29 मई, 2023

आशा-निराशा / नीरज दइया

     एक समय की बात है, छोटे से गांव में दो जुड़वा बहनें रहती थीं। उनके माता-पिता ने उन्हें ‘आशा’ और ‘निराशा’ नाम दिए थे। दोनों अपनी-अपनी प्रकृति में एक दूसरे से बिलकुल अलग थीं। आशा हमेशा उम्मीद और खुशियों से भरी रहती थी, जबकि निराशा इसके ठीक विपरीत अक्सर उदास और निराश रहती थी।
    एक दिन, गांव में मेला आया। मेले के बात सुनकर आशा खुशी में उछल-कूद मचा रही थी, जबकि निराशा लगातार उदास बैठी कुछ सोच रही थी।     
    आशा ने सोचा- मेले में घूमने-फिरने के साथ ही बड़ा झूला झुलने को मिलेगा। गोला गोल ऊंचा झूला और तरह तरह के झूले। खाने-पीने की अलग अलग स्वाद की ढेरों चीजें मिलेंगी। कपड़े और बहुत से सामान वे मेले से कम कीमत में खरीद सकेंगी।
    वहीं निराशा कुछ अलग सोच रही थी- मेले में घूमने-फिरने से थक जाएंगे और बुखार हो जाएगा। वहां वे लोग साफ-सफाई का ध्यान नहीं रखते हैं। हम गंदा खाएंगे-पीएंगे तो बीमार हो जाएंगे। बीमार होंगे तो दवाई के पैसे लगेंगे। कपड़े और दूसरे सामान देखकर मन लालच से भर जाएगा। लड़कियां भी अपने सजने-संवरने के सामान पर कितने रुपये खर्च कर देती है! हद होती है यार... मेला यानी वक्त की बरबादी।
    एक दिन मेल में चलने के लिए आशा ने निराशा को धक्का दिया, चल-चल चलते हैं। निराशा ने रोनी सूरत बना रखी थी फिर भी आशा ने हंस कर जोश के साथ कहा- ‘चलो निराशा बहन, हम मेला देखने जाएंगे। वहां खूब मौज-मस्ती करेंगे। बहुत सारे मजेदार खेल-खिलौने होंगे और हां, चामत्कारिक चीजें देखने को मिलेंगी।’
    निराशा मेले में नहीं जाने का निर्णय ले चुकी थी। उसने सोचा- आशा गंदी लड़की है। यह कोई जिद पकड़ लेती है तो उसे नहीं छोड़ती है।
    आशा उम्मीद भरी आंखों से लगातार आग्रह करती रही तो आखिर में उसकी जीत हुई और निराशा ने अपनी जिद छोड़ दी। दोनों ने मेले में जाने का फैसला किया और वे दोनों मेले के रास्ते लहराती हुई चल पड़ीं।
    मेले में पहुंचकर, आशा ने देखा कि निराशा के चेहरे पर अब भी कोई अधिक खुशी नहीं है। उसने अपनी बहन निराशा दीदी का हाथ पकड़ा और मेले की घुमाई करने के लिए तेजी से चलने लगी। उसने कहा- ‘जिंदगी बहुत सारे रंगों का नाम है। इन रंगों से ही हमारे भीतर सुख-दुख होते हैं। कम रंग तो दुखी होना पड़ेगा। आओ! हम खुसियों के सारे रंग बटोर लें।’
    इस बात पर भी निराशा दीदी चुप रही तो आशा ने आपनी बात को आगे बढ़ाया- ‘दुनिया में बहुत सारी चीजें आखिर बनी हुई किसने लिए है? हमें मजे से जीना चाहिए और जीवन को हर बार नए अवसर देने चाहिए।’
    निराशा ने कहा- ‘मेरा नाम तो निराशा है, भला मैं क्या अवसर दे सकती हूं।’
    आशा ने कहा- ‘नाम पता सब भूल जाओ। बस सोचो कि तुम हो।’
    निराशा ने सोचा कि वह है इस दुनिया में एक सुंदर और प्यारी बच्ची। बस ऐसा सोचते ही उसमें जैसे एक नई आशा का संचार होने लगा। अब वह अपनी बहन के साथ मजेदार खेलों में हिस्सा लेने लगी। उन्हें वहां राइड्स पर सवारी कर खूब आनंद लिया। दोनों बहनें आपस में बातें करती रहीं। उनमें इतनी बातें पहले कभी नहीं हुई थी। वे एक दूसरे की समस्याओं को सुनती और समझती रहीं।
