तुम हो ही कहाँ?

नहीं, यह भी सच नहीं। तुम तो आज भी हो। एक तुम जाते हो तो तुम्हारी जगह कई और पैदा हो जाते हैं। मुझे तो लगता है कि तुम कभी मरते ही नहीं। बार-बार मरकर भी जी उठते हो। कीचक तो एक बार मरा था, लेकिन तुम…?

अब मैं क्या कहूँ? तुम ही बताओ- तुम कब मरोगे?

नाराज़ मत होना। बस इतना बता दो- तुम कब मरोगे?

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14 अप्रैल, 2026

ना कहना हमने नहीं सीखा/ डॉ. नीरज दइया

इस संसार में जीना भी एक कला है, और इस कला का पहला नियम है—“ना” शब्द को शब्दकोश से बाहर निकाल देना। क्योंकि “ना” में जितनी ताकत होती है, उतना ही खतरा भी छिपा रहता है। कौन कब नाराज हो जाए, कौन कब किस रूप में सामने आ जाए- यह कोई नहीं जानता। इसलिए समझदार लोग “ना” कहना सीखते ही नहीं, और जो सीख लेते हैं, वे जीवन की दौड़ में अक्सर पिछड़ जाते हैं।

आज का जमाना “हां” का जमाना है। यहां “हां” कहना केवल सहमति नहीं, बल्कि एक रणनीति है- एक निवेश है भविष्य के लिए। आप किसी से कहिए, “भाई साहब, यह काम हो जाएगा?” सामने से उत्तर आएगा- “अरे क्यों नहीं! हो जाएगा, आप तो बस समझिए... हो ही गया।” इस “हो जाएगा” में इतनी मिठास होती है कि सुनने वाला अपने सारे दुख भूल जाता है। अब काम हुआ या नहीं, यह बाद की बात है।

मान लीजिए आपको अपने बच्चे का एडमिशन किसी अच्छे स्कूल में कराना है। आप किसी “जाने-माने” व्यक्ति के पास जाते हैं। वह मुस्कुराते हुए कहता है, “आप तो अपने आदमी हैं, एडमिशन क्या, प्रिंसिपल को फोन करके अभी बात कर देता हूं।” आप खुशी-खुशी घर लौटते हैं। एक हफ्ता बीतता है, फिर दो, फिर एक महीना। जब आप फिर पूछते हैं, तो जवाब मिलता है, “अरे, वो प्रिंसिपल छुट्टी पर था, अब आया है, हो जाएगा।” और यह “हो जाएगा” महीनों तक चलता रहता है। अंत में जब आप खुद जाकर एडमिशन करवा लेते हैं, तब वही सज्जन कहते हैं- “देखा, मैंने कहा था ना, हो जाएगा! करवा दिया है।”

अब आप सोच में पड़ जाते हैं कि काम हुआ किससे, आपकी कोशिश से या उनकी “हां” से?

इसी तरह ट्रांसफर का मामला ले लीजिए। सरकारी दफ्तरों में यह एक ऐसा खेल है जिसमें “ना” शब्द का कोई अस्तित्व नहीं होता। आप किसी नेता जी के पास जाते हैं, और निवेदन करते हैं- “सर, मेरा ट्रांसफर गृह जिले में करवा दीजिए।” नेता जी तुरंत कहेंगे, “हो जाएगा, आप तो अपने हैं।” फिर वह आपके सामने फोन उठाकर किसी अधिकारी को कॉल करने का अभिनय करेंगे- “हाँ भाई, देखना इनका काम हो जाए।” आप भावुक हो जाते हैं, लगता है जैसे आपका जीवन बदलने वाला है। फिर शुरू होता है इंतजार का असली खेल।

एक महीना, दो महीना, छह महीना- आप फोन करते हैं, पहले तो वे उठाएंगे नहीं। अगर उठा लिया तो जवाब मिलता है- “फाइल चल रही है, ऊपर से अप्रूवल आना है, थोड़ा समय लगेगा।” और अगर किसी दिन अचानक आपका ट्रांसफर हो जाता है, तो नेता जी का पहला वाक्य होगा- “देखा, मैंने कहा था ना, हो जाएगा!”

