31 दिसंबर, 2016

हमारा डिजिटल-युग में प्रवेश

जो कोई लेख लिखता है, वह लेखक होता है। जो सुलेख लिखता है, वह सुलेखक होता है। जो कुछ भी नहीं लिखता उसे क्या कहेंगे? सोचने की बात है कि अगर ऐसे लेखक, सुलेखक और अलेखक मानेंगे तो चारों तरफ लेखक ही लेखक हो जाएंगे। हो जाएंगे नहीं, हो गए हैं। पूरा इंडिया डिजिटल युग में प्रवेश कर रहा है। करना कुछ नहीं है, बस मोबाइल-क्रांति से पूरा देश जुड़ गया है। पूरे देश में लेखकों और विचारकों के साथ क्रांतिकारियों की फौज खड़ी हो गई है। आस-पास के भाई-बंधुओं में भले सोशल रिलेशन कम हुआ हो पर नेट और नोट की इस नई दुनिया में हम पूरे विश्व से बातें कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर आपके बस ‘गुड मोर्निग’ लिखने की देर है कि कुछ ही मिनटों में वहां मोर्निग को तुरंत गुड करने वाले आ जाएंगे। यह डिजिटल युग है, आप घर के बाहर खड़े हो कर जोर से बोलिए- ‘गुड मोर्निग।’ देखिए कितनों का जबाब आता है। आपने जोर से बोला तो संभव है कोई डांट दे, या लड़ाई कर ले। आपके ‘गुड मोर्निग’ का जबाब तो आता सा आएगा, पहले सामने वाला पूछेगा- ‘हम बहरे हैं क्या? ये सुबह सुबह काहे की गुड मोर्निग, गुड मोर्निग लगा रखी है।’ आपके ही घर वाले आपको पागल हो गए तक कह जाएंगे कि गली में जाकर आपने गुड मोर्निंग बोलने का अपराध क्यों किया। वह पुराना युग था, जब आप अपने घर-परिवार और गली-मौहल्ले को कुछ पूछा करते, कुछ कहा करते थे। अब अगर कुछ पूछना-कहना है तो पूरा देश आपको बताने-सुनने को तैयार है। एक से बढ़कर एक हुनरमंद मित्र मौजूद है। बस आप एक लाइन लिख दें- ‘मोबाइल खरीदना है कौनसा लूं?’ फिर देखिए कि आप को बताने वाले कहां-कहां से और क्या-क्या ज्ञान देने लगेंगे। यह तो बस एक उदाहरण है। आप इन-बॉक्स में भी बहुत कुछ पूछ सकते हैं।
