28 दिसंबर, 2021
डॉ. शक्तिदान कविया की स्वर्णिम आभा / डॉ. नीरज दइया
कृति ‘धरती घणी रूपाली’ के अनुवाद के बारे में डॉ. आनंद प्रकाश दीक्षित ने लिखा- ‘तरुण की कुछ चुनी हुई कविताओं का राजस्थानी के सरस हृदय कवि डॉ. शक्तिदान कविया ने राजस्थानी में उन कविताओं की संपूर्ण गरिमा और अर्थ एवं भाव की रक्षा करते हुए सुघड अनुवाद प्रस्तुत करके बड़ा ही उपयोगी कार्य किया है। उनका अनुवाद मूल रचना के सन्निकट और उसके लिए सोने में सुगंध जैसा है।’ पचास कविताओं की इस कृति में प्रस्तावना विद्वान लेखक डॉ. मनोहर शर्मा ने लिखी और स्वयं अनुवादक ने भी अपनी बात भूमिका ‘अनुवादक रा आखर’ में विस्तार से रखी है। यही नहीं अंग्रेजी भाषा के कवि टॉमस ग्रे की ‘एलीजी’ का अनुवाद भी कविया जी ने किया जो बेहद चर्चित रहा है। इनकी भूमिकाओं के माध्यम से हम कविता और अनुवाद की अनेक बातें जान सकते हैं।
दो बातें स्पष्ट है एक तो यह कि कविया जी कविता के अच्छे अनुवादक रहे हैं और दूसरी यह कि उनका अध्ययन व्यापक-विशद रहा है। वैसे उन्होंने स्वयं भी कविताएं लिखी है। एक कवि हृदय दूसरे कवि हृदय को बेहतर ढंग से समझ सकता है। परंपरागत डिंगळ शैली और छंदबद्ध काव्य-रचनाओं के लिए पहचाने जाने वाले कविया जी की सर्वाधिक जनप्रिय कविता को राजस्थानी भाषा की वंदना कह सकते हैं। ‘इणरौ इतिहास अनूठो है, इण मांय मुलक री आसा है।/ चहूंकूंटां चावी नै ठावी, आ राजस्थानी भासा है।’ जब-जब राजस्थानी भाषा और मंचीय कविता की बात होगी हमें इस अद्वितीय कविता का स्मरण करना होगा। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि सपूता री धरती, दारू-दूषण, धरा सुरंगी धाट, धोरां री धरोहर जैसी काव्य-कृतियों के द्वारा कवि के रूप में अनेक छंदबद्ध रचनाएं देने वाले कविया जी ने आधुनिक कविता के क्षेत्र में भी किंचित योगदान दिया है, किंतु वे डिंगळ के छंदवद्ध कवि के रूप में ही ख्याति प्राप्त कर सके हैं। आधुनिक गद्य विधाओं खासकर उपन्यास, कहानी, कविता, नाटक आदि के विषय में उनका चिंतन लेखन मेरे अध्ययन में नहीं आया है किंतु वे महाविद्यालय में राजस्थानी विभागाध्यक्ष रहे तो निसंदेह इन सब पर भी उनका समान अधिकार रहा है।
कविता और अनुवाद की बात करते हुए प्रसंगवश हमें यहां यह भी विचार करना चाहिए कि किसी अनुवादक के द्बारा किसी रचना अथवा कृति को अनुवाद के लिए चयन करने का मूल आधार क्या होता है। इसमें सर्वाधिक अभिमत तो अनुवादक की अपनी पसंद है जो निसंदेह महत्त्व भी रखती है। कविया जी के साथ भी ऐसा ही रहा है। साहित्य अकादेमी के अनुवाद पुरस्कार से सम्मानित कृति के अनुवाद का बीजारोपण अनुवादक कविया जी के मन में वर्ष 1958 में हुआ, जब वे कविवर तरुण की कविता ‘बटोही ठंडी सांस न ले’ रचना से बेहद प्रभावित हुए थे। वर्ष 1989 में महाकवि तरुण की ‘तरुण-काव्य ग्रंथावली’ का प्रकाशन हुआ और दिसंबर 1990 में उन्होंने उनकी चयनित लगभग पचास कविताओं का राजस्थानी रूपांतरण किया। यहां यह भी रेखांकित किया जाना जरूरी है कि किसी मूल कविता के मूल छंद को अनुवाद की भाषा में उसी छंद और भाव गरिमा के साथ साधना बेहद श्रमसाध्य होता है जो उन्होंने इस अनुवाद में किया है।
