31 मार्च, 2017

कागज के दुश्मन

कागज का आविष्कार चीन में हुआ। पंच काका का स्थाई आदेश है कि जब भी किसी का नाम लेने की बात हो, तो सावधानी रखो। मैं सोच रहा हूं कि चीन का नाम लिया जाए, या कह दिया जाए कि कागज का आविष्कार भारत में हुआ। कोई वास्तव में पक्का यह नहीं जानता कि कागज का आविष्कार कहां हुआ। कहते हैं कि ऐसा लिखा हुआ मिलता है। लिखने से मानते हो तो मैंने लिख दिया- ‘कागज का आविष्कार भारत में हुआ।’ मैंने लिखा तो आप संदेह कर रहे हैं। इसलिए बेहतर पंच काका की बात है कि कागज की बात करते हुए मैं इसके आविष्कारक की बात गोल कर जाऊं। किसी ने कब कहा है कि नाम लो। मोर नाचा जंगल में किसने देखा, आपकी बात सही है। पर मैं तो पंच काका के स्थाई आदेश की पालना में बात का आरंभ ही बदल देता हूं। हमारे कविराज कह गए- ‘हीमत कीमत होय, बिन हिमत कीमत नही। करे न आदर कोय, रद कागद ज्यूं राजिया॥’ वैसे यह केवल राजिया के ही समझने की बात नहीं है। यह मेरी हिम्मत है कि कवि का नाम नहीं लिया, और उनकी पंक्तियों का उल्लेख कर दिया। लिखते समय पूरा मार्जिन हाथ में रखता हूं। कागज और कलम हमारी है, तो फिर कंजूसी कैसी? वैसे कागद को चिट्ठी भी कहते हैं। और आजकल चिट्ठी आनी-जानी बंद-सी हो गई है। वह भी क्या दौर था- जब डाकिया डाक लाता था और हिंदी फिल्मों में ‘डाकिया डाक लाया...’ जैसे गाने लिखे गए थे। खुशी की बात यह है कि अब डाक और डाकिया दोनों ही कंपलीटली फ्री हो गए हैं। लेटर-बॉक्स देखे तो बरसों-बरस हो गए हैं। जैसे वे हमारी दुनिया से गायब हो गए हो। अब यह शिकायत भी दूर हो गई- “चिठिया हो तो हर कोई बांचे, भाग ना बांचे कोए....।” भाग्य का भाग्योदय हो गया है। ई-मेल और संदेश भेजने के नए-नए तरीके इजाद हो गए हैं। अब कागज के दुशमन तो गिने-चुने ही रहे हैं। अखबार और पत्र-पत्रिकाओं ने भी ई-संस्करण सुलभ करा दिए हैं। अब कौन कचरा इक्कठा करे। यह ‘ई-युग’ है बाबा। देखिए ए-बी-सी-डी चार युगों के बाद ये ई-युग आया है। इसमें समझदारी नहीं कि अखबार और पत्र-पत्रिकाओं के लिए इंतजार करो। सब कुछ नेट के ई में है भैया।
    पंच काका कागज की दूसरी ही बात बता रहे हैं। गली में लड़ाई हो गई। बात बस इतनी थी कि दो हजार के नए नोट पर कोई नया फोटो क्यों नहीं छापा? भगतसिंह का छप जाता, नहीं तो बाबा साहेब का छाप देते। देखिए ना फिर से छाप दिया- गांधी बाबा का। वे इतने छप चुके हैं, तो अब किसी नए का नंबर आना चाहिए था। इसी बात पर बहस हुई। किसी ने सुझाव दिया कि जब इतने नोट हैं, तो फिर अलग-अलग नोटों पर अलग-अलग फोटो छाप कर सब की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। वैसे यह बहस और लड़ाई की बात नहीं थी। पर क्या करें हो गई कि गांधी बाबा को करवट बदलवाने के चक्कर में क्यों सबको लाइन में खड़ा करा दिया। नोट पर गांधी लेफ्ट से राइट हुए कि राइट से लेफ्ट, पर पूरे देशवासियों ने बैंकों की लेफ्ट-राइट जरूरी की। आजादी इसी का नाम है कि सब के अपने-अपने सुझाव और विचार हैं।
    पंच काका ने उन्हें समझाया- ओछी राजनीति के चक्कर में आपने संबंध बर्बाद मत करो। सब के सब कागज और कलम ले आए और लिखने लगे। सबका कहना था कि हम प्रधानमंत्री जी कागद लिख सकते हैं। उन्होंने खुद कहा है- मुझे लिखो। गली के लोगों की कागज से दुश्मनी निकली। एक कागज लिखकर फाड़ते कि ठीक से लिखा नहीं गया। फिर दूसरा-तीसरा-चौथा। यह क्रम किसी नए कवि जैसे चलता रहा कि कविता लिखने के नाम पर बीसियों कागज बर्बाद करते हैं। अब इन्हें कौन समझाएं कि इस ‘ई-युग’ में कागज के दुश्मनों के लिए कोई जगह नहीं है। अब सब कुछ कागज-लेस हो रहा है।
नीरज दइया

