31 दिसंबर, 2017

पुस्तक समीक्षा- डॉ. नीरज दइया

नम्बर वन आऊंला (राजस्थानी बाल कविताएं)
कवि : पवन पहाड़िया, प्रकाशक- नेम प्रकासण ग्रा.पो. डेह (नागौर) राज. 341022, पृष्ठ : 52 मूल्य : 100/- संस्करण : 2014   
   
    राजस्थानी भाषा और साहित्य के लिए विगत तीन दशकों से सक्रिय पवन पहाड़िया की पहचान एक कवि और राजस्थानी भाषा मान्यता हेतु संघर्षशील रचनाकार के रूप में है। अपनी मातृभाषा के लिए ऐसे अनेक रचनाकारों की अपनी निष्ठाएं और आस्थाएं हैं, जिनके रहते वे अनेक मोर्चों पर स्वयं खड़े होने के लिए विवश हैं। पवन पहाड़िया भी एक कवि-लेखक के साथ-साथ जनचेतना और साहित्य के प्रचार-प्रसार-प्रकाशन हेतु सक्रिय है। इसके अतिरिक्त वे राजस्थानी भाषा के नए रचनाकारों को प्रेरित और प्रोत्साहित करने के लिए भी पहचाने जाते हैं। उन्होंने अनेक भामाशाहों को प्रेरित कर साहित्य पुरस्कार आरंभ किए हैं।
     ‘नम्बर वन आऊंला’ संग्रह पर पवन पहाड़िया को साहित्य अकादेमी का बाल साहित्य पुरस्कार (राजस्थानी) वर्ष 2017 का अर्पित किया गया है। यह बाल कविताओं का संग्रह उन्होंने प्रख्यात राजस्थानी साहित्यकार बी.एल. माली की प्रेरणा से लिखा है और यह संग्रह उन्हें ही समर्पित किया गया है। इस संग्रह की भूमिका में कविताओं में वर्णित विषयों और भावबोध का खुलासा करते हुए आलोचक डॉ. गजेसिंह राजपुरोहित लिखते हैं- ‘‘एक अबोध बाल का मन सदैव आगै बढ़ने की चाहत रखता है। यही चाहत उसे सदैव सफलता के शिखर तक ले जाती है। उसी चाहत को कवि अपनी रचनाओ- नम्बर वन आऊंला के मार्फत बालकों में जाग्रत करता है। चेतना को ललकारता है कि वह किसी से कम नहीं है, वह सदा सत्य के मार्ग चलते हुए एक नया इतिहास रचेगा। यही चाहना ही उसे सफलता दिलाती है, सर्वश्रेष्ठ बनाती है।’’   
आरंभ में अपनी बात ‘मेरा दर्द’ शीर्षक से व्यक्त करते हुए कवि पवन पहाड़िया लिखते हैं- “नई पीढ़ी से मेरा आग्रह है कि वे चाहे अंग्रेजी में पढ़े-लिखें या हिंदी में पर घर में अपनी मातृभाषा को काम में लेंवे।” घर-परिवार और समाज में भाषा को संस्कार बनाएं रखने और जाग्रत करने के प्रमुख धेय से ही कवि ने इस संग्रह की 41 कविताएं लिखी है। पुस्तक की पहली कविता वंदना के रूप में करतार से अरदास है तो दूसरी बाल कविता ‘तिंरंगो’ में देश-भक्ति की भावना उजागर होती है। संग्रह में बालकों के आत्मीय और निजी संबंधों यथा मां, बहन आदि के महत्त्व को भी उजागर किया गया है। कवि कविताओं में श्रम के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए संदेश भी देता है कि पढ़ने-लिखने के साथ-साथ खेलना-कूदना भी जीवन में उतना ही आवश्यक और अनिवार्य है। शिक्षा और चरित्र निर्माण की भावना इन कविताओं में प्रमुखता से उभर कर सामने आती हैं।
    संग्रह की अनेक कविताएं प्रेरणादायी है जिनमें बालकों से पानी के महत्त्व और वृक्षारोपण जैसे अनेक मुद्दों पर सीधा संवाद है। कवि मौसम की बात करते हुए गर्मी, सर्दी और वर्षा के मौसमों के विविध रंगों को कविताओं में शब्दबद्ध कर अनेक बिंब रखते हुए सुंदर चित्रों को जैसे चित्रित करते हुए बालकों को समोहित करता है। कविताओं में बालकों को प्रिय लागने वाली तितलियों और बिल्लियों की दुनिया के साथ अन्य पशुओं-पक्षियों को भी वर्णित विषय बनाया गया है। इन कविताओं से बालकों में भारतीय त्यौहारों का हर्ष-उल्लास एक झलक के रूप में प्रस्तुत होता है। होली, दीपावली, अक्षय तृतीया और मकर सक्रांति जैसे पर्वों के माध्यम से बालकों को संस्कारित करने का प्रयास भी हुआ है।
    संग्रह की शीर्षक कविता में राजस्थान सरकार द्वारा प्रतिभावान विद्यार्थियों को ‘लेपटोप’ दिए जाने को केंद्र में रखते हुए उन्हें प्रेरित करने हेतु एक बाल मन के उद्गार कवि ने लयबद्ध अभिव्यक्त किए हैं। मूल कविता की आरंभिक पंक्तियां हैं- ‘लेपटोप घर में ल्याऊंला / मां म्हैं नंबर वन आऊंला / बैगो दिनगै म्हनै उठाज्यै,/ दांतण करियां पाठ पढ़ाज्यै।’ बच्चों के द्वारा बच्चों को संदेश देना अधिक प्रेरक और प्रभावशाली है।
    बाल साहित्य के लिए कवि पवन पहाड़िया का सक्रिय होना सुखद है पर भाषिक संरचनागत कुछ बातों का भी यहां विशेष ध्यान रखा जाना आवश्यक है। बालक जो भाषा सीख रहा है उसके समक्ष भाषा की अनेक चुनौतियां भी होती है। उदाहरण के लिए पुस्तक के आवरण पृष्ठ पर ‘नम्बर’ लिखा गया है जबकि संग्रह में कविता के शीर्षक में ‘नंबर’ शब्द प्रयुक्त हुआ है। पंचमाक्षर का यह रूपभेद समरूपता की मांग यहां रखता है। कविताओं के साथ प्रयुक्त चित्रों को केवल कंप्यूटर के भरोसे नहीं छोड़ते हुए किसी कलाकार के माध्यम से अधिक मेहनत के साथ प्रस्तुत किए जाने की संभवाना बनी हुई है। ऐसी कुछ बातों के बावजूद यह संग्रह अपनी सरलता, सहजता, गेयता के कारण मनोहक और प्रभावशाली है। कवि को बाल मनोविज्ञान की गहरी समझ और भाषा की गहरी सूझ-बूझ है। उनके छंद-ज्ञान से संग्रह की इन बाल कविताओं को बल मिला है। 
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27 दिसंबर, 2017