यह “हां” का जादू इतना प्रभावशाली है कि आदमी सच्चाई जानकर भी कुछ नहीं कह पाता।

बड़े लोगों की दुनिया में “हां” एक मुद्रा है। जितनी ज्यादा “हां”, उतनी ज्यादा कीमत और वोट, पक्षधरता। मंत्री जी से लेकर छोटे-मोटे कार्यकर्ता तक, सभी इस कला में निपुण होते हैं। कोई उनसे कहे- “सर, सड़क बनवा दीजिए” तो जवाब मिलेगा- “अवश्य, बन जाएगी।” कोई कहे- “बिजली की समस्या है” तो उत्तर होगा- “हल हो जाएगी।” और अगर कोई थोड़ा साहस करके पूछ ले- “कब?” तो तुरंत उत्तर मिलेगा- “बहुत जल्द।” आपको इंतजार में लगना होता है, नेता जी नहीं तो समय आपका काम एक दिन करता है और श्रेय मिलता है नेता जी को, यह जरूरी भी है क्योंकि समय तो अबोला होता है। “बहुत जल्द” एक ऐसा समय है जो कभी आता नहीं, लेकिन उम्मीद को जिंदा रखता है।

कुछ लोग तो इस “हां” को व्यवसाय बना लेते हैं। वे हर काम के लिए “हां” कहते हैं, और साथ में थोड़ा “प्रोसेसिंग फीस” भी ले लेते हैं। आप उनसे कहें- “मेरा काम जल्दी करवा दीजिए” तो वे कहेंगे- “बस थोड़ा खर्चा आएगा, बाकी काम मेरा।” आप उनकी मनमानी रकम दे देते हैं, और फिर वही पुरानी कहानी- “काम हो जाएगा।” यदि आप धैर्यवान हैं तो एक न एक दिन काम हो जाता है। अगर काम हो गया तो वह उनका श्रेय, और अगर नहीं हुआ तो “ऊपर से अटक गया”।

इस पूरे खेल में सबसे दिलचस्प बात यह है कि “ना” कहने वाला व्यक्ति समाज में असफल माना जाता है। अगर कोई साफ-साफ कह दे- “भाई, यह काम मेरे बस का नहीं है” तो लोग उसे नकारा समझ लेते हैं। लेकिन जो व्यक्ति हर बात पर “हां” कहता है, भले ही कुछ भी न करे, वह “जुगाड़ू” और “प्रभावशाली” कहलाता है।

हमारा समाज भी इस आदत को बढ़ावा देता है। हमें सच्चाई से ज्यादा उम्मीद पसंद है, भले ही वह झूठी क्यों न हो। हमें “ना” सुनने की आदत नहीं है, इसलिए हम “हां” सुनने वालों के पीछे भागते रहते हैं।

कभी-कभी तो यह स्थिति हास्यास्पद हो जाती है। एक व्यक्ति दस लोगों से एक ही काम के लिए “हां” सुनता है, और अंत में काम किसी ग्यारहवें व्यक्ति से हो जाता है। लेकिन श्रेय लेने के लिए सभी दस लोग तैयार रहते हैं- “मैंने कहा था ना, हो जाएगा!”

इस “हां” की संस्कृति ने हमें एक अजीब मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां काम से ज्यादा उसका श्रेय महत्त्वपूर्ण हो गया है। लोग काम करने से ज्यादा “काम करवा देने” का दावा करते हैं।

अंततः सवाल यह उठता है कि क्या सच में “ना” कहना इतना खतरनाक है? या हमने इसे बिना वजह ही डर का विषय बना लिया है? शायद सच्चाई यह है कि “ना” कहना साहस मांगता है, और “हां” कहना सुविधा देता है। “ना” कहने से रिश्ते टूट सकते हैं, लेकिन “हाँ” कहने से उम्मीदें बनती रहती हैं—यद्यपि अगर वे कभी पूरी न हों। और इसलिए, हमने “ना” कहना नहीं सीखा। क्योंकि इस दुनिया में जीने के लिए सच से ज्यादा जरूरी है- उम्मीद, और उम्मीद का दूसरा नाम है—“हां, हो जाएगा।” और अगर यह कहने वाला अपना परिचित खास मित्र है, तो वह आपसे पैसे ले भी नहीं सकता और बिना पैसों के कोई काम वह करने वाला भी नहीं है। इसलिए लगातार आपको हां-हां सुनना पड़ेगा, सुनने को मिलेगा लेकिन काम आपका नहीं होगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई है, इससे संबंधों की ऊर्जा, ऊष्मा समाप्त होने को है।