टारगेटमयी मार्च

ब से मार्च का महीना आया है तब से हर सरकारी कार्यालय के गेट को देखता हूं तो पाता हूं कि वे इन दिनों जल्दी खुल जाते हैं और देरी से बंद होने लगे हैं। जिस कार्यलय में कर्मचारी सूरज के सिर पर आने के बाद भी दौड़ते-भगते पहुंचते थे, उन्हीं कार्यालयों में अब सूरज के आते हैं थोड़ी देर में एक-एक कर सभी कर्मचारी और अफसर आने लगे हैं। न केवल आने लगे हैं वरन अपने स्थान पर विजारित होकर फाइलों और बिलों में ऐसे खो जाते हैं कि दिन भर लगे रहने पर भी उनका सिर ऊंचा नहीं होता। यह सब देख कर लगता है कि देश बदल रहा है। ऐसे तो हमारी तरक्की को कोई रोक नहीं सकता। सबके अपने-अपने टारगेट हैं। टारगेट को प्राप्त करना बहुत जरूरी है। बाबू का टारगेट है और अफसर का अपना टारगेट। सब के अपने अपने टारगेट और खाते हैं। आदमी की हिम्मत और पद के हिसाब से सब का अपना अपना मुंह है। किसी का मुंह छोटा है वह कम खाता-पीता है, और जिसका मुंह बड़ा है वह ज्यादा खाता-पीता है। यह झूठ है कि हमारे देश में कोई भूखा सोता है। यहां भले कितनी ही गरीबी हो और भले गरीबी की किसी भी रेखा की बात हो, यहां कोई भूखा नहीं सोता है। सबके अपने अपने खाने-पीने के रास्ते बने हुए हैं। भिखारी से लेकर सेठ साहूकार तक के अपने अपने रास्ते हैं। कोई भगवान के नाम पर कुछ ले रहा है तो कोई दे रहा है। हरेक का अपना खाता है। जिसमें पाप-पुण्य है। आदमी एक जैसे ही हैं, पर कभी कोई भगवान के नाम पर तो कभी कोई वाहे गुरु और अल्लाह के नाम पर खाता-पीता अथवा खिलाता-पिलाता है। कार्यालय में साहब के कमरे के बाहर बैठने वाला अंतिम अधिकारी भी दफ्तर के हिसाब से खाता-पीता है। सबका नसीब है और यह नसीब मार्च के महीने में जोर शोर से चमक उठता है। मार्च का महीना यानी खाने-खिलाने का महीना। इस महीने में टारगेट पूरे करते-करते कई टारगेट पूरे हो जाते हैं। बकाया बिल और बकाया बजट को यूज करना मार्च में जरूरी होता है। सब चाहते हैं कि आया हुआ बजट जाना नहीं चाहिए। बिना खर्च के आया हुआ बजट वापस चला जाएगा तो यह सरासर हरामखोरी है। लापरवाही है। कार्य के प्रति उदासीनता है। अनुशासनहीनता है। सरकारी बजट का पूरा पूरा उपयोग होना ही चाहिए। यदि किसी करण से बजट मार्च में नहीं खत्म हो सकता है तो उसके लिए मार्च के महीने को खुला रखा जाता है। अप्रैल की दस-बीस तारीख तक मार्च महीने को चलाया जाता है। पिछली तारीखों में बिलों का लेन-देन और सब व्यवस्थित किया जाता है। बिना तारीख के बिल कबाड़े जाते हैं। साहब के खास आदमी दफ्तर में अपने हिसाब से बिलों पर तारीख लिखते और प्रमाणित करते हैं। ऐसा भी होता है कि बिल का सामान और काम-काज अपनी जगह छोड़ दिया जाता है। आज नहीं तो कल-परसों या फिर कभी सामान एडजेस्ट हो जाएगा, काम करा लिया जाएगा। परंतु अगर मार्च का महीना निकल गया और उसको अप्रैल में भी नहीं पकड़ पाए तो बजट लेफ्स हो जाएगा। सामान और काम की बजाय ध्यान बिल और कमीशन पर दिया जाना चाहिए। वांछित बिल समय पर आ जाए, पास हो जाए और सबका खाना-पीना बराबर हो जाए तो कोई समस्या नहीं है। बस एक बार दौड़ते-भागते टारगेटमयी मार्च को पकड़ लिया तो समझो पूरे साल भार का आराम हो गया। पंच काका कहते हैं कि मार्च की दौड़-भाग में कुछ कर्मचारी और अफसर ऐसे भी हैं, जिनको टारगेटमयी मार्च के पीछे दौड़ना-भागना नहीं आता। राम जाने वे किस मिट्टी से बने हैं। उनको ढंग से खाना-पीना नहीं आता। ऐसे में बेचारे सहायकों को चाय-पानी के लिए तरसना पड़ता है। बिना चाय-पानी के नौकरी किस काम की, इससे तो बेहतर है कहीं ढंग की जगह तबादला हो जाए।
नीरज दइया