मूल : बुलाकी शर्मा / अनुवाद : नीरज दइया

राजस्थानी कहानी- हिलोर

    हमीद ने झोंपड़ी के पास मोटरसाइकिल रोकी और क्वाटरों के काम का जायजा लेने के लिए आगे रवाना हुआ।
    लाइन से क्वाटर बन रहे थे। पंद्रह-बीस आदमी-औरतें काम में लगे थे।
    “बालनजोगी, टांगों में सत नहीं है क्या? ऐसे कैसे बेसके पड़ रही है? फुर्ती से हाथ-पैर नहीं चलाए जाते?... अरे रामले, तुझे क्या हुआ? टी.बी. के मरीज जैसे क्या मरा मरा सा फावड़ा चलता है? गारा बनाने में इस साहब को क्या जोर आता है भाई..... ?”
    सोहन चलवे की बातें सुन कर हमीद मुस्कुराया। एक तरफ रखी खाट पर बैठते हुए कुछ जोर से बोला, “कैसे चलवोजी, काम ठीक-ठाक चल रहा है ना?”
    बीड़ी का कश खींचते हुए सोहनजी ने पीछे मुड़ क्र देखा, “ओह... ठेकेदारजी आप।”
    “जल्दी-जल्दी हाथ-पैर चलावो देखें।” सोहनजी मजदूरों को हिदायत देते हुए हमीद के पास पहुंचे और खाट के पैताने बैठ गए।
    कमीज के जेब से हमीद ने सिगरेट का पाकेट निकाला। उस में से एक सिगरेट निकाल कर पाकेट सोहनजी के आगे कर दिया। फिर पेंट की जेब से लाइटर निकाल कर सिगरेट जलाई और एक जोरदार कश खींचा। सोहनजी ने भी सिगरेट जलाई।
    “बहुत कामचोर है ये लड़के-लड़कियां। इन से तो बूढ़े भले जो बेचारे अपने वश से भी अधिक काम करते हैं। इन नलायकों को कितना ही डांटो, किंतु चलेंगे तो अपनी ही चाल से।” काम करते मजदूर की तरफ देखते हुए सोहनजी ने कहा।
    भोमा पानी के दो मग ले कर आया।
    हमीद ने मग मुंह से थोड़ा ऊंचा कर एकधार गटागट पानी पीया। पी कर एक कुरला किया और मग को खाट के नीचे रख दिया।
    “आपकी गालियों का भी असर नहीं होता?” हमीद ने मुस्कुराते हुए पूछा।
    “नहीं जी।” एक हाथ से पगड़ी ऊंची करते हुए दूसरे से सिर खुजाते वह बोला, “मेरा ही गला खराब होता है, इन नालायकों को क्या फर्क पड़ता है।”
    इतने में वे गरजे- “तुझे बहुत हंसी आ रही है चिड़कली। कामचोर से काम तो होता नहीं, खड़े-खड़े दांत निकालती है। जल्दी से तगारी भर कर पहुंचाया नहीं जाता क्या?”
    पगड़ी उन्होंने वापस सिर पर रखली।
    चिड़कली की हंसी थम गई पर आंखें अब भी हंस रही थी। होले से बोली- “मैं क्या करूं, संतिया ई तगारी नहीं भरता।”
    “किस बात की मजाक करता है रे संतिया।” अब वे संतिये पर गुस्सा हुए- “यह क्या तेरे, मैं कह दूंगा अभी लगती है। तगारी भरी नहीं जाती क्या? कहां से आ कर जम गए ऐसे ढीठ?”
    संतिये ने गारे से तगारी भरी। चिड़कली उठा कर कारीगर की तरफ रवाना हो गई।
    हमीद उसे ही देखता रहा। उसे यह नई लगी। करीब अठारह साल की होगी। मंझला कद। सुंदर नैन-नक्स, उन में किनारे तक लगाया कजल। गहरी मांग भरे थी। पीली ओढ़नी और हरी छींट का लंहगा पहने हुए। ओढ़नी का एक सिरा कांचली में दबाए हुए।
    सोहनजी ने उसकी नजरों का कहा जैसे सुन लिया- “कल ही आई है यह। बहुत हाथ-पैर जोड़ने लगी तब रख ली।”
    “अच्छा किया।” हमीद ने कहा।
    संतिया गारे से तगारी भरता है, चिड़कली झुक कर उठाती है और इंटे लगाते कारीगर तक गारा पहुंचाती है। फिर से आती है, गारे से तगारी भरावती है और वही क्रम।
    हमीद की नजरें लगातार उस के पीछे।
    सोहनजी उसे देख कर मुस्कुराए। आवाज दी- “अरे चिड़कली, जा लिच्छू की होटल से ठेकेदारजी के लिए चाय ले कर आ।”
    उस ने गारे की तगारी भरवाई, उठाई और रवाना हो गई। जैसे सुना ही नहीं।
    वे गुस्सा होते खाट से खड़े हुए। जोर से कहा- “बहरी है क्या? सुना नहीं मैं क्या कह रहा हूं?”
    “मैं अपना काम कर रही हूं ना, किसी दूसरे से कह दें।” कारीगर के पास तगारी खाली करती हुई वह वापस आ कर भोमले से तगारी भरवाने लगी। तगारी भर गई, उस ने उठाई और फिर रवाना हो गई।
    अब सोहनजी से कहां सब्र होता। वे उसी के पास पहुंच गए और तगारी छीन कर दूर फेंकते तीखे स्वर में बोले- “बहुत काम कर के निहाल कर दिया। जा केतली ले कर चाय ला। आई है बहुत काम करने वाली।”
    चिड़कली के सिर पर तीन सलवटें घिर आई। कुछ समय वह चलवोजी की तरफ देखती रही। चलवोजी गुस्से में थे। केतली ले कर वह चुपचाप रवाना हो गई।
    सोहनजी ने चलवे हमीद के सामने देखा और दोनों एक ही भाव से होले-से मुस्कुराए।
    हमीद ने नई सिगरेट जलाई। एक शानदार कश लिया और खाट से खड़ा हो लिया।
    काम करने वालों की तरफ आया। बनते क्वाटरों का चक्कर लिया। कुछ समय कारीगरों को ईंटें लगाते देखता रहा। फिर होले-होले उस के कदम झोंपड़ी की तरफ बढ़ने लगे।

