*समीक्षा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
*समीक्षा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

05 नवंबर, 2021

भारतीय साहित्य के निर्माता : श्रीलाल शुक्ल / प्रेम जनमेजय

साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल की प्रसिद्धि विशेष रूप से उनके उपन्यास “राग दरबारी” के कारण मानी जाती है, किंतु इस सत्य के मूल्यांकन का एक विकल्प प्रेम जनमेजय द्वारा साहित्य अकादमी के लिए लिखित विनिबंध “श्रीलाल शुक्ल” है। साहित्य अकादेमी और भारतीय ज्ञानपीठ से सम्मानित श्रीलाल शुक्ल (1925-2011) ने विपुल साहित्य सृजन किया और उनके कार्यों का व्यापक मूल्यांकन भी हुआ। अनेक साक्षात्कारों में उन्होंने अपने साहित्य से जुड़े और इतर प्रसंगों पर बेबाकी से अपनी बात भी रखी है। प्रेम जनमेजय अपने आरंभिक लेखन काल से ही शुक्ल जी से जुड़े और आखरी समय तक जुड़े रहे हैं। जनमेजय जी के उनसे अंतरंग लंबे संपर्क का ही प्रतिफल है कि प्रस्तुत विनिबंध में हम बहुत व्यवस्थित रूप से शुक्ल जी के व्यक्तित्व और कृतित्व को न केवल व्यापकता के साथ जान पाते हैं वरन महसूस भी कर पाते हैं कि कैसे वे उच्च कोटि के  लेखक होने के साथ-साथ उन्मुक्त भाव से अपनी बात रखने वाले स्नेहिल व्यक्ति भी थे।
    श्रीलाल शुक्ल जी को भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने के समाचार का शीर्षक “उम्र के इस पड़ाव पर खास रोमांचित नहीं करता पुरस्कार- श्रीलाल” पढ़कर प्रेम जनमेजय जी का मन तत्काल फोन करने का हुआ किंतु वे यह सोचकर रुक गए कि उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है। किंतु वे अधिकर देर नहीं रुक सके और उनसे उनका संवाद हुआ, परिणाम श्रीलाल शुक्ल जी ने रोमांच नहीं होने के विषय में कहा- “ऐसा नहीं प्रेम जी, ऐसे पुरस्कारों से संतोष अवश्य होता है। इस उम्र में अक्सर साहित्यकारों को उपेक्षित कर दिया जाता है। यह पुरस्कार संतोष देता है कि मैं उपेक्षित नहीं हूं।’ यह उनका प्रेमजी से अंतिम संवाद था। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि प्रेम जनमेजय जी ने पूरी ईमानदारी से प्रस्तुत विनिबंध में अनेक स्थलों पर सप्रमाण अपनी बात कहने का प्रयास किया है। पुस्तक का आरंभ ‘आरंभ’ शीर्षक के आलेख से होता है जिसमें एक युवा लेखक का अपने वरिष्ठ रचनाकार के प्रति सम्मान है वहीं विभिन्न कथनों के आलोक में श्रीलाल शुक्ल के लेखक मन की पड़ताल भी है। ‘जीवन यात्र के पदचिह्न’ में जन्म से लेकर निधन तक के पूरे घटनाक्रम में श्रीलाल शुल्क के लेखक के साथ घर-परिवार-समाज के जीवन में उनके दृष्टिकोण के साथ आत्मीयता को भी रेखांकित किया गया है। इस कृति के माध्यम से हम हमारे समय के वरिष्ठ लेखक की जीवन शैली और दिनचर्या के साथ विचारधार और प्रतिबद्धता का भी अंदाजा लगा सकते हैं। इसी अध्याय को अधिक गंभीरता से ‘दृष्टिकोण’ में स्पष्ट किया गया है कि एक लेखक किस प्रकार से अपने साहित्य समाज में किन-किन और कैसे-कैसे संघर्षों के साथ आगे बढ़ता चला जाता है।
    श्रीलाल शुक्ल के प्रसिद्ध उपन्यास ‘राग दरवारी’ के पहले उनके रचनाक्रम और संघर्ष को ‘आरंभिक रचना-यात्रा’ आध्याय में रेखांकित किया गया है वहीं ‘राग दरबारी युग का रचना-समय’ में यह सिद्ध करने का उपक्रम है कि किस प्रकार एक रचना अपने पुरस्कार के बाद विचारधाराओं को परिवर्तित कर केंद्र में स्थापित हो जाती है। राग दरबारी का अपना एक युग रहा है और रहेगा, उसका भी विस्तार से विवरण और व्यंग्य-यात्रा के अंक का उल्लेख द्वारा प्रेम जनमेजय जी के हवाले उपन्यास विषयक अनेक नवीन तथ्य और जानकारियां यहां है। विनिबंध में न केवल राग दरबारी वरन श्रीलाल शुक्ल जी के समग्र उपन्यास साहित्य का आंशिक परिचय और रचनाओं की केंद्रीय भावभूमि को स्पष्ट किया गया है। श्रीलाल शुक्ल के कहानी-संग्रहों, व्यंग्य-संग्रहों और अन्य विधाओं में उनके अवदान को विनिबंधकार ने बिंदुवार रेखांकित किया है। ‘उपसंहार’ में पूरी चर्चा को समेकित करते हुए श्रीलाल शुक्ल के भारतीय साहित्य में योगदान के विभिन्न स्तरों को उल्लेखित किया गया है। यहां विशेष बात यह भी कि हम इस कृति के माध्यम से प्रेम जनमेजय जी अपने प्रिय लेखक श्रीलाल शुक्ल के समग्र साहित्य के विशद अध्ययन का आस्वाद कराते हैं। यहां उनके व्यक्तिगत चिंतन, मनन के आलोक में तथ्यों को लेकर स्पष्टता भी प्रभावित करती है। अनेक वरिष्ठ और समकालीन लेखकों के विभिन्न कृतियों और प्रसंगों पर कथनों के माध्यम से हम जिस श्रीलाल शुक्ल लेखक की पहचान करने में सक्षम होते हैं निसंदेह वह पहचान हमारी पूर्ववर्ती पहचान को दृढ़, समृद्ध और परिपक्क्व बनाती है। किसी विनिबंध की सफलता यही होती है कि हम हमारे परिचित रचनाकार को समग्रता में जानने का अवसर प्रदान करे।

-    डॉ. नीरज दइया

15 अक्टूबर, 2021

डॉ. हरीश नवल के चश्मे से व्यंग्य को देखना / डॉ. नीरज दइया

आज हिंदी व्यंग्य को जिन गिने-चुने नामों ने पहचान दी है, उनमें एक प्रमुख नाम हरीश नवल का है। पहली पुस्तक पर आपको युवा ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलना ध्यानाकर्षकण का विषय रहा है। किंतु बाद में आपकी सतत साहित्य-साधना में भाषा का सयंमित व्यवहार विशेष उल्लेखनीय उपलब्धि है। सद्य प्रकाशित व्यंग्य कृति ‘गांधी जी का चश्मा’ के माध्यम से व्यंग्यकार हरीश नवल यह प्रमाणित करते हैं कि व्यंग्य में बहुत कम शब्दों में बहुत गहरी-गंभीर बात कही जा सकती है।
    शीर्षक व्यंग्य ‘गांधी जा चश्मा’ की बात करें तो आरंभ में लगता है कि गांधी का चश्मा जो 2.55 करोड़ रुपये में हुआ नीलाम और अमरीका के एक व्यक्ति ने खरीदा उसका कहीं कोई संदर्भ होगा। किंतु नहीं यह व्यंग्य विगत सात दशकों से दो अक्टूबर को गांधी जंयती पर होने वाले मेलों पर सधा हुआ व्यंग्य है। इसके शीर्षक और आरंभ को पढ़ते हुए कहानीकार संजीव की कहानी ‘नेता जी का चश्मा’ का स्मरण होता है, जिसमें एक बालक की देशभक्ति को बहुत सकारात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। यहां इस व्यंग्य रचना में अहिंसा नगर में जंयती समारोह आयोजन से पूर्व गांधी जी की मूर्ति जो एक बहुत बड़े शिल्पकार ने बनाई है का चश्मा गायब होने का प्रकरण है। बिना चश्मे के गांधी जी आंखें जैसे उनमें अश्रु भरे हैं, होंठ बहुत सूखे हुए हैं... तिस पर व्यंग्कार का कहना कि ‘गांधी जी के चेहरे पर चश्मे के कारण गांधी जी का पूरा चेहरा कहां दिखता था’ हमारे सारे चश्में उतार देने को पर्याप्त है। आखिर चश्मा गया कहां का रहस्य अंत में स्वयं गांधी जी के श्रीमुख से किया गया है। गांधी जी के पूरा कथन स्वयं में परिपूर्ण व्यंग्य है- ‘सुनो तुमसे ही कह सकता हूं, तुम जैसे मेरे आचरण का अनुकरण करने वाले अब मुट्ठी भर ही रह गए हैं, विगत सात दशकों से देखता आ रहा हूं कि मेरे विचारों की रोज हत्या हो रही है, जबकि मेरी हत्या केवल एक बार ही हुई, सोचता रहा, देखता रहा कि बदलती हुई सफेद, लाल, केसरी आदि टोपियों वालों में कोई तो मेरे सपनों को आरंभ करेगा लेकिन सभी एक से ही आचारण को अपनाते रहे। मेरी सोच धीरे-धीरे मरती रही। अब मुझसे देखा नहीं जाता इसलिए मैंने खुद ही अपना चश्मा उतार कर नष्ट कर दिया।’
    हरीश नवल का मानना है कि व्यंग्य की चोट दुशाले में लपेट कर मारे गए जूते जैसी होनी चाहिए। वह सीधा सपाट व्यंग्य प्रस्तुत नहीं करते, वरन कुछ पेच और घुमाव उनकी प्रवृत्ति है। स्वयं को बिना मुखर किए जब व्यंग्यकार कभी बहुत गहन-गंभीर बात प्रस्तुत करता है तो जाहिर है वह पाठकों से एक ज्ञान-स्तर की भी मांग और उम्मीद करता है। ऐसी अपेक्षा के पूरित नहीं होने पर पाठक थम जाता है और सोचने लगता है कि क्या कह दिया गया है... यह सोचने अथवा अवकाश देना हिंदी व्यंग्य में विरल है। हरीश नवल ने वर्षों अध्यापन का कार्य किया और वे साहित्य के विधिवत अध्येयता रहे हैं, अतः उनकी अनेक रचनाओं में साहित्य-इतिहास और परंपरा को बहुत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
    ‘बिल्लो रानी और ईश वंदना’ में फिल्मी गीतों के माध्यम से भावक के भावों के बदले जाने का और जहां चाह वहां राहा कि उक्ति का विस्तार है। जहां जो नहीं है वहां वह जो मनवांछित है को ढूंढ़ लेने की प्रवृति को यहां अतिरेक के साथ प्रस्तुत करते हुए हरीश नवल पाठकों को हास्य के द्वार तक ले जाते हैं, किंतु कोई खुल कर या खिलखिला कर हंसे उससे पहले ही व्यंग्य की मार से वह तिलमिलाहट से भर देते हैं। कहना होगा कि हरीश नवल के व्यंग्यकार में उनका कहानीकार अधिक मुखर होता है, तब वे अपेक्षाकृत अधिक प्रभावशाली व्यंग्य देते हैं। ‘उफ़ भईया जी चोट’, ‘जन विकास यात्रा’, ‘देश की मिट्टी और नाराद जी’ अथवा ‘प्रिय राजेन्द्र जी’ जैसे व्यंग्य इसके उदाहरण है। देश में नेताओं की मोनोपोली, धन का अपव्यय, व्यवस्था की खामिया और आधुनिक समय-समाज में घर करती संवेदनहीनता को प्रस्तुत करते हुए हरीश नवल के व्यंग्य यदि अपने पाठक में संवेदना जाग्रत करते हैं तो यह बड़ी सफलता है। आधुनिक युग में वैसे तो पाठक सर्वज्ञान है और सब कुछ जानता है, जो जानता हो उसको कुछ बताना बेहद मुश्किल काम है फिर भी व्यंग्यकार उसके जानने को बढ़ाते हुए जैसे द्विगुणित करने का मुश्किल काम बड़ी सरलता से करने का हुनर रखते हैं।
    ‘निदान नींद का’ की बात करें जो मूलतः लघुकथा के रूप में है और बड़ा मारक व्यंग्य यहां सांकेतिक है। राजा आदंदारित्य का नियम था कि वह प्रातः महामंत्री के साथ नगर का विहंगम दृश्य देखते और जहां से धुआं उठता दिखाई नहीं देता तो महामंत्री को पता करने का आदेश देता कि उस घर में अंगीठी क्यों नहीं जली। वह उसकी व्यवस्था करने का आदेश भी देते और महामंत्री इस नियम से दुखी क्योंकि वे प्रातः की नींद में कोई बाधा नहीं चाहते थे। महामंत्री ने अपने मित्र राज-वैज्ञानिक तारादत्त से निदान के रूप में धुएं रहित अंगीठी का अविष्कार करवा पर्यावरण की शुद्धता की दुहाई देते हुए राजाज्ञा प्राप्त कर वैसी अंगीठी हर घर में पहुंचा दी और अब राजा को कहां भोजन बना और कहां नहीं इसका भेद नहीं मिल पाता था। प्रतीक के माध्यम से व्यवस्था पर सुंदर कटाक्ष किया गया है, किंतु अब ऐसे राजा नहीं रहे और महामंत्री ही राजा बन गए हैं- जो जागते हुए भी गहरी नींद में ही रहते हैं। ऐसी अनेक छोटी और मध्यम आकार की रचनाओं को पढ़ते हुए अभिभूत हुआ जा सकता है, यह प्रभाव कृति और कृतिकार की विशेषता है।
    शब्दों के श्लेष और वक्रोकी के अतिरिक्त भाषा-व्यंजना के माध्यम से हरीश नवल हमारे समक्ष ऐसे व्यंग्य को प्रस्तुत करते हैं जो दूसरों से अलग और अपने अंदाज के कारण प्रभावशाली है। वैसे इस पुस्तक की यह विशेषता है कि व्यंग्य भले आकार में छोटा अथवा बड़ा हो, वह निबंध, कथा अथवा लघुकथा के रूप में हो किंतु वह सदैव अपने शिल्प, भाषा के साधा हुआ है, यहां नए विषयों की तलाश के कारण व्यंग्य प्रभावशाली है। पुस्तक के अंत में हरीश नवल के व्यंग्य अवदान को रेखांकित करता पंद्रह पृष्ठों का एक आलेख ‘व्यंग्य कमल : हरीश नवल’ बिना लेखक के नाम के दिया गया है। लेखक प्रकाशक किसी की भी भूल रही हो पर गूगल बाबा नहीं भूलते और उनके द्वारा पता चल सकता है कि यह आलेख डॉ. आरती स्मित द्वारा लिखा गया, जो ‘सेतु’ में वर्ष 2017 में प्रकाशित हुआ है। इस आलेख के अंतिम अनुच्छेदों को हटा कर पुस्तक के अंत में गांधी बाबा को चित्र में मुस्कुराते हुए दिखाया गया है। इस कृति के माध्यम से डॉ. हरीश नवल के चश्मे से समकालीन व्यंग्य को देखना बेहद सुखद है।

