29 जून, 2018

पैसे का चक्कर / नीरज दइया

पैसा एक वचन है और इसका बहुवचन जब भी होता है वह बहुत भारी होता है। अब इसके एक वचन से किसी को कोई मतलब नहीं रह गया है। जहां कहीं भी मुद्रा में पोइंट के बाद कुछ लिखा होता है उसे हमारे सिस्टम अपने आप अपग्रेड कर देते हैं। इस राउंट-अप करने की प्रक्रिया में अब वे दिन लद गए जब इसके एक वचन अथवा बहुवचन होने के भी कोई अर्थ होते थे। मुझे अपने बचपन के दिन याद आते हैं, जब हाथ में पैसे होते थे तब एक अजीव सी खुशी होती थी। अब यह हाल है कि जब कोई हाथ में पैसों की शक्ल वाले सिक्के खुल्ले के चक्कर में पकड़ा देता है तो लगता है कि कह दें कि भैया इन्हें तुम ही रख लो। नोट है तो दे दो पर ऐसे चिल्लर से जेब फटने और खन-खन होने का डर है। हाय रे हमारा वह जमाना जब हम पैसों की इसी खन-खन से हर्षित होते थे और अब यहीं खनखनाहट कानों को खटकने लगी है। अतः यह निर्विवादित सत्य के रूप में कहा जा सकता है कि पैसे का सिम्पल बहुवचन हमारे भीतर नफरत भरने वाला है। पैसे का सुपर डिग्री बड़े वाला बहुवचन जिसमें बहुत सारे बहुवचन मिले हो और वह भी पैसे की शक्ल में हर्गिज नहीं हो तब हमारे काम का है।
एक रुपया यानी सौ पैसे और सौ पैसे में अब कुछ नहीं आता है। बच्चों को मनी जिसे हम पुराने जमाने में बहुत बाद में हाथ खर्च के नाम से जानने लगे थे आजकल वह सब डिजिटल हो गया है। बच्चों को कार्ड चाहिए और उससे कुछ भी करने की छूट। अब पैसों की तो बात ही मत करो, कम से कम सौ रुपये को शून्य मानते हुए जो भी करना है स्टार्ड करो। आप को बच्चों की जरा-भी खुशी का ख्याल है या फिर उसकी एक झलक देखने की इच्छा है तो बात पांच सौ देने लेने से कम मत करना। यदि आपका पहला फिगर दो हजार हो तो कुछ बेहतर परिणाम देखने को मिल सकते हैं। अब ऐसी जनरेशन है कि बिना संकोच के सीधे कहती है- ‘पैसा पैसा क्या होता है पैसे की लगा दूँ ढेरी...’ भारतीय मुद्रा के विषय में यदि इस गीत के जैसे कि कहा ‘मैं बारिश कर दूँ पैसे की जो तू हो जाये मेरी’। किसी दिन यह तेरी मेरी वाला खेल सच में हो गया और किसी ने पैसों की बारिश करा दी शायद हमारे अच्छे दिन आ जाएंगे। पर इसमें अच्छे दिनों की तुलना में मुझे खतरा अधिक लगता है कि जिस किसी क्षेत्र में पैसों की बारिश होगी वह दिवानों और दिवानियों की संख्या के बल को देखते हुए होगी। खुदा ना करे कि हम सब उन्हीं पैसों के ढेर के नीच दब जाएं।
वैसे भी अभी हमारी हालत कुछ अच्छी नहीं है। सुनते हैं कि पूरा देश कर्ज के बोझ से दबा हुआ है। देश के दबे होने में आप अपने पर कितना दबाब महसूस करते हैं आप की आप जाने पर मैं तो मेरी ही कह सकता हूं। मेरे गणित के अध्यापक ने ढंग से गिनती में निपुण नहीं किया या कहें कि मेरी ही नालायकी थी कि बड़ी गणित देखकर जी धबराने लगता है। बात लाखों से पार होते ही केस किसी दूसरे को रेफर करना पड़ता है। रोज दाल-रोटी मिल जाए इसी में भारतीय जनता की भांति मेरी भी खुशी है। अपनी अक्षमता को मैं स्वाभिमानी हूं इसलिए ‘सादा जीवन उच्च विचार’ कह कर गौरव की अनुभूति करता हूं। हमारे बुजुर्गों ने पैसों को हाथ का मैल कहा था सो मैं तो इस मैले से हाथ की अधिक निकटता का पक्षधर नहीं हूं। पंच काका की बात भी ठीक है कि जिनको पैसों का असली सूत्र मालूम है वे चुप रहते हैं। नासमझ लोग ही ‘पैसे पैसे क्या करती है’ ऐसा शोर-शराबा करते हैं। ए मुनिया! इस पैसों की ढेरी के चक्कर में नहीं आना है।
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अट्टहास, जुलाई, 2018 में प्रकाशित