  
    चिड़कली चाय ले कर आई। केतली और कप खाट के करीब रखे और कुछ गर्म हो कर बोली- “यह लो चाय, चलवोजी।”
    सोहनजी मजदूरों की तरफ खड़े थे। वहीं से नाराज होते कहा- “तुम तो एकदम पागल हो। अरे कपों में डाल। एक कप ठेकेदारजी को दे कर आ। वे झोंपड़ी में बैठे हैं।”
    बेमन उस ने कपों में चाय डाली। एक कप ले कर झोंपड़ी के सामने पहुंची और वहीं खड़ी होकर बोली- “लिजिए चाय।”
    हमीद भीतर खाट पर बैठा था। नजरे मिलाती बोली- “लेना।”
    चिड़कली के पैर वहीं चिपक गए।
    “अरे भाई, चाय ठंडी हो रही है ना।” हमीद कोमलता से बोला।
    वह भीतर गई। एक कदम दूर से ही कहा- ‘लिजिए” आउर कप जमीन पर रखने के लिए नीचे झुकी।
    “नहीं-नहीं, नीचे नहीं रखना।” हमीद तपाक से खड़ा हो गया- “धूल गिर जाएगी।... लाओ मुझे दो।”
    हमीद ने हाथ लंबा किया। कप लिए उसा ने हाथ आगे कर दिया।
    “आ बैठ... ” वह चिड़कली को कहने वाला ही था पर उस से निजरे मिलते ही उस की आंखों से गुस्सा बरस रहा था। आंखों में भड़का हुआ गुस्सा जोर पर था। गुलाबी पंखुड़ियों सरीखे होंठ फड़फड़ाने लगे। सांसें तेज चलने लगी।
    हमीद यह तेज लावा सहन नहीं कर सका और उसका हाथ सुस्त हो गया।
    चिड़कली ने कप नीचे रखा। लाल आंखों से उस को देखा और झोंपड़ी से बहार निकल गई। हमीद को जैसे पसने छूट गए। सुन्न-सा निढाल खाट पर गिर गया।
    उस में डर समा गया। चिड़कली ने शोर-शराबा कर दिया तो? इस प्रकार की लपटों से पहली बार सामना हुआ था। खूब औरतों को देखा था लेकिन चिड़कली जैसी एक भी नहीं। वह मजाक करता तब मजदूरनियां खुश होती, आंखें मटकारती हंसती और उसे आगे का रास्ता मिल जाता।
    पर यह चिड़कली? जरूर उस ने गुस्से में उस के बारे में उलट-पुलट कर दिया होगा। मजदूर कुछ नहीं कहेंगे, पर उन की आंखों में घिरते सवालों के उत्तर उस के पास कहां होंगे? उस की बरसों की साख आज मिट्टी में मिलेगी। झोंपड़ी से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं हुई उस की।
    चिड़कली झोंपड़ी से बाहर आ कर काम करने लगी। किसी से कुछ नहीं कहा। पर चेहरे पर गुस्से की टेढी-मेढ़ी रेखाएं साफ नजर आ रही थी।
    दोपहर का समय हुआ तब उस की सहेली झमकू ने पास आ कर कहा- “आ, नाश्ता कर लें।”
    “मुझे भूख नहीं।” उस ने सामने ही नहीं देखा।
    “क्या हुआ री भूख के?” झमकू ने उसे शक की निगाहों से देखते कहा।
    “कह दिया ना, इच्छा नहीं है।”
    झमकू आगे कुछ पूछे उस से पहले वह अलग दिशा में चली गई।
    पानी के कुंड के पास पहुंच कर चिड़कली ने दोनों हाथों से पानी ले कर मुंह को छींटे दिए। सिर को भी गिला किया। फिर कांचली में ठूंसी हुई ओढ़नी का सिर निकाल कर उस से सिर-मुंह पोंछा।
    फिर वह बजरी पर पलाथी लगा कर बैठ गई। कोहनियां पलाथी से सटा कर हथेलियों में अपना चेहरा लिए सोचती रही।
    मजदूरी पर आते आज उस का दूसरा ही दिन था। काम करने आना जरूरी था। घर के हालात किसे से छुपे नहीं। शादी की मेंहदी अभी हाथों से गई नहीं। छह महीने ही नहीं हुए शादी को। घर में बड़ा परिवार। बस एक कमाऊ उस का पति। उस ने तो मनाही दी, बोला रहने दे ऐसे ही गुजार-बसर हो जाएगी। जैसे-तैसे कर लेंगे। पर उस से अपने मरद की दौड़-भाग नहीं देखी गई। कितना काम करता है। सुबह हाथ गाड़ा ले कर निकलता है। दिन में ऊन के बोरे एक कोटड़ी से दूसरी कोटड़ी में पहुंचाता है। रात गए आता है तब बैठने की भी हिम्मत नहीं रहती।
    पर ठेकेदारजी ऐसे करेंगे तब कैसे बसर होगा। अपने आदमी को बताए तो और भी बुरा। वह मरने-मारने पर उतर आएगा। उसे काम छोड़ना होगा और एकेला घाणी के बैल जैसा वह शरीर तोड़ता रहेगा।
    चिड़कली की आंखें गिली हो आईं।