    आशा और निराशा थी तो दोनों एक ही उम्र की पर फिर भी आशा ने खुद को बड़ा मानते हुए निराशा को समझाया कि चुनौतियों से हमें हार नहीं माननी चाहिए। सकारात्मक सोच का जीवन में बहुत महत्त्व होता है।
    उसे लगा कि निराशा अब बदल रही है। वह बदल जाएगी। पर यह क्या... दूसरे ही दिन फिर निराशा ने खुद को अपने कमरे में बंद कर लिया। पूछने पर बोली- ‘परीक्षा में मेरे अंक कम क्यों आते हैं?’
    आशा उसे हर बात समझा सकती थी पर वह समझना ही नहीं चाहती थी।
    सीधी और सरल सी बात थी- आशा पढ़ाई में सक्रिय रहती थी इसलिए वह होशियार थी और वह हमेशा खुश रहती थी। वहीं निराशा सुस्त रहती और कामचोर थी तो उसका नाम कमजोर बच्चों में आता था। उसके पेपर भी अच्छे नहीं होते थे। कभी-कभी तो वह पेपर पूरा लिखती भी नहीं थी इसलिए उसके अंक कम आते थे। उसे लगता रहता था कि सब उसके साथ भेदभाव करते हैं।
    दोनों बहनें अलग-अलग दिशा में चल रही थीं।
    एक दिन विद्यालय के वार्षिकोत्सव की तारीख घोषित की गई। विद्यालय ने विभिन्न प्रतियोगिताओं का एक कार्यक्रम जारी  किया। सभी छात्र-छात्राओं के लिए अच्छा अवसर था। आशा, जो हमेशा से आगे रहती थी, उसने इन प्रतियोगिताओं में भाग लेने का निर्णय कर लिया था। वह प्रतियोगिताओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने के लिए मेहनत करने लगी। उसकी अद्भुत प्रतिभा को देखकर उसे प्रशंसा मिली।
    वहीं, निराशा ने भी कुछ प्रतियोगिताओं में डरते डरते हिस्सा लेने का निर्णय लिया आशा के कहने पर किया। बहन की प्रेरणा से निराशा के जीवन में नई उम्मीदें उमंगे हिलोरे ले रही थी। उसने कुछ नया करने का फैसला किया। उसने मेहनत बढ़ाई और विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग लिया तो कुछ में उसे सफलता मिली।
    दोनों बहनों ने एक साथ प्रतिस्पर्धा के लिए तैयारी की और उनके घर जैसे ईनामों के ढेर लग गए। इस मुकाबलें ने उन्हें एक-दूसरे के साथ गहरे बंधनों में बांध दिया। उन्होंने अपनी अनुभूतियों, ज्ञान और कौशल का प्रदर्शन किया और आपसी प्रतिस्पर्धा के बावजूद एक दूसरे का समर्थन भी किया। प्रतियोगिता उन्हें न केवल अकेले अपने आप को प्रमाणित करने का अवसर दिया, बल्कि उन्हें एक-दूसरे के साथ अधिक सहयोगी बनाने का भी मौका दिया।
    इस घटना के बाद, आशा और निराशा ने मिलकर एक दूसरे के समर्थन में खड़े होने का निर्णय ले लिया था। वे सहयोग करने और एक-दूसरे की पढ़ाई में मदद करने के लिए साथ काम करने लगीं। आशा ने निराशा को उत्साहित किया और निराशा ने आशा को समर्थन प्रदान किया। उन्होंने एक-दूसरे की कमियों को पूरा किया और वे सफलता पर सफलता प्राप्त करती चली गई।
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26 मार्च, 2023