------------------------
पुस्तक का नाम : गांधी जी का चश्मा ; लेखक : हरीश नवल
विधा – व्यंग्य ; संस्करण – 2021 ; पृष्ठ संख्या – 132 ; मूल्य – 200/- रुपए
प्रकाशक – किताबगंज प्रकाशन, सवाई माधोपुर
-----------------------

डॉ. नीरज दइया

 

05 जून, 2018

दो व्यंग्य संग्रह- डॉ. नीरज दइया / समीक्षा- रजनी मोरवाल

रजनी मोरवाल
पंच काका के जेबी बच्चे (व्यंग्य संग्रह) डॉ. नीरज दइया ; अवरण चित्र : के. रवीन्द्र ; संस्करण : 2017 ; पृष्ठ : 96 ; मूल्य : 200/- ; ISBN : 978-93-82307-68-6 ; प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334003
पंच काका के जेबी बच्चे
    व्यंग्य का अभिप्राय अमूमन हास्य, ताना, उपहास, मजाक, तंज़, त्वरित टिप्पणी या प्रतिक्रिया से लगाया जाता है, जिसके प्रभाव स्वरूप तिलमिला देने वाली प्रतिक्रिया उत्पन्न की जा सके। जबकि पारिभाषिक अर्थों में देखें तो अभिव्यंजना शक्ति द्वारा निकलने वाला अर्थ ही व्यंग्य होता है। डॉ. नीरज दइया की व्यंग्य कृति “पंच काका के जेबी बच्चे” इन तमाम पारिभाषिक अर्थों पर पूर्णतया खरी उतरती है। संग्रह में कुल 39 व्यंग्य हैं जिनमें पंच काका के माध्यम से वर्तमान युग की सामाजिक विसंगतियों पर करारा प्रहार किया गया है।
    संग्रह के पहले व्यंग्य में पंच काका का सवला हैं- “व्यंग्य क्या होता है?” और अंत में वे स्वयं ही कहते है- “ये शरारतियों का काम है।” पंच काका एक पात्र इजाद किया गया है जो लगभग सभी व्यंग्य में अपनी उपस्थित दर्ज कराते हुए जैसे अंतिम स्टोक लगा कर किसी बात को पूरा करते हैं। पंच काका नामक यह अनूठा पात्र कभी-कभी अपने मन की बात तो अधिकतर व्यंगकार के मन की बात करता है, किंतु इतनी मार्मिकता और कलाकारी के साथ कि स्वयं को उसमें गौण रखते हुए भी सतत विद्यमान है। पंच काका के माध्यम से इस व्यंग्य-संग्रह में गज़ब की किस्सागोई उत्पन्न हुई है।
    ‘पंच काका के जेबी बच्चे’ संग्रह का शीर्षक प्रारम्भ से अंत तक उत्सुकता बनाए रखता है, मसलन प्राकृतिक बच्चे, परखनली बच्चे, सेरोगेट बच्चे तो सभी सुनते आ रहें हैं, किन्तु ‘जेबी बच्चे’ एक ऐसा अनूठा प्रयोग है जो संग्रह के अंत में जाकर अपना भेद खोलता है। दरअसल लेखक ने अपनी विचारशक्ति से इस अद्भुत शब्द का आविष्कार किया जो एक उपलब्धि के रूप में उनके नाम दर्ज किया जाना चाहिए। इस शब्द के साथ वे चुटकी लेते हैं कि जेब से उत्पन्न होने वाले बच्चे ‘जेबी बच्चे’ कहलाते हैं जो कि इस अवसरवादी, महत्वकांक्षी और पैसों की दुनिया में जेब से पैदा होते हैं।
    व्यंग्य ‘गुट, गुटका और गुटकी’ में नीरज दइया साहित्य की उठा-पटक पर तंज़ कसते हुए कहते हैं कि “गैर गुट वाले गुटका-गुटकी के नशे में लडखडाते हैं, साहित्य के ऐसे सूरमाओं के मुख पर ऐसे-ऐसे विशेषण और आप्त कथन आते हैं कि सुनने वाले दंग रह जाते हैं, दो-चार गुटकी भरते ही वे पीढ़ियों तक को सुशोभित करते हुए ज्ञान के घोड़े पर सवार हो जाते हैं।” विषयानुरूप सहज-सरल भाषा में डॉ. दइया पाठकों से सीधा संवाद करते हैं और यही उनका वैशिष्टय है जो पाठकों को जोड़ता है।
    व्यंग्यों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि दइया किसी बात में से बात निकालने की खूबी जानते हैं। वे यह भी जानते हैं कि हर बात से व्यंग्य नहीं निकालता और यदि व्यंग्य के लक्षण मिल भी जाएं तो उसे साहित्य के रूप में ढालने से पूर्व कठिन तपस्या करनी पड़ती हैं। वे तमाम बातों के सागर से उस सीप को खोज लाते हैं जिस में मोती होता है, फिर उसी मोती पर व्यंग्य केन्द्रित करते हुए सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार करते हैं। वे निरंतर इस विधा के अनुशासन में रहते हुए अपने मंतव्य पर दृष्टि गढ़ाए रहते हैं।
    ‘सर्वश्रेष्ठ वाद-अवसरवाद’ व्यंग्य के बहाने समाज में बढ़ती अवसरवादी प्रवृति पर डॉ. दइया लिखते हैं- “अवसरवाद सिद्धांत के अनुसार दिल खोलकर दिखावा करो, दिखावा करने से ही अवसर मिलते हैं। किस अवसर के लिए तेल कौनसे ब्रांड का खरीदना है यह महत्त्वपूर्ण है। तेल, साबुन क्रीम से आपकी हैसियत का पता चलता है और गेंहू, दाल, चावल तो आपके पेट में चले जाते हैं।” बेहद सधा हुआ व्यंग्य और यथार्थवादी भी।
    ‘डिज़िटल इंडिया’ और ‘दाढ़ी रखूं या नहीं’ के माध्यम से उन्होंने सोशल मीडिया पर समय के दुरुपयोग पर कटाक्ष किया है तो वहीं देश में बिजली की समस्या को आधार बनाकर ‘डिजिटल इंडिया’ और विकास के नारे पर प्रश्नवाचक चिह्न लगाया है। सरकारी नीतियों के कारण स्कूलों में हर क्रियाविधि की सूचना कार्यालय को सबूतमय भेजनी पड़ती है, शिक्षक पढ़ाने से अधिक बच्चों के संग सेल्फी लेते नज़र आते हैं ‘बच्चे के संग सेल्फी’ व्यंग्य के द्वारा उन्होंने नई शिक्षा नीति पर बड़ी गंभीरता से करारा व्यंग्य ढूंढा है। ‘टारगेटमयी मार्च’ के द्वारा वे काम के बढ़ते बोझ से उत्पन्न तनाव पर निशाना साधते हैं कि कैसे एक निश्चित समयावधि में टारगेट और आंकड़ों की जद्दोजहद में फंसे कर्मचारी मानसिक व शारीरिक रूप से बढ़ते तनाव की वजह से जूझते हैं।
    ऐसे तमाम उदाहरण हैं जो संग्रह से दिए जा सकते हैं, हर रचना में पंच काका के पंच हैं, व्यंग्य के ये तीर दरअसल नीरज दइया द्वारा ही छोड़े गए हैं जो अपने गंतव्य पर पहुंचकर लोगों को गुदगुदाते तो हैं साथ ही बढ़ी गंभीरता से अपनी बात का असर भी छोड़ जाते हैं। वे बखूबी जानते हैं कि व्यंग्य महज़ हास्य बनकर न रह जाए इसीलिए वे अपने व्यंग्यों में बिम्ब, प्रतीक, वक्रता के साथ-साथ भाषा की सहजता व सरलता पर भी ध्यान देते हैं और यही विशेषताएं उनके लेखन को समृद्ध बनाती हैं।
००००
टांय टांय फिस्स (व्यंग्य संग्रह) डॉ. नीरज दइया ; अवरण चित्र : के. रवीन्द्र ; संस्करण : 2017 ; पृष्ठ : 96 ; मूल्य : 200/- ; प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334003
टांय टांय फिस्स
    व्यंग्य संग्रह “टांय टांय फिस्स” अपने अनूठे शीर्षक से प्रभावित करता है। यूँ तो आम मायनों में इसका अर्थ होता है- जिसका परिणाम कुछ न निकले, किंतु व्यंग्य संग्रह की 40 रचनाओं को पढ़कर लगता है कि जैसे किसी खजाने की कूंची हाथ लग गई हो। लेखक नीरज दइया ने ऐसे-ऐसे वाक्यों का प्रयोग करते हुए कुछ नए मुहावरे भी गढ़े हैं कि व्यंग्यकार के रूप में उनकी छवि यादगार कही जा सकती है।
    व्यंग्य में अपनी उत्कृष्ट भाषा शैली से नीरज दइया छोटी से छोटी बात को भी वे इस ढंग से चुटीला बना देते हैं कि बात के नए अर्थ उभरकर पाठकों के सामने आते हैं। यह इसलिए भी है कि वे राजस्थानी भाषा और जिस लोक से जुड़े हैं उनका व्यंग्य में एक नया ‘फ्लेवर’ उन्हें अन्य व्यंग्यकारों से भिन्न और कुछ खास भी बनाता है। उनका विशद अध्ययन है जिससे समसामयिका के साथ अनेक प्रसंग और ब्यौरे उनकी रचनाओं को तो समृद्ध बनाते हैं। व्यंग्यों में जिस ‘पंच काका’ नामक अनोखे किरदार को गढ़ा है वे काका यहां भी अपने पंच छोड़ते हुए सतत विद्यमान हैं । इस संग्रह में कुछ नए पात्र- फन्ने खां, स्वामी चेतानानंद, आदि आचार्य श्री बैगनाचार्य आदि हैं जो व्यंग्य को आगे बढाने में सहायक प्रतीत होते हैं। 
    इन रचनाओं से गुजरते हुए लगता है कि नीरज दइया जानते हैं कि देश के माहौल, परिवार, साहित्यिक गतिविधियों, लेखकों, स्कूल, समसामयिक घटनाओं, चर्चाओं, बातों, कार्यस्थल व भिन्न-भिन्न स्थानों पर किस तरह अपनी सहमति-अहसमति के द्वंद्व में व्यंग्य का मौका मिल सकता है। उनकी अनेक रचनाओं में व्यंग्य के साथ कोई न कोई गंभीर संदेश होता है जिसे वे शब्दों की आड़ लेकर बेहद करीने से पाठकों के सामने प्रस्तुत करते हैं। उनके व्यंग्य हास्य तो उत्पन्न करते ही है, साथ ही नैतिक मूल्यों की पैरवी भी करते हैं।
    नीरज दइया विभिन्न विषयों से पाठकों को हतप्रभ करते चलते हैं। कागज के दुश्मन, कुंवारे-कुंवारियों की धमाचौकड़ी, हम सबकी गति एक, वी.आई.पी. कल्चर, बाबाजी के चेलों खूब खाओ बैंगन, खुल्ले मिलेंगे क्या, काला धन देश में पकड़ा, ई-होली हुडदंग आदि अनेक ऐसे व्यंग्य हैं जहाँ वे समसामयिक समस्याओं पर करारा प्रहार करते हैं। पूरा संग्रह ही व्यंग्य से सराबोर है किन्तु कुछ उदहारण जो मुझे निजी रूप से सुंदर पंच लगे उनमें से चयनित पांच पंच प्रस्तुत है-
कागज के दुश्मन- ई-युग ने डाक-डाकिया को परमानेंटली फ्री कर दिया।
हम सबकी गति एक- जहाँ बूढे दादाजी के मरने पर परिवार वाले फूट-फूटकर रोते हैं, वहीँ घर में कन्या के जन्म पर रोनी सूरत बनाए रखते हैं, बेटा हो या बेटी सबकी गति और दिशा एक ही होनी चाहिए।
जाकेट की सर्दी-गर्मी- साहित्यकारों वाली जाकेट सर्दी-गर्मी बारह महीनों चलती है, ये त्रासदियाँ भोगने के लिए नहीं दिखाने के लिए भी होती है , क्या जाकेट साहित्यकारों का कोई ड्रेस कोड बन गई है ?
होमवर्क, स्कूल और पेरेंट का त्रिभुज– यह एक गणित है और इस त्रिभुज में टोटल तनाव वही का वही रहता है अब यह आपकी मर्ज़ी है कि इसे कब, कहाँ व कैसे भोगना है ?
वी आई की खान भारत- ये सब नाटक है ढकोसला है, दुनिया एक रंगमंच है और हम इसकी कठपुतलियाँ, कब-कौन-कैसे उठेगा ये कोई नहीं जानता...बाबु मोशाए ...वी आई पी की खान भारत तो गया...अब मुठ्ठी भर पूर्व वी आई पी सारे नवजात वी आईपियों को मारेंगे।
    डॉ. नीरज दइया की भाषा की कलात्मकता और कसावट के साथ वैविद्ध्यपूर्ण विषयों पर लिखते हुए गुणवत्ता से व्यंग्य का मंतव्य साधते हैं। अपने गंभीर-चिंतन सूक्ष्म सर्वेक्षण, व्यंजनामूलक विशिष्ट जीवन दृष्टि द्वारा समाज में फैली विद्रूपताओं पर चोट करने के निर्भीक प्रयास में वे शत-प्रतिशत खरे उतरते हैं। पंच काका का आशीर्वाद तो उनके साथ है ही। कृति “टांय टांय फिस्स” में उनकी पहचान को और अधिक पुख्ता धरातल मिलता है। आशा है वे एक प्रखर व्यंग्यकार के रूप में नए-नए आयाम गढ़ते रहेंगे।
०००००
रजनी मोरवाल, 
23/97 “आर्ष”, स्वर्ण पथ, मानसरोवर, जयपुर 302020
मोबाइल-09824160612

