01 दिसंबर, 2021

श्री जितेंद्र निर्मोही अर श्याम शर्मा जी खातर मोकळी मोकळी बधाई

आदरजोग श्री जितेंद्र निर्मोही अर श्याम शर्मा जी काल बीकानेर पधारिया तो बां सूं मानजोग श्री बुलाकी शर्मा, श्री राजेंद्र जोशी अर डॉ. प्रशांत बिस्सा जी रै भेळप मांय लांबी हथाई रो जोग बण्यो। साहित्यिक चरचा पछै जितेंद्र जी अर श्यामा जी नै ‘सांवर दइया की चयनित राजस्थानी कविताएं’ अर ‘अंतरंग’ पत्रिका रो राजस्थानी कहाणी विशेषांक भेंट करियो। यादगार मुलाकात-चरचा, भळै-भळै निर्मोही जी नै श्री नानूराम संस्कर्ता सम्मान खातर मोकळी मोकळी बधाई अर मंगळकामनावां।

महत्त्वपूर्ण कवि डॉ. असंगघोष जी का बीकानेर में नेगचार संस्था द्वारा स्वागत-सम्मान....

हिंदी दलित साहित्‍य के महत्त्वपूर्ण कवि डॉ. असंगघोष का नेगचार संस्था द्वारा सम्मान किया गया। भोपाल से पधारे कवि का सम्मान शॉल ओढाकर एवं पुस्तकें भेंट कर किया गया।
    लालगढ़ पैलेस में आज आयोजित इस सम्मान कार्यक्रम के अध्यक्ष साहित्यकार बुलाकी शर्मा ने कहा कि असंगघोष कवि के रूप में जाना पहचाना नाम है और इनकी कविताओं में दलित समाज के साथ बदलते भारतीय समाज के सुंदर चित्र देखे जा सकते हैं। यह उल्लेखनीय है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के लंबे सफर में अपनी व्यस्तताओं में भी कविता और कला माध्यमों के लिए उन्होंने अपनी संवेदनाओं को बचाए रखा है।   
    मुख्य अतिथि कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया कहा कि असंगघोष जी की कविताओं में जिस सहजता-सरलता के साथ मन को छूने वाली संवेदनाओं का वर्णन मिलता है वह दलित कविता धारा में ही नहीं वरन समकालीन कविता में महत्त्वपूर्ण है। आपके कविता संग्रह- खामोश नहीं हूँ मैं, हम गवाही देंगे, मैं दूँगा माकूल जवाब, समय को इतिहास लिखने दो, ईश्‍वर की मौत, हत्‍यारे फिर आएँगे आदि की चयनित कविताओं का संचयन-संपादन सुधीर सक्सेना द्वारा किया गया है, जिसे पढ़कर उनको समग्रता में जाना जा सकता है। दइया ने बताया कि असंगघोष का जन्म मध्य प्रदेश के जावद नामक छोटे से कस्‍बे में दलित परिवार में हुआ था किंतु लंबे संघर्ष के बाद आपने अनेक कीर्तिमान स्थापित किए हैं। दलित साहित्य को साहित्य की मुख्य धारा के रूप में चर्चा में लाने का श्रेय जिन कवियों को दिया जाता है उनमें उनका नाम प्रमुख है।
     कॉलेज प्राचार्य एवं प्रकाशक डॉ. प्रशांत बिस्सा ने कहा कि असंगघोष प्रशासनिक सेवा में रहते हुए भी साहित्य के प्रति समर्पित हैं। कवि के साथ साथ वे बेहतरीन फोटोग्राफर और पर्यावरण चिंतक हैं । । पक्षियों के प्रति उनका विशेष मोह है और वे देश के विभिन्न अंचलों में घूमकर उनके  संरक्षण के लिए सतत सक्रिय हैं । पक्षी विषयक आपका शोध कार्य जल्द ही प्रकाश में आएगा तो इस क्षेत्र को एक नई दिशा मिलेगी।
    मरुनगरी में  सम्मानित करने के प्रति आभार प्रदर्शित करते हुए कवि असंगघोष  ने कहा कि वे मालवा के निवासी हैं और मालवा और राजस्थानी दोनों भाषाएं बहुत करीब की भाषाएं है । इनमें साझा संस्कृति के साथ विपुल शब्द भंडार की परंपरा है। उन्होंने कहा कि भाषा और संस्कृति के विकास के लिए सरकारों को पर्याप्त ध्यान देना चाहिए। इस अवसर पर उन्होंने अपनी कुछ चुनिंदा कविताओं का भी प्रभावी पाठ किया। श्रीमती असंगघोष ने आभार व्यक्त किया। 
23 नवम्बर 2021