‘जय हो’ की नाराजगी / डॉ. नीरज दइया

मोबाइल टनाटनाया तो स्क्रीन पर नाम चमकने लगा। मन में सोचा यह क्यों फोन कर रहा है? बिना काम के और बिना मतलब के फोन उठाने में मेरी रुचि नहीं रहती। मेरी इस रुचि और अरुचि का संभवत उन्हें मालूम नहीं था, फिर से फोन बज रहा था और नाम भी वहीं था। आर. के. जोशी आखिर क्या बात करना चाहते हैं? कुछ लोग गजब की पिंडी पकड़ होते हैं, हमें सोचना चाहिए कि सामने वाले ने एक बार फोन नहीं उठाया, दोबारा फोन नहीं उठाया... तो फिर तीसरी बार फोन क्यों कर रहे हैं? मैंने फोन उठाया और बहुत मधुर स्वर में कहा- भाई साहब प्रणाम। कहिए...
- कब से फोन किए जा रहा हूं, आप फोन क्यों नहीं उठा रहे हैं? फोन उठाने का भी कोई खर्चा आता है क्या...? ऐसे अवसरों पर झूठ हमारी बड़ी सहायता करता है। दूर बैठे आदमी को बस सुनाई सुनाई देता है, दिखाई नहीं देता है। इसलिए मैंने कहा- भाई साहब मैं ड्राइविंग कर रहा था और ट्रैफिक बहुत था। क्षमा चाहता हूं इसलिए फोन नहीं उठा पाया। हुकुम करिए आप क्या कह रहे थे?
- नहीं पहले यह बताओ, अब भी गाड़ी चला रहे हो या रुके हो कहीं पर...?
कहने वाले ने झूठ थोड़े ही कहा है- एक झूठ को सच बनाने के लिए हजार झूठ बोलने पड़ते हैं। मैंने कहा- गाड़ी को साइड में लगा कर रोक लिया है, आपसे बात करने के लिए...।
- चलो तो फिर कोई बात नहीं, फिर बात करेंगे। जब आप फ्री हो तो फोन कर लेना...।
- ऐसा भी क्या है भाई साहब, अब बता भी दीजिए... गाड़ी रोक ली है और साइड में लगा ली है। मुझे गुस्सा आ रहा था कि जब इतना जरूरी काम नहीं था तो फिर घंटी पर घंटी क्यों किए जा रहे थे।
जोशी भाई साहब ने कहा- मैंने तो इसलिए फोन किया था कि मैं जानना चाह रहा था कि मैंने ऐसी क्या गलती कर दी, जिससे आप नाराज हो गए हैं।
इसे कहते हैं किसी की शराफत पर लट्ठ मारना। मुझे बातों में ऐसी जलेबिया पसंद नहीं है। अपने गुस्से को काबू में रखते हुए मैंने उत्तर दिया- मैं भला आपसे क्यों नाराज हूं। मैं नाराज हूं, ऐसा आपको किसने कहा? आपके और हमारे संबंध तो बरसों पुराने हैं और घर जैसे हैं। आप दूसरों की बातों में नहीं आए।
- दूसरे किसी ने नहीं कहा है यह तो साफ-साफ दिखती बात है!
- भाई साहब ऐसे समझ में नहीं आ रहा है, आप सीधे-सीधे बताइए बात क्या है?
- पिछले तीन-चार दिनों से देख रहा हूं कि आप फेसबुक में मुझे टैग नहीं कर रहे हैं।
मैंने मन ही मन कहा- खोदा पहाड़ निकली चूहिया। पर प्रत्यक्ष में बोला- तो यह जरूरी बात है...।
- हां तो मुझे टेंशन हो गयी कि ऐसा मैंने क्या कर दिया, कह दिया या कहीं कुछ लिख दिया कि आपने मुझे टैग करना बंद कर दिया है!
