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01 जून, 2017

वाह, क्या कहने !

“टांय टांय फिस्स” व्यंग्य संग्रह की भूमिका
          डॉ. नीरज दइया के पहले व्यंग्य-संग्रह ‘टांय टांय फिस्स’ को पढ़ते समय मेरे जेहन में जो पहला नाम आया वह आलोक पौराणिक का था। वह इसलिए कि आलोक पौराणिक ने अपने पहले ही व्यंग्य-संग्रह ‘नेकी कर कुएं में डाल’ से हिंदी व्यंग्य संसार में अपनी पुख्ता पहचान बनाली। जिस बात पर पाठकों का सर्वाधिक ध्यान गया वह थी उनके अनुभव की परिपक्वता और समकालीन समय के खुरदरेपन को बारीकी से पकडऩे की तथा उसके भीतरी खोखलेपन को उजागर करने की चकित कर देने वाली वैचारिक दृष्टि। स्पष्ट है कि संग्रह चाहे पहला, दूसरा या पांचवा हो, उसका उतना महत्त्व नहीं है, जितना इस बात का कि व्यंग्यकार कितना संवेदनशील, सजग, सूक्ष्म दृष्टि-सम्पन्न और विचारशील लेखक है तथा समय की विसंगतियों की दुखती रगों पर हाथ रखने में कितना सिद्धहस्त है। आलोक पौराणिक को पहले ही व्यंग्य-संग्रह में इतनी लोकप्रियता मिली, इसके लिए ये सभी आधारभूत कारण ही उत्तरदायी हैं।
          आगे बढऩे से पहले यह भी बता दें कि आलोक पौराणिक के उक्त संग्रह की आलोचना भी हुई थी। अर्थशास्त्र के प्रोफेसर होने के कारण उनका अधिकांश व्यंग्य उदारीकरण, वैश्विक बाजार, उपभोक्तावाद, ब्रांड नामों के चलन, पेजर, सेल्यूलर, मैक्डोनाल्ड, सुंदरियों के उत्पादन पुरुष ब्यूटी पार्लर, नीम और हल्दी के पेटेंट जैसे विषयों पर ही केंद्रित रहा। इसलिए शेष भारत के विराट विद्रूप को देखने में तथा उसके लिए आवश्यक शैल्पिक सधाव में वे असमर्थ रहे। साथ ही उनमें दोहराव भी अधिक था।
          व्यंग्य के क्षेत्र में जो ताजातरीन नई पीढ़ी (एक प्रकार से चौथी पीढ़ी) सामने आई है, उसमें सुशील सिद्धार्थ, मधुसूदन पाटिल, श्याम हमराही, संतोष खरे, गिरिराज शरण अग्रवाल तथा रमाशंकर श्रीवास्तव आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। डॉ. नीरज दइया को मैं इसी चौथी पीढ़ी का एक अत्यंत सफल, सजग, सोद्देश्यपूर्ण और गुणवत्ता से युक्त व्यंग्यकार मानता हूं जिनके पास व्यंग्य की एक प्रखर आलोचना-दृष्टि तथा चिंतन की एक समाजशास्त्रीय विचारधारा है। वे जानते हैं कि व्यंग्य एक संस्कारवान तथा गंभीर लेखक के लिए जिम्मेदारी का काम है। उसमें चलताऊ फार्मूलेबाजी, कैरीकेचर या सामयिक अखबारी टिप्पणियों से काम नहीं चलता। उनका व्यंग्य स्वाभाविक है, गढ़ा हुआ नहीं। उसमें तराश है, तल्खी है और एक प्रकार की कौंध है। वे मात्र छींटाकशी करने या मन की भड़ास निकालने के लिए नहीं लिखते बल्कि जरूरत हो तो एक अच्छे व्यंग्य संग्रह के लिए इंतजार भी कर सकते हैं जैसा कि उन्होंने अब तक किया है। उनका लेखन-कर्म तो 1989 में ही प्रारंभ हो चुका था। कविता, कहानी, लघुकथा, अनुवाद, आलोचना और बाल-साहित्य खूब लिखा और जब देखा व्यंग्य लिखने के लिए उनके पास पर्याप्त कौशल, गंभीर चिंतन, सूक्ष्म-सर्वेक्षण, व्यंजना मूलक विशिष्ट जीवन दृष्टि और विद्रूपताओं पर चोट करने का निर्भीक साहस है तभी इस अचूक हथियार को काम में लिया।