यह नेट-क्रांति ऐसी है कि यहां सब कुछ मिलता है। सब कुछ यानी आपकी अपनी पसंद। आप कुछ भी गूगल बाबा में सर्च करो। एक विज्ञापन आता था- सब कुछ दिखता है। जी हां, यहां सब कुछ दिखता है। बस आप देखने बैठ जाएं, निराश नहीं होंगे। एक पेन के विज्ञापन में पंक्ति आई थी- लिखते-लिखते लव हो जाए। पर मैं तो बरसों से लिख रहा हूं, और किसी ने लव नहीं किया। यह भी हो सकता है किसी ने किया हो और मुझ मूर्ख को खबर ही नहीं हुई हो। इंटरनेट का कमाल है कि वह ऐसा-वैसा खुद फैसला नहीं करता, आप जो चाहे वह तो बस उपलब्ध करता है। इतना सुख है फिर भी क्या आप बाबा आदम के युग में रहना पसंद करेंगे। मर्जी आपकी, जैसा चाहे करें। नियम है- अब तो देश को डिजिट-युग में आना ही है।
एक मास्टर जी का डिजिटल-युग में प्रवेश हुआ। ई-मेल और फेसबुक के साथ-साथ इंटरनेट के माध्यम से फी-मेल और कामसूत्र-बुक भी देखने में खो गए। जब मास्टर जी भी यही सब कुछ करने लगेंगे तो फिर शिष्यों और शिष्याओं को दोष देना गलत है। जीओ का कमाल है कि छोटे-छोटे बच्चे इंटरनेट-फ्रेंडली हो चुके हैं। इस डिजिटल इंडिया में ऐसे रंग-रोगन देख रहे हैं कि देश खड़ा हो रहा है। बच्चे जल्दी से जल्दी समझदार हो रहे हैं तो देश बहुत आगे नहीं बढ़ गया क्या?
डिजिटल-युग में मैंने और पंच काका ने भी दाखिला ले लिया है। अब हम हैं, और हमारे फोन, कंप्यूटर, इंटरनेट है। साथ बैठने की जरूरत नहीं, हमने परिवार-ग्रुप बना लिया है। मोर्निग से लेकर नाइट तक सब लिख कर बातें होती हैं। एक दूसरों को कुछ का कुछ भेजते रहते हैं। सच जानिए कि लिखने-पढ़ने से मुक्ति मिल गई। यहां सब कुछ रेडिमेड है। साहित्य की गंभीरता और किताबों को अब कौन सूंधता है? साहब कुछ जब हाथ में इंटरनेट है तो गोर्की-प्रेमचंद के साथ साहित्य का पूरा कुनबा यहीं उपलब्ध है ना।