25 जून, 2018

जय प्रकाश मानस : गूगल से भी आगे / नीरज दइया

जयप्रकाश मानस से मेरा परिचय बहुत पुराना है। कोई जान-पहचान दो दशक को छूने लगे तो उसे पुराना कहा जा सकता है। समय परिचय को प्रगाढ़ करे अथवा नहीं करें किंतु किसी व्यक्ति आकलन में मदद जरूर करता है। इस दौरान हम अपने संबंधों को ठीक-ठीक समझ और परिभाषित कर सकते हैं। मैं मेरे और मानस जी के विषय में कुछ लिखने से पहले उस दिन का स्मरण करना चाहता हूं जब जयप्रकास जी ने मेरे मानस में एक दस्तक दी। बात उन दिनों की है जब मैंने राजस्थान सरकार की अपनी मास्टरी छोड़कर केंद्रीय विद्यालय, राजकोट में पी.जी.टी. हिंदी के रूप में वर्ष 2003 में कार्यग्रहण किया था। वहां मुझे उच्च माध्यमिक स्तर की कक्षाओं में हिंदी अध्यापन के साथ राजभाषा हिंदी और अन्य कार्य भी मिले थे।
किसी तारीख, दिन और महीने के चक्कर में पड़े बिना सीधे-सीधे कहना यह है कि जयप्रकाश मानस मेरे मानस गुरु उन्हीं दिनों बने थे। ऐसे गुरु जिन्हें वर्षों तक खबर नहीं हुई कि उनका कोई शिष्य नीरज दइया राजकोट गुजरात में बैठा है। भले उस समय मैं अपने इस संबंध को परिभाषित नहीं कर सका पर अब यह पक्का है कि वे मेरे गुरुजनों की श्रेणी में हैं। मेरे कुछ मित्रों को मुझ से शिकायत है कि मेरे गुरुजनों की संख्या अधिक है। मैं मानता रहा हूं जिससे हम कुछ सीखते हैं, जो हमें कुछ सीखाता है वह आदरणीय गुरु ही होता है। उन्होंने मुझे कंप्यूटर के भीतर छुपी हुई राजभाषा हिंदी लेखन से परिचित होने की प्रेरणा दी। उन दिनों मैं कंप्यूटर द्वारा देवनागरी हिंदी में लिखने का प्रयास बेबदुनिया के की-बोर्ड से किसी प्राथमिक स्तर के विद्यार्थी जैसे कर रहा था। मेरे पास एक ई-मेल आया। ऐसा मेल जिसे मैं अपने याहू आई-डी पर पढ़ नहीं पा रहा था। जानकार मित्र ने बताया कि यह फोंट की समस्या हो सकती है, यहां खुल नहीं रहे हैं। मित्र के सुझाव दिया और वह मेल जीमेल एकाउंट मैं पढा गया। सृजनगाथा संपादक के रूप में जयप्रकाश मानस के मेल से पता चला कि उन्होंने मेरे दो अनुवाद प्रकाशित किए हैं।
यह किसी के प्रति सम्मान और श्रद्धा की बात है। कुछ बातें हम कह देते हैं और कुछ मनों में रह जाती है। मैं शब्दों के माध्यम से जयप्रकास मानस जी मिलता रहा हूं। उनसे संवाद का भी लंबा सिलसिला रहा हैं। बीकानेर में हमारी पहली रू-ब-रू मुलाकात वर्ष 2017 में हुई। जब वे अपने दल-बल के साथ ‘द्वितीय अंतराष्ट्रीय लघुकथा हिन्दी सम्मेलन’ के दौरान मेरे शहर में आए थे। मैंने उन्हें अपनी इन भावनों से अवगत कराया तो वे हंसने लगे और ‘अरे नहीं’ शब्द उनके मुख से निकले। उनके ‘अरे नहीं’ कहने और हंसने से मैं अपना शिष्य पद छोड़ने वाला नहीं था और नहीं छोड़ा है। वे भले मुझे मित्र, छोटा भाई या एक लेखक जैसा जो कुछ समझे उनका अपना दृष्टिकोण है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने जिस श्रद्धा-भक्ति का पाठ पढ़ाया है उससे मैंने बहुत कुछ सीखा है। मैं तो जय, प्रकाश और मानस तीनों से शब्दों के गहरे अर्थों से प्रभावित होता रहा हूं, फिर ऐसे दुर्लभ संयोग को कैसे छोड़ सकता हूं।
मेरा उनसे संबंध कवि-अनुवादक के रूप में भी रहा है। मैंने उनकी कुछ कविताओं के राजस्थानी अनुवाद किए थे। जो पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुए हैं। आप और हम उन्हें फेसबुक पर लंबे समय से सक्रिय देख रहे हैं। वे किसी एनसाइक्लोपीडिया की भांति इतनी जानकारिया और स्रोत का भंडार है कि उन्हें प्रणाम करने का मन करता है। खैर मैं तो उन्हें अपना गुरु मान चुका हूं और उनकी इन सभी सेवाओं के लिए उन्हें हार्दिक वंदन करता ही हूं। अंत मैं मेरा बस इतना सा आग्रह है कि जो तटस्थ रहेगा, समय लिखेगा उसका भी इतिहास, फैसला आपका है कि आप अपना इतिहास कैसा चाहते हैं। मुझे तटस्थ की भूमिका से बेहतर स्नेह और आशीष का आकांक्षी होना बेहतर लगता है। मैं अपने गुरु जयप्रकाश रथ के रथ के साथ हूं और रहूंगा।
व्यक्ति का स्वभाव है कि वह थोड़ा बहुत स्वार्थी होता है। मैं कुछ अधिक हूं और जयप्रकास रथ यानी मानस जी के संदर्भ में इतने लंबे समय में मुझे उनके कार्य, व्यवहार और अदम्य उत्साह में अनेकानेक स्वार्थ नजर आते हैं। वे एक सक्रिय रचनाकार के साथ गहरे अध्येता हैं। अपने समय और परिवेश से जुड़ कर वे जैसा जो कुछ कर चुके हैं अथवा अब भी कर रहे हैं बहुत उल्लेखनीय है। किसी एक व्यक्ति में इतनी क्षमताएं और योग्यताएं होना अद्वितीय है। उन्होंने साहित्य लेखन के साथ संपादक और हिंदी के प्रचार-प्रसार-विकास के लिए अतुलनीय कार्य किए हैं। यह सब उनके परिचय में विस्तार से देखा जा सकता है। अगर आपको यह सब पता नहीं तो गूगल जिंदाबाद तो आप जानते ही हैं। गूगल के साथ मेरे गुरुजी मानस जी को भी जिंदाबाद इसलिए कहना है कि वे बहुत सी बातों में गूगल से भी आगे हैं।
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24 जून, 2018

