31 जनवरी, 2017

‘हां’ कहने के हजार दुःख

क्सर माइक पर जिसे बुलाया जाता है उस से ‘दो शब्द’ कहने का अनुनय होता है, फिर भी बोलने वाला सीमा का उलंधन करता हुआ अधिकादिक शब्द बोलता है। काफी बार तो यह अधिकता जानलेवा होती है। यह तो गनीमत है कि हम हमारी सहनशीलता और संवेदनशीलता के कारण ‘दो शब्द’ के नाम पर लंबे-चौड़े भाषण और शब्दों का रायता पचा जाते हैं। हां तो कहानी यह है कि एक बार मुझे भी ‘दो शब्द’ कहने के लिए आमंत्रित किया गया। वैसे तो मुझे गिनती हमेशा याद रहती है। अब मैं ‘दो शब्द’ के लिए बुलाया गया हूं, तो तीसरा-चौथा और बहुत सारे शब्दों की जमात को एक के बाद एक कैसे परोस दूं। ‘दो शब्द’ का मर्म केवल दो शब्द नहीं होता। कुछ शब्द को अगर दो शब्द कहा जाता है तो फिर यह प्रचलन कैसे चल निकला। इस विषय पर शोध-खोज होनी चाहिए।
          मंच पर पहुंचते ही मैंने एक आइडिया लगाया, संभव है यह आपके भी काम आए। यही सोच कर मैं साझा करता हूं। मेरी आदत है कि मैं मंच पर पहुंचते ही माइक पकड़ लेता हूं, और कुछ ऐसे भी वक्ता होते हैं जिनको माइक पकड़ लेता है। तो मैंने माइक पकड़ कर कहा- ‘मैं दो शब्द कहना चाहता हूं और साथ में अपने कहे दो शब्दों की तीन कहानियां। ‘दो शब्द’ कह रहा हूं, ध्यान से सुनिएगा- पहला शब्द है ‘हां’- और दूसरा है ‘ना’। हो गए ‘दो शब्द’। ये दो शब्द तो आपने सुने ही हैं, पर इनकी जो चार कहानियां मैं बताने जा रहा हूं, वे संभवत: आपके लिए नई हो सकती है।
          इन दो शब्दों से हमारा पूरा घर-संसार और परिवार जुड़ा है। यहां तक कि मैं और आप सब भी इन दो शब्दों से ही जुड़े हैं। मुझे बुलाया, मैं ‘हां’ कह कर आया। आप सुन रहे हैं- ‘हां’ कह कर ही सुनना होता है। मेरा मानना है कि हमारे जीवन में ‘हां’ और ‘ना’ का गहरा सरोकार है। ये दो शब्द हमारे भीतर-बाहर, आगे-पीछे, ऊपर-नीचे यहां तक कि आमने-सामने आते-जाते रहते हैं। दोनों में बरंबार लड़ाई होती है। तकरार है छोटा-मोटा तो प्यार भी बहुत है। आखिर है तो दोनों शब्द भाई-भाई, पर ऐसा लगता है कि कभी-कभी दोनों जानी दुश्मन बन गए हैं। आपने देखा होगा, देखा क्या हम सब महसूस करते हैं कि जब भी आपका मन ‘हां’ कहने को करता है, सोचते हैं ‘ना’ कह दूं और बहुत बार ‘ना’ कहते कहते ‘हां’ कहने को मन करता है। हमारा मन इन दो किनारों पर झुलता है।
          पंच चाचा की फिलोसफी का आधार बस ये दो शब्द ‘हां’ और ‘ना’ है। ‘हां-ना’ को पूरे संसार का जनक कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। वे कहते हैं- ‘इस संसार का आगाज़ हां-ना से हुआ, और अंजाम भी हां-ना से होगा। बाकी जो कुछ संसार में है, वह छलावा और भ्रम है।’ चाचा पहुंचे हुए आदमी हैं। उनकी बातें कम से कम मुझे तो समझ में आती नहीं। मैंने पूछ ही लिया- ‘चाचा अंजाम तो होगा तब देखा जाएगा, अंजाम के बारे में भले ना बताएं पर यह तो कहिए कि ‘हां-ना’ से आगाज कैसे होगा?’
          चाचा ने दांत दिखाएं और बोले- ‘इत्ती-सी बात नहीं जानते। अरे बाबा आदम का असली नाम ना था।’
          ‘अच्छा। तब तो हां नाम हव्वा का होगा।’
          ‘सही पकड़े हो।’
          मैंने आगे कुछ कहा नहीं, पर सच है कि हम हमारे चाचा जैसे कहां-कब सही पकड़ पाते हैं। इस ‘हां-ना’ के बीच चाचाजी के चक्कर में वे मेरी चार कहानियां कहीं पीछे ना छूट जाए। सो सीधे-सीधे अब कहानियों पर आता हूं। इन कहानियां के पूरी होते ही समझ लिजिएगा कि मेरे ‘दो शब्द’ की व्याख्या और यह आमंत्रण मेरा पूरा हुआ।
          चार दिन की हमारी छोटी-सी जिंदगी है। पेश है चार छोटी-छोटी मौलिक कहानियां।
          मैं पंच चाचा के साथ रहता जरूर हूं, पर यह वहम करने की जरूरत नहीं है कि ये कहानियां मेरी नहीं पंच चाचा की है। वैसे करो वहम, मेरा क्या मेरे पास तो हस्तलिखित है। मेरी खुद की राइटिंग में है। जब प्रमाण की जरूरत होगी पेश कर दी जाएंगी।