          डॉ. दइया के प्रस्तुत संग्रह में चालीस आलेख हैं। आलोक पौराणिक की तरह उनका लेखन कोरे अर्थतंत्र तक सीमित नहीं बल्कि उन्होंने इतने अधिक विषयों पर आधिकारिक रूप से व्यंग्य लिखें हैं कि किसी भी पाठक को आश्चर्य हो सकता है। इसके लिए सीमित नहीं, बल्कि एक चौतरफा व्यंग्य दृष्टि की जरूरत होती है। साहित्य से सीधा जुड़ाव होने के कारण साहित्यिक विसंगतियों पर लिखना स्वाभाविक है पर यह उनके व्यंग्य-लेखन का सिर्फ एक तिहाई भाग ही है। साहित्येतर विषयों में आहार (खान-पान), आयुर्वेदिक चिकित्सा, घरेलू उपचार, ई-युग की छाप (ई-होली का हुड़दंग), काला धन, कानून व न्याय, घरों में बेटों-बेटियों में भेद, चापलूसी, दफ्तरी जीवन, ठग विद्या, डिजिटिलाइजेशन, ढोंगी साधुओं के प्रपंच, दाम्पत्य जीवन, नेता, पुलिस व वकीलों का त्रिकोण, नोटबंदी, पर्यावरण, फिल्में, फैशन, बात में बात का समाप्त न होने वाला सिलसिला, बेरोजगारी, माफिया (खनन, भू व साहित्य क्षेत्र के माफिया) मन का मनचलापन, युवा जगत (कुंवारे-कुंवारियों की पसंद-नापसंद), राजनीति, लक्ष्मी की चकाचौंध, विश्वविद्यालयीय सर्वेक्षण, वीआईपी लोगों की भरमार व उनका नियति, शिक्षातंत्र, सामान्य जन की परेशानियां. सोशल मीडिया, साक्षात्कार तथा सेल्फी से सकारात्मक दृष्टि का प्रादुर्भाव आदि। फिर इन विषयों के उपविषय भी हैं। साहित्य से जुड़े एक तिहाई विषयों (कुल 13 व्यंग्य) और उनके भी उपविषयों को जोड़ लिया जाए तो लगभग 100 विषय सामने आते हैं। यह नीरज की मौलिकता और कलात्मक कसावट का ही परिणाम है कि इतने सारे बिंदुओं को उन्होंने जिस कुशलता, ताजगी व रोचकता, भाषा के सहज प्रवाह तथा पाठकों में निरंतर बढ़ती जाने वाली जिज्ञासा व उत्सुकता के साथ निभाया है, वह उन्हें आज की पीढ़ी के व्यंग्यकारों में विशेष प्रतिष्ठा का स्थान देती है।
          उनकी सफलता के ये कुछ निर्णायक बिंदु हैं- आलोचना से उनको सूक्ष्म दृष्टि व पर्यावलोकन, कविता से संवेदना, कहानी से रोचकता व रंजकता, अनुवाद कर्म से शैल्पिक सधाव, संपादन से चयन-दृष्टि तथा बाल-साहित्य से जिज्ञासा के जो भाव मिले, वे ही तो व्यंग्य-लेखन के महत्त्वपूर्ण घटक हैं। फिर उनको एक अतिरिक्त सौभाग्य भी मिला (जो प्रेम जनमेजय जैसे व्यंग्यकारों को भी नहीं मिल पाया था)। अपने जीवन के पहले 24 वर्ष उन्होंने राजस्थानी व हिंदी के शीर्षस्थ व्यंग्यकार तथा अपने पिता स्वर्गीय सांवर दइया की छत्रछाया में बिताए। व्यंग्य के बीजाणु तो तभी से उनके रक्त में प्रवाहित होने लगे थे। वंशानुक्रम और पारिस्थितिकी के ये बीजाणु जो 1992 में स्व. सांवर दइया के निधन तक आकार ग्रहण करने लगे थे, आज 24 वर्षों बाद यानी सन 2016 के अंत तक इतने पुष्पित और पल्लवित हो चुके हैं कि आज की पीढ़ी के कुछ व्यंग्यकार उनसे ईष्या कर सकते हैं।
          डॉ. नीरज दइया एक बहुश्रुत और बहुपठित लेखक है। वे आज के कथित बड़े साहित्यकारों की तरह केवल स्वयं की पुस्तकों को ही नहीं पढ़ते। साहित्य की अनेक विधाओं में रचना करते समय उन्होंने देश-विदेश के लेखकों की पुस्तकें पढ़ी हैं. उन पर चर्चा की है तथा उनकी व्याख्याएं कर के समीक्षाएं लिखीं हैं। इससे उनका ज्ञान-क्षितिज आज की पीढ़ी के व्यंग्यकारों से कुछ अधिक विस्तृत व विश्वसनीय है।