28 मार्च, 2017

कुंवारों-कुंवारियों की धमाचौकड़ी

मारे देश में रोजगारों की कमी नहीं है। अगर हम अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाएं, तो एक नहीं बीस तरह के काम हैं, जिनको रोजगार के रूप में अपनाया जा सकता है। मैं आपको बीस के बीस तरह के रोजगार नहीं बता सकता, पर एक के बारे में कुछ खुलासा करता हूं। समझदार को तो इशारा ही काफी होता है। पिछले दिनों एक वैवाहिक साइट ने सर्वेक्षण करवाया कि कुंवारों-कुंवारियों की पहली पसंद में कौन-कौन शमिल है। पसंद की बात पर ऐसे-ऐसे नजारे सामने आए कि मत पूछिए बात। बॉलीवुड-हॉलीवुड और क्रिकेट-राजनीति के युवा चेहरों की तो जैसी लॉटरी निकल आई। दीवानों-दीवानियों के हाल-बेहाल, पसंद करना था एक को, और नाम बताए दस के। पूरी वेटिंग लिस्ट ही बना दी। ये नहीं तो ये, और ये नहीं तो ये चलेगा। ही और शी इस ये-यू के चक्कर में रहते हैं। अंततः गले और वरमाला पर किसी एक्स-वाई का नाम लिखा होता है। पसंद करने-कराने की छूट हो तो फिर पूरी छूट होनी चाहिए। पसंद तो पसंद होती है। कोई शादीशुदा है या नहीं, इससे कोई सरोकार नहीं। यह अंदर की बात होती है। दिल का मामला है साहेव। फिर जब सपनों में किसी के आने-जाने की कोई रोक-टोक नहीं है, तो यहां पसंद में रोक-टोक क्यों? देश में बड़े नाम ऐसे भी मिल जाएंगे जो शादीशुदा होते हुए भी कुंवारों और कुवारियों जैसे हैं। कोई अपने जीवन-साथी को वर्षों तक छोड़ दे, तो कोई समयावधि होनी चाहिए कि इतने वर्षों पूरे कर, आप कुंवरा-कुंवारी कहे जाने का प्रमाण-पत्र पा सकेंगे। झूठ बोलना किसे पसंद नहीं है। खुद को बरसों कुंवरा-कुंवारी कहलाने में गर्वानुभूति है। तो बात सर्वेक्षण की थी और उस में अमिताभ बच्चन, सचिन तेंडुलकर, रितिक रोशन, विराट कोहली, राहुल गांधी से लेकर माननीय प्रधानमंत्री जी तक का नाम कुंवारियों की पसंद में सरपट आया। रूपसियों को तो छोड़िए कुंवारों का हाल तो इससे भी बुरा है। वे तो पासवाली आंटी तक का नाम लेने में नहीं शर्माते हैं। आप कुछ भी समझे, पर ये अंदर की बात है। दिल का मामला है। बहुत सी पुरानी बातें ऐसी हैं जो पुरानी होती ही नहीं। सदा प्रासंगिक रहती है। जैसे- भैया! शादी ऐसा लड्डू है, खाए सो पछताए और ना खाए पछताए। जब पछताना ही है तो खा लेना ही ठीक है। कुछ का मानना है कि पछताना ही है, तो अकेले ही ठीक है। मिलकर पछ्ताना ठीक है या अकेले, इसका कोई ढंग से खुलासा नहीं हुआ है। कुछ ट्रेलर देख कर पछताते हैं। किसी को आदर्श मानकर प्रेरणा ग्रहण करना गलत नहीं। राजनीति और समाज में कुछ प्रसिद्ध कंवारों और कंवारियों के नाम कुख्यात हैं। अपने जीवन को फकीरी जीवन कहने वाले और वालियों का कुछ तो जादू है। आह ! स्वतंत्रता से भरा जीवन कितना सुखद है। किसी का ना कहना, ना सुनना। जो जी में आए, सो करो। परिवार और शादी में कितने बंधन हो जाते हैं। इन दिनों यह एक बड़ा रोजगार बन गया है। बिन किसी इन्वेस्टमेंट के आमदनी होने लगती है।
          पंच काका रोमाटिंग मूड में आ कर कहने लगे हैं- जब दो दिल टकराते हैं तो बिजलियां कड़कती है, घर में बारिश और तूफान आता है। धीरे-धीरे दो पहियों पर दौड़ने वाली गाड़ी, सवारियों के बढ़ने पर बैलगाड़ी बन जाती है। बीस बातें सोचते हुए जीवन जीना पड़ता है। ऐसे में कुंवारों और कुंवारियों की धमाचौकड़ी देख कर जलन होती है। यह खेल निराला है- जो बंधन में हैं, आजादी चाहते हैं और जो आजाद है, वे बंधन के लिए बेताब है।
० नीरज दइया 