आज तुम याद बेहिसाब आए / डॉ. नीरज दइया

25 जून स्मृति दिवस पर विशेष-
स्मृति-शेष साहित्यकार श्री महेशचन्द्र जोशी


    मैं अपने ही काम-काज में खोया था कि बहुत दिनों बाद मन्दा (मन्दाकिनी जोशी) का फोन आया। एक छोटे से संवाद ने मुझे समय के उस बिंदु तक पहुंचा दिया जहां से हमारे परिचय का स्मरण मैं करने लगा। मेरे बचपन के दिनों में कहानीकार महेशचन्द्र जोशी (1935-2012) को मैंने सबसे पहले बाल साहित्य के लेखकों के रूप में पहचाना था। वे मेरे पिता को गहरे दोस्त रहे और मेरे लिए ऐसे लेखक हैं जिन्होंने मुझे अपना बाल उपन्यास भेंट कर शब्दों की इस दुनिया के लिए प्रेरित किया था। जोशी की पुत्री मन्दा से मेरा परिचय कब हुआ यह अब ठीक-ठीक स्मरण नहीं आता। उसे मेरे पिता सांवर दइया ने उसे बेटी की तरह प्यार दिया और वह मेरे लिए सदा बड़ी बहन की भांति आदरणीय रही हैं। उसकी सादगी, सहजता और सरलता प्रभावित करती है।  
    मन्दा बचपन से ही नाटकों में काम करती थी, उसे मेकअप और बिना मेकअप दोनों रूपों में देखा है। उसे और उसकी छोटी बहन अनु (अनुपमा) में मैंने पाया कि एक छिपी हुई रहती थी और दूसरी मुझसे मेरे हाल चाल पूछा करती थी। आज सोचता हूं तो लगता है कि मैंने उसे कभी सीधी-सरल लड़की के रूप में तो देखा ही नहीं, वह तो सदा से मुझे एक परी जैसी लगती रही है। मेरे बाल मन में पंखों वाली परियों की जो कहानियां रहीं उसमें मन्दा बिना पंखों वाली एक ऐसी परी है जिसकी उडान को पर्याप्त मान-सम्मान मिला है। परियों तो हमेशा हंसती रहती है पर वह ऐसी परी है जो 25 जून, 2012 को बहुत रोई थी। उसने अपने पापा और हम सब के आदरणीय कहानीकार महेशचन्द्र जोशी को इसी दिन मुखाग्नि दी थी। उसने यह साबित कर दिया कि वह अपने पापा की बहादुर बेटी नहीं बेटा है। उसके संघर्ष और कार्यों को देखते हुए अगर मैं उसे परी कहता हूं तो गलत नहीं है। यह बिना पंखों वाली एक ऐसी परी है जिसकी उडान की कहानियां बरसों हम में प्रेरण और हिम्मत भरती रहेगी। वह नारी शक्ति और अदम्य जीजीविषा का एक उदाहरण है। पिछले दिनों बीमारी से लंबा संघर्ष कर फिर से अपनी अदम्य मुस्कान से साबित किया है कि वह सचमुच परी ही हैं जो कभी हारती नहीं है।   
    मन्दाकिनी जोशी इसका पूरा श्रेय अपने पापा को देती हैं। वह उन्हें याद करते हुए कहतीं हैं- ‘मेरे प्रेरक मेरे पापा रहे हैं। उनका सम्पूर्ण जीवन संघर्षमय रहा। एक संपन्न परिवार में जन्म लेने के बाद भी पापा आर्थिक संकटों से जूझते रहे, पर हमें कभी आर्थिक अभाव महसूस नहीं होने दिए। जब तक माँ रहीं, दु:ख क्या होता है, शायद हमने दोनों बहनों ने जाना ही नहीं। जब 31 मार्च, 1993 को मेरी माँ (हेमप्रभा) का असामयिक निधन हुआ पापा ने हमें हिम्मत बंधाई। उन्होंने हमें भरपूर प्यार दिया। हम दोनों बहनों को बेटों की तरह पाला। हमें जीने की, कुछ करने की पूरी आजादी दी। इसी आजादी की वजह से मैंने रंगमंच पर लगभग 15 वर्ष की लंबी पारी पूरी की। पापा अस्वस्थ होने के बाद भी मुझे कभी रंगकर्म के लिए नहीं रोकते थे, वरन् मेरी कला को सराहते हुए सदा प्रेरित-प्रोत्साहित करते रहे।’