पहली कहानी : ‘हां’ की कहानी
          ‘हां’ तो यह हां की कहानी है। हां से ही मिलता-जुलता इसका जुड़वा भाई है- ‘हूं’। जो लोग ‘हां-हूं’ के मंत्र का जाप करते हैं, और भीतर ही भीतर ‘ना-नूं’ को याद करते हैं.... वे सदा सुखी रहते हैं। ‘हां’ की कहानी में कोई सुख नहीं है। ‘हां’ कहने के हजार दुःख पहले भी थे, और अब भी हैं। इतने वर्षों बाद भी इन दुःखों में कोई कमी-बेसी नहीं हुई है। अगर हुई भी है तो उसे स्वीकारा नहीं गया है। कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि साहित्य में हजार का मलतब हजार नहीं होता। भैया मेरा मानना है कि बाजार में तो हजार का मतलब हजार ही होता है। अब आप साहित्य वाले ‘हजार’ का मतलब छोटा-बड़ा कुछ भी करते रहो। कहानी अगर दुःख की हो तो ऐसी कहानी का क्या कहना और क्या सुनना। आज दुःख को कोई सुनना ही नहीं चाहता। दुःख नहीं सुनने का बड़ा कारण यह है कि दुःख सुनाने-सुनने से कम होता है। हमें फुर्सत हो तब ना, क्या हम अपना दुःख लेकर बैठेंगे और किसी को पूछेंगे- ‘भैया टाइम है क्या?’ हर सुनने वाला कहेगा- ‘ना।’
लोकतंत्र में कोई किसी का दुःख कम करे भी तो कैसे? फुर्सत ही नहीं है अपने ही काम करने से। यहां तो खुद के ही काम कम नहीं है। फिर फ्री में क्यों किसी का दुःख हल्का करें। हर काम में जब हिसाब-किताब है तो इसमें भी होना चाहिए।
          हां तो ‘हां’ की यही कहानी है कि आज हर व्यक्ति अपना दुःख लिए फिरता है। सार की बात यह है कि यह दुःख असल में हर काम के लिए ‘हां-हां’ कहने से जन्म लेता है। सुख पाना है तो ‘हां’ बोलने से परहेज करो। जैसे डॉक्टर ने ‘हां’ बोलने के लिए मना कर रखा हो। कभी मुश्किल में ‘हां’ कहना भी पड़े तो मन से ‘हां’ मत कहो। नेता जी की भांति बार-बार मुंडी हिलाओ। मुख पर भले ही ‘हां-हां’ हजार बार कहो पर मुंडी हिला हिलाकर साथ में ‘ना-ना’ कहना भी जारी रखो। ‘हां’ को मारने वाली अमोघ शक्ति ‘ना’ के पास है। नेता जी के सुख का मूल मंत्र है- हजार लोगों को ‘हां-हां’ कह कर भी कभी कोई काम नहीं करते। यह कहानी वैसे तो बहुत लंबी और बहुत विस्तार से कही जाती है, फिलहाल इसे यहीं विराम देता हूं। समझने वालो के लिए तो जरा सा संकेत ही काफी होता है। तो आखिर में सब बोलो- ‘हां’। अरे खोपड़िया हिला कर साथ में ‘ना’ भी बोल दो।