03 फ़रवरी, 2018

डॉ. नीरज दइया की आलोचना-दृष्टि और सृष्टि

पुस्तक पर आलेख
============
राजस्थानी और हिन्दी साहित्य में डॉ. नीरज दइया एक जाना-पहचाना नाम है। राजस्थानी कविता और आलोचना के क्षेत्र में तो उन्होंने विशेष कार्य किया ही है, अनुवाद, संपादन और व्यंग्य साहित्य में भी इनका योगदान उल्लेखनीय है। डॉ. दइया की अब तक दो दर्जन से ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पिछले दिनों उनकी आलोचनात्मक कृति ‘बिना हासलपाई’ को साहित्य अकादेमी मुख्य पुरस्कार (राजस्थानी) 2017 दिये जाने की घोषणा हुई है। यहां हम उक्त पुरस्कृत पुस्तक पर आलेख प्रकाशित कर रहे हैं।
==========
भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’
----------------
आलोचना बौद्धिक प्रकृति का साहित्यिक-सांस्कृतिक कर्म है अतः आलोचक का नैतिक दायित्व बनता है कि वह किसी कृति की विषद व्याख्या और तात्विक मूल्यांकन करते हुए उसमें व्याप्त बोध की अभिव्यक्ति और उसके निहितार्थ को समाने लाए। उसका यह भी दायित्व है कि वह आज के जटिल समय में किसी कृति की समग्रता को इस प्रकार प्रस्तुत करे कि पाठक की समझ का विकास हो और वह बिना किसी अतिरिक्त बौद्धिक बोझ के रचना का आस्वाद ले सके। काल के अनंत प्रवाह में कृति की अवस्थिति की पहचान ही आलोचना है।
सही दृष्टि वाले आलोचक के मन में कुछ प्रश्न हमेशा कुलबुलाते रहते हैं। जैसे आलोचक के इस अराजक और अविश्वसनीय युग में वह कैसे अपनी तर्क बुद्धि और विवेक का उपयोग करे? निरपेक्ष तथा तटस्थ किस प्रकार रहे? सच कहने व किसी रचना के कमजोर पक्षों को उघाड़ने का साहस कैसे करे? और परंपरा एवं निरंतरता के बीच समीकरण कैसे बिठाए? ये कुछ बुनियादी प्रश्न हैं जिनसे पूर्वाग्रह रहित आलोचक का भिड़ना होता रहता है। आलोचना की परंपरा में दो नाम निर्विवादित रूप से उभर कर आते हैं। इनमें पहला नाम है आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का तथा दूसरा है डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी का। आचार्य शुक्ल कृति को केन्द्र में रखकर मूल्यांकन करते थे। वे कृतिकार से चाहे वह कितना ही दिग्गज क्यों न हो, प्रभावित हुए बिना अपना निर्णय दिया करते थे।
उधर डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी भी कृति को तो केन्द्र में रखते थे पर रचना में निहित सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, दार्शनिक व मनोवैज्ञानिक संदर्भों में भी सहज रूप से संचर्ण करने में नहीं हिचकिचाते थे। संचरण के बाद वे कृति पर फिर से उसी प्रकार लौट आते थे जैसे कोई संगीतज्ञ लम्बे आलाप के बाद सम पर लौट आता है। इन दोनों दृष्टियों में आलोचना के जो गुणधर्म सामने आते हैं वे इस प्रकार हैं- कृति घनिष्ठता, आस्वाद क्षमता, संवेदनशीलता और प्रमाणिकता। इसके अलावा एक प्रकार का खुलापन, चारों ओर से आने वाले, चिन्तन का स्वागत, प्रस्तुति का पैनापन तथा पक्षधरता के स्थान पर पारदर्शिता का प्रदर्शन आदि भी स्वास्थ आलोचना के महत्त्वपूर्ण घटक हैं।
मेरे सामने डॉ. नीरज दइया की आलोचना पुस्तक ‘बिना हासलपाई’ है। मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि डॉ. दइया ने दोनों प्रणालियों से जुड़े इन आठों बिन्दुओं का मनोयोग से पालन किया है। आचार्य शुक्ल और डॉ. द्विवेदी के युग के अस्सी वर्ष बीत जाने के बाद भी हिंदी साहित्य में आलोचना के मानक साहित्य शास्त्र का अब तक विकास नहीं हुआ है फिर राजस्थानी कहानी-आलोचना तो वैसे ही रक्त अल्पता का शिकार है तथा पक्षधरता से अभिशप्त रही है। ऐसे में यदि स्वस्थ व निरपेक्ष दृष्टि की कोई आलोचना पुस्तक सामने आए तो उसका स्वागत किया ही जाना चाहिए।
आलोचना का प्रस्थान बिंदु है साहस। डॉ. दइया ने साहस के साथ कहानी-साहित्य को कथा साहित्य कहने का विरोध किया है क्यों कि कथा शब्द में कहानी व उपन्यास दोनों का समावेश होता है (केवल कहानी का नहीं)। उसे कथा शब्द से संबोधित करना भ्रम पैदा करता है। साथ ही उन्होंने केवल परिवर्तन के नाम पर उपन्यास को नवल कथा कहने की प्रवृति का भी विरोध किया है क्यों कि इस अनावश्यक बदलाव की क्या आवश्यकता है?
व्यक्तियों के नाम से काल निर्धारण करने की प्रवृति को भी वे ठीक नहीं मानते क्योंकि ऐसा करने से आपधापी, निजी पसंद-नापसंद, आपसी पक्षधरता और हासलपाई लगाने के प्रयास आलोचना के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर सकते हैं। डॉ. दइया यह मानकर चलते हैं कि आधुनिक होने का अर्थ समय के यथार्थ से जुड़ना है। ‘बिना हासलपाई’ पुस्तक की एक विशेषता उसकी तार्कितकता और तथ्यात्मकता का है। पच्चीस कहानीकारों में नृसिंह राज्पुरोहित को प्रथम स्थान इसलिए दिया गया क्योंकि उनकी कहानियों में पूर्ववर्ती लोक कथाओं से सर्वथा मुक्ति का भाव है अतः सही मायने में वे ही आधुनिक राजस्थानी कहानी के सूत्रधार माने जा सकते हैं। राजस्थानी कहानी के विकास में कुल जमा साठ वर्ष ही तो हुए हैं। इस अवधि में शुरुआती पीढ़ी से आज तक की नवीनतम पीढ़ी तक चार प्रवृतियां तथा चार पीढ़ियां सामने आती हैं। इसे दृष्टिगत रखते हुए डॉ. दइया ने 15-15 वर्षों के चार कालखण्डों के विभाजन का सुझाव दिया है ताकि चारों पीढ़ियों तथा चारों प्रवृत्तियों के साथ न्याय किया जा सके।
कहानीकारों का चयन संपादक का विशेषाधिकार हुआ करता है। डॉ. दइया ने 25 कहानीकारों की कृतियों को सामने रखकर सारा ताना-बाना बुना है। उसमें ऐसे अनेक कहानीकारों को सम्मिलित नहीं किया गया है जो पक्षधरता या फिर ग्लैमर या कि प्रचार के कारण सभी संकलनों में समाविष्ट होते रहते हैं। पुस्तक में ऐसे स्वनामधन्य, रचनाकारों के विरुद्ध कोई टिप्पणी तो नहीं है पर उनके वर्चस्व के चलते ऐसे उपेक्षित या हल्के-फुल्के ढंग से विवेचित किन्तु उनके समान ही या कहीं-कहीं सृजनात्मक रूप से उनसे भी आगे रहने लायक कुछ कहानीकारों को पूरे सम्मान के साथ जोड़ा गया है। क्या कारण है कि सर्वथा समर्थ और प्रभावशाली कहानीकार भंवरलाल ‘भ्रमर’ के साथ समुचित न्याय नहीं किया गया? क्या कारण है कि प्रथम पीढ़ी के साथ कहानियां लिखने वाले मोहन आलोक को या कन्हैयालाल भाटी को उपेक्षिता रखा गया? चौकड़ी की धमा चौकड़ी के चलते ऐसे कई समर्थ कहानीकार प्रकाश में नहीं आ सके जिनकी कहानियां वर्षों से पत्रिकाओं में छपती रहती थी। चूंकि पुस्तक रूप में उनके संग्रह बाद में सामने आए, क्या यही उपेक्षा का वजनदार कारण बन सकता है? संपादक को तो चौतरफा दृष्टि रखनी चाहिए। पत्रिकाओं के प्रकाशन, गोष्ठियों में कहानी-वाचन, सेमिनारों में कहानियों पर चर्चा आदि पर भी सजग संपादकों द्वारा ध्यान दिया जाना चाहिए। पुस्तक रूप में सामने आने न आने पर क्या गुलेरी जी की कहानियों के अवदान को कम आंका जा सकता है? डॉ. दइया ‘आ रे म्हारा समपमपाट, म्हैं थनै चाटूं थूं म्हनै चाट’ वाली प्रवृति के एकदम खिलाफ हैं।
इस पुस्तक की एक और विशेषता संपादक की अध्ययनशीलता की है। उन्होंने कुल 25 कहानीकारों के 55 कहानी-संग्रहों की 150 से अधिक कहानियों की चर्चा की है और वह भी विषद चर्चा। मुझे तो इससे पूर्ववर्ती संकलनों में ऐसा श्रम साध्य काम को करता हुआ कोई भी आलोचक नहीं मिला। कसावट भी इस पुस्तक एक अद्भुत विशेषता है। पृष्ठ संख्या 31 से पृष्ठ संख्या 160 तक के 130 पृष्ठों में सभी 25 कहानीकारों की कहानियों के गुण-धर्म का विवेचन करना और अनावश्यक विस्तार से बचे रहना कोई कम महत्त्व की बात नहीं है। तीसरी और चौथी पीढ़ी के उपलब्धीमूलक सृजन तथा आगे की संभावनाओं को देखते कुछ ऐसे कहानीकारों को भी शामिल किया गया है जिनको पूर्ववर्ती संकलनों में स्थान नहीं मिला।
डॉ. दइया के पास एक आलोचना दृष्टि है तथा कसावट के साथ बात कहने का हुनर भी है। वे कलावादी आलोचना, मार्क्सवादी आलोचना या भाषाई आलोचना के चक्कर में न पड़ कर किसी कृति का तथ्यों के आधार पर कहाणीकार के समग्र अवदान को रेखांकित करते चलते हैं। ऐसा विमर्श, ऐसा जटिल प्रयास कम से कम सुविधाभोगी संपादक तो कर ही नहीं सकते। रचना के सचा को उजागर करने में हमें निर्मल वर्मा की इस टिप्पणी पर ध्यान देना होगा कि ‘आज जिनके पास शब्द है, उनके पास सच नहीं है और जिनके पास अपने भीषण, असहनीय, अनुभवों का सच है, शब्दों पर उनका कोई अधिकार नहीं है।’ मुझे यह लिखते हुए हर्ष होता है कि डॉ. दइया के पास वांछित शब्द और सच दोनों ही है। डॉ. दइया ने सभी कहानीकारों के प्रति सम्यक दृष्टि रखी है, न तो ठाकुरसुहाती की है और न जानबूझ कर किसी के महत्त्व को कम करने की चेष्टा ही की है। एक और बात- प्रथम और द्वितीय पीढ़ी के कहानीकारों की चर्चा करते समय उसी कालखंड में लिखने वाले अन्य कहानीकारों की कहानियों के संदर्भ भी दिए गए हैं ताकि तुलनात्मक अध्ययन संभव हो सके।
डॉ. दइया ने वरिष्ठ कहानीकारों की कहानियों में जहां कहीं कमियां दर्शाई गई है वहीं इस बात पर भी पूरा ध्यान दिया गया है कि शालीनता व सम्मान में किसी प्रकार की कमी न रहे। संक्षेप में यह आलोचना पुस्तक एक अच्छी प्रमाणिक और उपयोगी संदर्भ पुस्तक है।
००००
पुस्तक का नाम- बिना हासलपाई (2014)
लेखक- डॉ. नीरज दइया
प्रकाशक - सर्जना, शिवबाड़ी रोड, बीकानेर- 334003
पृष्ठ- 160
कीमत - रुपये 240/-
=


 आभार : ‘दुनिया इन दिनों’ प्रधान संपादक- श्री सुधीर सक्सेना

बुलाकी शर्मा के सृजन सरोकार

इस पुस्तक में राजस्थान के परिचित कथाकार व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा के व्यक्तित्व तथा कृतित्व को केंद्र में रखकर नीरज दइया ने अपना समीक्षात्मक आकलन प्रस्तुत किया है। इस आकलन में उनके परस्पर संबंधों तथा निजी जीवन के अनुभवों के साथ ही संस्मरणपरक छवियां भी अंकित की गई है। व्यक्ति के समाज, समय, संस्कृति तथा परिवेश से जुड़ाव की बदौलत ही उसके सर्जनात्मक व्यक्तित्त्व तथा कृतित्त्व की भूमिका निश्चित होती है। इससे यह भी पता चलता है कि कोई भी व्यक्ति बतौर एक रचनाकार हमेशा अपने भीतर सतत आत्म-संघर्ष तथा आत्ममंथन की प्रक्रिया से गुजरता रहता है। रचनाकार के तौर पर बुलाकी शर्मा को समझने की दृष्टि से इस पुस्तक का महत्त्व स्पष्ट है। व्यंग्यकार तथा कथाकार के रूप में बुलाकी अपने विचार खुलकर प्रकट करते हैं और उनके रचनाकार का यह अकुंठित रूप से उन्हें सार्थक रचनाकार के तौर पर स्थापित करता है।
- मधुमती टीम ( राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर)