जब हम कविया जी के विशद कार्य को देखते हैं तो उनको किसी एक रूप अथवा विधा के बंधन में नहीं बांध सकते हैं। वे कवि और अनुवादक तो थे ही किंतु उससे भी अधिक उनका मान-सम्मान निबंध विधा में रहा है। उन्होंने एक बेजोड़ गद्यकार के रूप में जहां वचनिका शैली को साधने का प्रयास किया, वहीं विविध विषयों के व्यापक अध्ययन-मनन-चिंतन से पुष्ट उनके निवंध विषयगत आधरभूमि कहे जाते हैं। ‘संस्कृति री सोरम’ (1984) निबंध-संग्रह में दस निवंधों के माध्यम से राजस्थानी संस्कृति के अनेक परिचित-अपरिचित पक्षों को कविया जी ने वाणी दी है। यहां परंपरा और आधुनिकता का सुंदर समन्वय देखा जा सकता है। लोक-संस्कृति, लोक-परंपराओं, लोक-विश्वासों और लोक-साहित्य के व्यापक अध्यान को यहां शब्द-शब्द सुवास और लालित्यपूर्ण गद्य में देख सकते हैं।
यह देखकर आश्चर्य होता है कि उन्होंने जिस विद्वता से अनेक ग्रंथों की भूमिकाएं और प्रस्तावनाएं लिखी उनमें स्वतंत्र रचनाओं-विचारों के अनेक अंश मौजूद है। शायद यही कारण रहा होगा कि अनेक कृतियों की भूमिकाओं और प्रस्तावनाओं में से चयनित 24 को उन्होंने कृति ‘प्रस्तावना री पीलजोत’ (2009) में संकलित किया था। मेरा मानना है कि शक्तिदान कविया की स्वर्णिम आभा इन रचनाओं के अतिरिक्त अनेक ऐसे ग्रंथ संपादनों की भूमिकाओं में भी मिलती है। उदाहरण के लिए भारतीय विद्या मंदिर शोध प्रतिष्ठान से प्रकाशित राजस्थानी की चर्चित कृति ‘छन्द राउ जइतसी रउ’ (1991) का संपादन मूलचंद ‘प्राणेश’ ने किया जिसमें प्रस्तावना डॉ. शक्तिदान कविया की प्रकाशित हुई है। इसी प्रकार राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान से प्रकाशित ‘सोढायण’ (1966) के संपादक के रूप में कविया जी ने 92 पृष्ठीय भूमिका में बहुत विस्तार से विविध आयामों को स्पर्श करते हुए जो कुछ लिखा है वह अपने आप में अद्वितीय मेधा का अनुपम उदाहरण है। कैसे एक व्यक्ति ने इतिहास, साहित्य और संस्कृति को एकमेक करते हुए अतीत के पन्नों को प्रामाणिकता के साथ उजागर किया है यह देखने-समझने की बात है। उनको कवि-अनुवाद के साथ निबंधकार और आलोचक के रूप में मानना समीचीन होगा।
हिंदी लेखक की बात करें तो उनके विपुल लेखन को संग्रहित किया जाना है। अब तक उनकी तीन कृतियां- राजस्थानी साहित्य का अनुशीलन, डिंगल के ऐतिहासिक प्रबंध काव्य और राजस्थानी काव्य में सांस्कृतिक गौरव हिंदी में प्रकाशित हुई है। उन्होंने राणी लक्ष्मी कुमार चूड़ावत पर विशेष कार्य किया है। राजस्थानी दूहा संग्रह, राजिया रा सोरठा और ऊमरदान ग्रंथावली जैसे अनेक ग्रंथों के संपादन के लिए उनकी अक्षय कीर्ति है। डॉ. शक्तिदान कविया के संपूर्ण कार्यों की प्रारंभिक जानकारी के लिए राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर द्बारा प्रकाशित राजस्थानी साहित्य रा अगीवाण शृंखला में डॉ. गजादान चारण द्वारा लिखित विनिबंध देख सकते हैं।