दूसरी कहानी : ‘ना’ की कहानी
          ‘ना’ कहने के हजार सुख है। सुख कौन नहीं पाना चाहता है। ‘ना’ का सुख इतना प्रभावशाली है कि दो बार ‘ना’-‘ना’ बोलते हैं, तो ‘नाना’ की याद आने लगती है। नाना हमारे सुख की ‘पूरी’ खान है, अगर किसी को अहसमति हो तो बोलो- ‘ना’। देखिए किसी ने नहीं बोला ‘ना’। अस्तु यह तय हुआ कि ‘ना’ में हमारे सुख की ‘आधी’ खान है। इसी ज्ञान से कुछ कहने वाले कहते हैं कि कुछ ना कहना ही बेहतर कहना है। तो कहिए ‘ना’ किसने रोका है। ‘ना’ कहने से हर काम से मुक्ति रहती है। ‘हां’ की हजार बीमारियां एक ‘ना’ कहते ही छू-मंतर हो जाती हैं। वैसे सज्जनों के लिए ‘ना’ कहना जरा कठिन है किंतु अगर आप ने एक बार ‘ना’ कहना सीख लिया तो मजा आ जाएगा, और फिर आगे हमेशा के लिए ‘ना’ और ‘ना’ के साथ एकदम ‘ना’ फिर साफ ‘ना’ बोलना सीख जाएंगे। आप किसी बात की चिंता-विंता ना करें। हर काम होगा। बस इतना जान लें कि कोई काम रुकता नहीं है। अरे भाई ऐसा नहीं है कि आप नहीं करेंगे तो होगा ही नहीं। पूरा बोझ आप जो लिए फिरते हैं, इसे धड़ाम से नीचे पटक कर मुक्त हो जाएं। सब हो जाएगा। आप के और हमारे मरने पर भी यह संसार चलेगा कि थम जाएगा। इतने गए इतने आए। कोई हिसाब है क्या आने जाने का। चला चली का खेला है भाई। ‘ना’ कहने का यह गुरु-ज्ञान जानते हुए भी हमारे देश में मूर्खों की कमी नहीं है। ऐसे मूर्ख ही हमारे सारे काम करेंगे और हमारा यह देश निरंतर आगे बढ़ेगा।

तीसरी कहानी : ‘हां-ना’ की कहानी
          अंततः हर ‘हां’ का ‘ना’ में रूपांतरण हो जाता है। जीवन में जहां भी ‘हां’ है, वहां ‘ना’ को स्थान देना अनिवार्य है। यह प्रकृति का नियम है, जैसे एक सिक्के के जैसे दो पहलू हुआ करते हैं। दोनों साथ-साथ रहेंगे। अगल-बगल रहेंगे। बार-बार हां-हां कह कह कर जब कोई बोर हो जाता है तो ना-ना कहना स्वीकार लेता है। जीवन का मूल दर्शन है कि हर प्राणी सदैव ‘हां’ या ‘ना’ की दिशा में चलता है। हमारा जन्म-मरण भी ‘हां’ और ‘ना’ से जुड़ा है। गहरे अर्थों में हर किसी का जन्म ‘हां’ रूपी प्रेम-प्याले अथवा ‘ना’ की जबरदस्ती नाव में किसी अनचाहे सवार के चढ़ जाने से हुआ है। जिनका आगाज ‘हां’ से हुआ वे अनंतः ‘ना’ कि दिशा में गमन करते हैं, और जिनका आगाज ‘ना’ से हुआ है जाहिर है वे ‘हां’ की दिशा में गमन करते हैं अथवा करना चाहते हैं।
          तो बंधुओ! हमारे जीवन का सार है- ‘हां’ और ‘ना’।
          हां यदि जीवन है, तो ना मृत्यु और फिर से हां ही हमारा पुनर्जन्म है।
          यह ‘हां-ना’ का चक्कर ही भवसागर है प्यारे।