- ठीक है भाई साहब मैं आपको घर जाकर सभी पोस्ट में टैग कर दूंगा। अब मैं उनको समझाने की स्थिति में नहीं था कि फेसबुक आदि अपने तो रोज के धंधें हैं, कोई टैग हो गया तो ठीक नहीं हुआ तो ठीक। अपने दोस्ती दुश्मनी देखकर टैग नहीं करते जी। जो हाथ में जाए उसे ही टैगिया देते हैं। ये जोशी भाई साहब मेरी हर पोस्ट पर केवल एक ही बात लिखते हैं- जय हो। मैं किसी के मरने की खबर लगा दूं या जन्मदिन की बस इनका कॉपी-पेस्ट हर जगह ‘जय हो’ ही होता है। मैंने तो इनका नाम ही जय हो निकाल दिया है। तो जनाब जय हो ने सवाल किया- वह तो ठीक है। नहीं, पर कारण तो बताओ ना ऐसा क्या हुआ? पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ।
- तो ठीक है भाई साहब फोन अब रखें। मैं अभी यहीं रुका हुआ तो हूं, अपने काम पर बाद में जाऊंगा। आपको फेसबुक पर सभी पोस्टों पर पहले टैग कर देता हूं।
- नहीं मेरा मतलब यह नहीं है, आपको जहां जाना है वहां पहले जाओ। बाद में जब फ्री हो तो मेरी बात पर सोचना।
- जी भाई साहब फोन रखता हूं। और मैंने फोन काट दिया। मन ही मन एक गंदी सी गाली निकाली। जिसे यहां लिखना ठीक नहीं।.... कितना खून पी गाया। फोन मेरा, फेसबुक मेरी, डाटा पैक मेरा, पोस्ट मेरी, तो मैं किसी टेग करूं और किसे नहीं करूं... यह मर्जी भी मेरी चलेगी या तुम्हारी।
कुछ लोग टैग करने पर परेशान हो जाते हैं और यह जनाब है कि टैग नहीं करने पर इतने परेशान हो लिए। समझदार लोग ठीक कहते हैं कि फेसबुक, व्हाट्सएप, टि्वटर और सोशल मीडिया के दूसरे विकल्प आदमी का समय बहुत खाते हैं। इनकी चकरी चढ़े तो फिर दो घड़ी सुख चैन से बैठ नहीं सकते हैं। कब कहां से किस की घंटी बज जाए कहा नहीं जा सकता। यह घंटियां और बिप-विप दिन देखती है, ना रात और ना ही दोपहर। कोई सो रहा है, कोई पढ़ रहा है, कोई कुछ खा रहा है, कोई कुछ भी कर रहा है, कोई कुछ बात कर रहा है या किसी काम में व्यस्त हैं... पर साहब यह सब कुछ फ्री है। यह हमारी आजादी है कि हम इनके बंधनों में बंध कर इनके गुलाम हो चुके है। बिना इन सब के अब तो सांस भी अच्छे से नहीं आती है। इस फ्री सेवा में कोई टेंशन ले तो टेंशन सर्वाधिक फ्री है।
जोशी भाई साहब टेंशन ले रहे हैं इसलिए मैं अपनी सभी फेसबुक पोस्ट को पहले उन्हें टेग कर देता हूं। फिर आपसे आगे की बात कभी करूंगा क्योंकि पहले तो टैग करने में समय लगेगा और उसके बाद टैग करके ‘जय हो’ को सूचित भी करना पड़ेगा कि भाई साहब आपको टैग कर दिया है। लिख दो अब आप ‘जय हो’।
मेरा निवेदन है कि आपको भी यदि टैग करवाने में रुचि हो तो प्लीज फोन नहीं करें, इस काम के लिए बस मैसेज ही काफी है।

 