    मन्दा की इस यात्रा में मैंने उसके कुछ नाटक देखे हैं। महेशचन्द्र जोशी को अपने पुराने अजीज दोस्त सांवर दइया को याद करते हुए देखा है। वे बहुत भावुक इंसान थे और उनका गला भर आता था। वे बीमारी में भी जीवन से भरपूर उत्साहित रहते थे। उनकी बातों में पुराने किस्से और साहित्य की दुनिया के अलावा कुछ नहीं होता था। वे भी मन्दा को मन्दा कहते थे, मेरे पिता भी मन्दा कहा करते थे। शायद यही कारण रहा होगा कि हम घर में उसे मन्दा कहा करते थे। वह कविताएं लिखती है पर उसकी कोई किताब अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है।
    किसी रचनाकार के जीवन में उसके माता-पिता का स्थान बहुत बड़ा होता है। वह बड़ा स्थान कुछ अधिक बड़ा हो जाता है जब पिता महेशचन्द्र जोशी जैसे हो। वरिष्ठ साहित्यकार महेशचन्द्र जोशी सन 1965 से अनवरत् लिखते रहे और वे राजस्थान ही नहीं राष्टीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने में सफल रहे । उनका जन्म 30  अगस्त, 1935 जसपुर (उत्तर प्रदेश) में हुआ। वे मूलतः कुमाऊँनी थे। उनके जीवन काल में सात किताबें- मोम का घोड़ा (बाल उपन्यास), नशा (उपन्यास 1985), अधूरी तस्वीर(1972), मुझे भूल जाओ (1996), तलाश जारी है (1998), आठवाँ फेरा (2001), मेरा घर कहाँ है (2004) प्रकाशित हुई और आठवी किताब ओल्ड डोक्यूमेंट (2013) उनके निधनोपरांत प्रकाशित हुई। इसमें बड़ी भूमिका मन्दा यानी परी दीदी की रही है।
    आज महेशचन्द्र जोशी को इस संसार से विदा हुए 6 साल हो चुके हैं। वे अपने शब्दों के द्वारा अब भी हमारे बीच बने हुए हैं। उनकी ढेर सारी यादें और बातें अब भी हमें प्रेरित करती हैं। दुनिया की नजरों में वे चले गए हैं पर बहुत बार उनके जाने के बाद मुझे ऐसा लगता रहा है कि वे बीच-बीच में कभी कभार मुझे देखने आते हैं। मैं उन्हें मन्दा की आंखों से झांकता हुआ पाता हूं कि वे मुझे देख रहे हैं। उनका स्नेह और आशीर्वाद हमेशा हमेशा से बना हुआ है और इस बार जब वे झांक रहे थे तब कुछ कह भी रहे थे। उनका कहा मैंने मन्दा से कह दिया है कि वे चाहते हैं अभिनेत्री और रंगमंच की कलाकार अब कवयित्री के रूप में आए। शब्दों की दुनिया बहुत बड़ी है और इस बड़ी दुनिया में एक छोटी सी दुनिया मेरी है। मैं अपनी दुनिया में फैज अहमद फैज की पंक्तियां याद करता हुआ कहना चाहता हूं- कर रहा था गम-ए-जहां का हिसाब, आज तुम याद बेहिसाब आए।
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ना जाने कैसी ऊहापोह / डॉ. नीरज दइया