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26 दिसंबर, 2025

पुरस्कार में चड्डी/ नीरज दइया

हमारे समय की सबसे बड़ी सांस्कृतिक उपलब्धि यह है कि अब पुरस्कार मान-सम्मान नहीं, वे सिर्फ एक दैनिक, मासिक, त्रैमासिक पहचान-पत्र बन चुके हैं। पहचान-पत्र भी ऐसे कि बिना नवीनीकरण के यहां लगने लगा है कि उसके बिना आदमी साहित्यिक नागरिक ही नहीं माना जाएगा। इन दिनों पुरस्कारों की ऐसी भरमार है कि जिधर देखो, उधर पुरस्कार ही पुरस्कार दिखाई देते हैं और पतंगों की तरह उनको लूटने वालो की दौड़, छीना छपट्टी। पुरस्कार देने वाले स्वयं वीआईपी हो गए हैं, और लेने वालों की स्थिति ऐसी है मानो पुरस्कार नहीं, कोई दुम मिल गई हो। जैसे कुत्ता अपने इलाके में पूंछ उठाकर चलता है, वैसे ही पुरस्कारधारी अपने-अपने सम्मान उठाए घूमते हैं। कोई अगर गलती से उसे न देखे, या कम तवज्जो दे दे, तो तुरंत नाराजगी प्रकट होती है। हरेक पुरस्कार के लिए बहुत बहुत बधाई लिखते लिखते मैं परेशान हो गया हूं। लबें समय से मेरा सारा समय मित्रों को बहुत बहुत बधाई देने में ही निकल गया है और मुझे लगने लगा है कि मैं ही सबको यह देता रहूंगा क्या? 

कुछ दिन पहले मैं एक साहित्यिक कार्यक्रम में मंच संचालन कर रहा था। एक साहित्यकार को आमंत्रित करना था। आमंत्रण से पहले उन्होंने एक पूरा पन्ना भेज दिया, जिसमें उनके अब तक प्राप्त सभी पुरस्कारों की सूची थी। निर्देश साफ था कि पहले सारे पुरस्कार बताए जाएं, फिर ससम्मान नाम लिया जाए। लोगों को पता चलना चाहिए कि मैं कितना बड़ा सम्मानित लेखक हूं। अब कार्यक्रम की भी अपनी एक गरिमा और समय-सीमा होती है। मैंने सोचा, दो-तीन प्रमुख पुरस्कारों का उल्लेख पर्याप्त होगा। मेरा ऐसा विचार विवेक दिखाना मुसीबत बन गया। समस्या खड़ी हो गई। महोदय मंच पर आए ही नहीं। मंच के नीचे से ही टिप्पणी आई- “यह तो मेरे पुरस्कारों का बीस प्रतिशत भी नहीं है। कम से कम अस्सी प्रतिशत तो बताइए। नहीं तो सौ प्रतिशत बताइए। दस-बीस प्रतिशत परिचय से क्या होगा? आपको सब कुछ लिख कर देने के बाद यह हालत है कमाल है बंधु।”

क्षण भर के लिए मुझे लगा कि मैं साहित्यिक कार्यक्रम नहीं, किसी शेयर बाजार का उद्घाटन कर रहा हूं, जहां लेखक का मूल्य उसकी पुरस्कार-सूची से तय हो रहा है।

आज स्थिति यह है कि जिनके पास संस्थाएं हैं, जिनके हाथ में पुरस्कार हैं, उनका साहित्यिक कद स्वतः बढ़ गया है। उनकी किताबें अचानक पठनीय हो जाती हैं। लोग उन पर लेख लिखने लगते हैं। वे गोष्ठियों, सभाओं, सेमिनारों में विशेष आमंत्रित होने लगते हैं। उन्हें चाय, पान, भोजन और प्रशंसा सब कुछ उपलब्ध होता है। यहां तक कि शादी-ब्याह में भी “विशिष्ट अतिथि” के रूप में बुला लिए जाते हैं। साहित्य पीछे छूट जाता है, सम्मान आगे चलने लगता है।