31 दिसंबर, 2017

पुस्तक समीक्षा- डॉ. नीरज दइया

नम्बर वन आऊंला (राजस्थानी बाल कविताएं)
कवि : पवन पहाड़िया, प्रकाशक- नेम प्रकासण ग्रा.पो. डेह (नागौर) राज. 341022, पृष्ठ : 52 मूल्य : 100/- संस्करण : 2014   
   
    राजस्थानी भाषा और साहित्य के लिए विगत तीन दशकों से सक्रिय पवन पहाड़िया की पहचान एक कवि और राजस्थानी भाषा मान्यता हेतु संघर्षशील रचनाकार के रूप में है। अपनी मातृभाषा के लिए ऐसे अनेक रचनाकारों की अपनी निष्ठाएं और आस्थाएं हैं, जिनके रहते वे अनेक मोर्चों पर स्वयं खड़े होने के लिए विवश हैं। पवन पहाड़िया भी एक कवि-लेखक के साथ-साथ जनचेतना और साहित्य के प्रचार-प्रसार-प्रकाशन हेतु सक्रिय है। इसके अतिरिक्त वे राजस्थानी भाषा के नए रचनाकारों को प्रेरित और प्रोत्साहित करने के लिए भी पहचाने जाते हैं। उन्होंने अनेक भामाशाहों को प्रेरित कर साहित्य पुरस्कार आरंभ किए हैं।
     ‘नम्बर वन आऊंला’ संग्रह पर पवन पहाड़िया को साहित्य अकादेमी का बाल साहित्य पुरस्कार (राजस्थानी) वर्ष 2017 का अर्पित किया गया है। यह बाल कविताओं का संग्रह उन्होंने प्रख्यात राजस्थानी साहित्यकार बी.एल. माली की प्रेरणा से लिखा है और यह संग्रह उन्हें ही समर्पित किया गया है। इस संग्रह की भूमिका में कविताओं में वर्णित विषयों और भावबोध का खुलासा करते हुए आलोचक डॉ. गजेसिंह राजपुरोहित लिखते हैं- ‘‘एक अबोध बाल का मन सदैव आगै बढ़ने की चाहत रखता है। यही चाहत उसे सदैव सफलता के शिखर तक ले जाती है। उसी चाहत को कवि अपनी रचनाओ- नम्बर वन आऊंला के मार्फत बालकों में जाग्रत करता है। चेतना को ललकारता है कि वह किसी से कम नहीं है, वह सदा सत्य के मार्ग चलते हुए एक नया इतिहास रचेगा। यही चाहना ही उसे सफलता दिलाती है, सर्वश्रेष्ठ बनाती है।’’   
आरंभ में अपनी बात ‘मेरा दर्द’ शीर्षक से व्यक्त करते हुए कवि पवन पहाड़िया लिखते हैं- “नई पीढ़ी से मेरा आग्रह है कि वे चाहे अंग्रेजी में पढ़े-लिखें या हिंदी में पर घर में अपनी मातृभाषा को काम में लेंवे।” घर-परिवार और समाज में भाषा को संस्कार बनाएं रखने और जाग्रत करने के प्रमुख धेय से ही कवि ने इस संग्रह की 41 कविताएं लिखी है। पुस्तक की पहली कविता वंदना के रूप में करतार से अरदास है तो दूसरी बाल कविता ‘तिंरंगो’ में देश-भक्ति की भावना उजागर होती है। संग्रह में बालकों के आत्मीय और निजी संबंधों यथा मां, बहन आदि के महत्त्व को भी उजागर किया गया है। कवि कविताओं में श्रम के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए संदेश भी देता है कि पढ़ने-लिखने के साथ-साथ खेलना-कूदना भी जीवन में उतना ही आवश्यक और अनिवार्य है। शिक्षा और चरित्र निर्माण की भावना इन कविताओं में प्रमुखता से उभर कर सामने आती हैं।
    संग्रह की अनेक कविताएं प्रेरणादायी है जिनमें बालकों से पानी के महत्त्व और वृक्षारोपण जैसे अनेक मुद्दों पर सीधा संवाद है। कवि मौसम की बात करते हुए गर्मी, सर्दी और वर्षा के मौसमों के विविध रंगों को कविताओं में शब्दबद्ध कर अनेक बिंब रखते हुए सुंदर चित्रों को जैसे चित्रित करते हुए बालकों को समोहित करता है। कविताओं में बालकों को प्रिय लागने वाली तितलियों और बिल्लियों की दुनिया के साथ अन्य पशुओं-पक्षियों को भी वर्णित विषय बनाया गया है। इन कविताओं से बालकों में भारतीय त्यौहारों का हर्ष-उल्लास एक झलक के रूप में प्रस्तुत होता है। होली, दीपावली, अक्षय तृतीया और मकर सक्रांति जैसे पर्वों के माध्यम से बालकों को संस्कारित करने का प्रयास भी हुआ है।
    संग्रह की शीर्षक कविता में राजस्थान सरकार द्वारा प्रतिभावान विद्यार्थियों को ‘लेपटोप’ दिए जाने को केंद्र में रखते हुए उन्हें प्रेरित करने हेतु एक बाल मन के उद्गार कवि ने लयबद्ध अभिव्यक्त किए हैं। मूल कविता की आरंभिक पंक्तियां हैं- ‘लेपटोप घर में ल्याऊंला / मां म्हैं नंबर वन आऊंला / बैगो दिनगै म्हनै उठाज्यै,/ दांतण करियां पाठ पढ़ाज्यै।’ बच्चों के द्वारा बच्चों को संदेश देना अधिक प्रेरक और प्रभावशाली है।
    बाल साहित्य के लिए कवि पवन पहाड़िया का सक्रिय होना सुखद है पर भाषिक संरचनागत कुछ बातों का भी यहां विशेष ध्यान रखा जाना आवश्यक है। बालक जो भाषा सीख रहा है उसके समक्ष भाषा की अनेक चुनौतियां भी होती है। उदाहरण के लिए पुस्तक के आवरण पृष्ठ पर ‘नम्बर’ लिखा गया है जबकि संग्रह में कविता के शीर्षक में ‘नंबर’ शब्द प्रयुक्त हुआ है। पंचमाक्षर का यह रूपभेद समरूपता की मांग यहां रखता है। कविताओं के साथ प्रयुक्त चित्रों को केवल कंप्यूटर के भरोसे नहीं छोड़ते हुए किसी कलाकार के माध्यम से अधिक मेहनत के साथ प्रस्तुत किए जाने की संभवाना बनी हुई है। ऐसी कुछ बातों के बावजूद यह संग्रह अपनी सरलता, सहजता, गेयता के कारण मनोहक और प्रभावशाली है। कवि को बाल मनोविज्ञान की गहरी समझ और भाषा की गहरी सूझ-बूझ है। उनके छंद-ज्ञान से संग्रह की इन बाल कविताओं को बल मिला है। 
०००००


14 दिसंबर, 2017

जीवनानुभवों को व्यंजित करती कहानियां

पुस्तक समीक्षा- डॉ. नीरज दइया
हिंदी जगत के लिए गौरव का विषय है कि वरिष्ठ कहानीकार हरदर्शन सहगल अब भी सक्रिय हैं। आपका जन्म 26 फरवरी, 1935 को कुंदियाँ, जिला मियाँवाली (अब पाकिस्तान) में हुआ, यानी उम्र के 82 वसंत देख चुके सहगल की एक लंबी कहानी और अपनी जीवन-यात्रा है। उन्होंने अपनी दिनचार्या में अब भी लिखने-पढ़ने को अबाध गति से जारी रखा है। निसंदेह वे आज कथा-साहित्य के प्रतिमान हैं किंतु फिर भी वे अपनी रचनाओं के बारे में छोटी से छोटी राय-टिप्पणी पर भी ध्यान देते हैं साथ ही निरंतर परिष्कार और परिवर्धन की बातें सोचते रहते हैं।
    हरदर्शन सहगल अपनी अपनी जीवन-कथा आत्मकथा के रूप में ‘डगर डगर पर मगर’ में लिख चुके हैं, फिर भी उनकी झोली में अनेक अपनी और आस-पास की कहानियां शेष हैं। गुलाम और आजाद भारत के साथ बदलते शहरों और लोगों के मंजर उनके जेहन में नित्य कथाओं के उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं। आपके कृतित्व की बात करें तो अब तक दस कहानी-संग्रह, एक व्यंग्य कथा-संग्रह, तीन उपन्यास, दो बाल उपन्यास, एक नाटक, एक हास्य संस्मरण, दस बाल कथा-नाटक संग्रह, कई संपादित पुस्तकें के अतिरिक्त बाल साहित्य की अनेक पुस्तकें तथा लगभग दो हजार से अधिक स्फुट रचनाएं प्रकाशित व प्रसारित हो चुकी है। उनका विभाजन की त्रासदी पर लिखा उपन्यास ‘टूटी हुई जमीन’ अनेक भाषाओं में अनूदित और चर्चित हुआ है। वहीं ‘वर्जनाओं को लाँघते हुए’, ‘कई मोड़ों के बाद’ संग्रह विशेष रूप से चर्चित रहे हैं। इसी शृंख्ला में उनका कहानी संग्रह ‘मुहब्बते’ आज के बदलते समय और संदर्भों में विशेष रूप से उल्लेखनीय इसलिए भी है कि इसमें उनकी प्रेम कहानियों को संकलित किया गया है। ‘मुहब्बतें’ में संकलित कहानियां केवल नायक-नायिका के देहिक प्रेम की कहानिया नहीं है, वरन यहां प्रेम के विशद और व्यापक बहुआयामी रूप को देखा-समझा जा सकता है।
    संग्रह के आवरण पर कहानीकार हरदर्शन सहगल और श्रीमती कमला सहगल का एक पुराना चित्र और किताबों के बीच उनकी उपस्थिति अपने आप में एक कहानी है। यहां यह बताना भी आबश्यक है कि कृति के समर्पण पृष्ठ पर अंकित है- ‘‘जिसका होना ही मेरा अस्तित्व है : कमला”
    संग्रह के आरंभ में ‘गल्प का यथार्थ’ शीर्षक से एक भूमिका है जिसमें कहानी के बदलते रंग-रूप पर व्यापक चर्चा करते हुए अनेक स्थापनाएं-आग्रह प्रस्तुत हुए हैं। मनुष्य के विचार-बोध और व्यवहार के अंतर के रेखांकित करते हुए हरदर्शन सहगल साहित्य के समाजवादी उद्देश्य के पक्ष में अपना मत रखते हुए अंत में दो छोटी मगर जरूरी बातें कहानी के संदर्भ में प्रस्तुत करते हैं, जो इस प्रकार है-“एक छात्र को मैडम सजा देती है। आगे जाकर वह डॉक्टर बन जाता है। सेवानिवृति पश्चात मैडम अस्पताल पहुंचती है डॉक्टर झट से आगे बढ़ कर मैडम के पांव छूता है- मैडम आपने मेरा जीवन संवार दिया।/ एक दूसरा छात्र है। उसे भी मैडम सजा देती है। आगे चलकर वह भी डॉक्टर बन जाता है। मैडम को देखते ही उपेक्षा से मुह फेर लेता है।/ दोनों ही यथार्थवादी कहानियां है। कौन सी अच्छी लगी?”
    कहानी अच्छी या बुरी से अधिक जीवनानुभवों को व्यंजित करती है। दोनों ही स्थितियों पर यदि उस छात्र के मनोविज्ञान का अध्ययन किया जाए तो गलत दोनों नहीं हैं किंतु हर चरित्र से एक पाठक और कहानीकार की अपेक्षा होती है। कहानी में कुछ रूढ़ चरित्र और आदर्शों के रहते बदलता यथार्थ पूर्ण रूपेण चित्रित होने के रह भी जाता है। इस भूमिका और हरदर्शन सहगल की कथा-यात्रा के विविध पड़ावों को देखते हुए निसंदेह कहा जा सकता है कि वे बहुधा चरित्रों को आदर्श स्थितियों में देखने के पक्ष में दिखाई देते हैं। उनका कहानीकार सदा संबंधों को बनाने और बनने पर बने रहने, बने रखने के पक्ष में सक्रिय रहा है। बिना जीवन मूल्यों के पोषण के कहानी या साहित्य का भला क्या उद्देश्य हो सकता है।
    ‘देश हुआ बेगाना’ में दो दोस्तों की मुहब्बत की अविस्मरणीय कहानी है जो विभाजन की त्रासदी और संत्रास को ब्यंजित करती है। इसी पृष्ठभूमि पर कहानी ‘आज़ादी के वे दिन उर्फ वह्शियाना तूफान’ है जिसमें भी 1947 के वे दिन आंखों के सामने साकार होते हैं। ‘टूटते हुए पंख’ को एक प्रयोग और प्रतीकात्मक कहानी कहना अधिक उपयुक्त होगा इसमें राजतंत्र की अनेक परतों को खोलते हुए एक मासूम पक्षी की कथा है। ‘हारमोनियम और ग्रामोफोन’ कहानी में भी संदर्भ देश के बंटवारे का है किंतु यह अपनी सांकेतिकता में एक मार्मिम संकेत भी छोड़ती है। हारमोनियम और ग्रामोफोन दोनों ही जीवन और संगीत के साथ हमारी कलात्मक रुचियों को प्रकट करने के उपकरण के रूप में कहानी में आएं हैं। कहानी के अंत में सरदार सिंह का हारमोनियम पहुंचाने का उपक्रम और यह संवाद- ‘संभालो अपनी दूसरी अमानत को! बड़ी मुश्किल से सब कुछ छोड़कर, इसे बचा लाया था।’ एक विशद संकेत है। यहां मानवीय मूल्य-बोध के साथ जीवन के संगीत की पुनर्रचना का स्वर भी कहानी से उभरता है। 
    ‘पहलू’ अपेक्षाकृत लंबी कहानी है जिसमें दशहत के सामने सिर उठाने के प्रसंग को बड़े कलात्मक ढंग से संजोते हुए प्रताप नारायण भार्गव के माध्यम से बदलते समय के साथ बदलती स्थितियों का चित्रण किया गया है। दादाजी के प्रति पौत्रों की मुहब्बत की इस कहानी के अंत में कहानीकार का कहना- ”अब यह कथा किसी को अयथार्थवादी लगे तो बेशक लगे लकिन हकीकत यही है कि अग्ले सप्ताह से बच्चों ने प्रताप बाबू के नेतृत्व में बाजार में पिकटिंग (धरना) शुरू कर दी। संवाददाता आये। प्रेस फोटोग्राफर आये। संसद का अगला सत्र शुरू होने वाला था। सो नेता भी आये। नहीं आये तो वो हफ़्ताबारी उगाहने वाले। पुलिसवाले, अपने ट्रासंफर के लिए नये-नये स्टेशनों की तलाश में मशगूल हो गये।” कहानी ‘इंतजार’ में मदमाती का प्रतिशोध जिस प्रविधि से आहिस्ता-आहिस्ता कहानी में फलित हुआ है वह प्रभावित करता है। 
    शब्दों के आवरण में कहानी में कल्पना भी यर्थाथ सदृश्य प्रस्तुत होती है। कहानी का द्वंद्व यह भी है कि कहानीकार के सामने जो यथार्थ है उसे वह उसी रूप में अथवा उसके परिमार्जित रूप में प्रस्तुत करता है। यथार्थ से अंश दर अंश चयनित कर उसे कहानी में घटित और फलित होने की प्रविधि हरदर्शन सहगल के यहां यहां तक पहुंचते पहुंचते जिस मानक तक आ गई है वह रेखांकित किया जाना चाहिए। कहानी में भाषिक प्रवाह के साथ अंत तक उत्सुकता को बनाए रखना भी एक कला है जिसे अथक साधना से सहगल जैसे कहानीकारों ने साध कर इस विधा को लोकप्रिय बनाए रखा है।
    संग्रह की दो कहानियों- ‘कुछ बंगले और मकान’ और ‘अंतर्जगत’ को कहानीकार ने ‘परा मनोवैज्ञानिक कहानी’ के रूप में रेखांकित किया है। शीर्षक कहानी ‘मुहब्बतें’ में नम्रता और वैभव के बदलते-बिगड़ते-संवरते संबंधों को परिवार और बच्चों के साथ प्रस्तुत करते हुए संबंधों के बने और बनाए रखने का स्वर भी है। संग्रह की शेष कहानियां भी अपने-अपने स्तर हमारे संबंधों के रहस्यों पर प्रकाश डालती हुई मन की अनेक परतों को खोलती और प्रभावित करती हैं।      
डॉ. नीरज दइया