स्मृति शेष कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ का स्मरण

    वह दिन और महीना कौनसा था, अब ठीक-ठीक स्मृति में नहीं है। वैसे मैं जिस दिन और महीने में अभी पहुंचा हूं और जिस स्मृति तक आपको ले जाना चाहता हूं, वहां यह सूचना इतनी आवश्यक भी नहीं है। आवश्यक यह है कि मैं आज से करीब आठ साल पहले बारिश के बाद के किसी उजले दिन में कालीबंगा में कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ के साथ था।
    राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित कालीबंगा ऐतिहासिक महत्त्व का स्थल है। इसी जिले के कवि कागद राजस्थानी और हिंदी के ही नहीं वरन भारतीय कविता के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर रहे हैं। आपका जन्म 05 जुलाई, 1957 को केसरीसिंहपुर (श्रीगंगानगर) में हुआ और 12 अगस्त, 2016 को इस संसार से विदा होना अंकित किया गया है। वे विदा जरूर हो गए हैं किंतु ऐसा बहुत कुछ है जो अब भी अहसास करता रहा है कि वे यहीं कहीं हमारे आस-पास है। यहीं हमारे आस-पास उनके होने की अनेक स्मृतियां है।
    मैं स्मरण कर रहा हूं, उस दिन उन्होंने मुझे कहा कि कालीबंगा के इन थेहड़ों में वे अनुभूत करते हैं कि किसी विगत समय में वे यहीं आदिम जाति के संग-संग रहे हैं। जैसे वे समय के पार बहुत दूर विगत में धड़कते जीवन की धड़कनें अपनी सांसों में महसूस करते हुए कहीं दूसरे ही लोक में खो गए थे। मैंने उनके चेहरे पर अजीब से भावों को देखा था। उनके मन में ना जाने कैसी ऊहापोह चल रही थी।
    हमारी तमाम तकनीकी उपलब्धियों के बाद भी मन के भावों और भीतर चलने वाली ऊहापोह की थाह बेहद मुश्किल है। साहित्य इस मुश्किल को आसान करता है। खासकर काव्य में ऐसे जटिल और गुंफित भावों की अभिव्यक्ति होती है। कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ का राजस्थानी कविता-संग्रह ‘आंख भर चितराम’ (2009) है, जो उन्हीं दिनों आया था। यह संयोग है कि इस कृति का ब्लर्ब मैंने लिखा था। इस संग्रह में ‘कालीबंगा’ शृंखला के अंतर्गत इक्कीस कविताएं हैं। सघन अनुभूतियों से इन कविताओं में कालीबंगा को कवि ने शब्दों में साकार किया है।
    एक वरिष्ठ कवि ने कहा कि इस पुस्तक का नाम ‘आंख भर चितराम’ ठीक नहीं है। हथेली चित्रों से भरी हो सकती हैं, पर आंख का भरना तो रोना होता है। इस नाम का सुझाव भी मेरा था, जिसे कागद जी बड़ी सहजता से स्वीकार कर लिया था। इसलिए इसका यश-अपयश मेरा भी है। इस संग्रह में बहुत-सी कविताएं चित्रात्मक है, उन्होंने काफी कविताओं में शब्दों के माध्यम से जैसे अनेक चित्रों को प्रस्तुत किया है। हर आंख री सीमा है, पर हर आंख में असीम भाव भरे हुए हैं। आंख एक ऐसा आइना है, जिनमें ना जाने कितने चित्र समाहित हैं। हमारे जीवन के सभी चित्रों की आंख एक शरण-स्थली है। कठौती में गंगा कहने वाला राजस्थानी समाज क्या आंख को चित्रों का अक्षय-पात्र नहीं मान सकता है। शब्द के अर्थों को विस्तारित भावों के साथ लिया जाना चाहिए या संकुचित और रूढ़ अर्थों तक हमें रुक जाना चाहिए?