यह सब देखकर मैं एक विचित्र मानसिक स्थिति में पहुंच गया। थोड़ा आक्रोश, थोड़ा दुख और काफी निराशा। तब मैंने गंभीरता से सोचना शुरू किया कि अगर पूरा साहित्यिक संसार पुरस्कारों के सहारे चल रहा है, तो मुझे भी कोई नया पुरस्कार शुरू करना चाहिए। कुछ खास मित्रों से विचार-विमर्श हुआ। अंततः तय हुआ कि हम ऐसा पुरस्कार देंगे, जो अब तक किसी ने नहीं दिया।

मैंने देखा कि अनेक बड़े-बड़े पुरस्कार प्राप्त कर चुके लेखक भी जब बोलते हैं, तो ज्ञान कम और उनका नंगापन ज्यादा दिखाई देता है। शब्दों में विचार अथवा तथ्य नहीं, केवल आत्मप्रदर्शन होता है। तब समझ में आया कि समस्या पुरस्कार की नहीं, नंगाई की है। और नंगाई को ढकने के लिए हमने समाधान खोज लिया- पुरस्कार में चड्डी।

यह चड्डी साहित्यिक जरूरत के अनुसार दी जाएगी। अलग-अलग वर्गों में। अभिषेक चड्डी, जांगिया चड्डी, अंडरवियर चड्डी, डबल-साइड चड्डी। विभिन्न विधाओं के लिए अलग-अलग रंग तय होंगे। कविता के लिए लाल चड्डी। कहानी के लिए पीली, जो दोनों लिखते हैं उनके लिए लाल-पीली चड्डियां नाप लेकर बनवाओ। आलोचना के लिए थोड़ी मोटी और महंगी चड्डी। महिला साहित्यकारों के लिए अलग डिजाइन और वरिष्ठों के लिए अलग क्वालिटी की रहेगी।

यदि किसी विशेष वर्ग, समुदाय या अल्पसंख्यक को सम्मानित करना हो, तो उसके लिए भी चड्डी के रंग और साइज निर्धारित होंगे। युवा साहित्यकारों को छोटी चड्डी दी जाएगी और वरिष्ठों को बड़ी। जिनकी नंगाई अधिक ढीली हो, उनके लिए गेट-टाइट चड्डी की व्यवस्था रहेगी। वितरण के लिए एक चयन समिति बनेगी, ताकि कोई भी नंगापन बिना ढके मंच पर न आए।

इस तरह ‘चड्डी पुरस्कार’ की पूरी योजना तैयार की गई। नियम बनाए गए। मेरा और मेरे मित्रों का उद्देश्य साफ है- साहित्य में फैली नंगाई को ढकना। क्योंकि आज के समय में सच्चाई को नहीं, छवि को बचाने की जरूरत है। और छवि सबसे अच्छे ढंग से पुरस्कार की चड्डी से ही ढकी जा सकती है।

अब उम्मीद है कि साहित्यिक मंच पहले से ज्यादा सभ्य, सुरक्षित और सम्मानित दिखाई देंगे। चड्डी को पुरस्कृत जन पहन कर गुड फील करेंगे। इससे साहित्य और साहित्यकार दोनों का विकास होगा। भले भीतर जो हो, वह अलग बात है। नंगाई को ढकने के लिए देखना सब मुझे और मेरे मित्रों को भी सम्मानित करेंगे। हमारी वेल्यू बढ़ जाएगी और चड्डियों को पुरस्कार में पाने के लिए लेखक रुपये और डॉलर लेकर हमारे पीछे दौड़ते नजर आएंगे। फिर हम देश विदेश तक अपनी अलग अलग ब्रांच खोलेंगे... उसके बाद? उसके बाद राजा प्रजा कोई पुरस्कृत नहीं रहेगा। लोग पुरस्कार के मोह से मुक्त हो जाएंगे और आगे कुछ नहीं... एक बच्चा मंच पर आएगा और कहेगा- राजा नंगा है। 

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12 नवंबर, 2025

पांच कविताएं/ डॉ. नीरज दइया

भुलावा

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आगे प्रेम 

पीछे प्रेम 

इस यात्रा के बीच 

जिंदगी - एक भुलावा ।


हाथ बढ़ाते हैं 

जिन्हें छूने के लिए 

वो हर बार 

खिसक जाते हैं चुपचाप ।


मंजिल पास लगती है 

फिर भी 

रह जाती हैं- दूरियां...