          चालीस व्यंग्य आलेखों में जिन-जिन के उद्धरण, दृष्टांत या नामोल्लेख हैं, उनमें साहित्यकारों में सूर, तुलसी, कबीर, रहीम व मीरां के अलावा रवींद्रनाथ टेगोर, दुष्यंत, धूमिल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद व विजयदान देथा, सिद्धांतकारों में डार्विन, गीतकारों में साहिर लुधयानवी व आनंद बक्सी, फिल्म कलाकारों में राजेश खन्ना, शिल्पा शेट्टी व अभिषेक (कलाकार व निर्देशक उड़ता पंजाब), विदेशी लेखकों में केलिफोर्निया विश्वविद्यालय के यू चेन, नेताओं में नरेंद्र मोदी व राहुल गांधी, खिलाडिय़ों में सचिन तेंदुलकर व विराट कोहली तो हैं ही, विश्व स्वास्थ्य संगठन के शोध-सर्वेक्षण, स्पेन के शिक्षातंत्र तथा वैवाहिक साइट के सर्वेक्षण आदि उल्लेखनीय हैं।
          व्यंग्य के क्षेत्र में नीरज ने कई नवाचार किए हैं। इनमें से एक है पंच काका नाम के किरदार का सृजन। अन्य व्यंग्यकारों ने भी जरूरत के अनुसार कुछ किरदार खड़े किए पर वे उन्हें विषयानुसार बदलते रहे और कभी-कभी बिना स्थाई किरदार के भी काम चला लिया। ‘टांय टांय फिस्स’ के इस किरदार में बुद्धि-चातुर्य, आलोचना-दृष्टि तो है ही, कहीं-कहीं दुनियादारी से लेकर दुकानदारी तथा रसूकदारी से लेकर ईमानदारी तक के भाव हैं। पंच काका सही नसीहत देते हैं, समन्वय कराते हैं, अनुभव की बातें करते हैं, कभी-कभी मस्ती के मूड में आ जाते हैं तो जाम छलकाने की, चिढ़ जाएं तो ऊंचा उठाकर धड़ाम से नीचे पटकने की तथा खीझ जाएं तो टांय टांय फिस्स तक कर देने की कुव्वत रखते हैं यानी वे व्यंग्य की हर शाखा के प्रतिनिधि किरदार हैं। कुछ उद्धरण देना ठीक रहेगा।
(अ) सही नसीहत (1) ‘‘जुगाड़ू सम्मान में अपने नाम को जोड़कर क्यों खराब करते हो। जो कुछ तुम्हारी गरिमा है, उसे बचाये रखो।’’ (पृष्ठ- 36) (2) ‘‘सबकी देखो, सबकी सुनो पर करो अपने मन की।’’ (पृष्ठ- 52)
(आ) समन्वय (1) ‘‘भैया विपक्ष, तू अपने नाम को बदल ले यार। ये ‘वि’ का तमगा उतार कर सिम्पल ‘पक्ष’ बन जा। इससे तुझे भी फायदा और हमें तो फायदा है ही।’’ (पृष्ठ- 24), (2) ‘‘दाम्पत्य जीवन के बारे में पंच काका की सलाह है- ‘ज्यादा भटकने, भटकाने से मन की शांति चली जाती है। तो हे भतीजों-भतीजियों काका की सलाह है- भटकना-भटकाना छोड़ कर कुछ ऐसा हो जो गरिमामय हो। हमारे सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप हो।’’ (पृष्ठ- 46)
(इ) दुनियादारी (1) ‘‘मीठी आलोचना का मीठा फल। कभी चखा हो तो जानो।’’ (पृष्ठ- 22), (2) ‘‘हां, अब जब कोई दूसरा लेखक मिले, उसे उसके सामने बड़ा लेखक बताते रहना। तुम्हारी दुकानदारी चलती रहेगी। समझ गए न।’’ (पृष्ठ- 28)
(ई) व्यंग्य (1) ‘‘प्रजातंत्र में कानून सर्वोपरि होता है। शाकाहारी कानून बना दिया तो परेशानी किसको है। अब शेर राजा भी घास खाएगा। मांस खाने की इच्छा होगी तो छिप कर गुप-चुप खा लेगा। फिर स्टेज पर आकर घास के पास मुंह किए खड़ा होकर शाकाहार का विज्ञापन करेगा।’’ (पृष्ठ- 54), ‘‘साहब है तो क्या हुआ, साहब के भी तो साहब होते हैं। इसलिए कभी मूंछें नीची तो कभी मूंछें ऊंची।’’ (पृष्ठ- 69)