मुहब्बतें (कथा संग्रह) कहानीकार : हरदर्शन सहगल, प्रकाशक- कलासन प्रकाशन, मॉर्डन मार्केट, बीकानेर (राज.), पृष्ठ : 150, मूल्य : 250/-, संस्करण : 2017   

10 दिसंबर, 2017

नम्बर वन आऊंला (राजस्थानी बाल कविताएं)

 कवि : पवन पहाड़िया, प्रकाशक- नेम प्रकासण ग्रा.पो. डेह (नागौर) राज. 341022, पृष्ठ : 52 मूल्य : 100/- संस्करण : 2014   
   
    राजस्थानी भाषा और साहित्य के लिए विगत तीन दशकों से सक्रिय पवन पहाड़िया की पहचान एक कवि और राजस्थानी भाषा मान्यता हेतु संघर्षशील रचनाकार के रूप में है। अपनी मातृभाषा के लिए ऐसे अनेक रचनाकारों की अपनी निष्ठाएं और आस्थाएं हैं, जिनके रहते वे अनेक मोर्चों पर स्वयं खड़े होने के लिए विवश हैं। पवन पहाड़िया भी एक कवि-लेखक के साथ-साथ जनचेतना और साहित्य के प्रचार-प्रसार-प्रकाशन हेतु सक्रिय है। इसके अतिरिक्त वे राजस्थानी भाषा के नए रचनाकारों को प्रेरित और प्रोत्साहित करने के लिए भी पहचाने जाते हैं। उन्होंने अनेक भामाशाहों को प्रेरित कर साहित्य पुरस्कार आरंभ किए हैं।
     ‘नम्बर वन आऊंला’ संग्रह पर पवन पहाड़िया को साहित्य अकादेमी का बाल साहित्य पुरस्कार (राजस्थानी) वर्ष 2017 का अर्पित किया गया है। यह बाल कविताओं का संग्रह उन्होंने प्रख्यात राजस्थानी साहित्यकार बी.एल. माली की प्रेरणा से लिखा है और यह संग्रह उन्हें ही समर्पित किया गया है। इस संग्रह की भूमिका में कविताओं में वर्णित विषयों और भावबोध का खुलासा करते हुए आलोचक डॉ. गजेसिंह राजपुरोहित लिखते हैं- ‘‘एक अबोध बाल का मन सदैव आगै बढ़ने की चाहत रखता है। यही चाहत उसे सदैव सफलता के शिखर तक ले जाती है। उसी चाहत को कवि अपनी रचनाओ- नम्बर वन आऊंला के मार्फत बालकों में जाग्रत करता है। चेतना को ललकारता है कि वह किसी से कम नहीं है, वह सदा सत्य के मार्ग चलते हुए एक नया इतिहास रचेगा। यही चाहना ही उसे सफलता दिलाती है, सर्वश्रेष्ठ बनाती है।’’
    आरंभ में अपनी बात ‘मेरा दर्द’ शीर्षक से व्यक्त करते हुए कवि पवन पहाड़िया लिखते हैं- “नई पीढ़ी से मेरा आग्रह है कि वे चाहे अंग्रेजी में पढ़े-लिखें या हिंदी में पर घर में अपनी मातृभाषा को काम में लेंवे।” घर-परिवार और समाज में भाषा को संस्कार बनाएं रखने और जाग्रत करने के प्रमुख धेय से ही कवि ने इस संग्रह की 41 कविताएं लिखी है। पुस्तक की पहली कविता वंदना के रूप में करतार से अरदास है तो दूसरी बाल कविता ‘तिंरंगो’ में देश-भक्ति की भावना उजागर होती है। संग्रह में बालकों के आत्मीय और निजी संबंधों यथा मां, बहन आदि के महत्त्व को भी उजागर किया गया है। कवि कविताओं में श्रम के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए संदेश भी देता है कि पढ़ने-लिखने के साथ-साथ खेलना-कूदना भी जीवन में उतना ही आवश्यक और अनिवार्य है। शिक्षा और चरित्र निर्माण की भावना इन कविताओं में प्रमुखता से उभर कर सामने आती हैं।
    संग्रह की अनेक कविताएं प्रेरणादायी है जिनमें बालकों से पानी के महत्त्व और वृक्षारोपण जैसे अनेक मुद्दों पर सीधा संवाद है। कवि मौसम की बात करते हुए गर्मी, सर्दी और वर्षा के मौसमों के विविध रंगों को कविताओं में शब्दबद्ध कर अनेक बिंब रखते हुए सुंदर चित्रों को जैसे चित्रित करते हुए बालकों को समोहित करता है। कविताओं में बालकों को प्रिय लागने वाली तितलियों और बिल्लियों की दुनिया के साथ अन्य पशुओं-पक्षियों को भी वर्णित विषय बनाया गया है। इन कविताओं से बालकों में भारतीय त्यौहारों का हर्ष-उल्लास एक झलक के रूप में प्रस्तुत होता है। होली, दीपावली, अक्षय तृतीया और मकर सक्रांति जैसे पर्वों के माध्यम से बालकों को संस्कारित करने का प्रयास भी हुआ है।
    संग्रह की शीर्षक कविता में राजस्थान सरकार द्वारा प्रतिभावान विद्यार्थियों को ‘लेपटोप’ दिए जाने को केंद्र में रखते हुए उन्हें प्रेरित करने हेतु एक बाल मन के उद्गार कवि ने लयबद्ध अभिव्यक्त किए हैं। मूल कविता की आरंभिक पंक्तियां हैं- ‘लेपटोप घर में ल्याऊंला / मां म्हैं नंबर वन आऊंला / बैगो दिनगै म्हनै उठाज्यै,/ दांतण करियां पाठ पढ़ाज्यै।’ बच्चों के द्वारा बच्चों को संदेश देना अधिक प्रेरक और प्रभावशाली है।
    बाल साहित्य के लिए कवि पवन पहाड़िया का सक्रिय होना सुखद है पर भाषिक संरचनागत कुछ बातों का भी यहां विशेष ध्यान रखा जाना आवश्यक है। बालक जो भाषा सीख रहा है उसके समक्ष भाषा की अनेक चुनौतियां भी होती है। उदाहरण के लिए पुस्तक के आवरण पृष्ठ पर ‘नम्बर’ लिखा गया है जबकि संग्रह में कविता के शीर्षक में ‘नंबर’ शब्द प्रयुक्त हुआ है। पंचमाक्षर का यह रूपभेद समरूपता की मांग यहां रखता है। कविताओं के साथ प्रयुक्त चित्रों को केवल कंप्यूटर के भरोसे नहीं छोड़ते हुए किसी कलाकार के माध्यम से अधिक मेहनत के साथ प्रस्तुत किए जाने की संभवाना बनी हुई है। ऐसी कुछ बातों के बावजूद यह संग्रह अपनी सरलता, सहजता, गेयता के कारण मनोहक और प्रभावशाली है। कवि को बाल मनोविज्ञान की गहरी समझ और भाषा की गहरी सूझ-बूझ है। उनके छंद-ज्ञान से संग्रह की इन बाल कविताओं को बल मिला है। 

     डॉ. नीरज दइया

08 नवंबर, 2017

परख / पंच काका के जेबी बच्चे

यशवंत कोठारी
------
कवि-आलोचक नीरज दइया इन दिनों व्यंग्य में सक्रिय है। इस पोथी में उनके ताजा व्यंग्य संकलित है जो उन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं हेतु लिखे हैं। इन व्यंग्य रचनाओं के बारे में सुपरिचित व्यंग्यकार-संपादक सुशील सिद्धार्थ ने एक लंबा, सचित्र ब्लर्ब लिखा है जो उनके फोटो के साथ अवतरित हुआ है। संकलन में नीरज के चालीस व्यंग्य हैं, भूमिका महेश चंद्र शर्मा ने लिखी है जो स्वयं एक बड़े संपादक हैं। वर्तमान की विसंगतियों पर नीरज की पैनी नजर है, वे चीजों को बहुत ध्यान से देखते हैं फिर पूरी शालीनता के साथ व्यंग्य के रूप में रियेक्ट करते हैं, यहीं आज के व्यंग्य की मूलभत आवश्यकता है, जिसे लेख लिखने वाले भूल जाते हैं, मगर कविमना नीरज सब कुछ संजो कर पाठकों के साथ ताल मेल बिठा कर अपनी बात कहते हैं। व्यंग्य की यही विशेषता होती है। पाठक आपको मिल जाए।
अधिकांश रचनाएं कलेवर में छोटी है, काश नीरज पूरी लंबाई की रचना लिखते फिर संपादित कर अखबारों को देते , क्योंकि अखबारों में आजकल जगह खत्म, लेख खत्म, प्रभारी ज्यादा मेहनत नहीं करते। नीरज पाठकों को गुमराह नहीं करते, वे सीधा संवाद करते हैं। वे लंबी-चौड़ी नहीं हांकते, बस काम की बात करते हैं। लगभग सभी रचनाओं में पंच काका उपस्थित है, यह पंच हिंदी का तो है ही अंग्रेजी का भी पंच है। हर रचना में पंच है जो पाठक को झकझोर देता है। मास्टरजी का चोला इस संकलन का सबसे अच्छा व्यंग्य है। सेल्फी पर भी लेखन ने अच्छा लिखा है। लेखक का वर्तमान परिवेश से अच्छा नाता है, वे बार-बार समाज में व्याप्त विसंगतियों पर प्रहार करते हैं।
दाढ़ी पर भी उन्होंने खूबसूरत व्यंग्य लिखा है। नीरज का कवि रूप भी इन रचनाओं में विचरता रहता है। साहित्य संबंधी व्यंग्यों में कटु यथार्थ के दर्शन होते हैं। नीरज के इन व्यंग्यों में बिम्ब है, प्रतीत है, वक्रता है, वे इन औजारों का जम कर इतेमाल करते हैं। ‘अपने अपने भूत’ ऐसा ही व्यंग्य है। काश वे कुछ और रचनाओं को शामिल करते, पुस्तक का कलेवर छोट है, मूल्य अधिक।
पुस्तक का शीर्षक व्यंग्य- पंच काका के जेबी बच्चे कुछ आत्म व्यंग्य की तरह शुरू होता है फिर जाकर सार्वजनिक हो जाता है। यह कला कम ही लेखक साध पाते हैं। नीरज ने यह कर दिखाया है। कई जगहों पर राजस्थानी मुहावरे हैं, जो मन को खुश कर देते हैं पिताजी के जूते ऐसा ही व्यंग्य है।
अमुख, प्रमुख और आमुख लेखक एक साहित्यिक व्यंग्य है जिसे लगभग हर लेखक ने जिया है। मानदेय हर सच्चे लेखक की दुखती रग है। साहित्यिक मेलों प्र भी लेखक ने कलम तोड़ कर रख दी है। कुल मिलाकर सुधि पाठक इस संकलन का स्वागत करेंगे। अब कुछ बात कालम लेखक की। नीरज के ये व्यंग्य किसी कॉलम की मर्यादा के साथ चलते हैं, कॉलम का अनुशासन या संपादक का अनुशासन मानना ही पड़ता है लेखक को अपनी मजबूरियों को नजर अंदाज कर कॉलम की मजबूरियों के साथ जीना पड़ता है या जीना सिखना पड़ता है। यही है वो कारण जो एक क्लासिक रचना को रोक देता है।
मैं इस रचना का स्वागत करता हूं। वे खूब लिखें। पुस्तक का कवर प्रतीकात्मक है मगर सुंदर है। इस संकलन को पढ़ने के बाद यह कहा जा सकता है कि राजस्थान का हिंदी व्यंग्य लेखन का भविष्य उज्ज्वल है। वे रांगेय राघव, अशोक शुक्ल, भगवती लाल व्यास की परंपरा को आगे बढ़ाएंगे। आमीन।
००००
पंच काका के जेबी बच्चे / डॉ. नीरज दइया / व्यंग्य संग्रह / वर्ष 2017 / मूल्य 200/- / पृष्ठ 96 / सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर-334001
(मधुमती : अक्टूबर, 2017)