० नीरज दइया
 

27 दिसंबर, 2016

संपर्क बढ़ाने पर ध्यान दें

ज चारों तरफ संपर्क का ही बोलबाला है। यह ऐसी बोलती हुई बाला है कि सब इसके दीवाने हैं। इसके बिना कहीं कुछ नहीं होता। हमारे माननीय प्रधानमंत्री ने जन-जन से संपर्क किया और ‘अबकी बार मोदी सरकार’ से जो कुछ किया, वह सब के सामने है। कहने वाले बेशक कुछ भी कहते रहे, पर सच्चाई यह है कि बिना संपर्क के कुछ भी नहीं हो सकता। चुनाव तो सदा पार्टियों का होता रहा है। यह तकनीकी कमाल था कि संपर्क से किसी पार्टी का पर्याय एक उम्मीदवार बना। यह संपर्क की जीत है। अस्तु यह सूत्र के रूप में लिखा जाना चाहिए कि संपर्क बढ़ाने पर ध्यान देंगे तो सिद्धि-प्रसिद्धि मिलेगी। संपर्क बनाने और साधने के अनेक तरीके हैं। यह बहुत सरल है। ठीक वैसे ही जैसे मोबाइल में किसी का नम्बर डायल करते हैं। आपको इंटरनेट फेंडली होना है। अपने काम के आदमी का मुखड़ा सामने आते ही उसका खास नंबर प्रेस कीजिए। नहीं समझे, अरे भाई बिना नंबर तो किसी से बात नहीं हो सकती है। सबसे पहले नंबर पता कीजिए कि किसका क्या नंबर है। गलत नंबर डायल करना खतरनाक हो सकता है। किसी को चापलूसी पसंद है, और किसी को थोड़ी-थोड़ी। पर कुछ ऐसे भी हैं जिनको चापलूसी, बस चापलूसी के नाम से नापसंद है। आप अपनी चापलूसी का नाम बदल कर ही उनको खुश कर सकते हैं। मान लिजिए कि आप एक आम आदमी हैं। कोई छोटी मोटी नौकरी करते हैं। देखिए आपके जीवन की फ्रिक करने वाले आपकी बीमा करना चाहते हैं। बैंक आपको लोन देना चाहता है। आप गाड़ी और बंगला क्यों नहीं खरीदते हैं? आपके पास नौकरी है और एक बंधी बंधाई पगार है। उसे लूटने के लिए बहुत से चापलूस आपसे संपर्क करना चाहते हैं। बिना नौकरी के ये सब सुविधाएं नहीं मिलने वाली। आप ने क्या सोच रखा है कि हम बहुत भले हैं। हम में संवेदनाएं कूट-कूट कर भरी हुई है। बिल्कुल नहीं। हम ऐसे हैं कि रास्ते पर चलते हुए किसी को लिफ्ट नहीं देते हैं। किसी का क्या भरोसा? हर काम हम बस केवल अपने फायदे के लिए करते हैं। गली में स्वच्छता अभियान चला तो प्रेस वाले फोटो लेने आए। सबसे पहले सफाई पसंद के रूप में हम ही कूदे थे। झाडू लेकर फोटो के लिए दौड़ना, मन को कितना सकून देता है। वह एक ऐतिहासिक दिन था। हमने झाडू हाथ में लिया था। गली के नेता जी के साथ हमारी शानदार मुस्कान और हंसी का कोई मुकाबला नहीं कर सकता है। हम सही वक्त पर सही नाटक करते हैं। मुखौटा लगाते हैं।
संपर्क ही वह मुखौटा है, जिसे देखते ही बड़ी-बड़ी बीमारियां ठीक हो जाती है। मान लिजिए आपका पेट गैस से भरा है। बिना किसी से बोले तो आपकी यह बीमारी बढ़ती जाएगी। जन संपर्क होगा तभी तो बोल-बतिया सकेंगे। दीवारों से तो बातें करेंगे नहीं ना। इसलिए कहा कि संपर्क से हर बिगड़ा काम बन जाता है। कोई फाइल अटकी है या भटकी है, तो उसका एक ही तरीका है- संपर्क। हमारे राजस्थान में तो सम्पर्क का कुछ अधिक ही महत्त्व स्वीकार करते हुए जन सामान्य की शिकायतों को दर्ज करने और समस्याओं के निराकरण हेतु अभिनव प्रयास का नाम ही राजस्थान संपर्क रख दिया गया है। यहां बिना कार्यालय में उपस्थित हुए समस्याओं को ऑनलाइन दर्ज करने की सुविधा दी गई है। संपर्क की महिमा है कि जिलों में संपर्क कार्यालय खुले हैं। हमारी समस्याओं को हल करने के लिए सरकार ने भी संपर्क को चुना है। पंच काका का मानना हैं कि आज के युग में संपर्क ही लोकप्रिय बला है। मुझ से वे अक्सर कहते हैं कि केवल लिखने-पढ़ने से कुछ नहीं होगा। किसी रचना को ढंग की जगह छपवाना है, तो संपर्क सही करो, फिर देखो कमाल। काका के कहने पर मैं संकल्प लेता हूं कि अब संपर्क बढ़ाने पर ध्यान दूंगा।
 ० नीरज दइया
 