(उ) ऊंचा उठा कर धड़ाम से नीचे गिराना (1) पंच काका ने एक रद्दी कविता के लिए फेसबुक स्टेट पर लिखा- ‘अच्छी कविता, सधी कविता, साधुवाद।’ (पृष्ठ- 71) काका के इस व्यंग्य को समझना उस लेखक के बूते की बात नहीं थी।
(ऊ) टांय टांय फिस्स (1) ‘लेखकों में फर्क बस इतना ही है। प्रेमचंद कम गलती करते थे और तुम हो जो गलतियों की खान हो। तुम्हारे यहां तो दो लाइनें पढ़ो और जांच करो तो टांय टांय फिस्स।’’ (पृष्ठ- 96)
          दूसरा नवाचार व्यंग्य आलेखों की संरचना का है। नीरज ने इस संरचना को त्रिआयामी बनाया है। पहले आयाम में खुद व्यंग्यकार विषमताओं का उद्घाटन, निरूपण और विश्लेषण करते हुए जहां जरूरत हो, चोट करता है। दूसरे आयाम में उस विषय से संबंधित विद्वानों, मनीषियों का या अन्य व्यक्तियों के दृष्टांत सामने रखता है और अंतिम आयाम में पंच काका के टिप्पणियां देकर एक सांगोपांग व्यंग्य रचना का सृजन करता है। रचनाओं का यह स्थाई भाव है। ऐसा अन्य रचनाकारों में कम मिलता है।
          तीसरा नवाचार नए-नए विषयों को उठा कर उन्हें रोचक ढंग से प्रस्तुत करने का है। इनमें ‘ई-होली का हुड़दंग’, ‘सेल्फी लेने के नए आइडिया’, ‘शराबी चूहे और पिनोकियो वाइरस’, ‘वीआईपी की खान भारत’ तथा ‘याद नहीं अब कुछ’ आदि सम्मिलित है। जिस रोचक ढंग से इन विषयों का निर्वाह किया गया है वह नीरज दइया को श्रेष्ठ व्यंग्यकार बनाता है। दो तीन उदाहरण ही दूंगा, शेष तो रोचकता के कारण पाठक पढ़े विना नहीं छोड़ेंगे। (अ) ‘‘जब देश में सब कुछ ‘ई’ ही होता जा रहा है तो ये होलिया को ‘ई’ क्यूं नहीं किया जाए। इसमें हींग लगे ना फिटकरी और रंग आए चोखा वाली बात है। होली में आपको क्या चाहिए- रंग ही तो चाहिए ना। देखिए ना- रंग तो चोखा आ गया। अब क्या चाहिए। होली का ई-कार्ड, ई-गुलाल, ई-रंग, ई-डिस्को, ई-नाश्ता, ई-थाली, ई-साली, ई-घरवाली सब कुछ रेडी कर दिया है।’’ (पृष्ठ- 88-89) इसके आगे सात प्रकार की होलियों का वर्णन है। पढ़कर देखें मजा आ जाएगा। (आ) ‘‘नोटबंदी के बाद जिनके पास ढेर सारे पुराने नोट रह गए, उनकी निर्धनों से इस प्रकार की मनुहारें- ‘ले लो ना भैया, भाई साहब। आप ले लो। बहनजी आप ले लो। अपने खाते में जमा करा दो। जब जी में आए देना। जितना मन करे देना। चलो नहीं देना। जब आपको लगे कि दे सकते हैं, तब देना। सच्ची कसम। हम नहीं मांगेंगे। आपको देकर ये गाना गाएंगे- ‘भूल गया सब कुछ, याद नहीं कुछ।’’ (पृष्ठ- 79) जो विषय ऊपर गिनाएं हैं वे एक-एक से बढ़कर रोचक है। मैं तो बानगी देकर हट जाता हूं ताकि पाठक जिज्ञासा के साथ इस नए अनुभव-संसार से जुड़ सकें।