18 अक्टूबर, 2017

‘पाछो कुण आसी’ - मानवीय संवेदनाओं व हेत-प्रेम के जीवंत चित्र

० सी.एल. सांखला, कोटा
    मनुष्य होने की पहचान उसके अंतस में हेत-प्रेम व मानवीय संवेदनाओं का संचरण ही है। संवेदनाओं की सघनता मनुष्यता को सही मायने में प्रामाणिक बनाती है। अमूर्त भावनाओं का जितना अधिक जुड़ाव जीवन से होता है, वे उतनी ही तीव्रता से कविता में ढलकर समूर्त होने लगती है।
    राजस्थानी कविता और गद्य में अपनी गहरी पकड़ व पैठ रखने वाले नीरज दइया तीन चार दसकों में जो साहित्य सर्जना की है, बेहद मूल्यवान है। कविता संग्रह ‘साख’ (1997), देसूंटो (2000), हिंदी कविता- ‘उचटी हुई नींद (2013) तथा ‘आलोचना रै आंगणै’ (2011), ‘बिना हासलपाई’ (2014) आदि उम्दा रचाव के साक्ष्य हैं। वर्ष 2015 में सर्जना बीकानेर से प्रकाशित राजस्थानी कविता संग्रह ‘पाछो कुण आसी’ की कविताएं मनुष्य की आंतरिक संवेदनाओं व हेत-प्रेम की सशक्त अभिव्यक्ति है।
    वक्त की गिरफ्त में संवेदना शून्य हुए व्यक्ति को जगाने व पुनः संवेदित करने के सद्प्रयत्न में कवि बार-बार ‘हेलो’ करता है-
म्हैं हेलो करूं
हेला माथै हेलो करूं
बारंबार करूं
दिन-रात करूं
मन-आंगणै करूं...
कदैई तो सुणैला थूं। (हेलो)
    कवि की दृष्टि में संवेदनशील मानवीय चेतना से मिलन अथवा अनुभूति ही सही मायने में पुण्य कर्म या सौभाग्य है तथा उससे परे हो जाना ही पाप या दुर्भाग्य है। कवि को यह दृष्टि यथार्थ व आदर्श तथा विज्ञान व अध्यात्म को सुसमन्वित करती है-
        थारी ओळूं में जीवणो
        पुन्न है म्हारो
        थनै बिसरावणो पाप। (पाप-पुन्न)
    मनुष्य जीवन एक सत्य है परंतु मृत्यु उससे भी अधिक ठोस सत्य है। जीवनदात्री बहमाता जब अतिरिक्त जीवन शक्तियां देती हैं तो मुस्कुराती है। साथ ही कवि भी मुस्कुराता है। दोनों जानते हैं कि जीवन से पहले मृत्यु लिखी जा चुकी है-
        जीवण सूं पैली मौत लिखी
        कीं देवण लाग्या जद बैमाता
        मुळक्या
        मुळक देख’र मुळक्यो म्हैं। (बिसरगी मुळकती-मुळकती)
बहुत ही कम शब्दों में कवि नीरज दइया बहुत बड़ी बात कहने में सिद्धहस्त हैं-
        लोग मौको तकै
        ठाह ई कोनी लागण देवै
        काट’र लेय जावै नस। (लोग मौको तकै)
दइया की इन कविताओं में रोमांचक रूपक एवं बिम्ब योजनाएं दृष्टव्य है-
        आंख री छियां-छियां
दीठ लेय’र जावै
सुपना रै देस। (मिनख एकलो कोनी)
    अंतरंग रागात्मकता और मानवीय हेत-प्रेम मनुष्यता की कसौटी भी है जो इन कविताओं में बखूबी देखी जा सकती है-
थारी ओळ्यूं मांय
खदबदीजै काळजो
बरसै बादळां दांई
थारी हूंस... ! (हूंस)
    कवि मानव मन की इच्छा शक्ति तथा क्रियाशीलता को जिंदगी के लिए आवश्यक मानता है अन्यथा जिंदगी व मौत में कोई अंतर नहीं रह जाता। ‘सगळा मारग’ कविता से ये पंक्तियां शायद यही बात कहती है-
जे मिलण री हूंस नीं
कांई करैला संजोग
आपां रै मून रैयां
मर जावैला
सगळा मारग। (सगळा मारग)
    वस्तुतः ये कविताएं अमूर्त भावों की कोरी कल्पनाएं न होकर साधारण आदमी की जद्दोजहद एवं जीवट की मूर्त अभिव्यक्ति है। जिनमें संदेश भी है और प्रेरणाएं भी-
साची ! अंगूठो कैवतां ई
म्हारी आंख्यां साम्हीं आवै- गुरु द्रोण
जे कर लेवूं आंख्यां आडो हाथ
लखावै- गायब हुयग्या म्हारा अंगूठा...। (अंगूठो)
    ‘पाछो कुण आसी’ कविता संग्रह की सभी कविताओं में यूं तो छंद मुक्त कविताएं है जिनमें गद्य कविताओं की बानगी हैं, किंतु सही मायने में ‘गद्य कविताएं’ शीर्षक देकर जो संकलित है उनमें ‘चालो माजी कोटगेट’, ‘इंदरधनुस’, ‘ऊंट’, ‘चकारियो’, ‘भींत’, ‘धीरज’, ‘प्रेम’ आदि कविताएं पढ़ना व समझना जरूरी है। यह एक बेजोड़ संग्रह है। इनमें अतीत के गुणगान नहीं, वरन गुजरे वक्त की जीवंत बची धड़कने साफ सुनाई देती है। यहां समय के साथ कदमताल करती जिंदगी तथा बदलते समय की आबोहवा में सांस लेती मनुष्यता की लिखावट में तृष्णा और भटकाव है तो भविष्य की असल कथाएं कहती कविताएं भी। भले ये कविताएं सम्मोहन पैदा न करती हो, पर यथार्थ की परते खोलती हुई पथराई आंखों को खोलती है तथा सुप्त संवेदनाओं को जगाती है। यहां मानवीय जीवन का अद्भुत व सौम्य चित्रण सहज ही देखने को मिलता है। माटी की सौंधी महक से नहाए हुए शब्द एवं राजस्थानी मुहावरों से सुगुंफित कवितांश व काव्यावलियां पाठक को सहज ही प्रभावित करने वाली है।
पुस्तक-        पाछो कुण आसी
विधा-           राजस्थानी कविता संग्रह
कवि-           डॉ. नीरज दइया
प्रकाशक-     सर्जना प्रकाशन, बीकानेर
कीमत-        140 रिपिया
संस्करण-     2015
पृष्ठ-             96


दैनिक युगपक्ष 07-11-2017 

09 अक्टूबर, 2017

टांय टांय फिस्स

पुस्तक समीक्षा-
============================================
टांय टांय फिस्स   व्यंग्यकार : डॉ. नीरज दइया प्रकाशक- सूर्य प्रकाशन मंदिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग) बीकानेर पृष्ठ : 96 मूल्य : 200/- संस्करण : 2017   
================================   
    राजस्थान के व्यंग्य लेखन परिदृश्य में आज फारुख अफरीदी, अतुल चतुर्वेदी, अनुराग वाजपेयी, अजय अनुरागी, बुलाकी शर्मा, मधु आचार्य आशावादी, नवनीत पांडेय और अब नीरज दइया भी शामिल हो गये। डॉ. नीरज दइया के सद्य प्रकाशित व्यंग्य संग्रह ‘टांय टांय फिस्स’ में उनके चालीस व्यंग्य संकलित हैं। इन व्यंग्य रचनाओं से गुजरते हुए कहा जा सकता है कि डॉ. नीरज दइया उन व्यंग्यकारों में से एक हैं जिनके लेखन में भौतिकतावादी संस्कृति का एहसास हावी नहीं हुआ हैं। अथवा यूं कह लीजिए कि वे अपनी चिंताओं में मनन करने वाले अन्वेषी हैं। अन्वेषक का काम ही अनुसंधान करने का होता है। नए-नए तथ्यों को तलाशना और उस पर मौजूं तरीके से अपनी बात को कहना होता है, जिस पर नीरज दइया को विशेष अधिकार प्राप्त है।
    नीरज दइया के व्यंग्य आज समकालीन परिदृश्य में गंभीरता से अपनी मौजूदगी बनाए हुए हैं, उनकी यह चिंता व्यंग्यधर्मिता के प्रति उनके मौलिक चिंतन को जहां व्यक्त करती है, वहीं उनकी सक्रियता को भी दर्शाती है कि क्यों एक कवि-कथाकार व्यंग्य लिखने को विवश हुआ। उनका समाज के प्रति दायित्वबोध व्यंग्य के माध्य से अपनी चिंताओं के साथ अभिव्यक्त हुआ है।
    संग्रह के आरंभ में प्राक्कथन में वरिष्ठ साहित्यकार भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’ ने लिखा है- ‘डॉ. नीरज दइया एक बहुश्रुत और बहुपठित लेखक है।’ इस उक्ति के साक्ष्य में देखें तो संग्रह में संकलित विविध वर्णी व्यंग्यों में नीरज के लेखन में एक ताजगी दिखती है, वह विषयों को समाज से ही उठाते है लेकिन उसको प्रस्तुत निराले ढंग से करते हैं।
    संग्रह की सभी व्यंग्य रचनाओं में एक स्थाई चरित्र के रूप में पंच काका की उपस्थिति से अपनी मौलिकता और निजता बनी है। पंच काका के माध्यम से अनेक सत्यों को उद्धाटित किया है तो व्यंग्यकार नीरज दइया ने व्यंग्य करते हुए खुद को भी नहीं छोड़ा है। वे अपने आप पर व्यंग्य करने का कौशल रखते हैं इसिलिए उनके व्यंग्य में शालिनता और शिष्टता एक स्थाई भाव के रूप में देखी जा सकती है।
    विगत दो वर्षों से मैं उनके लेखन का साक्षी रहा हूँ, वे नियमित रूप से कालम लेखन में भी हाथ आजमा रहे हैं। उनका यह हुनर पक्का तीरंदाज बनाने में कामयाब रहा है। रोजमर्रा के विषय कब व्यंग्य के विषय बन जाते है और कब विसंगतियां उस पर हावी हो जाती है। यह एक प्रकार की बैचैनी है, जो लेखक को औजार देती है कि अब आपका काम है कि रनदे से उस वास्तविकता को निखार कर उसे नए अर्थ से भर दें, या उसे परिभषित कर दें। नीरज दइया के लेखन में कहीं कोई दुराव या छिपाव नहीं है। जैसे बड़ी कंपनियां अपने उत्पाद को बेचने के लिए हथकंडे अपनाती है। ऐसा कुछ भी यहां देखने को नहीं मिलेगा। कोई कंडीशन अप्लाई वाला बोर्ड यहां चस्पा नहीं। अपने लेखन से विशुद्ध सरोकार रखने वाले व्यंग्यकार नीरज दइया कभी किसी दौड़ में शामिल नहीं रहे। लेकिन लेखकीय गुण, माहौल उन्हें शुरू से ऐसा मिला कि वे खुद भी मौलिक लेखन के अंतर्गत कविता-आलोचना और अनुवाद-कर्म करते हुए व्यंग्य लेखन में पूरी ठसक के साथ आ गए।
    समकालीन व्यंग्य रचनाओं में बदलती स्थितियों के साथ त्वरित टिप्पणियां भी शामिल होने लगी है। हर्ष का विषय है कि इस संग्रह में समकालीनता का आग्रह होते हुए भी स्थितियों पर गहनता से सोच-विचार कर उनको आधार बनाया गया है। जीवनानुभव और जीवन की स्थितियों से मुठभेड़ करते हुए नीरज दइया ने मीठी आलोचना का मीठा फल!!, रचना की तमीज, ‘सामान्य’ शब्द कैसे है सामान्य, खाने-पीने की शिकायत, विकास का गणित, साहित्य माफिया, याद नहीं अब कुछ, बेईमानों पर पड़ी बड़ी मार और टांय टांय फिस्स आदि व्यंग्य लिखते हुए व्यंग्य की लाठी को बचाए रखा है। 
    नीरज दइया का लेखन विश्वसनीय है। समाज के विषय अब उनके विषय होते जा रहे हैं। व्यंग्य लेखन का दर्द वे समझते है और तभी उनके पास विसंगतियां आकर मुस्कराने लगती हैं। उनके तेवर को देख कर लगता है कि उनकी आलोचना में भी अच्छी पकड़ हो सकती हैं। विषय में से अपने हिस्से की धूप निकाल लेना नीरज दइया भली-भांति जानते है। टांय टांय फिस्स व्यंग्य संग्रह के व्यंग्य निश्चित ही पठनीय है, और पाठकों द्वारा पढ़े जा रहे हैं। व्यंग्य-यात्रा के सम्पादक डॉ. प्रेम जनमेजय का यह कहना कि व्यंग्य लेखन ऐसा धारधार विषय है कि वह इतना पैना है कि सामने वाले को भयभीत कर दें, लेकिन बिना अहित किए। इससे साफ जाहिर है कि नीरज दइया के पास एक सशक्त भाषा है जिसका उपयोग वे अपने लेखन में बेबाक तरीके से कर रहे हैं। कहीं-कहीं उनके लेखन में हरीश नवल जैसे अत्यंत शालीन व्यंग्यकार बोलते दिखते है तो लगता है कि ‘टॉय-टॉय फिस्स’ को पहचान मिलने में अब देर नहीं। नीरज दइया को लेखन में श्रीलाल शुक्ल होना है, तो मार्कें का सुभाष चन्दर भी। फिलहाल व्यंग्यकार डॉ. दइया को शुभकामनाएं कि उनका लेखन यशस्वी हो, वे अपने पाठक अर्जित करें। पुस्तक के सुरुचिपूर्ण मुद्रण और आकर्षक प्रस्तुति के लिए प्रकाशक साधुवाद के पात्र हैं।
- डॉ लालित्य ललित
सम्पादक, नेशनल बुक ट्रस्ट,इंडिया,
नेहरू भवन, 5,इंस्टिट्यूशनल एरिया,फेज-2,
वसन्त कुंज,नई दिल्ली-110070