    उस दिन के बाद चिड़कली की हंसी-मजाक सब बंद हो गई। चुपचाप काम करना, किसी के बिना मतलब के बोलना नहीं। सहेलियां कभी मजाक करती- “घरवाले की याद सताती रहती है, ऐसे क्या गुमसुम बनी रहती हो?”
    वह कुछ जबाब नहीं देती।
    चलवोजी भी उस से अधिक गुस्से से नहीं बतियाते। क्या कहे, वह बिना आराम किए काम करती रहती, काम में ढीठाई करे तब अवसर मिले उन्हें कुछ कहने का।
    हमीद दस बजते ही खाट पर आकर बैठ जाता। बैठा-बैठा सिगरेटे फूंकता। दो-चार बार घूम कर काम का जायजा लेता, कभी झोंपड़ी में आ कर आराम करता। उस ने यह सोच कर धैर्य धारण किया कि चिड़कली ने किसी से कुछ नहीं कहा। काम पर भी लगातार आ रही है, समय के साथ खुद ही मजदूरी के नियम-कायदे सीख जाएगी। उस की निगाहें चिड़कली पर ही रहती।
    नीचे झुक कर ईंटें उठाती, गारे की तगारी उठाती, ओढ़नी के छोर से पसीना पोंछती, प्याज-रोटी खाते, सहेलियों को आंखें निकालती, हथनी जैसी मंथर चाल से घूमती-फिरती चिड़कली- यकायक हमीद की निगाहों में स्थिर हो जाती है।
    हंस कर उस की बात मानने वाली लड़कियों को वह दूसरे ही दिन भूल जाता पर चिड़कली की रक्तिम आंखें वह नहीं भूला सका। गुस्से से तमतमाये चेहरे की जगह वह मुस्कुराता चेहरा देखना चाहता है और चाहता है कि चिड़कली अपने आप मान जाए।
    दोपहर के समय एक बार चिड़कली कीकर के नीचे बैठी सुस्ता रही थी। होले-होले पैर रखते हुए हमीद उस कीकर के पास पहुंचा। चिड़कली खुद में खोई थी। उसे के आने की उसे खबर ही नहीं लगी।
    कुछ दूरी पर खड़ा वह चिड़कली को निहारता रहा। चेहरे पर चिंता और मजबूरी की रेखाएं। बाएं हाथ में एक तिनका लिए, वह उस से दांत कुचर रही थी।
    सिर पर होले-से थपकी दे कर हमीद ने उसे सचेत करने की सोची पर हिम्मत का हाथ बढ़ ना सका।
    “सुस्त कैसे है, चिड़कली?” मधुर स्वर में हमीद बोला।
    वह चौंकी जैसे बिच्छू ने डंक मार दिया हो। फुर्ती से खड़ी होने लगी।
    “बैठी रहो, बैठी रहो” हमीद ने हाथ से टोक दिया- “मैं कुछ नहीं करूंगा।"
    वह सचेत हो कर बैठ गई। अब वह तिनके से जैसे मिट्टी पर मांडने बनाने लगी।
    “क्या हुआ तुम्हारे? ऐसे कैसे सुस्त और उदास रहती है?”
    उस ने जबाब नहीं दिया।
    कीकर की फली तोड़ कर हमीद ने उसे होले-होले मसला और दूर गिराते कहा- “मेरी नियत खराब नहीं पर तुम मुझे अच्छी लगती हो। जिस समय देखा, उसी समय से मेरे मन में तेरी ठौर बन गई।”