          अब दो उद्धरणों के साथ अपनी बात समाप्त करूंगा। ये दोनों उद्धरण अपने-अपने प्रकार से महत्त्वपूर्ण हैं। (1) ‘‘पंच काका कहते हैं- ‘खग जाने खग की भाषा, ठग जाने ठग की भाषा। जीवन इस कदर रीतता जा रहा है कि कहीं कोई प्रतिरोध-प्रतिशोध नहीं। चंद सिक्कों की खनखनाहट और कुछ मरे हुए या जीवन से शून्यता की तरफ गति करते शब्दों की खडख़ड़ाहट सुनना ही भारतीयों के जीवन में शेष रहा है।’’ (ठग जाने ठग की भाषा, पृष्ठ- 32), (2) ‘‘काका का सुझाव है कि जो बोल सकते हैं उनमें ‘पिनोकियो’ वाइरस का प्रयोग होना चाहिए। जिससे सच-झूठ को पकड़ा जा सके। भूठ बोलने वाले की नाक लंबी होगी तो क्या? हमारे यहां तो लंबी नाक रुतबे का प्रमाण है। लंबी नाक के इस खेल में देखेंगे कि किसकी नाक अधिक लंबी होती है- नेताओं की या पुलिस की या वकीलों की।’’ (शराबी चूहे और पिनोकियो वाइरस, पृष्ठ- 73)
          और अंत में खुद अपने बारे में। मैंने अब तक 100 से अधिक लेखकों की पुस्तकों की भूमिकाएं लिखीं हैं पर यह पहला अवसर है जब मुझे एक पिता और पुत्र की भूमिकाएं (बेशक अलग-अलग समय में) लिखने का श्रेय मिला है। नेगचार प्रकाशन द्वारा सन 1996 में प्रकाशित देश के अत्यन्त प्रतिष्ठित व्यंग्यकार स्व. सांवर दइया की राजस्थानी पुस्तक ‘इक्यावन व्यंग्य’ की भूमिका मैंने ‘सिरजण री झणकार’ शीर्षक से लिखी थी। यह भूमिका लेखक के मरणोपरांत लिखी गई। बाद में देश के चर्चित व्यंग्यकारों में डॉ. मदन केवलिया व श्री बुलाकी शर्मा ने अपनी पुस्तकों पर भूमिकाएं लिखने का मुझे सौभाग्य दिया। आज जब व्यंग्य के क्षेत्र में अत्यंत सफल व सुयोग्य लेखक डॉ. नीरज दइया की पुस्तक ‘टांय टांय फिस्स’ की भूमिका लिख रहा हूं तो मैं तो आह्लादित हूं ही, मुझे विश्वास है कि पाठक और ज्यादा उत्सुक और आह्लादित होंगे तथा डॉ. दइया से निरंतर व्यंग्य संग्रह लिखते रहने की मांग करेंगे। इत्यलम्। वरिष्ठ कवि-शिक्षाविद
भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’
वरिष्ठ कवि-शिक्षाविद
1-स-9, पवनपुरी, बीकानेर- 334003
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टांय टांय फिस्स (व्यंग्य संग्रह) डॉ. नीरज दइया ; अवरण चित्र : के. रवीन्द्र ; संस्करण : 2017 ; पृष्ठ : 96 ; मूल्य : 200/- ; प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334003 ; ISBN : 818885857-9
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टांय टांय फिस्स (व्यंग्य संग्रह) प्रख्यात साहित्यकार डॉ. मंगत बादल को सादर समर्पित

24 मई, 2017

“पंच काका के जेबी बच्चे” व्यंग्य संग्रह की भूमिका

वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार
सामान्य कथन में व्यंग्य को लोग ताना या चुटकी की संज्ञा देते हैं। व्यंग्य, कथन की एक ऐसी शैली है जहां बोलने वाला अधरोष्ठों में मुस्कु रा रहा हो और सुनने वाला तिलमिला उठे। यानी व्यंग्य तीखा और तेज तर्रार कथन होता है जो हमेशा सोद्देश्य होता है। इसका प्रभाव तिलमिला देने वाला होता है।
पारिभाषिक रूप से व्यंग्य साहित्य की एक विधा है जिसमें उपहास, मजाक और इसी क्रम में आलोचना का प्रभाव रहता है। शब्द की अभिव्यंजना शक्ति द्वारा निकलने वाला अर्थ ही व्यंग्य कहलाता है। यदि इन पारिभाषिक मापदंडों की कसौटी पर नीरज दइया की पुस्तक- ‘पंच काका के जेबी बच्चे’ में संकलित व्यंग्य रचनाओं को कसा जाए तो वह खरी उतरती है। भाषा विषयानुरुप और कथन में निर्बाध प्रवाह। शैली की विशिष्टता भी अनूठी।