04 अक्टूबर, 2017

मील का पत्थर : आधुनिक लघुकथाएं

पुस्तक: आधुनिक लघुकथाएं (अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में संकलित)
सम्पादक: डॉ. नीरज दइया/श्री राजेन्द्र जोशी
प्रकाशक: सूर्य प्रकाशन मन्दिर, नेहरू मार्ग (दाऊजी रोड), बीकानेर
संस्करण: 2017 ; मूल्य: 100 रूपये मात्र


सृजन-नगरी बीकानेर में 14वें अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन के पहले ही सत्र में पुस्तक आधुनिक लघुकथाएं का
लोकार्पण होना अपने आप में बीकानेर के लिए बहुआयामी उपलब्धि माना जाएगा। उपलब्धि की पहली बात तो यही है कि यह सम्मेलन यहाँ हो रहा है, इससे इतर उपलब्धियां इस आशय में कि बीकानेर के सम्पादक द्वय डॉ नीरज दइया एवं श्री राजेन्द्र जोशी द्वारा लघु अवधि में स्तरीय लघुकथाएं संकलित करने का सफल प्रयास सामने आया। साथ ही इन संकलित लघुकथाओं को पुस्तकाकार देने में  देशभर में विख्यात सूर्य प्रकाशन मन्दिर के डॉ प्रशान्त बिस्सा एवं उनकी टीम का परिश्रम रंग लाया। इसके उपरान्त विशिष्ट उपलब्धि यह कि इस पुस्तक का लोकार्पण देशभर के ख्यातनाम लघुकथाकारों के सान्निध्य में हो रहा है।
पुस्तक में संकलित लघुकथाएं पढ़ते समय पाठक को प्रत्येक लघुकथा में जहां मानवीय संवेदनाओं का ज्वार उठता महसूस होता है वहीं हर कथा का प्रत्येक पात्र आपको समाज में अपने आसपास देखा, जाना-पहचाना - सा लगता है। यही इन कथाओं की श्रेष्ठता और सफलता का द्योतक है। पुस्तक का आकर्षक आवरण बीकानेर के जाने-माने कलाकार गौरीशंकर आचार्य का बनाया हुआ है, जो कि एक नज़र देखने पर ही गौरीशंकर की अनूठी शैली स्मरण करवा देता है। लघुकथाएं संकलित कर पुस्तकाकार रूप में पाठकों तक पहुंचाने का यह प्रथम प्रयास नहीं है।
इससे पूर्व भी राजस्थान ही नहीं, देश के जाने-माने सृजनकर्ताओं ने श्रेष्ठ रूप में ऐसे सफल प्रयास किए हैं। किन्तु आधुनिक लघुकथाएं का यह संकलन इसलिए भी इतर माना जाना चाहिए कि  इन कथाओं  में एक ओर जीवन मूल्यों को महत्ता दी गई है तो साथ ही हमारे आसपास श्वांसें लेती विसंगतियों को तीक्ष्ण प्रहार के साथ उकेरा गया है। यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि लघुकथा की पहचान के तत्वों को इस संकलन में देखा जा सकता है जैसे कि लघुकथा परम्परा में सकारात्मक पक्ष को विकसित करना। ऐसे तत्वों को पुस्तक की प्रथम रचना ‘पास‘ ( अर्जुनदान चारण ) से लेकर अंतिम कथा ‘पेट’ ( पारस दासोत ) तक पाठक बखूबी रेखांकित पाते है।
लघुकथा पास में आजादी के सिपाही और थाने के सिपाही के माध्यम से कथाकार ने देश को आधुनिक दौर तक पहुंचाने वालों की हालत को आसानी से उकेर दिया है। इस कथा में सरकारी, निजी, वृद्ध, जवान, राज का नौकर और निजी क्षेत्र का कामगार वर्ग की स्थिति का रेखांकन यूं हुआ है मानो आपकी आंखों में लगा सुरमा कोई निकाल ले गया और आपको खबर हुई तो हक्केबक्के रह गए। मानवीय संवेदनाओं का सागर लहराता दिखता है लघुकथा पेट में। श्रमिक वर्ग को यह मालूम ही नहीं कि जिस पेट के लिए वह दिनरात खटता है वह पेट होता क्या है? इससे बड़ी बात इतने कम शब्दों में पिरोने के लिए लघुकथाकार को सलाम। सलाम उन सभी लघुकथाकारों को भी, जिन्होंने लघुकथा परम्परा को बदलते समय और समाज के साथ समन्वय करते हुए संक्षेप में शाब्दिक रूप देते हुए गागर में सागर भर कर दिखाया है। पेज 28 पर भूत और इमली की सांटी/ जयप्रकाश मानस को पढ़ते समय आपको अपना बचपन जरूर याद आएगा। साथ ही याद आएंगी ऐसी अनेकानेक बातें, जिनमें अंधविश्वास और समाज की दशा/दिशा पर आपने यकीनन कई मर्तबा मंथन किया होगा।
पेज 63 पर लक्ष्मीनारायण रंगा की लघुकथा लोरी को आजादी से लेकर अब तक के सभी नेताओं को भी पढ़ना चाहिए। ईश्वर न करे, लघुकथा में वर्णित लोरी हमारी भावी पीढ़ी सुनने का दुर्भाग्य पाले। सच तो यह है कि इस पुस्तक की सभी लघुकथाओं में ऐसी-ऐसी विशिष्टताओं को पाठक पाएंगे जिन्हें वर्णित करने के लिए इस पुस्तक से भी अधिक पृष्ठों वाली एक और पुस्तक की रचना करनी पड़े।
अशफाक कादरी की राज, गोविन्द शर्मा की रक्षा, डा जसवीर चावला की एक दिव्य आत्म-हत्या, देवकिशन राजपुरोहित की माकूल जवाब, नदीम अहमद नदीम की दरबार, नीति केवलिया की नजरिया, फारूक आफरीदी की चोट, डा मदन गोपाल लढ़ा की गहराता सन्नाटा, माधव नागदा की पुराना दरवाजा, राजेंद्र शर्मा मुसाफिर की अहिंसा का स्मरण इत्यादि-इत्यादि सभी ऐसी कथाओं का सागर है आधुनिक लघुकथाएं। सोने पर सुहागा यह कि डॉ अशोक कुमार प्रसाद का अन्वेषणात्मक आलेख लघुकथा का वर्तमान, जयप्रकाश मानस की कलम से लघुकथा की शास़्त्रीयता जैसे शिक्षाप्रद और संग्रहणीय पाठ भी इस पुस्तक में शामिल हैं। शुभ कामनाएं कि निकट भविष्य में यह पुस्तक हमें सभी स्तरीय पुस्तकालयों, वाचनालयों में पढ़ने को मिलेगी तथा हिन्दी साहित्य पाठ्यक्रम में शिक्षण संस्थाओं द्वारा शामिल की जाएगी। आधुनिक लघुकथाएं पुस्तक के लिए सम्पादक द्वय डॉ नीरज दइया और श्री राजेन्द्र जोशी एवं प्रतिष्ठित सूर्य प्रकाशन मन्दिर एवं आवरण चित्रकार गौरीशंकर आचार्य को साधुवाद।
- मोहन थानवी

24 सितंबर, 2017

विद्रूप चित्रण से ज्यादा प्रभावी प्रहार

० अरविंद तिवारी
    बीकानेर न केवल साहित्य की उर्वर भूमि है बल्कि सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए पूरे भारत में जाना जाता है। रंगकर्म से लेकर आर्ट गैलरी में समय-समय पर लगने वाली प्रदर्शनियों को मैंने निकट से देखा है। एक दर्ज़न से अधिक साहित्यकारों की ख्याति अखिल भारतीय स्तर की है। हिंदी साहित्य वास्तव में बीकानेर का ऋणी है। फ़िलहाल वहाँ के तेजी से उभर रहे व्यंग्य लेखक डॉ. नीरज दइया के दूसरे व्यंग्य संग्रह "टांय टांय फिस्स" के बारे में कुछ कहने-लिखने का मन है। बीकानेर वह धरा है जहाँ मालीराम शर्मा, डॉ. मदन केवलिया, बुलाकी शर्मा, हरदर्शन सहगल जैसे दिग्गज व्यंग्यकारों ने व्यंग्य साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान बनाया है। मालीराम शर्मा का स्तम्भ लेखन बेहद पठनीय और लोकप्रिय रहा है। ऐसे वातावरण वाले शहर में व्यंग्यकारों का उभरना सामान्य बात है। नए व्यंग्यकारों के लिए अपने इन दिग्गजों से सीखने के विपुल अवसर रहते हैं। चुनौतियाँ भी इन्हीं के लेखन से हैं।
    नीरज दइया के दूसरे व्यंग्य संग्रह "टांय टांय फिस्स" में कुल 40 व्यंग्य संकलित हैं। उनका शुरुआती व्यंग्य संग्रह- ‘पंच काका के जेबी बच्चे’ से यह व्यंग्य संग्रह काफी परिपक्व है। वैसे अन्य अनुशासनों में डॉ. नीरज दइया का नाम बेहद जाना-पहचाना है, खासकर राजस्थानी साहित्य में। उनके पिताजी स्व. सांवर दइया राजस्थानी साहित्य के चर्चित साहित्यकार हुए हैं। डॉ. नीरज दइया ने यह संकलन राजस्थानी और हिंदी के साहित्यकार डॉ. मंगत बादल को समर्पित किया है। मंगत जी व्यंग्य भी लिखते हैं। भूमिका जाने-माने व्यंग्य कवि भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’ ने बेहद भावुक होकर लिखी है। प्रशन्सात्मक भूमिका नीरज जी को अच्छा और अच्छा लिखने के लिए प्रेरित करेगी।
    'ये मन बड़ा पंगा कर रहा है' व्यंग्य में लेखक कहता है- 'एक दिन सोचा मन की फ़ोटो प्रति कर ली जाय मगर मन है कि पकड़ में नहीं आता। 'फन्ने खाँ लेखक नहीं' में लेखक कहता है- लेखक होना अपने आप में अमर होना है। इस अमरता के लिए ही लेखक मरे जा रहे हैं। "सबकी अपनी अपनी दुकानदारी" में नीरज जी लिखते हैं- 'अच्छे दिन हैं कि सभी घास खाएं और सोएँ।’ ‘वी आई पी की खान’ व्यंग्य में वी आईं पी कल्चर पर प्रहार किया गया है। ‘साहित्य माफिया’ में वह लिखते हैं- साहित्य भी एक धंधा बन चुका है। आज किसके पास समय है कि साहित्य जैसे फक्कड़ धंधे में हाथ आजमाए। ‘चीं-चपड़, गटर-गूं और टीं-टा-टू’ व्यंग्य में कहा गया है- पिंजरा केवल चूहों के लिए, हम सभी के लिए अलग अलग रूपों में कहीं न कहीं किसी न किसी ने निर्मित कर रखा है।
    इस व्यंग्य संग्रह में आक्षेप, भर्त्सना, कटाक्ष आदि व्यंग्य रूप प्रचुरता में विद्यमान हैं लेकिन विट, आइरनी, ह्यूमर आदि न के बराबर है। विद्रूप चित्रण से ज्यादा प्रभावी प्रहार हैं। यदि इन सशक्त प्रहारों के साथ विद्रूपता को साध लिया जाय तो नीरज जी का लेखन ऐतिहासिक हो जायेगा। भाषा साधारण किन्तु प्रवाहमयी है। पंच काका की हर व्यंग्य में उपस्थिति से शैलीगत प्रयोग नहीं हो पाये हैं। इस सन्दर्भ में मुझे अपना प्रतिदिन का नवज्योति में कॉलम लिखना याद आ गया। ढाई साल तक मैंने रोजाना व्यंग्य कॉलम लिखा था- "गयी भैंस पानी में" शीर्षक से। शुरुआती दिनों में मैं हर व्यंग्य में भैंस को ले आता था, जिससे व्यंग्य की धार कुंद हो जाती। दस दिनों बाद संपादक और मित्रों के टोकने पर मैने शैली बदल दी थी। बहरहाल इस संग्रह के बाद व्यंग्य जगत को नीरज जी से उम्मीदें बढ़ गयीं हैं।
००००
टांय टांय फिस्स (व्यंग्य संग्रह) डॉ. नीरज दइया ; अवरण चित्र : के. रवीन्द्र ; संस्करण : 2017 ; पृष्ठ : 96 ; मूल्य : 200/- ; प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334003