आगे प्रेम 

पीछे प्रेम 

बीच में हम-

बस प्रेम-मार्गी।

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ढाई आखर

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प्रेम को जानना 

यानी पढ़ लेना 

ढाई आखर-

और बन जाना पंडित।


पर जानना ही 

तो अंत है, 

और मुझे नहीं चाहिए 

प्रेम का अंत।


इसलिए हर बार 

कह देता हूं-

मुझे समझ नहीं आए 

ढाई आखर, 

तुम रचते रहो 

मैं बांचता रहूं


अनजान अनाम सही 

प्रेम में बना रहूं...

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प्रेम चाहिए... हर जगह

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मैंने कहा-

प्रेम चाहिए पृथ्वी पर। 

भूलभुलैया बन गए हैं रास्ते, 

हृदयों में उग आए हैं कांटे,

मनुष्यता सिसक रही है, 

प्रेम चाहिए... हर जगह।


देवता प्रेम के हुए प्रसन्न, 

बोले-

'प्रेम भेज रहा हूं, 

कहां भेजूं इस पृथ्वी पर ?'


मैंने कहा-

मेरी पृथ्वी की अपनी सीमाएं हैं,

नक्शों में बंटी, भाषाओं में बंधी, 

धर्म, जाति, रंग की दीवारों से 

घिरी हुई है सारी दुनिया।


मगर नहीं हैं सीमाएं प्रेम की 

वह उगता है सूरज-सा, 

बरसता है बादलों-सा, 

बहता है नदियों-सा 

एक छोर से दूसरे तक


जहां जरूरत हो, 

पहुंच जाता है वह।


तो कैसे कहूं 

किस पते पर भेजो प्रेम? 

किस नगर, किस जाति, किस धर्म के नाम 

मांगूं मैं उसे?


नहीं, 

प्रेम चाहिए हर एक कण में, 

हर जीव, हर जड़, हर चेतन में।

जन-जन के मन में, 

श्वास-श्वास में हो प्रेम।


संबंधों में ही नहीं, 

विचारों में, 

नीतियों में, 

भाषाओं और पाठ्यक्रमों में 

और सबसे जरूरी, 

बच्चों की आंखों में हो प्रेम।


देवता मौन रहे 

और मैं भी। 

मौन में ही कुछ उत्तर था 

शायद प्रेम अब भेजा जा चुका है।

हवाओं में घुल चुका है वह।


क्योंकि प्रेम अब पृथ्वी पर है-

और वह जीवित रहेगा 

केवल तब तक, 

जब तक हम प्रेम होंगे।

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सांस-सांस गाती है...

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'झीनी-झीनी चदरिया', 

ओढ़ रखी है मैंने भी 

तुम्हारे नाम की।


मेरी सांस-सांस 

गाती है दिन-रात।


भीतर-बाहर आती-जाती

गुनगुनाती है हवा 

बस एक ही आलाप....।

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कौन तय करता है

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कोई हल्की सी चिंगारी 

कमाल की रोशनी बन सकती है

यह भी हो सकता है-

हो जाए उदय के साथ-

अचानक उसका अंत। 

कौन तय करता है ?


जरा सी सहानुभूति 

बदल जाए प्रेम में 

या उसे स्वार्थ समझ 

भूलने के कुचक्र में 

रखा जाएगा- रौंदने के लिए 

कौन तय करता है ?


घने अंधकार के बीच 

सब कुछ भूल कर खुलती-

जैसे ही आँख 

जग जाती - स्मृति 

पेड़ की शाखाओं की तरह

सज जाता है 

भीतर हरा-भरा संसार... 

कौन तय करता है ?

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डॉ. नीरज दइया

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‘प्रभात खबर’ के दीपावली विशेषांक 2025 में