27 फ़रवरी, 2024
मूर्ख बनाने के अचूक उपाय/ नीरज दइया
19 फ़रवरी, 2024
लोकप्रियता का फार्मूला और आइंस्टीन/ नीरज दइया
जो
सही है वह हमेशालोकप्रिय नहीं होता और जो लोकप्रिय होता है वह हमेशा सही
नहीं होता।’ पता नहींअल्बर्ट आइंस्टीन ने यह कब कहा था? मुझे इस बात से
कोईसरोकार नहीं है कि किसने क्या कहा? कब कहा? मैं बस यह जानता हूं कि सवाल
करनालोकप्रिय बनने का प्रथम सौपान है। जितना बड़ा सवाल और जितने बड़े आदमी
पर सवालकरेंगे आपकी लोकप्रिया का पायदान उतना ही बड़ा होगा। मैं जानता हूं
कि आइंस्टीन केइस विचार के विषय में आपको भी पता नहीं है कि यह कब कहा गया
था... और आप चुप बैठेहैं।
देश-विदेश में अनेकविद्वान,
बुद्धिजीवी, वैज्ञानिक औरदार्शनिक हुए हैं और उन्होंने अनेक बातें कही हैं।
मेरा मानना है कि इन सभीश्रेणियों में जो नहीं आते हैं, वे भी कोई बात
कहने काअधिकार तो रखते ही हैं। अगर ऐसी बात कहनी नहीं आती है तो मेरे जैसे
सवाल उठाने औरदूसरों की कही बातों का प्रतिरोध करने का अधिकार तो संविधान
ने दिया है। हमें बससही के सामने आना है। अगर सही जो सही है, तो वह हमें
हटाकर खुद सामने आ जाएगा।नहीं तो हम सही का दर्जा ले लेंगे।
आजकल कुछ नया नियम चलरहा है कि खुद को सही साबित करने के लिए किसी को गलत
साबित करना पड़ता है। यह यदिनहीं हो सकता तो बहुत आसान तरीका है कि बस आप
सही के सामने आ जाओ और उसे ढक लो। बसथोड़ा इंतजार करो। कोई किसी को सामने
आने देना नहीं चाहता। सब एक दूसरे को पीछेधकेल रहे हैं। इस सामने आने के
फंडे में आपके पास आत्मविश्वास भरपूर होना चाहिए।दूसरी बात- आपको किसी से
डरना नहीं है भले वह आइंस्टीन ही क्यों नहीं हो। अगर आप आइंस्टीनका विरोध
करेंगे तो वह वापस इस संसार में आपको कोई जबाव देने नहीं आएगा। यह भीसत्य
है कि यदि कुछ कहना है तो किसी परलोक वासी को पकड़ना चाहिए। उसके विषय में
आपकुछ कहेंगे तो उसे ‘सही’ को झूठ कहने के लिए कम से कम वह खुद तो नहीं
आएगा।
अब दूसरी स्थिति यह बनती है कि आत्मविश्वाससे भरपूर
केवल आप और हम नहीं है। बहुत ऐसे भी हैं जो आत्मविश्वास से सही में भरपूरहै
और वे सही है तो वे आपके सामने आएंगे। कोई सामने आए तो इसका पहला और सीधा
अर्थयही समझना चाहिए कि आप सही हैं और इसका प्रमाण है कि कोई आपके सामने आ
रहा है, खुदको सही साबित करने के लिए।
अनेक बार कोई बात
जो बहुत सही होती हैवह मामूली सा मेरे जैसा आदमी भी कह देता है। मेरे पक्ष
में अल्बर्ट आइंस्टीन को मैंरख सकता हूं जो कह कर गए हैं कि जो सही है वह
हमेशा लोकप्रिय नहीं होता। मैं सहीहूं और लोकप्रिय नहीं हुआ हूं, किंतु
किसे हसरत नहीं होती लोकप्रिय होने की! इसलिएमैं भी लोकप्रिय होना चाहता
हूं। मैं नहीं जानता कि लोकप्रिय होने के लिएमूल-मंत्र क्या है... इसलिए
सही-सही बातें करता रहता हूं और सोचता हूं कि पता नहींकिस बात में वह असर
हो कि मुझे लोकप्रिय बना दे। मैं कभी भी लोकप्रिय हो सकता हूं।मेरे
लोकप्रिय होने का मुझे इंतजार है। सही हमेशा नहीं कभी कभी या कभी
कभारलोकप्रिय होता है।
मैं तो हमेशा से मानता आया हूं
किशास्त्र से बड़ा ज्ञान लोक में होता है। यह मुझे लगता है कि आइंस्टीन को
भी यह बातपता थी, इसलिए ही तो उन्होंने ‘सही और लोकप्रिय कासिद्धांत’ दिया।
मैं इस रचना का शीर्षक भी इसी सिद्धांत के नाम पर रखना चाहता थाकिंतु पंच
काका का कहना था कि इसे लोकप्रिय करना है तो इसके शीर्षक में आइंस्टीनका
नाम फिट होना जरूरी है। मैं पंच काका और मेरी पत्नी का हमेशा से मुरीद हूं।
