06 जनवरी, 2025

तीन प्रेम कविताएं/ नीरज दइया


1.
पारस पत्थर है प्रेम
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पारस पत्थर है प्रेम
वह नहीं मिलता उसे
जो खोजता है....

इस संसार में
है हर किसी के पास-
पारस पत्थर....

वह दिया नहीं जा सकता है,
मांग कर भी-
लिया नहीं जा सकता है।
००००

2.
पर्याप्त प्रेम
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प्रेम में सफल होने का अभिप्राय
मेरे लिए बस इतना है
कि दो दिल
ठीक उसी तरह आएं करीब
जैसे आते हैं करीब
किसी समय किसी वेग से दो पत्थर
और जन्म लेती है- चिंगारी
वैसे ही....
हां, ठीक वैसे ही.....
अगर दिख जाए कहीं प्रेम
किसी चिंगारी सरीखा
मेरे लिए पर्याप्त है....
उसे संभाले रखूंगा मैं
उसी की स्मृति में
सफल होगा- वह प्रेम।
००००

3.
विरह को चुनना
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प्रेम में यदि चुनना हो
तो विरह को चुनना पसंद करूंगा मैं
प्रेम में जीना
नहीं है संभालना प्रेम को
भारती रहती है झोली
प्रेम में रहती है- मदहोशी।

भूल जाता है प्रेमी- दिन दुनिया
उसे कुछ भी नहीं दिखता
सिवाय- प्रेम के....

यदि चुनना हो-
विरह को चुनना खुशी-खुशी
जिद मत करना
प्रेम को पकड़ने की
विरह ही है- सच्चा प्रेम।
००००

डॉ. नीरज दइया

दो कविताएं/ नीरज दइया

 1.

चकित है आकाश
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बवंडर बनने को बेताब
जब-जब भी तेज चलती हैं हवाएं
कोई कहता है-
जरा धीरे, प्यार से...।
गुस्सा तो आग का भी नहीं चलता
धीमी आंच पर वह सेकती है-रोटियां
जब-जब बेकाबू होता है पानी
कोई कहता है-
जरा धीरे, प्यार से...।
आकाश देखता है-
अपने बोझ से परेशान दबी धरती
बदलना चाहती है अपनी गति
वह भी सुनती है-
जरा धीरे, प्यार से...।
चकित है आकाश
कहां से आ रही आवाज-
जरा धीरे, प्यार से...।
००००
2.
गालिब चाचा से सवाल
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कोई अपनी मर्जी से
कहां छूता है-
किसी भी आग को...
कोई अपनी मर्जी से
कहां पाता है-
कोई दरिया
और वह भी आग का...
मैंने नहीं
आग के दरिया ने ही
चुना है मुझे....
आग के दरिया ने ही
चाचजान चुना था तुम्हें!
सवाल है-
जाना कहां है
तैर कर मुझे
तुम डूबे, मैं डूबा
अब कौन है बाहर?
कौन समझाने से
समझा तुम्हारे??
००००
● डॉ. नीरज दइया
('प्रेरणा-अंशु' अक्टूबर, 2024 में प्रकाशित)

 

23 अगस्त, 2024

पांच प्रेम कविताएं ● नीरज दइया


1.

प्रेम चाहिए पृथ्वी पर

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मेरे खून में- प्रेम है

आदम और हवा का

उसी प्रेम की असंख्य बेलें

फैली हैं- पूरी पृथ्वी पर,

जुड़ा हुआ हूं मैं

जुड़ी हुई हैं- पीढ़ियां सारी।


उस समय के साक्षी-

सूरज, चांद और सितारे

कहते हैं सारे

प्रेम चाहिए पृथ्वी पर।

हवा में चंचलता है

उसी से थिरकती है पृथ्वी

चकित है आकाश।

००००

2.