डॉ. शक्तिदान कविया को यदि मैं गुरुओं का गुरु कहता हूं तो यह कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। उन्होंने शिक्षा विभाग राजस्थान के शिक्षक रचनाकारों की संपादित कृति ‘फूल सारू पांखड़ी’ (1984) की भूमिका भी अनेक ऐसे बिंदुओं को उजागर किया है कि वे आज भी भाषाई दृष्टिकोण से प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। ‘फूल सारू पांखड़ी’ में गहरी व्यंजना है जो गागर में सागर उक्ति से मिलती-जुलती है। गागर में सागर में अधिकता का भाव है, वहीं फूल सारू पांखड़ी में न्यूनता की अभिव्यक्ति है। बहुत अधिक के स्थान पर बस थोड़ा-सा अथवा उसका अंश मात्र अभिव्यक्त करना अथवा होना ‘फूल सारू पांखड़ी’ में समाहित है। आठ-दस पृष्ठों की भूमिका में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात भाषा के प्रति गंभीर और सजग होने की प्रेरणा गुरुजनों को देना है। उन्होंने अनेक उदाहरणों-उद्धरणों के द्वारा शिक्षक विभाग में सेवारत राजस्थानी लेखकों का आह्वान किया है कि यदि वे सजगता से कार्य करेंगे तो निकट भविष्य में भाषा मानकीकरण का कार्य बेहद सरल-सहज हो जाएगा। उनका मानना रहा कि राजस्थानी में ‘लेखक’ के लिए ‘लिखारौ’ शब्द उचित नहीं है। इसका कारण वे देते हैं कि ‘लेखक’ में ‘क’ कर्त्ता का बोधक है, जबकि ‘लिखारौ’ में अर्जीनवीस या प्रतिलिपिकार ही हो सकता है। निसंदेह यह उनका लेखन के लिए जिस सृजनात्मक क्षमता का अहसास समाहित करने की बात का उदाहरण है। इसी भांति उन्होंने राजस्थानी के लिए ‘पाठक’ या ‘पढ़णहार’ दोनों शब्दों को ‘पढ़ार’ की तुलना में अधिक उचित-बेहतर बताया है। यहां यह कहने का अभिप्राय है कि शिक्षकों को उनकी भाषा और वर्तनी की अनेक जानकारियों के साथ प्रेरित और प्रोत्साहित करने वाले कविया जी ने स्वयं एक रचनाकार के रूप में समरूपता का निर्वाहन करने का प्रयास जीवन पर्यंत किया है। इस लिहाज से वे भाषाविद अथवा भाषा वैज्ञानिक के रूप में भी पहचाने जा सकते हैं। ऐसे पुरोधा की स्मृति को नमन।
25 दिसंबर, 2021
जूते का स्वाद / डॉ. नीरज दइया
एक दिन अकबर ने बीरबल से पूछा- “बीरबल, दुनिया में सब से बेहतर स्वाद किसका होता है?” बीरबल सोच में पड़ गया। वह जब भी सोच में पड़ता, अकबर से कहा अदब से कहता- ‘‘जहांपनाह ! थोड़ा वक्त दीजिए।’’ इस बार भी उसने यही कहा, और उसे वक्त दे दिया गया। अब दिन-रात बीरबल को चिंता सताने लगी कि अगर किसी खाने-पीने या फल आदि का नाम लिया और बादशाह अकबर को वह पसंद नहीं आया तो क्या होगा? यहां तो उसकी हाजिर-जवाबी पर दाग लगने की नौबत आ पहुंची। वह यही सोच सोच कर परेशान रहने लगा- अगर उसकी और जहांपनाह की पसंद जुदा निकली तो क्या होगा! हो सकता है कि बूढ़े जहांपनाह बूढ़े होते बीरबल की अंतिम परीक्षा ले रहे हो और इसके बाद उसे सदा-सदा के लिए विदा कर दिया जाए। विदा क्या धक्के मार कर दरबार से बाहर कर दिया जाए... बीरबल की आंखों में आंसु आ गए। हाय अल्लाह! इतने सालों की वफादारी का यह ईनाम बख्सा जाएगा!