24 मार्च, 2017

मैं आई हूं यूपी-बिहार लूटने

पंच काका का मानना है कि हमारे देश में जिन राज्यों की चर्चा मुख्य धारा में रहती है, उनमें यूपी-बिहार प्रमुख हैं। वे कहते हैं कि लूटा उसे जाता है जिसके पास कुछ होता है। यूपी-बिहार में ही सब कुछ है। बिहार में लालूजी तो यूपी में मुलायमजी प्रसिद्ध है। ये तो बस दो ठो नाम लिए हूं। पर इतना जान लो के जिनके पास लुटाने के लिए बहुत कुछ होत रहा, वही लूट और लूटा सकत है। फिल्मी दुनिया में गाना ऐसे ही नहीं बन जात- ‘मैं आई हूं यूपी-बिहार लूटने’। इस गाने में ही लाइन थी- ‘दिल वालों का करार लूटने’। अब अगर गौर किया जाए तो गीतकार ने सबसे पहले ‘दिल वालों’ की जगह ‘दिल्ली वालों’ का करार लिखने की सोची थी। पंच काका ने ही कहा कि इसे इतना ओपनली नहीं लिखना है। माना कि दिल्ली का करार यूपी-बिहार से जुड़ा हुआ है। आपको याद हो तो एक समय भोजपुरी गाना हिट हुआ था- ‘कमर लचके तो यूपी-बिहार झुमेला।’ यह प्रमाण है कि यूपी-बिहार की लोकप्रियता अन्य राज्यों से अधिक है। वैसे यूपी, बिहार के लोगों की भावनाओं को ठेस भी बहुत जल्दी पहुंचती है। पूरे देश में यूपी-बिहार के लोग फैले हुए हैं। काफी जगह तो ऐसी है कि वहां सभी हिंदी-भाषी लोगों को ‘बिहारी’ कहा जाता है। हमारे एक मित्र यूपी वालों को नाराजगी में ‘यूप्ले’ कहा करते हैं। ऐसे ही एक परेशानी के दिन उन्होंने अपनी भाषा में यूपी वालों के लिए एक नया शब्द इजाद कर दिया- ‘यूप्ले’ यानी ‘तुम खेलो’, वे शब्द के प्रयोग को कोड-वर्ड की तरह काम लिया करते थे। कोड वर्ड का मतलब भय-खतरा है। क्या यूपी-बिहार में देश के लोगों को डाराने वाले लोग रहते हैं? नहीं ऐसा नहीं हो सकता। अगर ऐसा होता तो यूपी-बिहार को किसी के ले लेने और किसी को दे देने से भला आपत्ति क्यों होती। एक किस्सा यूं हुआ कि फिल्म ‘छोटे सरकार’ के एक गाने को लेकर शिल्पा शेट्टी के ख़िलाफ़ कार्रवाई हो गई। कारण था उनकी फिल्म का  गाना- 'एक चुम्मा तू मुझको उधार दे दे और बदले में यूपी-बिहार ले ले...।’