एक लंबे अर्से से दैनिक नवज्योति के संपादकीय पृष्ठ के लोकप्रिय स्तंभ ‘जल-तरंग’ में उनकी रचनाएं नियमित रूप से प्रकाशित हुई हैं। उनकी रचनाओं की लोकप्रियता का अंदाजा पाठकों से मिल रहे प्रशंसात्मक पत्रों से लगाया जा सकता है। व्यंग्य की पारिभाषिक व्याख्या के अलावा जिस सहज अंदाज से उन्होंने अपनी रचना- ‘व्यंग्य की ए बी सी डी’ में चुटकियां ली हैं- ‘वाह ! बेटा उस्ताद से उस्तादी’। वे खुद लिखते हैं कि ‘व्यंग्य की ए बी सी डी आसान नहीं है बल्कि कठिन है। कठिन इसलिए है कि यह शरारतियों का काम है। यह सीडी ऐसी है जो बिना कम्प्यूटर के चलती है। ऐसी सीढ़ी जो दूर तक पहुंचती है’। इससे सरल व्याख्या व्यंग्य की और क्या हो सकती है? बात जब ‘एक नम्बर बनाम दो नम्बर’ की हो तो यह करारा प्रहार उन व्यक्तियों के दो नंबर के क्रिया-कलापों को लेकर किया गया है, जो एक जेब में औरों को दिखाने के लिए अखरोट और बादाम रखते हैं और पीछे छिपकर भुने हुए चने खाते हैं। आज समाज की सार्वजनिक प्रदर्शन की प्रवृत्ति पर सीधा प्रहार है। व्यंग्यकार दइया लक्ष्मी की खासियत बताने में नहीं चूकते कि ‘वह ऐसी शक्ति है जो खुद तो पूजनीय है, साथ ही वह जहां रहती है, उसे भी पूजनीय बना देती है’।
लेखक ‘जुल्म-ए-जलसा’ की अपनी तरह से शब्दों में जो व्याख्या दी है वह भी अद्भुत अंदाज से। जल्सा या जल सा यानी पानी सा। फिर इसकी आड़ में कहर किस तरह बरपाया है और पेटपूजा की जाती है, यह अपने आप में एक अच्छी खासी रचना है। इसी तरह ‘मास्टरजी का चोला’ व्यंग्य आजकल जिस तरह विश्वविद्यालयों और हमारी शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों और शिक्षिकाओं के पहनावे और व्यवहार है, उस पर भी अच्छा-खसा तंज कसा गया है। पहनावे और व्यवहार से कभी शिक्षक छात्रों में स्पष्ट भेद किया जा सकता था, लेकिन आज इस दृष्टि से कोई भेद ही नहीं रहा। कभी शिक्षक से छात्र भय खाते थे, आजकल फ्रें डली नजर आते हैं। शिक्षक ही नहीं वर्तमान पिताओं के व्यवहार पर भी कटाक्ष किया गया है। जिसकी वजह से नई पीढ़ी जिस तरह अनियंत्रित होकर अपने अभिभावकों के बताए मार्ग का अनुसरण ना कर दूसरे मार्ग पर चलने को ही मॉर्डन होने की दंभ भरती है। इसे चरितार्थ करने की कोशिश लेखक ने अपनी रचना- ‘पिताजी के जूते’ की आड़ में अभिव्यक्त की है।
हमारे समय में होली और शीतलाष्टमी, शादी या अन्य पारिवारिक उत्सवों में हास-परिहास की परंपराएं थीं, उन्हें हम भुलाते जा रहे हैं, लेकिन पश्चिमी सभ्यता से आए अप्रैल फूल बनाने की प्रवृति को ‘फलके सा चेहरा’ के माध्यम से चित्रण किया है। वर्तमान में किसी भी विभाग में आप जाइए-साल भर कोई काम नहीं होता। लेकिन नया बजट आने से पहले वित्तीय वर्ष के आखिरी माह मार्च के लक्ष्य पाने के लिए जिस तरह की प्रवृत्ति आज आम हो गई है, उस पर करारा व्यंग्य है- ‘टारगेटमयी मार्च’। ‘हेलमेट’ के जरिए सड़क सुरक्षा, यातायात नियमों की आड़ में जिस तरह परिवहन विभाग और यातायात पुलिस द्वारा उलटे-सीधे ऊपरी कमाई के उद्यम को ‘हेलमेट पर निबंध’ के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है।