आंसु तो मेरे भी आने वाले हैं, कारण यह कि मेरे पाठक आप श्रीमान तो शीर्षक देखकर यह विचार कर चुके हैं कि स्वादों में सबसे निराला स्वाद जूतों का ही बताया जाएगा। क्या आप इस बात से सहमत हैं? अब मैं बीरबल बन कर आपसे थोड़ा समय लेकर बात को आगे बढ़ा रहा हूं कि कहीं कोई स्वाद जूतों से बेहतर आपको समझा सकूं। यह तो बेहद सरल था कि मैं बीरबल के श्रीमुख से अकबर को तपाक से उत्तर दिला देता- “जहांपनाह स्वादों में सबसे बेहतरीन स्वाद तो जूते का स्वाद होता है।” यों बात वहीं खत्म हो जाती। हो जाती तो ठीक ही थी, पर नहीं हुई और बिना कुछ किए कराए मुंह में जूते का स्वाद भर गया है। दुनिया में हजारों चीजे हैं जनाब, और जूता भी भला कोई खाने की चीज और स्वाद में आता है क्या? पर क्या करें सबकी अपनी अपनी पसंद होती है और ना मालूम बदशाह सलामत की पसंद क्या हो। और खुदा का खौफ नहीं उनकी पसंद तो बदलती रहती है!
श्रीमान सुनिए बात यूं है कि यह कोई झूठा किस्सा या बनी बनाई झूठी कहानी नहीं है। बिल्कुल सच्ची घटना है कि एक लेखक अपने आस-पास अनेक लेखकों के चित्रों को अपने आस-पास बिखेर कर उन्हें जूते का स्वाद चखा रहा था- “दुष्टों, साहित्य का तुम सब ने मिलकर बेड़ा गर्क कर दिया है। मैं जब तक इस संसार में पैदा हुआ तुम सब ने मिलकर वह सब कुछ लिख डाला जो-जो मैं लिखने की सोच कर यहां आया था।” देखिए, आजादी ने हमें बहुत सारी हिम्मत दे दी है। माना कि इस जूता प्रकरण में उसका स्वाद हमारे लेखक मित्रों तक नहीं पहुंच सका। उनमें से कुछ लेखक तो स्वगवासी थे किंतु जो इसी संसार के वासी थे उनको इसकी खबर तक नहीं लगी कि कोई नया लेखक उनको जूतों का प्रसाद दे रहा है। मुझे लगने लगा है कि अब तो आपके मुंह में भी कुछ कुछ स्वाद जूतों का आने लग गया है।
वैसे तो यह मेरी कल्पना ही थी कि जूते का स्वाद बेहतरीन होता है किंतु अब यकीन हो चला है कि दुनिया में सबसे बेहतरीन स्वाद जूते का ही है। उम्र के साथ उसका स्वाद बदलता जाता है। जूते की ऐड़ी और ऊंची ऐड़ी का स्वाद समान नहीं हो सकता। मित्र और हसीना के जूते का स्वाद तो भैया भिन्न-भिन्न होता ही है। आजकल जमाना बदल गया है किसी को मर्दाना जूते का स्वाद पसंद है तो किसी को फैशनेबल जनाना। अपना ख्याल यहां तो हाई हील के जूते खाने के लिए दुनिया में ऐसे स्टोर भी खुल रहे हैं जहां ग्राहक बड़ी संख्या में आते हैं और उनकी लाइन लगती है। एक रेस्टोरेंट सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना कि वहां खाने में जूते परोसे जाते हैं। खाने वाले जूता, चॉकलेट से बना है। अकबर-बीरबल ने तो उसी जमाने में यह स्वाद रहस्य जान लिया था किंतु अब इस नई दुनिया का मानना है कि जूते का स्वाद गजब का होता है।