         यूपी-बिहार को लूटने-लूटाने और झूमने-झुमाने तक तो बात ठीक थी, कि चलो भैया! लूट और झूम लो। यूपी हो या बिहार यहां के शीर्ष नेताओं का परिवार बड़े कुनबें के रूप में विख्यात है। यहां बस गिने-चुनों की चलती है। कुछ परिवारों का दबदबा है। जब-जब से वे सत्ता में आएं हैं, अपने भाई-बंधुओं का जमावड़ा किया है। मान कि यह अपने अपने घर का मसला है, और कोई ऐसे ही लुटता-लूटता नहीं। कैसे लुटता-लूटता है इसकी सब खबर रहती है। पर यह क्या है कि सब जब अपने ही आदमी है, तो किससे क्या कहा जाए? है तो यह सरासर गलत ही। यह क्या बात हुई कि एक ‘चुम्मा’, और वह भी उधार का। यानी उधार के चुम्मे के बदले में ‘यूपी-बिहार ले ले...’। कोई ऐसे क्यों ले लेगा। हम नहीं हैं क्या? एकदम पोल थोड़ी है। कोई ऐसे कैसे ले सकता है? इसी बात पर कोर्ट में मुकदमा दर्ज हो गया। सबको लाइन में लगा दिया। यह बात अलग है कि हमारे यहां नियम में भी नियम और उपनियमों के अनेक दाव हैं। कानून का खेल बड़ा है। यहां देर जरूर हो जाती है, पर अंधेर नहीं। अगर अंधेर होती तो कोई देने-लेने की बात करता ही क्यों? ऐसे ही लेन-देन नहीं हो जाता क्या? बिना बात के...। पंच काका करते हैं कि संयुक्त परिवार अच्छी बात है। इससे कभी मैं और कभी तुम का खेल चलता रहता है। ना इसकी बारी और ना उसकी बारी। हम ही हम है बारीबारी। आपस में मिल बांट कर खा लेते हैं। आप भले इसे बदलती राजनीति का खेल कहें। पर जनता टेस्ट बदलना चाहती है। हर रोज दाल खाने वालों को अब कुछ दूसरा टेस्ट मिलना चाहिए।