25 अगस्त, 2017

बुलाकी शर्मा की सृजन में आलोचना-दृष्टि से प्रवेश

हिन्दी साहित्य का यह सबसे बड़ा और कटु सत्य है कि यहां विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों द्वारा शोध, आलोचकों द्वारा की रचना की बजाय नाम को महत्त्व अधिक दिया जाता है, कमोबेश यह भेड़चाल है जिसका खामियाज़ा हर अच्छे लिखनेवाले को भुगतना पड़ता है और अच्छा-सराहनीय लिखने के बावज़ूद वह हाशिए पर, अचर्चित और गुमनाम-सा ही रह जाता है। राजस्थान के लेखकों के साथ ये दुर्घटनाएं सबसे अधिक हुयीं हैं। सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह कि खुद यहां के बड़े- बड़े तथाकथित नामधारी, आलोचना में चर्चित आलोचको ने यहां के शब्दकारों की बजाए उन दिल्ली, भोपाली लेखकों के लेखन पर ज्यादा काम किया जो उन्हें अधिक से अधिक प्रोजेक्ट लाभ, नाम- इकराम, किसी न किसी अकादमी, संस्था, फाउंडेशन में फिट करा सकते थे। इस दिशा में यह सुखद लगता है कि बीकानेर के राजस्थानी-हिन्दी में समान अधिकार से लिखनेवाले युवा कवि, आलोचक डा. नीरज दइया ने इस ओर ध्यान दिया और उनकी दो किताबें बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार व मधु आचार्य ‘आशावादी’ के सृजन-सरोकार सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर से आयी हैं। अभी मैं “बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार” से गुजर रहा हूं चूंकि मैं बुलाकी शर्मा, उनके लेखन से व्यक्तिश: जुड़ा हूं, उनकी सृजन-यात्रा के के हर पड़ाव का न केवल साक्षी रहा हूं अपितु उन्हें निकटता से जानने का दावा तो नहीं करता लेकिन अवसर जरूर मिलता रहा है और मुझे इस बात का संतोष और खुशी है कि डा. नीरज दइया मुझ से भी कहीं गहरे बुलाकी शर्मा के लेखन और व्यक्तित्व को जानने में सफल हुए हैं।
बुलाकी शर्मा शब्द-जगत में बीकानेर की ऐसी शख्सियत है जिस पर हर शहर ऐसी शख्सियत के अपने शहर में होने का गर्व कर सकता है एक ऐसा समन्वयवादी दोस्त- दुश्मन सभी से मधुरभाषी, व्यवहार-कुशल व्यक्तित्व हैं जिनके बारे में एक शब्द ’अजात शत्रु’ बिज्जी ने सही ही कहा था। चालीस बरसों से राजस्थानी- हिन्दी में व्यंग्य- कथा साहित्य में निर्बाध रूप से निरंतर उनकी कलम चल रही है। राजस्थानी- हिन्दी दोनों ही भाषाओं में अकादमी सम्मान के अलावा उन्हें कई सम्मान से भी अधिक लेखकों-पाठकों के बीच गहरी पहचान उनकी कलम की बदौलत हासिल है। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व देखते हुए सहज ऐसी अपेक्षा और आवश्यकता बेमानी नहीं है कि उनके रचनाकर्म पर विस्तार से आलोचनात्मक आलेख, बातचीत, बहस और मूल्यांकन आदि हो।
एक ऐसा समय जब जीवन के हर क्षेत्र में व्यक्ति आत्ममुग्धता में जी रहा है, कला- साहित्य में तो यह चरम पर है। सब एक-दूसरे की टांग खींचने में जुटे हैं, कौन मित्र-शत्रु है, कौन शत्रु-मित्र, पहचान मुश्किल है, हर कार्य-करम किसी न किसी स्वार्थ, हित में निहित हो चुका हो, ऐसे में किसी के व्यक्तित्व, सृजन का सम्यक मूल्यांकन का विचार ही आश्चर्यजनक लगता है, पर जैसा कि नीरज दइया को जाननेवाले जानते हैं, वे ऐसे आश्चर्यजनक शुभ करते रहते हैं, उन्हंत ऐसे सभी शुभ के लिए साधुवाद।
बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार कृति में डा. नीरज दइया ने अथ श्रीबजरंग बली की डायरी, धूमिल होते समय के एलबम के पन्ने, अफलातून की धूम, अजात शत्रु की काया- माया, लिखा तो ठीक ही है, बात एक कालजयी कहानी की, नवीन कथा शैली में सम्बन्धों के ग्राफ, सुनने- सुनाने और पढ़ने- पढ़ाने की कहानियां, राजस्थानी व्यंग्य विधा के परसाई, खुद घायल होने का हौंसला और हुनर, चेखव की बन्दूक यानी बीएस फिफ्टी वन, वरिष्ठ व्यंग्यकार की श्रेणी में, सदा स्मरणीय बाल साहित्यकार, नाटककार, अनुवादक और सम्पादक के रूप में, बुलाकी शर्मा से सृजन-संवाद और अंत में बुलाकी शर्मा की सृजन- यात्रा जैसे आकर्षक शीर्षकों से बुलाकी शर्मा के सम्पूर्ण व्यक्तित्व और कृतित्व को एक मंच पर सामने लाने का जो सद्प्रयास किया है, उस में वे सफल रहे हैं। पुस्तक के अंत में बुलाकी शर्मा के लेखन और व्यक्तित्व की परतें खोलनेवाला साक्षात्कार दिया गया है जो महत्त्वपूर्ण हैं, जिस में इस किताब को तैयार करते समय उनके लेखन और व्यक्तित्व के बारे में उपजी हमारी कुछ शंकाओं से सम्बन्धित सवालों के लेखक द्वारा दिए गए माकूल जबाब, कुछ और प्रश्नो की राह खोलते हैं, हो सकता है उन प्रश्नों के उत्तर लेखक आगे कभी दें। एक प्रश्न बहुभाषाओं में लिखनेवाले लेखक अपनी रचनाओं को दोनों भाषाओं की किताबों में रखते हैं , उन रचनाओं की मौलिकता के बारे में हैं, वह किस भाषा में मौलिक है, का उत्तर जो उन्होंने दिया है, से तो मैं भी सहमत नहीं। मेरा मानना है यह रचना के प्रति अतिरिक्त मोह के अलावा कुछ नहीं हैं जो वह उसी एक रचना को लेखक अपने लेखन की हर भाषा में देखना-दिखाना चाहता है।
सुन्दर आवरण के लिए प्रख्यात चित्रकार-कवि कुंवर रवीन्द्र एवं सुरुचिपूर्ण प्रकाशन के लिए सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर के डॉ. प्रशांत बिस्सा बधाई के पात्र हैं।
- नवनीत पाण्डे
(लेखक वरिष्ठ कवि-कथाकार है)
==============================
पुस्तक : बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार (आलोचना) / लेखक : डॉ. नीरज दइया
प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन, मंदिर, बीकानेर ; पृष्ठ-88 ; संस्करण 2017 ; मूल्य-200/-
==============================




16 अगस्त, 2017

111 कविताएँ कवि : सुधीर सक्सेना

पुस्तक समीक्षा /  डॉ. नीरज दइया
    हिंदी कविता में विगत चार दशकों से सक्रिय कवि सुधीर सक्सेना की पुस्तक ‘111 कविताएं’ उनके सात पूर्व प्रकाशित कविता-संग्रहों- ‘कुछ भी नहीं अंतिम’, ‘समरकन्द में बाबर’, ‘रात जब चन्द्रमा बजाता है बाँसुरी’, ‘किताबें दीवार नहीं होती’, ‘किरच किरच यकीन’, ‘ईश्वर- हां... नहीं... तो’ एवं ‘धूसर में बिलासपुर’ से चयनित कविताएं है। संग्रह में इन सात कविता-संकलनओं से चयनित कविताएं कवि के इंद्रधनुषी सफर को प्रस्तुत करती हैं, वहीं इन सात रंगों में अनेक रंगों और वर्णों की आभा भी सुसज्जित नजर आती है। कहना होगा कि एक लेखक-कवि और संपादक के रूप में सुधीर सक्सेना की रचनाशीलता के अनेक आयाम हैं। वे किसी एक शहर अथवा आजीविका से बंधकर नहीं रहे, साथ ही वे विविध विधाओं में सामान्य और औसत लेखन से अलग सदैव कुछ अलग और विशिष्ट करने के प्रयास में आरंभ से ही कुछ ऐसा करते रहे हैं कि उनकी सक्रिय उपस्थिति को रेखांकित किया गया है। उनका कविता-संसार एक रेखीय अथवा सरल रेखीय संसार नहीं है कि जिसमें बंधी-बंधाई और किसी एक लीक पर चलने वाली कविताएं हो। जाहिर है यह चयन और संकलन उनकी इसी विविधता और बहुवर्णी काव्य-सरोकारों को जानने-समझने का मजीद अहमद द्वारा किया गया एक उपक्रम है। सुधीर सक्सेना की काव्य-यात्रा के विषय में संपादक के कथन- ‘उनकी कविओं की शक्ति, सुन्दरता के आयामों की विविधता ही कवि को समकालीन हिंदी कविता की अग्रिम पंक्त में ला खड़ा करती है।’ से निसंदेह पाठकों और आलोचकों की सहमति पुस्तक के माध्यम से भी होती है।
    पुस्तक के आरंभ में कवि सुधीर सक्सेना की काव्य-यात्रा पर प्रकाश डालती सुधी आलोचक ओम भारती की विस्तृत एवं महत्त्वपूर्ण भूमिका है। साथ ही वरिष्ट कवि-आलोचक नरेन्द्र मोहन का कवि सुधीर सक्सेना की काव्य-साधना पर एक पत्र पुस्तक में ‘मंतव्य’ के अंतर्गत दिया गया है। इससे यह पुस्तक शोधार्थियों और सुधी पाठकों के लिए विशेष महत्त्व की हो गई है। कविता-यात्रा के विविध पड़ावों पर यह गंभीर अध्ययन-मनन कविताओं के विविध उद्धरणों के माध्यम से नवीन दृष्टि और दिशा देने वाले हैं। इन आलेखों में जहां कवि के साथ अंतरंग-प्रसंगों को साझा किया गया है वहीं समकालीन कविता और सुधीर सक्सेना की कविता को लेकर विमर्श में हिंदी कविता में सुधीर सक्सेना का योगदान भी रेखांकित हुआ है। संग्रह में संकलित कविताओं में जहां कवि के काव्य-विकास और संभावनाओं की बानगी है, वहीं उनके सधे-तीखे तेवर और निजता में अद्वितीय अभिव्यंजना का लोक भी उद्घाटित हुआ हैं। इसी को संकेत करते ओम भारती लिखते हैं- ‘सुधीर की कविता बरसों का रियाज, सधे-सुरों और सहज आलाप समेटती पुरयकीन कविता है। इसमें व्यंजना का रचाव है,तो लक्ष्णा का ठाठ भी है।’
    संकलित कविताएं वर्तमान जीवन के यथार्थ-बोध के साथ कुछ ऐसे अनुभवों और अनुभूतियों का उपवन है जिसमें हम उनकी विविध पक्षों के प्रति सकारात्मकता, सार्थकता और आगे बढ़ने-बढ़ाने की अनेक संभवनाएं देख सकते हैं। कविताओं में कवि की निजता और अंतरंगता में प्रवाह है तो साथ ही पाठक को उसके स्तर तक पहुंच कर संवेदित करने का कौशल भी है। वे कविताओं के माध्यम से जैसे एक संवाद साधते हैं। कविताओं में कवि की उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति से अधिक उल्लेखनीय उनकी सहजता, सरलता और सादगी में अभिव्यंजित होती विचारधारा है। जिसके रहते वे विषय और उसके प्रस्तुतीकरण के प्रति सजग-सचेत और हर बार नई भंगिमाओं की तलाश में उत्सुकता जगाते हुए अपने पाठकों को हर बार आकर्पित करते हैं। ‘कुछ भी नहीं अंतिम’ संग्रह के नाम को सार्थक करता यह संकलन अपनी यात्रा में बहुत बार हमें अहसास करता है कि सच में कवि के लिए कविता का कोई प्रारूप अंतिम और रूढ़ नहीं है। ‘समरकंद में बाबर’ के प्रकाशन के साथ ही हिंदी कविता में सुधीर सक्सेना को बहुत गंभीरता से लिया जाने लगा। वे जब ईश्वर के विषय में फैले अथवा बने हुए संशयों को कविता में वाणी देते हैं तो अपने अंतःकरण के निर्माण में अपने इष्ट मित्रों और साथियों की स्मृतियों-अनुभूतियों को भी खोल कर रखते हैं। ‘ईश्वर- हां... नहीं... तो’ और ‘किताबें दीवार नहीं होती’ जैसे संग्रहों की कविताएं सुधीर सक्सेना को हिंदी समकालीन कविता के दूसरे हस्ताक्षरों से न केवल पृथ्क करती है वरन यह उनके अद्वितीय होने का प्रमाण भी है। प्रेम कविताएं हो अथवा निजता के प्रसंगों की कविताएं सभी में उनकी अपनी दृष्टि की अद्वितीयता प्रभावशाली कही जा सकती है। ये कविताएं कवि के विशद अध्ययन-मनन और चिंतन की कविताएं हैं जिन में विषयों की विविधता के साथ ऐसे विषयों को छूने का प्रयास भी है जिन पर बहुत कम लिखा गया है। कवि को विश्वास है- ‘वह सुख/ हम नहीं तो हमारी सततियां/ तलाश ही लेंगी एक न एक दिन/ इसी दुनिया में।’ वे अपनी दुनिया में इस संभावना के साथ आगे बढ़ते हैं।
    ‘धूसर में बिलासपुर’ लंबी कविता इसका प्रमाण है कि किसी शहर को उसके ऐतिहासिक सत्यों और अपनी अनुभूतियों के द्वारा सजीव करना सुधीर सक्सेना के कवि का अतिरिक्त काव्य-कौशल है। कविता की अंतिम पंक्तियां है- ‘किसे पता था/ कि ऐसा भी वक्त आयेगा/ बिलासपुर के भाग्य में/ कि सब कुछ धूसर हो जायेगा/ और इसी में तलाशेगा/ श्वेत-श्याम गोलार्द्धों से गुजरता बिलासपुर/ अपनी नयी पहचान।’ अस्तु कहा जा सकता है कि जिस नई पहचान को संकेतित यह कविता है वैसी ही हिंदी कविता यात्रा की नई पहचान के एक मुकम्मल कवि के रूप में सुधीर सक्सेना को पहचाना जा सकता है।
    अच्छा होता कि इस संकलन में संग्रहों और कविताओं के साथ उनका रचनाकाल भी उल्लेखित कर दिया जाता जिससे हिंदी कविता के समानांतर सज्जित इन कविता यात्रा को काल सापेक्ष भी देखने-परखने का मार्ग सुलभ हो सकता था। साथ ही यहां यह भी अपेक्षा संपादक से की जा सकती है कि वे अपना और कवि का एक संवाद इस पुस्तक में देते अथवा कवि सुधीर सक्सेना से उनका आत्मकथ्य इस पुस्तक में शामिल करते। इन सब के बाद भी यह एक महत्त्वपूर्ण और उपयोग कविता संचयन कहा जाएगा। सुंदर सुरुचिपूर्ण मुद्रण और आकर्षक प्रस्तुति से कविताओं का प्रभाव द्विगुणित हुआ है।
------------------------------------
111 कविताएँ / कवि : सुधीर सक्सेना चयन एवं संपादन : मजीद अहमद प्रकाशक- लोकमित्र, 1/6588, पूर्व रोहतास नगर, शाहदरा, दिल्ली पृष्ठ : 224 मूल्य : 395/- संस्करण : 2016
------------------------------------