येदोनों सही हैं या गलत इस विषय में मैं कुछ कह नहीं सकता हूं किंतु ये
दोनों ही मेरीगली और मोहल्ले में लोकप्रिय हैं। पत्नी इसलिए कि उसे कहीं भी
शादी-विवाह या कोईमांगलिक अवसर हो गीत गाने के लिए बुलाते हैं और पंच काका
के बिना कोई महफिल सजतीनहीं। मुझे मेरी कविता सुनने के लिए कोई नहीं
बुलाता। यही कसक मेरे भीतर रही है औरसंभव है यही कारण हो मेरे लोकप्रिय
होने की अभिलाषा का।
असल में लोकप्रिय होना ‘लोक’
मेंप्रिय होना है। लोक में प्रिय होना वैसे भी आसान नहीं है। और आइंस्टीन
तो आगाह करगए हैं कि सही कभी-कभार ही प्रिय होता है। चुनाव में पक्ष और
विपक्ष के साथनिर्दलीय उम्मीदवारों के लिए यह सिद्धांत लागू होता है किंतु
जब दूध में पानी मिलजाता है तो दूध का दूध और पानी का पानी करना बिरलों का
खेल है। ऐसे अनेक सच हैंजिनको सुनते ही मिर्ची लगती है। सही तब तक छुपे
रुस्तम की तरह होता है जब तक कि वहलोकप्रिय नहीं हो जाए। सही को लोकप्रिय
नहीं बनने देने के लिए अनेक संगठन औरसत्ताएं प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में
काम करती हैं। सही अपने आप कभी भी लोकप्रियनहीं सकता है। उसे लोकप्रिय
बनाना पड़ता है और बहुत बार तो जब तक वह लोकप्रिय होताहै वह खुद प्रिय हो कर
इस संसार से चला जाता है। सही का मार्ग सरल नहीं होता इसलिएकहना चाहिए कि
लोकप्रियता के मार्ग में अवरोध बहुत होते हैं।
अब मान भी
लिया जाए कि जैसे-तैसे मैं सही लोकप्रिय हो भी जाता हूं तो संदिग्ध बन जाता
हूं। अब फिर सामने संकट है- ‘जो लोकप्रियहोता है वह हमेशा सही नहीं होता।’
अभिप्राय यह है कि पूरी जिंदगी संहेद ही संदेहबना रहेगा। इसका कारण जहां
तक मुझे समझ आया है वह है- सही को लोकप्रिय होने केमार्ग में अनेक समझौते
करने पड़ते हैं कि वह लोकप्रिय हो सके। ऐसे में पहले सही कोलगता है कि वह
सही है या नहीं। अगर सही है तो वह लोकप्रिय क्यों नहीं हो रहा है। असलमें
आइंस्टीन का सही और लोकप्रिय होना अपने आप में एक पहेली है। इस जटिल समय
मेंसही की उम्मीद करने वाले बहुत कम बचे हैं। वर्षों पहले ही आज के समय की
जटिलताओंका अहसास आइंस्टीन को हो गया था। हमें मान लेना चाहिए कि हमारे समय
में सही कालोकप्रिय होना बेहद कठिन है और उसके से भी कठिन है किसी
लोकप्रिय का सही होना।
नीरज दइया
24 जनवरी, 2024
उत्तर-आधुनिक चरण-स्पर्श/ नीरज दइया
मैंने अपने पोते से पूछा- ‘चरण शब्द से तुम क्या समझते हो?’
उसने कहा- ‘दादा चरण या चारण, मेरे एक फ्रेंड का सरनेम चारण है। यू नो मूल शब्द चरण नहीं चरन है और चरन का मतलब पैर भी होता है।’
अब सवाल करने की बारी उसकी थी, उसने कहा- ‘लेकिन आप यह पूछ क्यों रहे हैं?’
मैंने कहा- ‘ऐसे ही, क्योंकि तुम आजकल चरण-स्पर्श करना भूल गए हो...?’
- ‘नहीं, नहीं। किसने कहा आपसे? मैंने सब के चरण-स्पर्श कर लिए थे आज। मैं तो हमेशा करता हूं।’
- ‘हें, मैंने तो नहीं देखा...!’
- ‘आप कैसे देखते, जब मैं बेडरूम में था तब कर लिए थे।’
- ‘कैसे?’
- ‘अरे आप सब के चरणों की फोटो खींच कर मैंने अपने मोबाइल में रख ली है। रोज सुबह उठ कर मैं चरण स्पर्श कर लेता हूं, इसलिए आपको लग रहा है कि नहीं किए चरण-स्पर्श। मैंने तो सब के किए, मेरे पास सब के चरणों की फोटो है- आपकी, दादी जी की और पापा-मम्मी की भी। यह देखिए...’
वह अपने मोबाइल में हम सब के चरणों के चित्र दिखा रहा था।
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