 

06 नवंबर, 2021

भारतीय साहित्य के निरमाता : ऊमरदान लाळस / गजेसिंह राजपुरोहित

डॉ. नीरज दइया

साहित्य अकादेमी द्वारा राजस्थानी कवि ऊमरदान लालस (1854-1903) के जीवन और साहित्य-यात्रा को लेकर मूल राजस्थानी भाषा में लिखित कवि-आलोचक डॉ. गजेसिंह राजपुरोहित का विनिबंध प्रकाशित हुआ है। साहित्य अकादेमी की सराहना इसलिए भी की जानी चाहिए कि एक तो वह बहुत कम कीमत में ऐसे प्रकाशनों को उपलब्ध कराती रही है और दूसरे भारतीय साहित्य निर्माता सीरीज में प्रकाशित विनिबंधों का वह भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी प्रकाशित करती है। प्रस्तुत विनिबंध में विद्वान लेखक डॉ. गजेसिंह राजपुरोहित ने कवि ऊमरदान लालस से संबंधित ‘ऊमर काव्य’ (संपादक- जगदीशसिंह गहलोत) और ‘ऊमरादान ग्रंथावली’ (संपादक- डॉ. शक्तिदान कविया) को आधार ग्रंथ बनाते हुए अनेक नई अवधारणाओं और शोध निकषों की सम्यक विवेचना की है।
कृति में राजस्थानी कविता के अध्येयता और आलोचकों की टिप्पणियों के साथ आधुनिक कविता के विविध आयामों के साथ उसके आरंभ को स्पष्ट करते हुए कवि ऊमरदान जी का कविता परंपरा-विकास में स्थान निर्धारित करने का महत्त्वपूर्व कार्य भी किया गया है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि 1857 से पहले और बाद में सक्रिय विभिन्न कवियों को क्षेत्रवार विवेचना के साथ उनकी मूल काव्य-प्रवृतियों को भी रेखांकित किया गया है। कवि ऊमरदान लालस के जीवन परिचय को उपलब्ध साक्ष्यों के साथ प्रस्तुत करते हुए विद्वान लेखक राजपुरोहित ने कवि की संपूर्ण साहित्यिक यात्रा की रचनात्मकता के मुख्य बिंदुओं को विभिन्न काव्यांशों को प्रस्तुत करते हुए विशद ढंग से प्रस्तुत किया है। प्रस्तुत विवेचना में कवि के भाव पक्ष और केंद्रीय धारा की तलाश करते हुए कला पक्ष का भी एक अध्यय पृथक प्रस्तुत किया है। प्रस्तुत विनिबंध की एक अन्य रेखांकित किए जाने योग्य विशेषता कवि ऊमरदान लालल के जीवन प्रसंगों के विभिन्न संस्मरणों का एक अलग से अध्याय है। इसमें अनेक रोचक प्रसंगों के हवाले पाठक कवि ऊमरदान जी की अनेक विशेषताओं से रू-ब-रू होते हैं।
आज जब हम हमारे समकालीन रचनाकारों के विषय में भी पर्याप्त और पूरी जानकारी के अभाव में उनका मूल्यांकन नहीं कर पाते हैं, ऐसे समय में आधुनिक काल के आरंभिक कवियों अथवा कहें कि मध्यकाल और आधुनिक काल के संधिकाल के कवियों पर अकादेमी द्वारा ऐसे प्रयास निसंदेह उल्लेखनीय हैं। भाई डॉ. गजेसिंह राजपुरोहित को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं।