    “इस में मैं क्या करूं ठेकेदारजी”, चिड़कली शांत नहीं थी, यह बात उसकी ऊपर-नीचे होती कांचली कह रही थी।
    “अच्छा लगता है उसे हर कोई पाना चाहता है।” हमीद का स्वर बहुत धीमा था।
    “आप को तो मेरा काम अच्छा लगना चाहिए, तभी मुझे रोजगार मिलेगा।”
    “तुम तो निरी भोली हो, चिड़कली”, वह उसे समझाने लगा- “तू ने मेरे मन को गिरफ्त में ले लिया। एक बार मन की बात रख दे। रोजगार की चिंता फिर रहेगी ही नहीं।”
    गर्दन उठा कर उस ने उस के सामने देखा। कुछ समय एकटक देखती रही, फिर पूछा- “मन रखने के बाद आप अपने घर ले कर चलेंगे क्या? पत्नी बना क्र रखेंगे मुझे?”
    उस से जल्दी से उत्तर नहीं बना। कीकर की डाले पकड़ता छोड़ता रहा। कांट गड गया और अंगुली से खून गिरने लगा। अंगुली चूस कर खून बंद किया। फिर दीनता से हंसने की चेष्टा करते हुए बोला- “मजाक कर रही है क्या? तुम दूसरे की ब्याहता घर में कैसे रख सकता हूं।"
    “मैं मेरे मरद को छोड़ कर आ जाऊंगी। बोलिए है मंजूर? फेर जैसा आप चाहे होगा।” चिड़कली की नजरें उस पर टिक हुई थी।
    हमीद का गला सूखने लगा। माथे पर पसीने की बूंदे चमकने लगी। उसे समझ नहीं आया कि आज इतना बेवश कैसे हो गया। दूसरी मजदूरनियां उस के सामने होंठ तक नहीं हिला सकती पर यह तो सवालों के और वे भी इतने ऊंचे टीलों जैसे खड़े कर दिए कि वह उन टीलों में धंसता ई जा रहा है।
        कुछ समय चिड़कली उस को देखती रही, फिर नम्रता से बोली- “आप मेरे माई-बाप हो ठेकेदारजी। मजबूरी की मारी मैं आती हूं। आप को पैसों के बल पर मुझ से भी रूपवती मिल जाएगी। आप के किस बात की कमी। आप मुझे माफ कर दें ठेकेदारजी।”
    चिड़कली ने हमीद के पैर पकड़ लिए।
    “आपकी चाहत मैं पूरी नहीं कर सकती। अप को मेरी चाम प्यारी है पर यह मेरे मरद की है। उस पर मैं आंच नहीं आने दूंगी।” चिड़कली खड़ी हो गई- “अब यहां नहीं तो किसी दूसरी जगह काम करूंगी। मुझे माफ करना ठेकेदारजी।”
    उस ने एक बार हमीद की तरफ देखा, फिर गर्दन नीची किए रवाना हो गई।
    हमीद संज्ञाविहीन हो गया। जाते उसे देखता रहा। फिर जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाता उस के करीब पहुंचा और दीनता से बोला- “नहीं-नहीं यहीं काम कर। तुझे मेरी सौगंध। तुझे यहीं काम करना है। ... तुझे कोई कुछ नहीं कहेगा। किसी चीज वस्तु की जरूरत हो तो चेलवोजी से कह देना।”
    वह चिड़कली के सामने भी नहीं देख सका।
    तेज-तेज कदमों को उठाता मोटरसाइकिल के करीब पहुंचा, किक लगा कर स्टार्ट की और धुंआ छोड़ता निकल गया।
  