चौथी कहानी : ‘ना-हां’ की कहानी
          एक दिन ‘हां’ और ‘ना’ में लड़ाई हो गई। दोनों खाना खा रहे थे।
          हां ने कहा- ‘पहली रोटी मैं खाऊंगा’ और ना ने कहा- ‘मैं खाऊंगा।’ दोनों की लड़ाई बढ़ गई पर परोसने वाल सयाना आलोचक था। वह बोला- ‘जीवन में तुम दोनों का होना जरूरी है। एक के बिना दूसरे का महत्त्व नहीं। अब मुझे फैसला करना है तो मैं पहले ना को रोटी दूंगा।’
          इस पर तुरंत ‘हां’ ने प्रतिवाद किया तो आलोचक ने उसे माकूल जबाब दिया- ‘इसमें मेरा कोई दोष नहीं। शब्दकोश में तुम्हारा स्थान मेरे प्यारे हां भैया बाद में आता है। इसलिए यहां भी तुम को बाद में रहना पड़ेगा। अकादि क्रम समझते हो कि नहीं’
          ऐसा झगड़ा सुलझाना सरल नहीं होता। कोई सयाना संपादक होता तो कहता- ‘दोनों आपस में लड़ाई मत करो। मैं दोनों को रोटी पहले खिला सकता हूं। ये लो आधी रोटी ना तुम्हारी और ये लो आधी हां तुम्हारी।’ मैं भी कोई कम हूं क्या? मुझे ‘दो शब्द’ कहने को आमंत्रित किया, तो मैंने ‘दो शब्द’ ही कहे हैं- ‘हां’-‘ना’। है ना? आपको मेरे ये ‘दो शब्द’ सदा याद रहेंगे। ये देखिए आपने बोला- ‘हां’। बोला ‘ना’ हां?
नीरज दइया
 
 