16 दिसंबर, 2016

नियम वहां, जहां कोई पूछे

सुबह-सुबह का वक्त था। मैं किसी काम से मोटर साइकल पर कहीं जा रहा था। हाइवे के मोड़ के करीब था, इतने में एक मोटर साइकिल ने ओवरटेक किया। दो सज्जनों की यह सवारी तेज गति से आगे निकली तो ध्यान जाना स्वभाविक था। मुझे गुस्सा आया कि एक तो बिना हेलमेट के हाइवे पर छावनी क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं, और गति भी आवश्यकता से अधिक है। पर यह क्या मैंने देखा कि चालू बाइक पर दोनों सज्जनों ने जल्दी-जल्दी अपने-अपने हेलमेट पहन लिए। ओह, कितने चालक है ये लोग। पता है कि यहां चैकिंग हो सकती है, तो नियम में आ गए। मैंने चलते-चलते अपने गतिमान मन को समझाय कि हे पगले मन ! ऐसे कितनों की सोच करेगा। नियम तो सब अपनी जगह होते हैं। उनको कब-कहां मानना है अथवा कहां नहीं मानना, इसका निर्धारण खुद नियम तो करते नहीं है। यातायात का एक नियम मानकर मैं महान बन गया, और उपदेश की मुद्रा में पहुंच गया हूं। मैंने विचार किया कि मैं भी घर के आस-पास कहीं निकलता हूं तो हेलमेट कहां पहनता हूं। नियम भंग तो भंग ही है, चाहे कभी भी करो। बात हमारी सुरक्षा और भले की है। फिर भी हम जो हैं, अपने फायदे के अनुसार ही नियमों का पालन करते हैं।
पंच काका कहते हैं कि सरकार खुद चाहती है कि लोग नियम तोड़े। जिसे बर्बाद होना है उसे बर्बाद होने देना क्या है? नहीं समझे, देखो बीड़ी-सिगरेट और वाइन आदमी की स्वास्थ्य को बर्बाद करती है। ठीक बात है तो कहो- हां। तो पंच काका का मानना है कि स्वास्थ्य के लिए जो हानिकार चीजे हैं, उन पर सरकार रोक क्यों नहीं लगाती है। उन्हें बंद क्यों नहीं करती है। मैंने कहा कि वहां चेतावनी लिखी रहती है फिर भी लोग अगर सेवन करते हैं तो सरकार की गलती कहां है। पंच काका को मेरा बीच में बोलना बर्दाश्त नहीं होता। पंच काका क्या किसी भी बड़े-बुजुर्ग को अपनों से छोटों का बीच में बोलना सहन नहीं होता। उन्होंने जबाब दिया कि बहुत बारीक अक्षरों में लिखा होता है। उन्हें पढ़ने के लिए हम आंखें कहां से लाएं? इतने बारीक अक्षरों में लिखने से नियम का पालना हो गया पूरा। बीड़ी-सिगरेट, पान-जर्दा या फिर दारू-मारू ये सब बंद क्यों नहीं करते हो। जब ये चीजें गुणकारी-लाभप्रद नहीं, फिर बेचने-खरीदने की पाबंदी क्यों नहीं। माना कि पाबंद का अर्थ पूरी रोक नहीं होता। पाबंदी पूरी पाबंदी तो कभी होती ही नहीं। एक राज्य में शराबबंदी के चलते लोग सैर-सपाटा करने दूसरे राज्य में चले आते हैं, अपने आनंद को मानाते हुए लौटते हैं। चोरी-छिपे जो गोरखधंधा होता है, वह तो होता ही रहेगा। सारी पाबंद और बंदी बस कुछ लोगों को दिखाने के रास्ते हैं। हाथी के हांत हैं। नोटबंदी में बुरा हाल हुआ तो गरीबों का हुआ, पर अमीरों के आनंद में कौनसा खलल पड़ा। पंच काका बोले- सची बात है कि नियमों में ही कुछ ऐसा किया-धरा होता है कि रामजी बच कर निकल जाते हैं, और श्यामजी फस जाते हैं। एक बच के निकल जाए और दूसरा फस जाए, तो इसे कहते हैं- राम राज्य? मैंने फिर प्रतिवाद किया कि काका यह तो व्यक्ति-व्यक्ति पर निर्भर है कि उसे क्या आता है और क्या नहीं आता। मान लो किन्हीं दो आदमियों को पानी में फैंका जाता है, तो एक निकल कर बाहर आ जाए और दूसरा डूब जाए तो इसे क्या कहोगे? जो निकल आया है, उसे तैरना आता था और जो डूब गया वह लल्लू था जो तैरना नहीं जानता था। यह सीधा-सा सिद्धांत है कि नियमों के जाल से जिसे बचना आता है वह बच जाता है और जो बचना नहीं जानता वह बेचार फस जाता है। चाचा जी, नियम तो बेचारे उस जाल की तरह है जिसे एक बहेलिये ने बिछाया तो पक्षियों को पकड़ने के लिए था, पर वे होसियार निकले। पूरे जाल को ही लेकर उड गए। अब चाचा जी हंसे और बोले- यह बात जोरदर कही।