    ढाई-तीन महीनों क्वाटरों का काम चला पर हमीद एक बार भी नहीं आया। चलवोजी ही काम देखते रहे।
    काम करते हुए चिड़कली ने एक दिन अचानक सोचा- “ठेकेदारजी इन दिनों एक बार भी नहीं आए, क्या हुआ होगा उन के.... एक बार आए तो कितना अच्छा रहे....।”
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अनुवाद : नीरज दइया


अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति,अमेरिका की प्रमुख त्रैमासिक पत्रिका “विश्वा” (प्रधान संपादक श्री रमेश जोशी, ओहायो) के अक्टूबर, 2017 अंक में प्रख्यात कहानीकार श्री बुलाकी शर्मा की प्रसिद्ध राजस्थानी कहानी का हिंदी अनुवाद प्रकाशित हुआ है। 




खतरनाक खिचड़ी / डॉ. नीरज दइया

आपको मैं एक जादू दिखाना चाहता हूं। कोई मदारी तो मैं हूं नहीं और अगर होता तो भी बंदर या भालू को यहां कागज पर कैसे दिखा सकता हूं। उन्हें देखने के लिए तो आपको मेरे मजमे में कहीं उपस्थित होना होता। खैर मैं एक जादू लाया हूं। जादू यानी मैजिक। मैजिक कहते ही आपके दिमाग से ‘बंदर-भालू’ सब गायब हो गए हैं। क्यों कि फिलहाल मीडिया का मैजिक चल रहा है कि उसने इस शब्द के साथ माननीय प्रधानमंत्री का नाम जोड़कर ‘मोदी-मैजिक’ के अनुप्रास को चर्चित कर दिया है। सोचने की बात यह है कि भला जादू में जादू कहां और कैसे काम करता है या कर सकता है। क्या कोई जादू किसी को वोट दिला सकता है? मतदान में तो आप और हमने यानी देश की जनता ने भाग लिया है। मेरा मनना है कि कोई जादू तो हुआ है। जैसे फिल्म में ‘तेरा जादू चल गया’ और ‘सीने से दिल गया’ जैसी बातें जादू जैसी दिखाई देती हैं वैसे ही रोजमर्रा के जीवन में अनेक जादू होते रहते हैं।
आप यकीन कीजिएगा कि जादू होता है और कहीं भी हो सकता है। किसी के भी साथ हो सकता है। मैं तो यहां तक मानता हूं कि कोई भी जादू कर सकता है। मैं यहां एक शब्द लिखता हूं- ‘खिचड़ी’। देखिए यह इस शब्द का यह जादू है कि खिचड़ी शब्द पढ़ते ही आप के दिमाग में राष्ट्रीय खाद्य पदार्थ की तश्वीर उभरने लगी है। मशहूर शेफ संजीव कपूर ब्रांड एम्बेसडर बन कर इंडिया गेट पर हजार किलोग्राम खिचड़ी बनाने की तश्वीर या ऐसा विचार जेहन में आना क्या किसी जादू से कम है। खिचड़ी वे अनाथ बच्चों को खिलाएं या स्कूलों में मिड डे मील में, हमें क्या? मैं आपको इस कहानी से बहुत पहले ले चलता हूं जहां वर्षों पुरानी खिचड़ी अभी भी अधपकी आपका इंतजार कर रही है। लिजिए आपके दिमाग में बीरबल की खिचड़ी का दृश्य उभर कर आ गया है। अकबर और बीरबल को ना आपने देखा और ना मैंने। उनकी अधपकी खिचड़ी के चर्चे क्या हजार किलोग्राम की खिचड़ी पकाते ही भूल गए हैं?
एक समय था जब खिचड़ी गरीबों और बीमार लोगों का भोजन हुआ करती थी, अब जमाना बदल गया है और खिचड़ी को बहुत सम्मान मिल चुका है। यानी खिचड़ी भी वीआईपी हो गई है। खिचड़ी खाने वाली से भी अधिक वीआईपी दिमाग में पकने वाली होती है। मेरे दिमाग में तो हर दिन खिचड़ी पकती रहती है। अगर आपके पास भी दिमाग है तो आप अपना हाल सुनाएं। खास बात दिमाग में खिचड़ी पकाने के लिए बुद्धि की जरा भी जरूरत नहीं है। मेरे जैसे और मूर्ख दिमाग खिचड़ी पकाने के बेहतरीन स्थल कहे जा सकते हैं।
पंच काका कहते हैं कि यह स्कूली लड़के के दिमाग में पकने वाली खिचड़ी का ही कमाल था कि उसने ग्रेटर नोएडा में अपनी मां और बहन की जघन्य तरीके से हत्या कर दी। बिना खिचड़ी पके भला कोई बेटा अपनी प्यारी मां और बहन पर क्रिकेट बैट और कैंची से ताबड़तोड़ वार कर हत्या कर सकता है? भैया ये बड़ों और बच्चों के दिमाग में पकने वाली खिचड़ी बड़ी खतरनाक होती है।
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19 दिसंबर, 2017