20 मार्च, 2023

लघुकथा- नई नौकरानी / डॉ. नीरज दइया

            अभी दो महीने ही पूरे नहीं हुए मुझे इस घर में काम करते हुए और अचानक आज मां सा ने कह दिया- ‘सुनो! कल से काम पर नहीं आना।’ इस दिनोदिन बढ़ती मंहगाई में हम जैसी को जब तक दो-चार घरों में काम नहीं मिले तो गुरज-बरस कैसे हो... चारों तरफ हायतौबा मची हुई है। मुझे रहा नहीं गया, मैं बोल पड़ी- ‘क्यों मां सा क्या हुआ? मुझ से कोई गलती हो गई क्या?’
            मां सा नरम पड़ गई और बोली- ‘नहीं री... गलती कैसी। ऐसा है मुझे से इस उमर में घर का कामकाज होता नहीं। वैसे हमारे घर में काम है भी कितना सा... चार जनों की रोटी बनाना और साफ-सफाई।’
            - ‘तो मैं आप जब कहो आ जाती ना.... बताओ जल्दी आना है या फिर लेट...?’
            - ‘अरे नहीं तू बहुत भोली है री। देख इत्ते दिन बहू अपने पीहर गई हुई थी। अब वो कल आ रही है। वही करती थी पहले और अब भी कर लेगी...।’
            मैं मन मसोस कर रह गई। क्या कहती? पर मन ही मन में तो अपने आप बोल फूट ही गए- ‘अच्छा कल तुम्हारे वाली नई नौकरानी आ रही है।’
- डॉ. नीरज दइया
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लघुकथा- मामूली खर्च/ डॉ. नीरज दइया

 रामगोपाल को एकएक आवेश आया। मन विचलित हो उठा। ‘ऐसा कैसे कर सकते हैं वे?’ उन्होंने जोर से कहा तो उनकी पत्नी ने बताया- ‘ऐसा तो वे पहले भी कर चुके हैं? जो फ्रिज हमने बेटी के दहेज में दिया उसे उन्होंने आगे किसी को गिफ्ट दे दिया।’ रामगोपाल के गुस्से का बांध सीमा लांध रहा था- ‘यह कब की बात है, मुझे पहले बताया क्यों नहीं?’ पत्नी ने धीरे से कहा- ‘बताती कैसे, तुम्हारी बेटी अब तुम्हारी हमारी नहीं रही। वह उनकी तरफ हो गई है, उसने बताया ही नहीं। यह तो बातों बातों में उसके मुंह से निकल गया कि वाशिंग मसीन जो हमने दहेज में दी उसे वे किसी रिश्तेदार की शादी में गिफ्ट देंगे।’
    रामगोपाल ने सोचा कि वह फोन लगा कर अपने समधी जी से बात करे पर अगले ही पल यह विचार त्याग दिया। आगे भी ऐसा हुआ कि उसने फोन किया और उन्होंने फोन उठाया ही नहीं, ना ही वापस उनका फोन आया। पत्नी ने पूछा- ‘क्या हुआ?’
    ‘कुछ नहीं।’ कहते हुए उन्होंने धीरज बंधाते हुए कहा- ‘शांता, तुम चिंता मत करो। भगवान के घर न्याय है और देखना यहीं का यहीं है। जो जैसा करेगा, वैसा भरेगा। ऊपरवाला सारे कर्मों का हिसाब रखता है।’
    शांता को यह सुनकर भी धीरज नहीं आया। उसने कहा- ‘ऊपरवाला तो करेगा जब करेगा, अब मैं करूंगी।’
    ‘क्या करोगी भागवान?’ रामगोपाल को आश्चर्य हुआ कि यह तो कभी ऐसा नहीं करती। उनको उत्तर मिला- ‘ऑनलाइन ऑडर कर के समधी के घर मैं एक नई वाशिंग मसीन भिजवा दूंगी। बेटी के दहेज में इतने रुपये खर्च किए, इस मामूली खर्च से क्या डरना।’ वह मुस्कुरा रही थी।    
- डॉ. नीरज दइया