० नीरज दइया

22 मार्च, 2017

जाकेट की सर्दी और गर्मी

काफी दिनों से सोच रहा था कि मैं भी माननीय प्रधानमंत्री जैसी जाकेट खरीद लूं। जब अधिक इच्छा हो गई तो कीमत जान कर ही होश उड़ गए। उड़े हुए होश को जल्दी से संभाला और दुकानदार से बोला- प्रधानमंत्री जी को छोड़ो, किसी दूसरे किस्म की दिखाओ भैया। वह बोला- साहित्यकारों वाली दिखानी है या बाबाओं वाली। मैंने जिज्ञासावश कह दिया- दोनों ही दिखा दो। पास खड़ी श्रीमती जी कान के पास आ कर फुसफुसाई- बाबाओं वाली नहीं लेनी। आप लिखते हो इसलिए साहित्यकारों वाली जचेगी। मैंने मुस्कुरा कर हां की निगाहों से उसे देखा। उसके अधरों पर मुस्कान खिल उठी। मेरा मानना है कि कपड़े अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए ही हम पहनते हैं। दूसरों को अच्छे दिखने के लिए पहनने वाली साहित्यकारों वाली जाकेट की कीमत बजट में थी, सो खरीद कर हंसी-खुशी घर आए।
            अगले दिन जाकेट पहन कर आइने के सामने खड़ा हुआ तो लगा जाकेट में मैं नहीं कोई दूसरा दिखाई दे रहा है। सुंदर चीजें सभी को आकर्षित करती हैं। बहुत से मित्रों से मेरे जाकेट में जचने को स्वीकारा और मुझे बधाइयां मिली। न्यू पिंच का सुखद अहसास तब सौ गुना बढ़ गया जब हैडमास्टर ने पहले ही कालांश में आकर कहा- कैसे कहूं, क्या कहूं, कहूं या नहीं कहूं। बहुत सोच में पड़ गया हूं। मैं खुशी खुशी बोला- कहिए जो भी कहना है, आपको सब कुछ कहने का हक है। तब वे बड़े संकोच से बोले- आज क्या है कि फोटोग्राफर को बुलवाया है। हमारी प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों के साथ फोटो खींची जानी है। अगर आपको बुरा नहीं लगे तो एक घंटे के लिए अपनी जाकेट दीजिए, फोटोग्राफर का फोन आ गया है कि वह आने वाला है। जीवन में अनेक मांगने वालों से वास्ता पड़ा था पर यह अनुभव पहला-पहला था। मैंने जाकेट उतारते हुए सोचा कि मैं कर्ण हूं और यह भगवान हैडमास्टर बन कर आया है। मैं संकोच में तो था कि जाकेट के चक्कर में शर्ट को ढंग से प्रेस नहीं किया था और जाकेट उतारते ही यह रहस्य भी खुलना था।
            एक घंटे का कह कर ले गए थे फिर दो घंटे में हो गए और वे लौटाने नहीं आए तो मैं खुद लेने पहुंचा गया। वे बोले- मैं तो भूल ही गया था। जाकेट आपसे अधिक मुझ पर फबती है। लिजिए आपकी जाकेट। और हां थेंक्यू। मैंने मुस्कुराते हुए अपनी जाकेट लेकर पहन ली। गनीमत रही कि शर्ट के बारे में किसी ने कुछ नहीं कहा। बुरा तो उसके अगले दिन हुआ जब मैं जाकेट पहन कर प्राथमिक विभाग से गुजर रहा था कि कुछ छोटे बालकों ने आ कर मुझे घेर लिया। पहले तो मैं समझ नहीं पाया कि माजरा क्या है। बच्चे मन के सच्चे होते हैं और उन्होंने सच्चाई जाहिर कर दी कि मैंने उनके हैडमास्टर जी का जाकेट क्यों पहन रखा है? बड़े बच्चे ऐसे सवाल करने वाले भोले नहीं होते, मैं भी कहां भोला था। मैंने बच्चों को यह कह कर टरकाया कि यह जाकेट मैंने हैडमास्टर जी की खरीद ली है। वे अब अपने लिए नई लाएंगे।
            पंच काका कहते हैं कि साहित्यकारों वाली जाकेट सर्दी-गर्मी बारह महीनों चलती है। ये सर्दी-गर्मी को रोकने के लिए नहीं, बस ऐसी ही त्रासदियां भोगने और दिखाने के लिए होती हैं। समझ में नहीं आता कि लोग साहित्यकारों वाली जाकेट पहनते क्यों है? क्या बस दिखाने के लिए कि हमारे पास भी है या यह कोई ड्रेस-कोड है?

० नीरज दइया