05 नवंबर, 2021

भारतीय साहित्य के निर्माता : श्रीलाल शुक्ल / प्रेम जनमेजय

साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल की प्रसिद्धि विशेष रूप से उनके उपन्यास “राग दरबारी” के कारण मानी जाती है, किंतु इस सत्य के मूल्यांकन का एक विकल्प प्रेम जनमेजय द्वारा साहित्य अकादमी के लिए लिखित विनिबंध “श्रीलाल शुक्ल” है। साहित्य अकादेमी और भारतीय ज्ञानपीठ से सम्मानित श्रीलाल शुक्ल (1925-2011) ने विपुल साहित्य सृजन किया और उनके कार्यों का व्यापक मूल्यांकन भी हुआ। अनेक साक्षात्कारों में उन्होंने अपने साहित्य से जुड़े और इतर प्रसंगों पर बेबाकी से अपनी बात भी रखी है। प्रेम जनमेजय अपने आरंभिक लेखन काल से ही शुक्ल जी से जुड़े और आखरी समय तक जुड़े रहे हैं। जनमेजय जी के उनसे अंतरंग लंबे संपर्क का ही प्रतिफल है कि प्रस्तुत विनिबंध में हम बहुत व्यवस्थित रूप से शुक्ल जी के व्यक्तित्व और कृतित्व को न केवल व्यापकता के साथ जान पाते हैं वरन महसूस भी कर पाते हैं कि कैसे वे उच्च कोटि के  लेखक होने के साथ-साथ उन्मुक्त भाव से अपनी बात रखने वाले स्नेहिल व्यक्ति भी थे।
    श्रीलाल शुक्ल जी को भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने के समाचार का शीर्षक “उम्र के इस पड़ाव पर खास रोमांचित नहीं करता पुरस्कार- श्रीलाल” पढ़कर प्रेम जनमेजय जी का मन तत्काल फोन करने का हुआ किंतु वे यह सोचकर रुक गए कि उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है। किंतु वे अधिकर देर नहीं रुक सके और उनसे उनका संवाद हुआ, परिणाम श्रीलाल शुक्ल जी ने रोमांच नहीं होने के विषय में कहा- “ऐसा नहीं प्रेम जी, ऐसे पुरस्कारों से संतोष अवश्य होता है। इस उम्र में अक्सर साहित्यकारों को उपेक्षित कर दिया जाता है। यह पुरस्कार संतोष देता है कि मैं उपेक्षित नहीं हूं।’ यह उनका प्रेमजी से अंतिम संवाद था। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि प्रेम जनमेजय जी ने पूरी ईमानदारी से प्रस्तुत विनिबंध में अनेक स्थलों पर सप्रमाण अपनी बात कहने का प्रयास किया है। पुस्तक का आरंभ ‘आरंभ’ शीर्षक के आलेख से होता है जिसमें एक युवा लेखक का अपने वरिष्ठ रचनाकार के प्रति सम्मान है वहीं विभिन्न कथनों के आलोक में श्रीलाल शुक्ल के लेखक मन की पड़ताल भी