गुट, गुटका और गुटकी

हते हैं कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। अगर बहुत सारे चने मिल जाए तो संभव है कि भाड़ को फोड़ दें। यहां यह समझना जरूरी है कि आखिर भाड़ को फोड़ने पर इतना जोर क्यों दिया जाता है। क्या बिना किसी तोड़-फोड़ के शांतिपूर्वक कुछ नहीं किया जा सकता है। अगर कोई अकेला चना कुछ नहीं कर सकता है तो वह शांति से बैठ तो सकता है। पर जब जब भी कोई चना शांति से चुप-चाप बैठ कर चिंतन करता है, तो दूसरे साथी चने उसे कहते हैं- तू भाड़ में जा। हम जा रहे हैं भाड़ फोड़ने। चने की नियति भाड़ है और भाड़ की चना इसी प्रकार साहित्य और साहित्यकार का अंतर्संबंध है। जो लोग साहित्य के महत्त्व को नहीं समझते वे साहित्य लेखक को चना और साहित्य लेखन को भाड़ समझते हैं। अस्तु दुनिया ने भड़भूंजे की भांति साहित्यकारों को भाड़ के हवाल कर दिया है।
             एक अकेला साहित्यकार लिखता है तो उसे दूसरे और तीसरे के साथ अपने मित्र साहित्यकारों की संगत बल देती है। वह सलाह करता है और चिंतन पर परामर्श करता है। ऐसे में ऐसे गतिशील साहित्यकारों के समूह को अगतिशील और जंग खाए लेखकों द्वारा दूसरे किस्म की जंग छेड़ी जाती है। जो लिखेगा वह छपेगा और जो लिखेगा-छपेगा उसे कभी पुरस्कार-सम्मान भी मिलेगा। समस्या यहीं से आरंभ होती है। एक गुट विशेष की चर्चा शहर से गांव तक खुशबू की भांति फैलती और हर तरफ चर्चा होती है। जो लेखन के ताप को झेल नहीं सकते वे ठंडे लेखक ऐसे गुट से परेशान होते हैं और हानिकार होते हुए भी गुटका खाते है। समय गुजारने के लिए और लेखन की तलब मिटाने में गुटका मददगार होता है। प्रतिबंध के बाद भी गुटका खाने वाले ऐसे ही कुछ मित्रों के बीच बैठ कर गुट की गाथा को बारंबार सुनते-सुनाते हैं। वे चाहते हैं कि धोबी बन कर पछाड़-पछाड़ कर सभी को धो-पौंछ कर गुट से तितर-बितर कर दें। एक बार जो गुट बन जाता है उसे तितर-बितर करना सहज नहीं होता। उनकी इस सहजता से दुखी गम गलत करने वाले गुटका खाते खाते गुटकी की शरण में जाते हैं। गुटकी और गुटकी के शौकीन मिल बैठ जाते हैं तो अनेक समझौतों पर अलिखित हस्ताक्षर होते हैं।
             गैर-गुट वाले गुटका-गुटकी के नशे में लड़खड़ाते हैं। साहित्य के ऐसे सूरमाओं के मुख पर ऐसे-ऐसे शब्द से मिश्रित वाक्य और आप्त कथन आते हैं कि सुनने वाले दंग रह जाते हैं। वे दो-चार गुटकी भरते ही पीढ़ियों तक को शुभोषित करते हुए ज्ञान को घोड़ों पर सवार हो जाते हैं और बहुत आगे निकल जाते हैं। न जाने कहां कहां की कौड़िया लाते हैं। कहीं की ईंट और कहीं का पत्थर भानूमति ने कुनबा जोड़ा की तर्ज पर यह कुनवा रात के अंधेरे-अंधेरे में पूरी दुनिया का कायाकल्प कर डालता है किंतु सवेरा होते ही सारे संकल्प और योजनाएं धरी रह जाती है। सूरज के साथ थोड़ा सा चलते ही शाम का स्मरण हो जाता है और पूरे दिन शाम की रंगीन के साजो-सामान की व्यवस्था योजना में दिन का देहांत हो जाता है। पंच काका कहते हैं कि ऐसे गुटनिर्पेक्ष, निर्दलीय और संत साहित्यकार कहे जाने वालों के जीवन में जाल और माल ऐसा होता है कि हर किसी को फासने-गिराने, चीरने-फाड़ने और उठाने-पटकने की रणनीति के अलावा कुछ कर ही नहीं सकते। अगर इन गुटका-गुटकी वालों का बस चले तो ये चौबीसों घंटे दिन का देहांत करने को तैयार है। 