जते का स्वाद ऐसा है कि सब जानते और मानते हैं। हो सकता है इसे स्वीकार करने की हिम्मत नहीं हो। इसका स्वाद तो सभी जानते हैं और कोई जीवन ऐसा नहीं जिसने इसका स्वाद ना जाना हो। किंतु सत्य यह भी है कि इस विषय में पूछे जाने पर हर कोई किन्नी काटता हैं। यह संकोच कैसा…? दरसल जूता सदैव एक संभावनाशील विषय रहा है और हर युग में रहेगा। बीरबल ने जाना कि हमारे भरत जी जूते का स्वाद बखूबी जानते थे इसलिए तो रामजी के खड़ाऊ लेकर अयोध्या वापस लौट आए और जूते यानी खड़ाऊ को पूजते रहे। अब विचार कीजिए कि पूरा भक्तिकाल भगवान के श्रीचरणों में बैठा कर कौन से स्वाद को लेकर साहित्य का स्वर्णयुग बन बैठा है। साहब को कभी मेम साहब के जूतों का स्वाद पूछ कर देखिए। ऐसे गोपनीय प्रकरण रसरंजन के बाद श्रीमुख की शोभा होते हैं, अस्तु इसके साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ करना अधोषित अपराध है।
- डॉ. नीरज दइया
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एक दिन अकबर ने बीरबल से पूछा- “बीरबल, दुनिया में सब से बेहतर स्वाद किसका होता है?” बीरबल सोच में पड़ गया। वह जब भी सोच में पड़ता, अकबर से अदब से कहता- ‘‘जहांपनाह ! थोड़ा वक्त दीजिए।’’ इस बार भी उसने यही कहा, और उसे वक्त दे दिया गया। अब दिन-रात बीरबल को चिंता सताने लगी कि अगर किसी खाने-पीने या फल आदि का नाम लिया और बादशाह अकबर को वह पसंद नहीं आया तो क्या होगा? यहां तो उसकी हाजिर-जवाबी पर दाग लगने की नौबत आ पहुंची। वह यही सोच सोच कर परेशान रहने लगा- अगर उसकी और जहांपनाह की पसंद जुदा निकली तो क्या होगा! हो सकता है कि बूढ़े जहांपनाह बूढ़े होते बीरबल की अंतिम परीक्षा ले रहे हो और इसके बाद उसे सदा-सदा के लिए विदा कर दिया जाए। विदा क्या धक्के मार कर दरबार से बाहर कर दिया जाए... बीरबल की आंखों में आंसु आ गए। हाय अल्लाह! इतने सालों की वफादारी का यह ईनाम बख्सा जाएगा!
आंसु तो मेरे भी आने वाले हैं, कारण यह कि मेरे पाठक आप श्रीमान तो शीर्षक देखकर यह विचार कर चुके हैं कि स्वादों में सबसे निराला स्वाद जूतों का ही बताया जाएगा। क्या आप इस बात से सहमत हैं? अब मैं बीरबल बन कर आपसे थोड़ा समय लेकर बात को आगे बढ़ा रहा हूं कि कहीं कोई स्वाद जूतों से बेहतर आपको समझा सकूं। यह तो बेहद सरल था कि मैं बीरबल के श्रीमुख से अकबर को तपाक से उत्तर दिला देता- “जहांपनाह स्वादों में सबसे बेहतरीन स्वाद तो जूते का स्वाद होता है।” यों बात वहीं खत्म हो जाती। हो जाती तो ठीक ही थी, पर नहीं हुई और बिना कुछ किए कराए मुंह में जूते का स्वाद भर गया है। दुनिया में हजारों चीजे हैं जनाब, और जूता भी भला कोई स्वाद में आता है क्या? पर क्या करें सबकी अपनी-अपनी पसंद होती है और ना मालूम बदशाह सलामत की पसंद क्या हो। और खुदा का खौफ नहीं, उनकी पसंद तो बदलती रहती है!