यह कवि की कल्पना नहीं

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यह कवि की कल्पना नहीं

शुद्ध यथार्थ है-

लाल पान जैसा ही होता है दिल।

वह दिखाया नहीं जा सकता

छलिया होता है वह,

ईश्वर के सारे छल

छिपाए रखता है-

अपने भीतर।


कभी धड़कता है- धीरे-धीरे

कभी जोर-जोर से

और कभी रुक जाता है-

अचानक!


विज्ञान के सारे शिक्षकों ने

देश दुनिया के सारे डॉक्टरों ने

बहरूपिये दिल को जाना

मगर मान नहीं

जैसे कवि ने माना

अगर मान लेते

वे कवि हो जाते!

००००००

3.

खरोंच

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हमारा दिल

एक पहेली है अबूझ

सब कुछ समझा जा सकता है

सिवाय दिल के।

किसी नियम या सूत्र में

बांधा नहीं जा सकता है-

प्रेम।

उम्र और देश काल की सीमाएं भी

बांध नहीं सकती उसे।

अनेक बार मैंने कहा दिल से-

अभी समय है सही

किया जा सकता है प्रेम

किंतु स्थिर रहा वह अपनी जगह

और एक दिन अचानक

करने लगा- नृत्य।

बेमौसम बिना बादल

कर सकता है वह नृत्य

मैंने पाया

इस नृत्य में

टूटा नहीं दिल

बस हल्की सी खरोंच लगी।

००००

4.

यकीन कीजिए

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प्रेम जैसा द्रव्य

दूसरा कोई नहीं है

पूरी पृथ्वी पर।

किसी सारणी में

नहीं है उसका

तयशुदा स्थान।

वह अवस्थाओं से परे

किसी भी अवस्था में

बदलता है अवस्था,

छोड़ सकता है-

अपना रंगकिसी भी रूप में

उसे दाग या धब्बा मानने वालों की कमी नहीं

पर यकीन कीजिए-

प्रेम जैसा द्रव्य

दूसरा कोई नहीं

पूरी पृथ्वी पर....।

००००००

5.

लौटना संभव नहीं

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जब-जब भी मैं

पहुंचा हूं-

प्रेम के परिसर में

लौटा नहीं पूरा

संभव नहीं- लौटना।

हरेक यात्रा का

अपना समय होता है

नहीं लौटता समय भी

चलता रहता है-

आगे और आगे

साथ-साथ समय के

चलते हुए मैं

देख रहा हूं- लगातार

पीछे और पीछे

जानते हुए-

कि लौटना संभव नहीं....।

००००


 

23 जुलाई, 2024

पांच प्रेम कविताएं ● नीरज दइया


(1.)

उसे खुश देखकर 

मैंने पूछा नहीं

बस सोचा-

खुशी का क्या राज है?


उसकी खुशी 

बहुत अच्छी थी 

इतनी अच्छी कि सोचते हुए 

खुश हो गया 

मैं भी!



(2.)

यह वही चेहरा है!

मैं सोचने लगा 

कल जो उदासी में डूबा था 

हैरान-परेशान 

अपने रंगों को कहीं भूलकर,

बेसुध-बेरंग बेजान।


यह खनकती हुई हंसी 

कहां से आई? 

क्या गुमसुम उदास तुम को

तुम्हारे भीतर छुपी-

अल्हड़ लड़की मिल गई है

या किसी नई उम्मीद में 

भीतर बहने लगी है-

एक साथ कई चंचल नदियां,

जिनकी कलकल से 

खनक रही हंसी तुम्हारी।



(3.)

प्रेम में 

भीतर बजती है- 

घंटी या घंटियां?

यह संगीत की बात है....


खलनायक नहीं मानते 

घंटी या घंटियां 

वे इन शब्दों के 

केवल पुल्लिंग रूप जानते हैं,

उनके लिए प्रेम 

केवल हासिल करना है!

उनका शब्दकोश ही नहीं

अलग है व्याकरण भी हमसे।



(4.)

प्रेम में लड़का 

प्रेम में लड़की 

प्रेम में आदमी 

प्रेम में औरत 

प्रेम में बुढ़ा 

प्रेम में बुढ़िया....