आजकल समाज में सोशल मीडिया काफी सक्रिय है। लोग सुबह ईश्वर का स्मरण करना भूल जाएं और रात को सोते समय स्वाध्याय ना करें लेकिन फेसबुक, ट्वीटर के जरिए मोबाइल, कम्प्यूटर, टेब, लेपटॉप में डूबे रहते हैं। फेसबुक पर अपनी सेल्फी लेकर अपलोड करने फिर उसकी लाइक्स और कमेंट लिखने और देखने में अपने जीवन का कीमती समय व्यर्थ कर रहे हैं, इस पर ‘दाढ़ी रखूं या नहीं’ और ‘डिजिटल इंडिया’ जैसी रचनाओं के जरिए कटाक्ष किया गया है।
जब डिजिटल इंडिया की चर्चा हो तो स्वत: ‘विकास’ की बात करना तो बनता ही बनता है। विकास पर सत्तारूढ़ हर दल दावे करता है, भले ही हो या ना हो, लेकिन नगाड़ा तो बजाते रहना ही पड़ता है। तो इसके ठीक विपरीत विपक्ष विकास में भी विनाश के हर पहलू को ढूंढ़कर आलोचना करने से बाज नहीं आता। आजकल राजनीति में विकास की यही गणित पढ़ी और पढ़ाई जा रही है। तीसरा पक्ष की पलटी राजनीति चाल भी चर्चा का विषय बन जाती है।
कुल मिलाकर नीरज दइया की इस कृ ति ‘पंच काका के जेबी बच्चे’ में संकलित व्यंग्य रचनाएं वर्तमान युग की विसंगतियों पर अपनी तेज धार से प्रहार करती है। ईश्वर से कामना है कि वे आधुनिक व्यंग्य विधा के प्रमुख प्रकाश-स्तंभ हरिशंकर परसाई और श्रीलाल शुक्ल की परंपरा को आगे बढ़ाने में सहायक सिद्ध होंगे। इन मंगलकामनाओं के साथ मैं उनके सुनहरे भविष्य की कामना करता हूं।
महेश चंद्र शर्मा
स्थानीय संपादक, दैनिक नवज्योति, जयपुर
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पंच काका के जेबी बच्चे (व्यंग्य संग्रह) डॉ. नीरज दइया ; अवरण चित्र : के. रवीन्द्र ; संस्करण : 2017 ; पृष्ठ : 96 ; मूल्य : 200/- ; ISBN : 978-93-82307-68-6 ; प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334003
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पंच काका के जेबी बच्चे (व्यंग्य संग्रह) प्रख्यात साहित्यकार-पत्रकार देवकिशन राजपुरोहित को सादर समर्पित

19 मई, 2017

समाज एवं रचनाकार के लिए एक आइना


किसी भी रचनाकार का अपने परिवेश के साथ, अपने समाज के साथ, अपने समय के साथ क्या रिश्ता है यह जानने का अच्छा एवं सही तरीका है उसकी रचना के माध्यम से प्रकट होने वाली उसकी ‘रचनात्मक दृष्टि’। मनुष्य जीवन में भी मनुष्य के हर कार्य के पीछे उसकी ‘दृष्टि’ छुपी होती है और उसी ‘दृष्टि’ के आलोक में हम उस कार्य का और उस कार्य के कारण उस मनुष्य का आकलन करते हैं। इसीलिए जब हम किसी रचनाकार के अब तक प्रकाशित रचनाकर्म का आकलन करने बैठते हैं हमें सबसे पहले यह जानना पड़ता है कि उस रचनाकार की ‘दृष्टि’ क्या है, जो उसकी रचनाओं के माध्यम से हम तक सम्प्रेषित होती है। वह रचनाकार अपने समय के सवालों से कैसे जूझता है, अपने समय को एक शाश्वत समय में कैसे प्रतिष्ठित करता है। हम इससे भी एक कदम पहले लेकर यह जानने की कोशिश कर सकते हैं कि वह अपने समय के सवालों को कैसे उठाता है। अपने समय को प्रश्नांकित करना, अपने समय से मुठभेड़ करना एवं उस मुठभेड़ को एक शाश्वत समय में प्रतिष्ठित करना किसी भी रचनाकार के लिए सबसे बड़ी चुनौति होती है। जो रचना इस कार्य को ठीक तरह से पूरा कर पाती है वह अपने पाठकों का विश्वास अर्जित कर लेती है।