    दृश्य के रूप में एक चित्र हमारी आंखों के ठीक सामने उपस्थित होता है और दूसरा चित्र ऐसे किसी दृश्य की अनुभूति से कवि सृजित करता है। किनारों के रूप में ऐसे दोनों छोर मेरे सामने थे। कालीबंगा का वर्तमान अपने अतीत को लिए सामने था और कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ के काव्य-संग्रह ‘आंख भर चितराम’ की कालीबंगा पर केंद्रित कविताओं की अनुभूतियां अंतस में हिलोरे ले रही थीं। यह समय का ऐसा पुल था, जिस के पार कवि के साथ चहलकदमी करते हुए मैं पहुंच गया था। कवि के साथ ऐसे ही किसी पुल पर मैं खड़ा था। मुझे डर लगने लगा था।
    कालीबंगा के उस सूने उजाड़ में कोई नहीं बस हम दो ही थे। कागद जी की भावुकता मुझे भीगने पर विवश कर रही थी। मैं कवि के व्यक्तिगत जीवन के कुछ पन्नों का अध्येयता था, इसलिए डरता था कि उनकी तबियत बिगड़ गई तो क्या होगा? मैं उस समय कहना तो बहुत चाहता था, पर मुझे मौन ने जकड़े रखा। मेरा मौन रहना ही उचित था, क्योंकि ऐसे समय में जो कुछ भी मैं कह सकता था उससे वे भली-भांति परिचित थे। फिर मैं कवि होकर किसी अग्रज कवि को यह कैसे कहता कि भाई साहब इतना भावुक होना ठीक नहीं है!
    मैं तो हिरोशिमा और नागासाकी परमाणु बम के संदर्भ पर अज्ञेय जी की कविता- ‘एक दिन सहसा / सूरज निकला / अरे क्षितिज पर नहीं, / नगर के चौक / धूप बरसी / पर अंतरिक्ष से नहीं, / फटी मिट्टी से।’ में खोया हुआ था। साथ ही उनकी अनुभूति और अभिव्यक्ति की बात को ओम पुरोहित ‘कागद’ से जोड़ कर देख रहा था कि यह होता है किसी विषय में डूबना। कवि  अज्ञेय जी की भांति ओम पुरोहित ‘कागद’ भी कालीबंगा को आत्मसात कर के कविताएं रच सके थे। 
    ‘थेहड में सोए शहर / कालीबंगा की गलियां / कहीं तो जाती हैं / जिनमें आते-जाते होंगे / लोग / अब घूमती है / सांय-सांय करती हवा...’
    कालीबंगा में मिले कितने ही अवशेषों को सुरक्षित कर लिया गया है।  संग्रहालयों के लिए न जाने यहां से कितने अवशेषों को ले जाया जा चुका हैं। समय के लंबे अंतराल के बाद भी यहां की मिट्टी चुप नहीं है, वह बहुत कुछ बोलती है। उसे सुनने वाले कान चाहिए। कागद जी ने इसी मिट्टी का बोलना बहुत पहले सुना था और कविताओं के रूप में हमें अब सुनाया है। वे पारखी हाथ किसी इतिहासकार या भूगोलवेत्ता के नहीं वरन एक कवि के थे, जिन्होंने कुछ अवशेष बटोर लिए थे। कुछ ठीकरियां और चमकदार मिट्टी के अलग-अलग आकारों के पतले बरते जैसे कुछ अवशेष मेरी हथेली पर रख देते हैं। यह कोई जादू ही था कि वे अवशेष वे मेरे हाथ में किसी बड़े बर्तन और ढक्कनों के साथ छोट-छोटे गोल पहियों के रूप में मुझे दिखाई देने लगते हैं।
    किसी वृत्ताकार घेरे को देखकर मुझे कालीबंगा में कागज जी की पंक्तियों का स्मरण होने लगता- ‘मिट्टी का / यह गोल घेरा / कोई मांडणा नहीं / चिह्न है / डफ का / काठ से / मिट्टी होने की / यात्रा का।’ इन कविताओं के माध्यम से कालीबंगा का जीवन हमारे भीतर प्राणवाना होता है और हम कवि की उन भावनाओं तक पहुंचने में सक्षम होते हैं तो यह कवि कागद की सबसे बड़ी सफलता कही जानी चाहिए। ‘कालीबंगा’ शीर्षक की राजस्थानी कविताओं का हिंदी अनुवाद डॉ. मदन गोपाल लढ़ा ने किया है।
    कालीबंगा पर केंद्रित कविताओं पर मर्मज्ञ सामूहिक रूप से ध्यान देंगे तो पाएंगे कि इतिहास केंद्रित इतनी सांद्र संवेदनाओं से पूरित इन कविताओं की तुलना में बहुत कम कविताओं को हम रख सकेंगे। घरातल की बात करें तो कुछ कवियों की कुछ कविताएं स्वतंत्र रूप से भले अपना अस्थित्व नहीं बना पाती हो, किंतु उनकी शृंखला अथवा सामूहिक प्रारूप से जो काव्य-बोध होता है वह लंबे समय तक अपनी उपस्थिति का अहसास कराता रहता है।