श्रीमान सुनिए, बात यूं है कि यह कोई झूठा किस्सा या बनी बनाई झूठी कहानी नहीं है। बिल्कुल सच्ची घटना है कि एक लेखक अपने आस-पास अनेक लेखकों के चित्रों को अपने आस-पास बिखेर कर उन्हें जूते का स्वाद चखा रहा था- “दुष्टों, साहित्य का तुम सब ने मिलकर बेड़ा गर्क कर दिया है। मैं जब तक इस संसार में पैदा हुआ तुम सब ने मिलकर वह सब कुछ लिख डाला जो-जो मैं लिखने की सोच कर यहां आया था।” आजादी ने हमें बहुत सारी हिम्मत दे दी है। माना कि इस जूता प्रकरण में उसका स्वाद हमारे लेखक मित्रों तक नहीं पहुंच सका। वैसे तो यह मेरी कल्पना ही थी कि जूते का स्वाद बेहतरीन होता है, किंतु अब यकीन हो चला है कि दुनिया में सबसे बेहतरीन स्वाद जूते का ही है। उम्र के साथ उसका स्वाद बदलता जाता है। जूते की ऐड़ी और ऊंची ऐड़ी का स्वाद समान नहीं हो सकता। मित्र और हसीना के जूते का स्वाद तो भैया भिन्न-भिन्न होता ही है। आजकल जमाना बदल गया है किसी को मर्दाना जूते का स्वाद पसंद है, तो किसी को फैशनेबल जनाना जूतियां। अपना ख्याल यहां तो हाई-हील के जूते खाने के लिए दुनिया में ऐसे स्टोर भी खुल रहे हैं जहां ग्राहक बड़ी संख्या में आते हैं और उनकी लाइन लगती है। एक रेस्टोरेंट सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना कि वहां खाने में जूते परोसे जाते हैं। खाने वाले जूता, चॉकलेट से बना है।
जूते का स्वाद ऐसा है कि सब जानते हैं। हो सकता है इसे स्वीकार करने की हिम्मत नहीं हो। कोई जीवन ऐसा नहीं जिसने इसका स्वाद ना जाना हो। किंतु सत्य यह भी है कि इस विषय में पूछे जाने पर हर कोई किन्नी काटता हैं। यह संकोच कैसा…? हमारे भरत जी जूते का स्वाद बखूबी जानते थे इसलिए तो रामजी के खड़ाऊ लेकर अयोध्या वापस लौट आए और खड़ाऊ पूजते रहे। पूरा भक्तिकाल भगवान के श्रीचरणों में बैठ कर कौन से स्वाद को लेकर साहित्य का स्वर्णयुग बन बैठा है। साहब को कभी मेम साहब के जूतों का स्वाद पूछ कर देखिए। ऐसे गोपनीय प्रकरण रसरंजन के बाद श्रीमुख की शोभा होते हैं। यकीन कीजिए जूतमपाक से बेहतरीन स्वाद इस संसार में दूसरा नहीं है और बीरबल को सारे स्वाद जान लेने के बाद यही उत्तर देना पड़ा। अकबर भी यह उत्तर जाकर ना जाने क्यों चुप रहे!
‘म्हारो काळजो’ संग्रै
‘म्हारो काळजो’ री कवितावां मिनखाजूण री अणथक जातरा नै अरथावण-बिड़दावण अर लगोलग बधावण री कवितावां है। कवि आपरै आसै-पासै अर मांयली दुनिया मांय हुय रैया बदळावां कानी ध्यान करण री बात करै। जीवण रो खरो साच सेवट मरण मानीजै पण मरण नै मंगळ मानण वाळी कविता परंपरा मांय अबै पैली दांई रणखेत मांय जुध नीं हुय’र नितूकै अंतस मांय जुध चालै। कवि जूण-खेत मांय बेफिकरी सूं आगै बधण अर भरोसो राखण रो संदेस देवै। कवि बदळतै बगत मांय छूटतै संस्कारां अर मिनखाजूण मांय खूटतै मिनखपणै नै समझण-समझावण अर चेतावण री बात करै।
‘म्हारो काळजो’ री कवितावां जाण्यै-अणजाण्यै साच नै फेर फेर जाणकारी मांय लावण री कवितावां है। ‘कठै सूं चाल/ कठै तांई पूगणो है/ कुण जाणै’ जैड़ी ओळ्यां इण बात री साख भरै। कवि जूण रै हरेक साच रो मन सूं स्वागत करण री बात करै। आं कवितावां री खासियत नवी बुणगट रै साथै कवि री आपरी भासा अर भावां है जिण रै पाण कविता बांचणियां रा मन मोवै।