प्रेम इतना बावला है 

कि देखता ही नहीं

वह किसे भिगो रहा है। 


समा जाते हैं इसके भीतर- 

छोटे-बड़े देवता-दानव

या फिर पूरी दुनिया के शब्द।



(5.)

इतना गुस्सा क्यों? 

अपने अतीत पर 

जो बीत चुका है 

वह लौटकर नहीं आएगा।


छोड़ दो 

जाने दो उसे- 

दूर... बहुत दूर तुमसे

वह मुक्त होना चाहता है

और उसे थामे बैठे हो तुम...


माना कि यह कहना सरल है-

'वर्तमान को थाम लो 

और भविष्य को देखो।'

सच में कठिन है-

आज में रहना-सहना...

इतना गुस्सा क्यों है?

गुस्से को बह जाने दो-

उसी कल के प्रवाह में।



27 फ़रवरी, 2024

मूर्ख बनाने के अचूक उपाय/ नीरज दइया

क्षमा करें, मुझे यहां इस पहली ही पंक्ति में यह नहीं कहना चाहिए किंतु कहना पड़ रहा है कि आप मेरे जाल में फस चुके हैं। शीर्षक देखकर आप का आकर्षित होना और यहां किसी उम्मीद में आंखें गड़ाना क्या कोई अच्छी बात है? मैं तो चाहता हूं कि आप आंखें गड़ाएं और इसे अंत तक पढ़े किंतु अपने दिल पर आप रखें और विचार करें- क्या सच में आप किसी को मूर्ख बनाने के अचूक उपाय जानना चाहते हैं? मतलब आप किसी को या फिर बहुत सारों को मूर्ख बनाना चाहते हैं या फिर यह भी हो सकता है कि आप बुद्धिमान बनना चाहते हैं। यह बात कुछ जमी। आप यदि जान लेंगे कि कोई किसी को मूर्ख कैसे बना सकता है तो फिर जब कोई आपको मूर्ख बनाना चाहेगा तब आप आसानी से बच सकते हैं। यानी कि आप खुद तो मूर्ख बनना चाहते नहीं है। यह बहुत अच्छी और सकारात्मक बात है कि आप खुद को बचाने के लिए इसे पढ़ रहे हैं। मैं धन्यवाद देता हूं कि आपके भीतर किसी के प्रति दुर्भावना नहीं है।
मूर्ख बनाने के अचूक उपाय धर्म है। धर्म के नाम पर मूर्ख बनाने का कारोबार सबसे तेज चल रहा है। दुनिया में आस्तिक और नास्तिक दो प्रकार के लोग हैं। किसी दूसरे से क्यों, अब आपसे ही सवाल है कि आप क्या हैं? आस्तिक या नास्तिक? दुनिया में आस्तिकों की संख्या बहुत अधिक है। यदि आप आस्तिक हैं और ईश्वर को मानते हैं तो पक्के मूर्ख है। नाराज होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह मैंने नहीं कहा है। पेरियार जी ने कहा कि ईश्वर को पूजने वाले मूर्ख हैं। पेरियार जी का पूरा नाम इरोड वेंकट रामासामी पेरियार है और यहां यह भी बता दूं कि तमिल भाषा में ‘परियार’ का अर्थ सम्मानित व्यक्ति होता है। अब जब कोई सम्मानित व्यक्ति ईश्वर के विषय में यह कहे कि उसे मानने वाले मूर्ख हैं तो विचार करन पड़ेगा।
आप आपके पास दूसरा विकल्प है कि आप खुद को नास्तिक कह देंगे। मैं मानता हूं कि जो खुद को नास्तिक कहते हैं, वे भी कहीं न कहीं भीतर से आस्तिक होते हैं। आस्था से विरोध सहज संभव नहीं और उसे जाने बिना तो बिल्कुल ही नहीं। आस्था तो हमारे खून में है। अगर आप नास्तिकों के छोटे से समूह में शामिल हो जाते हैं तो बहुसंख्यक आस्तिक लोग आपको मूर्ख समझेंगे।