उत्तर आधुनिक सच / डॉ. नीरज दइया

हमारा विकास इतना हुआ है कि अब छुपाए नहीं छुप सकता। सुनो, सब लोग कह रहे हैं कि हां विकास हो गया है, हां विकास हो गया। किसी कोने से अगर कोई आवाज आएगी- विकास नहीं हुआ है तो हम उसे हमारे इस विकास होने के शोर में दबा देंगे। वैसे हमारे पास सब कुछ है मसलन आधुनिक तकनीक है। हम ऐसी बेसुरी आवाजों को तकनीक से कुचल सकते हैं। विकास के होने अथवा नहीं होने के मुद्दे पर मतदान करा सकते हैं। लोकतंत्र में मतदान का प्रवल महत्त्व है। अगर दस आदमी कहे- विकास नहीं हुआ है और नब्बे कहें कि हुआ है तो सच क्या है? सीधी बात है- दस की बात को सच नहीं मान जा सकता।
आदमी का विकास देखिए- वह क्या से क्या हो गया। पहले सच बोलता था, फिर जमाना बदला और वह आधुनिक सच बोलने लगा। आजकल वह लोकतंत्र में ऐसे उत्तर आधुनिक सच सुनना और बोलता है। उसके संस्कारों में प्रगति करना है और वह प्रगति करता जा रहा है। बहुमत का जमाना है। और बहुमत कहता है कि विकास हुआ है। आप धारा के विरूद्ध नहीं जा सकते हैं। अरे आप देशद्रोही थोड़ी बनाना चाहेंगे। जो विकास को विकास नहीं मानते और हमारे जयधोष में काले झंडे दिखाते हैं या कुछ काली पट्टियां लगाते हैं वे मूर्ख है। समझते नहीं कि काले झंडे लहराने से भला क्या होगा। दो मिनट को बस आप ध्यान भंग करा देंगे। यह उत्तर आधुनिक सच है कि दो मिनिट का क्या महत्त्व है? बस दो मिनट में आप वो कर सकते हैं। वो नहीं समझे, अरे वो... वो जो आजकल हर घर में बनाने की बात सरकार कर रही है। आपके घर में शौचालय है ना? अब दूसरों के घरों में बन जाएंगे तो इसे विकास नहीं कहेंगे क्या? स्वच्छता अभियान है और खुले में शौच मना है। अगर आप खुले में जाएंगे तो आप विकास के विरूद्ध हैं।
आम आदमी की जरूरत है- रोटी, कपड़ा और मकान। इन तीनों चीजों का अंतर्संबंध शौचालय से भी है। हमारी विकास-यात्रा में यह बहुत युगों पुरानी बात है कि हम भले कितनी ही प्रगति कर लें, विकास कर लें किंतु हमें बार बार शौचालय तो जाना ही पड़ेगा। इससे पीछा नहीं छूट सकता। उत्तर आधुनिक सच है कि आप कलेक्टर भी बन जाएंगे तो आपको दैनिक दिनचर्या में यह तो करना ही होगा। देखिए जितने भी अफसर है उनके लिए यह विशेष व्यवस्था उनके कमरे में अलग से होती है। पता नहीं अफसर को हाजत हो जाए और वह निवृत होना चाहे। लघु शंकाओं और दीर्घ शंकाओं से अफसर का बहुत वास्ता पड़ता है। वैसे अफसर ऐसी व्यवस्था अपने लिए रखते हैं तो वे पहले ऐसी ही एक सामूहिक व्यवस्था दूसरों के लिए भी करते हैं। घर और दफ्तर में ऐसी व्यवस्थाएं हैं तो भला अगर आप कहीं जा रहे हो या कहीं से आ रहे हो तब इस व्यवस्था का क्या होगा? यह व्यवस्था तो हमारे आस-पास रहनी चाहिए। भीड़ में यह कर नहीं सकते और खुले में करने की सरकारी मनाही है इसलिए भावनाओं को समझते हुए विकास में एक विकास फिर जुड़ रहा है कि अव आप गूगल मैप द्वारा शहर के शौचालय देख सकेंगे।
पंच काका कहते हैं कि जीपीएस की मदद से शहर में किसी भी स्थान के नजदीकी यूरिनल तक पहुंचना अब संभव हो जाएगा। अरे भाई हम कुत्ते नहीं हैं कि कहीं भी टांग उठा लेंगे। आप समझ गए ना इस विकास को।
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16 दिसंबर, 2017