‘म्हारो काळजो’ री कवितावां मांय युवा कवि री मनगत भेळै प्रौढ हुवतै कवि-मन री चिंतावां ई आपां देख सकां। जूण रा साच सूं ओ काळजो आकळ-बाकळ हुयोड़ो है। अठै अंतस रै लूण नै बचावण री बात भेळी अंतस सूं जुड़ी केई बातां है जिण मांय भासा अर जुबान री खास बात मिलैला। आं कवितावां नै बांचणो आपरै जुगबोध सूं अरू-भरू हुवणो है। आस करां कै कवि भेळै आखो मानखो ई आपरी भासा, साहित्य अर संस्कारां री हेमाणी नै बचावण खातर संभैला। जूण मांय बिसरता मूल्यां नै बचावण री साची अर खरी आफळ खतार कवि नै मोकळी बधाई रै साथै मंगळकामनावां कै कवि री काव्य-जातरा अणथक आगै आगै बधैला।
- डॉ. नीरज दइया
18 दिसंबर, 2021
सुधीर सक्सेना मानवीय चेतना के कवि : तिवाड़ी
हमारे समय के महत्त्वपूर्ण कवि सुधीर सक्सेना मानवीय चेतना के कवि हैं।
उनके मन में जीव मात्र के प्रति प्रेम और करुणा है और वे किसी को दुःखी
नहीं देख सकते। विषम स्थितियाँ उन्हें ईश्वर से प्रश्न करने को विवश करती
रही है। इसी प्रश्नाकुलता में कवि की गहरी मानवीय आस्तिकता को हम देख सकते
हैं। साहित्य अकादमी से पुरस्कृत लब्धप्रतिष्ठ कवि-कथाकार मालचंद तिवाड़ी ने
सुधीर सक्सेना के कविता संग्रह 'ईश्वर : हाँ, नहीं.. तो' पर वरिष्ठ
साहित्यकार बुलाकी शर्मा के सम्पादन में प्रकाशित विमर्श-पुस्तक तथा
सुपरिचित कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया की राजस्थानी अनुवाद पुस्तक का लोकार्पण
करते हुए मुख्य अतिथि के रूप में ये उद्गार व्यक्त किए।
होटल जोशी में
मुक्ति संस्था की ओर से आयोजित इस समारोह में मालचंद तिवाड़ी ने कहा कि
ईश्वर से प्रश्न करती ये कविताएं हिंदी के साथ अन्य भाषा के सुधि पाठकों को
ही नहीं, साहित्य के आलोचकों को भी विमर्श के लिए विवश कर रही हैं। इस
विमर्श पर बुलाकी शर्मा के सम्पादन में पुस्तक का आना और नीरज दइया द्वारा
इसका राजस्थानी में अनुवाद किया जाना इसकी सार्थकता का प्रमाण है।
कवि सुधीर सक्सेना ने कहा कि ईश्वर के अस्तित्व को सकारने के पक्ष में जितने तर्क हो सकते हैं, उससे कहीं अधिक उसे नकारने के पक्ष में भी हो सकते हैं। लेकिन हम तर्क के विपरीत भावनाओं में जीते हैं। सत्य को ईश्वर मानकर ही हम सत्यशोधक और सत्याग्रही हो सकते हैं। ऐसे सत्याग्राही जिसके लिए असत्य, घृणा, वैमनस्य, हिंसा, वैर-विरोध कोई अर्थ नहीं रखते। उन्होंने कहा कि मुझे खुशी है कि मेरी इन कविताओं को समालोचकों ने गम्भीरता से लेते हुए इन पर विमर्श करना आवश्यक माना।
डॉ नीरज दइया ने कहा कि सुधीर सक्सेना के ईश्वर में राम-रहीम, वाहे गुरु, यीशु आदि सबकी उपस्थिति है। कवि के ईश्वर से प्रश्न हमारे अपने प्रश्न हैं जिनसे हम रोजमर्रा के जीवन में रूबरू होते हैं। साकार-निराकार सत्ताओं के बीच कवि उस ईश्वर से हमारा साक्षात कराते हैं, हमारा हमारा है। इन तरह की कविताएं राजस्थानी में कम हैं इसलिए इन्हें राजस्थानी पाठकों तक पहुंचाना मैंने अपना दायित्व माना।
समारोह अध्यक्ष वरिष्ठ कवि-कथाकार नवनीत पांडे ने कहा कि सुधीर सक्सेना यायावर हैं। देश-विदेश में घूमते हुए वे स्वयं को पूरी दुनिया का मानते हैं और उनके सरोकार आम जन से हैं। ईश्वर से सवाल करने वाले सुधीर सक्सेना सत्ता और व्यवस्था से सवाल करने में भी अग्रणी रहे हैं। वे हमारी मरुधरा बीकानेर आते हैं तो यहां की माटी और यहां की तासीर उनसे कविता रचवा लेती है।
साहित्यकार रामप्रकाश जोशी मन्नू, श्रीप्रकाश जोशी, राजेंद्र जोशी समेत कई साहित्यकारों और प्रबुद्धजनों ने अपने विचाररखे। आभार प्रदर्शन वरिष्ठ चित्रकार प्रफुल्ल पळसुलेदेसाई ने किया।