है। ‘जीवन यात्र के पदचिह्न’ में जन्म से लेकर निधन तक के पूरे घटनाक्रम में श्रीलाल शुल्क के लेखक के साथ घर-परिवार-समाज के जीवन में उनके दृष्टिकोण के साथ आत्मीयता को भी रेखांकित किया गया है। इस कृति के माध्यम से हम हमारे समय के वरिष्ठ लेखक की जीवन शैली और दिनचर्या के साथ विचारधार और प्रतिबद्धता का भी अंदाजा लगा सकते हैं। इसी अध्याय को अधिक गंभीरता से ‘दृष्टिकोण’ में स्पष्ट किया गया है कि एक लेखक किस प्रकार से अपने साहित्य समाज में किन-किन और कैसे-कैसे संघर्षों के साथ आगे बढ़ता चला जाता है।
    श्रीलाल शुक्ल के प्रसिद्ध उपन्यास ‘राग दरवारी’ के पहले उनके रचनाक्रम और संघर्ष को ‘आरंभिक रचना-यात्रा’ आध्याय में रेखांकित किया गया है वहीं ‘राग दरबारी युग का रचना-समय’ में यह सिद्ध करने का उपक्रम है कि किस प्रकार एक रचना अपने पुरस्कार के बाद विचारधाराओं को परिवर्तित कर केंद्र में स्थापित हो जाती है। राग दरबारी का अपना एक युग रहा है और रहेगा, उसका भी विस्तार से विवरण और व्यंग्य-यात्रा के अंक का उल्लेख द्वारा प्रेम जनमेजय जी के हवाले उपन्यास विषयक अनेक नवीन तथ्य और जानकारियां यहां है। विनिबंध में न केवल राग दरबारी वरन श्रीलाल शुक्ल जी के समग्र उपन्यास साहित्य का आंशिक परिचय और रचनाओं की केंद्रीय भावभूमि को स्पष्ट किया गया है। श्रीलाल शुक्ल के कहानी-संग्रहों, व्यंग्य-संग्रहों और अन्य विधाओं में उनके अवदान को विनिबंधकार ने बिंदुवार रेखांकित किया है। ‘उपसंहार’ में पूरी चर्चा को समेकित करते हुए श्रीलाल शुक्ल के भारतीय साहित्य में योगदान के विभिन्न स्तरों को उल्लेखित किया गया है। यहां विशेष बात यह भी कि हम इस कृति के माध्यम से प्रेम जनमेजय जी अपने प्रिय लेखक श्रीलाल शुक्ल के समग्र साहित्य के विशद अध्ययन का आस्वाद कराते हैं। यहां उनके व्यक्तिगत चिंतन, मनन के आलोक में तथ्यों को लेकर स्पष्टता भी प्रभावित करती है। अनेक वरिष्ठ और समकालीन लेखकों के विभिन्न कृतियों और प्रसंगों पर कथनों के माध्यम से हम जिस श्रीलाल शुक्ल लेखक की पहचान करने में सक्षम होते हैं निसंदेह वह पहचान हमारी पूर्ववर्ती पहचान को दृढ़, समृद्ध और परिपक्क्व बनाती है। किसी विनिबंध की सफलता यही होती है कि हम हमारे परिचित रचनाकार को समग्रता में जानने का अवसर प्रदान करे।