- नीरज दइया

14 दिसंबर, 2016

एबी कुत्ता और खेबी बिल्ली

मुझे याद है कि पंच काका और काकी जी में इस बात को लेकर लड़ाई हुई थी कि कुत्ता खरीदें या कुतिया। फैसला टॉस से हुआ। हमारे घर एक कुत्ता आया। मैंने पूछा- काका इसका नाम क्या रखें? वे बोले- नाम में क्या है, कुछ भी रख लो। चलो एबी रख लेते हैं। पर देखना तुम्हारी काकी जरूर खेबी करेगी। यह नाम चल निकला, बाद में मेरे लड़के ने बताया कि एबी तो बहुत अच्छा नाम है। उसका तर्क था कि दक्षिण अफ्रीका के सबसे तेज़ शतक लगाने वाले क्रिकेट खिलाड़ी का नाम भी एबी है। यह पंच काका ने सुना तो जोर से हंसे और बोले- अपने अमिताभ बच्चन का सोर्ट नेम क्या है भैया? मैं थोड़ा नाराज हुआ, कहा- यह बात ठीक नहीं है। एबी हमारा कुत्ता है, और उसके नाम से किसी का कोई लेना-देना नहीं है।
हमने कुत्ता क्या लिया कि बधाई देने वालों का तांता लग गया। लोग मुबारकबाद देने लगे तो देते ही गए। वे गिफ्ट लाते और कितना अच्छा लगा हमें। सब एबी-एबी करते हुए हमारे कुत्ते को देख कर खुश होते। उन्हें खुश देख कर हम खुश होते। यही तो जीवन है। इसमें खुशियां ढूंढ़नी पड़ती है। उसके बाद तो यह सिलसिला चला जो भी घर आता, एबी से बिना मिले नहीं जाता। उसके बारे में बातें करने वालों की संख्या दिन-दूनी और रात-चौगुनी होने लगी। इस संख्या का हमें पता तब चला जब एबी बीमार हुआ। पंच काका और एबी के प्रशंसक बीमार एबी का हालचाल जानने घर आने लगे। आपके कुत्ते के प्रशंसक कैसे हैं, यह आप जाने। हमारे वाले तो देखिए- कोई सेव ला रहा है, कोई केले, कोई बिस्किट, कोई नमकीन और मिठाई तक ला रहा है। मैंने एक शरारत की। एक आगंतुक से पूछ लिया- यह सब क्यों लाएं है? एबी तो कुछ खाता नहीं। वे बोले- कोई बात नहीं। आप सब तो हैं ही। हम सब थे जो एबी के नाम से आने वाली चीजों को ग्रहण कर रहे थे। पंच काका के मन में क्या था, यह तो मैं नहीं जानता पर मैं सोच रहा था- हम तो कभी किसी के घर ऐसा कुछ लेकर गए नहीं, फिर ये सब कोई बोझ उतार रहें या चढ़ा रहे हैं।
एबी के जीवन का तीसरा परिच्छेद आया। पर यह इतना जल्दी आएगा हमने सोचा नहीं था। बेहद दुख और भारी मन से हमने सभी को सूचित किया- एबी इज नो मोर। फिर से वही लोग जो पहले आए थे, शोक प्रदर्शित करने के लिए आने लगे। दुख और संकट की घड़ियों में भी उन आने वालों में से कुछ ऐसे भले लोग भी आते थे, जो कुछ न कुछ छोटा-मोटा उपहार ले आते। वे कहते- किसी के यहां खाली हाथ जाना हमें अच्छा नहीं लगता। यह हमारा सम्मान था कि उनका सम्मान था। पर कुछ न कुछ सामान लाने वाले हमें बहुत अच्छे लगने लगे। बाद में तो इतने अच्छे लगने लगे कि खाली हाथ आने वालों को हम देखते और मन ही मन कहते कि आप भी इन लोगों से कुछ प्रेरणा क्यों नहीं लेते।
पंच काका और काकी दोनों बैठे थे कि उनका कोई अजीज मित्र आया। वह बोला- अब एबी के बिना आप का मन कैसे लगेगा। आप में आपस में कितना प्यार हो गया था। वह आगे बोला- मुझे याद है आप मेरे घर के मूर्हत और खाने पर आने वाले थे, पर नहीं आए। बाद में पता चला कि एबी बीमार हो गया था। तभी मैं सोच रहा था कि आप जरूर आते, पर ऐसी स्थिति में कैसे आते। मेरा एक सुझाव है कि आप अपना मन बहलाने के लिए कोई दूसरा कुत्ता-कुत्ती या बिल्ला-बिल्ली खरीद लो। पंच काका सहमत हो गए, मुझे बेहद आश्चर्य हुआ। यह क्या बिल्ला खरीदें या बिल्ली इस पर टॉस भी हो गया। इस बार काकी की जीत हुई और तय हुआ हम बिल्ला नहीं बिल्ली खरीदेंगे। मैं ऐसा मौका क्यों छोड़ने वाला था, तुरंत प्रकट हुआ बीच में बोला- काका, हम बिल्ली का नाम खेबी रखेंगे।
- नीरज दइया
 