श्री मधु आचार्य के सर्जनात्मक सरोकारों पर केन्द्रित यह पुस्तक तत्कालीन समाज के लिए एवं स्वयं रचनाकार के लिए एक आइने का काम करेगी क्योंकि इस पुस्तक के लेखक डॉ. नीरज दइया  अपनी इस पुस्तक में श्री मधु आचार्य की रचनाओं में छुपी ‘रचनात्मक दृष्टि’ को समाज के सामने लाने का प्रयास करते हैं जिसके कारण वे रचनाएं एवं उन रचनाओं के माध्यम से स्वयं रचनाकार महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
श्री मधु आचार्य के रचनाकर्म का आकलन इसलिए भी जरूरी लगता है कि वे एक ही समय में दो भिन्न भाषाओं में साहित्य की विभिन्न विधाओं में अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज करवाते हैं। कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबन्ध, व्यंग्य एवं बाल साहित्य के क्षेत्र में निरंतर लिखना एवं स्तरीय लिखना दो अलग अलग बातें हैं। श्री मधु आचार्य के लेखन की विशेषता यही है कि वे दो भिन्न भाषाओं में इतनी साहित्यिक विधाओं में एक साथ सक्रिय रहते हुए भी अपने रचनाकर्म के साथ समझौता नहीं करते। इसलिए भी उनका पाठक वर्ग उन पर उनके रचनाकर्म के कारण विश्वास करता है, उन्हें प्यार करता है। किसी भी रचनाकार के लिए उसके पाठक वर्ग का विश्वास ही सबसे बड़ी पूजी होती है और श्री मधु आचार्य पाठकों के इस विश्वास पर खरे उतरते हैं।
कविता और कहानी या उपन्यास और नाटक या कि बड़ों के लिए लेखन एवं बच्चों के लिए लेखन दो भिन्न मानसिकता, दो भिन्न धरातल, भिन्न भाषागत व्यवहार भिन्न शिल्पगत वैशिष्ट्य को साधना है। एक रचनाकार के लिए भाषा को ‘सिरजना’ एवं भाषा को ‘बरतना’ का सांमजस्य बनाये रखना बहुत जटिल कार्य होता है। खास तौर से जब साहित्यिक विधा की अपनी अन्दरूनी मांग ही उससे भाषा के भिन्न ‘वैशिष्ट्य’ को अपने पाठक तक पहुंचाने की चुनौति देती है। इस पुस्तक में लेखक डॉ. नीरज दइया विवेचित रचनाकार के रचनाकर्म के उस वैशिष्ट्य को उसके पाठक तक पहुंचाने के लिए एक ‘सेतु’ बनाने का श्रमसाध्य कार्य करते हुए सामने आते हैं। यही इस पुस्तक की विशेषता है और इस कार्य के लिए डॉ. नीरज दइया को बहुत बहुत बधाई।
श्री मधु आचार्य का रचनाकर्म अभी चुका नहीं हैं। उम्मीद की जा सकती है कि भविष्य में वे राजस्थानी एवं हिंदी में और रचनाएं अपने पाठक समुदाय को सौंपेंगे। रंगकर्म के क्षेत्र में उनके लम्बे अनुभव को देखते हुए राजस्थान के रंग सामाजिक को उनसे बहुत उम्मीदें हैं। वे अपने जीवन में एवं अपने सर्जनात्मक क्षेत्र उत्तरोत्तर उन्नति की ओर बढ़ेंगे यही कामना है।
- डॉ. अर्जुनदेव चारण
वरिष्ठ कवि-नाटककार-आलोचक

मधु आचार्य `आशावादी' के सृजन-सरोकार (2017) डॉ. नीरज दइया ; अवरण चित्र : दिनेश कुमार ओझा ; पृष्ठ : 96 ; मूल्य : 200/- ISBN : 978-93-82307-70-9 ; प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334003