मूर्खता के प्रचार प्रसार के लिए ही हम एक अप्रैल को मूर्ख दिवस मानते हैं। बड़े खुश होते हैं। होली पर तो मूर्खता का बड़ा राज चलता है। होली पर भला कोई समझदारी की बातें करता है क्या है? जगह जगह महामूर्ख सम्मेलन होते हैं। कवियों में भी महामूर्ख बनने की होड़ लग जाती है। कुछ ऐसे काल निर्धारित किए गए हैं जिनमें किसी को मूर्ख बनाने का दोष नहीं लगता है। सभी मूर्ख बनने पर आमादा है और जैसे पुकार कर कहते रहते हैं- अरे! हमें मूर्ख बनाओ, हमें मूर्ख बनाओ। नशा करने से भीतर की दबी-छिपी मूर्खताएं अपने आप बाहर आ जाती है। काफी बार तो मूर्खता अपनी सीमा लांघ जाती है और व्यक्ति अपने आप गधे पर विराजित होकर हंसता है।
क्या केवल भारत में ही गधे होते हैं क्या? गधा मूर्ख होता है क्योंकि वह बेहिसाब भार लेकर चलता है। आदमी भी मूर्ख कहा जाएगा यदि वह बेहिसाब बोझ लेकर चलेगा। बोझ यानी बहुत सारी बिना सिर-पैर की बातें लिए घूमना। यह सत्य है कि प्रत्येक इंसान के भीतर मूर्खता थोक के भाव से भरी हुई होती हैं। असल में बहुत सी बातों को नहीं जानना ही मूर्ख बनने और बनाने का अचूक उपाय है। कोई समझदार व्यक्ति किसी को मूर्ख नहीं बनता है। प्रकृति ने मूर्ख बनाने का काम भी मूर्खों को सौंप रखा है। इस पर यकीन कीजिए कि मैं आपको तभी मूर्ख बना सकता हूं जब मेरे पास उसका भरपूर अनुभव और प्रचुर ज्ञान हो। फर्क बस इतना है कि बड़ा मूर्ख कुछ पर्दों को उठा कर अपनी मूर्खता दिखा देता है और मेरे जैसा मूर्ख जो थोड़ा स्याना होता है आपको यहां यह बताने का प्रयास करता है कि ऐसे पर्दों को कैसे उठाएं कि उसके पीछे छिपी मूर्खता दिखाई देने लग जाए।
आदमी आदमी के बीच भेदभाव करना क्या किसी मूर्खता से कम है? जो भेदभाव करते हैं वे क्या हैं? भेदभाव को सब जानते हैं, भेदभाव करने वाले और सहन करने वाले भी! भेदभाव सहन करना क्या बुद्धिमानी की बात है? आप कहेंगे भेदभाव पहले करते थे अब नहीं करते हैं, तो इसका अभिप्राय पहले मूर्ख तो थे ही। इसलिए मूर्खता वह लेबल है जिससे आदमी छुटकारा पाना चाहता है। किंतु यह लेबल ना जाने किस प्रविधि से किस किस पर चिपकाया गया है कि छूटता नहीं है। बाहर का लेबल किसी तरह निकाल बाहर करते हैं तो पता चलता कि भीतर भी लेबल चिपका हुआ है। भीतर का लेबल यह है कि आदमी खुद तो समझदार बनना और कहलाना चाहता है किंतु उसके मन में यह इच्छा कूट-कूट कर भरी हुई है कि मूर्ख बनाने के अचूक उपाय मिल जाए तो वह अपना काम कर दिखाए। अब आप बता दीजिए कि किसी को मूर्ख बनाने की बात सोचना कैसा काम है? किसी को मूर्ख बनाने का विचार छोड़ देना ही सबसे बड़ी समझदारी या कहें बुद्धिमानी है। क्या अब भी आप मूर्ख बनाने के अचूक उपाय जानना चाहते हैं? नहीं, तो बात खत्म।

नीरज दइया