17 जून, 2018

डॉ. नीरज दइया की तीन कविताएं-

घर वह घर नहीं है

पता तो वही है
घर वह घर नहीं है
जो था आपका
पिताजी !

नाम तो वही है
भाई पर भाई नहीं है
जो था आपके रहते
पिताजी !

घर जिस में आप रहते थे पिताजी।
भाई जिस में मैं था पिताजी।
पता ही नहीं चला
कव कैसे क्या हो गया...।

पुराने घर को गिरा कर
खड़ा किया नया घर।
पिताजी ! आपने बनवाया
वह घर अब नहीं है।
भाई कहता है- पुश्तैनी घर है।
इस घर के बारे में
अब मैं क्या कहूं पिताजी ?
००

कोई बात नहीं !

बहुत पुरानी हो गई
फिर भी अपनी मुस्कान लिए
दीवार पर सजी है-
तश्वीर पिताजी की।

सुबह-सवेरे वे रोज
भरते हैं मुझ में नया जीवन
घर से निकते समय देखता हूं उन्हें
जीवन की भागा-दौड़ में
सोचता हूं- इस रविवार को
तश्वीर साफ करूंगा।

काफी महीने हो गए
वह रविवार नहीं आया,
मैं ग्लानि से भरता हूं
फिर भी दीवार पर-
तश्वीर में पिताजी
मुस्कान लिए कहते हैं-
कोई बात नहीं !
००

अधूरी कविताओं के बारे में

मुझे कविताओं को सौंपा पिताजी ने
पर नहीं सौंपी मुझे
आपनी कविताएं।

कई कविताएं
जो सहेजती है मुझे
और जिन्हें सहेजता हूं मैं
नहीं लगी अच्छी
क्यों कि वे नहीं हो सकी
पूरी!

उन कविताओं के लिए
मेरा बड़ा दुख है
कि वे रह गईं हैं अधूरी।

जब-जब मैं बतियाता हूं उनसे
वे रोती हैं, साथ मेरे
उनकी पीड़ा परखने वाला
मेरे अतिरिक्त
कोई नहीं है।
कोई नहीं है अन्य !
००