- नीरज दइया

30 जनवरी, 2017

सर्वश्रेष्ठ वाद - अवसरवाद

जकल जहां देखो वहां विकल्पों के वितान खुल गए हैं। बाजार में कोई छोटी सी चीज लेने जाते हैं तो बहुत देर लगती है। कारण यह कि कौनसी लें, नहीं लें यह फैसला कैसे करें। इसमें समय लगता है। तेल, साबुन, क्रीम से लेकर गेहूं, चावल और दाल आदि सभी चीजों का यही हाल है। तेल लेना है तो कौनसा तेल लें? साबुन तो कौनसा साबुन लें? बाजार में हर वस्तु के अलग-अलग ब्रांड में उपलब्ध है। विज्ञापनों का जादू ऐसा कि हमें हमारी पसंद बार-बार बदलने पर मजबूर करते हैं। हमें पूरी तरह से भ्रमित किया जा रहा है। असल में विकल्प होते ही भ्रमित करने के लिए हैं। परीक्षाओं में प्रश्नों के उत्तर में चार-पांच विकल्प दिए होते हैं, और सही उत्तर छांटने बैठते हैं तो प्रायः सभी सही लगते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि सर्वश्रेष्ठ और सही का चुनाव कैसे किया जाए?
           आवश्यकता आविष्कार की जननी है और इसी आवश्यकता के बल पर एक बार फिर आविष्कार हो गया है। अब इसे आविष्कार माने या नहीं माने, आपकी इच्छा। सभी अवसरों पर सर्वश्रेष्ठ अवसरवादिता है। वादों और कसमों में अवसरवाद बेमिशाल है। मान लें कि आपको तेल लेने जाने का अवसर मिलता है। कौनसा तेल लेंगे यह महत्त्वपूर्ण नहीं है, महत्त्वपूर्ण है कि किस अवसर के लिए तेल लेंना है। अवसर ही महत्त्वपूर्ण होता है। अगर दफ्तर में साहब को तेल लगाना है, तो इंजन-छाप लेना चाहिए। पत्नी ने मंगवाया है अपनी टांग दूर रखें, और जो जैसा कहा गया है वैसा ही तेल घर लें जाएं। आप अपनी बुद्धि का प्रयोग बिल्कुल नहीं करें। यह सदा याद रखें कि आपकी पत्नी आपसे अधिक बुद्धिमान है। अगर आप दुकानदार हैं और ग्राहकों के लिए तेल लें रहे हैं तो अवसरवाद कहता है कि नकली तेल खरीदें, जो सस्ता और जल्दी मिलता है। इससे आपको और ग्राहकों दोनों को फायदा होगा। सारे दुकानदार जब नकली और कम कीमत वाला तेल, बड़ा लाभ कमाते हुए बेच रहे हैं तो अवसरवाद कहता है कि आपको देश और जनता की चिंता बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। साबुन और क्रीम में मामले में अवसरवाद कहता है कि हाथी के दांत सिद्धांत यहां अनुकूल रहेगा। अगर कहीं जा रहे हैं तो ब्रांड में समझौता नहीं करें। तेल, साबुन और क्रीम से आपकी हैसियत का पता चलता है। गेहूं, चावल और दाल तो पेट में चले जाते हैं और फिर दिखाई नहीं देते। क्या खाया-पीया यह कोई नहीं पूछता। हां, कौनसा तेल लगाया, किस साबुन का उपयोग किया और क्रीम कौनसी इस्तेमाल करते हैं... यह चर्चा कभी भी हो सकती है। अगर नहीं हो तो आपको करनी चाहिए। बिना पूछे ही बताएं कि आप क्या क्या और कौनसा-कौनसा ब्रांड इस्तेमाल करते हैं। अवसरवाद सिद्धांत के अनुसार दिल खोल कर खूब दिखावा करो। दिखावा करने से ही अवसर मिलते हैं। अवसर पर दिखावा करने से ही आपकी प्रतिभा की पहचान होगी। अगर आप महिला है फिर तो कहने ही क्या। यहां अवसरवाद का कहना है कि आपको हर अवसर मिल सकता है। अपने लटके-झटके और दांत दिखाने के साथ-साथ आधुनिक होने का लबादा ओढ़ लें। पुराने विचार और मूल्यों को बीती सदी की बातें कहते हुए छोड़ देना है। पंच काका कहते हैं कि अवसरवाद का मौलिक जन्मदाता हर कोई बन सकता है। जरूर बस इतनी है कि अपने स्वाभिमान और सिद्धांतों को भूल जाओ और अवसर के लिए गधा बनना पड़े तो भी चूको मत।
० नीरज दइया 