17 मार्च, 2023

पुरस्कारों की अर्थी/ डॉ. नीरज दइया

 सुबह-सुबह अखबार मेरे हाथों में आते ही मैं खोजना आरंभ कर देता हूं। अखबार की पहली खबर से चालू होकर अंतिम पंक्ति तक बस मैं बस खोजता और खोजता रहता हूं कि कहीं कोई मेरे काम की खबर मिल जाए। रविवार और साहित्य परिशिष्ठ के दिन तो मैं अपनी रचना को खोजता हूं कि संपादक ने मेरी रचना को स्थान दिया है या नहीं बाकी दिनों में मेरी खोज अलग होती है। अब आपसे क्या छिपाना आप कोई मुझ से अलग थोड़ी हैं मैं तो जैसे कोई कुंवरा वैवाहिक विज्ञापनों में वधू को खोजता है वैसे ही पुरस्कारों को ढूंढ़ता हूं। यह मेरा दुर्भाग्य कि मुझे सफलता बहुत कम नसीब होती। संपादकों के लिए मैं आदर के अतिरिक्त अन्य शब्दों का प्रयोग करते हुए कुछ कह भी कैसे सकता हूं वर्ना जो कभी कभार मेरी रचना को स्थान देते हैं वह भी बंद कर देंगे।

            मैं निवेदन की मुद्रा में यह तो कह सकता हूं कि वे पुरस्कारों की खबरें जरा विस्तार से और पूरी प्रकाशित किया करें। जनता को इससे कोई सरोकार नहीं है कि यह पुरस्कार कैसे मिला है, पर मैं लेखक के रूप में यह जानने का थोड़ा हक और अधिकार रखता हूं। मेरे लिए यह जानकारी बहुत जरूरी है कि पुरस्कार किसे मिला, किस रचना पर मिला, कितनी राशि का मिला और संस्था ने किन-किन को निर्णायक बनाया है। सबसे अधिक जरूरी यह पुरस्कार सम्मान दूसरे लेखकों यानी कि मुझे कैसे मिल सकता है। मैं इसे पाने के लिए क्या क्या तैयारी करूं। जैसे कंपटीशन की तैयारी के लिए देश में जगह जगह कोचिंग सेंटर खुले हैं वैसे ही पुरस्कार पाने के लिए संस्थाओं को ऐसे सेंटर भी खोलने चाहिए।

            सुना है कि कुछ जुगाड़ू किस्म के लेखक पुरस्कार पाने के लिए डोनेशन के नाम पर बढ़ चढ़ कर रकद सहायता-सहयोग के नाम पर देते हैं। आश्चर्य की बात है कि पुरस्कार और सम्मान का पूरा खर्च गोपनीय रूप से उठाने वाले लेखकों को हसंते खिलखिलाते देखा गया है। उनके कांधे या सिर पर कोई शिकन या बोझ कहीं दिखाई ही नहीं देता है। माना कि संपादक यह सब गोपनीय बातें नहीं छाप सकता है किंतु कुछ तो उसका उत्तरदायित्त्व होता है। कुछ लेखक किस्म के संपादक खुद तो ऐसे जानकरियों से लाभ उठा लेते हैं किंतु अपने पाठकों और अन्य लेखकों को वंचित रखते हैं जिससे वे पुरस्कार की दौड़ में पीछे रह जाते हैं।

            मैं यह अध्ययन अर शोध लंबे समय से कर रहा हूं और अब मेरे अध्ययन के परिणाम या कहें सार आपके सामने प्रस्तुत करने का समय आ गया है। मैं योग्य लेखक हूं और आप में से भी अनेक योग्य लेखक होंगे। हमें कुछ ऐसा करना यह है कि साहित्य के जुगाड़ू लेखकों की टें बोल जाए। मेरे इस अध्ययन में अकादमी के पुरस्कारों पर विशेष अध्ययन किया गया है क्यों कि वहां सूचना का अधिकार सक्रिय है। सेठों और साहूकारों की संस्थाओं के नाम भले सेठ-साहूकार रखें हो किंतु असल में ये सब चोरों-लुटेरों की संस्थाएं होती हैं। इनका साहित्य और पुरस्कार से लेश मात्र का लोभ नहीं होता ये बस इस नाम पर वीआईपी को बुलाकर उनके हाथों पुरस्कार प्रदान कराते समय अपनी फोटो और लाभों को ध्यान में रखते हैं।