12 दिसंबर, 2016

अंकज्योषित का चक्कर

कोई माने या ना माने, मुझे तो अंकज्योतिष पर पूरा विश्वास है। सब कुछ नाम में ही तो समाया है। अगर नाम में शक्ति नहीं होती तो हजारों वर्षों से नाम की महिमा यूं ही नहीं चली आती। नाम सुमरिन से तो बेड़ा पार हो जाता है। मुक्ति का आधार ही नाम है और नए जमाने में तो बस सब कुछ नाम का ही खेल है। जो है नाम वाला वही तो बदनाम है। नाम हो या बदनाम हो, होता तो आखिर नाम ही है ना। हमें तो सब को बस अपने-अपने नाम और काम से मतलब होना चाहिए। अंकज्योतिष ने जब आज जब दुनिया भर के लोगों के जीवन में महत्त्व हासिल कर लिया है, तब एक नाम का एक नया अर्थ और दूसरे नाम का दूसरा नया अर्थ निकला जाना स्वाभाविक है। यह सब स्वरों और व्यंजनों का खेल है। बस जरा-सा फेर-फार और आपकी किसमत का बंद ताला खटाक से खुल जाएगा।
अंकज्योतिष की अवधारणा है कि आपके नाम की जरा-सी स्पेलिंग बदलने से आपके साथ घटित होने वाला सब कुछ जो उलटा-पुलटा है उसे ठीक किया जा सकता है। अंग्रेजी नाम में किसी एक लेटर को जोड़ देने, कम कर देने या बदल देने से अंकभार घटा-बढ़ा कर सब कुछ बदला जा सकता है। आपको बस एक बार यकीन करना होगा कि आपके भी अच्छे दिन आ सकते हैं। अच्छे दिनों को लाने के लिए हम सब ने अब तक क्या-क्या नहीं किया? जब इतना कुछ किया है तो क्या थोड़ा सा यह भी नहीं कर सकते हैं? करना क्या है आपको? बस यही कि आप अंकज्योतिष पर यकीन कर लेंवे।
यह आपके जीवन में एक बहुत अच्छा निर्णय हो गया है कि आपने अंकज्योतिष पर यकीन कर लिया है। मुझे नहीं मालूम कि आपको इसकी जानकारी है भी अथवा नहीं है कि ज्योतिष दुनिया में सबसे प्राचीन और आधुनिक विज्ञान के बीच जगह बनाता है। आप जब एक अंकज्योतिष के पास सलाह लेने पहुंचेंगे और बातों पर यकीन करेंगे तो पाएंगे कि कुछ महीने बात मान लेने से परिवर्तन साफ दिखाई देगा। आपके आस-पास सभी चीजे बेहतर होने लगेगी। आपके व्यक्तिगत और पेशेवर जिंदगी में आपको लगेगा कि आपने मोर्चा मार लिया है। लोग भले इसे महसूस करें या नहीं करें पर आपको लगने लगेगा कि खुद में जबरदस्त आंतरिक परिवर्तन होने लगा है। ठहराव ठीक नहीं इसलिए यह बदलाव जरूरी है।
मेरे साथ सब कुछ ठीक हो रहा है और ठीक चल रहा है फिर मुझे अंकज्योतिष के पास जाने की क्या जरूरत ऐसा सोचना ही गलत है। अगर सभी लोग ऐसे ही सोचने लगे तो उनका धंधा कैसे चलेगा। हमें तो आंखें मूंद कर विश्वास करने की आवश्यकता है। मेरे जैसे बहुत लोग हैं जो अंकज्योषित के पास जाते है और आंखें खोल कर विश्वास करते हैं। यह सकारात्मकता का एक रास्ता है, जिसे पा लेना जरूरी है।
बेशक पंच काका का मानना है कि ग्रह, नक्षेत्र, राशि, अंक ढेर सारे जाल गणित पर आधारित है। गौर करने की बात यह है कि हम सब के भीतर सकारात्मकता और नकारात्मकता होती है। यह बस हमारे मानने कि बात है कि हम अपनी सकारात्मकता को पहचान लें। सकारात्मकता अंदर महसूस करने की चीज है और एक बेहतर जीवन व्यतीत करने में यही मदद करती है। वे कहते हैं कि हर आदमी को एक रास्ता चाहिए। रास्ता तो खुद हमारे पास है। रास्ते की पहचान होनी चाहिए। इसी पहचान को हम फ्री में प्राप्त कर सकते हैं या फिर कोई भी हो सकता है जिस पर हम विश्वास करते हैं और कुछ खर्च कर के यही ज्ञान प्राप्त करते हैं। अब अंकज्योतिष को ही लो। यह अंकों का खेल है जो अगर कोई पढ़ा-लिखा या कम पढ़ा-लिखा थोड़े दिन इस में माथापच्ची करे तो पूरी जानकारी हासिल कर सकता है।
- नीरज दइया