-    डॉ. नीरज दइया

15 अक्तूबर, 2021

डॉ. हरीश नवल के चश्मे से व्यंग्य को देखना / डॉ. नीरज दइया

आज हिंदी व्यंग्य को जिन गिने-चुने नामों ने पहचान दी है, उनमें एक प्रमुख नाम हरीश नवल का है। पहली पुस्तक पर आपको युवा ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलना ध्यानाकर्षकण का विषय रहा है। किंतु बाद में आपकी सतत साहित्य-साधना में भाषा का सयंमित व्यवहार विशेष उल्लेखनीय उपलब्धि है। सद्य प्रकाशित व्यंग्य कृति ‘गांधी जी का चश्मा’ के माध्यम से व्यंग्यकार हरीश नवल यह प्रमाणित करते हैं कि व्यंग्य में बहुत कम शब्दों में बहुत गहरी-गंभीर बात कही जा सकती है।
    शीर्षक व्यंग्य ‘गांधी जा चश्मा’ की बात करें तो आरंभ में लगता है कि गांधी का चश्मा जो 2.55 करोड़ रुपये में हुआ नीलाम और अमरीका के एक व्यक्ति ने खरीदा उसका कहीं कोई संदर्भ होगा। किंतु नहीं यह व्यंग्य विगत सात दशकों से दो अक्टूबर को गांधी जंयती पर होने वाले मेलों पर सधा हुआ व्यंग्य है। इसके शीर्षक और आरंभ को पढ़ते हुए कहानीकार संजीव की कहानी ‘नेता जी का चश्मा’ का स्मरण होता है, जिसमें एक बालक की देशभक्ति को बहुत सकारात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। यहां इस व्यंग्य रचना में अहिंसा नगर में जंयती समारोह आयोजन से पूर्व गांधी जी की मूर्ति जो एक बहुत बड़े शिल्पकार ने बनाई है का चश्मा गायब होने का प्रकरण है। बिना चश्मे के गांधी जी आंखें जैसे उनमें अश्रु भरे हैं, होंठ बहुत सूखे हुए हैं... तिस पर व्यंग्कार का कहना कि ‘गांधी जी के चेहरे पर चश्मे के कारण गांधी जी का पूरा चेहरा कहां दिखता था’ हमारे सारे चश्में उतार देने को पर्याप्त है। आखिर चश्मा गया कहां का रहस्य अंत में स्वयं गांधी जी के श्रीमुख से किया गया है। गांधी जी के पूरा कथन स्वयं में परिपूर्ण व्यंग्य है- ‘सुनो तुमसे ही कह सकता हूं, तुम जैसे मेरे आचरण का अनुकरण करने वाले अब मुट्ठी भर ही रह गए हैं, विगत सात दशकों से देखता आ रहा हूं कि मेरे विचारों की रोज हत्या हो रही है, जबकि मेरी हत्या केवल एक बार ही हुई, सोचता रहा, देखता रहा कि बदलती हुई सफेद, लाल, केसरी आदि टोपियों वालों में कोई तो मेरे सपनों को आरंभ करेगा लेकिन सभी एक से ही आचारण को अपनाते रहे। मेरी सोच धीरे-धीरे मरती रही। अब मुझसे देखा नहीं जाता इसलिए मैंने खुद ही अपना चश्मा उतार कर नष्ट कर दिया।’
    हरीश नवल का मानना है कि व्यंग्य की चोट दुशाले में लपेट कर मारे गए जूते जैसी होनी चाहिए। वह सीधा सपाट व्यंग्य प्रस्तुत नहीं करते, वरन कुछ पेच और घुमाव उनकी प्रवृत्ति है। स्वयं को बिना मुखर किए जब व्यंग्यकार कभी बहुत गहन-गंभीर बात प्रस्तुत करता है तो जाहिर है वह पाठकों से एक ज्ञान-स्तर की भी मांग और उम्मीद करता है। ऐसी अपेक्षा के पूरित नहीं होने पर पाठक थम जाता है और सोचने लगता है कि क्या कह दिया गया है... यह सोचने अथवा अवकाश देना हिंदी व्यंग्य में विरल है। हरीश नवल ने वर्षों अध्यापन का कार्य किया और वे साहित्य के विधिवत अध्येयता रहे हैं, अतः उनकी अनेक रचनाओं में साहित्य-इतिहास और परंपरा को बहुत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