            पुरस्कार रहस्य जो जितना मैंने जाना वह यह है कि पुरस्कार की प्रविधि को शमशाम में ले जाने वाली अर्थी से समझ सकते हैं। जिस प्रकार अर्थी को उठाने की होड लगी रहती है वैसे ही पुरस्कार को पाने के लिए और कंधा देने के लिए चारों तरफ होड़ लगी हुई है। यह विचित्र संयोग है कि पुरस्कार समिति में भी एक संयोजक और तीन निर्णायक अर्थात कुछ चार होते हैं और अर्थी भी चार लोग मिलकर उठाते हैं। अर्थ काच की तरफ एकदम साफ है कि ये चारों साहित्य के ठेकेदार चाहे तो किसी लेखक की अर्थी उठाएंगे और कहेंगे तो नहीं उठाएंगे। मना कर देंगे। कहने को तो कहा जाता है कि संयोजक की भूमिका मूकदर्शक भर होती है किंतु मूक बधिर भी इशारे में बहुत कुछ कह देते हैं फिर यह तो ठहरा तुर्रम खां संयोजक। कभी निर्णायक कोई बाप किस्म का आदमी आ जाए तो बात अलग है वर्ना सारी बात संयोजन के संकेतों पर ही रहती है।

            मेरे देश के महान संपादकों और अखबारों को मालिकों मैं आपके किस्म किस्म के पत्रकारों और पत्रकारिता के घटकों की दुहाई देते हुए वॉच डॉग पत्रकारिता के मसीहाओं का आह्वान करता हूं कि मेरे इस अध्ययन का फायदा उठाएं और अकादमी पुरस्कारों को अर्थी से समझें कि अर्थी को वैसे तो कोई भी कंधा दे देता है एक राह चलता राहगीर भी। किंतु असल सवाल है कि किसी की अर्थी को कंधा देने का असली हकदार कौन है? शव किसी बाप का है तो बेटे हकदार होगा और बेटे का है तो उसके बाप-दादा। साहित्य पुरस्कारों में घोर अंधेरा देखा जा रहा है। कंधा देने वाले ऐसे गैरे नत्थू खैरे हैं। जो साहित्य के अ-आ-ई सीख रहे हैं उनको संयुक्ताक्षरों तक पहुंचा दिया गया है। निर्णायक स्कूल कॉलेज के अध्यापक प्रोफेसर बन रहे हैं जिनको सृजनात्मक साहित्य का अर्थ केवल पाठ्यक्रम में लगी पाठ्यपुस्तकों के अतिरिक्त कुछ आता है। निर्णायक की हैसियत नहीं है कि वह पुरस्कार के लिए सामने प्रस्तुत पुस्तकों का अर्थ अभिप्राय और साहित्य-परंपरा में प्रासंगिकता का आकलन तो बहुत दूर की बात वे अच्छे से उनका वाचन नहीं कर पाएंगे।

            अस्तु हे संपादक श्रेष्ठ आप ही आशा का केंद्र है कि कुछ ऐसा करें कि इस युग के जुगाड़ू लेखकों की टें बोल जाए। आदरणीय आपसे इतना कुछ संभव नहीं हो तो इतनी कृपा अवश्य करें कि मेरी इस अधकचरी तृतीय कोटि की रचना को थोड़ा सा स्थान आपने प्रतिष्ठित अखबार में प्रदान करें। आपकी इसी अनुकंपा से मैं स्वयं को धन्य समझूंगा।

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