सभ्य भाषा में झगड़े का नाम चुनाव

    झगड़ा करना अच्छे लोगों का काम नहीं होता। मैं खुद को अच्छे लोगों में शुमार करता हूं और भविष्य में भी इसी पोजिशन में बने रहना चाहता हूं। वैसे पोजिशन चीज ही ऐसी है कि जिस पर सबसे ज्यादा खतरा मंडराता रहता है। खैर सारी बातें अपनी जगह है और समय ही फैलता करता रहा है। अब समय है फैसले का और मैं किसी भी प्रकार का झगड़ा करने के पक्ष में तो बिल्कुल नहीं हूं। और साथ में तुर्रा यह भी है कि किसी से भी झगड़ा क्यों किया जाए। ना जाने किस की कब जरूरत आन पड़े। आज झगड़ा और कल सुलह करनी पड़े तो भाई पहले से ही पुखता इंतजाम होना चाहिए।
    हमारे बड़े कवि कबीर जी कह गए- ‘कबिरा खड़ा बजार में मांगे सब की खैर। ना काहू से दोस्ती न काहू से वैर।’ छोटे कवि और मुझ जैसे आपके मित्र ऐसे संकटों में भी पड़ने से जरा गुरेज करते हैं। भाई बजार में खड़े होने की फुर्सत अपने पास नहीं है और इतने भी ठाले नहीं बैठे कि सब की खैर मांगे। यहां अपनी खैर के लिए दिन रात रोते रहते हैं और अपनी खैर की चिंता की ही तो बात कर रहे हैं कि झगड़ा करने का अर्थ अपनी खैर को खोना है। हां अगर बजार में कहीं खैर मिलती हो पैसे देकर, या फ्री में बांटी जा रही हो तो भैया हमें बजार में खड़ा होना भी मंजूर है। बिना खैर के बजार में खड़े हो कर खैर मांगने के पक्ष में हम नहीं हैं। दोस्ती और बैर की भी बात अगर कबीर स्टाइल में रखी जाएगी तो अपना काम कौन करेगा। जिनसे जान-पहचान है उनके लिए तो बस दो ही श्रेणियां है- दोस्ती या दुश्मनी।
    झगड़ा करना यानी दुश्मनी मोल लेना। वही तो नहीं चाहते सो पूछ रहे हैं कि झगड़ा करने का सही समय क्या है। झगड़ा कुर्सी का है और साहब को फरियाद करने जाना है। साहब हमको बड़े वाले और अच्छे वाली कुर्सी चाहिए। आपकी किरपा हो जाए तो सुसरे रामलाल और श्यामलाल को छोड़ कर मुंगेरीलाल को धकेल कर हमें कुर्सी दे दी जाए। ये चुनाव-वुनाव तो सब चोंचले हैं। होगा तो वही जो श्रीमान चाहेंगे। आप अफसर है और आप जिस कुर्सी पर बैठे हैं उसके लिए किसी तीसरे की पंचायत तो हो नहीं सकती है। अगर चुनाव से पहले झगड़ा करेंगे तो हम आंखों में आ जाएंगे और हम वैसे तो आपकी आंखों में ही रहना चाहते हैं पर ऐसे नहीं... आंख रहने और आंख में रखने में बहुत फर्क है। सरा खेल ही आंख का है। वर्षों से हम अर्जुन वाली आंख कुर्सी पर गड़ाएं बैठे हैं। इसी चक्कर में तो सब से दोस्ती रखी और बैर मोल नहीं लिया। कवीर जी के मंतर को जरा मरोड लिया साहब- अपनी सबसे दोस्ती ना काहू से बैर। किसी को हंस कर पटाए रखा, किसी को मुस्कुरा कर फसाए रखा। जरूर हुई तो चाय-पानी से मामला बैठाया। उससे भी नहीं बनी बात तो पार्टी देकर खुश किया। खुश क्या धोखा दिया। हमारा असली मकसद ऐन-केन-प्रकरेण इस बड़े वाली कुर्सी तक पहुंचने का है।
    पंच काका कहते हैं कि सभ्य भाषा में झगड़े का नाम चुनाव है। सो अरज हमारी यह है कि हम को तो सर्वसम्मति से आप जोड़-तोड़ कर कुर्सी पर एक बार बिठला दो, बाकी सब हम संभाल लेंगे। एक बार बैठ गए तो ऐसे चिपक कर बैठेंगे कि हम हमार बिटवा के बड़े होने तक यहीं बैठे रहेंगे। 
डॉ. नीरज दइया