    ‘बिल्लो रानी और ईश वंदना’ में फिल्मी गीतों के माध्यम से भावक के भावों के बदले जाने का और जहां चाह वहां राहा कि उक्ति का विस्तार है। जहां जो नहीं है वहां वह जो मनवांछित है को ढूंढ़ लेने की प्रवृति को यहां अतिरेक के साथ प्रस्तुत करते हुए हरीश नवल पाठकों को हास्य के द्वार तक ले जाते हैं, किंतु कोई खुल कर या खिलखिला कर हंसे उससे पहले ही व्यंग्य की मार से वह तिलमिलाहट से भर देते हैं। कहना होगा कि हरीश नवल के व्यंग्यकार में उनका कहानीकार अधिक मुखर होता है, तब वे अपेक्षाकृत अधिक प्रभावशाली व्यंग्य देते हैं। ‘उफ़ भईया जी चोट’, ‘जन विकास यात्रा’, ‘देश की मिट्टी और नाराद जी’ अथवा ‘प्रिय राजेन्द्र जी’ जैसे व्यंग्य इसके उदाहरण है। देश में नेताओं की मोनोपोली, धन का अपव्यय, व्यवस्था की खामिया और आधुनिक समय-समाज में घर करती संवेदनहीनता को प्रस्तुत करते हुए हरीश नवल के व्यंग्य यदि अपने पाठक में संवेदना जाग्रत करते हैं तो यह बड़ी सफलता है। आधुनिक युग में वैसे तो पाठक सर्वज्ञान है और सब कुछ जानता है, जो जानता हो उसको कुछ बताना बेहद मुश्किल काम है फिर भी व्यंग्यकार उसके जानने को बढ़ाते हुए जैसे द्विगुणित करने का मुश्किल काम बड़ी सरलता से करने का हुनर रखते हैं।
    ‘निदान नींद का’ की बात करें जो मूलतः लघुकथा के रूप में है और बड़ा मारक व्यंग्य यहां सांकेतिक है। राजा आदंदारित्य का नियम था कि वह प्रातः महामंत्री के साथ नगर का विहंगम दृश्य देखते और जहां से धुआं उठता दिखाई नहीं देता तो महामंत्री को पता करने का आदेश देता कि उस घर में अंगीठी क्यों नहीं जली। वह उसकी व्यवस्था करने का आदेश भी देते और महामंत्री इस नियम से दुखी क्योंकि वे प्रातः की नींद में कोई बाधा नहीं चाहते थे। महामंत्री ने अपने मित्र राज-वैज्ञानिक तारादत्त से निदान के रूप में धुएं रहित अंगीठी का अविष्कार करवा पर्यावरण की शुद्धता की दुहाई देते हुए राजाज्ञा प्राप्त कर वैसी अंगीठी हर घर में पहुंचा दी और अब राजा को कहां भोजन बना और कहां नहीं इसका भेद नहीं मिल पाता था। प्रतीक के माध्यम से व्यवस्था पर सुंदर कटाक्ष किया गया है, किंतु अब ऐसे राजा नहीं रहे और महामंत्री ही राजा बन गए हैं- जो जागते हुए भी गहरी नींद में ही रहते हैं। ऐसी अनेक छोटी और मध्यम आकार की रचनाओं को पढ़ते हुए अभिभूत हुआ जा सकता है, यह प्रभाव कृति और कृतिकार की विशेषता है।
    शब्दों के श्लेष और वक्रोकी के अतिरिक्त भाषा-व्यंजना के माध्यम से हरीश नवल हमारे समक्ष ऐसे व्यंग्य को प्रस्तुत करते हैं जो दूसरों से अलग और अपने अंदाज के कारण प्रभावशाली है। वैसे इस पुस्तक की यह विशेषता है कि व्यंग्य भले आकार में छोटा अथवा बड़ा हो, वह निबंध, कथा अथवा लघुकथा के रूप में हो किंतु वह सदैव अपने शिल्प, भाषा के साधा हुआ है, यहां नए विषयों की तलाश के कारण व्यंग्य प्रभावशाली है। पुस्तक के अंत में हरीश नवल के व्यंग्य अवदान को रेखांकित करता पंद्रह पृष्ठों का एक आलेख ‘व्यंग्य कमल : हरीश नवल’ बिना लेखक के नाम के दिया गया है। लेखक प्रकाशक किसी की भी भूल रही हो पर गूगल बाबा नहीं भूलते और उनके द्वारा पता चल सकता है कि यह आलेख डॉ. आरती स्मित द्वारा लिखा गया, जो ‘सेतु’ में वर्ष 2017 में प्रकाशित हुआ है। इस आलेख के अंतिम अनुच्छेदों को हटा कर पुस्तक के अंत में गांधी बाबा को चित्र में मुस्कुराते हुए दिखाया गया है। इस कृति के माध्यम से डॉ. हरीश नवल के चश्मे से समकालीन व्यंग्य को देखना बेहद सुखद है।

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पुस्तक का नाम : गांधी जी का चश्मा ; लेखक : हरीश नवल
विधा – व्यंग्य ; संस्करण – 2021 ; पृष्ठ संख्या – 132 ; मूल्य – 200/- रुपए
प्रकाशक – किताबगंज प्रकाशन, सवाई माधोपुर
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डॉ. नीरज दइया