20 जनवरी, 2017

पारे का पराक्रम

मौसम के अनुसार कभी ऊपर चढ़ना और कभी नीचे उतरना पारे की नियति है। मौसम बदले तो पारे के विश्राम में खलल पड़ता है। पारे और मौसम का गणित तो समझा जा सकता है, परंतु श्रीमती जी और उनके पारे का गणित दुनिया के किसी कोने में आज तक नहीं समझा जा सका है। यह केवल भारत की बात नहीं, दुनिया के सारे वैज्ञानिक पतियों-गणितज्ञयों के यहां यही हालात है, तो सामान्य पतियों की तो बात ही क्या करें। पारे का गणित समझने में अब तक असफलता का एक कारण यह भी है कि जरा सी बात पर इनका पत्नियों का पारा सीधे सातवें आसामान तक जा पहुंचता है। पारे की गति का रहस्य बना हुआ है। अब कल की ही बात है, मैंने कह दिया कि आज दाल में शायद कुछ कमी रह गई। इतनी सी बात कहने पर श्रीमती जी न केवल नाराज हुई, बल्कि अपने पारे को सातवें आसमान पर ले गईं। नतीजा यह हुआ कि अगले दिन ऑफिस जाने से पहले मुझे ही रोटी-सब्जी बनानी पड़ी। सीधे मुंह जब पत्नियां पतियों से बात नहीं करती हैं, तो उन बेचारों का पूरा दिन खराब जाता है। मूड का बाजा बजा हुआ हो तो कहीं मन नहीं लगता। बार बार चिंता सताती है कि पारा सातवें असमान से नीचे आया कि नहीं। फिर चाहे खुद के मोबाइल से फोन करो या ऑफिस के सरकारी फोन से। पत्नी फोन नहीं उठाए तो समझ लिजिए, अभी स्थिति अनियंत्रित है और पारा सातवें आसमान पर ही है। वर्ना बहुत बार ऐसा होता है कि सरकारी फोन पर पत्नियों से बतियाने में जो दोनों तरफ सुख का अहसास होता है, वह मोबाइल में भला कहां। घर बिल आता है, तो दिल जलता है पर फ्री के फोन का समय-ग्राफ जैसे-जैसे ऊपर उठता है वैसे वैसे प्रेम में श्रीवृद्धि होती है।
मैंने अनुभवी पतियों से पूछा- पारे को सातवें आसमान से नीचे कैसे उतारा जाए। सभी ने हाथ खड़े कर दिए कि इसका कोई तयसुदा फार्मूला नहीं है। ऐसी परिस्थियों में कुछ भी हो सकता है। बात किसी उपहार से बन सकती है, या फिर एक-दो दिन घर में दोनों सिफ्ट काम करने से हालत सुधरने की संभावना बनेगी। दिन-रात ऐसे अवसर को खोजना होगा जिससे कि पारे को जरा राहत की स्थिति में लाया जा सके। पंच काका घर में होते हैं तब उनके लिहाज का असर रहता है। अपनी उपस्थित मात्र से स्थितियों को वे सामान्य बना देते हैं। घर में शीत-युद्ध होता है किंतु भीतर ही भीतर। अब जब पंच काका कहीं गए हुए हैं, तो हालत सुधार में देरी की संभावना दिख रही है। मैंने फोन कर पूछा कि अब क्या करूं? पंच काका ठहरे पारखी और दुनिया देखे हुए। बोले- कुछ नहीं करना, शाम का खाना बाजार से पैक करा के ले जाना और खूब खर्चा कर डाल। मंहगी साड़ी खरीद कर ले जा। कोई विदेशी इत्र या फिर गहने तक की औकात हो तो कहने ही क्या। सोने की रकम देखते ही हर पत्नी का पारा फटाक से नीचे आ जाता है। तुरंत राहत का यह अचूक नुस्खा है। नोट बंदी और तंगी के इन हालात में जैसे-तैसे मैंने कुछ खर्चा किया। बजट को इतना सेट किया कि पत्नी का पारा कहीं रहे, पर मेरी दाल जरा सी गल जाए। सारा खेल दाल से ही तो शुरू हुआ था, इसलिए जैसे ही दाल गलेगी पारा नीचे आ जाएगा।
० नीरज दइया